नागर खण्ड · अध्याय 141
मिष्टान्नदेश्वर माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.6.141.1)
॥ सूतउवाच ॥ ॥ तथान्योऽपि हि तत्रास्ति देवो मिष्टान्नदायकः ॥ यस्य संदर्शनादेव मिष्टान्नं लभते नरः
sūtauvāca tathānyo'pi hi tatrāsti devo miṣṭānnadāyakaḥ yasya saṁdarśanādeva miṣṭānnaṁ labhate naraḥ
सूत जी ने कहा — वहाँ एक और देवता भी हैं, मिष्टान्न (मीठा भोजन) देने वाले, जिनके दर्शनमात्र से ही मनुष्य मिष्टान्न प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 2 (skanda.6.141.2)
आसीत्पूर्वं नृपो नाम्ना वसुसेन इति स्मृतः ॥ आनर्त्ताधिपतिः ख्यातो बृहत्कल्पे द्विजोत्तमाः
āsītpūrvaṁ nṛpo nāmnā vasusena iti smṛtaḥ ānarttādhipatiḥ khyāto bṛhatkalpe dvijottamāḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! पूर्वकाल में वसुसेन नाम से प्रसिद्ध एक राजा था, जो बृहत्कल्प में आनर्त देश का प्रसिद्ध अधिपति था।
श्लोक 3 (skanda.6.141.3)
अत्यैश्वर्यसमायुक्तो गजवाजिरथान्वितः ॥ जितारिपक्षस्तेजस्वी दाता भोगी जितेंद्रियः
atyaiśvaryasamāyukto gajavājirathānvitaḥ jitāripakṣastejasvī dātā bhogī jiteṁdriyaḥ
वह अत्यंत ऐश्वर्यसंपन्न, हाथी-घोड़े-रथों से युक्त, शत्रुपक्ष को जीतने वाला, तेजस्वी, दानी, भोगी तथा जितेंद्रिय था।
श्लोक 4 (skanda.6.141.4)
स संक्रांतौ व्यतीपाते ग्रहणे रवि सोमयोः ॥ पर्वकालेषु चान्येषु विविधेषु सुभक्तितः
sa saṁkrāṁtau vyatīpāte grahaṇe ravi somayoḥ parvakāleṣu cānyeṣu vividheṣu subhaktitaḥ
वह संक्रांति, व्यतीपात, सूर्य और चंद्रमा के ग्रहण के अवसरों पर तथा अन्य विविध पर्वकालों में अत्यंत भक्तिपूर्वक दान करता था।
श्लोक 5 (skanda.6.141.5)
प्रयच्छति द्विजातिभ्यो रत्नानि विविधानि च ॥ इंद्रनीलमहानीलविद्रुमस्फटिकादि च
prayacchati dvijātibhyo ratnāni vividhāni ca iṁdranīlamahānīlavidrumasphaṭikādi ca
वह ब्राह्मणों को नाना प्रकार के रत्न — इंद्रनील, महानील, मूँगा, स्फटिक आदि — प्रदान करता था।
श्लोक 6 (skanda.6.141.6)
माणिक्यमौक्तिकान्येव विद्रुमाणि विशेषतः ॥ हस्त्यश्वरथयानानि वस्त्राणि विविधानि च
māṇikyamauktikānyeva vidrumāṇi viśeṣataḥ hastyaśvarathayānāni vastrāṇi vividhāni ca
विशेष रूप से माणिक्य, मोती, मूँगे, हाथी, घोड़े, रथ, वाहन तथा नाना प्रकार के वस्त्र भी वह देता था।
श्लोक 7 (skanda.6.141.7)
न कस्यचित्प्रदद्यात्स सस्यं ब्राह्मणसत्तमाः ॥ अतीव सुलभं मत्वा तथा तोयं विशेषतः
na kasyacitpradadyātsa sasyaṁ brāhmaṇasattamāḥ atīva sulabhaṁ matvā tathā toyaṁ viśeṣataḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! परंतु वह किसी को भी अन्न नहीं देता था, और विशेष रूप से जल को भी अत्यंत सुलभ मानकर कभी दान में नहीं देता था।
श्लोक 8 (skanda.6.141.8)
ततो राज्यं चिरं कृत्वा दृष्ट्वा पुत्रोद्भवान्सुतान् ॥ कालधर्ममनुप्राप्तः कस्मिंश्चित्कालपर्यये
tato rājyaṁ ciraṁ kṛtvā dṛṣṭvā putrodbhavānsutān kāladharmamanuprāptaḥ kasmiṁścitkālaparyaye
