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नागर खण्ड · अध्याय 147

व्यास-शुक-संवाद

अध्याय 146अध्याय-सूचीअध्याय 148

श्लोक 1 (skanda.6.147.1)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ तथान्योऽपि च तत्रास्ति देवः पुत्रप्रदो नृणाम् ॥ वटिकेश्वर नामा च सर्वपापहरो हरः

sūta uvāca tathānyo'pi ca tatrāsti devaḥ putraprado nṛṇām vaṭikeśvara nāmā ca sarvapāpaharo haraḥ

सूत जी ने कहा — वहाँ एक और देव भी हैं, जो मनुष्यों को पुत्र प्रदान करने वाले हैं — वटिकेश्वर नामक हर, जो समस्त पापों को हरने वाले हैं।

श्लोक 2 (skanda.6.147.2)

यस्मिन्वटिकया पूर्वं तपस्तप्तं द्विजोत्तमाः ॥ प्राप्ता पुत्रं शुके याते वनं व्यासात्कपिंजलम्

yasminvaṭikayā pūrvaṁ tapastaptaṁ dvijottamāḥ prāptā putraṁ śuke yāte vanaṁ vyāsātkapiṁjalam

हे श्रेष्ठ द्विजो! जहाँ पूर्वकाल में वटिका ने तप किया था, और शुक के वन को चले जाने पर, व्यास से कपिंजल नामक पुत्र प्राप्त किया था।

श्लोक 3 (skanda.6.147.3)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ कस्यासौ वटिका तत्र कथं तप्तवती तपः ॥ कस्माद्गृहं परित्यक्त्वा शुकोऽपि वनमाश्रितः

ṛṣaya ūcuḥ kasyāsau vaṭikā tatra kathaṁ taptavatī tapaḥ kasmādgṛhaṁ parityaktvā śuko'pi vanamāśritaḥ

ऋषियों ने कहा — वह वटिका किसकी थी, और उसने वहाँ किस प्रकार तप किया? और शुक भी घर छोड़कर किसलिए वन में चले गए?

श्लोक 4 (skanda.6.147.4)

कथं कपिजलं पुत्रं व्यासाल्लेभे शुचिस्मिता

kathaṁ kapijalaṁ putraṁ vyāsāllebhe śucismitā

और उस पवित्र-मुस्कान वाली ने व्यास से कपिंजल पुत्र को कैसे प्राप्त किया?

श्लोक 5 (skanda.6.147.5)

।। सूत उवाच ॥ ॥ आसीद्व्यासस्य विप्रेंद्राः कलत्रार्थं मतिः क्वचित् । निष्कामस्य प्रशांतस्य सर्वज्ञस्य महात्मनः

sūta uvāca āsīdvyāsasya vipreṁdrāḥ kalatrārthaṁ matiḥ kvacit niṣkāmasya praśāṁtasya sarvajñasya mahātmanaḥ

सूत जी ने कहा — हे विप्रेंद्रो! उस निष्काम, परम शांत, सर्वज्ञ महात्मा व्यास के मन में भी कभी पत्नी के प्रति एक विचार उत्पन्न हुआ।

श्लोक 6 (skanda.6.147.6)

ततः क्षयमनुप्राप्ते वंशे कुरुसमुद्भवे ॥ विचित्रवीर्यमासाद्य पार्थिवं द्विजसत्तमाः

tataḥ kṣayamanuprāpte vaṁśe kurusamudbhave vicitravīryamāsādya pārthivaṁ dvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! तत्पश्चात्, कुरुवंश में उत्पन्न होने वाला वंश जब क्षय को प्राप्त हो गया, तब राजा विचित्रवीर्य को लेकर —

श्लोक 7 (skanda.6.147.7)

सत्यवत्याः समादेशात्तस्य क्षेत्रे ततः परम् ॥ स पुत्राञ्जनयामास त्रीञ्छूरान्पांडुपूर्वकान्

satyavatyāḥ samādeśāttasya kṣetre tataḥ param sa putrāñjanayāmāsa trīñchūrānpāṁḍupūrvakān

सत्यवती की आज्ञा से, उसी के क्षेत्र (पत्नियों) में, उन्होंने पांडु आदि तीन शूरवीर पुत्रों को उत्पन्न किया।

श्लोक 8 (skanda.6.147.8)

