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नागर खण्ड · अध्याय 143

जाबालि-शाप माहात्म्य

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144

श्लोक 1 (skanda.6.143.1)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ तथान्योऽपि च तत्रास्ति देवश्चित्रेश्वरो द्विजाः ॥ चित्रपीठस्य मध्यस्थश्चित्रसौख्यप्रदो नृणाम्

sūta uvāca tathānyo'pi ca tatrāsti devaścitreśvaro dvijāḥ citrapīṭhasya madhyasthaścitrasaukhyaprado nṛṇām

सूत जी ने कहा — हे द्विजो! वहाँ एक और देवता भी हैं — चित्रेश्वर, जो चित्रपीठ के मध्य में स्थित हैं और मनुष्यों को विचित्र सुख देने वाले हैं।

श्लोक 2 (skanda.6.143.2)

यं दृष्ट्वा पूजयित्वा च स्नापयित्वाथवा नरः ॥ मुच्यते परदारोत्थैः पातकैश्चोपपातकैः

yaṁ dṛṣṭvā pūjayitvā ca snāpayitvāthavā naraḥ mucyate paradārotthaiḥ pātakaiścopapātakaiḥ

जिनका दर्शन, पूजन अथवा अभिषेक करके मनुष्य परस्त्रीगमन से उत्पन्न महापातकों तथा उपपातकों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.6.143.3)

धर्षयित्वा गुरोः पत्नीं कन्यां वा निजवंशजाम् ॥ नीचां वा व्रतयुक्तां वा कामासक्तेन चेतसा

dharṣayitvā guroḥ patnīṁ kanyāṁ vā nijavaṁśajām nīcāṁ vā vratayuktāṁ vā kāmāsaktena cetasā

गुरु की पत्नी को, या अपने ही कुल में उत्पन्न कन्या को, या नीच स्त्री को, या व्रतधारिणी स्त्री को, कामासक्त चित्त से भ्रष्ट करके भी —

श्लोक 4 (skanda.6.143.4)

चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां यस्तं पूजयते नरः ॥ स तत्पापं निहत्याशु स्वर्गलोकं ततो व्रजेत्

caitraśuklacaturdaśyāṁ yastaṁ pūjayate naraḥ sa tatpāpaṁ nihatyāśu svargalokaṁ tato vrajet

जो मनुष्य चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उनकी पूजा करता है, वह अपने उस पाप का शीघ्र नाश करके स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 5 (skanda.6.143.5)

तथा चित्रांगदस्तत्र जाबालिसहितो नृपः ॥ कुमार्या सहितः सार्द्धं नग्नया तत्समुत्थया ॥ सन्तिष्ठते तदग्रे तु शप्तो जाबालिना पुरा

tathā citrāṁgadastatra jābālisahito nṛpaḥ kumāryā sahitaḥ sārddhaṁ nagnayā tatsamutthayā santiṣṭhate tadagre tu śapto jābālinā purā

और वहाँ राजा चित्रांगद, जाबालि के साथ, तथा उन्हीं से उत्पन्न उस नग्न कन्या के साथ, पूर्वकाल में जाबालि द्वारा शापित होकर उनके सम्मुख खड़े रहते हैं।

श्लोक 6 (skanda.6.143.6)

त्रयाणामपि यस्तेषां तस्मिन्नहनि निर्वपेत् ॥ स इष्टां लभते नारीं सिद्धिं च मनसि स्थिताम्

trayāṇāmapi yasteṣāṁ tasminnahani nirvapet sa iṣṭāṁ labhate nārīṁ siddhiṁ ca manasi sthitām

जो कोई उस दिन उन तीनों में से किसी के भी लिए हवन करता है, वह इच्छित स्त्री को तथा अपने मन में स्थित सिद्धि को प्राप्त करता है।

श्लोक 7 (skanda.6.143.7)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ कस्माज्जाबालिना शप्तः पूर्वं चित्रांगदो युवा ॥ सा च तत्तनया कस्मात्कुमारी वस्त्रवर्जिता

ṛṣaya ūcuḥ kasmājjābālinā śaptaḥ pūrvaṁ citrāṁgado yuvā sā ca tattanayā kasmātkumārī vastravarjitā

ऋषियों ने कहा — पहले जाबालि द्वारा युवा चित्रांगद किसलिए शापित हुए थे? और वह उनकी पुत्री वस्त्रविहीन कुमारी किसलिए है?