तत्पश्चात् दीर्घकाल तक राज्य करके और अपने पुत्रों से उत्पन्न पौत्रों को देखकर, किसी काल के अवसर पर वह कालधर्म को प्राप्त हुआ अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हुआ।
श्लोक 9 (skanda.6.141.9)
ततश्च मंत्रिभिस्तस्य सत्यसेन इति स्मृतः ॥ अभिषिक्तः सुतो राज्ये वीर्योदार्यसमन्वितः
tataśca maṁtribhistasya satyasena iti smṛtaḥ abhiṣiktaḥ suto rājye vīryodāryasamanvitaḥ
तदनन्तर मंत्रियों द्वारा उसका सत्यसेन नामक पुत्र, जो शौर्य और उदारता से युक्त था, राज्य पर अभिषिक्त किया गया।
श्लोक 10 (skanda.6.141.10)
वसुसेनोऽपि संप्राप्य स्वर्गं दानप्रभावतः ॥ दिव्यांबरधरो भूत्वा दिव्यरत्नैर्विभूषितः
vasuseno'pi saṁprāpya svargaṁ dānaprabhāvataḥ divyāṁbaradharo bhūtvā divyaratnairvibhūṣitaḥ
वसुसेन भी अपने दान के प्रभाव से स्वर्ग को प्राप्त कर, दिव्य वस्त्र धारण किए हुए और दिव्य रत्नों से विभूषित हुआ।
श्लोक 11 (skanda.6.141.11)
सेव्यमानोऽप्सरोभिश्च विमानवरमाश्रितः ॥ बभ्राम सर्वलोकेषु स्वेच्छया क्षुत्समावृतः
sevyamāno'psarobhiśca vimānavaramāśritaḥ babhrāma sarvalokeṣu svecchayā kṣutsamāvṛtaḥ
अप्सराओं द्वारा सेवित होता हुआ और उत्तम विमान पर आश्रित रहकर, वह अपनी इच्छा से समस्त लोकों में विचरण करता था, किन्तु भूख से घिरा रहता था।
श्लोक 12 (skanda.6.141.12)
पिपासाकुलचित्तश्च मुखेन परिशुष्यता ॥ न कंचिद्ददृशे तत्र भुंजानमपरं दिवि
pipāsākulacittaśca mukhena pariśuṣyatā na kaṁciddadṛśe tatra bhuṁjānamaparaṁ divi
वह प्यास से व्याकुल-चित्त था, उसका मुख सूखता जा रहा था, फिर भी उस स्वर्ग में उसने किसी अन्य को भोजन करते हुए नहीं देखा।
श्लोक 13 (skanda.6.141.13)
न च पानसमासक्तं न सस्यं सलिलं न च
na ca pānasamāsaktaṁ na sasyaṁ salilaṁ na ca
न ही उसने किसी को पान में लीन देखा, न किसी को अन्न में, न जल में।
श्लोक 14 (skanda.6.141.14)
ततो गत्वा सहस्राक्षमुवाच द्विजसत्तमाः ॥ क्षुत्तृषावृतदेहस्तु लज्जयाऽधोमुखः स्थितः
tato gatvā sahasrākṣamuvāca dvijasattamāḥ kṣuttṛṣāvṛtadehastu lajjayā'dhomukhaḥ sthitaḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! तब भूख-प्यास से आवृत शरीर वाला वह लज्जा से नीचे मुख किए हुए सहस्राक्ष (इंद्र) के पास जाकर बोला।
श्लोक 15 (skanda.6.141.15)
नैवात्र दृश्यते कश्चित्क्षुत्तृषापरिपीडितः ॥ मां मुक्त्वा विबुधश्रेष्ठ तत्किमेतद्वदस्वमे
naivātra dṛśyate kaścitkṣuttṛṣāparipīḍitaḥ māṁ muktvā vibudhaśreṣṭha tatkimetadvadasvame
हे देवश्रेष्ठ! मुझे छोड़कर यहाँ कोई भी भूख-प्यास से पीड़ित दिखाई नहीं देता; तो फिर यह क्या है, मुझे बताइए।
श्लोक 16 (skanda.6.141.16)
एष मे स्वर्गरूपेण नरकः समुपस्थितः ॥ किमेतैर्भूषणैर्वस्त्रैर्विमानादिभिरेव च
eṣa me svargarūpeṇa narakaḥ samupasthitaḥ kimetairbhūṣaṇairvastrairvimānādibhireva ca
यह स्वर्ग के रूप में मेरे लिए साक्षात् नरक बनकर उपस्थित हुआ है; इन आभूषणों, वस्त्रों और विमान आदि से मुझे क्या लाभ?