वानप्रस्थव्रते तिष्ठन्सकृन्मैथुनतत्परः ॥ क्षेत्रजैस्तनयैर्वंशे कुरोस्तस्मादुपस्थिते

vānaprasthavrate tiṣṭhansakṛnmaithunatatparaḥ kṣetrajaistanayairvaṁśe kurostasmādupasthite

वानप्रस्थ व्रत में स्थित रहते हुए, केवल एक बार संभोग में तत्पर होकर, इस प्रकार कुरुवंश में क्षेत्रज पुत्रों के आ जाने पर —

श्लोक 9 (skanda.6.147.9)

ततः स चिंतयामास भार्यामद्य करोम्यहम् ॥ गार्हस्थ्येनाथ धर्मेण साधयामि शुभां गतिम्

tataḥ sa ciṁtayāmāsa bhāryāmadya karomyaham gārhasthyenātha dharmeṇa sādhayāmi śubhāṁ gatim

तब उन्होंने विचार किया — अब मैं भी एक पत्नी बना लूँ, और गार्हस्थ्य धर्म के द्वारा शुभ गति सिद्ध करूँ।

श्लोक 10 (skanda.6.147.10)

ततः स प्रार्थयामास जाबालिं तु सुतां शुभाम् ॥ वटिकाख्यां शुभां कन्यां स ददौ तस्य सत्वरम्

tataḥ sa prārthayāmāsa jābāliṁ tu sutāṁ śubhām vaṭikākhyāṁ śubhāṁ kanyāṁ sa dadau tasya satvaram

तब उन्होंने जाबालि से उनकी शुभ पुत्री की याचना की; उन्होंने भी वटिका नाम की उस शुभ कन्या को शीघ्र ही उन्हें दे दिया।

श्लोक 11 (skanda.6.147.11)

ततस्तया समेतः स वनवासं समाश्रितः ॥ वानप्रस्थाश्रमे तिष्ठन्कृतमैथुनतत्परः

tatastayā sametaḥ sa vanavāsaṁ samāśritaḥ vānaprasthāśrame tiṣṭhankṛtamaithunatatparaḥ

तत्पश्चात् उसके साथ, वे वन-निवास में चले गए, और वानप्रस्थ आश्रम में रहते हुए संभोग में तत्पर हुए।

श्लोक 12 (skanda.6.147.12)

ततो गर्भवती जज्ञे पिंजला तस्य पार्श्वतः ॥ ऋतौ मोहनमासाद्य व्यासात्सत्यवतीसुतात्

tato garbhavatī jajñe piṁjalā tasya pārśvataḥ ṛtau mohanamāsādya vyāsātsatyavatīsutāt

तत्पश्चात् उनके पास ही पिंजला उस ऋतुकाल में सत्यवती-पुत्र व्यास से मोहन (गर्भाधान) को प्राप्त कर गर्भवती हुई।

श्लोक 13 (skanda.6.147.13)

अथ याति परां वृद्धिं स गर्भस्तत्र संस्थितः ॥ उदरे व्यासभार्यायाः शुक्लपक्षे यथा शशी

atha yāti parāṁ vṛddhiṁ sa garbhastatra saṁsthitaḥ udare vyāsabhāryāyāḥ śuklapakṣe yathā śaśī

तत्पश्चात् वह गर्भ, व्यास की पत्नी के उदर में स्थित होकर, उत्तरोत्तर बढ़ने लगा, जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा बढ़ता है।

श्लोक 14 (skanda.6.147.14)

एवं संगच्छतस्तस्य वृद्धिं गर्भस्य नित्यशः ॥ द्वादशाब्दा अतिक्रांता न जन्म समवाप्नुयात्

evaṁ saṁgacchatastasya vṛddhiṁ garbhasya nityaśaḥ dvādaśābdā atikrāṁtā na janma samavāpnuyāt

इस प्रकार उस गर्भ की वृद्धि होते-होते बारह वर्ष बीत गए, फिर भी उसका जन्म नहीं हुआ।

श्लोक 15 (skanda.6.147.15)

यत्किंचिच्छृणुते तत्र गर्भस्थोऽहि वचः क्वचित् ॥ तत्सर्वं हृदिसंस्थं च चक्रे प्रज्ञासमन्वितः

yatkiṁcicchṛṇute tatra garbhastho'hi vacaḥ kvacit tatsarvaṁ hṛdisaṁsthaṁ ca cakre prajñāsamanvitaḥ