श्लोक 8 (skanda.6.143.8)

अद्यापि तिष्ठते तत्र विरुद्धं रूपमाश्रिता ॥ जनहास्य करं नित्यं तस्मात्सूत वदस्व नः

adyāpi tiṣṭhate tatra viruddhaṁ rūpamāśritā janahāsya karaṁ nityaṁ tasmātsūta vadasva naḥ

वह आज भी वहाँ उस विरुद्ध (असामान्य) रूप में स्थित है, सदा लोगों के उपहास का पात्र बनी हुई; अतः हे सूत! हमें बताइए।

श्लोक 9 (skanda.6.143.9)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ आर्सोत्पूर्वं मुनिर्नाम्ना जाबालिरिति विश्रुतः ॥ कौमारब्रह्मचर्येण येन चीर्णं तपः सदा

sūta uvāca ārsotpūrvaṁ munirnāmnā jābāliriti viśrutaḥ kaumārabrahmacaryeṇa yena cīrṇaṁ tapaḥ sadā

सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में जाबालि नामक एक प्रसिद्ध मुनि थे, जिन्होंने कौमार्य-अवस्था से ही ब्रह्मचर्य द्वारा सदा तप किया था।

श्लोक 10 (skanda.6.143.10)

हाटकेश्वरजं क्षेत्रं समासाद्य स सद्द्विजाः ॥ बाल्येऽपि वयसि प्राप्ते समारेभे महत्तपः

hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ samāsādya sa saddvijāḥ bālye'pi vayasi prāpte samārebhe mahattapaḥ

हे उत्तम द्विजो! हाटकेश्वर से उत्पन्न उस क्षेत्र को प्राप्त कर, उन्होंने बाल्यावस्था में ही महान् तप आरंभ किया।

श्लोक 11 (skanda.6.143.11)

कृच्छ्रचांद्रायणादीनि पाराकाणि शनैःशनैः ॥ कुर्वता तेन ते देवाः संनीता भयगोचरम्

kṛcchracāṁdrāyaṇādīni pārākāṇi śanaiḥśanaiḥ kurvatā tena te devāḥ saṁnītā bhayagocaram

क्रमशः कठोर चांद्रायण आदि पाराक व्रतों को धीरे-धीरे करते हुए उन्होंने देवताओं को भय से आक्रांत कर दिया।

श्लोक 12 (skanda.6.143.12)

ततः शक्रादयो देवाः संत्रस्ता मेरुमूर्धनि ॥ मिलित्वा चक्रिरे मंत्रं तस्य विघ्नकृते मिथः

tataḥ śakrādayo devāḥ saṁtrastā merumūrdhani militvā cakrire maṁtraṁ tasya vighnakṛte mithaḥ

तब शक्र आदि देवता भयभीत होकर मेरु पर्वत की चोटी पर मिलकर उसे विघ्न पहुँचाने के लिए आपस में मंत्रणा करने लगे।

श्लोक 13 (skanda.6.143.13)

यद्यस्य तपसो वृद्धिरेवं यास्यति नित्यशः ॥ च्यावयिष्यति तन्नूनं स्वर्गराज्याच्छतक्रतुम्

yadyasya tapaso vṛddhirevaṁ yāsyati nityaśaḥ cyāvayiṣyati tannūnaṁ svargarājyācchatakratum

यदि इसके तप की वृद्धि सदा इसी प्रकार होती रही, तो यह निश्चय ही शतक्रतु (इंद्र) को स्वर्ग-राज्य से च्युत कर देगा।

श्लोक 14 (skanda.6.143.14)

तस्माद्गच्छतु रंभाख्या तत्पार्श्वे ऽप्सरसां वरा ॥ ब्रह्मचर्यविघाताय तस्यर्षेर्भावितात्मनः

tasmādgacchatu raṁbhākhyā tatpārśve 'psarasāṁ varā brahmacaryavighātāya tasyarṣerbhāvitātmanaḥ

अतः अप्सराओं में श्रेष्ठ रंभा उसके पास जाए, ताकि उस दृढ़-संकल्प मुनि का ब्रह्मचर्य भंग हो सके।

श्लोक 15 (skanda.6.143.15)