श्लोक 17 (skanda.6.141.17)
क्षुधा संपीड्यमानस्य स्वर्गमेतच्छचीपते ॥ अग्नितुल्यं समुद्दिष्टं मम चित्तेऽपि वर्तते
kṣudhā saṁpīḍyamānasya svargametacchacīpate agnitulyaṁ samuddiṣṭaṁ mama citte'pi vartate
हे शचीपते! भूख से पीड़ित होते हुए मुझे यह स्वर्ग अग्नि के समान प्रतीत होता है, यही मेरे मन में भी सदा बना रहता है।
श्लोक 18 (skanda.6.141.18)
तस्मात्कुरु प्रसादं मे यथा क्षुन्न प्रबाधते ॥ नोचेत्क्षिप सुरश्रेष्ठ रौरवे नरके द्रुतम्
tasmātkuru prasādaṁ me yathā kṣunna prabādhate nocetkṣipa suraśreṣṭha raurave narake drutam
अतः मुझ पर कृपा कीजिए, जिससे भूख मुझे पीड़ित न करे; अन्यथा, हे देवश्रेष्ठ, मुझे शीघ्र रौरव नरक में डाल दीजिए।
श्लोक 19 (skanda.6.141.19)
॥ इंद्रउवाच ॥ ॥ अनर्होसि महीपाल नरकस्य त्वमेव हि ॥ त्वया दानानि दत्तानि संख्याहीनानि सर्वदा
iṁdrauvāca anarhosi mahīpāla narakasya tvameva hi tvayā dānāni dattāni saṁkhyāhīnāni sarvadā
इंद्र ने कहा — हे राजन्! तुम नरक के सर्वथा अयोग्य हो, क्योंकि तुमने सदा असंख्य दान दिए हैं।
श्लोक 20 (skanda.6.141.20)
परं किं तु क्वचिन्नान्नं दत्तं राजन्न चोदकम्॥ न किंचिदपि संचिंत्य यतः सुलभमेव हि
paraṁ kiṁ tu kvacinnānnaṁ dattaṁ rājanna codakam na kiṁcidapi saṁciṁtya yataḥ sulabhameva hi
परन्तु हे राजन्! तुमने कभी अन्न नहीं दिया, न जल दिया, क्योंकि तुमने उन्हें अत्यंत सुलभ समझकर कुछ भी विचार नहीं किया।
श्लोक 21 (skanda.6.141.21)
तोयं सान्नं सदा दद्यादन्नं चैव सदक्षिणम्॥ य इच्छेच्छाश्वतीं तृप्तिमिह लोके परत्र च
toyaṁ sānnaṁ sadā dadyādannaṁ caiva sadakṣiṇam ya icchecchāśvatīṁ tṛptimiha loke paratra ca
जो पुरुष इस लोक और परलोक में शाश्वत तृप्ति चाहता है, उसे सदा अन्न सहित जल और दक्षिणा सहित अन्न देना चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.6.141.22)
तस्मात्त्वं हि क्षुधाविष्टः स्वर्गे चैव महीपते ॥ भूषितो भूषणैः श्रेष्ठैर्विमानवरमाश्रितः
tasmāttvaṁ hi kṣudhāviṣṭaḥ svarge caiva mahīpate bhūṣito bhūṣaṇaiḥ śreṣṭhairvimānavaramāśritaḥ
इसीलिए हे राजन्! तुम श्रेष्ठ आभूषणों से विभूषित तथा उत्तम विमान पर आश्रित होकर भी स्वर्ग में भूख से ग्रस्त हो।
श्लोक 23 (skanda.6.141.23)
॥ राजोवाच ॥ ॥ अस्ति कश्चिदुपायोऽत्र देवौ वा मानुषोऽपि वा ॥ क्षुत्पिपासेऽतितीव्रे मे विनाशं येन गच्छतः
rājovāca asti kaścidupāyo'tra devau vā mānuṣo'pi vā kṣutpipāse'titīvre me vināśaṁ yena gacchataḥ
राजा ने कहा — क्या यहाँ देव अथवा मनुष्य द्वारा कोई ऐसा उपाय है, जिससे मेरी यह अत्यंत तीव्र भूख-प्यास नष्ट हो जाए?
