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नागर खण्ड · अध्याय 144

चित्रांगदेश्वर-फलवती-जाबाल्याख्यान

अध्याय 143अध्याय-सूचीअध्याय 145

श्लोक 1 (skanda.6.144.1)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ सा गत्वा त्रिदिवं पश्चात्सहस्राक्षं सुरैर्युतम् ॥ प्रोवाच भगवन्दिष्ट्या क्षोभितोऽसौ महामुनिः

sūta uvāca sā gatvā tridivaṁ paścātsahasrākṣaṁ surairyutam provāca bhagavandiṣṭyā kṣobhito'sau mahāmuniḥ

सूत जी ने कहा — वह रंभा तत्पश्चात् देवलोक को जाकर, देवताओं सहित सहस्राक्ष (इंद्र) के पास पहुँचकर बोली — हे भगवन्! सौभाग्य से वह महामुनि विचलित हो गया।

श्लोक 2 (skanda.6.144.2)

तपस्तस्य हतं कृत्स्नं यत्कृच्छ्रेण समाचितम् ॥ तथा निस्तेजसत्वं च नीतस्त्वं सुखभाग्भव

tapastasya hataṁ kṛtsnaṁ yatkṛcchreṇa samācitam tathā nistejasatvaṁ ca nītastvaṁ sukhabhāgbhava

उसका समस्त तप, जो कठिन साधना से संचित किया गया था, नष्ट हो गया है, और वह तेजोहीन कर दिया गया है; अब आप सुखी हो जाइए।

श्लोक 3 (skanda.6.144.3)

एवमुक्त्वाऽथ सा रंभा शंसिता निखिलैः सुरैः ॥ अमोघरेतसस्तस्य दध्रे गर्भं निजोदरे

evamuktvā'tha sā raṁbhā śaṁsitā nikhilaiḥ suraiḥ amogharetasastasya dadhre garbhaṁ nijodare

ऐसा कहकर, समस्त देवताओं द्वारा प्रशंसित हुई रंभा ने उस अमोघवीर्य मुनि के गर्भ को अपने उदर में धारण किया।

श्लोक 4 (skanda.6.144.4)

जाबालिरपि कृत्वा च पश्चात्तापमनेकधा ॥ भूयस्तु तपसि स्थित्वा स्थितस्तत्रैव चाश्रमे

jābālirapi kṛtvā ca paścāttāpamanekadhā bhūyastu tapasi sthitvā sthitastatraiva cāśrame

जाबालि भी बाद में अनेक प्रकार से पश्चाताप करके, पुनः तप में स्थित होकर उसी आश्रम में रहने लगे।

श्लोक 5 (skanda.6.144.5)

ततस्तु दशमे मासि संप्राप्ते सुषुवे शुभाम् ॥ कन्यां सरोजपत्राक्षीं दिव्यलक्षणलक्षिताम्

tatastu daśame māsi saṁprāpte suṣuve śubhām kanyāṁ sarojapatrākṣīṁ divyalakṣaṇalakṣitām

तत्पश्चात् दसवें महीने के आने पर, उसने कमल-पत्र के समान नेत्रों वाली, दिव्य लक्षणों से युक्त एक शुभ कन्या को जन्म दिया।

श्लोक 6 (skanda.6.144.6)

अथ तां मानुषोद्भूतां मत्वा तस्यैव चाश्रमम् ॥ गत्वा मुमोच प्रत्यक्षं तस्यर्षेश्चेदमब्रवीत्

atha tāṁ mānuṣodbhūtāṁ matvā tasyaiva cāśramam gatvā mumoca pratyakṣaṁ tasyarṣeścedamabravīt

फिर उसे मानव-सुलभ उत्पत्ति समझकर, उसी मुनि के आश्रम में जाकर, रंभा ने उसे स्वयं मुनि के समक्ष छोड़ दिया और यह कहा।

श्लोक 7 (skanda.6.144.7)

तव वीर्यसमुद्भूतामेनां मज्जठरोषिताम् ॥ कन्यकां मुनिशार्दूल तस्मात्पालय सांप्रतम्

tava vīryasamudbhūtāmenāṁ majjaṭharoṣitām kanyakāṁ muniśārdūla tasmātpālaya sāṁpratam

हे मुनिश्रेष्ठ! यह कन्या आपके ही वीर्य से उत्पन्न होकर मेरे उदर में पली है; अतः अब आप इसका पालन कीजिए।

श्लोक 8 (skanda.6.144.8)

न स्वर्गे विद्यते वासो मानुषाणां कथंचन ॥ एतस्मात्कारणात्तुभ्यं मया ब्रह्मन्समर्पिता

na svarge vidyate vāso mānuṣāṇāṁ kathaṁcana etasmātkāraṇāttubhyaṁ mayā brahmansamarpitā

स्वर्ग में मनुष्यों का किसी प्रकार भी निवास नहीं हो सकता; इसी कारण से, हे ब्रह्मन्! मैंने इसे आपको सौंप दिया है।

श्लोक 9 (skanda.6.144.9)

एवमुक्त्वा ययौ रंभा सत्वरं त्रिदशालयम् ॥ जाबालिरपि तां दृष्ट्वा कन्यकां स्नेहमाविशत्

evamuktvā yayau raṁbhā satvaraṁ tridaśālayam jābālirapi tāṁ dṛṣṭvā kanyakāṁ snehamāviśat

ऐसा कहकर रंभा शीघ्र ही देवलोक को चली गई; जाबालि भी उस कन्या को देखकर स्नेह से भर उठे।

श्लोक 10 (skanda.6.144.10)

ततस्तां कन्यकां कृत्वा सुष्ठु गुप्ते लतागृहे ॥ रसैर्मिष्टफलोद्भूतैः पुपोष च दिवानिशम्

tatastāṁ kanyakāṁ kṛtvā suṣṭhu gupte latāgṛhe rasairmiṣṭaphalodbhūtaiḥ pupoṣa ca divāniśam

तत्पश्चात् उस कन्या को एक सुरक्षित लता-गृह में रखकर, वे उसे मीठे फलों के रसों से दिन-रात पालने लगे।

श्लोक 11 (skanda.6.144.11)

सापि कन्या परां वृद्धिं शनैर्याति दिनेदिने । शुक्लपक्षं समासाद्य यथा चन्द्रकला दिवि

sāpi kanyā parāṁ vṛddhiṁ śanairyāti dinedine śuklapakṣaṁ samāsādya yathā candrakalā divi

वह कन्या भी प्रतिदिन धीरे-धीरे बढ़ने लगी, जैसे शुक्ल पक्ष में आकाश में चंद्रकला बढ़ती है।

श्लोक 12 (skanda.6.144.12)

यथायथाथ सा याति वृद्धिं कमललोचना ॥ तथातथास्य सुस्नेहो जाबालेरप्यवर्धत

yathāyathātha sā yāti vṛddhiṁ kamalalocanā tathātathāsya susneho jābālerapyavardhata

जैसे-जैसे वह कमल-नयना बढ़ती गई, वैसे-वैसे जाबालि का स्नेह भी उसके प्रति बढ़ता गया।

श्लोक 13 (skanda.6.144.13)

सा शिशुत्वे मृगैः सार्द्धं पक्षिभिश्च सुशोभना ॥ क्रीडां चक्रे सुविश्रब्धैर्वर्धयंती मुनेर्मुदम्

sā śiśutve mṛgaiḥ sārddhaṁ pakṣibhiśca suśobhanā krīḍāṁ cakre suviśrabdhairvardhayaṁtī munermudam

बाल्यावस्था में वह सुशोभित कन्या निर्भय होकर मृगों और पक्षियों के साथ क्रीड़ा करती हुई मुनि के आनंद को बढ़ाती थी।

श्लोक 14 (skanda.6.144.14)

ततो बाल्यं परित्यक्त्वा वल्कलावृतगात्रिका ॥ तस्यर्षेः सर्वकृत्येषु साहाय्यं प्रकरोति च

tato bālyaṁ parityaktvā valkalāvṛtagātrikā tasyarṣeḥ sarvakṛtyeṣu sāhāyyaṁ prakaroti ca

तत्पश्चात् बाल्यावस्था को त्यागकर, वल्कल वस्त्र धारण किए हुए वह उस ऋषि के सभी कार्यों में सहायता करने लगी।

श्लोक 15 (skanda.6.144.15)

समित्कुशादि यत्किंचित्फलपुष्पसमन्वितम् ॥ वनात्तदानयामास तस्य प्रीतिमवर्धयत्

samitkuśādi yatkiṁcitphalapuṣpasamanvitam vanāttadānayāmāsa tasya prītimavardhayat

वह वन से समिधा, कुश आदि तथा फल-फूल जो कुछ भी लाती, उससे उनकी प्रसन्नता बढ़ती जाती थी।

श्लोक 16 (skanda.6.144.16)

ततः कतिपयाहस्य फलार्थं सा मृगेक्षणा ॥ निदाघसमये दूरं स्वाश्रमात्प्रजगाम ह

tataḥ katipayāhasya phalārthaṁ sā mṛgekṣaṇā nidāghasamaye dūraṁ svāśramātprajagāma ha

तत्पश्चात् किसी दिन ग्रीष्म ऋतु में वह मृगनयनी फलों के लिए अपने आश्रम से दूर चली गई।

श्लोक 17 (skanda.6.144.17)

एतस्मिन्नंतरे तत्र विमानवरमाश्रितः ॥ प्राप्तश्चित्रांगदोनाम गन्धर्वस्त्रिदिवौकसाम्

etasminnaṁtare tatra vimānavaramāśritaḥ prāptaścitrāṁgadonāma gandharvastridivaukasām

इसी बीच, वहाँ श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़, चित्रांगद नामक एक गंधर्व, जो देवताओं में से एक था, आ पहुँचा।

श्लोक 18 (skanda.6.144.18)

तेन सा विजने बाला पूर्णचन्द्रनिभानना ॥ दृष्टा चांद्रमसी लेखा पतितेव धरातले

tena sā vijane bālā pūrṇacandranibhānanā dṛṣṭā cāṁdramasī lekhā patiteva dharātale

उस एकांत में उसने उस पूर्णचंद्र-मुखी बाला को देखा, मानो चंद्रमा की कोई कला पृथ्वी पर गिर पड़ी हो।

श्लोक 19 (skanda.6.144.19)

ततः कामपरीतांगः सोवतीर्य धरातलम्॥ विमानान्मधुरैर्वाक्यैस्तामुवाच कृतांजलिः

tataḥ kāmaparītāṁgaḥ sovatīrya dharātalam vimānānmadhurairvākyaistāmuvāca kṛtāṁjaliḥ

तब काम से आक्रांत होकर वह विमान से पृथ्वी पर उतरा और हाथ जोड़कर मधुर वचनों में उससे बोला।

श्लोक 20 (skanda.6.144.20)

का त्वं कमलगर्भाभा निर्जनेऽथ महावने ॥ भ्रमस्येकाकिनी बाले वनमध्ये सुलोचने

kā tvaṁ kamalagarbhābhā nirjane'tha mahāvane bhramasyekākinī bāle vanamadhye sulocane

हे कमल-गर्भ के समान कांतिमती बाला! तुम कौन हो, जो इस निर्जन महावन में, हे सुलोचने, अकेली विचर रही हो?

श्लोक 21 (skanda.6.144.21)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ अहं फलवतीनाम जाबालेर्दुहिता मुने ॥ फलपुष्पार्थमायाता तदर्थमिह कानने

kanyovāca ahaṁ phalavatīnāma jābālerduhitā mune phalapuṣpārthamāyātā tadarthamiha kānane

कन्या ने कहा — हे मुने! मैं जाबालि की पुत्री हूँ, फलवती नाम से; फल-फूल के लिए ही मैं इस वन में आई हूँ।

श्लोक 22 (skanda.6.144.22)

॥ चित्रांगद उवाच ॥ ॥ कुमारब्रह्मचारी स श्रूयते मुनिसत्तमः ॥ तत्कथं तस्य वामोरु त्वं जाता भार्यया विना

citrāṁgada uvāca kumārabrahmacārī sa śrūyate munisattamaḥ tatkathaṁ tasya vāmoru tvaṁ jātā bhāryayā vinā

चित्रांगद ने कहा — वे मुनिश्रेष्ठ तो कुमार-ब्रह्मचारी सुने जाते हैं; तो हे सुंदरी! तुम बिना किसी पत्नी के उनसे कैसे उत्पन्न हुई?

