नागर खण्ड · अध्याय 138
धर्मराजेश्वर की उत्पत्ति और धर्मराज का विदुर रूप में जन्म
श्लोक 1 (skanda.6.138.1)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ किं कृतं धर्मराजेन तपोध्यानादिकं च यत्॥ मांडव्यशापनाशाय तदस्माकं प्रकीर्तय
ṛṣaya ūcuḥ kiṁ kṛtaṁ dharmarājena tapodhyānādikaṁ ca yat māṁḍavyaśāpanāśāya tadasmākaṁ prakīrtaya
ऋषि बोले - माण्डव्य के शाप को दूर करने के लिए धर्मराज ने जो तप, ध्यान आदि किया, वह हमें बताइए।
श्लोक 2 (skanda.6.138.2)
॥ सूत उवाच ॥ मांडव्य शापमासाद्य धर्मराजः सुदुःखितः ॥ तपस्तेपे द्विजश्रेष्ठास्तस्मिन्क्षेत्रे व्यवस्थितः
sūta uvāca māṁḍavya śāpamāsādya dharmarājaḥ suduḥkhitaḥ tapastepe dvijaśreṣṭhāstasminkṣetre vyavasthitaḥ
सूत जी ने कहा - हे श्रेष्ठ द्विजो! माण्डव्य के शाप को प्राप्त होकर अत्यंत दुःखी धर्मराज उसी क्षेत्र में रहकर तप करने लगे।
श्लोक 3 (skanda.6.138.3)
प्रासादं देवदेवस्य संविधाय कपर्दिनः ॥ अव्यग्रं पूजयामास पुष्पधूपानुलेपनैः
prāsādaṁ devadevasya saṁvidhāya kapardinaḥ avyagraṁ pūjayāmāsa puṣpadhūpānulepanaiḥ
उन्होंने जटाधारी देवदेव (शिव) का एक मन्दिर बनवाकर, पुष्प, धूप और अनुलेपन से शांतचित्त होकर उनकी पूजा की।
श्लोक 4 (skanda.6.138.4)
ततः कालेन महता तुष्टस्तस्य महेश्वरः ॥ प्रोवाच वरदोऽस्मीति प्रार्थयस्व यदीप्सितम्
tataḥ kālena mahatā tuṣṭastasya maheśvaraḥ provāca varado'smīti prārthayasva yadīpsitam
तब बहुत समय बीतने पर उनसे प्रसन्न होकर महेश्वर बोले - मैं वरदाता हूँ, जो चाहो वह माँग लो।
श्लोक 5 (skanda.6.138.5)
॥ धर्मराज उवाच ॥ अहं देव पुरा शप्तो मांडव्येन महात्मना ॥ स्वधर्मे वर्तमानोऽपि सर्वदोषविवर्जितः
dharmarāja uvāca ahaṁ deva purā śapto māṁḍavyena mahātmanā svadharme vartamāno'pi sarvadoṣavivarjitaḥ
धर्मराज बोले - हे देव! अपने ही धर्म में स्थित रहते हुए और सब दोषों से रहित होते हुए भी मुझे महात्मा माण्डव्य ने पूर्वकाल में शाप दिया था।
श्लोक 6 (skanda.6.138.6)
कुपितेन च तेनोक्तं शूद्रयोनौ भविष्यसि
kupitena ca tenoktaṁ śūdrayonau bhaviṣyasi
क्रोधित होकर उन्होंने कहा था कि तुम शूद्र-योनि में जन्म लोगे।
श्लोक 7 (skanda.6.138.7)
तत्रापि च महद्दुःखं ज्ञातिनाशसमुद्रवम् ॥ मच्छापजनितं सद्यो जातिजं समवाप्स्यसि
tatrāpi ca mahadduḥkhaṁ jñātināśasamudravam macchāpajanitaṁ sadyo jātijaṁ samavāpsyasi
और वहाँ भी मुझे मेरे शाप से उत्पन्न, अपनी ही जाति के विनाश से जनित महान दुःख शीघ्र ही प्राप्त होगा, ऐसा उन्होंने कहा।
श्लोक 8 (skanda.6.138.8)
तस्मात्त्राहि सुरश्रेष्ठ तस्या योनेः सकाशतः ॥ कथं चैतद्विधो भूत्वा तस्यां जन्म करोम्यहम्
tasmāttrāhi suraśreṣṭha tasyā yoneḥ sakāśataḥ kathaṁ caitadvidho bhūtvā tasyāṁ janma karomyaham
इसलिए हे श्रेष्ठ देव! मुझे उस योनि से बचाइए, अथवा यह बताइए कि इस प्रकार का बनकर मैं वहाँ जन्म कैसे लूँ।
श्लोक 9 (skanda.6.138.9)
तत्रापि च महदुःखं ज्ञातिनाशसमुद्भवम्॥ एतदर्थे सुरश्रेष्ठ मया चाराधितो भवान्॥
tatrāpi ca mahaduḥkhaṁ jñātināśasamudbhavam etadarthe suraśreṣṭha mayā cārādhito bhavān
और वहाँ भी मुझे स्वजन-नाश से उत्पन्न महान दुःख प्राप्त होगा; हे श्रेष्ठ देव! इसी प्रयोजन से मैंने आपकी आराधना की है।
श्लोक 10 (skanda.6.138.10)
॥ श्रीभगवानुवाच ॥ न तस्य सन्मुनेर्वाक्यं शक्यते कर्तुमन्यथा ॥ तस्माच्छूद्रोऽपि भूत्वा त्वं न संतानमवाप्स्यसि