श्लोक 24 (skanda.6.141.24)
॥ इन्द्र उवाच ॥ ॥ यदि कश्चित्सुतस्तुभ्यं विप्रेभ्यः सततं जलम्॥ ददाति च सदा सस्यं तत्ते तृप्तिः प्रजायते
indra uvāca yadi kaścitsutastubhyaṁ viprebhyaḥ satataṁ jalam dadāti ca sadā sasyaṁ tatte tṛptiḥ prajāyate
इंद्र ने कहा — यदि तुम्हारा कोई पुत्र सदा ब्राह्मणों को जल तथा अन्न देता रहे, तो उससे तुम्हें तृप्ति उत्पन्न होगी।
श्लोक 25 (skanda.6.141.25)
नान्यथा पार्थिवश्रेष्ठ एकस्मिन्नपि वासरे ॥ अदत्तस्य तव प्राप्तिः सत्यमेतन्मयोदितम्
nānyathā pārthivaśreṣṭha ekasminnapi vāsare adattasya tava prāptiḥ satyametanmayoditam
हे राजश्रेष्ठ! अन्यथा एक भी दिन तुम्हें उस वस्तु की प्राप्ति नहीं होगी, जो तुमने नहीं दी — यह मैंने सत्य कहा है।
श्लोक 26 (skanda.6.141.26)
सोऽपि भूमिपतेः पुत्रस्तव यच्छति नोदकम्॥ न च सस्यं द्विजातिभ्यस्त्वन्मार्गमनुसंचरन्
so'pi bhūmipateḥ putrastava yacchati nodakam na ca sasyaṁ dvijātibhyastvanmārgamanusaṁcaran
और तुम्हारे उस राजा-पुत्र ने भी तुम्हारे ही मार्ग का अनुसरण करते हुए, ब्राह्मणों को न तो जल दिया है, न अन्न।
श्लोक 27 (skanda.6.141.27)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो नारदो मुनिसत्तमः॥ ब्रह्मलोकात्स्थितौ यत्र तौ भूमिपसुरेश्वरौ
etasminnaṁtare prāpto nārado munisattamaḥ brahmalokātsthitau yatra tau bhūmipasureśvarau
इसी बीच, जहाँ वे राजा और इंद्र दोनों खड़े थे, वहाँ ब्रह्मलोक से मुनिश्रेष्ठ नारद आ पहुँचे।
श्लोक 28 (skanda.6.141.28)
ततः शक्रः समुत्थाय तस्मै तुष्टिसमन्वितः ॥ अर्घं दत्त्वा विधानेन सादरं चेदमब्रवीत्
tataḥ śakraḥ samutthāya tasmai tuṣṭisamanvitaḥ arghaṁ dattvā vidhānena sādaraṁ cedamabravīt
तब इंद्र प्रसन्नतापूर्वक उठकर, विधिपूर्वक उन्हें अर्घ्य देकर आदरसहित यह बोला।
श्लोक 29 (skanda.6.141.29)
कुतः प्राप्तोऽसि विप्रेंद्र प्रस्थितः क्व च सांप्रतम्॥ केन कार्येण चेद्गुह्यं न तेऽस्ति वद सांप्रतम्
kutaḥ prāpto'si vipreṁdra prasthitaḥ kva ca sāṁpratam kena kāryeṇa cedguhyaṁ na te'sti vada sāṁpratam
हे विप्रेंद्र! आप कहाँ से आए हैं, और अभी कहाँ जा रहे हैं? किस कार्य से — यदि यह गोपनीय न हो तो अभी बताइए।
श्लोक 30 (skanda.6.141.30)
नारद उवाच ॥ ॥ ब्रह्मलोकादहं प्राप्तः प्रस्थितस्तु धरातले ॥ तीर्थयात्राकृते शक्र नान्यदस्तीह कारणम्
nārada uvāca brahmalokādahaṁ prāptaḥ prasthitastu dharātale tīrthayātrākṛte śakra nānyadastīha kāraṇam
नारद ने कहा — हे शक्र! मैं ब्रह्मलोक से आया हूँ और अब पृथ्वीतल की ओर जा रहा हूँ; तीर्थयात्रा के लिए — इसके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है।