श्लोक 23 (skanda.6.144.23)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ सत्यमेतन्महाभाग नास्ति दारपरिग्रहः ॥ तस्यर्षेः किं तु संजाता यथा तन्मेऽवधारय

kanyovāca satyametanmahābhāga nāsti dāraparigrahaḥ tasyarṣeḥ kiṁ tu saṁjātā yathā tanme'vadhāraya

कन्या ने कहा — हे महाभाग! यह सत्य है कि उनका विवाह नहीं हुआ है, परन्तु मैं उन ऋषि से किस प्रकार उत्पन्न हुई, वह सुनो।

श्लोक 24 (skanda.6.144.24)

रंभा नामाप्सरास्तेन पुरा दृष्टा सुरांगना ॥ ततः कामपरीतेन सेविता च यथासुखम्

raṁbhā nāmāpsarāstena purā dṛṣṭā surāṁganā tataḥ kāmaparītena sevitā ca yathāsukham

पूर्वकाल में उन्होंने रंभा नामक देवांगना अप्सरा को देखा था, तत्पश्चात् काम से आक्रांत होकर उन्होंने उससे यथासुख रमण किया।

श्लोक 25 (skanda.6.144.25)

ततस्तदुदराज्जाता देवलोके महत्तरे ॥ तयापि चेह तस्यर्षेर्भूय एव नियोजिता

tatastadudarājjātā devaloke mahattare tayāpi ceha tasyarṣerbhūya eva niyojitā

तत्पश्चात् उसके उदर से उत्पन्न होकर, उस श्रेष्ठतर देवलोक में, उसने भी मुझे पुनः उन्हीं ऋषि को सौंप दिया।

श्लोक 26 (skanda.6.144.26)

एवं स मे पिता जातो जाबालिर्मुनिसत्तमः ॥ पोषिताऽहं ततस्तेन नानाफलसमुद्रवैः

evaṁ sa me pitā jāto jābālirmunisattamaḥ poṣitā'haṁ tatastena nānāphalasamudravaiḥ

इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ जाबालि मेरे पिता बने; तत्पश्चात् उन्होंने ही मुझे नाना प्रकार के फलों के रसों से पाला।

श्लोक 27 (skanda.6.144.27)

ततः फलवती नाम कृतं तेन महात्मना ॥ ममानुरूपमेतद्धि यन्मां त्वं परिपृच्छसि

tataḥ phalavatī nāma kṛtaṁ tena mahātmanā mamānurūpametaddhi yanmāṁ tvaṁ paripṛcchasi

तत्पश्चात् उन महात्मा ने मेरा नाम फलवती रखा; यह मेरे अनुरूप ही है, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो।

श्लोक 28 (skanda.6.144.28)

॥ चित्रांगद उवाच ॥ ॥ तव रूपं समालोक्य कामस्याहं वशं गतः ॥ तस्माद्भजस्व मां भीरु नो चेद्यास्यामि संक्षयम्

citrāṁgada uvāca tava rūpaṁ samālokya kāmasyāhaṁ vaśaṁ gataḥ tasmādbhajasva māṁ bhīru no cedyāsyāmi saṁkṣayam

चित्रांगद ने कहा — तुम्हारे रूप को देखकर मैं काम के वश में हो गया हूँ; अतः हे भीरु! मुझसे रमण करो, अन्यथा मैं नष्ट हो जाऊँगा।

श्लोक 29 (skanda.6.144.29)

अहं चित्रांगदोनाम गन्धर्वस्त्रिदिवौकसाम् ॥ तीर्थयात्राकृते प्राप्तः क्षेत्रेऽस्मिञ्छ्रद्धयाऽन्वितः

ahaṁ citrāṁgadonāma gandharvastridivaukasām tīrthayātrākṛte prāptaḥ kṣetre'smiñchraddhayā'nvitaḥ

मैं देवताओं में से चित्रांगद नामक गंधर्व हूँ, और श्रद्धापूर्वक तीर्थयात्रा के लिए इस क्षेत्र में आया हूँ।

श्लोक 30 (skanda.6.144.30)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ कुमारधर्मिणी चाहमद्यापि वशगा पितुः ॥ कामधर्मं न जानामि चित्रांगद कथंचन

kanyovāca kumāradharmiṇī cāhamadyāpi vaśagā pituḥ kāmadharmaṁ na jānāmi citrāṁgada kathaṁcana

कन्या ने कहा — हे चित्रांगद! मैं अभी भी कुमारी-धर्म का पालन करने वाली तथा पिता के अधीन हूँ; काम-धर्म को मैं किसी भी प्रकार नहीं जानती।

श्लोक 31 (skanda.6.144.31)

तस्मात्प्रार्थय मे तातं स मां तुभ्यं प्रदास्यति ॥ अनुरूपाय योग्याय तरुणाय मनस्विनीम्

tasmātprārthaya me tātaṁ sa māṁ tubhyaṁ pradāsyati anurūpāya yogyāya taruṇāya manasvinīm

अतः तुम मेरे पिता से प्रार्थना करो; वे इस बुद्धिमती को तुम्हें ही सौंप देंगे, जो एक उपयुक्त, योग्य तथा युवा वर हो।

श्लोक 32 (skanda.6.144.32)

ममापि रुचितं चित्ते तव वाक्यमिदं शुभम् ॥ धन्याहं यदि ते कण्ठमालिंगामि यथेच्छया

mamāpi rucitaṁ citte tava vākyamidaṁ śubham dhanyāhaṁ yadi te kaṇṭhamāliṁgāmi yathecchayā

मेरे मन को भी तुम्हारा यह शुभ वचन रुचिकर लगा है; यदि मैं इच्छानुसार तुम्हारे कंठ का आलिंगन कर सकूँ तो धन्य हो जाऊँ।

श्लोक 33 (skanda.6.144.33)

॥ चित्रांगद उवाच ॥ ॥ न शक्नोमि महाभागे तावत्कालं प्रतीक्षितुम् ॥ मां दहत्येष गात्रोत्थः सुमहान्कामपावकः

citrāṁgada uvāca na śaknomi mahābhāge tāvatkālaṁ pratīkṣitum māṁ dahatyeṣa gātrotthaḥ sumahānkāmapāvakaḥ

चित्रांगद ने कहा — हे महाभागे! मैं इतने समय तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता; मेरे शरीर से उठी यह विशाल काम-अग्नि मुझे जला रही है।

श्लोक 34 (skanda.6.144.34)

तस्मात्कुरु प्रसादं मे रतिदानेन शोभने ॥ को जानाति हि तच्चित्तं कीदृग्रूपं भविष्यति

tasmātkuru prasādaṁ me ratidānena śobhane ko jānāti hi taccittaṁ kīdṛgrūpaṁ bhaviṣyati

अतः हे शोभने! रति देकर मुझ पर कृपा करो; कौन जानता है कि भविष्य में मन कैसा हो जाएगा?

श्लोक 35 (skanda.6.144.35)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ एवं ते वर्तमानस्य मम तातः प्रकोपतः ॥ दहिष्यति न संदेहः शापं दत्त्वा सुदारुणम्

kanyovāca evaṁ te vartamānasya mama tātaḥ prakopataḥ dahiṣyati na saṁdehaḥ śāpaṁ dattvā sudāruṇam

कन्या ने कहा — यदि तुम इस प्रकार करोगे, तो मेरे पिता क्रोधित होकर निःसंदेह भयंकर शाप देकर तुम्हें जला डालेंगे।

श्लोक 36 (skanda.6.144.36)

॥ चित्रांगद उवाच ॥ ॥ तव तातः स कालेन मां दहिष्यति मानदे ॥ कामानलः पुनः सद्य एष भस्म करिष्यति

citrāṁgada uvāca tava tātaḥ sa kālena māṁ dahiṣyati mānade kāmānalaḥ punaḥ sadya eṣa bhasma kariṣyati

चित्रांगद ने कहा — हे मानदे! तुम्हारे पिता तो समय के साथ मुझे जलाएँगे, परन्तु यह काम-अग्नि तो अभी ही मुझे भस्म कर देगी।

श्लोक 37 (skanda.6.144.37)

एवमुक्त्वाऽथ तां बालां वेपमानां त्रपावतीम् ॥ गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ प्रविवेश सुरालयम्

evamuktvā'tha tāṁ bālāṁ vepamānāṁ trapāvatīm gṛhītvā dakṣiṇe pāṇau praviveśa surālayam

ऐसा कहकर, उस कांपती हुई लज्जायुक्त बाला का दाहिना हाथ पकड़कर, वह देवभवन में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 38 (skanda.6.144.38)

तत्र तां रमयामास तदा कामप्रपीडितः ॥ तत्कालजातरागांधां निर्लज्जत्वमुपागताम्

tatra tāṁ ramayāmāsa tadā kāmaprapīḍitaḥ tatkālajātarāgāṁdhāṁ nirlajjatvamupāgatām

वहाँ काम से पीड़ित होकर उसने उससे रमण किया, जो उस क्षण उत्पन्न राग से अंधी हुई निर्लज्जता को प्राप्त हो गई थी।

श्लोक 39 (skanda.6.144.39)

एवं तस्याः समं तेन स्थिताया दिवसो गतः ॥ निमेषवन्मुनिश्रेष्ठास्ततश्चास्तं गतो रविः

evaṁ tasyāḥ samaṁ tena sthitāyā divaso gataḥ nimeṣavanmuniśreṣṭhāstataścāstaṁ gato raviḥ

हे मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार उसके साथ रहते हुए उसका वह दिन एक पलक झपकने के समान बीत गया, और तत्पश्चात् सूर्य अस्त हो गया।

श्लोक 40 (skanda.6.144.40)

एतस्मिन्नंतरे विप्रो जाबालिर्दुःख संयुतः ॥ अनायातां सुतां ज्ञात्वा परिबभ्राम सर्वतः

etasminnaṁtare vipro jābālirduḥkha saṁyutaḥ anāyātāṁ sutāṁ jñātvā paribabhrāma sarvataḥ

इसी बीच, ब्राह्मण जाबालि दुःखी होकर, अपनी पुत्री को न लौटा हुआ जानकर, चारों ओर भटकने लगे।

श्लोक 41 (skanda.6.144.41)

अहो सा दुहिता मह्यं किमु व्यालैः प्रभक्षिता ॥ वृक्षं कंचित्समारूढा पतिता धरणी तले

aho sā duhitā mahyaṁ kimu vyālaiḥ prabhakṣitā vṛkṣaṁ kaṁcitsamārūḍhā patitā dharaṇī tale

वे विलाप करने लगे — हाय! क्या मेरी वह पुत्री सर्पों द्वारा भक्षित हो गई? या किसी वृक्ष पर चढ़कर भूमि पर गिर पड़ी?

श्लोक 42 (skanda.6.144.42)

किं वा जलाशयं कंचित्प्राप्य गाधमजानती ॥ निमग्ना तत्र सा बाला संप्रविष्टा जलार्थिनी

kiṁ vā jalāśayaṁ kaṁcitprāpya gādhamajānatī nimagnā tatra sā bālā saṁpraviṣṭā jalārthinī

या क्या किसी जलाशय की गहराई को न जानते हुए, जल लेने के लिए उसमें प्रवेश करके वह बाला डूब गई?