śrībhagavānuvāca na tasya sanmunervākyaṁ śakyate kartumanyathā tasmācchūdro'pi bhūtvā tvaṁ na saṁtānamavāpsyasi
श्रीभगवान बोले - उस सत्पुरुष मुनि का वचन अन्यथा नहीं किया जा सकता; इसलिए तुम शूद्र बनोगे तो अवश्य, किन्तु तुम्हें कोई संतान प्राप्त नहीं होगी।
श्लोक 11 (skanda.6.138.11)
ज्ञातिक्षयं प्रदृष्ट्वापि नैव दुःखमवाप्स्यसि ॥ यतो निषिध्यमानापि न करिष्यंति ते वचः
jñātikṣayaṁ pradṛṣṭvāpi naiva duḥkhamavāpsyasi yato niṣidhyamānāpi na kariṣyaṁti te vacaḥ
स्वजन-नाश देखकर भी तुम्हें दुःख प्राप्त नहीं होगा, क्योंकि मना करने पर भी वे तुम्हारी बात नहीं मानेंगे (अर्थात् तुम्हारे कोई अपने संतति ही न होंगे)।
श्लोक 12 (skanda.6.138.12)
एतस्मात्कारणाच्चित्ते न ते दुःखं भविष्यति ॥ ज्ञातिजं धर्मराजैतत्सत्यमेव मयोदितम्
etasmātkāraṇāccitte na te duḥkhaṁ bhaviṣyati jñātijaṁ dharmarājaitatsatyameva mayoditam
इसी कारण से, हे धर्मराज! तुम्हारे मन में स्वजनों से उत्पन्न दुःख नहीं होगा; यह मैंने सत्य ही तुमसे कहा है।
श्लोक 13 (skanda.6.138.13)
स्थित्वा वर्षशतं प्राज्ञ त्वं शूद्रो धर्मवत्सलः ॥ उपदेशान्बहून्दत्त्वा ज्ञातिभ्यो हितकाम्यया ॥ अपि श्रद्धा विहीनेषु पापात्मसु सदैव हि
sthitvā varṣaśataṁ prājña tvaṁ śūdro dharmavatsalaḥ upadeśānbahūndattvā jñātibhyo hitakāmyayā api śraddhā vihīneṣu pāpātmasu sadaiva hi
हे बुद्धिमान! तुम धर्म-प्रिय शूद्र बनकर सौ वर्ष तक रहोगे, और अपने कुटुम्बीजनों को उनके हित की कामना से, चाहे वे श्रद्धाहीन और पापी ही क्यों न हों, निरंतर बहुत से उपदेश दोगे।
श्लोक 14 (skanda.6.138.14)
ततो वर्षशते पूर्णे ब्रह्मद्वारेण केवलम् ॥ आत्मानं सम्यगुत्सृज्य मोक्षमेव प्रयास्यसि
tato varṣaśate pūrṇe brahmadvāreṇa kevalam ātmānaṁ samyagutsṛjya mokṣameva prayāsyasi
फिर सौ वर्ष पूर्ण होने पर, ब्रह्मरन्ध्र के द्वार से ही अपने शरीर का भली-भाँति त्याग करके, तुम मोक्ष को ही प्राप्त होगे।
श्लोक 15 (skanda.6.138.15)
एवमुक्त्वा स भगवान्गतश्चादर्शनं ततः ॥ धर्मराजोऽपि तं शापं भेजे मांडव्यसंभवम्
evamuktvā sa bhagavāngataścādarśanaṁ tataḥ dharmarājo'pi taṁ śāpaṁ bheje māṁḍavyasaṁbhavam
ऐसा कहकर वे भगवान वहाँ से अदृश्य हो गए; और धर्मराज ने भी माण्डव्य से उत्पन्न उस शाप को भोगा।
श्लोक 16 (skanda.6.138.16)
तदा विदुररूपेण ह्यवतीर्य धरातले ॥ मांडव्यस्य वचः सत्यं स चकार महामतिः
tadā vidurarūpeṇa hyavatīrya dharātale māṁḍavyasya vacaḥ satyaṁ sa cakāra mahāmatiḥ
तब उस महामति ने विदुर के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेकर माण्डव्य के वचन को सत्य कर दिखाया।
श्लोक 17 (skanda.6.138.17)
जातो भगवता साक्षाद्व्यासेनामिततेजसा ॥ पाराशर्येण विप्रेण दासीगर्भसमुद्भवः
jāto bhagavatā sākṣādvyāsenāmitatejasā pārāśaryeṇa vipreṇa dāsīgarbhasamudbhavaḥ
वह अमित तेजस्वी भगवान पराशर-पुत्र व्यास के द्वारा साक्षात् उत्पन्न होकर एक दासी के गर्भ से जन्मा।
श्लोक 18 (skanda.6.138.18)
एतद्वः सर्वमाख्यातं धर्मराजसमुद्भवम् ॥ आख्यानं यदहं पृष्टः सर्वपातकनाशनम्
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ dharmarājasamudbhavam ākhyānaṁ yadahaṁ pṛṣṭaḥ sarvapātakanāśanam
यह धर्मराज की उत्पत्ति से संबंधित संपूर्ण, सब पापों का नाश करने वाला आख्यान, जो मुझसे पूछा गया था, मैंने तुम्हें सुना दिया है।