श्लोक 31 (skanda.6.141.31)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ तच्छ्रुत्वा स नृपो हृष्टस्तमुवाच मुनीश्वरम् ॥ प्रसादः क्रियतां मह्यं दीनस्य मुनिपुंगव
sūta uvāca tacchrutvā sa nṛpo hṛṣṭastamuvāca munīśvaram prasādaḥ kriyatāṁ mahyaṁ dīnasya munipuṁgava
सूत जी ने कहा — यह सुनकर वह राजा हर्षित होकर उन मुनीश्वर से बोला — हे मुनिश्रेष्ठ! मुझ दीन पर कृपा कीजिए।
श्लोक 32 (skanda.6.141.32)
त्वया भूमितले वाच्यो मम पुत्रो महीपतिः ॥ आनर्त्ताधिपतिः ख्यातः सत्यसेन इति प्रभो
tvayā bhūmitale vācyo mama putro mahīpatiḥ ānarttādhipatiḥ khyātaḥ satyasena iti prabho
हे प्रभो! आपको पृथ्वीतल पर मेरे उस पुत्र से, जो आनर्त देश के अधिपति के रूप में सत्यसेन नाम से प्रसिद्ध है, यह कहना है।
श्लोक 33 (skanda.6.141.33)
तव तातो मया दृष्टः शक्रस्य सदनं प्रति ॥ क्षुत्पिपासापरीतांगो दीनात्मा देवमध्यगः
tava tāto mayā dṛṣṭaḥ śakrasya sadanaṁ prati kṣutpipāsāparītāṁgo dīnātmā devamadhyagaḥ
मैंने तुम्हारे पिता को, जिनका शरीर भूख-प्यास से आक्रांत है और जो दीन-आत्मा होकर देवताओं के मध्य इंद्र के भवन में हैं, स्वयं देखा है।
श्लोक 34 (skanda.6.141.34)
तस्मात्पुत्रोऽसि चेन्मह्यं त्वं सत्यं परिरक्षसि ॥ तन्मन्नाम्ना प्रयच्छोच्चैः सस्यानि सलिलानि च
tasmātputro'si cenmahyaṁ tvaṁ satyaṁ parirakṣasi tanmannāmnā prayacchoccaiḥ sasyāni salilāni ca
अतः यदि तुम सचमुच मेरे पुत्र हो और सत्य का पालन करते हो, तो मेरे नाम से खुले हाथों अन्न और जल दान करो।
श्लोक 35 (skanda.6.141.35)
स तथेति प्रतिज्ञाय नारदो मुनिसत्तमः ॥ अनुज्ञाप्य सहस्राक्षं प्रस्थितो भूतलं प्रति
sa tatheti pratijñāya nārado munisattamaḥ anujñāpya sahasrākṣaṁ prasthito bhūtalaṁ prati
"ऐसा ही होगा" कहकर प्रतिज्ञा करते हुए मुनिश्रेष्ठ नारद, इंद्र से आज्ञा लेकर पृथ्वीतल की ओर चल पड़े।
श्लोक 36 (skanda.6.141.36)
ततः क्रमेण तीर्थानि भ्रममाणः स सद्द्विजः ॥ आनर्त्तविषयं प्राप्य सत्यसेनमुपाद्रवत्
tataḥ krameṇa tīrthāni bhramamāṇaḥ sa saddvijaḥ ānarttaviṣayaṁ prāpya satyasenamupādravat
तत्पश्चात् वे सत्पुरुष द्विज क्रमशः तीर्थों में विचरण करते हुए आनर्त देश में पहुँचे और सत्यसेन के पास गए।
श्लोक 37 (skanda.6.141.37)
अथ संपूजितस्तेन सम्यग्भूपतिना मुनिः ॥ पितुः संदेशमाचख्यौ विजने तस्य सादरम्
atha saṁpūjitastena samyagbhūpatinā muniḥ pituḥ saṁdeśamācakhyau vijane tasya sādaram
उस राजा द्वारा भलीभाँति पूजित होकर, मुनि ने एकांत में उसे उसके पिता का संदेश आदरपूर्वक सुनाया।
श्लोक 38 (skanda.6.141.38)
तच्छ्रुत्वा शोकसंतप्तः सत्यसेनो महीपतिः ॥ तं विसृज्य मुनिश्रेष्ठं पूजयित्वा विधानतः
tacchrutvā śokasaṁtaptaḥ satyaseno mahīpatiḥ taṁ visṛjya muniśreṣṭhaṁ pūjayitvā vidhānataḥ