ब्रह्मचर्यं तपोमूलं यतः संकीर्तितं द्विजैः ॥ तस्याभावात्परिक्लेशः केवलं न फलं व्रते

brahmacaryaṁ tapomūlaṁ yataḥ saṁkīrtitaṁ dvijaiḥ tasyābhāvātparikleśaḥ kevalaṁ na phalaṁ vrate

क्योंकि द्विजों द्वारा ब्रह्मचर्य को ही तप का मूल कहा गया है; उसके अभाव में केवल क्लेश ही होता है, व्रत का कोई फल नहीं मिलता।

श्लोक 16 (skanda.6.143.16)

एवं ते निश्चयं कृत्वा समाहूय ततः परम् ॥ रंभामूचुर्महेंद्रेण सर्वे देवास्तदादरात्

evaṁ te niścayaṁ kṛtvā samāhūya tataḥ param raṁbhāmūcurmaheṁdreṇa sarve devāstadādarāt

ऐसा निश्चय करके, फिर उसे बुलाकर, महेंद्र सहित समस्त देवताओं ने आदरपूर्वक रंभा से कहा।

श्लोक 17 (skanda.6.143.17)

गच्छ शीघ्रं महाभागे जाबालिर्यत्र तिष्ठति ॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे तपोविघ्नाय तस्य वै

gaccha śīghraṁ mahābhāge jābāliryatra tiṣṭhati hāṭakeśvaraje kṣetre tapovighnāya tasya vai

हे महाभागे! शीघ्र उस हाटकेश्वर क्षेत्र में जाओ, जहाँ जाबालि हैं, उनके तप में विघ्न डालने के लिए।

श्लोक 18 (skanda.6.143.18)

ते ते भावाः प्रयोक्तव्याः कथास्तास्ता मनोहराः ॥ वर्धयंती तथा चित्ते तस्य कामं निरर्गलम्

te te bhāvāḥ prayoktavyāḥ kathāstāstā manoharāḥ vardhayaṁtī tathā citte tasya kāmaṁ nirargalam

उन-उन मनोहर भावों और कथाओं का प्रयोग करना है, जिससे उसके चित्त में काम अनियंत्रित होकर बढ़ता जाए।

श्लोक 19 (skanda.6.143.19)

॥ रंभोवाच ॥ ॥ स मुनिर्न विजानाति कामधर्मं सुरेश्वर ॥ अरसज्ञं कथं देव करिष्यामि स्मरान्वितम्

raṁbhovāca sa munirna vijānāti kāmadharmaṁ sureśvara arasajñaṁ kathaṁ deva kariṣyāmi smarānvitam

रंभा ने कहा — हे देवेश्वर! वह मुनि तो काम-धर्म को जानते ही नहीं हैं; रस से अनभिज्ञ उनको काम से युक्त मैं कैसे कर सकूँगी?

श्लोक 20 (skanda.6.143.20)

॥ इन्द्र उवाच ॥ ॥ एष यास्यति मद्वाक्याद्वसंतस्तस्य सन्निधौ ॥ अस्य संदर्शनादेव भविष्यति स सस्मरः

indra uvāca eṣa yāsyati madvākyādvasaṁtastasya sannidhau asya saṁdarśanādeva bhaviṣyati sa sasmaraḥ

इंद्र ने कहा — मेरे कहने से वसंत उसके पास जाएगा; उसे देखते ही वह मुनि काम से युक्त हो जाएगा।

श्लोक 21 (skanda.6.143.21)

तस्माद्गच्छ द्रुतं तत्र सहानेन वरानने ॥ संसिद्धिर्जायते येन देवकृत्यं भवेद्द्रुतम्

tasmādgaccha drutaṁ tatra sahānena varānane saṁsiddhirjāyate yena devakṛtyaṁ bhaveddrutam

अतः हे सुमुखी! उसके साथ शीघ्र वहाँ जाओ, जिससे सिद्धि प्राप्त हो और देवकार्य शीघ्र संपन्न हो सके।

श्लोक 22 (skanda.6.143.22)

अथ सा तं प्रणम्योच्चैः प्रस्थिता धरणीतलम्॥ वसंतेन समायुक्ता जाबालिर्यत्र तिष्ठति

atha sā taṁ praṇamyoccaiḥ prasthitā dharaṇītalam vasaṁtena samāyuktā jābāliryatra tiṣṭhati

तब वह उन्हें उच्च स्वर से प्रणाम करके, वसंत के साथ, पृथ्वीतल की ओर वहाँ चल पड़ी जहाँ जाबालि रहते थे।

