नागर खण्ड · अध्याय 139
धर्मराजेश्वर का माहात्म्य: शोकाकुल ब्राह्मण का शाप
श्लोक 1 (skanda.6.139.1)
॥ सूत उवाच ॥ धर्मराजेश्वरोत्थं च माहात्म्यं द्विजसत्तमाः ॥ यन्मया प्रश्रुतं पुण्यं सकाशात्स्वपितुः पुरा
sūta uvāca dharmarājeśvarotthaṁ ca māhātmyaṁ dvijasattamāḥ yanmayā praśrutaṁ puṇyaṁ sakāśātsvapituḥ purā
सूत जी ने कहा - हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! धर्मराजेश्वर से संबंधित जो पुण्यमय माहात्म्य मैंने पूर्वकाल में अपने पिता से सुना था,
श्लोक 2 (skanda.6.139.2)
तदहं कीर्तयिष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिताः ॥ त्रैलोक्येऽपि सुविख्यातं सर्व पातकनाशनम्
tadahaṁ kīrtayiṣyāmi śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ trailokye'pi suvikhyātaṁ sarva pātakanāśanam
वह मैं तुम्हें सुनाऊँगा; एकाग्रचित्त होकर सुनो - यह तीनों लोकों में सुविख्यात और सब पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 3 (skanda.6.139.3)
तत्र क्षेत्रे पुरा विप्रः कश्यपान्वयसंभवः ॥ उपाध्याय इति ख्यातो वेदविद्यापरायणः
tatra kṣetre purā vipraḥ kaśyapānvayasaṁbhavaḥ upādhyāya iti khyāto vedavidyāparāyaṇaḥ
पूर्वकाल में उस क्षेत्र में कश्यप-वंश में उत्पन्न, वेदविद्या में तत्पर, उपाध्याय नाम से विख्यात एक ब्राह्मण रहता था।
श्लोक 4 (skanda.6.139.4)
पश्चिमे वयसि प्राप्ते तस्य पुत्रो बभूव ह ॥ स्वाध्यायनियमस्थस्य प्रभूतविभवस्य च
paścime vayasi prāpte tasya putro babhūva ha svādhyāyaniyamasthasya prabhūtavibhavasya ca
स्वाध्याय-नियम में स्थित और अत्यंत ऐश्वर्यशाली उस ब्राह्मण को जीवन की अंतिम अवस्था में एक पुत्र प्राप्त हुआ।
श्लोक 5 (skanda.6.139.5)
पञ्चवर्षकमात्रस्तु यदा जज्ञे च तत्सुतः ॥ तदा मृत्युवशं प्राप्तः पितृमातृसुदुःखकृत्
pañcavarṣakamātrastu yadā jajñe ca tatsutaḥ tadā mṛtyuvaśaṁ prāptaḥ pitṛmātṛsuduḥkhakṛt
वह पुत्र जब मात्र पाँच वर्ष का हुआ, तभी मृत्यु के वश में हो गया, और अपने माता-पिता को अत्यंत दुःख देने वाला बना।
श्लोक 6 (skanda.6.139.6)
ततः स ब्राह्मणः कोपं चक्रे वैवस्वतोपरि ॥ धर्मराजगृहं प्राप्तं दृष्ट्वा निजकुमारकम्
tataḥ sa brāhmaṇaḥ kopaṁ cakre vaivasvatopari dharmarājagṛhaṁ prāptaṁ dṛṣṭvā nijakumārakam
तब वह ब्राह्मण अपने पुत्र को धर्मराज (यम) के घर पहुँचा हुआ देखकर वैवस्वत (यम) पर क्रुद्ध हो गया।
श्लोक 7 (skanda.6.139.7)
आदाय सलिलं हस्ते शुचिर्भूत्वासमाहितः ॥ प्रददौ दारुणं शापं धर्मराजाय दुःखितः
ādāya salilaṁ haste śucirbhūtvāsamāhitaḥ pradadau dāruṇaṁ śāpaṁ dharmarājāya duḥkhitaḥ
हाथ में जल लेकर, पवित्र होकर, और असंयत होकर, दुःखित उस ब्राह्मण ने धर्मराज को अत्यंत भयंकर शाप दिया।
श्लोक 8 (skanda.6.139.8)
अपुत्रोऽद्य कृतो यस्मादहं तेन दुरात्मना ॥ अतः सोऽपि च दुष्टात्मा यमोऽपुत्रो भविष्यति
aputro'dya kṛto yasmādahaṁ tena durātmanā ataḥ so'pi ca duṣṭātmā yamo'putro bhaviṣyati
उस दुरात्मा ने मुझे आज पुत्रहीन कर दिया है, इसलिए वह दुष्टात्मा यम भी पुत्रहीन ही रहेगा।
