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नागर खण्ड · अध्याय 142

गणपतित्रय उत्पत्ति माहात्म्य

अध्याय 141अध्याय-सूचीअध्याय 143

श्लोक 1 (skanda.6.142.1)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ तथान्यदपि तत्रास्ति पुण्यं गणपतित्रयम् ॥ स्वर्गदं मर्त्यदं पुण्यं तथान्यन्नरकापहम्

sūta uvāca tathānyadapi tatrāsti puṇyaṁ gaṇapatitrayam svargadaṁ martyadaṁ puṇyaṁ tathānyannarakāpaham

सूत जी ने कहा — वहाँ एक और पुण्यमय वस्तु भी है — गणपतित्रय (तीन गणपति), जो स्वर्ग देने वाले, मर्त्यलोक में शुभ जन्म देने वाले, तथा नरक को दूर करने वाले पुण्यस्वरूप हैं।

श्लोक 2 (skanda.6.142.2)

हंतृ वै सर्वविघ्नानां पूजितं सुरदानवैः॥ सर्वकामप्रदं चैव विद्याकीर्तिविवर्धनम्

haṁtṛ vai sarvavighnānāṁ pūjitaṁ suradānavaiḥ sarvakāmapradaṁ caiva vidyākīrtivivardhanam

वे समस्त विघ्नों का नाश करने वाले हैं, देव और दानवों द्वारा पूजित हैं, समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले तथा विद्या और कीर्ति को बढ़ाने वाले हैं।

श्लोक 3 (skanda.6.142.3)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ त्रिविधाः पुरुषाः सूत जायंतेत्र महीतले ॥ उत्तमा मध्यमाश्चान्ये तथा चान्येऽधमाः स्थिताः

ṛṣaya ūcuḥ trividhāḥ puruṣāḥ sūta jāyaṁtetra mahītale uttamā madhyamāścānye tathā cānye'dhamāḥ sthitāḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूत! इस पृथ्वीतल पर तीन प्रकार के पुरुष उत्पन्न होते हैं — उत्तम, मध्यम, तथा अधम।

श्लोक 4 (skanda.6.142.4)

उत्तमाः प्रार्थयंति स्म मोक्षमेव हि केवलम् ॥ गता यत्र निवर्तंते न कथंचिद्धरातले

uttamāḥ prārthayaṁti sma mokṣameva hi kevalam gatā yatra nivartaṁte na kathaṁciddharātale

उत्तम पुरुष केवल मोक्ष की ही कामना करते हैं, जहाँ जाकर वे फिर पृथ्वीतल पर किसी प्रकार लौटते नहीं।

श्लोक 5 (skanda.6.142.5)

मध्यमाः स्वर्गमार्गं च दिव्यान्भोगान्मनोरमान् ॥ अप्सरोभिः समं क्रीडां यज्ञाद्यैः कर्मभिः कृताम्

madhyamāḥ svargamārgaṁ ca divyānbhogānmanoramān apsarobhiḥ samaṁ krīḍāṁ yajñādyaiḥ karmabhiḥ kṛtām

मध्यम पुरुष स्वर्ग के मार्ग को तथा यज्ञ आदि कर्मों से प्राप्त होने वाले दिव्य, मनोरम भोगों और अप्सराओं के साथ क्रीड़ा को चाहते हैं।

श्लोक 6 (skanda.6.142.6)

अधमा मर्त्यलोकेत्र रमंते विषयात्मकाः ॥ विषकीटकवत्तत्र रतिं कृत्वा गरीयसीम्

adhamā martyaloketra ramaṁte viṣayātmakāḥ viṣakīṭakavattatra ratiṁ kṛtvā garīyasīm

अधम पुरुष विषयासक्त होकर इसी मर्त्यलोक में ही रमण करते हैं, विषैले कीड़े के समान वहाँ अत्यंत गहरी आसक्ति करके।

श्लोक 7 (skanda.6.142.7)

स्वर्गमोक्षौ परित्यज्य तत्कस्मान्मर्त्य इष्यते ॥ येनासौ प्रार्थ्यते मर्त्यैर्मर्त्यदो गणनायकः

svargamokṣau parityajya tatkasmānmartya iṣyate yenāsau prārthyate martyairmartyado gaṇanāyakaḥ

स्वर्ग और मोक्ष दोनों को त्यागकर, फिर मनुष्यों द्वारा "मर्त्य" (मृत्यु-लोक का जन्म) किसलिए चाहा जाता है, जिसके लिए वे गणनायक "मर्त्यद" (मर्त्य-जन्म देने वाले) की प्रार्थना करते हैं?