गर्भ में स्थित रहते हुए वह जो कुछ भी वचन कभी सुनता, वह सब बुद्धिमत्तापूर्वक अपने हृदय में धारण कर लेता।

श्लोक 16 (skanda.6.147.16)

वेदाः सांगाः समाधीता गर्भवासेऽपि तेन च ॥ स्मृतयश्च पुराणानि मोक्षशास्त्राणि कृत्स्नशः

vedāḥ sāṁgāḥ samādhītā garbhavāse'pi tena ca smṛtayaśca purāṇāni mokṣaśāstrāṇi kṛtsnaśaḥ

गर्भ में रहते हुए भी उसने अंगों सहित वेदों का, स्मृतियों का, पुराणों का, तथा समस्त मोक्ष-शास्त्रों का अध्ययन कर लिया।

श्लोक 17 (skanda.6.147.17)

तत्रस्थोऽपि दिवा नक्तं स्वाध्यायं प्रकरोति सः ॥ न च जन्मोत्थजां बुद्धिं कथंचिदपि चिंतयेत्

tatrastho'pi divā naktaṁ svādhyāyaṁ prakaroti saḥ na ca janmotthajāṁ buddhiṁ kathaṁcidapi ciṁtayet

वहीं रहते हुए भी वह दिन-रात स्वाध्याय करता रहता था, और जन्म लेने के विचार को किसी भी प्रकार मन में नहीं लाता था।

श्लोक 18 (skanda.6.147.18)

सापि माता परा पीडां नित्यं याति तथाकुला ॥ यथायथा स संयाति वृद्धिं जठरमाश्रितः

sāpi mātā parā pīḍāṁ nityaṁ yāti tathākulā yathāyathā sa saṁyāti vṛddhiṁ jaṭharamāśritaḥ

उसकी माता भी, जैसे-जैसे वह गर्भ में स्थित रहकर बढ़ता जाता, वैसे-वैसे व्याकुल होकर अत्यंत पीड़ा को प्राप्त होती जाती थी।

श्लोक 19 (skanda.6.147.19)

ततश्च विस्मयाविष्टो व्यासो वचनमब्रवीत् ॥ कस्त्वं मद्गृहिणीकुक्षौ प्रविष्टो गर्भरूपधृक्

tataśca vismayāviṣṭo vyāso vacanamabravīt kastvaṁ madgṛhiṇīkukṣau praviṣṭo garbharūpadhṛk

तत्पश्चात् आश्चर्यचकित होकर व्यास ने कहा — तुम कौन हो, जो गर्भरूप धारण करके मेरी पत्नी के गर्भ में प्रविष्ट हुए हो?

श्लोक 20 (skanda.6.147.20)

न निष्क्रामसि कस्मात्त्वं किमेतां सूदयिष्यसि ॥ ॥ ॥ गर्भ उवाच ॥ ॥ राक्षसोऽहं पिशाचोहं देवोऽहं मानुषस्तथा

na niṣkrāmasi kasmāttvaṁ kimetāṁ sūdayiṣyasi garbha uvāca rākṣaso'haṁ piśācohaṁ devo'haṁ mānuṣastathā

तुम बाहर क्यों नहीं निकलते? क्या तुम इसे मार डालोगे? गर्भ ने कहा — मैं राक्षस हूँ, मैं पिशाच हूँ, मैं देव हूँ, और मैं मनुष्य भी हूँ।

श्लोक 21 (skanda.6.147.21)

गजोऽहं तुरगश्चापि कुक्कुटश्छाग एव च ॥ योनीनां चतुराशीतिसहस्राणि च संख्यया

gajo'haṁ turagaścāpi kukkuṭaśchāga eva ca yonīnāṁ caturāśītisahasrāṇi ca saṁkhyayā

मैं हाथी हूँ, घोड़ा भी हूँ, मुर्गा हूँ, तथा बकरा भी हूँ; चौरासी लाख योनियों की गिनती में —

श्लोक 22 (skanda.6.147.22)