श्लोक 9 (skanda.6.139.9)
तथास्य भूतले लोको नैव पूजां विधास्यति ॥ कीर्तयिष्यति नो नाम यथान्येषां दिवौकसाम्
tathāsya bhūtale loko naiva pūjāṁ vidhāsyati kīrtayiṣyati no nāma yathānyeṣāṁ divaukasām
इसी प्रकार पृथ्वीतल पर संसार उसकी पूजा नहीं करेगा, और अन्य देवताओं की तरह उसका नाम भी नहीं लेगा।
श्लोक 10 (skanda.6.139.10)
यः कश्चित्प्रातरुत्थाय नाम चास्य ग्रहीष्यति ॥ मंगल्यकरणे चाथ विघ्नं तस्य भविष्यति
yaḥ kaścitprātarutthāya nāma cāsya grahīṣyati maṁgalyakaraṇe cātha vighnaṁ tasya bhaviṣyati
जो भी मनुष्य प्रातःकाल उठकर उसका नाम लेगा, उसके किसी भी मंगल-कार्य में विघ्न उत्पन्न हो जाएगा।
श्लोक 11 (skanda.6.139.11)
तं श्रुत्वा तस्य विप्रस्य यमः शापं सुदारुणम् ॥ स्वधर्मे वर्तमानस्तु ततो दुःखा न्वितोऽभवत्
taṁ śrutvā tasya viprasya yamaḥ śāpaṁ sudāruṇam svadharme vartamānastu tato duḥkhā nvito'bhavat
उस ब्राह्मण के इस अत्यंत भयंकर शाप को सुनकर, अपने ही धर्म में स्थित रहने वाले यम अत्यंत दुःखी हो गए।
श्लोक 12 (skanda.6.139.12)
एतस्मिन्नंतरे गत्वा ब्रह्मणः सदनं प्रति ॥ कृतांजलिपुटो भूत्वा यमः प्राह पितामहम्
etasminnaṁtare gatvā brahmaṇaḥ sadanaṁ prati kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā yamaḥ prāha pitāmaham
इसी बीच ब्रह्मा के भवन में जाकर, हाथ जोड़कर, यम ने पितामह से कहा।
श्लोक 13 (skanda.6.139.13)
पश्य देवेश शप्तोऽहं निर्दोषोपि द्विजन्मना ॥ स्वधर्मे वर्तमानस्तु यथान्यः प्राकृतो जनः
paśya deveśa śapto'haṁ nirdoṣopi dvijanmanā svadharme vartamānastu yathānyaḥ prākṛto janaḥ
हे देवेश! देखिए, अपने ही धर्म में स्थित रहते हुए, किसी सामान्य प्राकृत मनुष्य की भाँति निर्दोष होते हुए भी मुझे एक ब्राह्मण ने शाप दे दिया है।
श्लोक 14 (skanda.6.139.14)
तस्मादहं त्यजिष्यामि नियोगं ते पितामह ॥ ब्रह्मशापभया द्भीतः सत्यमेतन्मयोदितम्
tasmādahaṁ tyajiṣyāmi niyogaṁ te pitāmaha brahmaśāpabhayā dbhītaḥ satyametanmayoditam
इसलिए हे पितामह! मैं आपका यह कार्यभार त्याग दूँगा; मैंने यह ब्रह्मशाप के भय से डरकर सत्य ही कहा है।
श्लोक 15 (skanda.6.139.15)
पुरा मांडव्यशापेन शूद्रयोन्यवतारितः ॥ सांप्रतं पुत्ररहितः कृतोऽपूज्यश्च सत्तम
purā māṁḍavyaśāpena śūdrayonyavatāritaḥ sāṁprataṁ putrarahitaḥ kṛto'pūjyaśca sattama
हे सत्तम! पहले मैं माण्डव्य के शाप से शूद्र-योनि में उतार दिया गया था, और अब मुझे पुत्रहीन और अपूज्य बना दिया गया है।
श्लोक 16 (skanda.6.139.16)
॥ सूत उवाच ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दीनं वैवस्वतस्य च ॥ तत्कालोचितमाहेदं स्वयमेव शतक्रतुः
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā dīnaṁ vaivasvatasya ca tatkālocitamāhedaṁ svayameva śatakratuḥ
सूत जी ने कहा - वैवस्वत के उस दीन वचन को सुनकर, उस समय के अनुरूप यह वचन स्वयं इंद्र ने कहा।
श्लोक 17 (skanda.6.139.17)
युक्तमुक्तमनेनैतद्धर्मराजेन पद्मज ॥ नियोगे वर्तमानेन तावकीये सुरेश्वर