श्लोक 43 (skanda.6.144.43)

एवं स प्रलपन्विप्रो बभ्राम गहने वने ॥ कुशकण्टकविद्धांगः क्षुत्पिपासासमाकुलः

evaṁ sa pralapanvipro babhrāma gahane vane kuśakaṇṭakaviddhāṁgaḥ kṣutpipāsāsamākulaḥ

इस प्रकार विलाप करते हुए वह ब्राह्मण घने वन में भटकता रहा, कुश और कांटों से बिंधे शरीर वाला, भूख-प्यास से व्याकुल।

श्लोक 44 (skanda.6.144.44)

यंयं शृणोति शब्दं स मृगपक्षिसमुद्भवम् ॥ रजन्यां तत्र निर्याति मत्वा फलवतीं च ताम्

yaṁyaṁ śṛṇoti śabdaṁ sa mṛgapakṣisamudbhavam rajanyāṁ tatra niryāti matvā phalavatīṁ ca tām

जो-जो भी ध्वनि उसे मृगों या पक्षियों से उत्पन्न सुनाई देती, रात्रि में उसे फलवती का ही शब्द समझकर वह उधर ही निकल पड़ता।

श्लोक 45 (skanda.6.144.45)

अथ क्रमात्समायातो हरहर्म्यं स सन्मुनिः ॥ यत्र चित्रांगदोपेता सा संतिष्ठति कन्यका

atha kramātsamāyāto haraharmyaṁ sa sanmuniḥ yatra citrāṁgadopetā sā saṁtiṣṭhati kanyakā

तत्पश्चात् क्रमशः वह सत्पुरुष मुनि उस शिव-भवन में आ पहुँचे, जहाँ चित्रांगद के साथ वह कन्या ठहरी हुई थी।

श्लोक 46 (skanda.6.144.46)

निःशंका जल्पमाना च रागवाक्यान्यनेकशः ॥ अनर्हाणि कुमारीणां ब्रह्मजानां विशेषतः

niḥśaṁkā jalpamānā ca rāgavākyānyanekaśaḥ anarhāṇi kumārīṇāṁ brahmajānāṁ viśeṣataḥ

वह निर्भय होकर अनेक प्रकार के रागपूर्ण वचन बोल रही थी, जो कुमारियों के लिए, विशेषतः ब्राह्मणकुल में जन्मी कुमारियों के लिए, अनुचित थे।

श्लोक 47 (skanda.6.144.47)

ततः स सुचिरं श्रुत्वा दूरस्थो विस्मयान्वितः ॥ कुमार्याश्चेष्टितं दृष्ट्वा कोपसंरक्तलोचनः

tataḥ sa suciraṁ śrutvā dūrastho vismayānvitaḥ kumāryāśceṣṭitaṁ dṛṣṭvā kopasaṁraktalocanaḥ

दूर खड़े होकर बहुत देर तक यह सुनकर वे विस्मित हो गए, और उस कुमारी की चेष्टा देखकर उनके नेत्र क्रोध से लाल हो उठे।

श्लोक 48 (skanda.6.144.48)

अथ दुद्राव वेगेन गृह्य काष्ठसमुच्चयम् ॥ द्वाभ्यामेव विनाशाय भर्त्समानो मुहुर्मुहुः

atha dudrāva vegena gṛhya kāṣṭhasamuccayam dvābhyāmeva vināśāya bhartsamāno muhurmuhuḥ

तब वे लकड़ी का एक ढेर उठाकर, उन दोनों को नष्ट करने के लिए वेग से दौड़ पड़े, और बार-बार उन्हें धिक्कारने लगे।

श्लोक 49 (skanda.6.144.49)

धिग्धिक्पापसमाचारे कौमार्यं दूषितं त्वया ॥ लांछनं च समानीतं मम लोकत्रयेऽपि च

dhigdhikpāpasamācāre kaumāryaṁ dūṣitaṁ tvayā lāṁchanaṁ ca samānītaṁ mama lokatraye'pi ca

उन्होंने कहा — धिक्कार है, धिक्कार है, हे पापाचारिणी! तूने अपने कौमार्य को दूषित कर दिया, और मुझे तीनों लोकों में कलंक दिलाया है।

श्लोक 50 (skanda.6.144.50)

नितरां पतिमासाद्य कर्मणानेन चाधमे ॥ तस्मादनेन पापेन युक्तां त्वां नाशयाम्यहम्

nitarāṁ patimāsādya karmaṇānena cādhame tasmādanena pāpena yuktāṁ tvāṁ nāśayāmyaham

हे अधमे! विशेष रूप से पति को प्राप्त किए बिना ही यह कर्म करके तूने यह किया है; अतः इस पाप से युक्त तुझे मैं नष्ट कर देता हूँ।

श्लोक 51 (skanda.6.144.51)

एवमुक्त्वा प्रहारं स यावत्क्षिपति सन्मुनिः ॥ तावच्चित्रांगदो नष्टो व्योममार्गेण सत्वरम्

evamuktvā prahāraṁ sa yāvatkṣipati sanmuniḥ tāvaccitrāṁgado naṣṭo vyomamārgeṇa satvaram

ऐसा कहकर जैसे ही वह सत्पुरुष मुनि प्रहार करने को उद्यत हुए, चित्रांगद उसी क्षण आकाश-मार्ग से शीघ्र भाग गया।

श्लोक 52 (skanda.6.144.52)

विवस्त्रा सापि तत्रैव खिन्नांगी कामसेवया ॥ न शशाक क्वचिद्गंतुं समुत्थाय ततः क्षितौ

vivastrā sāpi tatraiva khinnāṁgī kāmasevayā na śaśāka kvacidgaṁtuṁ samutthāya tataḥ kṣitau

वह भी विवस्त्र होकर, काम-भोग से थके अंगों वाली, वहीं भूमि से उठकर भी कहीं जाने में समर्थ न हो सकी।

श्लोक 53 (skanda.6.144.53)

ततः काष्ठप्रहारोघैर्हत्वा तां पतितां क्षितौ॥ मृतामिति परिज्ञाय स क्रोधपरिवारितः

tataḥ kāṣṭhaprahāroghairhatvā tāṁ patitāṁ kṣitau mṛtāmiti parijñāya sa krodhaparivāritaḥ

तब क्रोध से घिरे हुए उन्होंने लकड़ी के अनेक प्रहारों से उसे भूमि पर गिराकर, उसे मृत समझ लिया।

श्लोक 54 (skanda.6.144.54)

ततश्चित्रांगदस्यापि ददौ शापं सुदारुणम् ॥ स दृष्ट्वाऽऽकाशमार्गेण गच्छमानं भयातुरम्

tataścitrāṁgadasyāpi dadau śāpaṁ sudāruṇam sa dṛṣṭvā''kāśamārgeṇa gacchamānaṁ bhayāturam

तत्पश्चात् उन्होंने आकाश-मार्ग से भयभीत होकर जाते हुए चित्रांगद को देखकर, उसे भी एक अत्यंत भयंकर शाप दे दिया।

श्लोक 55 (skanda.6.144.55)

य एष कन्यकां मह्यं धर्षयित्वा समुत्पतेत् ॥ स पतत्वचिरात्पापश्छिन्नपक्ष इवांडजः

ya eṣa kanyakāṁ mahyaṁ dharṣayitvā samutpatet sa patatvacirātpāpaśchinnapakṣa ivāṁḍajaḥ

उन्होंने कहा — जो यह मेरी कन्या को भ्रष्ट करके उड़ रहा है, वह पापी शीघ्र ही कटे पंखों वाले पक्षी की भाँति गिर जाए।

श्लोक 56 (skanda.6.144.56)

कुष्ठव्याधिसमायुक्तश्चलितुं नैव च क्षमः ॥ एतस्मिन्नन्तरे भूमौ स पपात नभस्तलात्

kuṣṭhavyādhisamāyuktaścalituṁ naiva ca kṣamaḥ etasminnantare bhūmau sa papāta nabhastalāt

कुष्ठ-रोग से युक्त होकर, चलने में भी असमर्थ हो जाए — इसी बीच वह आकाश से भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 57 (skanda.6.144.57)

कुष्ठव्याधिसमायुक्तः स च चित्रांगदो युवा ॥ ततस्तं स मुनिः प्राह काष्ठोद्यतकरः क्रुधा

kuṣṭhavyādhisamāyuktaḥ sa ca citrāṁgado yuvā tatastaṁ sa muniḥ prāha kāṣṭhodyatakaraḥ krudhā

वह युवा चित्रांगद भी कुष्ठ-रोग से आक्रांत हो गया; तब उस मुनि ने, हाथ में लकड़ी उठाए, क्रोधपूर्वक उससे कहा।

श्लोक 58 (skanda.6.144.58)

कस्त्वं पापसमाचार येन मे धर्षिता बलात् ॥ कुमारी तन्नयाम्येष त्वामद्य यम शासनम्

kastvaṁ pāpasamācāra yena me dharṣitā balāt kumārī tannayāmyeṣa tvāmadya yama śāsanam

तू कौन है, हे पापाचारी, जिसने बलपूर्वक मेरी कुमारी को भ्रष्ट किया है? अतः अभी मैं तुझे यमराज के शासन में भेजता हूँ।

श्लोक 59 (skanda.6.144.59)

॥ चित्रांगद उवाच ॥ ॥ अहं चित्रांगदोनाम गन्धर्वस्त्रिदिवौकसाम् ॥ तीर्थयात्राप्रसंगेन क्षेत्रेऽस्मिन्समुपागतः

citrāṁgada uvāca ahaṁ citrāṁgadonāma gandharvastridivaukasām tīrthayātrāprasaṁgena kṣetre'sminsamupāgataḥ

चित्रांगद ने कहा — मैं देवताओं में से चित्रांगद नामक गंधर्व हूँ, और तीर्थयात्रा के प्रसंग से इस क्षेत्र में आया था।

श्लोक 60 (skanda.6.144.60)

ततस्तु कन्यकां दृष्ट्वा कामदेववशं गतः

tatastu kanyakāṁ dṛṣṭvā kāmadevavaśaṁ gataḥ

तत्पश्चात् उस कन्या को देखकर मैं कामदेव के वश में हो गया।

श्लोक 61 (skanda.6.144.61)

ततः सेवितवानत्र लताहर्म्ये जनच्युते ॥ तस्मात्कुरु क्षमां मह्यं दीनस्य प्रणतस्य च

tataḥ sevitavānatra latāharmye janacyute tasmātkuru kṣamāṁ mahyaṁ dīnasya praṇatasya ca

तत्पश्चात् मैंने यहाँ जनरहित लता-भवन में उसका सेवन किया; अतः दीन और प्रणत मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 62 (skanda.6.144.62)

यथा व्याधेर्भवेन्नाशो यथा स्याद्गगने गतिः ॥ भूयोऽपि त्वत्प्रसादेन स्वल्पः कोपो हि साधुषु

yathā vyādherbhavennāśo yathā syādgagane gatiḥ bhūyo'pi tvatprasādena svalpaḥ kopo hi sādhuṣu

जिससे मेरे रोग का नाश हो और मुझे पुनः आकाश में गति प्राप्त हो, आपकी कृपा से यह हो; क्योंकि साधु पुरुषों में क्रोध अल्प ही होता है।

श्लोक 63 (skanda.6.144.63)

॥ जाबालिरुवाच ॥ ॥ ईदृग्रूपधरस्त्वं हि मम वाक्याद्भविष्यसि ॥ एषापि मत्सुता पापा वस्त्रहीना सदेदृशी

jābāliruvāca īdṛgrūpadharastvaṁ hi mama vākyādbhaviṣyasi eṣāpi matsutā pāpā vastrahīnā sadedṛśī

जाबालि ने कहा — मेरे वचन से तू सदा इसी रूप को धारण करने वाला बना रहेगा; और मेरी यह पापिनी पुत्री भी सदा इसी प्रकार वस्त्रहीन बनी रहेगी।

श्लोक 64 (skanda.6.144.64)

भविष्यति न संदेहो जीवयिष्यति चेत्क्वचित् ॥ यद्येषा धास्यति क्वापि वस्त्रं गात्रे निजे क्वचित्

bhaviṣyati na saṁdeho jīvayiṣyati cetkvacit yadyeṣā dhāsyati kvāpi vastraṁ gātre nije kvacit

इसमें कोई संदेह नहीं — यदि यह कभी भी अपने शरीर पर कहीं वस्त्र धारण करेगी,

श्लोक 65 (skanda.6.144.65)