श्लोक 23 (skanda.6.143.23)

अथाकस्मादशोकस्य संजातः पुष्पसंचयः ॥ तिलकस्य च चूतस्य मंजर्यः समुपस्थिताः

athākasmādaśokasya saṁjātaḥ puṣpasaṁcayaḥ tilakasya ca cūtasya maṁjaryaḥ samupasthitāḥ

तब अकस्मात् अशोक के पुष्पों का समूह उत्पन्न हो गया, और तिलक तथा आम्र की मंजरियाँ प्रकट हो गईं।

श्लोक 24 (skanda.6.143.24)

शिशिरे च सरोजानि विकासं प्रापुरेव हि ॥ ववौ च सुरभिर्वायुर्दाक्षिणात्यः सुकामदः

śiśire ca sarojāni vikāsaṁ prāpureva hi vavau ca surabhirvāyurdākṣiṇātyaḥ sukāmadaḥ

शिशिर ऋतु में ही कमल विकसित हो उठे, और अत्यंत मनोरम, कामनाओं को उत्पन्न करने वाली, सुगंधित दक्षिणी वायु बहने लगी।

श्लोक 25 (skanda.6.143.25)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्ता रंभा तत्र वराप्सराः ॥ सलिलाशयतीरस्थो जाबालिर्यत्र तिष्ठति

etasminnaṁtare prāptā raṁbhā tatra varāpsarāḥ salilāśayatīrastho jābāliryatra tiṣṭhati

इसी बीच वह श्रेष्ठ अप्सरा रंभा वहाँ पहुँची, जहाँ जाबालि जल-आशय के तट पर स्थित थे।

श्लोक 26 (skanda.6.143.26)

अक्षमालाधृतकरो जपन्मंत्रमनेकधा ॥ अभीष्टं श्रद्धया युक्तो विधाय पितृतर्पणम्

akṣamālādhṛtakaro japanmaṁtramanekadhā abhīṣṭaṁ śraddhayā yukto vidhāya pitṛtarpaṇam

वे हाथ में जपमाला धारण किए, बार-बार मंत्र जपते हुए, श्रद्धापूर्वक इच्छित पितृ-तर्पण कर रहे थे।

श्लोक 27 (skanda.6.143.27)

अथ संपश्यतस्तस्य मुक्त्वा वस्त्रपरिग्रहम्

atha saṁpaśyatastasya muktvā vastraparigraham

तब, जब वह देख ही रहे थे, उस श्रेष्ठ अप्सरा ने अपने वस्त्र उतारकर,

श्लोक 28 (skanda.6.143.28)

स्नानार्थं तज्जलं साऽथ प्रविवेश वराप्सराः

snānārthaṁ tajjalaṁ sā'tha praviveśa varāpsarāḥ

स्नान के लिए उसी जल में प्रवेश किया।

श्लोक 29 (skanda.6.143.29)

विवस्त्रां तां समालोक्य सोऽपि यौवनशालिनीम्॥ याम्यानिलेन च स्पृष्टः कामस्य वशगो ऽभवत्

vivastrāṁ tāṁ samālokya so'pi yauvanaśālinīm yāmyānilena ca spṛṣṭaḥ kāmasya vaśago 'bhavat

अपनी यौवनयुक्त, विवस्त्र उस अप्सरा को देखकर, तथा दक्षिणी वायु के स्पर्श से भी छूकर, वह काम के वश में हो गए।

श्लोक 30 (skanda.6.143.30)

ततस्तस्याभवत्कंपस्तत्क्षणादेव सन्मुने ॥ अक्षमाला कराग्राच्च पपात धरणीतले

tatastasyābhavatkaṁpastatkṣaṇādeva sanmune akṣamālā karāgrācca papāta dharaṇītale

तब हे सत्मुने! उसी क्षण उन्हें कंपन होने लगा, और जपमाला उनके हाथ की उँगलियों से छूटकर भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 31 (skanda.6.143.31)

पुलकः सर्वगात्रेषु संजज्ञेऽतीव दारुणः ॥ अश्रुपाताः पतंति स्म कोष्णाः प्लावितभूतलाः

pulakaḥ sarvagātreṣu saṁjajñe'tīva dāruṇaḥ aśrupātāḥ pataṁti sma koṣṇāḥ plāvitabhūtalāḥ

