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नागर खण्ड · अध्याय 145

अमरेश्वर माहात्म्य

अध्याय 144अध्याय-सूचीअध्याय 146

श्लोक 1 (skanda.6.145.1)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ यत्त्वया कथितं सूत न मृता सा कुमारिका ॥ हता रौद्रप्रहारैश्च कौतुकं तन्महत्तरम्

ṛṣaya ūcuḥ yattvayā kathitaṁ sūta na mṛtā sā kumārikā hatā raudraprahāraiśca kautukaṁ tanmahattaram

ऋषियों ने कहा — हे सूत! तुमने जो कहा कि वह कुमारी, भयंकर प्रहारों से मारी जाकर भी नहीं मरी, यह तो अत्यंत आश्चर्यजनक है।

श्लोक 2 (skanda.6.145.2)

यतो भूयः प्रसंजाता योगिनी हरतुष्टिदा ॥ यत्त्वार्थं सर्वमाचक्ष्व कारणं च तदद्भुतम्

yato bhūyaḥ prasaṁjātā yoginī haratuṣṭidā yattvārthaṁ sarvamācakṣva kāraṇaṁ ca tadadbhutam

क्योंकि वह पुनः शिव को प्रसन्न करने वाली योगिनी बन गई; उस अद्भुत कारण को हमें विस्तार से बताओ।

श्लोक 3 (skanda.6.145.3)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ सा प्रविष्टा समं तेन सुपुण्यममरेश्वरम् ॥ माघकृष्णचतुर्दश्यां न मृत्युर्यत्र विद्यते

sūta uvāca sā praviṣṭā samaṁ tena supuṇyamamareśvaram māghakṛṣṇacaturdaśyāṁ na mṛtyuryatra vidyate

सूत जी ने कहा — वह उसके साथ उस अत्यंत पुण्यमय अमरेश्वर क्षेत्र में प्रविष्ट हुई थी, जहाँ माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मृत्यु का अस्तित्व ही नहीं रहता।

श्लोक 4 (skanda.6.145.4)

अपि चैवायुषः शेषे किमुताकालतो द्विजाः॥ तेन नो निधनं प्राप्ता हतापि सुदृढं तदा

api caivāyuṣaḥ śeṣe kimutākālato dvijāḥ tena no nidhanaṁ prāptā hatāpi sudṛḍhaṁ tadā

हे द्विजो! जब आयु शेष होने पर भी वहाँ मृत्यु नहीं होती, तो असमय मृत्यु की तो बात ही क्या? इसी कारण, अत्यंत दृढ़ता से मारी जाने पर भी वह उस समय मृत्यु को प्राप्त नहीं हुई।

श्लोक 5 (skanda.6.145.5)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ अमरेश्वर इत्युक्तो यो देवो ह्यमरत्वदः ॥ केन संस्थापितो ह्यत्र किंप्रभावश्च कीर्तय

ṛṣaya ūcuḥ amareśvara ityukto yo devo hyamaratvadaḥ kena saṁsthāpito hyatra kiṁprabhāvaśca kīrtaya

ऋषियों ने कहा — जो देव अमरेश्वर कहलाते हैं और अमरत्व देने वाले हैं, वे यहाँ किसके द्वारा स्थापित किए गए, और उनका क्या प्रभाव है, यह बताओ।

श्लोक 6 (skanda.6.145.6)

॥सूत उवाच ॥ ॥ अदितिश्च दितिश्चैव प्रजापतिसुते शुभे॥ कृते पुरातिरूपाढ्ये कश्यपेन महात्मना

sūta uvāca aditiśca ditiścaiva prajāpatisute śubhe kṛte purātirūpāḍhye kaśyapena mahātmanā

सूत जी ने कहा — कृत युग में, महात्मा कश्यप द्वारा, प्रजापति की दो शुभ, अत्यंत रूपवती पुत्रियाँ, अदिति और दिति, विवाहित की गई थीं।

श्लोक 7 (skanda.6.145.7)

अदित्यां विबुधा जाता दितेश्चैव तु दैत्यपाः॥। तेषां सापत्न्यभावेन महद्वैरमुपस्थितम्॥ अथ दैत्यैः सुरा ध्वस्ताः कृताश्चान्ये पराङ्मुखाः ॥ अन्ये तु भयसंत्रस्ता दिशो जग्मुः क्षतांगकाः

adityāṁ vibudhā jātā diteścaiva tu daityapāḥ teṣāṁ sāpatnyabhāvena mahadvairamupasthitam atha daityaiḥ surā dhvastāḥ kṛtāścānye parāṅmukhāḥ anye tu bhayasaṁtrastā diśo jagmuḥ kṣatāṁgakāḥ