तन्नूनं च शिरोऽप्यस्याः फलिष्यति न संशयः ॥ एवमुक्त्वा विकोपश्च स जगाम निजाश्रमम्

tannūnaṁ ca śiro'pyasyāḥ phaliṣyati na saṁśayaḥ evamuktvā vikopaśca sa jagāma nijāśramam

तो निश्चय ही उसका सिर फट जाएगा, इसमें कोई संशय नहीं। ऐसा कहकर, क्रोधरहित होकर, वे अपने आश्रम को चले गए।

श्लोक 66 (skanda.6.144.66)

चित्रांगदोऽपि तत्रैव तया सार्धं तथा स्थितः ॥ कस्यचित्त्वथ कालस्य तत्र क्षेत्रे समाययौ

citrāṁgado'pi tatraiva tayā sārdhaṁ tathā sthitaḥ kasyacittvatha kālasya tatra kṣetre samāyayau

चित्रांगद भी उसी अवस्था में उसके साथ वहीं रहने लगा; तत्पश्चात् किसी समय उस क्षेत्र में शिव पधारे।

श्लोक 67 (skanda.6.144.67)

चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां भगवाञ्छशिशेखरः ॥ गन्तुं चित्रेश्वरे पीठे गणै रौद्रैः समावृतः ॥ योगिनीभिः प्रचण्डाभिः सार्धं प्राप्ते निशामुखे

caitraśuklacaturdaśyāṁ bhagavāñchaśiśekharaḥ gantuṁ citreśvare pīṭhe gaṇai raudraiḥ samāvṛtaḥ yoginībhiḥ pracaṇḍābhiḥ sārdhaṁ prāpte niśāmukhe

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को, रात्रि का आरंभ होने पर, चंद्रशेखर भगवान् रौद्र गणों तथा प्रचंड योगिनियों के साथ चित्रेश्वर पीठ की ओर जाने के लिए वहाँ पधारे।

श्लोक 68 (skanda.6.144.68)

अथ प्राप्ते निशार्धे तु योगिन्यस्ताः सुदारुणाः ॥ महामांसं महामांसमित्यूचुर्भक्षणाय वै

atha prāpte niśārdhe tu yoginyastāḥ sudāruṇāḥ mahāmāṁsaṁ mahāmāṁsamityūcurbhakṣaṇāya vai

तत्पश्चात् आधी रात्रि के आगमन पर वे अत्यंत भयंकर योगिनियाँ भक्षण के लिए "महामांस! महामांस!" पुकारने लगीं।

श्लोक 69 (skanda.6.144.69)

नृत्यमानाः पुरस्तस्य देवदेवस्य शूलिनः ॥ सस्पर्धा गणमुख्यैस्तैर्नर्तमानैः समंततः

nṛtyamānāḥ purastasya devadevasya śūlinaḥ saspardhā gaṇamukhyaistairnartamānaiḥ samaṁtataḥ

वे उन देवाधिदेव शूलधारी शिव के समक्ष नृत्य करने लगीं, चारों ओर नाचते हुए प्रमुख गणों के साथ स्पर्धा करती हुई।

श्लोक 70 (skanda.6.144.70)

यस्तत्र समये तासां महामांसं प्रयच्छति ॥ मंत्रपूतं स संसिद्धिं समवाप्नोति वांछिताम्

yastatra samaye tāsāṁ mahāmāṁsaṁ prayacchati maṁtrapūtaṁ sa saṁsiddhiṁ samavāpnoti vāṁchitām

उस समय जो कोई उन्हें मंत्रपूत महामांस अर्पित करता है, वह अपनी इच्छित सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 71 (skanda.6.144.71)

मद्यं मांसं तथा चान्यन्नैवेद्यं वा फलादिकम् ॥ तस्य सिद्धिः समादिष्टा यथा स्वहृदये स्थिता

madyaṁ māṁsaṁ tathā cānyannaivedyaṁ vā phalādikam tasya siddhiḥ samādiṣṭā yathā svahṛdaye sthitā

मद्य, मांस, या अन्य नैवेद्य अथवा फल आदि अर्पित करने वाले की सिद्धि उसी प्रकार निर्धारित होती है, जैसी उसके हृदय में स्थित हो।

श्लोक 72 (skanda.6.144.72)

एतस्मिन्नंतरे कन्या सा जाबालिसमुद्भवा ॥ स च चित्रांगदस्तत्र गत्वा प्रोवाच सादरम्

etasminnaṁtare kanyā sā jābālisamudbhavā sa ca citrāṁgadastatra gatvā provāca sādaram

इसी बीच वह जाबालि से उत्पन्न कन्या और वह चित्रांगद, दोनों वहाँ जाकर आदरपूर्वक बोले।

श्लोक 73 (skanda.6.144.73)

अस्मदीयमिदं मांसं योगिन्यो हर्षसंयुताः ॥ भक्षयन्तु यथासौख्यं स्वयमेव प्रकल्पितम्

asmadīyamidaṁ māṁsaṁ yoginyo harṣasaṁyutāḥ bhakṣayantu yathāsaukhyaṁ svayameva prakalpitam

उन्होंने कहा — हे योगिनियो! प्रसन्नतापूर्वक हमारा यह मांस, जो स्वयं ही अर्पित किया गया है, अपनी इच्छानुसार ग्रहण करें।

श्लोक 74 (skanda.6.144.74)

अथ तं पुरुषं दृष्ट्वा कुष्ठव्याधिसमावृतम् ॥ विवस्त्रां कन्यकां तां च सर्वास्ता विस्मयान्विताः

atha taṁ puruṣaṁ dṛṣṭvā kuṣṭhavyādhisamāvṛtam vivastrāṁ kanyakāṁ tāṁ ca sarvāstā vismayānvitāḥ

तब उस कुष्ठ-रोग से आक्रांत पुरुष तथा उस विवस्त्र कन्या को देखकर, वे सभी योगिनियाँ विस्मित हो गईं।

श्लोक 75 (skanda.6.144.75)

ते च सर्वे गणा रौद्राः स च देवस्त्रिलोचनः ॥ पप्रच्छ कौतुकाविष्टस्तत्र चित्रांगदं प्रभुः

te ca sarve gaṇā raudrāḥ sa ca devastrilocanaḥ papraccha kautukāviṣṭastatra citrāṁgadaṁ prabhuḥ

वे सभी रौद्र गण भी, तथा वे त्रिनेत्रधारी देव भी, कौतुकवश वहाँ चित्रांगद से प्रश्न करने लगे।

श्लोक 76 (skanda.6.144.76)

कस्त्वं धैर्यसमायुक्तो महत्सत्त्वे व्यवस्थितः ॥ यः प्रयच्छसि जीवं त्वं कीटस्यापि सुवल्लभम्

kastvaṁ dhairyasamāyukto mahatsattve vyavasthitaḥ yaḥ prayacchasi jīvaṁ tvaṁ kīṭasyāpi suvallabham

उन्होंने पूछा — तुम कौन हो, जो धैर्य से युक्त तथा महान सत्त्व में स्थित हो, जो कीट को भी अत्यंत प्रिय अपने प्राण अर्पित कर रहे हो?

श्लोक 77 (skanda.6.144.77)

केयं च वसनैंर्हीना त्वया सार्धं गतव्यथा ॥ प्रयच्छति निजं देहं यद्देयं नैव कस्यचित्

keyaṁ ca vasanaiṁrhīnā tvayā sārdhaṁ gatavyathā prayacchati nijaṁ dehaṁ yaddeyaṁ naiva kasyacit

और यह वस्त्रहीन स्त्री, जो तुम्हारे साथ पीड़ा से मुक्त होकर, अपनी उस देह को अर्पित कर रही है जो किसी को भी अर्पित करने योग्य नहीं है, यह कौन है?

श्लोक 78 (skanda.6.144.78)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ ततः स कथयामास सर्वमात्मविचेष्टितम् ॥ यथा कन्यासमं संगः कृतः शापश्च सन्मुनेः

sūta uvāca tataḥ sa kathayāmāsa sarvamātmaviceṣṭitam yathā kanyāsamaṁ saṁgaḥ kṛtaḥ śāpaśca sanmuneḥ

सूत जी ने कहा — तब उसने अपनी सारी कथा कह सुनाई — किस प्रकार उसने कन्या के साथ संग किया और उस सत्पुरुष मुनि ने शाप दिया।

श्लोक 79 (skanda.6.144.79)

ततश्चित्रांगदं दृष्ट्वा स गन्धर्वं दिवौकसाम् ॥ तथारूपं कृपाविष्टस्ततः प्रोवाच शंकरः

tataścitrāṁgadaṁ dṛṣṭvā sa gandharvaṁ divaukasām tathārūpaṁ kṛpāviṣṭastataḥ provāca śaṁkaraḥ

तत्पश्चात् उस देवगण के गंधर्व चित्रांगद को उस दशा में देखकर, कृपा से भरकर शंकर ने उससे कहा।

श्लोक 80 (skanda.6.144.80)

मम संदर्शनं प्राप्य न मृत्युर्जायते क्वचित् ॥ न वृथा दर्शनं चैतत्तस्मात्प्रार्थय सादरम्

mama saṁdarśanaṁ prāpya na mṛtyurjāyate kvacit na vṛthā darśanaṁ caitattasmātprārthaya sādaram

मेरे दर्शन को प्राप्त करके किसी को भी मृत्यु नहीं होती; और यह दर्शन व्यर्थ भी नहीं जाता; अतः आदरपूर्वक वर माँगो।

श्लोक 81 (skanda.6.144.81)

॥ चित्रांगद उवाच ॥. ॥ व्याधिनाऽहं सुनिर्विण्णस्तेन देवात्र चागतः ॥ येन व्याधिक्षयो भावी देहनाशेन शंकर

citrāṁgada uvāca . vyādhinā'haṁ sunirviṇṇastena devātra cāgataḥ yena vyādhikṣayo bhāvī dehanāśena śaṁkara

चित्रांगद ने कहा — हे देव! मैं इस रोग से अत्यंत खिन्न होकर यहाँ आया हूँ, ताकि, हे शंकर! शरीर के नाश से ही मेरे रोग का नाश हो सके।

श्लोक 82 (skanda.6.144.82)

तस्मात्कुरु क्षयं व्याधेर्यदि यच्छसि मे वरम् ॥ खेचरत्वं पुनर्देहि येन स्वर्गं व्रजाम्यहम्

tasmātkuru kṣayaṁ vyādheryadi yacchasi me varam khecaratvaṁ punardehi yena svargaṁ vrajāmyaham

अतः यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो मेरे रोग का क्षय कीजिए, और मुझे पुनः खेचरत्व (आकाश-गमन शक्ति) प्रदान कीजिए, जिससे मैं स्वर्ग जा सकूँ।

श्लोक 83 (skanda.6.144.83)

॥ श्रीशंकर उवाच ॥ ॥ त्वं स्थापयात्र मल्लिंगं पीठे गन्धर्वसत्तम ॥ ततश्चाराधय प्रीत्या यावद्वर्षमुपस्थितम्

śrīśaṁkara uvāca tvaṁ sthāpayātra malliṁgaṁ pīṭhe gandharvasattama tataścārādhaya prītyā yāvadvarṣamupasthitam

श्री शंकर ने कहा — हे गंधर्वश्रेष्ठ! तुम इस पीठ पर मेरा लिंग स्थापित करो, और तत्पश्चात् एक वर्ष तक प्रेमपूर्वक उसकी आराधना करो।

श्लोक 84 (skanda.6.144.84)

यथायथा सुपूजां त्वं मल्लिंगस्य करिष्यसि ॥ दिनेदिने तथा व्याधेस्तव नाशो भविष्यति

yathāyathā supūjāṁ tvaṁ malliṁgasya kariṣyasi dinedine tathā vyādhestava nāśo bhaviṣyati

जैसे-जैसे तुम मेरे लिंग की भलीभाँति पूजा करते जाओगे, वैसे-वैसे प्रतिदिन तुम्हारे रोग का नाश होता जाएगा।

श्लोक 85 (skanda.6.144.85)

ततस्तु खे गतिं प्राप्य पुनः स्वर्गं प्रयास्यसि ॥ मत्प्रसादान्न सन्देहः सत्यमेतन्मयोदितम्

tatastu khe gatiṁ prāpya punaḥ svargaṁ prayāsyasi matprasādānna sandehaḥ satyametanmayoditam