श्लोक 8 (skanda.6.142.8)

केन संस्थापितास्ते च तस्मिन्क्षेत्रे गजाननाः ॥ कस्मिन्काले च द्रष्टव्याः सर्वं विस्तरतो वद

kena saṁsthāpitāste ca tasminkṣetre gajānanāḥ kasminkāle ca draṣṭavyāḥ sarvaṁ vistarato vada

उस क्षेत्र में वे गजानन (गणेश) किसके द्वारा स्थापित किए गए, और किस काल में उनका दर्शन करना चाहिए? यह सब विस्तार से बताइए।

श्लोक 9 (skanda.6.142.9)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ पूर्वं तप्त्वा तपस्तीव्रं मर्त्यलोके द्विजोत्तमाः ॥ ततो गच्छंति संहृष्टाः स्वेच्छया त्रिदिवं प्रति ॥ मोक्षमार्गं तथैवान्ये ध्यानाविष्कृतमानसाः

sūta uvāca pūrvaṁ taptvā tapastīvraṁ martyaloke dvijottamāḥ tato gacchaṁti saṁhṛṣṭāḥ svecchayā tridivaṁ prati mokṣamārgaṁ tathaivānye dhyānāviṣkṛtamānasāḥ

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! पहले मर्त्यलोक में तीव्र तप करके, कुछ लोग प्रसन्नतापूर्वक अपनी इच्छा से स्वर्ग की ओर जाते हैं, और अन्य ध्यान से प्रकट हुए चित्त वाले मोक्षमार्ग की ओर जाते हैं।

श्लोक 10 (skanda.6.142.10)

ततः स्वर्गे समाकीर्णे कदाचिन्मनुजोत्तमैः ॥ देवेषु क्षिप्यमाणेषु समंतात्तत्प्रभावतः

tataḥ svarge samākīrṇe kadācinmanujottamaiḥ deveṣu kṣipyamāṇeṣu samaṁtāttatprabhāvataḥ

तब कभी उन उत्तम मनुष्यों से स्वर्ग भर जाने पर, उनके ही प्रभाव से देवता चारों ओर से विस्थापित होने लगे।

श्लोक 11 (skanda.6.142.11)

गत्वा स्वयं सहस्राक्षः सर्वैर्देवगणैः सह ॥ प्रोवाच शंकरं गौर्या सार्धमेकासनस्थितम्

gatvā svayaṁ sahasrākṣaḥ sarvairdevagaṇaiḥ saha provāca śaṁkaraṁ gauryā sārdhamekāsanasthitam

तब सहस्राक्ष (इंद्र) स्वयं समस्त देवगणों के साथ जाकर, एक ही आसन पर गौरी के साथ विराजमान शंकर से बोले।

श्लोक 12 (skanda.6.142.12)

॥ इन्द्र उवाच ॥ ॥ तपःप्रभावसंसिद्धैर्मानवैः परमेश्वर ॥ अस्माकं व्याप्यते सर्वं महिमानं गृहादिकम्

indra uvāca tapaḥprabhāvasaṁsiddhairmānavaiḥ parameśvara asmākaṁ vyāpyate sarvaṁ mahimānaṁ gṛhādikam

इंद्र ने कहा — हे परमेश्वर! तप के प्रभाव से सिद्ध हुए मनुष्यों द्वारा हमारा सारा वैभव — घर आदि — अतिक्रांत किया जा रहा है।

श्लोक 13 (skanda.6.142.13)

तस्मात्कृत्वा प्रसादं नः कंचिच्चिंतय सांप्रतम् ॥ उपायं येन तिष्ठामः सौख्येनात्र शिवालये

tasmātkṛtvā prasādaṁ naḥ kaṁcicciṁtaya sāṁpratam upāyaṁ yena tiṣṭhāmaḥ saukhyenātra śivālaye

अतः हम पर कृपा करके अभी कोई ऐसा उपाय सोचिए, जिससे हम इस शिवालय में सुखपूर्वक रह सकें।

श्लोक 14 (skanda.6.142.14)

अथ श्रुत्वा विरूपाक्षस्तेषां तद्वचनं द्विजाः ॥ पार्वत्याः पार्श्वसंस्थाया मुखचन्द्रं समैक्षयत्

atha śrutvā virūpākṣasteṣāṁ tadvacanaṁ dvijāḥ pārvatyāḥ pārśvasaṁsthāyā mukhacandraṁ samaikṣayat