भ्रांतोऽहं तेषु सर्वेषु तत्कोऽहं प्रब्रवीमि किम् ॥ सांप्रतं मानुषो भूत्वा जठरं समुपाश्रितः

bhrāṁto'haṁ teṣu sarveṣu tatko'haṁ prabravīmi kim sāṁprataṁ mānuṣo bhūtvā jaṭharaṁ samupāśritaḥ

मैं उन सभी में भटक चुका हूँ; तो अब मैं क्या बताऊँ कि मैं कौन हूँ? अभी तो मैं मनुष्य होकर आपके उदर में आश्रित हुआ हूँ।

श्लोक 23 (skanda.6.147.23)

मानुषं न करिष्यामि निष्कामं च कथंचन ॥ निर्विष्टो भ्रममाणोऽत्र संसारे दारुणे ततः

mānuṣaṁ na kariṣyāmi niṣkāmaṁ ca kathaṁcana nirviṣṭo bhramamāṇo'tra saṁsāre dāruṇe tataḥ

मैं इसे किसी भी प्रकार मानव-जन्म को इच्छारहित नहीं होने दूँगा, क्योंकि इस भयंकर संसार में प्रविष्ट होकर मैं भटकता रहा हूँ।

श्लोक 24 (skanda.6.147.24)

अत्रस्थो भवनिर्मुक्तो योगाभ्यासरतः सदा ॥ मोक्षमार्गं प्रयास्यामि स्थानान्मोक्षमसंशयम्

atrastho bhavanirmukto yogābhyāsarataḥ sadā mokṣamārgaṁ prayāsyāmi sthānānmokṣamasaṁśayam

यहीं रहते हुए, भव-बंधन से मुक्त, सदा योगाभ्यास में रत रहकर, मैं इसी स्थान से मोक्ष-मार्ग को, निःसंदेह मोक्ष को, प्राप्त करूँगा।

श्लोक 25 (skanda.6.147.25)

तावज्ज्ञानं च वैराग्यं पूर्वजातिस्मृतिर्यथा ॥ यावद्गर्भस्थितो जन्तुः सर्वोऽपि द्विजसत्तम

tāvajjñānaṁ ca vairāgyaṁ pūrvajātismṛtiryathā yāvadgarbhasthito jantuḥ sarvo'pi dvijasattama

हे श्रेष्ठ द्विज! ज्ञान, वैराग्य तथा पूर्वजन्म की स्मृति — ये सब तब तक ही रहते हैं, जब तक कोई भी प्राणी गर्भ में स्थित रहता है।

श्लोक 26 (skanda.6.147.26)

यदा गर्भाद्विनिष्क्रांतः स्पृश्यते विष्णुमायया ॥ तदा नाशं व्रजत्याशु सत्यमेतदसंशयम्

yadā garbhādviniṣkrāṁtaḥ spṛśyate viṣṇumāyayā tadā nāśaṁ vrajatyāśu satyametadasaṁśayam

जब वह गर्भ से बाहर निकल आता है और विष्णु-माया द्वारा स्पर्श किया जाता है, तब वह ज्ञान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है — यह मैंने सत्य कहा है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 27 (skanda.6.147.27)

तस्मान्नाहं द्विजश्रेष्ठ निष्क्रमिष्ये कथंचन ॥ गर्भादस्मात्प्रयास्यामि स्थानान्मोक्षमसंशयम्

tasmānnāhaṁ dvijaśreṣṭha niṣkramiṣye kathaṁcana garbhādasmātprayāsyāmi sthānānmokṣamasaṁśayam

अतः हे श्रेष्ठ द्विज! मैं किसी भी प्रकार इस गर्भ से बाहर नहीं निकलूँगा; मैं इसी स्थान से, इसी गर्भ से, निःसंदेह मोक्ष को प्राप्त करूँगा।

श्लोक 28 (skanda.6.147.28)

॥ व्यास उवाच ॥ ॥ न भविष्यति ते माया वैष्णवी सा कथंचन ॥ सुघोरान्नरकादस्मान्निष्क्रमस्व विगर्हितात्

vyāsa uvāca na bhaviṣyati te māyā vaiṣṇavī sā kathaṁcana sughorānnarakādasmānniṣkramasva vigarhitāt

व्यास ने कहा — यह विष्णु की माया तुम्हें किसी भी प्रकार स्पर्श नहीं करेगी; अतः इस अत्यंत भयंकर, गर्हित नरक से बाहर निकलो।