तत्पश्चात् आकाश में गति प्राप्त कर तुम पुनः स्वर्ग को चले जाओगे; मेरी कृपा से इसमें कोई संदेह नहीं — यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 86 (skanda.6.144.86)

एषापि कन्यका यस्मात्प्रविष्टा पीठमध्यतः ॥ तस्मात्फलवतीनाम योगिनी सम्भविष्यति

eṣāpi kanyakā yasmātpraviṣṭā pīṭhamadhyataḥ tasmātphalavatīnāma yoginī sambhaviṣyati

और यह कन्या भी, चूँकि इस पीठ के मध्य में प्रविष्ट हुई है, इसलिए फलवती नाम की एक योगिनी बन जाएगी।

श्लोक 87 (skanda.6.144.87)

अनेनैव तु रूपेण नग्नत्वेन व्यवस्थिता ॥ मुख्यामवाप्स्यते पूजां वांछितं च प्रदास्यति ॥ पूजकानां स्थितं चित्ते शतसंख्यगुणं तदा

anenaiva tu rūpeṇa nagnatvena vyavasthitā mukhyāmavāpsyate pūjāṁ vāṁchitaṁ ca pradāsyati pūjakānāṁ sthitaṁ citte śatasaṁkhyaguṇaṁ tadā

इसी रूप में, नग्न अवस्था में स्थित रहकर, वह प्रमुख पूजा को प्राप्त करेगी, और पूजा करने वालों के मन में स्थित इच्छा को सौ गुना करके प्रदान करेगी।

श्लोक 88 (skanda.6.144.88)

एतां संपूजयेन्मर्त्यः पीठमेतत्ततः परम्॥ पूजयिष्यति तस्येष्टा सिद्धिरेवं भविष्यति

etāṁ saṁpūjayenmartyaḥ pīṭhametattataḥ param pūjayiṣyati tasyeṣṭā siddhirevaṁ bhaviṣyati

जो मनुष्य इसकी पूजा करेगा और तत्पश्चात् इस पीठ की भी पूजा करेगा, उसे इस प्रकार अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होगी।

श्लोक 89 (skanda.6.144.89)

एवमुक्त्वा ततः साऽथ हर्षेण महताऽन्विता ॥ योगिनीवृंदमध्यस्था नृत्यं चक्रे ततः परम्

evamuktvā tataḥ sā'tha harṣeṇa mahatā'nvitā yoginīvṛṁdamadhyasthā nṛtyaṁ cakre tataḥ param

ऐसा सुनकर, वह अत्यंत हर्ष से भरकर, योगिनियों के समूह के मध्य में स्थित होकर, तत्पश्चात् नृत्य करने लगी।

श्लोक 90 (skanda.6.144.90)

एवं बभूव सा तत्र योगिनी च वरांगना ॥ तथा चक्रे परं नृत्यं यथा तुष्टो महेश्वरः

evaṁ babhūva sā tatra yoginī ca varāṁganā tathā cakre paraṁ nṛtyaṁ yathā tuṣṭo maheśvaraḥ

इस प्रकार वह सुंदरी वहाँ योगिनी बन गई, और ऐसा उत्कृष्ट नृत्य किया कि महेश्वर प्रसन्न हो गए।

श्लोक 91 (skanda.6.144.91)

ततः प्रोवाच तां हृष्टः सर्वयोगिनिसंनिधौ ॥ अनेन तव नृत्येन गीतेन च विशेषतः

tataḥ provāca tāṁ hṛṣṭaḥ sarvayoginisaṁnidhau anena tava nṛtyena gītena ca viśeṣataḥ

तब प्रसन्न होकर उन्होंने समस्त योगिनियों की उपस्थिति में उससे कहा — तुम्हारे इस नृत्य और विशेष रूप से गीत से,

श्लोक 92 (skanda.6.144.92)

परितुष्टोस्मि ते वत्से तस्माच्छृणु वचो मम ॥ निशीथेऽद्य दिने प्राप्ते यस्ते पूजां करिष्यति

parituṣṭosmi te vatse tasmācchṛṇu vaco mama niśīthe'dya dine prāpte yaste pūjāṁ kariṣyati

हे वत्से! मैं तुमसे अत्यंत संतुष्ट हूँ; अतः मेरा वचन सुनो — आज से जो भी मध्यरात्रि के समय तुम्हारी पूजा करेगा,

श्लोक 93 (skanda.6.144.93)

सुरा मांसान्नसत्कारैर्मंत्रैरागमसंभवैः ॥ स भविष्यति तत्कालं शापानुग्रहशक्तिमान्

surā māṁsānnasatkārairmaṁtrairāgamasaṁbhavaiḥ sa bhaviṣyati tatkālaṁ śāpānugrahaśaktimān

सुरा, मांस, अन्न आदि उपहारों तथा आगमोक्त मंत्रों द्वारा, वह उसी समय शाप और अनुग्रह दोनों की शक्ति से युक्त हो जाएगा।

श्लोक 94 (skanda.6.144.94)

बंधनं मोहनं चापि शत्रोरुच्चाटनं तथा ॥ करिष्यति न सन्देहो वशीकरणमेव च

baṁdhanaṁ mohanaṁ cāpi śatroruccāṭanaṁ tathā kariṣyati na sandeho vaśīkaraṇameva ca

वह निःसंदेह बंधन, मोहन, शत्रु का उच्चाटन तथा वशीकरण — ये सभी कर सकेगा।

श्लोक 95 (skanda.6.144.95)

त्रिकोणं कुण्डमास्थाय दिशां पालान्प्रपूजयेत् । क्षेत्रपालं च सर्वास्ता देवता गमनोद्भवाः

trikoṇaṁ kuṇḍamāsthāya diśāṁ pālānprapūjayet kṣetrapālaṁ ca sarvāstā devatā gamanodbhavāḥ

त्रिकोण कुंड बनाकर, वह दिक्पालों की पूजा करे, और क्षेत्रपाल तथा उस मार्ग में उत्पन्न होने वाली सभी देवताओं की भी।

श्लोक 96 (skanda.6.144.96)

तथा चत्वरपूजां च प्रकृत्वा विधिपूर्वकम् ॥ पश्चात्त्वां पूजयित्वा च होमं यश्च करिष्यति

tathā catvarapūjāṁ ca prakṛtvā vidhipūrvakam paścāttvāṁ pūjayitvā ca homaṁ yaśca kariṣyati

तथा विधिपूर्वक चौराहे की पूजा करके, तत्पश्चात् तुम्हारी पूजा करके, जो हवन करेगा,

श्लोक 97 (skanda.6.144.97)

शत्रुवामपदोत्थेन स्पृष्टेन रजसाऽथवा ॥ गुग्गुलेन सहस्रांतं स्तंभनं च करिष्यति

śatruvāmapadotthena spṛṣṭena rajasā'thavā guggulena sahasrāṁtaṁ staṁbhanaṁ ca kariṣyati

शत्रु के बाएँ पैर के नीचे की धूल से स्पर्श किए गुग्गुल से सहस्र बार होम करके, वह स्तंभन कर सकेगा।

श्लोक 98 (skanda.6.144.98)

यश्च शत्रुं हृदि स्थाप्य शत्रूद्वर्तनसंभवम् ॥ मलं धात्रीफलैः सार्धं मोहनं स करिष्यति

yaśca śatruṁ hṛdi sthāpya śatrūdvartanasaṁbhavam malaṁ dhātrīphalaiḥ sārdhaṁ mohanaṁ sa kariṣyati

तथा जो शत्रु को हृदय में स्थापित करके, शत्रु के उबटन से उत्पन्न मैल को आँवले के फलों के साथ मिलाकर हवन करेगा, वह मोहन कर सकेगा।

श्लोक 99 (skanda.6.144.99)

यः शत्रोः स्नानजं तोयं गृहीत्वा चाथ कर्दमम् ॥ शिवनिर्माल्यसंयुक्तं जुह्वयिष्यति पावके

yaḥ śatroḥ snānajaṁ toyaṁ gṛhītvā cātha kardamam śivanirmālyasaṁyuktaṁ juhvayiṣyati pāvake

जो शत्रु के स्नान के जल तथा उसकी कीचड़ को लेकर, उसे शिव के निर्माल्य (उच्छिष्ट पूजा-सामग्री) के साथ मिलाकर अग्नि में हवन करेगा,

श्लोक 100 (skanda.6.144.100)

तवाग्रे स नरो नूनं शत्रुमुच्चाटयिष्यति ॥ एषोपि तव संगेन तव चित्रांगदः प्रियः ॥ संप्राप्स्यति च सत्पूजामनुषंगात्त्वदुद्भवात्

tavāgre sa naro nūnaṁ śatrumuccāṭayiṣyati eṣopi tava saṁgena tava citrāṁgadaḥ priyaḥ saṁprāpsyati ca satpūjāmanuṣaṁgāttvadudbhavāt

वह मनुष्य तुम्हारे समक्ष निश्चय ही अपने शत्रु को दूर भगा सकेगा। और यह तुम्हारा प्रिय चित्रांगद भी, तुम्हारे संग से तथा तुमसे संबंधित होने के कारण, उत्तम पूजा को प्राप्त करेगा।

श्लोक 101 (skanda.6.144.101)

॥ फलवत्युवाच ॥ ॥ यदि देव प्रसन्नो मे तथान्यमपि सद्वरम्

phalavatyuvāca yadi deva prasanno me tathānyamapi sadvaram

फलवती ने कहा — हे देव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो एक और उत्तम वर भी दीजिए।

श्लोक 102 (skanda.6.144.102)

हृदिस्थं देहि मे सौख्यं येन संजायतेऽखिलम् ॥ पिता ममैष जाबालिर्निर्मुक्तो वसनैः सदा

hṛdisthaṁ dehi me saukhyaṁ yena saṁjāyate'khilam pitā mamaiṣa jābālirnirmukto vasanaiḥ sadā

मुझे वह सुख प्रदान कीजिए, जो मेरे हृदय में स्थित है और जिससे सब कुछ सिद्ध हो जाए — मेरे यह पिता जाबालि सदा वस्त्रों से रहित हैं।

श्लोक 103 (skanda.6.144.103)

अहं यथा तथात्रैव संतिष्ठतु दिवानिशम् । येन संतापमायाति पश्यन्मम विरोधिनीम्

ahaṁ yathā tathātraiva saṁtiṣṭhatu divāniśam yena saṁtāpamāyāti paśyanmama virodhinīm

जिस प्रकार मैं यहाँ हूँ, वैसे ही वे भी दिन-रात यहीं रहें, जिससे मेरे विरुद्ध आचरण करने वाले को देखकर वे संतप्त होते रहें।

श्लोक 104 (skanda.6.144.104)

क्रीडां ब्राह्मणवंशस्य मद्यमांससमुद्भवाम् ॥ मद्यगन्धं समाघ्राति मांसं पश्यति संस्कृतम् ॥ मां स्वच्छंदरतां नित्यं दुःखं याति दिनेदिने

krīḍāṁ brāhmaṇavaṁśasya madyamāṁsasamudbhavām madyagandhaṁ samāghrāti māṁsaṁ paśyati saṁskṛtam māṁ svacchaṁdaratāṁ nityaṁ duḥkhaṁ yāti dinedine

ब्राह्मण-वंश की इस मद्य-मांस से उत्पन्न क्रीड़ा को देखते हुए, मद्य की गंध सूँघते हुए, संस्कृत मांस को देखते हुए, तथा मुझे स्वच्छंद-रति में सदा देखते हुए, वे प्रतिदिन दुःख को प्राप्त होते रहें।

श्लोक 105 (skanda.6.144.105)

॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ एवं भविष्यति प्रोक्तं संजातं चाधुना शुभे ॥ अहं यास्यामि कैलासं त्वं तिष्ठात्र यथोदिता

śrībhagavānuvāca evaṁ bhaviṣyati proktaṁ saṁjātaṁ cādhunā śubhe ahaṁ yāsyāmi kailāsaṁ tvaṁ tiṣṭhātra yathoditā