हे द्विजो! उनकी यह बात सुनकर विरूपाक्ष (शिव) ने अपने पार्श्व में बैठी पार्वती के मुखचंद्र की ओर देखा।

श्लोक 15 (skanda.6.142.15)

निजगात्रं ततो देवी सुसंमर्द्य मुहुर्मुहुः ॥ मलमाहृत्य तं कृत्स्नं चक्रे नागमुखं ततः

nijagātraṁ tato devī susaṁmardya muhurmuhuḥ malamāhṛtya taṁ kṛtsnaṁ cakre nāgamukhaṁ tataḥ

तब देवी ने अपने ही शरीर को बार-बार मलकर, उस समस्त मैल को एकत्र कर, उससे एक गजमुख आकृति बनाई।

श्लोक 16 (skanda.6.142.16)

चतुर्हस्तं महाकायं लंबोदरसमन्वितम् ॥ सुकौतुककरं तेषां सर्वेषां च दिवौकसाम्

caturhastaṁ mahākāyaṁ laṁbodarasamanvitam sukautukakaraṁ teṣāṁ sarveṣāṁ ca divaukasām

वह चार भुजाओं वाला, विशाल शरीर वाला तथा लंबोदर (बड़े उदर वाला) था — उन सब देवताओं के लिए अत्यंत कौतुक उत्पन्न करने वाला।

श्लोक 17 (skanda.6.142.17)

ततः स विनयादाह देवीं शिखरवासिनीम् ॥ यदर्थमंब सृष्टोऽहं तत्कार्यं वद मा चिरम्

tataḥ sa vinayādāha devīṁ śikharavāsinīm yadarthamaṁba sṛṣṭo'haṁ tatkāryaṁ vada mā ciram

तब उसने विनयपूर्वक शिखरवासिनी देवी से कहा — हे माता! जिस प्रयोजन के लिए मैं उत्पन्न किया गया हूँ, वह कार्य बिना विलंब बताइए।

श्लोक 18 (skanda.6.142.18)

त्रैलोक्ये त्वत्प्रसादेन नासाध्यं विद्यते मम

trailokye tvatprasādena nāsādhyaṁ vidyate mama

आपकी कृपा से त्रैलोक्य में मेरे लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।

श्लोक 19 (skanda.6.142.19)

॥ श्रीदेव्युवाच ॥ ॥ मर्त्यलोके नरा ये च स्वर्गमोक्षपराः सदा ॥ तेषां विघ्नं त्वया कार्यं शुभकृत्येषु चैव हि

śrīdevyuvāca martyaloke narā ye ca svargamokṣaparāḥ sadā teṣāṁ vighnaṁ tvayā kāryaṁ śubhakṛtyeṣu caiva hi

श्रीदेवी ने कहा — मर्त्यलोक में जो मनुष्य सदा स्वर्ग और मोक्ष के परायण रहते हैं, उनके शुभ कार्यों में तुम्हें विघ्न उत्पन्न करना है।

श्लोक 20 (skanda.6.142.20)

सरितां पतयस्त्रिंशच्छंकवः सप्तसप्ततिः ॥ महासरोजषष्टिश्च निखर्वाणां च विंशतिः

saritāṁ patayastriṁśacchaṁkavaḥ saptasaptatiḥ mahāsarojaṣaṣṭiśca nikharvāṇāṁ ca viṁśatiḥ

नदियों के अधिपतियों सहित सैंतीस शंकु, साठ महासरोज, और बीस निखर्व — इतने गण तुम्हें दिए जाते हैं।

श्लोक 21 (skanda.6.142.21)

अर्बुदायुतसंयुक्ताः कोट्यो नवतिपञ्च च ॥ लक्षाश्च पंचपंचाशत्सहस्राः पंचविंशतिः॥ शतानि नवषष्टिश्च गणाश्चान्येऽत्र संस्थिताः

arbudāyutasaṁyuktāḥ koṭyo navatipañca ca lakṣāśca paṁcapaṁcāśatsahasrāḥ paṁcaviṁśatiḥ śatāni navaṣaṣṭiśca gaṇāścānye'tra saṁsthitāḥ

अर्बुदों और अयुतों से संयुक्त पंचानबे कोटि, पचपन सहस्र पच्चीस लाख, तथा नौ सौ साठ — इतने और भी गण यहाँ स्थित हैं।