उनके समस्त अंगों में अत्यंत तीव्र रोमांच उत्पन्न हो गया, और उष्ण अश्रुबिंदु भूमि को भिगोते हुए गिरने लगे।

श्लोक 32 (skanda.6.143.32)

अथ तं क्षुभितं ज्ञात्वा चित्तज्ञा सा वराप्सराः ॥ निर्गत्य सलिलात्तस्माच्चक्रे वस्त्रपरिग्रहम्

atha taṁ kṣubhitaṁ jñātvā cittajñā sā varāpsarāḥ nirgatya salilāttasmāccakre vastraparigraham

तब उसे विचलित जानकर, चित्त के भावों को समझने वाली उस श्रेष्ठ अप्सरा ने जल से निकलकर अपने वस्त्र धारण कर लिए।

श्लोक 33 (skanda.6.143.33)

ततस्तस्यांतिके गत्वा प्रणिपत्य कृतादरा ॥ प्रोवाच मधुरं वाक्यं वर्द्धंती तस्य तन्मतम्

tatastasyāṁtike gatvā praṇipatya kṛtādarā provāca madhuraṁ vākyaṁ varddhaṁtī tasya tanmatam

तत्पश्चात् उसके निकट जाकर, आदरपूर्वक प्रणाम करके, उसने उनके भाव को और अधिक बढ़ाती हुई मधुर वाणी में कहा।

श्लोक 34 (skanda.6.143.34)

आश्रमे सकलं ब्रह्मन्कच्चित्ते कुशलं मुने ॥ स्वाध्याये तपसि प्राज्ञ शिष्येषु मृगपक्षिषु

āśrame sakalaṁ brahmankaccitte kuśalaṁ mune svādhyāye tapasi prājña śiṣyeṣu mṛgapakṣiṣu

(उसने कहा —) हे ब्रह्मन्! क्या आश्रम में सब कुशल है? हे प्राज्ञ मुनि! क्या स्वाध्याय में, तप में, शिष्यों में, तथा मृगों और पक्षियों में सब कुशल है?

श्लोक 35 (skanda.6.143.35)

॥ मुनिरुवाच कुशलं मे वरारोहे सर्वत्रैवाधुना स्थितम्॥ विशेषेणात्र संप्राप्ता सर्वलक्षणलक्षिता

muniruvāca kuśalaṁ me varārohe sarvatraivādhunā sthitam viśeṣeṇātra saṁprāptā sarvalakṣaṇalakṣitā

मुनि ने कहा — हे वरारोहे! मुझे अभी सर्वत्र कुशल ही है, विशेष रूप से अब जब सर्वलक्षणों से युक्त तुम यहाँ आ पहुँची हो।

श्लोक 36 (skanda.6.143.36)

का त्वं वद महाभागे मम मन्मथवर्धनी॥ किं देवी वासुरी वा किं पन्नगी किं तु मानुषी

kā tvaṁ vada mahābhāge mama manmathavardhanī kiṁ devī vāsurī vā kiṁ pannagī kiṁ tu mānuṣī

हे महाभागे! बताओ तो, तुम कौन हो, जो मेरे काम को बढ़ा रही हो — क्या तुम देवी हो, या असुर-कन्या, या नागिनी, या फिर मनुष्य हो?

श्लोक 37 (skanda.6.143.37)

निवेदय शरीरे मे किं न पश्यसि वेपथुम्॥ निरर्गलश्च रोमांचो बाष्पपूरश्च नेत्रजः

nivedaya śarīre me kiṁ na paśyasi vepathum nirargalaśca romāṁco bāṣpapūraśca netrajaḥ

मुझे बताओ; क्या तुम मेरे शरीर का यह कंपन नहीं देख रही? यह अनियंत्रित रोमांच, और नेत्रों से बहता यह अश्रु-प्रवाह?