भगवान् ने कहा — हे शुभे! जो कहा गया है, वह ऐसा ही होगा, और अभी वैसा ही हो गया है; अब मैं कैलास को जाता हूँ, तुम यहाँ पूर्वोक्त रूप में ही स्थित रहो।

श्लोक 106 (skanda.6.144.106)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवं स भगवान्प्रोक्त्वा गतश्चादर्शनं हरः ॥ योगिन्यश्चैव ताः सर्वाः स्वेस्वे स्थाने व्यवस्थिताः

sūta uvāca evaṁ sa bhagavānproktvā gataścādarśanaṁ haraḥ yoginyaścaiva tāḥ sarvāḥ svesve sthāne vyavasthitāḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार भगवान् हर ऐसा कहकर अंतर्धान हो गए, और वे सभी योगिनियाँ भी अपने-अपने स्थान पर स्थित हो गईं।

श्लोक 107 (skanda.6.144.107)

चित्रांगदोपि तत्रैव कृत्वा प्रासादमुत्तमम् ॥ लिंगं संस्थापयामास देवदेवस्य शूलिनः

citrāṁgadopi tatraiva kṛtvā prāsādamuttamam liṁgaṁ saṁsthāpayāmāsa devadevasya śūlinaḥ

चित्रांगद ने भी वहीं एक उत्तम मंदिर बनवाकर, देवाधिदेव शूलधारी शिव का लिंग स्थापित किया।

श्लोक 108 (skanda.6.144.108)

ततश्चाराधयामास दिवारात्रमतंद्रितः

tataścārādhayāmāsa divārātramataṁdritaḥ

तत्पश्चात् वह आलस्यरहित होकर दिन-रात उसकी आराधना करने लगा।

श्लोक 109 (skanda.6.144.109)

ततः संवत्सरस्यांते व्याधिमुक्तः सुरूपधृक् ॥ विमानवरमारूढो जगाम त्रिदशालयम् ॥ सोऽपि जाबालिनामाथ विवस्त्र समपद्यत

tataḥ saṁvatsarasyāṁte vyādhimuktaḥ surūpadhṛk vimānavaramārūḍho jagāma tridaśālayam so'pi jābālināmātha vivastra samapadyata

तत्पश्चात् एक वर्ष के अंत में, रोग से मुक्त होकर तथा सुंदर रूप धारण कर, वह श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर देवलोक चला गया। और वह जाबालि भी वस्त्रहीन ही बना रहा।

श्लोक 110 (skanda.6.144.110)

जनहास्यकरो लोके स्थितस्तत्रैव सर्वदा ॥ पश्यमानो विकारांस्तान्दुःखितः स्वसुतोद्भवान्

janahāsyakaro loke sthitastatraiva sarvadā paśyamāno vikārāṁstānduḥkhitaḥ svasutodbhavān

वह सदा वहीं लोगों के उपहास का पात्र बना रहा, अपनी ही पुत्री से उत्पन्न उन विकारों को देखता हुआ दुःखी रहता था।

श्लोक 111 (skanda.6.144.111)

ततश्च गर्हयामास स्त्रीणां जन्म महामुनिः ॥ तस्मिन्पीठे समासाद्य दुःखेन महताऽन्वितः

tataśca garhayāmāsa strīṇāṁ janma mahāmuniḥ tasminpīṭhe samāsādya duḥkhena mahatā'nvitaḥ

तत्पश्चात्, उस पीठ पर स्थित रहकर, महान दुःख से भरे हुए उस महामुनि ने स्त्रियों के जन्म की निंदा करना आरंभ किया।

श्लोक 112 (skanda.6.144.112)

अहो पापात्मनां पुंसां संभविष्यंति योषितः ॥ यासामीदृक्समाचारो द्विजवंशोद्भवास्वपि

aho pāpātmanāṁ puṁsāṁ saṁbhaviṣyaṁti yoṣitaḥ yāsāmīdṛksamācāro dvijavaṁśodbhavāsvapi

उन्होंने कहा — हाय! पापी पुरुषों के घर में ही ऐसी स्त्रियाँ उत्पन्न होंगी, जिनका आचरण ऐसा हो — वह भी ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न होकर!

श्लोक 113 (skanda.6.144.113)

सकृदेव मया संगः कृतो नार्या समन्वितः ॥ आजन्ममरणं यावत्पापं प्राप्तं यथेदृशम्

sakṛdeva mayā saṁgaḥ kṛto nāryā samanvitaḥ ājanmamaraṇaṁ yāvatpāpaṁ prāptaṁ yathedṛśam

मैंने तो केवल एक ही बार किसी स्त्री के साथ संग किया था, फिर भी जन्म से मृत्यु तक ऐसा पाप प्राप्त हुआ।

श्लोक 114 (skanda.6.144.114)

ये पुनस्तासु संसक्ताः सदैव पुरुषाधमाः ॥ का तेषां जायते लोके गतिर्वेद्मि न चिंतयन्

ye punastāsu saṁsaktāḥ sadaiva puruṣādhamāḥ kā teṣāṁ jāyate loke gatirvedmi na ciṁtayan

जो नीच पुरुष सदा ही उनमें आसक्त रहते हैं, उनकी क्या गति होती होगी — यह सोचकर भी मुझे ज्ञात नहीं होता।

श्लोक 115 (skanda.6.144.115)

एवं तस्य ब्रुवाणस्य योगिन्यस्ताः क्रुधान्विताः ॥ तमूचुर्ब्राह्मणं तत्र घृणया परिवारितम्

evaṁ tasya bruvāṇasya yoginyastāḥ krudhānvitāḥ tamūcurbrāhmaṇaṁ tatra ghṛṇayā parivāritam

उसके इस प्रकार कहने पर, वे योगिनियाँ क्रोध से भर गईं, और घृणा से घिरे उस ब्राह्मण से यह कहने लगीं।

श्लोक 116 (skanda.6.144.116)

॥ योगिन्य ऊचुः ॥ मा निंदां कुरु मूढात्मंस्त्वं स्त्रीणां योगमाश्रितः ॥ एतच्चराचरं विश्वं स्त्रीभिः संधार्यते यतः

yoginya ūcuḥ mā niṁdāṁ kuru mūḍhātmaṁstvaṁ strīṇāṁ yogamāśritaḥ etaccarācaraṁ viśvaṁ strībhiḥ saṁdhāryate yataḥ

योगिनियों ने कहा — हे मूढ़! स्त्रियों की निंदा मत करो, तुम स्वयं स्त्री के योग से ही उत्पन्न हुए हो; क्योंकि यह संपूर्ण चराचर विश्व स्त्रियों द्वारा ही धारण किया जाता है।

श्लोक 117 (skanda.6.144.117)

याभिः संजनितः शेषः कूर्मश्च तदनंतरम् ॥ याभ्यां संधार्यते पृथ्वी यस्यां विश्वं प्रतिष्ठितम्

yābhiḥ saṁjanitaḥ śeṣaḥ kūrmaśca tadanaṁtaram yābhyāṁ saṁdhāryate pṛthvī yasyāṁ viśvaṁ pratiṣṭhitam

जिनके द्वारा शेषनाग उत्पन्न हुए, और उसके पश्चात् कूर्म भी, और जिनके द्वारा यह पृथ्वी धारण की जाती है, जिस पर यह संपूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है।

श्लोक 118 (skanda.6.144.118)

धन्येयं ते सुता मूढ या प्राप्ता योगमुत्तमम् ॥ प्राप्ता च परमं स्थानं स्तोकैरेवात्र वासरैः

dhanyeyaṁ te sutā mūḍha yā prāptā yogamuttamam prāptā ca paramaṁ sthānaṁ stokairevātra vāsaraiḥ

हे मूढ़! धन्य है यह तुम्हारी पुत्री, जिसने उत्तम योग को प्राप्त किया है, और थोड़े ही दिनों में यहाँ परम स्थान को भी प्राप्त कर लिया है।

श्लोक 119 (skanda.6.144.119)

त्वं पुनर्मूर्खतां प्राप्तश्छांदसं मार्गमास्थितः ॥ अविद्यया समायुक्तः संसारेऽत्र भ्रमिष्यसि

tvaṁ punarmūrkhatāṁ prāptaśchāṁdasaṁ mārgamāsthitaḥ avidyayā samāyuktaḥ saṁsāre'tra bhramiṣyasi

तुम तो मूर्खता को प्राप्त होकर, केवल छांदस (कर्मकांड के) मार्ग में स्थित होकर, अविद्या से युक्त होकर इस संसार में ही भटकते रहोगे।

श्लोक 120 (skanda.6.144.120)

॥ मुनिरुवाच ॥ स्त्रियो निंद्यतमाः सर्वाः सर्वावस्थासु दुःखदाः ॥ इहलोके परे चैव ताभ्यः सौख्यं न लभ्यते

muniruvāca striyo niṁdyatamāḥ sarvāḥ sarvāvasthāsu duḥkhadāḥ ihaloke pare caiva tābhyaḥ saukhyaṁ na labhyate

मुनि ने कहा — स्त्रियाँ सभी अवस्थाओं में अत्यंत निंदनीय तथा दुःखदायी होती हैं; उनसे न तो इस लोक में, न परलोक में सुख प्राप्त होता है।

श्लोक 121 (skanda.6.144.121)

यदर्थं निहतः शुम्भो निशुम्भश्च महासुरः ॥ रावणो दण्डभूपश्च तथान्येऽपि सहस्रशः

yadarthaṁ nihataḥ śumbho niśumbhaśca mahāsuraḥ rāvaṇo daṇḍabhūpaśca tathānye'pi sahasraśaḥ

जिनके ही कारण शुंभ और निशुंभ जैसे महान् असुर मारे गए, रावण और दण्ड जैसे राजा, तथा अन्य हज़ारों नष्ट हुए।

श्लोक 122 (skanda.6.144.122)

प्राप्य तादृग्द्विजं कांतं गौतमं स्त्रीस्वभावतः ॥ अहिल्या शक्रमासाद्य चकमे शीलवर्जिता

prāpya tādṛgdvijaṁ kāṁtaṁ gautamaṁ strīsvabhāvataḥ ahilyā śakramāsādya cakame śīlavarjitā

गौतम जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मण पति को पाकर भी, स्त्री-स्वभाव के कारण, शीलरहित होकर अहिल्या ने इंद्र को पाकर उससे रमण किया।

श्लोक 123 (skanda.6.144.123)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ यच्च निंदसि मूढात्मन्संति निंद्याश्च योषितः ॥ तद्वदस्व मया सार्धं येन त्वां बोधयाम्यहम्

kanyovāca yacca niṁdasi mūḍhātmansaṁti niṁdyāśca yoṣitaḥ tadvadasva mayā sārdhaṁ yena tvāṁ bodhayāmyaham

कन्या ने कहा — हे मूढ़! तुम जो यह निंदा कर रहे हो कि कुछ स्त्रियाँ निंदनीय हैं, उसे मेरे साथ कह लो, जिससे मैं तुम्हें समझा सकूँ।

श्लोक 124 (skanda.6.144.124)

न तेऽस्ति हृदये बुद्धिर्न लज्जा न दया मुने ॥ किमंत्यजोऽपि तत्कर्म कुरुते यत्त्वया कृतम्

na te'sti hṛdaye buddhirna lajjā na dayā mune kimaṁtyajo'pi tatkarma kurute yattvayā kṛtam

हे मुने! तुम्हारे हृदय में न बुद्धि है, न लज्जा है, न दया है; जो कर्म तुमने किया, वह तो चांडाल भी नहीं करता।

श्लोक 125 (skanda.6.144.125)

अहं तावत्प्रहारेण त्वया व्यापादिताऽधम ॥ स्त्रीहत्योद्भवपापस्य न चिन्ता विधृता हृदि

ahaṁ tāvatprahāreṇa tvayā vyāpāditā'dhama strīhatyodbhavapāpasya na cintā vidhṛtā hṛdi

हे अधम! मुझे तो तुमने प्रहार से मार डाला, फिर भी स्त्री-हत्या से उत्पन्न होने वाले पाप की तुम्हारे हृदय में कोई चिंता नहीं है।