श्लोक 22 (skanda.6.142.22)

येषां नदी स्मृतः पूर्वो महाकालस्तथा परः॥ ते सर्वे वशगास्तुभ्यं प्रभवंतु गणोत्तमाः

yeṣāṁ nadī smṛtaḥ pūrvo mahākālastathā paraḥ te sarve vaśagāstubhyaṁ prabhavaṁtu gaṇottamāḥ

जिनमें पहला नदी नाम से स्मरण किया जाता है और दूसरा महाकाल के नाम से — हे श्रेष्ठ गणो! वे सभी तुम्हारे वश में होकर तुम्हारे अधीन रहें।

श्लोक 23 (skanda.6.142.23)

आधिपत्यं मया दत्तं तव वत्स कुरुष्व तत् ॥ सर्वेषां गणवृंदानामाधिपत्ये व्यवस्थितः

ādhipatyaṁ mayā dattaṁ tava vatsa kuruṣva tat sarveṣāṁ gaṇavṛṁdānāmādhipatye vyavasthitaḥ

हे वत्स! मैंने तुम्हें यह आधिपत्य दिया है, इसे धारण करो — समस्त गणसमूहों के आधिपत्य में स्थित होकर।

श्लोक 24 (skanda.6.142.24)

एवमुक्त्वाथ सा देवी समानीयौषधीभृतान् ॥ हेमकुंभान्सुतीर्थांभः परिपूर्णान्महोदयान्

evamuktvātha sā devī samānīyauṣadhībhṛtān hemakuṁbhānsutīrthāṁbhaḥ paripūrṇānmahodayān

ऐसा कहकर उस देवी ने औषधियों से युक्त तथा पवित्र तीर्थों के जल से परिपूर्ण महान् स्वर्णकलश मंगवाए।

श्लोक 25 (skanda.6.142.25)

तस्याभिषेचनं चक्रे स्वयमेव सुरेश्वरी ॥ गीतवाद्यविनोदेन नृत्यमंगलजैः स्वनैः

tasyābhiṣecanaṁ cakre svayameva sureśvarī gītavādyavinodena nṛtyamaṁgalajaiḥ svanaiḥ

उस सुरेश्वरी ने स्वयं ही गीत, वाद्य, विनोद, नृत्य तथा मंगलध्वनियों के बीच उसका अभिषेक किया।

श्लोक 26 (skanda.6.142.26)

त्रयस्त्रिंशत्स्मृताः कोटयो देवानां याः स्थिता दिवि ॥ ताः सर्वास्तत्र चागत्य तस्य चक्रुश्च मंगलम्

trayastriṁśatsmṛtāḥ koṭayo devānāṁ yāḥ sthitā divi tāḥ sarvāstatra cāgatya tasya cakruśca maṁgalam

स्वर्ग में स्थित तैंतीस करोड़ देवता, जिनका स्मरण किया जाता है, वे सभी वहाँ आकर उसका मंगल-कार्य संपन्न करने लगे।

श्लोक 27 (skanda.6.142.27)

अथ तस्य ददौ तुष्टो भगवान्वृषभध्वजः ॥ कुठारं निशितं हस्ते सदा वै श्रेष्ठमायुधम्

atha tasya dadau tuṣṭo bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ kuṭhāraṁ niśitaṁ haste sadā vai śreṣṭhamāyudham

तब प्रसन्न होकर भगवान् वृषभध्वज ने उसके हाथ में एक तीक्ष्ण कुठार (फरसा) दिया, जो सदा उसका श्रेष्ठ आयुध रहा।

श्लोक 28 (skanda.6.142.28)

पात्रं मोदकसंपूर्णमक्षयं चैव पार्वती ॥ भोजनार्थे महाभागा मातृस्नेहपरायणा

pātraṁ modakasaṁpūrṇamakṣayaṁ caiva pārvatī bhojanārthe mahābhāgā mātṛsnehaparāyaṇā

महाभागा पार्वती ने, माता के स्नेह में तत्पर होकर, भोजन के लिए मोदकों से परिपूर्ण एक अक्षय पात्र दिया।

श्लोक 29 (skanda.6.142.29)

मूषकं कार्तिकेयस्तु वाहनार्थं प्रहर्षितः ॥ भ्रातरं मन्यमानस्तु बन्धुस्नेहेन संयुतः

mūṣakaṁ kārtikeyastu vāhanārthaṁ praharṣitaḥ bhrātaraṁ manyamānastu bandhusnehena saṁyutaḥ