श्लोक 29 (skanda.6.147.29)

गर्भवासात्ततो योगं समाश्रित्य शिवं व्रज ॥ तस्माद्दर्शय मे वक्त्रं स्वकीयं येन मे भवेत् ॥ आनृण्यं पितृलोकस्य तव वक्त्रस्य दर्शनात्

garbhavāsāttato yogaṁ samāśritya śivaṁ vraja tasmāddarśaya me vaktraṁ svakīyaṁ yena me bhavet ānṛṇyaṁ pitṛlokasya tava vaktrasya darśanāt

गर्भवास से निकलकर, तत्पश्चात् योग का आश्रय लेकर, शिव-पद को प्राप्त करो; अतः मुझे अपना मुख दिखाओ, जिससे तुम्हारे मुख के दर्शन से मुझे पितृ-लोक के ऋण से मुक्ति प्राप्त हो सके।

श्लोक 30 (skanda.6.147.30)

॥ गर्भ उवाच ॥ ॥ वासुदेवं प्रतिभुवं यदि मे त्वं प्रयच्छसि ॥ इदानीं यत्स्वयं तन्मे जन्म स्यान्नान्यथा द्विज

garbha uvāca vāsudevaṁ pratibhuvaṁ yadi me tvaṁ prayacchasi idānīṁ yatsvayaṁ tanme janma syānnānyathā dvija

गर्भ ने कहा — यदि आप मुझे वासुदेव को जमानत के रूप में दें, तो अभी मेरा जन्म हो सकता है, अन्यथा नहीं, हे द्विज।

श्लोक 31 (skanda.6.147.31)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ ततो व्यासो द्रुतं गत्वा द्वारकां प्रति दुःखितः ॥ कथयामास वृत्तांतं विस्तराच्चक्रपाणिने

sūta uvāca tato vyāso drutaṁ gatvā dvārakāṁ prati duḥkhitaḥ kathayāmāsa vṛttāṁtaṁ vistarāccakrapāṇine

सूत जी ने कहा — तत्पश्चात् व्यास दुःखी होकर द्रुतगति से द्वारका की ओर गए, और चक्रपाणि को उस समस्त वृत्तांत को विस्तार से सुनाया।

श्लोक 32 (skanda.6.147.32)

तेनैव सहितः पश्चात्स्वगृहं पुनरागतः ॥ व्यासः प्रतिभुवं तस्मै दातुं विष्णुं निरंजनम्

tenaiva sahitaḥ paścātsvagṛhaṁ punarāgataḥ vyāsaḥ pratibhuvaṁ tasmai dātuṁ viṣṇuṁ niraṁjanam

तत्पश्चात् उन्हीं के साथ, व्यास पुनः अपने घर लौट आए, ताकि निरंजन विष्णु को उसके लिए जमानत के रूप में दे सकें।

श्लोक 33 (skanda.6.147.33)

॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ ॥ प्रतिभूरस्मि नाशाय मायायास्तव निर्गमे ॥ मद्वाक्यान्निष्क्रमं कृत्वा गच्छ मोक्षमनुत्तमम्

śrīkṛṣṇa uvāca pratibhūrasmi nāśāya māyāyāstava nirgame madvākyānniṣkramaṁ kṛtvā gaccha mokṣamanuttamam

श्रीकृष्ण ने कहा — तुम्हारे बाहर निकलने पर तुम्हारी माया के नाश के लिए मैं जमानतदार हूँ; अतः मेरे वचन से बाहर निकलकर, परम मोक्ष को प्राप्त करो।

श्लोक 34 (skanda.6.147.34)

ततो द्रुतं विनिष्क्रांतो विष्णुवाक्येन स द्विजाः ॥ द्वादशाब्दप्रमाणस्तु यौवनस्य समीपगः

tato drutaṁ viniṣkrāṁto viṣṇuvākyena sa dvijāḥ dvādaśābdapramāṇastu yauvanasya samīpagaḥ

हे द्विजो! तत्पश्चात् विष्णु के वचन से वह शीघ्र ही बाहर निकल आया, बारह वर्ष की आयु का, यौवन के समीप पहुँचा हुआ।

श्लोक 35 (skanda.6.147.35)