श्लोक 38 (skanda.6.143.38)

रंभोवाच॥ किं ते गात्रस्वभावोऽयम् किं वान्यो व्याधिसंभवः ॥ कच्चिदेव न ते स्वास्थ्यं प्रपश्यामि शरीरजम्

raṁbhovāca kiṁ te gātrasvabhāvo'yam kiṁ vānyo vyādhisaṁbhavaḥ kaccideva na te svāsthyaṁ prapaśyāmi śarīrajam

रंभा ने कहा — क्या यह आपके शरीर का स्वाभाविक रूप है, या कोई अन्य व्याधि उत्पन्न हुई है? मुझे तो आपके शरीर में कोई स्वास्थ्य दिखाई नहीं देता।

श्लोक 39 (skanda.6.143.39)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ न मे गात्रस्वभावो न व्याधिभिश्च सुलोचने ॥ शृणुष्व कारणं कृत्स्नं येनेदृक्संस्थितं वपुः

muniruvāca na me gātrasvabhāvo na vyādhibhiśca sulocane śṛṇuṣva kāraṇaṁ kṛtsnaṁ yenedṛksaṁsthitaṁ vapuḥ

मुनि ने कहा — हे सुलोचने! यह न तो मेरे शरीर की स्वाभाविक अवस्था है, न किसी व्याधि से उत्पन्न; सुनो, जिस कारण मेरा शरीर इस प्रकार का हो गया है, वह संपूर्ण कारण।

श्लोक 40 (skanda.6.143.40)

यावती वर्तते वेला तव दर्शनसंभवा ॥ तावत्कालमिदं रूपं मम गात्रसमुद्भवम्

yāvatī vartate velā tava darśanasaṁbhavā tāvatkālamidaṁ rūpaṁ mama gātrasamudbhavam

जितने समय से तुम्हारा यह दर्शन हुआ है, उतने ही समय से मेरे शरीर में यह अवस्था उत्पन्न हुई है।

श्लोक 41 (skanda.6.143.41)

तदहं मन्मथाविष्टो दर्शनात्तव शोभने ॥ ब्रह्मचर्यपरोपीत्थं महाव्रतधरोऽपि च

tadahaṁ manmathāviṣṭo darśanāttava śobhane brahmacaryaparopītthaṁ mahāvratadharo'pi ca

हे शोभने! इसीलिए मैं तुम्हारे दर्शन से काम के वश में हो गया हूँ — यद्यपि मैं इस प्रकार ब्रह्मचर्य में तत्पर और महाव्रतधारी हूँ।

श्लोक 42 (skanda.6.143.42)

॥ रंभोवाच । ॥ यद्येवं ब्राह्मणश्रेष्ठ मां भजस्व यथासुखम् ॥ नात्र कश्चिद्भवेद्दोषः पण्यनारी यतोऽस्म्यहम्

raṁbhovāca yadyevaṁ brāhmaṇaśreṣṭha māṁ bhajasva yathāsukham nātra kaścidbhaveddoṣaḥ paṇyanārī yato'smyaham

रंभा ने कहा — हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यदि ऐसा है, तो सुखपूर्वक मुझसे रमण करो; इसमें कोई दोष नहीं होगा, क्योंकि मैं तो पण्यनारी (सर्वसाधारण की) हूँ।

श्लोक 43 (skanda.6.143.43)

साधारणा वयं विप्र यतः सृष्टाः स्वयंभुवा ॥ सर्वेषामेव लोकानां विशेषेण द्विजन्मनाम्

sādhāraṇā vayaṁ vipra yataḥ sṛṣṭāḥ svayaṁbhuvā sarveṣāmeva lokānāṁ viśeṣeṇa dvijanmanām

हे विप्र! हम सब लोकों के लिए, और विशेष रूप से द्विजों के लिए, स्वयंभू (ब्रह्मा) द्वारा साधारण रूप से ही रची गई हैं।

श्लोक 44 (skanda.6.143.44)

अहं चापि समालोक्य त्वां मुने मन्मथोपमम् । हता कामशरैस्तीक्ष्णैर्न च गंतुं समुत्सहे

ahaṁ cāpi samālokya tvāṁ mune manmathopamam hatā kāmaśaraistīkṣṇairna ca gaṁtuṁ samutsahe

हे मुने! मैं भी तुम्हें कामदेव के समान देखकर, काम के तीक्ष्ण बाणों से आहत हुई हूँ, और यहाँ से जाने का साहस नहीं कर पा रही।

श्लोक 45 (skanda.6.143.45)

मया दृष्टाः सुराः पूर्वं यक्षा विद्याधरास्तथा ॥ सिद्धाश्च किंनरा नागा गुह्यकाः किमु मानुषाः

mayā dṛṣṭāḥ surāḥ pūrvaṁ yakṣā vidyādharāstathā siddhāśca kiṁnarā nāgā guhyakāḥ kimu mānuṣāḥ