yuktamuktamanenaitaddharmarājena padmaja niyoge vartamānena tāvakīye sureśvara
हे कमलज ब्रह्मा! हे सुरेश्वर! अपने ही कार्यभार में तत्पर रहते हुए इस धर्मराज ने जो कुछ कहा है, वह उचित ही है।
श्लोक 18 (skanda.6.139.18)
अवश्यमेव मर्त्ये च मनुष्याः समये स्थिताः॥ बाल्ये वा यौवने वाथ वार्धक्ये वा पितामह ॥ संहर्तव्या न संदेहो नाकाले च कथंचन
avaśyameva martye ca manuṣyāḥ samaye sthitāḥ bālye vā yauvane vātha vārdhakye vā pitāmaha saṁhartavyā na saṁdeho nākāle ca kathaṁcana
हे पितामह! मृत्युलोक में मनुष्य निश्चय ही अपने-अपने काल पर स्थित हैं - चाहे बाल्यावस्था में, चाहे यौवन में, अथवा वृद्धावस्था में - उन्हें संहार करना ही है, इसमें कोई संदेह नहीं है, और वह भी कभी असमय में नहीं।
श्लोक 19 (skanda.6.139.19)
एतदेव कृतं नाम धर्मराजाख्यमुत्तमम् ॥ त्वया च सममित्रस्य समशस्त्रोर्महात्मनः
etadeva kṛtaṁ nāma dharmarājākhyamuttamam tvayā ca samamitrasya samaśastrormahātmanaḥ
आपने ही इस महात्मा को, जो सबका समान मित्र और समान शत्रु है, यह उत्तम 'धर्मराज' नाम दिया है।
श्लोक 20 (skanda.6.139.20)
तस्मादद्य समालोक्य कश्चिदेव विचिंत्यताम् ॥ उपायो येन निर्दोषो नियोगं कुरुते तव
tasmādadya samālokya kaścideva viciṁtyatām upāyo yena nirdoṣo niyogaṁ kurute tava
इसलिए आज भली-भाँति विचार करके कोई ऐसा उपाय सोचा जाए, जिससे यह निर्दोष रहते हुए ही आपका कार्यभार करता रहे।
श्लोक 21 (skanda.6.139.21)
॥ ब्रह्मोवाच ॥ ब्रह्मशापं न शक्तोऽह मन्यथाकर्तुमेवच ॥ उपायं च करिष्यामि सांप्रतं त्रिदशाधिप
brahmovāca brahmaśāpaṁ na śakto'ha manyathākartumevaca upāyaṁ ca kariṣyāmi sāṁprataṁ tridaśādhipa
ब्रह्मा बोले - मैं ब्रह्मशाप को अन्यथा करने में समर्थ नहीं हूँ; हे देवाधिप! परन्तु अभी मैं कोई उपाय करूँगा।
श्लोक 22 (skanda.6.139.22)
ततो ध्यानं प्रचक्रे स ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ तदर्थं सर्वदेवानां पुरतः सुस माहितः
tato dhyānaṁ pracakre sa brahmā lokapitāmahaḥ tadarthaṁ sarvadevānāṁ purataḥ susa māhitaḥ
तब लोकपितामह ब्रह्मा उसी प्रयोजन के लिए सब देवताओं के सामने एकाग्रचित्त होकर ध्यान में बैठ गए।
श्लोक 23 (skanda.6.139.23)
तस्यैवं ध्यानसक्तस्य प्रादुर्भूताः समंततः ॥ मूर्ता रोगाः सुरौद्रास्ते वातगुल्मकफात्मकाः ॥ अष्टोत्तरशतप्रायाः प्रोचुस्तं च कृतादराः
tasyaivaṁ dhyānasaktasya prādurbhūtāḥ samaṁtataḥ mūrtā rogāḥ suraudrāste vātagulmakaphātmakāḥ aṣṭottaraśataprāyāḥ procustaṁ ca kṛtādarāḥ
इस प्रकार ध्यान में लीन उनसे चारों ओर वात, गुल्म और कफ से युक्त, अत्यंत भयंकर, मूर्तिमान रोग प्रकट हुए - लगभग एक सौ आठ की संख्या में - और वे आदरपूर्वक उनसे बोले।
श्लोक 24 (skanda.6.139.24)
॥ रोगा ऊचुः ॥ किमर्थं देवदेवेश त्वया सृष्टा वयं विभो ॥ आदेशो दीयतां शीघ्रं प्रसादः क्रियतामिति
rogā ūcuḥ kimarthaṁ devadeveśa tvayā sṛṣṭā vayaṁ vibho ādeśo dīyatāṁ śīghraṁ prasādaḥ kriyatāmiti