अदिति से देवता उत्पन्न हुए, और दिति से दैत्यों के स्वामी उत्पन्न हुए; उन दोनों के सौत-भाव के कारण उनमें महान् वैर उत्पन्न हो गया। तब दैत्यों द्वारा देवता ध्वस्त कर दिए गए, कुछ को विमुख कर दिया गया, और अन्य भयभीत होकर घायल अंगों के साथ दिशा-दिशा में भाग गए।

श्लोक 8 (skanda.6.145.8)

ततो दुःखसमायुक्ता देवमातात्र संस्थिता ॥ तपश्चक्रे दिवानक्तं शिवध्यानपरायणा

tato duḥkhasamāyuktā devamātātra saṁsthitā tapaścakre divānaktaṁ śivadhyānaparāyaṇā

तब दुःख से भरी देवमाता अदिति यहाँ आकर स्थित हुई, और दिन-रात शिव-ध्यान में तत्पर होकर तप करने लगी।

श्लोक 9 (skanda.6.145.9)

एवं तस्यास्तपःस्थाया गते युगचतुष्टये ॥ निर्भिद्य धरणीपृष्ठं शिवलिंगं समुत्थितम्

evaṁ tasyāstapaḥsthāyā gate yugacatuṣṭaye nirbhidya dharaṇīpṛṣṭhaṁ śivaliṁgaṁ samutthitam

इस प्रकार उसके तप में स्थित रहते हुए चार युग बीत गए, तब पृथ्वी की सतह को भेदकर एक शिवलिंग उत्पन्न हुआ।

श्लोक 10 (skanda.6.145.10)

ततस्तस्मै कृतानन्दा स्तुत्वा स्तोत्रैः पृथग्विधैः ॥ अष्टांगप्रणिपातेन नमश्चक्रे समाहिता

tatastasmai kṛtānandā stutvā stotraiḥ pṛthagvidhaiḥ aṣṭāṁgapraṇipātena namaścakre samāhitā

तत्पश्चात् अत्यंत आनंदित होकर, उसने विभिन्न स्तोत्रों से उसकी स्तुति की, और एकाग्रचित्त होकर अष्टांग प्रणाम के साथ उसे नमस्कार किया।

श्लोक 11 (skanda.6.145.11)

एतस्मिन्नंतरे वाणी संजाता गगनांगणे ॥ शरीररहिता दिव्या मेघगम्भीरनिःस्वना

etasminnaṁtare vāṇī saṁjātā gaganāṁgaṇe śarīrarahitā divyā meghagambhīraniḥsvanā

इसी बीच आकाश-प्रांगण में एक दिव्य, शरीररहित वाणी उत्पन्न हुई, जिसकी ध्वनि मेघ के समान गंभीर थी।

श्लोक 12 (skanda.6.145.12)

वरं प्रार्थय कल्याणि यस्ते हृदि व्यवस्थितः ॥ प्रसन्नोऽहं प्रदास्यामि तवाद्य शशिशेखरः

varaṁ prārthaya kalyāṇi yaste hṛdi vyavasthitaḥ prasanno'haṁ pradāsyāmi tavādya śaśiśekharaḥ

वाणी ने कहा — हे कल्याणी! जो कुछ भी तुम्हारे हृदय में स्थित है, वह वर माँगो; मैं शशिशेखर आज तुमसे प्रसन्न होकर वह प्रदान करूँगा।

श्लोक 13 (skanda.6.145.13)

॥ अदितिरुवाच ॥ ॥ मम पुत्राः सुरश्रेष्ठ हन्यन्ते युधि दानवैः॥ तत्कुरुष्व गतायासानवध्यान्रणमूर्धनि

aditiruvāca mama putrāḥ suraśreṣṭha hanyante yudhi dānavaiḥ tatkuruṣva gatāyāsānavadhyānraṇamūrdhani

अदिति ने कहा — हे देवश्रेष्ठ! मेरे पुत्र युद्ध में दानवों द्वारा मारे जा रहे हैं; अतः ऐसा कीजिए कि वे युद्ध के मोर्चे पर अवध्य हो जाएँ और उनकी थकान भी दूर हो जाए।

