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नागर खण्ड · अध्याय 146

त्रयस्त्रिंश-देवनाम-वर्णन

अध्याय 145अध्याय-सूचीअध्याय 147

श्लोक 1 (skanda.6.146.1)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ आदित्यानां च सर्वेषां वसुरुद्रादिकाश्विनाम् ॥ प्रत्येकशः समाचक्ष्व नामानि त्वं महामते

ṛṣaya ūcuḥ ādityānāṁ ca sarveṣāṁ vasurudrādikāśvinām pratyekaśaḥ samācakṣva nāmāni tvaṁ mahāmate

ऋषियों ने कहा — हे महामते! समस्त आदित्यों, वसुओं, रुद्रों तथा अश्विनीकुमारों के नाम हमें एक-एक करके बताइए।

श्लोक 2 (skanda.6.146.2)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ वृषध्वजश्च शर्वश्च मृगव्याधस्तृतीयकः ॥ अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी षष्ठ एव हि

sūta uvāca vṛṣadhvajaśca śarvaśca mṛgavyādhastṛtīyakaḥ ajaikapādahirbudhnyaḥ pinākī ṣaṣṭha eva hi

सूत जी ने कहा — वृषध्वज, शर्व, तीसरे मृगव्याध, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, तथा छठे पिनाकी —

श्लोक 3 (skanda.6.146.3)

दहनश्चेश्वरश्चैव कपाली नवमस्तथा ॥ वृषाकपिस्तु दशमो रुद्रस्त्र्यंबक एव च

dahanaśceśvaraścaiva kapālī navamastathā vṛṣākapistu daśamo rudrastryaṁbaka eva ca

दहन, ईश्वर, तथा नवें कपाली, दसवें वृषाकपि, तथा रुद्र त्र्यंबक —

श्लोक 4 (skanda.6.146.4)

धुरो ध्रुवश्च सोमश्च मखश्चैवानिलोऽनलः ॥ प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः

dhuro dhruvaśca somaśca makhaścaivānilo'nalaḥ pratyūṣaśca prabhāsaśca vasavo'ṣṭau prakīrtitāḥ

धुर, ध्रुव, सोम, मख, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास — ये आठ वसु कहे गए हैं।

श्लोक 5 (skanda.6.146.5)

वरुणश्च तथा सूर्यो भानुः ख्यातश्च तापनः ॥ इंद्रश्चैवार्यमा चैव धाता चैव भगस्तथा

varuṇaśca tathā sūryo bhānuḥ khyātaśca tāpanaḥ iṁdraścaivāryamā caiva dhātā caiva bhagastathā

वरुण, सूर्य, प्रसिद्ध भानु, तापन, इंद्र, अर्यमा, धाता, तथा भग —

श्लोक 6 (skanda.6.146.6)

गभस्तिर्धर्मराजश्च स्वर्णरेता दिवाकरः ॥ मित्रश्च वासुदेवश्च द्वादशैते च भास्कराः

gabhastirdharmarājaśca svarṇaretā divākaraḥ mitraśca vāsudevaśca dvādaśaite ca bhāskarāḥ

गभस्ति, धर्मराज, स्वर्णरेता दिवाकर, मित्र, तथा वासुदेव — ये बारह आदित्य कहे गए हैं।

श्लोक 7 (skanda.6.146.7)

नासत्यश्चैव दस्रश्च ख्यातावेतौ तथाश्विनौ ॥ देववैद्यौ महाभागौ त्वाष्ट्रीगर्भसमुद्भवौ

nāsatyaścaiva dasraśca khyātāvetau tathāśvinau devavaidyau mahābhāgau tvāṣṭrīgarbhasamudbhavau

नासत्य तथा दस्र — ये दोनों प्रसिद्ध अश्विनीकुमार हैं, देवताओं के वैद्य, महाभाग, त्वष्टा की पुत्री के गर्भ से उत्पन्न।

श्लोक 8 (skanda.6.146.8)

त्रयस्त्रिंशत्समाख्याता एते ये सुरनायकाः ॥ क्षेत्रेऽत्रैवास्थिता नित्यं दानवानां वधाय च

trayastriṁśatsamākhyātā ete ye suranāyakāḥ kṣetre'traivāsthitā nityaṁ dānavānāṁ vadhāya ca

ये सभी तैंतीस सुर-नायक कहे गए हैं, जो इसी क्षेत्र में सदा दानवों के वध के लिए स्थित रहते हैं।

श्लोक 9 (skanda.6.146.9)

यस्तान्संपूजयेद्भक्त्या पुरुषः संयतेंद्रियः॥ यथोक्तदिवसे प्राप्ते नापमृत्युः प्रजायते

yastānsaṁpūjayedbhaktyā puruṣaḥ saṁyateṁdriyaḥ yathoktadivase prāpte nāpamṛtyuḥ prajāyate

जो पुरुष जितेंद्रिय होकर भक्तिपूर्वक निर्दिष्ट दिन पर उनकी पूजा करता है, उसे अकाल-मृत्यु प्राप्त नहीं होती।

श्लोक 10 (skanda.6.146.10)

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां रुद्राः पूज्या विचक्षणैः ॥ तस्मिन्क्षेत्रे विशेषेण वांछद्भिः परमं पदम्

aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ rudrāḥ pūjyā vicakṣaṇaiḥ tasminkṣetre viśeṣeṇa vāṁchadbhiḥ paramaṁ padam

अष्टमी और चतुर्दशी को उस क्षेत्र में परम पद की कामना करने वाले बुद्धिमान् पुरुषों द्वारा विशेष रूप से रुद्रों की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 11 (skanda.6.146.11)

दशम्यां वसवः पूज्यास्तथाष्टम्यां विशेषतः ॥ स्वर्गं समीहमानैश्च विलासैर्विविधैस्तथा

daśamyāṁ vasavaḥ pūjyāstathāṣṭamyāṁ viśeṣataḥ svargaṁ samīhamānaiśca vilāsairvividhaistathā

दशमी को, तथा विशेष रूप से अष्टमी को भी, स्वर्ग तथा नाना प्रकार के विलासों की कामना करने वालों द्वारा वसुओं की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 12 (skanda.6.146.12)

सप्तम्यामथ षष्ठ्यां च पूजनीया दिवाकराः ॥ ये वांछन्ति नराः सत्त्वं परिपंथिविवर्जितम्

saptamyāmatha ṣaṣṭhyāṁ ca pūjanīyā divākarāḥ ye vāṁchanti narāḥ sattvaṁ paripaṁthivivarjitam

सप्तमी तथा षष्ठी को उन मनुष्यों द्वारा आदित्यों की पूजा करनी चाहिए, जो शत्रुओं से रहित बल की कामना करते हैं।

श्लोक 13 (skanda.6.146.13)

देववैद्यौ तथा पूज्यौ द्वादश्यां व्याधिसंक्षयम् ॥ ये वांछन्ति सदा मर्त्या नीरुजा सम्भवंति ते

devavaidyau tathā pūjyau dvādaśyāṁ vyādhisaṁkṣayam ye vāṁchanti sadā martyā nīrujā sambhavaṁti te

द्वादशी को उन देवताओं के वैद्यों (अश्विनीकुमारों) की पूजा करनी चाहिए, जो व्याधि के नाश की कामना करते हैं; ऐसा करने वाले मनुष्य सदा रोगरहित हो जाते हैं।

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