कार्तिकेय ने प्रसन्न होकर उसे भाई मानते हुए, बंधु-स्नेह से युक्त होकर, वाहन के लिए मूषक (चूहा) दिया।

श्लोक 30 (skanda.6.142.30)

ज्ञानं दिव्यं ददौ ब्रह्मा तस्मै हृष्टेन चेतसा ॥ अतीतानागतं चैव वर्तमानं च यद्भवेत्

jñānaṁ divyaṁ dadau brahmā tasmai hṛṣṭena cetasā atītānāgataṁ caiva vartamānaṁ ca yadbhavet

ब्रह्मा ने प्रसन्न चित्त से उसे भूत, भविष्य और वर्तमान — सबका दिव्य ज्ञान प्रदान किया।

श्लोक 31 (skanda.6.142.31)

प्रज्ञां विष्णुः सहस्राक्षः सौभाग्यं चोत्तमं महत्॥ सौभाग्यं कामदेवस्तु कुबेरो विभवादिकम्

prajñāṁ viṣṇuḥ sahasrākṣaḥ saubhāgyaṁ cottamaṁ mahat saubhāgyaṁ kāmadevastu kubero vibhavādikam

सहस्राक्ष (इंद्र) ने उसे प्रज्ञा तथा उत्तम महान् सौभाग्य दिया; कामदेव ने सौभाग्य (मनोहरता) दिया, तथा कुबेर ने वैभव आदि दिया।

श्लोक 32 (skanda.6.142.32)

प्रतापं भगवान्सूर्यः कांतिमग्र्यां निशाकरः

pratāpaṁ bhagavānsūryaḥ kāṁtimagryāṁ niśākaraḥ

भगवान् सूर्य ने प्रताप दिया, और निशाकर (चंद्रमा) ने उत्तम कांति (सौंदर्य) दी।

श्लोक 33 (skanda.6.142.33)

तथान्ये विबुधाः सर्वे ददुरिष्टानि भूरिशः॥ आत्मीयानि प्रतुष्ट्यर्थं देव्या देवस्य च प्रभोः

tathānye vibudhāḥ sarve daduriṣṭāni bhūriśaḥ ātmīyāni pratuṣṭyarthaṁ devyā devasya ca prabhoḥ

इसी प्रकार अन्य समस्त देवताओं ने भी देवी और भगवान् की प्रसन्नता के लिए अपनी-अपनी प्रिय वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में दीं।

श्लोक 34 (skanda.6.142.34)

एवं लब्धवरः सोऽथ गणनाथो द्विजोत्तमाः ॥ देवकृत्यपरो नित्यं चक्रे विघ्नानि भूतले

evaṁ labdhavaraḥ so'tha gaṇanātho dvijottamāḥ devakṛtyaparo nityaṁ cakre vighnāni bhūtale

हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार वर प्राप्त करके वह गणनाथ (गणेश) सदा देवकार्यों में तत्पर रहते हुए पृथ्वीतल पर विघ्न उत्पन्न करने लगा।

श्लोक 35 (skanda.6.142.35)

धर्मार्थं यतमानानां मोक्षाय सुकृताय च ॥ ततो भूमितलेऽभ्येत्य गणेशस्तत्र यः स्मृतः

dharmārthaṁ yatamānānāṁ mokṣāya sukṛtāya ca tato bhūmitale'bhyetya gaṇeśastatra yaḥ smṛtaḥ

धर्म, मोक्ष तथा सुकृत के लिए प्रयत्नशील लोगों के लिए। तत्पश्चात् पृथ्वीतल पर आकर, वहाँ जो गणेश स्मरण किए जाते हैं —

श्लोक 36 (skanda.6.142.36)

वैमानिकैः समभ्येत्य स्थापितस्तत्र स द्विजाः ॥ येन स्वर्गार्थिनो लोकाः पूजां तस्य प्रचक्रिरे ॥ प्रथमं सर्वकृत्येषु विघ्ननाशाय तत्पराः

vaimānikaiḥ samabhyetya sthāpitastatra sa dvijāḥ yena svargārthino lokāḥ pūjāṁ tasya pracakrire prathamaṁ sarvakṛtyeṣu vighnanāśāya tatparāḥ

हे द्विजो! विमानों में उड़ने वाले देवताओं के साथ आकर वे वहाँ स्थापित किए गए, जिनकी पूजा स्वर्ग-कामी लोक करने लगे — सर्वप्रथम सब कार्यों में विघ्न-नाश हेतु तत्पर होकर।