श्लोक 126 (skanda.6.144.126)

विशेषेण सुतायाश्च कोपाविष्टेन चेतसा ॥ गच्छंति पातकान्यत्र प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः

viśeṣeṇa sutāyāśca kopāviṣṭena cetasā gacchaṁti pātakānyatra prāyaścittaiḥ pṛthagvidhaiḥ

विशेष रूप से अपनी ही पुत्री को क्रोध से भरे चित्त से मारने पर — जिन पापों से अलग-अलग प्रायश्चित्तों द्वारा ही मुक्ति मिलती है।

श्लोक 127 (skanda.6.144.127)

स्त्रीवधोत्थं पुनर्याति यदि तत्त्वं प्रकीर्तय ॥ एतन्मे न च दुःखं स्याद्यद्धतास्मि द्विजाधम

strīvadhotthaṁ punaryāti yadi tattvaṁ prakīrtaya etanme na ca duḥkhaṁ syādyaddhatāsmi dvijādhama

यदि उससे स्त्री-वध से उत्पन्न पाप फिर भी दूर हो जाता है, तो वह तत्त्व मुझे बताओ; हे नीच द्विज! मुझे मारे जाने का इतना दुःख नहीं है, जितना इसका है।

श्लोक 128 (skanda.6.144.128)

यच्छप्ता नग्नसद्भावं नीता तत्पातकं च ते ॥ कल्पांतेऽपि सुदुर्बुद्धे न संयास्यति कुत्रचित्

yacchaptā nagnasadbhāvaṁ nītā tatpātakaṁ ca te kalpāṁte'pi sudurbuddhe na saṁyāsyati kutracit

तुमने मुझे शापित करके नग्न अवस्था को पहुँचा दिया — उससे जो पाप तुम्हें लगा है, हे दुर्बुद्धे! वह कल्प के अंत में भी कहीं दूर नहीं होगा।

श्लोक 129 (skanda.6.144.129)

तस्माद्भुंक्ष्व सुदुःखार्तः स्थितोऽत्रैव मया सह ॥ न भूयो निंदसि प्रायो न च व्यापादयिष्यसि

tasmādbhuṁkṣva suduḥkhārtaḥ sthito'traiva mayā saha na bhūyo niṁdasi prāyo na ca vyāpādayiṣyasi

अतः अत्यंत दुःख से पीड़ित होकर मेरे ही साथ यहीं रहते हुए इसे भोगो; अब न तो तुम पुनः इस प्रकार निंदा करोगे और न ही किसी का वध करोगे।

श्लोक 130 (skanda.6.144.130)

अनिंद्या योषितः सर्वा नैता दुष्यंति कर्हिचित् ॥ मासिमासि रजो ह्यासां दुष्कृतान्यपकर्षति

aniṁdyā yoṣitaḥ sarvā naitā duṣyaṁti karhicit māsimāsi rajo hyāsāṁ duṣkṛtānyapakarṣati

स्त्रियाँ सभी निंदा के अयोग्य हैं, वे कभी दूषित नहीं होतीं; क्योंकि प्रतिमास उनका रज उनके समस्त दुष्कृत्यों को दूर कर देता है।

श्लोक 131 (skanda.6.144.131)

॥ मुनि रुवाच ॥ ॥ स्त्रियः पापसमाचारा नैताः शुध्यंति कर्हिचित् ॥ परकांते रतिर्यासामंत्यजत्वं प्रयच्छति

muni ruvāca striyaḥ pāpasamācārā naitāḥ śudhyaṁti karhicit parakāṁte ratiryāsāmaṁtyajatvaṁ prayacchati

मुनि ने कहा — पापाचार करने वाली स्त्रियाँ कभी शुद्ध नहीं होतीं; जिनकी पराए पुरुष में रति होती है, वह उन्हें चांडालत्व ही प्रदान करती है।

श्लोक 132 (skanda.6.144.132)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ मा मैवं वद मूढात्मन्नमेध्या इति योषितः ॥ अत्र श्लोकः पुरा गीतो मनुना तं निबोध मे

kanyovāca mā maivaṁ vada mūḍhātmannamedhyā iti yoṣitaḥ atra ślokaḥ purā gīto manunā taṁ nibodha me

कन्या ने कहा — हे मूढ़! ऐसा मत कहो कि स्त्रियाँ अपवित्र हैं; इस विषय में पूर्वकाल में मनु द्वारा गाया गया एक श्लोक है, उसे मुझसे सुनो।

श्लोक 133 (skanda.6.144.133)

ब्राह्मणाः पादतो मेध्या गावो मेध्यास्तु पृष्ठतः ॥ अजाश्वा मुखतो मेध्या स्त्रियो मेध्याश्च सर्वतः

brāhmaṇāḥ pādato medhyā gāvo medhyāstu pṛṣṭhataḥ ajāśvā mukhato medhyā striyo medhyāśca sarvataḥ

ब्राह्मण पैर से पवित्र होते हैं, गौएँ पीछे से पवित्र होती हैं, बकरी और घोड़े मुख से पवित्र होते हैं, और स्त्रियाँ सर्वत्र ही पवित्र होती हैं।

श्लोक 134 (skanda.6.144.134)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ ब्राह्मणाः सर्वतो मेध्या गावो मेध्याश्च सर्वतः ॥ अजाश्वा मुखतो मेध्या न मेध्याश्च स्त्रियः क्वचित्

muniruvāca brāhmaṇāḥ sarvato medhyā gāvo medhyāśca sarvataḥ ajāśvā mukhato medhyā na medhyāśca striyaḥ kvacit

मुनि ने कहा — ब्राह्मण सर्वांग से पवित्र होते हैं, गौएँ भी सर्वांग से पवित्र होती हैं, बकरी और घोड़े मुख से पवित्र होते हैं, परंतु स्त्रियाँ कहीं से भी पवित्र नहीं होतीं।

श्लोक 135 (skanda.6.144.135)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ तस्य चिंतामणिर्हस्ते तस्य कल्पद्रुमो गृहे ॥ कुबेरः किंकरस्तस्य यस्य स्यात्कामिनी गृहे

kanyovāca tasya ciṁtāmaṇirhaste tasya kalpadrumo gṛhe kuberaḥ kiṁkarastasya yasya syātkāminī gṛhe

कन्या ने कहा — जिसके घर में प्रिय पत्नी होती है, उसके हाथ में मानो चिंतामणि है, उसके घर में मानो कल्पवृक्ष है, और कुबेर भी मानो उसका सेवक है।

श्लोक 136 (skanda.6.144.136)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ तस्यापदोऽखिला दुःखं दुःखं तस्याखिलं गृहे ॥ नरकः सर्वतस्तस्य यस्य स्यात्कामिनीगृहे

muniruvāca tasyāpado'khilā duḥkhaṁ duḥkhaṁ tasyākhilaṁ gṛhe narakaḥ sarvatastasya yasya syātkāminīgṛhe

मुनि ने कहा — जिसके घर में स्त्री होती है, उसके लिए संपूर्ण आपत्तियाँ, संपूर्ण दुःख उसके घर में ही हैं, और उसके लिए सब कुछ नरक ही है।

श्लोक 137 (skanda.6.144.137)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ यानि कान्यत्र सौख्यानि भोगस्थानानि यानि च ॥ धर्मार्थकामजातानि तानि स्त्रीभ्यो भवंति हि

kanyovāca yāni kānyatra saukhyāni bhogasthānāni yāni ca dharmārthakāmajātāni tāni strībhyo bhavaṁti hi

कन्या ने कहा — इस संसार में जितने भी सुख हैं, जितने भी भोग-स्थान हैं, और धर्म, अर्थ, काम से उत्पन्न होने वाली सभी वस्तुएँ, वे सब स्त्रियों से ही प्राप्त होती हैं।

श्लोक 138 (skanda.6.144.138)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ यानि कानि सुदुःखानि क्लेशानि यानि देहिनाम् ॥ यानि कष्टान्यनिष्टानि स्त्रीभ्यस्तानि भवंति च

muniruvāca yāni kāni suduḥkhāni kleśāni yāni dehinām yāni kaṣṭānyaniṣṭāni strībhyastāni bhavaṁti ca

मुनि ने कहा — प्राणियों के जितने भी दुःख हैं, जितने भी क्लेश हैं, और जितने भी अनिष्ट कष्ट हैं, वे सब स्त्रियों से ही उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 139 (skanda.6.144.139)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ धर्मार्थकाममोक्षान्स्त्री चतुरोऽपि चतसृभिः ॥ वह्निप्रदक्षिणाभिस्तान्विवाहेऽपि प्रदर्शयेत्

kanyovāca dharmārthakāmamokṣānstrī caturo'pi catasṛbhiḥ vahnipradakṣiṇābhistānvivāhe'pi pradarśayet

कन्या ने कहा — विवाह के समय ही, स्त्री अग्नि की चार परिक्रमाओं के द्वारा, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों को दिखा देती है।

श्लोक 140 (skanda.6.144.140)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ संसारभ्रमणं नारी प्रथमेऽपि समागमे ॥ वह्निप्रदक्षिणान्यायव्याजेनैव प्रदर्शयेत्

muniruvāca saṁsārabhramaṇaṁ nārī prathame'pi samāgame vahnipradakṣiṇānyāyavyājenaiva pradarśayet

मुनि ने कहा — विवाह के प्रथम मिलन में ही, स्त्री अग्नि-प्रदक्षिणा के बहाने संसार-भ्रमण (जन्म-मरण के चक्र) को ही दिखा देती है।

श्लोक 141 (skanda.6.144.141)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ के नाम न विरज्यंति ज्ञानाढ्या अपि मानवाः ॥ कर्णांतलग्ननेत्रांतां दृष्ट्वा पीन पयोधराम्

kanyovāca ke nāma na virajyaṁti jñānāḍhyā api mānavāḥ karṇāṁtalagnanetrāṁtāṁ dṛṣṭvā pīna payodharām

कन्या ने कहा — ज्ञान-संपन्न मनुष्य भी, कर्ण तक फैले नेत्रों वाली तथा पुष्ट स्तनों वाली स्त्री को देखकर, किसका मन आसक्त नहीं हो जाता?

श्लोक 142 (skanda.6.144.142)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ के नाम न विनश्यंति मूढज्ञाना नितंबिनीम् ॥ रम्यबुद्ध्योपसर्पंति ये ज्वालाः शलभा इव

muniruvāca ke nāma na vinaśyaṁti mūḍhajñānā nitaṁbinīm ramyabuddhyopasarpaṁti ye jvālāḥ śalabhā iva

मुनि ने कहा — मूढ़-ज्ञान वाले जो पुरुष रमणीयता की बुद्धि से स्त्री के पास पतंगे की भाँति ज्वाला की ओर जाते हैं, वे किसका नाश नहीं करते?