ततः प्रणम्य दैत्यारिं व्यासं च जननीं तथा ॥ प्रस्थितो वनवासाय तत्क्षणाद्व्यासनंदनः

tataḥ praṇamya daityāriṁ vyāsaṁ ca jananīṁ tathā prasthito vanavāsāya tatkṣaṇādvyāsanaṁdanaḥ

तत्पश्चात् दैत्यारि, व्यास तथा अपनी माता को प्रणाम करके, वह व्यासनंदन उसी क्षण वन-निवास के लिए चल पड़ा।

श्लोक 36 (skanda.6.147.36)

अथ तं स मुनिः प्राह तिष्ठ पुत्रात्ममंदिरे ॥ संस्काराञ्जातकाद्यांश्च येन ते प्रकरोम्यहम्

atha taṁ sa muniḥ prāha tiṣṭha putrātmamaṁdire saṁskārāñjātakādyāṁśca yena te prakaromyaham

तब उस मुनि ने उससे कहा — हे पुत्र! अपने घर में ठहरो, जिससे मैं तुम्हारे जातकर्म आदि संस्कार कर सकूँ।

श्लोक 37 (skanda.6.147.37)

॥ शिशुरुवाच ॥ ॥ संस्काराः शतशो जाता मम जन्मनिजन्मनि ॥ भवार्णवे परिक्षिप्तो यैरहं बन्धनात्मकैः

śiśuruvāca saṁskārāḥ śataśo jātā mama janmanijanmani bhavārṇave parikṣipto yairahaṁ bandhanātmakaiḥ

शिशु ने कहा — मेरे जन्म-जन्मांतर में सैकड़ों संस्कार हो चुके हैं, जिनके बंधनों से मैं इस भव-सागर में फेंका जाता रहा हूँ।

श्लोक 38 (skanda.6.147.38)

॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ शुकवज्जल्पते यस्मात्तवायं पुत्रको मुने ॥ तस्माच्छुकोऽयं नाम्नास्तु योगविद्याविचक्षणः

śrībhagavānuvāca śukavajjalpate yasmāttavāyaṁ putrako mune tasmācchuko'yaṁ nāmnāstu yogavidyāvicakṣaṇaḥ

भगवान् ने कहा — हे मुने! चूँकि तुम्हारा यह पुत्र तोते की भाँति बोल रहा है, इसलिए इसका नाम "शुक" हो, जो योगविद्या में निपुण होगा।

श्लोक 39 (skanda.6.147.39)

नायं स्थास्यति हर्म्ये स्वे मोहमायाविवर्जितः ॥ तस्माद्गच्छतु मा स्नेहं त्वं कुरुष्वास्य संभवम्

nāyaṁ sthāsyati harmye sve mohamāyāvivarjitaḥ tasmādgacchatu mā snehaṁ tvaṁ kuruṣvāsya saṁbhavam

यह मोह-माया से रहित होकर अपने घर में नहीं रहेगा; अतः इसे जाने दो, इसकी उत्पत्ति में तुम स्नेह मत रखो।

श्लोक 40 (skanda.6.147.40)

अहं गृहं प्रयास्यामि त्वं मुक्तः पैतृकादृणात्॥ दर्शनादेव पुत्रस्य सत्यमेतन्मयोदितम्

ahaṁ gṛhaṁ prayāsyāmi tvaṁ muktaḥ paitṛkādṛṇāt darśanādeva putrasya satyametanmayoditam

अब मैं अपने घर जाता हूँ; तुम अपने पुत्र के दर्शन से ही पितृ-ऋण से मुक्त हो गए हो — यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 41 (skanda.6.147.41)

एवमुक्त्वा हृषीकेशो व्यासमामंत्र्य सत्वरम्॥ विहगाधिपमारूढः प्रययौ द्वारकां प्रति

evamuktvā hṛṣīkeśo vyāsamāmaṁtrya satvaram vihagādhipamārūḍhaḥ prayayau dvārakāṁ prati

ऐसा कहकर हृषीकेश, व्यास से शीघ्र विदा लेकर, पक्षिराज पर आरूढ़ होकर द्वारका की ओर चले गए।

श्लोक 42 (skanda.6.147.42)

ततो गते हृषीकेशे व्यासः पुत्रमुवाच ह ॥ प्रस्थितं वनवासाय निःस्पृहं स्वगृहं प्रति

tato gate hṛṣīkeśe vyāsaḥ putramuvāca ha prasthitaṁ vanavāsāya niḥspṛhaṁ svagṛhaṁ prati