यह सुनकर शोक से संतप्त हुए राजा सत्यसेन ने उस मुनिश्रेष्ठ को विधिपूर्वक पूजकर विदा किया।
श्लोक 39 (skanda.6.141.39)
ततो जनकमुद्दिश्य मिष्टान्नेन सुभक्तितः ॥ सहस्रं ब्राह्मणेंद्राणां भोजयामास नित्यशः
tato janakamuddiśya miṣṭānnena subhaktitaḥ sahasraṁ brāhmaṇeṁdrāṇāṁ bhojayāmāsa nityaśaḥ
तत्पश्चात् अपने पिता के उद्देश्य से अत्यंत भक्तिपूर्वक वह प्रतिदिन एक सहस्र श्रेष्ठ ब्राह्मणों को मिष्टान्न भोजन कराने लगा।
श्लोक 40 (skanda.6.141.40)
प्रपादानं तथा चक्रे ग्रीष्मकाले विशेषतः ॥ त्यक्त्वान्याः सकला याश्च क्रिया धर्मसमुद्भवाः
prapādānaṁ tathā cakre grīṣmakāle viśeṣataḥ tyaktvānyāḥ sakalā yāśca kriyā dharmasamudbhavāḥ
उसने विशेष रूप से ग्रीष्मकाल में जल-प्याऊ की स्थापना भी की, और धर्म से उत्पन्न होने वाले अन्य समस्त कृत्यों को त्याग दिया।
श्लोक 41 (skanda.6.141.41)
एवं तस्य महीपस्य वर्तमानस्य च द्विजाः ॥ अनावृष्टिरभूद्रौद्रा सर्वसस्यक्षयावहा
evaṁ tasya mahīpasya vartamānasya ca dvijāḥ anāvṛṣṭirabhūdraudrā sarvasasyakṣayāvahā
हे द्विजो! इस प्रकार उस राजा के इस कार्य में लगे रहते हुए, एक भयंकर अनावृष्टि हुई जो समस्त अन्न का नाश करने वाली थी।
श्लोक 42 (skanda.6.141.42)
यावद्द्वादशवर्षाणि न जलं त्रिदशाधिपः ॥ मुमोच धरणीपृष्ठे सर्वे लोकाः क्षुधार्दिताः
yāvaddvādaśavarṣāṇi na jalaṁ tridaśādhipaḥ mumoca dharaṇīpṛṣṭhe sarve lokāḥ kṣudhārditāḥ
बारह वर्षों तक देवताओं के अधिपति इंद्र ने पृथ्वीतल पर जल नहीं बरसाया, जिससे सभी लोग भूख से पीड़ित हो गए।
श्लोक 43 (skanda.6.141.43)
अत्राभावात्ततो भूयो न सस्यं संप्रयच्छति ॥ ब्राह्मणेभ्यः समुद्दिश्य पितरं स्वं यथा पुरा
atrābhāvāttato bhūyo na sasyaṁ saṁprayacchati brāhmaṇebhyaḥ samuddiśya pitaraṁ svaṁ yathā purā
अन्न के अभाव के कारण, वह पहले की भाँति अपने पिता के उद्देश्य से ब्राह्मणों को अन्न देना बंद कर बैठा।
श्लोक 44 (skanda.6.141.44)
ततः स क्षुत्परीतांगः पिता तस्य महीपतेः ॥ स्वप्ने प्रोवाच तं पुत्रमतीव मलिनांबरः
tataḥ sa kṣutparītāṁgaḥ pitā tasya mahīpateḥ svapne provāca taṁ putramatīva malināṁbaraḥ
तब उस राजा का पिता, जिसका शरीर भूख से आक्रांत था और जो अत्यंत मलिन वस्त्रधारी था, स्वप्न में उस पुत्र से बोला।
श्लोक 45 (skanda.6.141.45)
त्वया पुत्रेण पुत्राहं क्षुत्पिपासासमाकुलः ॥ स्वर्गस्थोऽपि हि तिष्ठामि तस्मादन्नं प्रयच्छ वै ॥ मन्नाम्ना तोयसंयुक्तं यदि त्वं मत्समुद्भवः
tvayā putreṇa putrāhaṁ kṣutpipāsāsamākulaḥ svargastho'pi hi tiṣṭhāmi tasmādannaṁ prayaccha vai mannāmnā toyasaṁyuktaṁ yadi tvaṁ matsamudbhavaḥ