श्लोक 14 (skanda.6.145.14)

॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ एतल्लिंगं मदीयं ये स्पृष्ट्वा यास्यंति संयुगे ॥ अवध्यास्ते भविष्यन्ति यावत्संवत्सरं शुभे

śrībhagavānuvāca etalliṁgaṁ madīyaṁ ye spṛṣṭvā yāsyaṁti saṁyuge avadhyāste bhaviṣyanti yāvatsaṁvatsaraṁ śubhe

भगवान् ने कहा — हे शुभे! जो कोई इस मेरे लिंग को स्पर्श करके युद्ध में जाएँगे, वे एक वर्ष तक अवध्य रहेंगे।

श्लोक 15 (skanda.6.145.15)

अन्योऽपि मानवो योऽत्र चतुर्दश्यां समाहितः ॥ माघमासस्य कृष्णायां प्रकरिष्यति जागरम्

anyo'pi mānavo yo'tra caturdaśyāṁ samāhitaḥ māghamāsasya kṛṣṇāyāṁ prakariṣyati jāgaram

और भी जो कोई मनुष्य माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को यहाँ एकाग्रचित्त होकर जागरण करेगा,

श्लोक 16 (skanda.6.145.16)

सोऽपि संवत्सरं यावद्भविष्यति निरामयः ॥ अपि मृत्युदिने प्राप्ते योऽस्मिन्नायतने शुभे

so'pi saṁvatsaraṁ yāvadbhaviṣyati nirāmayaḥ api mṛtyudine prāpte yo'sminnāyatane śubhe

वह भी एक वर्ष तक रोगरहित रहेगा; यहाँ तक कि जिसकी मृत्यु का दिन आ चुका हो, फिर भी जो इस शुभ आयतन में —

श्लोक 17 (skanda.6.145.17)

आगमिष्यति तं मृत्युर्दूरात्परिहरिष्यति ॥ एवमुक्त्वाथ सा वाणी विरराम ततः परम्

āgamiṣyati taṁ mṛtyurdūrātparihariṣyati evamuktvātha sā vāṇī virarāma tataḥ param

यहाँ आ जाएगा, उससे मृत्यु दूर से ही टल जाएगी। ऐसा कहकर वह वाणी तत्पश्चात् शांत हो गई।

श्लोक 18 (skanda.6.145.18)

अदितिश्चापि सन्तुष्टा हतशेषान्सुतांस्ततः ॥ समानीयाथ तल्लिंगं तेषामेव न्यदर्शयत् ॥ कथयामास तत्सर्वं माहात्म्यं यद्वरोदितम्

aditiścāpi santuṣṭā hataśeṣānsutāṁstataḥ samānīyātha talliṁgaṁ teṣāmeva nyadarśayat kathayāmāsa tatsarvaṁ māhātmyaṁ yadvaroditam

संतुष्ट होकर अदिति ने तत्पश्चात् अपने युद्ध में बचे हुए पुत्रों को बुलाकर, उन्हें वह लिंग दिखाया, और वर में जो कुछ भी माहात्म्य कहा गया था, वह सब उन्हें बताया।

श्लोक 19 (skanda.6.145.19)

ततस्ते विबुधाः सर्वे तल्लिंगं प्रणिपत्य च ॥ प्रतिजग्मुस्तुष्टियुक्ताः शस्त्राण्यादाय तान्प्रति

tataste vibudhāḥ sarve talliṁgaṁ praṇipatya ca pratijagmustuṣṭiyuktāḥ śastrāṇyādāya tānprati

तत्पश्चात् वे सभी देवता उस लिंग को प्रणाम करके, प्रसन्नतापूर्वक शस्त्र उठाकर उन दानवों के विरुद्ध लौट पड़े।

श्लोक 20 (skanda.6.145.20)

यत्र ते दानवा हृष्टाः स्थिताः शक्रपदे शुभे ॥ स्वर्गभोगसमायुक्ता नन्दनांतर्व्यवस्थिताः

yatra te dānavā hṛṣṭāḥ sthitāḥ śakrapade śubhe svargabhogasamāyuktā nandanāṁtarvyavasthitāḥ