रोग बोले - हे देवदेवेश! हे विभो! आपने हमें किस प्रयोजन के लिए उत्पन्न किया है? शीघ्र हमें आदेश दीजिए, और हम पर कृपा कीजिए।
श्लोक 25 (skanda.6.139.25)
॥ ब्रह्मोवाच ॥ व्रजध्वं भूतले शीघ्रं ममादेशादसंशयम् ॥ यमादेशान्मनुष्येषु गन्तव्यमविकल्पितम्
brahmovāca vrajadhvaṁ bhūtale śīghraṁ mamādeśādasaṁśayam yamādeśānmanuṣyeṣu gantavyamavikalpitam
ब्रह्मा बोले - मेरी आज्ञा से तुम निःसंदेह शीघ्र ही पृथ्वीतल पर जाओ; यम की आज्ञा से ही मनुष्यों के बीच बिना किसी विकल्प के जाना होगा।
श्लोक 26 (skanda.6.139.26)
एवमुक्त्त्वा तु तान्रोगांस्ततः प्राह पितामहः ॥ धर्मराजं समीपस्थं भृशं दीनमधोमुखम्
evamukttvā tu tānrogāṁstataḥ prāha pitāmahaḥ dharmarājaṁ samīpasthaṁ bhṛśaṁ dīnamadhomukham
उन रोगों से ऐसा कहकर, तब पितामह ने अपने निकट खड़े, अत्यंत दीन और मुँह नीचा किए हुए धर्मराज से कहा।
श्लोक 27 (skanda.6.139.27)
एते ते व्याधयः सर्वे मया यम नियोजिताः ॥ साहाय्यं च करिष्यंति सर्वकृत्येषु सर्वदा
ete te vyādhayaḥ sarve mayā yama niyojitāḥ sāhāyyaṁ ca kariṣyaṁti sarvakṛtyeṣu sarvadā
हे यम! मैंने ये सब व्याधियाँ तुम्हारे लिए नियुक्त की हैं; ये सदा सब कार्यों में तुम्हारी सहायता करेंगी।
श्लोक 28 (skanda.6.139.28)
यः कश्चिदधुना मर्त्यो गतायुः संप्रपद्यते ॥ वधाय तस्य यत्नेन त्वया प्रेष्याः सदैव तु
yaḥ kaścidadhunā martyo gatāyuḥ saṁprapadyate vadhāya tasya yatnena tvayā preṣyāḥ sadaiva tu
जो भी मनुष्य अब अपनी आयु समाप्त होकर मृत्यु के निकट पहुँचता है, उसके वध के लिए तुम इन्हें ही सदा प्रयत्नपूर्वक भेजना।
श्लोक 29 (skanda.6.139.29)
एतेषां जायते तेन जननाशसमुद्भवः ॥ अपवादो धरापृष्ठे न च संजायते तव
eteṣāṁ jāyate tena jananāśasamudbhavaḥ apavādo dharāpṛṣṭhe na ca saṁjāyate tava
इस प्रकार प्राणियों का नाश इन्हीं के द्वारा होता हुआ प्रतीत होगा, और पृथ्वीतल पर तुम्हें उसका दोष नहीं लगेगा।
श्लोक 30 (skanda.6.139.30)
तस्माद्गत्वा निजं स्थानं स्वाधिकारपरो भव ॥ ममादेशादसंदिग्धं नैवं दोषमवाप्स्यसि॥
tasmādgatvā nijaṁ sthānaṁ svādhikāraparo bhava mamādeśādasaṁdigdhaṁ naivaṁ doṣamavāpsyasi
इसलिए अपने स्थान पर जाकर फिर से अपने अधिकार में तत्पर हो जाओ; मेरी आज्ञा से निःसंदेह तुम इस प्रकार दोष को प्राप्त नहीं होगे।
श्लोक 31 (skanda.6.139.31)
ततस्तान्सकलान्व्याधीन्गृहीत्वा रविनंदनः॥ यमलोकं समासाद्य ततः प्रोवाच सादरम्
tatastānsakalānvyādhīngṛhītvā ravinaṁdanaḥ yamalokaṁ samāsādya tataḥ provāca sādaram
तब सूर्यपुत्र यम उन सब व्याधियों को साथ लेकर यमलोक पहुँचे, और वहाँ आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 32 (skanda.6.139.32)
पृष्ट्वापृष्ट्वा च गंतव्यं चित्रगुप्तं धरातले ॥ गंतव्यं जननाशाय समये समुपस्थिते
pṛṣṭvāpṛṣṭvā ca gaṁtavyaṁ citraguptaṁ dharātale gaṁtavyaṁ jananāśāya samaye samupasthite
पृथ्वीतल पर जाने से पहले सदा चित्रगुप्त से पूछ-पूछकर ही जाना चाहिए, और वह भी केवल तभी जाना चाहिए जब किसी प्राणी के नाश का उचित समय आ पहुँचा हो।
श्लोक 33 (skanda.6.139.33)