हे पुत्र! तुम्हारे कारण मैं, स्वर्ग में रहते हुए भी, भूख-प्यास से व्याकुल हूँ; अतः यदि तुम सचमुच मुझसे उत्पन्न हुए हो तो मेरे नाम से जल सहित अन्न प्रदान करो।
श्लोक 46 (skanda.6.141.46)
ततः शोकसमायुक्तः स नृपः स्वप्नदर्शनात् ॥ अन्नाभावात्समं मंत्रं मंत्रिभिः स तदाकरोत्
tataḥ śokasamāyuktaḥ sa nṛpaḥ svapnadarśanāt annābhāvātsamaṁ maṁtraṁ maṁtribhiḥ sa tadākarot
उस स्वप्न-दर्शन से शोकयुक्त हुए राजा ने तब अन्न के अभाव के विषय में मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श किया।
श्लोक 47 (skanda.6.141.47)
अहमाराधयिष्यामि सस्यार्थे वृषभध्वजम् ॥ राज्ये रक्षा विधातव्या भवद्भिः सादरं सदा
ahamārādhayiṣyāmi sasyārthe vṛṣabhadhvajam rājye rakṣā vidhātavyā bhavadbhiḥ sādaraṁ sadā
राजा ने कहा — मैं अन्न प्राप्ति के लिए वृषभध्वज शिव की आराधना करूँगा; तब तक तुम लोग सदा आदरपूर्वक राज्य की रक्षा करते रहना।
श्लोक 48 (skanda.6.141.48)
ततोऽत्रैव समागत्य स्थापयित्वा महेश्वरम् ॥ सम्यगाराधयामास व्रतैश्च नियमैस्तथा
tato'traiva samāgatya sthāpayitvā maheśvaram samyagārādhayāmāsa vrataiśca niyamaistathā
तत्पश्चात् वहीं आकर महेश्वर की स्थापना कर, उसने व्रतों और नियमों के साथ भलीभाँति उनकी आराधना की।
श्लोक 49 (skanda.6.141.49)
अथ तस्य गतस्तुष्टिं वर्षांते भगवाञ्छिवः॥ अब्रवीद्वरदोऽस्मीति प्रार्थयस्व यथेप्सितम्
atha tasya gatastuṣṭiṁ varṣāṁte bhagavāñchivaḥ abravīdvarado'smīti prārthayasva yathepsitam
तब एक वर्ष के अंत में उससे प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने कहा — मैं वर देने के लिए तत्पर हूँ, अपनी इच्छानुसार वर माँगो।
श्लोक 50 (skanda.6.141.50)
राजोवाच॥ अन्नार्थं देवदेवेश मयायं विहितो विधिः॥ तस्मात्त्वं यच्छ मे शीघ्रमसंख्यं वृषवाहन
rājovāca annārthaṁ devadeveśa mayāyaṁ vihito vidhiḥ tasmāttvaṁ yaccha me śīghramasaṁkhyaṁ vṛṣavāhana
राजा ने कहा — हे देवदेवेश! अन्न की प्राप्ति के लिए ही मैंने यह अनुष्ठान किया है; अतः हे वृषभवाहन! मुझे शीघ्र ही असंख्य अन्न दीजिए।
श्लोक 51 (skanda.6.141.51)
तथा संजायता वृष्टिः समस्ते धरणीतले ॥ येन सस्यानि जायंते सलिलानि च सांप्रतम्
tathā saṁjāyatā vṛṣṭiḥ samaste dharaṇītale yena sasyāni jāyaṁte salilāni ca sāṁpratam
और इस समग्र पृथ्वीतल पर ऐसी वृष्टि हो, जिससे अभी अन्न और जल उत्पन्न हों।
श्लोक 52 (skanda.6.141.52)
जायतां मम तातस्य स्वर्गस्थस्य महात्मनः ॥ प्रसादात्तव संतृप्तिरक्षया सुरसत्तम
jāyatāṁ mama tātasya svargasthasya mahātmanaḥ prasādāttava saṁtṛptirakṣayā surasattama
हे देवश्रेष्ठ! आपकी कृपा से स्वर्गस्थ मेरे महात्मा पिता को अक्षय तृप्ति प्राप्त हो।
श्लोक 53 (skanda.6.141.53)
॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ भविता न चिराद्वृष्टिः प्रभूता धरणीतले ॥ भविष्यंति तथान्नानि यानि कानि महीतले
śrībhagavānuvāca bhavitā na cirādvṛṣṭiḥ prabhūtā dharaṇītale bhaviṣyaṁti tathānnāni yāni kāni mahītale
भगवान् ने कहा — शीघ्र ही पृथ्वीतल पर प्रचुर वृष्टि होगी, और भूमि पर जितने भी प्रकार के अन्न हैं, वे सब भी उत्पन्न होंगे।
श्लोक 54 (skanda.6.141.54)
तस्मात्त्वं गच्छ राजेंद्र स्वगृहं प्रति सांप्रतम्॥ मम वाक्यादसंदिग्धमेतदेव भविष्यति
tasmāttvaṁ gaccha rājeṁdra svagṛhaṁ prati sāṁpratam mama vākyādasaṁdigdhametadeva bhaviṣyati
अतः हे राजेंद्र! अब तुम अपने घर लौट जाओ; मेरे वचन से यह निःसंदेह ऐसा ही होगा।
श्लोक 55 (skanda.6.141.55)
तच्चैतन्मामकं लिंगं यत्त्वया स्थापितं नृप ॥ प्रातरुत्थाय यः कश्चित्सम्यक्तद्वीक्षयिष्यति
taccaitanmāmakaṁ liṁgaṁ yattvayā sthāpitaṁ nṛpa prātarutthāya yaḥ kaścitsamyaktadvīkṣayiṣyati
हे राजन्! यह जो मेरा लिंग तुमने स्थापित किया है, इसे प्रातःकाल उठकर जो कोई भी भलीभाँति देखेगा —
श्लोक 56 (skanda.6.141.56)
मिष्टान्नममृतस्वादु स हि नूनमवाप्स्यति॥ मम वाक्यान्नृपश्रेष्ठ सदा जन्मनिजन्मनि
miṣṭānnamamṛtasvādu sa hi nūnamavāpsyati mama vākyānnṛpaśreṣṭha sadā janmanijanmani
हे राजश्रेष्ठ! वह निश्चय ही अमृततुल्य मीठा भोजन प्राप्त करेगा, मेरे वचन से, जन्म-जन्मांतर में सदा।
श्लोक 57 (skanda.6.141.57)
स एवं भगवानुक्त्वा ततश्चादर्शनं गतः ॥ सोऽपि राजा निजं स्थानं हर्षेण महतान्वितः ॥ आजगाम चकाराथ राज्यं निहतकंटकम्
sa evaṁ bhagavānuktvā tataścādarśanaṁ gataḥ so'pi rājā nijaṁ sthānaṁ harṣeṇa mahatānvitaḥ ājagāma cakārātha rājyaṁ nihatakaṁṭakam
भगवान् ऐसा कहकर अंतर्धान हो गए। वह राजा भी अत्यंत हर्ष से युक्त होकर अपने स्थान को लौट आया और निष्कंटक राज्य करने लगा।
श्लोक 58 (skanda.6.141.58)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ अद्यापि कलिकालेऽत्र संप्राप्ते दारुणे युगे ॥ यस्तं मिष्टान्नदं पश्येत्प्रातरुत्थाय भक्तितः
sūta uvāca adyāpi kalikāle'tra saṁprāpte dāruṇe yuge yastaṁ miṣṭānnadaṁ paśyetprātarutthāya bhaktitaḥ
सूत जी ने कहा — इस भयंकर कलियुग के आ जाने पर भी आज तक जो कोई प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक उस मिष्टान्नद देव के दर्शन करता है —
श्लोक 59 (skanda.6.141.59)
स मिष्टान्नमवाप्नोति यदि कामयते द्विजाः ॥ निष्कामो वा समभ्येति स्थानं देवस्य शूलिनः
sa miṣṭānnamavāpnoti yadi kāmayate dvijāḥ niṣkāmo vā samabhyeti sthānaṁ devasya śūlinaḥ
हे द्विजो! यदि वह इच्छा रखता हो तो मिष्टान्न को प्राप्त करता है, और यदि निष्काम हो तो शूलधारी देव के परमधाम को प्राप्त होता है।