हृषीकेश के चले जाने पर, व्यास ने अपने उस पुत्र से कहा, जो वन-निवास के लिए, अपने घर की ओर निःस्पृह होकर, प्रस्थान कर रहा था।

श्लोक 43 (skanda.6.147.43)

॥ व्यास उवाच॥ ॥ गृहस्थधर्मरिक्तानां पितृवाक्यं प्रणश्यति ॥ पितृवाक्यं तु यो मोहान्नैव सम्यक्समाचरेत्॥ स याति नरकं तस्मान्मद्वाक्यात्पुत्र मा व्रज

vyāsa uvāca gṛhasthadharmariktānāṁ pitṛvākyaṁ praṇaśyati pitṛvākyaṁ tu yo mohānnaiva samyaksamācaret sa yāti narakaṁ tasmānmadvākyātputra mā vraja

व्यास ने कहा — गृहस्थ-धर्म से रहित लोगों के लिए पिता का वचन व्यर्थ हो जाता है; परंतु जो मोहवश पिता के वचन का भलीभाँति पालन नहीं करता, वह नरक को प्राप्त होता है; अतः हे पुत्र! मेरे वचन से मत जाओ।

श्लोक 44 (skanda.6.147.44)

॥ शुक उवाच ॥ ॥ यथाद्याहं त्वया जातो मया त्वं चान्यजन्मनि ॥ संजातोऽसि मुनिश्रेष्ठ तथाहमपि ते पिता

śuka uvāca yathādyāhaṁ tvayā jāto mayā tvaṁ cānyajanmani saṁjāto'si muniśreṣṭha tathāhamapi te pitā

शुक ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! जैसे आज मैं आपसे उत्पन्न हुआ हूँ, वैसे ही किसी अन्य जन्म में आप भी मुझसे उत्पन्न हुए थे; इस प्रकार मैं भी आपका पिता हूँ।

श्लोक 45 (skanda.6.147.45)

तस्माद्वाक्यं त्वया कार्यं यद्येषा धर्मसंस्थितिः ॥ नाहं निषेधनीयस्तु व्रजमानस्तपोवनम्

tasmādvākyaṁ tvayā kāryaṁ yadyeṣā dharmasaṁsthitiḥ nāhaṁ niṣedhanīyastu vrajamānastapovanam

अतः यदि यही धर्म-मर्यादा है, तो आपको ही मेरे वचन का पालन करना चाहिए; तपोवन की ओर जाते हुए मुझे रोका नहीं जाना चाहिए।

श्लोक 46 (skanda.6.147.46)

॥ व्यास उवाच ॥ ॥ ब्राह्मणस्य गृहे जन्म पुण्यैः संप्राप्यते नृभिः ॥ संस्कारान्यत्र संप्राप्य वेदोक्तान्मुनिराप्यते

vyāsa uvāca brāhmaṇasya gṛhe janma puṇyaiḥ saṁprāpyate nṛbhiḥ saṁskārānyatra saṁprāpya vedoktānmunirāpyate

व्यास ने कहा — पुण्यों के द्वारा ही मनुष्य ब्राह्मण के घर में जन्म प्राप्त करता है; वहाँ वेदोक्त संस्कारों को प्राप्त करके ही मुनि-पद प्राप्त होता है।

श्लोक 47 (skanda.6.147.47)

॥ शुक उवाच ॥ ॥ संस्कारैराप्यते मुक्तिर्यदि कर्म शुभं विना ॥ पाखंडिनोऽपि यास्यंति तन्मुक्तिं व्रतधारिणः

śuka uvāca saṁskārairāpyate muktiryadi karma śubhaṁ vinā pākhaṁḍino'pi yāsyaṁti tanmuktiṁ vratadhāriṇaḥ

शुक ने कहा — यदि शुभ कर्म के बिना ही संस्कारों से मुक्ति मिल जाती हो, तो व्रतधारी पाखंडी भी उस मुक्ति को प्राप्त कर लेंगे।

श्लोक 48 (skanda.6.147.48)