परमस्ति मया तत्र स्थापितं लिंगमुत्तमम्। हाटकेश्वरजेक्षेत्रे सर्वपातकनाशनम्
paramasti mayā tatra sthāpitaṁ liṁgamuttamam hāṭakeśvarajekṣetre sarvapātakanāśanam
किन्तु वहाँ हाटकेश्वर क्षेत्र में मेरे द्वारा स्थापित एक उत्तम लिंग है, जो सब पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 34 (skanda.6.139.34)
यस्तं पश्यति सद्भक्त्या प्रातरुत्थाय मानवः ॥ स युष्माभिः सदा त्याज्यो दूरतो वचनान्मम
yastaṁ paśyati sadbhaktyā prātarutthāya mānavaḥ sa yuṣmābhiḥ sadā tyājyo dūrato vacanānmama
जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर सच्ची भक्ति से उसका दर्शन करता है, वह मेरे इस वचन से तुम सबके द्वारा सदा दूर से ही त्याज्य रहे (अर्थात् उसे कभी मत छूना)।
श्लोक 35 (skanda.6.139.35)
एवमुक्त्वा स तान्व्याधींस्ततो वैवस्वतः स्वयम् ॥ तस्य विप्रस्य तं पुत्रं गृहीत्वा सत्वरं ययौ ॥ तस्यैव मंदिरे रम्ये कृत्वा रूपं द्विजन्मनः
evamuktvā sa tānvyādhīṁstato vaivasvataḥ svayam tasya viprasya taṁ putraṁ gṛhītvā satvaraṁ yayau tasyaiva maṁdire ramye kṛtvā rūpaṁ dvijanmanaḥ
उन व्याधियों से ऐसा कहकर, वैवस्वत (यम) स्वयं ही उस ब्राह्मण के उस पुत्र को साथ लेकर, ब्राह्मण का रूप धारण करके, शीघ्र ही उसी के सुन्दर घर की ओर चले।
श्लोक 36 (skanda.6.139.36)
अथासौ ब्राह्मणो दृष्ट्वा स्वं पुत्रं गृहमागतम् ॥ सहितं विप्ररूपेण धर्मराजेन धीमता
athāsau brāhmaṇo dṛṣṭvā svaṁ putraṁ gṛhamāgatam sahitaṁ viprarūpeṇa dharmarājena dhīmatā
तब उस ब्राह्मण ने अपने पुत्र को घर आया हुआ, और उसके साथ ब्राह्मण-रूपधारी बुद्धिमान धर्मराज को भी देखा।
श्लोक 37 (skanda.6.139.37)
ततः प्रहृष्टचित्तेन सत्वरं सम्मुखो ययौ ॥ पुत्रपुत्रेति जल्पन्स निजभार्यासमन्वितः
tataḥ prahṛṣṭacittena satvaraṁ sammukho yayau putraputreti jalpansa nijabhāryāsamanvitaḥ
तब हर्षित हृदय से 'पुत्र, पुत्र' कहते हुए वह अपनी पत्नी के साथ तुरंत उसके सामने आया।
श्लोक 38 (skanda.6.139.38)
परिष्वज्य ततो भूयो वाष्पपर्याकुलेक्षणः ॥ आघ्राय च ततो मूर्ध्नि वाक्यमेतदुवाच ह
pariṣvajya tato bhūyo vāṣpaparyākulekṣaṇaḥ āghrāya ca tato mūrdhni vākyametaduvāca ha
फिर बार-बार गले लगाकर, अश्रुओं से भरे नेत्रों वाला होकर, उसके सिर को सूँघकर उसने यह वचन कहा।
श्लोक 39 (skanda.6.139.39)
॥ ब्राह्मण उवाच ॥ कथं पुत्र समायातस्त्वं तस्मा द्यममंदिरात् ॥ न कश्चित्पुनरायाति यत्र गत्वाऽपि वीर्यवान्
brāhmaṇa uvāca kathaṁ putra samāyātastvaṁ tasmā dyamamaṁdirāt na kaścitpunarāyāti yatra gatvā'pi vīryavān
ब्राह्मण बोला - हे पुत्र! तुम उस यम-मंदिर से कैसे लौट आए? वहाँ जाकर तो कोई भी पराक्रमी पुनः नहीं लौटता।
श्लोक 40 (skanda.6.139.40)
किं वा चैतत्समुत्पन्नमिन्द्रजालं ममांतिकम् ॥ किं वा स्वप्नमिदं किं वा ममायं दृष्टिविभ्रमः
kiṁ vā caitatsamutpannamindrajālaṁ mamāṁtikam kiṁ vā svapnamidaṁ kiṁ vā mamāyaṁ dṛṣṭivibhramaḥ
क्या मेरे सामने यह कोई इन्द्रजाल उत्पन्न हुआ है? या यह स्वप्न है, अथवा यह मेरी दृष्टि का भ्रम है?