जहाँ वे दानव प्रसन्न होकर इंद्र के शुभ पद पर स्थित थे, स्वर्ग के भोगों से युक्त होकर नंदन वन के भीतर बैठे हुए थे।

श्लोक 21 (skanda.6.145.21)

अथ ते दानवा दृष्ट्वा संप्राप्तांस्त्रिदिवौकसः ॥ सहसा संगरार्थाय नानाशस्त्रधरान्बहून्

atha te dānavā dṛṣṭvā saṁprāptāṁstridivaukasaḥ sahasā saṁgarārthāya nānāśastradharānbahūn

तब उन दानवों ने, स्वर्गवासी देवताओं को अचानक युद्ध के लिए, नाना प्रकार के शस्त्रों को धारण किए हुए बहुसंख्यक रूप में आया हुआ देखकर,

श्लोक 22 (skanda.6.145.22)

रथवर्यान्समारुह्य धृतशस्त्रास्त्रवर्मणः ॥ युद्धार्थं सम्मुखा जग्मुर्गर्जमाना घना इव

rathavaryānsamāruhya dhṛtaśastrāstravarmaṇaḥ yuddhārthaṁ sammukhā jagmurgarjamānā ghanā iva

श्रेष्ठ रथों पर आरूढ़ होकर, शस्त्र-अस्त्र और कवच धारण किए हुए, बादलों की भाँति गरजते हुए युद्ध के लिए सम्मुख आ गए।

श्लोक 23 (skanda.6.145.23)

ततः समभवद्युद्धं देवानां दानवैः सह ॥ रोषप्रेरितचित्तानां मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्

tataḥ samabhavadyuddhaṁ devānāṁ dānavaiḥ saha roṣapreritacittānāṁ mṛtyuṁ kṛtvā nivartanam

तत्पश्चात् देवताओं और दानवों के बीच युद्ध हुआ; क्रोध से प्रेरित चित्त वालों का तो मृत्यु ही निवृत्ति थी।

श्लोक 24 (skanda.6.145.24)

ततस्ते विबुधाः सर्वे हरलब्धवरास्तदा ॥ जघ्नुर्दैत्यानसंख्याताच्छितैः शस्त्रैरनेकधा

tataste vibudhāḥ sarve haralabdhavarāstadā jaghnurdaityānasaṁkhyātācchitaiḥ śastrairanekadhā

तब वे सभी देवता, जिन्होंने शिव से वर प्राप्त किया था, तीक्ष्ण शस्त्रों से अनगिनत दैत्यों को अनेक प्रकार से मार गिराने लगे।

श्लोक 25 (skanda.6.145.25)

हतशेषाश्च ये तेषां ते त्यक्त्वा त्रिदशालयम् ॥ पलायनकृतोत्साहाः प्रविष्टा मकरालयम्

hataśeṣāśca ye teṣāṁ te tyaktvā tridaśālayam palāyanakṛtotsāhāḥ praviṣṭā makarālayam

उनमें से जो मारे जाने से बचे रहे, वे स्वर्गलोक को त्यागकर, भागने के लिए उद्यत होकर समुद्र में जा घुसे।

श्लोक 26 (skanda.6.145.26)

ततः शक्रः समापेदे स्वराज्यं दानवैर्हृतम् ॥ यदासीत्पूर्वकाले तत्समग्रं हतकण्टकम्

tataḥ śakraḥ samāpede svarājyaṁ dānavairhṛtam yadāsītpūrvakāle tatsamagraṁ hatakaṇṭakam

तत्पश्चात् इंद्र ने अपना वह राज्य, जो दानवों द्वारा छीन लिया गया था, पूर्वकाल जैसा ही, समस्त कंटकों से मुक्त होकर पुनः प्राप्त कर लिया।

श्लोक 27 (skanda.6.145.27)

ततस्ते दानवाः शेषा ज्ञात्वा तल्लिंगसंभवम् ॥ माहात्म्यं वृषनाथस्य क्षेत्रस्यास्योद्भवस्य च

tataste dānavāḥ śeṣā jñātvā talliṁgasaṁbhavam māhātmyaṁ vṛṣanāthasya kṣetrasyāsyodbhavasya ca

तत्पश्चात् वे शेष बचे हुए दानव, वृषभनाथ के उस लिंग की उत्पत्ति और उस क्षेत्र के प्रादुर्भाव के माहात्म्य को जानकर —

श्लोक 28 (skanda.6.145.28)