मैंने पहले देवताओं को, यक्षों को, विद्याधरों को, तथा सिद्धों, किन्नरों, नागों और गुह्यकों को भी देखा है — मनुष्यों की तो बात ही क्या।

श्लोक 46 (skanda.6.143.46)

नेदृग्रूपं वपुस्तेषामेकस्यापि विलोकितम् ॥ मध्ये ब्राह्मणशार्दूल तस्माद्भक्तां भजस्व माम्

nedṛgrūpaṁ vapusteṣāmekasyāpi vilokitam madhye brāhmaṇaśārdūla tasmādbhaktāṁ bhajasva mām

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! उनमें से एक का भी ऐसा रूप मैंने नहीं देखा जैसा तुम्हारा है; अतः अपनी इस भक्त को अपना लो।

श्लोक 47 (skanda.6.143.47)

यो नारीं कामसंतप्तां स्वयं प्राप्तां परित्यजेत् ॥ स मूर्खः पच्यते घोरे नरके शाश्वतीः समाः

yo nārīṁ kāmasaṁtaptāṁ svayaṁ prāptāṁ parityajet sa mūrkhaḥ pacyate ghore narake śāśvatīḥ samāḥ

जो पुरुष काम से संतप्त होकर स्वयं आई हुई स्त्री को त्याग देता है, वह मूर्ख भयंकर नरक में शाश्वत वर्षों तक पकाया जाता है।

श्लोक 48 (skanda.6.143.48)

एवमुक्त्वा तया सोऽथ परिष्वक्तो महामुनिः ॥ अनिच्छन्नपि वाक्येन हृदयेन च सस्पृहः

evamuktvā tayā so'tha pariṣvakto mahāmuniḥ anicchannapi vākyena hṛdayena ca saspṛhaḥ

ऐसा कहकर उस अप्सरा ने उस महामुनि का आलिंगन कर लिया; वे मुनि, वाणी से अनिच्छुक होते हुए भी, हृदय से इच्छुक हो उठे।

श्लोक 49 (skanda.6.143.49)

ततो लतानि कुंजे तं समानीय मुनीश्वरम् । कामशास्त्रोदितैर्भावै रराम कृत्रिमैर्मुनिम्

tato latāni kuṁje taṁ samānīya munīśvaram kāmaśāstroditairbhāvai rarāma kṛtrimairmunim

तत्पश्चात् उस मुनीश्वर को लता-कुंज में लाकर, उसने कामशास्त्र में वर्णित कृत्रिम भावों के साथ उस मुनि से रमण किया।

श्लोक 50 (skanda.6.143.50)

एवं तया समं तत्र स्थितो यावद्दिनक्षयम् ॥ कामधर्मसमासक्तः संत्यक्ताशेषकर्मकः

evaṁ tayā samaṁ tatra sthito yāvaddinakṣayam kāmadharmasamāsaktaḥ saṁtyaktāśeṣakarmakaḥ

इस प्रकार वे उसके साथ दिन के अंत तक वहीं स्थित रहे, काम-धर्म में पूर्णतः आसक्त होकर, अपने समस्त कर्मों को त्यागकर।

श्लोक 51 (skanda.6.143.51)

ततो निष्कामतां प्राप्तो लज्जया परिवारितः ॥ विससर्ज च तां रंभां शौचं चक्रे ततः परम्

tato niṣkāmatāṁ prāpto lajjayā parivāritaḥ visasarja ca tāṁ raṁbhāṁ śaucaṁ cakre tataḥ param

तत्पश्चात् इच्छा-रहित होकर, लज्जा से घिरे हुए, उन्होंने उस रंभा को विदा कर दिया, और फिर शुद्धिकरण किया।

श्लोक 52 (skanda.6.143.52)

सापि तेन विनिर्मुक्ता कृतकृत्या विलासिनी । प्रहृष्टा प्रययौ तत्र यत्र देवाः सवासवाः

sāpi tena vinirmuktā kṛtakṛtyā vilāsinī prahṛṣṭā prayayau tatra yatra devāḥ savāsavāḥ

वह विलासिनी अप्सरा भी उनसे मुक्त होकर, अपना कार्य पूर्ण करके, प्रसन्नतापूर्वक वहाँ चली गई जहाँ इंद्र सहित देवता थे।

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