श्लोक 41 (skanda.6.139.41)
कश्चायं ब्राह्मणः पार्श्वे तव संतिष्ठते सुत ॥ दिव्येन तेजसा युक्तस्तं नमाम्यहमात्मज
kaścāyaṁ brāhmaṇaḥ pārśve tava saṁtiṣṭhate suta divyena tejasā yuktastaṁ namāmyahamātmaja
हे पुत्र! तुम्हारे पास खड़ा यह दिव्य तेज से युक्त ब्राह्मण कौन है? हे आत्मज! मैं इन्हें प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 42 (skanda.6.139.42)
॥ पुत्र उवाच ॥ एष ब्राह्मणरूपेण समायातो यमः स्वयम् ॥ मामादाय कृपाविष्टो ज्ञात्वा त्वां दुःखसंयुतम्
putra uvāca eṣa brāhmaṇarūpeṇa samāyāto yamaḥ svayam māmādāya kṛpāviṣṭo jñātvā tvāṁ duḥkhasaṁyutam
पुत्र बोला - यह स्वयं यम ही ब्राह्मण के रूप में आए हैं; आपको दुःखी जानकर, करुणा से भरकर वे मुझे स्वयं ले आए हैं।
श्लोक 43 (skanda.6.139.43)
तस्मात्त्वं कुरु तातास्य शापानुग्रहमद्य वै॥ गृहप्राप्तस्य सुस्नेहाद्यद्यहं तव वल्लभः
tasmāttvaṁ kuru tātāsya śāpānugrahamadya vai gṛhaprāptasya susnehādyadyahaṁ tava vallabhaḥ
हे तात! इसलिए यदि मैं आपको प्रिय हूँ, और मैं घर लौट आया हूँ, तो उसी स्नेह के कारण आज इनके शाप को अनुग्रह में बदल दीजिए।
श्लोक 44 (skanda.6.139.44)
ततस्तस्य प्रणामं स कृत्वा ब्राह्मणसत्तमः ॥ व्रीडयाऽधोमुखो भूत्वा ततः प्रोवाच सादरम्
tatastasya praṇāmaṁ sa kṛtvā brāhmaṇasattamaḥ vrīḍayā'dhomukho bhūtvā tataḥ provāca sādaram
तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उन्हें प्रणाम करके, लज्जा से मुख नीचा किए हुए आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 45 (skanda.6.139.45)
॥ ब्राह्मण उवाच ॥ अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम् ॥ यत्पुत्रस्य मम प्राप्तिर्गतस्य यमसादनम्।
brāhmaṇa uvāca adya me saphalaṁ janma jīvitaṁ ca sujīvitam yatputrasya mama prāptirgatasya yamasādanam
ब्राह्मण बोला - आज मेरा जन्म सफल हुआ, और मेरा जीवन सुजीवन हुआ, क्योंकि यम के भवन को गए हुए अपने पुत्र को मैंने पुनः प्राप्त किया है।
श्लोक 46 (skanda.6.139.46)
त्वं च पुत्रकृते तात सन्तोषं परमं गतः ॥ तस्मात्पुत्रेण संयुक्तो यथायं स्यात्तथा कुरु
tvaṁ ca putrakṛte tāta santoṣaṁ paramaṁ gataḥ tasmātputreṇa saṁyukto yathāyaṁ syāttathā kuru
हे तात! आप भी इस पुत्र के लिए परम संतोष को प्राप्त हुए हैं; इसलिए यह जैसे सदा इस पुत्र से युक्त रहे, वैसा ही कीजिए।
श्लोक 47 (skanda.6.139.47)
॥ ब्राह्मण उवाच ॥ न मे स्यादनृतं वाक्यं कदा चिदपि पुत्रक ॥ अपि स्वैरेण यत्प्रोक्तं किं पुनर्दुःखितेन च
brāhmaṇa uvāca na me syādanṛtaṁ vākyaṁ kadā cidapi putraka api svaireṇa yatproktaṁ kiṁ punarduḥkhitena ca
ब्राह्मण बोला - हे पुत्र! मेरा वचन कभी भी असत्य नहीं हो सकता, चाहे वह स्वेच्छा से कहा गया हो; फिर दुःखित होकर कहे गए वचन की तो बात ही क्या?
श्लोक 48 (skanda.6.139.48)
तस्मात्तस्य भवेत्पुत्रो दैवयोनिसमुद्भवः ॥ न कथंचिदपि प्राज्ञ मम शापवशाद्ध्रुवम्॥
tasmāttasya bhavetputro daivayonisamudbhavaḥ na kathaṁcidapi prājña mama śāpavaśāddhruvam
हे प्राज्ञ! इसलिए मेरे शाप के प्रभाव से उसे किसी भी प्रकार दैवी योनि से उत्पन्न पुत्र निश्चय ही नहीं होगा।
श्लोक 49 (skanda.6.139.49)
भविष्यति सुतश्चान्यो मानुषीयोनिसंभवः ॥ राजसूयाश्वमेधाभ्यां यश्चैनं तारयिष्यति
bhaviṣyati sutaścānyo mānuṣīyonisaṁbhavaḥ rājasūyāśvamedhābhyāṁ yaścainaṁ tārayiṣyati
किन्तु उसे मनुष्य-योनि से उत्पन्न एक और पुत्र प्राप्त होगा, जो राजसूय और अश्वमेध यज्ञों के द्वारा उसका उद्धार करेगा।
श्लोक 50 (skanda.6.139.50)
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न संतारणक्षमः ॥ पितृपक्षं शुभं कर्म कृत्वा सर्वोत्तमं भुवि
ko'rthaḥ putreṇa jātena yo na saṁtāraṇakṣamaḥ pitṛpakṣaṁ śubhaṁ karma kṛtvā sarvottamaṁ bhuvi
उस उत्पन्न पुत्र से क्या लाभ, जो पितृपक्ष के लिए पृथ्वी पर सर्वोत्तम शुभ कर्म करके भी उद्धार करने में समर्थ न हो?