श्लोक 143 (skanda.6.144.143)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ निर्मुखौ च कठोरौ च प्रोद्धतौ च मनोरमौ ॥ स्त्रीस्तनौ सेवते धन्यो मधुमांसे विशेषतः

kanyovāca nirmukhau ca kaṭhorau ca proddhatau ca manoramau strīstanau sevate dhanyo madhumāṁse viśeṣataḥ

कन्या ने कहा — मुखरहित, कठोर, उन्नत तथा मनोहर स्त्री के दोनों स्तनों का, मानो मधु और मांस के समान, सेवन करने वाला पुरुष धन्य है।

श्लोक 144 (skanda.6.144.144)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ आभोगिनौ मंडलिनौ तत्क्षणान्मुक्तकंचुकौ॥ वरमाशीविषौ स्पृष्टौ न तु पत्न्याः पयोधरौ

muniruvāca ābhoginau maṁḍalinau tatkṣaṇānmuktakaṁcukau varamāśīviṣau spṛṣṭau na tu patnyāḥ payodharau

मुनि ने कहा — फुँकारते हुए, कुंडली मारे हुए, तत्क्षण अपनी केंचुली उतारते हुए दो विषधर सर्पों का स्पर्श करना अच्छा है, परंतु पत्नी के दोनों स्तनों को नहीं।

श्लोक 145 (skanda.6.144.145)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ न चासां रचनामात्रं केवलं रम्यमंगिभिः । परिष्वंगोऽपि रामाणां सौख्याय पुलकाय च

kanyovāca na cāsāṁ racanāmātraṁ kevalaṁ ramyamaṁgibhiḥ pariṣvaṁgo'pi rāmāṇāṁ saukhyāya pulakāya ca

कन्या ने कहा — स्त्रियों की केवल रचना (शरीर-रूप) ही देहधारियों के लिए रमणीय नहीं है, बल्कि उन सुंदरियों का आलिंगन भी सुख और रोमांच के लिए होता है।

श्लोक 146 (skanda.6.144.146)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ न चासां रचनामात्रं रम्यं स्यात्पापदं दृशः ॥ वपुः स्पृष्टं विनाशाय स्त्रीणां प्रेत्य नरकाय च

muniruvāca na cāsāṁ racanāmātraṁ ramyaṁ syātpāpadaṁ dṛśaḥ vapuḥ spṛṣṭaṁ vināśāya strīṇāṁ pretya narakāya ca

मुनि ने कहा — स्त्रियों की केवल रचना ही रमणीय नहीं होती, वह दृष्टि के लिए पापदायी भी है; उनका स्पर्श किया गया शरीर विनाश के लिए तथा मृत्यु के पश्चात् नरक के लिए ही है।

श्लोक 147 (skanda.6.144.147)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ को नाम न सुखी लोके को नाम सुकृती न च ॥ स्पृहणीयतमः को न स्त्रीजनो यस्य रज्यते

kanyovāca ko nāma na sukhī loke ko nāma sukṛtī na ca spṛhaṇīyatamaḥ ko na strījano yasya rajyate

कन्या ने कहा — इस लोक में वह कौन नहीं है जो सुखी है, वह कौन नहीं है जो पुण्यात्मा है, वह कौन नहीं है जो अत्यंत वांछनीय है, जिससे स्त्री-जन अनुरक्त होता है?

श्लोक 148 (skanda.6.144.148)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ को न मुक्तिं व्रजेत्तत्र को न शस्यतरो भवेत् ॥ को न स्यात्क्षेमसंयुक्तः स्त्रीजने यो न रज्यते

muniruvāca ko na muktiṁ vrajettatra ko na śasyataro bhavet ko na syātkṣemasaṁyuktaḥ strījane yo na rajyate

मुनि ने कहा — वह कौन नहीं है जो मुक्ति को प्राप्त होता है, वह कौन नहीं है जो सर्वश्रेष्ठ होता है, वह कौन नहीं है जो कल्याण से युक्त होता है, जो स्त्री-जन में अनुरक्त नहीं होता?

श्लोक 149 (skanda.6.144.149)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ संसारांतः प्रसुप्तस्य कीटस्यापि प्ररोचते ॥ स्त्रीशरीरं नरस्यात्र किं पुनर्न विवेकिनः

kanyovāca saṁsārāṁtaḥ prasuptasya kīṭasyāpi prarocate strīśarīraṁ narasyātra kiṁ punarna vivekinaḥ

कन्या ने कहा — संसार में सोए हुए कीट को भी स्त्री-शरीर रुचिकर लगता है, तो फिर विवेकी मनुष्य को क्यों नहीं?

श्लोक 150 (skanda.6.144.150)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ अमेध्यजा तस्य यथा तथा तद्रोचनं कृमेः ॥ तथा संसारसूतस्य स्त्रीशरीरं च कामिनः

muniruvāca amedhyajā tasya yathā tathā tadrocanaṁ kṛmeḥ tathā saṁsārasūtasya strīśarīraṁ ca kāminaḥ

मुनि ने कहा — जैसे अपवित्र वस्तु में उत्पन्न कीड़े को उसी में रुचि होती है, वैसे ही संसार-रूपी सूत से उत्पन्न कामी पुरुष को स्त्री-शरीर में रुचि होती है।

श्लोक 151 (skanda.6.144.151)

॥ कन्योवाच ॥ ॥ सौख्यस्थानं नृणां किंचिद्वेधसा ऽन्यदपश्यता ॥ शाश्वतं चिंतयित्वाथ स्त्रीरत्नमिदमाहृतम्

kanyovāca saukhyasthānaṁ nṛṇāṁ kiṁcidvedhasā 'nyadapaśyatā śāśvataṁ ciṁtayitvātha strīratnamidamāhṛtam

कन्या ने कहा — विधाता ने, मनुष्यों के लिए शाश्वत सुख का कोई अन्य स्थान न देखकर, विचार करके यह स्त्री-रत्न ही रचा है।

श्लोक 152 (skanda.6.144.152)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ बंधनं जगतः किंचिद्वेधसाऽन्यदपश्यता ॥ स्त्रीरूपेण ततः कोपि पाशोऽयं स्त्रीमयः कृतः

muniruvāca baṁdhanaṁ jagataḥ kiṁcidvedhasā'nyadapaśyatā strīrūpeṇa tataḥ kopi pāśo'yaṁ strīmayaḥ kṛtaḥ

मुनि ने कहा — विधाता ने, संसार को बांधने के लिए कोई अन्य साधन न देखकर, स्त्री के रूप में यह स्त्रीमय पाश (फंदा) ही रच दिया है।

श्लोक 153 (skanda.6.144.153)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवं स मुनिशार्दूलस्तयातीव समागमे ॥ निरुत्तरीकृतो यावत्ततः प्राह निजां सुताम्

sūta uvāca evaṁ sa muniśārdūlastayātīva samāgame niruttarīkṛto yāvattataḥ prāha nijāṁ sutām

सूत जी ने कहा — इस प्रकार जब वह श्रेष्ठ मुनि इस भारी वाद-विवाद में उसके द्वारा निरुत्तर कर दिया गया, तब उन्होंने अपनी पुत्री से यह कहा।

श्लोक 154 (skanda.6.144.154)

॥ मुनिरुवाच ॥ ॥ त्वया सह न संवादो मया कार्योऽधुना क्वचित् ॥ या त्वं बालापि मामेवं निषेधयसि सर्वतः

muniruvāca tvayā saha na saṁvādo mayā kāryo'dhunā kvacit yā tvaṁ bālāpi māmevaṁ niṣedhayasi sarvataḥ

मुनि ने कहा — अब मुझे तुमसे और कोई वाद-विवाद नहीं करना है, क्योंकि तुम, इतनी छोटी होकर भी, मुझे इस प्रकार सब ओर से निरुत्तर कर रही हो।

श्लोक 155 (skanda.6.144.155)

तस्माद्धन्यतरं मन्ये अहमात्मानमद्य वै ॥ यस्य मे त्वं सुता ईदृगीदृक्छास्त्रविचक्षणा

tasmāddhanyataraṁ manye ahamātmānamadya vai yasya me tvaṁ sutā īdṛgīdṛkchāstravicakṣaṇā

इसलिए मैं आज स्वयं को अत्यंत धन्य मानता हूँ, कि मेरी ऐसी शास्त्र-निपुण पुत्री है।

श्लोक 156 (skanda.6.144.156)

तस्मान्न मे महाभागे कोपः स्वल्पोऽपि विद्यते ॥ तस्माद्यथेच्छया क्रीडां कुरु योगिनिमध्यगा

tasmānna me mahābhāge kopaḥ svalpo'pi vidyate tasmādyathecchayā krīḍāṁ kuru yoginimadhyagā

अतः हे महाभागे! मुझे तुम पर तनिक भी क्रोध नहीं है; इसलिए योगिनियों के मध्य में रहकर अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करो।

श्लोक 157 (skanda.6.144.157)

ततः सा लज्जिता दृष्ट्वा पितरं स्नेहवत्सलम् । प्रणिपत्य पुनःप्राह योगिनीमध्यसंस्थिता

tataḥ sā lajjitā dṛṣṭvā pitaraṁ snehavatsalam praṇipatya punaḥprāha yoginīmadhyasaṁsthitā

तब अपने स्नेहवत्सल पिता को देखकर वह लज्जित हो गई, और योगिनियों के मध्य में स्थित होकर, प्रणाम करके पुनः बोली।

श्लोक 158 (skanda.6.144.158)

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानात्त्वं निषिद्धो मया प्रभो ॥ क्षंतव्यं सकलं मेऽद्य वालिकाया विशेषतः

ajñānādyadi vā jñānāttvaṁ niṣiddho mayā prabho kṣaṁtavyaṁ sakalaṁ me'dya vālikāyā viśeṣataḥ

हे प्रभो! अज्ञान से हो या ज्ञान से, यदि मैंने आपका निषेध किया हो, तो मुझ बालिका का यह सब आज क्षमा कर दीजिए।

श्लोक 159 (skanda.6.144.159)

अत्र पीठे समागत्य प्रथमं ते द्विजोत्तमाः ॥ पूजां सर्वे करिष्यंति मानवा भक्तितत्पराः ॥ पश्चाच्च सर्वपीठस्य यास्यंति च परां गतिम्

atra pīṭhe samāgatya prathamaṁ te dvijottamāḥ pūjāṁ sarve kariṣyaṁti mānavā bhaktitatparāḥ paścācca sarvapīṭhasya yāsyaṁti ca parāṁ gatim

हे श्रेष्ठ द्विजो! इस पीठ में आकर सर्वप्रथम भक्तिपूर्ण मनुष्य मेरी पूजा करेंगे, और तत्पश्चात् संपूर्ण पीठ की पूजा करके परम गति को प्राप्त होंगे।

श्लोक 160 (skanda.6.144.160)

एवं सा तत्र संजाता जाबालिमुनिसंभवा ॥ जाबालिश्च मुनिश्रेष्ठस्तथा चित्रांगदेश्वरः

evaṁ sā tatra saṁjātā jābālimunisaṁbhavā jābāliśca muniśreṣṭhastathā citrāṁgadeśvaraḥ

इस प्रकार वह जाबालि मुनि से उत्पन्न कन्या वहाँ योगिनी के रूप में प्रकट हुई; और मुनिश्रेष्ठ जाबालि तथा चित्रांगदेश्वर भी वहीं रहे।

श्लोक 161 (skanda.6.144.161)

त्रयाणामपि यस्तेषां पूजां मर्त्यः समाचरेत्॥ दिवसेदिवसे तत्र स सिद्धिं समवाप्नुयात्

trayāṇāmapi yasteṣāṁ pūjāṁ martyaḥ samācaret divasedivase tatra sa siddhiṁ samavāpnuyāt

जो मनुष्य इन तीनों में से किसी की भी पूजा करता है, वह प्रतिदिन वहाँ सिद्धि को प्राप्त करता है।

श्लोक 162 (skanda.6.144.162)

नासाध्यं विद्यते किंचित्तावदत्र धरातले ॥ पूज्यते भूमिपालाद्यैर्भोगान्दिव्यांस्तथा लभेत्

nāsādhyaṁ vidyate kiṁcittāvadatra dharātale pūjyate bhūmipālādyairbhogāndivyāṁstathā labhet

इस पृथ्वीतल पर उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता; वह राजाओं आदि द्वारा पूजित होता है और दिव्य भोगों को भी प्राप्त करता है।

श्लोक 163 (skanda.6.144.163)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स मुनिः सा च कन्यका ॥ पूजनीया विशेषेण स देवोऽथ महेश्वरः

tasmātsarvaprayatnena sa muniḥ sā ca kanyakā pūjanīyā viśeṣeṇa sa devo'tha maheśvaraḥ

अतः पूरे प्रयत्न से उन मुनि की, उस कन्या की, और विशेष रूप से उन देव महेश्वर की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 164 (skanda.6.144.164)

एतद्वः सर्वमाख्यातमाख्यानं सर्वकामदम् ॥ पठतां शृण्वतां चैव इहलोके परत्र च

etadvaḥ sarvamākhyātamākhyānaṁ sarvakāmadam paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ caiva ihaloke paratra ca

यह संपूर्ण आख्यान, जो सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है, तुम्हें कह दिया गया है — पढ़ने और सुनने वालों के लिए, इस लोक में और परलोक में भी यह कल्याणकारी है।

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