नागर खण्ड · अध्याय 140
धर्मराज-पुत्र युधिष्ठिर की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.6.140.1)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ यदेतद्भवता प्रोक्तं पुत्रो मानुषविग्रहः ॥ भविष्यति यमस्यात्र कः संभूतः स सूतज
ṛṣaya ūcuḥ yadetadbhavatā proktaṁ putro mānuṣavigrahaḥ bhaviṣyati yamasyātra kaḥ saṁbhūtaḥ sa sūtaja
ऋषि बोले - हे सूतपुत्र! आपने जो यह बताया था कि यम को मनुष्य-रूप में एक पुत्र प्राप्त होगा, वह पुत्र कौन-से रूप में उत्पन्न हुआ?
श्लोक 2 (skanda.6.140.2)
॥ सूत उवाच ॥ तस्य पुत्रः समुत्पन्नः पांडोः क्षेत्रे महीतले ॥ युधिष्ठिर इति ख्यातः सर्वक्षत्रियपुंगवः
sūta uvāca tasya putraḥ samutpannaḥ pāṁḍoḥ kṣetre mahītale yudhiṣṭhira iti khyātaḥ sarvakṣatriyapuṁgavaḥ
सूत जी ने कहा - उनका वह पुत्र पृथ्वीतल पर पाण्डु के क्षेत्र में उत्पन्न हुआ, जो युधिष्ठिर नाम से विख्यात, सब क्षत्रियों में श्रेष्ठ हुआ।
श्लोक 3 (skanda.6.140.3)
राजसूयो मखो येन इष्टः सम्पूर्णदक्षिणः ॥ सर्वान्भूमिपतीन्वीर्यात्संविधाय करप्रदान्
rājasūyo makho yena iṣṭaḥ sampūrṇadakṣiṇaḥ sarvānbhūmipatīnvīryātsaṁvidhāya karapradān
उसने अपने पराक्रम से सब राजाओं को कर देने वाला बनाकर, संपूर्ण दक्षिणा से युक्त राजसूय यज्ञ संपन्न किया।
श्लोक 4 (skanda.6.140.4)
अश्वमेधाः कृताः पंच तथा सम्पूर्णदक्षिणाः ॥ भ्रामयित्वा हयं भूमौ पश्चात्प्राप स सद्गतिम्
aśvamedhāḥ kṛtāḥ paṁca tathā sampūrṇadakṣiṇāḥ bhrāmayitvā hayaṁ bhūmau paścātprāpa sa sadgatim
उसने संपूर्ण दक्षिणा से युक्त पाँच अश्वमेध यज्ञ भी किए, पृथ्वी पर घोड़े को घुमाकर, और अंततः उसने सद्गति प्राप्त की।
श्लोक 5 (skanda.6.140.5)
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोपि गयां व्रजेत् ॥ यजेत वाऽश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्
eṣṭavyā bahavaḥ putrā yadyekopi gayāṁ vrajet yajeta vā'śvamedhena nīlaṁ vā vṛṣamutsṛjet
मनुष्य को अनेक पुत्रों की कामना करनी चाहिए, इस आशा से कि उनमें से एक भी गया जाए, अथवा अश्वमेध यज्ञ करे, अथवा नील वृष का उत्सर्ग करे।
श्लोक 6 (skanda.6.140.6)
यदनेन वृतं मत्तः पुत्रित्वं सुमहात्मना ॥ हयमेधान्महायज्ञान्कर्ता स्यादस्य वै सुतः
yadanena vṛtaṁ mattaḥ putritvaṁ sumahātmanā hayamedhānmahāyajñānkartā syādasya vai sutaḥ
जिस पुत्र-भाव को उस महात्मा (यम) ने मुझसे (धर्मराज के रूप में) चुना, वह उसका पुत्र निश्चय ही अश्वमेध जैसे महायज्ञों को संपन्न करने वाला हुआ।
श्लोक 7 (skanda.6.140.7)
मन्येत कृतकृत्यत्वं येन पुत्रेण धर्मपः ॥ अन्यैः पुत्रशतैः किं वा वंशानुद्धारकारकैः
manyeta kṛtakṛtyatvaṁ yena putreṇa dharmapaḥ anyaiḥ putraśataiḥ kiṁ vā vaṁśānuddhārakārakaiḥ
जिस पुत्र के द्वारा धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति अपने को कृतकृत्य मानता है, उसके सामने वंश का उद्धार न करने वाले सैकड़ों अन्य पुत्रों से क्या लाभ?
श्लोक 8 (skanda.6.140.8)
॥ सूत उवाच ॥ एतद्वः सर्वमाख्यातं धर्मराजसुतोद्भवम् ॥ आख्यानं ब्राह्मणश्रेष्ठा धर्मवृद्धिकरं परम्
sūta uvāca etadvaḥ sarvamākhyātaṁ dharmarājasutodbhavam ākhyānaṁ brāhmaṇaśreṣṭhā dharmavṛddhikaraṁ param
सूत जी ने कहा - हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! यह धर्मराज के पुत्र की उत्पत्ति से संबंधित सम्पूर्ण आख्यान, जो धर्म की परम वृद्धि करने वाला है, मैंने तुम्हें सुना दिया है।