शुक्रेण कथितं सर्वं माघकृष्णे निशागमे ॥ चतुर्दश्यां शुचिर्भूत्वा यस्तल्लिंगं प्रपूजयेत् ॥ कालाघ्रातोऽपि न प्राणैः स पुमांस्त्यज्यते क्वचित्

śukreṇa kathitaṁ sarvaṁ māghakṛṣṇe niśāgame caturdaśyāṁ śucirbhūtvā yastalliṁgaṁ prapūjayet kālāghrāto'pi na prāṇaiḥ sa pumāṁstyajyate kvacit

जो सब कुछ शुक्राचार्य ने उन्हें बताया — कि माघ कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में जो पुरुष शुद्ध होकर उस लिंग की पूजा करता है, उसे मृत्यु द्वारा घेर लिए जाने पर भी वह अपने प्राणों से कभी वियुक्त नहीं किया जाता।

श्लोक 29 (skanda.6.145.29)

तस्माद्यूयं समासाद्य तल्लिंगं तद्दिने निशि ॥ पूजयध्वं महाभागा येन स्युर्मृत्युवर्जिताः

tasmādyūyaṁ samāsādya talliṁgaṁ taddine niśi pūjayadhvaṁ mahābhāgā yena syurmṛtyuvarjitāḥ

शुक्राचार्य ने कहा — अतः हे महाभागो! तुम भी उस दिन रात्रि में उस लिंग के पास जाकर उसकी पूजा करो, जिससे तुम मृत्यु से मुक्त हो जाओ।

श्लोक 30 (skanda.6.145.30)

यावत्संवत्सरस्यातं सत्यमेतन्मयोदितम् ॥ यथा ते देवसंघाश्च तत्प्रभावादसंशयम्

yāvatsaṁvatsarasyātaṁ satyametanmayoditam yathā te devasaṁghāśca tatprabhāvādasaṁśayam

यह मैंने सत्य कहा है, कि उसके प्रभाव से, जैसे वे देव-संघ एक वर्ष तक अवध्य रहे, उसी प्रकार तुम भी, निःसंदेह, एक वर्ष के अंत तक अवध्य रहोगे।

श्लोक 31 (skanda.6.145.31)

अथ तं दानवेन्द्राणां मंत्रं ज्ञात्वा सुरेश्वरः ॥ नारदाद्ब्राह्मणः पुत्राद्भयत्रस्तमनास्ततः

atha taṁ dānavendrāṇāṁ maṁtraṁ jñātvā sureśvaraḥ nāradādbrāhmaṇaḥ putrādbhayatrastamanāstataḥ

तब उन दानवेंद्रों की इस मंत्रणा को ब्राह्मण-पुत्र नारद से जानकर, देवेश्वर इंद्र भयभीत मन वाला हो गया।

श्लोक 32 (skanda.6.145.32)

मंत्रं चक्रे समं देवैस्तत्र देवस्य रक्षणे ॥ यथा स्यादुद्यमः सम्यक्तस्मिन्नहनि सर्वदा

maṁtraṁ cakre samaṁ devaistatra devasya rakṣaṇe yathā syādudyamaḥ samyaktasminnahani sarvadā

उसने देवताओं के साथ उस देव-लिंग की रक्षा के विषय में मंत्रणा की, जिससे उस दिन सदा भलीभाँति प्रयास हो सके।

श्लोक 33 (skanda.6.145.33)

कोटयस्तु त्रयस्त्रिंशद्देवानां सायुधास्ततः ॥ रक्षार्थं तस्य लिंगस्य तस्मिन्क्षेत्रे व्यवस्थिताः ॥ माघकृष्णचतुर्दश्यां सुसंनद्धाः प्रहारिणः

koṭayastu trayastriṁśaddevānāṁ sāyudhāstataḥ rakṣārthaṁ tasya liṁgasya tasminkṣetre vyavasthitāḥ māghakṛṣṇacaturdaśyāṁ susaṁnaddhāḥ prahāriṇaḥ

तत्पश्चात् तैंतीस करोड़ देवता, शस्त्रों सहित, उस लिंग की रक्षा के लिए उस क्षेत्र में स्थित हो गए, माघ कृष्ण चतुर्दशी को भलीभाँति सन्नद्ध होकर, प्रहार करने को तत्पर।

श्लोक 34 (skanda.6.145.34)