श्लोक 51 (skanda.6.139.51)
तथा पूजाकृते योऽस्य शापो दत्तश्च वै पुरा ॥ तत्रापि शृणु मे वाक्यं तस्य पुत्रक जल्पतः
tathā pūjākṛte yo'sya śāpo dattaśca vai purā tatrāpi śṛṇu me vākyaṁ tasya putraka jalpataḥ
हे पुत्र! उसकी पूजा के विषय में जो शाप पहले दिया गया था, उसके संबंध में भी मेरा यह वचन सुनो, जो मैं कह रहा हूँ।
श्लोक 52 (skanda.6.139.52)
वेदोक्तैर्विविधैर्मन्त्रैर्या पूजा चास्य संस्थिता ॥ न भविष्यति सा लोके कथंचिदपि पुत्रक
vedoktairvividhairmantrairyā pūjā cāsya saṁsthitā na bhaviṣyati sā loke kathaṁcidapi putraka
हे पुत्र! विविध वेदोक्त मन्त्रों से जो उसकी पूजा प्रचलित थी, वह अब संसार में किसी भी प्रकार नहीं होगी।
श्लोक 53 (skanda.6.139.53)
अस्य मानुषसंभूतैर्मन्त्रैः पूजा भविष्यति ॥ विशिष्टा सर्वदेवेभ्यः सत्यमेतन्मयोदितम्
asya mānuṣasaṁbhūtairmantraiḥ pūjā bhaviṣyati viśiṣṭā sarvadevebhyaḥ satyametanmayoditam
उसकी पूजा अब मनुष्यों द्वारा रचित मन्त्रों से ही होगी, और वह सब देवताओं की पूजा से भी विशिष्ट होगी - यह मैंने सत्य ही कहा है।
श्लोक 54 (skanda.6.139.54)
॥ पुत्र उवाच ॥ अहमेनं प्रतिष्ठाप्य द्रिजश्रेष्ठ महीतले ॥ सम्यगाराधयिष्यामि किमन्यैर्विबुधैर्मम
putra uvāca ahamenaṁ pratiṣṭhāpya drijaśreṣṭha mahītale samyagārādhayiṣyāmi kimanyairvibudhairmama
पुत्र बोला - हे श्रेष्ठ द्विज! मैं इन्हें पृथ्वीतल पर प्रतिष्ठित करके भली-भाँति आराधना करूँगा; मुझे अन्य देवताओं से क्या प्रयोजन है?
श्लोक 55 (skanda.6.139.55)
तस्मात्संकीर्तयिष्यामि मंत्रान्मानुषसंभवान् ॥ तथा पूजाविधानं च त्वत्प्रसादेन पूर्वज
tasmātsaṁkīrtayiṣyāmi maṁtrānmānuṣasaṁbhavān tathā pūjāvidhānaṁ ca tvatprasādena pūrvaja
हे पूर्वज (पिता)! इसलिए आपकी कृपा से मैं मनुष्यों द्वारा रचित मन्त्रों तथा पूजा-विधान का भी उच्चारण करूँगा।
श्लोक 56 (skanda.6.139.56)
ततः सुगं नः पन्थेति तस्य मंत्रं विधाय सः ॥ समाचरत्प्रहृष्टात्मा धर्मराजस्य शृण्वतः
tataḥ sugaṁ naḥ pantheti tasya maṁtraṁ vidhāya saḥ samācaratprahṛṣṭātmā dharmarājasya śṛṇvataḥ
तब 'सुगं नः पंथाः' इत्यादि उस मन्त्र की रचना करके, हर्षित हृदय से धर्मराज के सुनते हुए उसने वह पूजा-विधि संपन्न की।
श्लोक 57 (skanda.6.139.57)
तच्छ्रुत्वाथ यमः प्रोच्चैः सुप्रसन्नेन चेतसा ॥ तं ब्राह्मण मुवाचेदं हर्षगद्गदयागिरा
tacchrutvātha yamaḥ proccaiḥ suprasannena cetasā taṁ brāhmaṇa muvācedaṁ harṣagadgadayāgirā
यह सुनकर यम ने अत्यंत प्रसन्न होकर, हर्ष से गद्गद वाणी में उस ब्राह्मण से यह कहा।
श्लोक 58 (skanda.6.139.58)
॥ यम उवाच ॥ कथंचिदपि विप्रेद्र न मे स्याद्दर्शनं वृथा ॥ अन्येषामपि देवानां तस्मात्प्रार्थय वांछि तम्
yama uvāca kathaṁcidapi vipredra na me syāddarśanaṁ vṛthā anyeṣāmapi devānāṁ tasmātprārthaya vāṁchi tam