श्लोक 37 (skanda.6.142.37)

एतस्मिन्नेव काले च चमत्कारपुरोद्भवैः ॥ ब्राह्मणैर्ब्रह्मविज्ञानतत्परैर्मोक्षहेतुभिः ॥ ईशानः स्थापितस्तत्र मोक्षदो य उदाहृतः

etasminneva kāle ca camatkārapurodbhavaiḥ brāhmaṇairbrahmavijñānatatparairmokṣahetubhiḥ īśānaḥ sthāpitastatra mokṣado ya udāhṛtaḥ

इसी काल में, चमत्कारपुर में उत्पन्न, ब्रह्मविज्ञान में तत्पर तथा मोक्ष चाहने वाले ब्राह्मणों द्वारा वहाँ ईशान (गणेश) स्थापित किए गए, जो मोक्ष देने वाले कहे जाते हैं।

श्लोक 38 (skanda.6.142.38)

स्वर्गं वाञ्छद्भिरेवान्यैः स्वर्गद्वारप्रदस्तथा ॥ हेरंबः स्थापितस्तत्र सत्यनामा यथोदितः

svargaṁ vāñchadbhirevānyaiḥ svargadvārapradastathā heraṁbaḥ sthāpitastatra satyanāmā yathoditaḥ

और स्वर्ग चाहने वाले अन्य लोगों द्वारा वहाँ हेरंब स्थापित किए गए, जो स्वर्ग का द्वार देने वाले, अपने कहे गए नाम के अनुरूप सत्यनामा (सच्चे नाम वाले) हैं।

श्लोक 39 (skanda.6.142.39)

तथान्यैर्मर्त्यदो नाम गणैशस्तत्र यः स्थितः॥ येन स्वर्गाच्च्युता यांति न कदा नरकादिकम्॥ तिर्यक्त्वं वा कृमित्वं वा स्थावरत्वमथापि वा

tathānyairmartyado nāma gaṇaiśastatra yaḥ sthitaḥ yena svargāccyutā yāṁti na kadā narakādikam tiryaktvaṁ vā kṛmitvaṁ vā sthāvaratvamathāpi vā

और अन्य लोगों द्वारा वहाँ स्थापित "मर्त्यद" नामक गणेश हैं, जिनके प्रभाव से स्वर्ग से च्युत हुए प्राणी न कभी नरक को प्राप्त होते हैं, न तिर्यक्-योनि को, न कीट-योनि को, और न स्थावर (वृक्षादि) योनि को।

श्लोक 40 (skanda.6.142.40)

एतस्मात्कारणात्तत्र क्षेत्रे पुण्ये द्विजोत्तमाः ॥ हेरम्बो मर्त्यदो जातः स्वर्गिणां मर्त्यदः सदा

etasmātkāraṇāttatra kṣetre puṇye dvijottamāḥ herambo martyado jātaḥ svargiṇāṁ martyadaḥ sadā

इसी कारण से, हे श्रेष्ठ द्विजो! उस पुण्य क्षेत्र में हेरंब "मर्त्यद" के नाम से प्रसिद्ध हुए — सदा स्वर्गवासियों को शुभ मर्त्य-जन्म देने वाले।

श्लोक 41 (skanda.6.142.41)

एतद्वः सर्वमाख्यातं पुण्यं हेरंबसंभवम् ॥ आख्यानं सर्वविघ्नानि यन्निहन्ति श्रुतं नृणाम्

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ puṇyaṁ heraṁbasaṁbhavam ākhyānaṁ sarvavighnāni yannihanti śrutaṁ nṛṇām

यह हेरंब की उत्पत्ति का समस्त पुण्य आख्यान तुम्हें कह दिया गया है, जो सुनने मात्र से मनुष्यों के समस्त विघ्नों का नाश कर देता है।

श्लोक 42 (skanda.6.142.42)

एतन्माघचतुर्थां यः शुक्लायां पूजयेन्नरः ॥ न तस्य वत्सरं यावद्विघ्नं सञ्जायते क्वचित्

etanmāghacaturthāṁ yaḥ śuklāyāṁ pūjayennaraḥ na tasya vatsaraṁ yāvadvighnaṁ sañjāyate kvacit

जो मनुष्य माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को इसकी पूजा करता है, उसके लिए पूरे वर्षभर कभी कोई विघ्न उत्पन्न नहीं होता।

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