अथ ते दानवा दृष्ट्वा तान्देवांस्तत्र संस्थितान् ॥ भयसंत्रस्तमनसो दुद्रुवुः सर्वतो दिशम्

atha te dānavā dṛṣṭvā tāndevāṁstatra saṁsthitān bhayasaṁtrastamanaso dudruvuḥ sarvato diśam

तब उन दानवों ने वहाँ स्थित उन देवताओं को देखकर, भय से त्रस्त मन होकर, सभी दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 35 (skanda.6.145.35)

अथ प्रभाते विमले प्रोद्गते रविमण्डले ॥ भूय एव सुराः सर्वे मंत्रं चक्रुः परस्परम्

atha prabhāte vimale prodgate ravimaṇḍale bhūya eva surāḥ sarve maṁtraṁ cakruḥ parasparam

तत्पश्चात् स्वच्छ प्रभात के होने पर, सूर्यमंडल के उदय हो जाने पर, वे सभी देवता पुनः आपस में मंत्रणा करने लगे।

श्लोक 36 (skanda.6.145.36)

यद्येतत्क्षेत्रमुत्सृज्य गमिष्यामः सुरालयम् ॥ लिंगमेतत्समभ्येत्य पूजयिष्यंति दानवाः

yadyetatkṣetramutsṛjya gamiṣyāmaḥ surālayam liṁgametatsamabhyetya pūjayiṣyaṁti dānavāḥ

उन्होंने कहा — यदि हम इस क्षेत्र को छोड़कर देवलोक चले जाएँगे, तो दानव आकर इस लिंग की पूजा करेंगे,

श्लोक 37 (skanda.6.145.37)

ततोऽवध्या भविष्यंति तेऽपि सर्वे यथा वयम् ॥ तस्मादत्रैव तिष्ठामस्त्रयस्त्रिंशत्प्रनायकाः

tato'vadhyā bhaviṣyaṁti te'pi sarve yathā vayam tasmādatraiva tiṣṭhāmastrayastriṁśatpranāyakāḥ

और तब वे सब भी हमारी ही भाँति अवध्य हो जाएँगे; अतः हम तैंतीस प्रमुख नायक यहीं रहेंगे।

श्लोक 38 (skanda.6.145.38)

कोटीनामेव सर्वेषां शेषा गच्छन्तु तत्र च ॥ सहस्राक्षेण संयुक्ताः स्वर्गे स्वपररक्षकाः

koṭīnāmeva sarveṣāṁ śeṣā gacchantu tatra ca sahasrākṣeṇa saṁyuktāḥ svarge svapararakṣakāḥ

शेष सभी करोड़ों देवता, सहस्राक्ष के साथ, स्वर्ग में स्वयं की और दूसरों की रक्षा करने के लिए वहीं चले जाएँ।

श्लोक 39 (skanda.6.145.39)

ततोऽष्टौ वसवस्तत्र द्वादशार्कास्तथैव च ॥ एकादशापरे रुद्रा नासत्यौ द्वौ च सुन्दरौ

tato'ṣṭau vasavastatra dvādaśārkāstathaiva ca ekādaśāpare rudrā nāsatyau dvau ca sundarau

तब आठ वसु, तथा उसी प्रकार बारह आदित्य, और ग्यारह रुद्र, तथा दोनों सुंदर नासत्य —

श्लोक 40 (skanda.6.145.40)

एते तल्लिंगरक्षार्थं तस्मिन्क्षेत्रे व्यवस्थिताः॥ शेषाः शक्रसमायुक्ताः प्रजग्मुस्त्रिदशालयम्

ete talliṁgarakṣārthaṁ tasminkṣetre vyavasthitāḥ śeṣāḥ śakrasamāyuktāḥ prajagmustridaśālayam

ये सब उस लिंग की रक्षा के लिए उस क्षेत्र में स्थिर हो गए; शेष देवता इंद्र के साथ देवलोक को चले गए।

श्लोक 41 (skanda.6.145.41)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवं प्रभावं लिंगं तु देवदेवस्य शूलिनः ॥ भवद्भिः परिपृष्टं यददित्या स्थापितं पुरा

sūta uvāca evaṁ prabhāvaṁ liṁgaṁ tu devadevasya śūlinaḥ bhavadbhiḥ paripṛṣṭaṁ yadadityā sthāpitaṁ purā