यम बोले - हे विप्रेन्द्र! मेरा दर्शन किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं होता; इसलिए तुम अन्य देवताओं की तरह मुझसे भी अपनी अभीष्ट वस्तु माँग लो।
श्लोक 59 (skanda.6.139.59)
॥ ब्राह्मण उवाच ॥ तवार्चां मम पुत्रोऽयं स्थापयिष्यति यामिह ॥ तामनेनैव मंत्रेण यः कश्चित्पूजयेद्द्विजः
brāhmaṇa uvāca tavārcāṁ mama putro'yaṁ sthāpayiṣyati yāmiha tāmanenaiva maṁtreṇa yaḥ kaścitpūjayeddvijaḥ
ब्राह्मण बोला - मेरा यह पुत्र यहाँ जिस मूर्ति की आपकी स्थापना करेगा, उसे जो भी ब्राह्मण इसी मन्त्र से पूजा करेगा,
श्लोक 60 (skanda.6.139.60)
भवेत्संवत्सरं यावत्संप्राप्ते पंचमीदिने ॥ मा तस्य पुत्रशोको हि इह लोके कथञ्चन
bhavetsaṁvatsaraṁ yāvatsaṁprāpte paṁcamīdine mā tasya putraśoko hi iha loke kathañcana
एक वर्ष तक, पंचमी तिथि आने तक, ऐसा करने वाले को इस लोक में किसी भी प्रकार पुत्र-शोक प्राप्त न हो।
श्लोक 61 (skanda.6.139.61)
॥ सूत उवाच ॥ स तथेति प्रतिज्ञाय संप्रहृष्टमना यमः ॥ यमलोकं जगामाथ स्वाधिकारपरोऽभवत्॥
sūta uvāca sa tatheti pratijñāya saṁprahṛṣṭamanā yamaḥ yamalokaṁ jagāmātha svādhikāraparo'bhavat
सूत जी ने कहा - 'ऐसा ही हो' यह स्वीकार करके, अत्यंत हर्षित होकर यम यमलोक को चले गए, और फिर से अपने अधिकार में तत्पर हो गए।
श्लोक 62 (skanda.6.139.62)
सोऽपि ब्राह्मणदायादः कृत्वा प्रासादमुत्तमम् ॥ यममाराधयामास मध्ये संस्थाप्य भक्तितः ॥ पित्रा चोक्तेन मन्त्रेण तेनैव विधिपूर्वकम्॥
so'pi brāhmaṇadāyādaḥ kṛtvā prāsādamuttamam yamamārādhayāmāsa madhye saṁsthāpya bhaktitaḥ pitrā coktena mantreṇa tenaiva vidhipūrvakam
वह ब्राह्मण-पुत्र भी एक उत्तम मन्दिर बनवाकर, बीच में यम को स्थापित करके, अपने पिता द्वारा बताए गए उसी मन्त्र से भक्तिपूर्वक विधिवत् उनकी आराधना करने लगा।
श्लोक 63 (skanda.6.139.63)
ततश्च क्रमशः प्राप्य पुत्रपौत्राननेकशः ॥ कालधर्ममनुप्राप्तश्चिरं स्थित्वा महीतले
tataśca kramaśaḥ prāpya putrapautrānanekaśaḥ kāladharmamanuprāptaściraṁ sthitvā mahītale
फिर क्रमशः अनेक पुत्र-पौत्रों को प्राप्त करके, वह पृथ्वीतल पर बहुत समय तक रहकर अंततः काल-धर्म को प्राप्त हुआ।
श्लोक 64 (skanda.6.139.64)
एतद्वः सर्वमाख्यातं पुराणेयत्पुरा श्रुतम्॥ यश्चैतत्कीर्तयेद्भक्त्या संप्राप्ते पंचमीदिने ॥ नापमृत्युर्भवेत्तस्य न च शोकः सुतोद्भवः
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ purāṇeyatpurā śrutam yaścaitatkīrtayedbhaktyā saṁprāpte paṁcamīdine nāpamṛtyurbhavettasya na ca śokaḥ sutodbhavaḥ
पुराण में जो कुछ मैंने पहले सुना था, वह सब मैंने तुम्हें सुना दिया है; जो कोई पंचमी तिथि आने पर इसे भक्तिपूर्वक कहता है, उसे न तो अपमृत्यु प्राप्त होती है, और न ही पुत्र से उत्पन्न शोक।