सूत जी ने कहा — इस प्रकार वह शूलधारी देवाधिदेव का लिंग, जिसे आपने मुझसे पूछा, ऐसे ही प्रभाव वाला है, जो पूर्वकाल में अदिति द्वारा स्थापित किया गया था।

श्लोक 42 (skanda.6.145.42)

यस्मान्न विद्यते मृत्युस्तेन दृष्टेन देहिनाम् ॥ अमराख्यं ततो लिंगं विख्यातं भुवनत्रये

yasmānna vidyate mṛtyustena dṛṣṭena dehinām amarākhyaṁ tato liṁgaṁ vikhyātaṁ bhuvanatraye

चूँकि उसके दर्शन से प्राणियों को मृत्यु प्राप्त नहीं होती, इसीलिए वह लिंग "अमर" के नाम से तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 43 (skanda.6.145.43)

यस्मिन्देशेऽपि सा कन्या हता तेन द्विजन्मना ॥ जाबालिना सुक्रुद्धेन तस्य देवस्य मंदिरे

yasmindeśe'pi sā kanyā hatā tena dvijanmanā jābālinā sukruddhena tasya devasya maṁdire

और जिस स्थान पर वह कन्या, अत्यंत क्रोधित उस द्विज जाबालि द्वारा मारी गई थी, वह उस देव के ही मंदिर में था।

श्लोक 44 (skanda.6.145.44)

आसीत्तत्र दिने कृष्णा माघमास चतुर्दशी ॥ तेन नो निधनं प्राप्ता सुहताऽपि तपस्विनी

āsīttatra dine kṛṣṇā māghamāsa caturdaśī tena no nidhanaṁ prāptā suhatā'pi tapasvinī

उस दिन माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी ही थी; इसी कारण वह तपस्विनी, भलीभाँति प्रहार किए जाने पर भी, मृत्यु को प्राप्त नहीं हुई।

श्लोक 45 (skanda.6.145.45)

एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्य लिंगस्य सम्भवम् ॥ माहात्म्यं ब्राह्मणश्रेष्ठाः सर्वपातकनाशनम्

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ tasya liṁgasya sambhavam māhātmyaṁ brāhmaṇaśreṣṭhāḥ sarvapātakanāśanam

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उस लिंग की उत्पत्ति का यह संपूर्ण माहात्म्य, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है, तुम्हें कह दिया गया।

श्लोक 46 (skanda.6.145.46)

यश्चैतत्पठते भक्त्या तस्य लिंगस्य संनिधौ ॥ अपमृत्युभयं तस्य कथंचिन्नैव जायते

yaścaitatpaṭhate bhaktyā tasya liṁgasya saṁnidhau apamṛtyubhayaṁ tasya kathaṁcinnaiva jāyate

जो कोई इसे उस लिंग के समीप भक्तिपूर्वक पढ़ता है, उसे अकाल-मृत्यु का भय किसी भी प्रकार नहीं होता।

श्लोक 47 (skanda.6.145.47)

तस्याग्रेऽस्ति शुभं कुण्डं पूरितं स्वच्छवारिणा । अदित्या निर्मितं देव्या स्नानार्थं चात्मनः कृते

tasyāgre'sti śubhaṁ kuṇḍaṁ pūritaṁ svacchavāriṇā adityā nirmitaṁ devyā snānārthaṁ cātmanaḥ kṛte

उसके सामने एक शुभ कुंड है, जो स्वच्छ जल से भरा हुआ है, जो देवी अदिति द्वारा स्वयं के स्नान के लिए बनवाया गया था।

श्लोक 48 (skanda.6.145.48)

स्नानं कृत्वा नरस्तस्मिन्यस्तल्लिंगं प्रपश्यति ॥ करोति जागरं रात्रौ तस्मिन्नेव दिनेदिने ॥ सोऽद्यापि वत्सरं यावन्नापमृत्युमवाप्नुयात्

snānaṁ kṛtvā narastasminyastalliṁgaṁ prapaśyati karoti jāgaraṁ rātrau tasminneva dinedine so'dyāpi vatsaraṁ yāvannāpamṛtyumavāpnuyāt

जो मनुष्य उसमें स्नान करके उस लिंग का दर्शन करता है, और उसी दिन रात्रि में जागरण करता है, वह आज भी एक वर्ष तक अकाल-मृत्यु को प्राप्त नहीं होता।

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