॥ व्यास उवाच ॥ ॥ ब्रह्मचारी भवेत्पूर्वं गृहस्थश्च ततः परम् ॥ वानप्रस्थो यतिश्चैव ततो मोक्षमवाप्नुयात्

vyāsa uvāca brahmacārī bhavetpūrvaṁ gṛhasthaśca tataḥ param vānaprastho yatiścaiva tato mokṣamavāpnuyāt

व्यास ने कहा — पहले ब्रह्मचारी हो, फिर गृहस्थ बने, तत्पश्चात् वानप्रस्थ और अंत में संन्यासी हो — इसी क्रम से मोक्ष प्राप्त होता है।

श्लोक 49 (skanda.6.147.49)

॥ शुक उवाच ॥ ॥ ब्रह्मचर्येण चेन्मोक्षस्तत्षण्ढानां सदा भवेत् ॥ गृहस्थाश्रमिणां चेत्स्यात्तत्सर्वं मुच्यते जगत्

śuka uvāca brahmacaryeṇa cenmokṣastatṣaṇḍhānāṁ sadā bhavet gṛhasthāśramiṇāṁ cetsyāttatsarvaṁ mucyate jagat

शुक ने कहा — यदि ब्रह्मचर्य से ही मोक्ष प्राप्त हो जाता हो, तो नपुंसकों को तो सदा ही मोक्ष प्राप्त होता रहेगा; और यदि गृहस्थाश्रम से ही मोक्ष प्राप्त होता हो, तो संपूर्ण जगत् ही मुक्त हो जाएगा।

श्लोक 50 (skanda.6.147.50)

अथवा वनरक्तानां तन्मृगाणां प्रजायते

athavā vanaraktānāṁ tanmṛgāṇāṁ prajāyate

अथवा यदि यह वन में रत रहने वालों को प्राप्त होता हो, तो वह तो मृगों को भी प्राप्त हो जाएगा।

श्लोक 51 (skanda.6.147.51)

अथवा यतिधर्माणां यदि मोक्षो भवेन्नृणाम् ॥ दरिद्राणां च सर्वेषां तन्मुक्तिः प्रथमा भवेत्

athavā yatidharmāṇāṁ yadi mokṣo bhavennṛṇām daridrāṇāṁ ca sarveṣāṁ tanmuktiḥ prathamā bhavet

अथवा यदि मनुष्यों को संन्यास-धर्म से ही मोक्ष प्राप्त होता हो, तो समस्त दरिद्रों को ही सबसे पहले मुक्ति प्राप्त हो जाएगी।

श्लोक 52 (skanda.6.147.52)

॥ व्यास उवाच ॥ ॥ गृहस्थधर्मरक्तानां नृणां सन्मार्गगामिनाम् ॥ इह लोकः परश्चैव मनुना संप्रकीर्तितः

vyāsa uvāca gṛhasthadharmaraktānāṁ nṛṇāṁ sanmārgagāminām iha lokaḥ paraścaiva manunā saṁprakīrtitaḥ

व्यास ने कहा — सन्मार्गगामी तथा गृहस्थ-धर्म में रत मनुष्यों के लिए ही मनु ने इस लोक और परलोक दोनों की प्राप्ति बताई है।

श्लोक 53 (skanda.6.147.53)

॥ श्रीशुक उवाच ॥ ॥ गृहगुप्तौ सुगुप्तानां बंधानां बंधुबंधनैः ॥ मोहरागसमावेशात्सन्मार्ग गमनं कुतः

śrīśuka uvāca gṛhaguptau suguptānāṁ baṁdhānāṁ baṁdhubaṁdhanaiḥ moharāgasamāveśātsanmārga gamanaṁ kutaḥ

श्री शुक ने कहा — घर में बंधे हुए, बंधुओं के बंधनों से सुरक्षित रूप से जकड़े हुए, तथा मोह और राग में डूबे हुए लोगों के लिए सन्मार्ग पर चलना कहाँ संभव है?

श्लोक 54 (skanda.6.147.54)

॥ व्यास उवाच ॥ । कष्टं वने निवसतोऽत्र सदा नरस्य नो केवलं निजतनुप्रभवं भवेच्च । दैवं च पित्र्यमखिलं न विभाति कृत्यं तस्माद्गृहे निवसतात्महितं प्रचिन्त्यम्

vyāsa uvāca kaṣṭaṁ vane nivasato'tra sadā narasya no kevalaṁ nijatanuprabhavaṁ bhavecca daivaṁ ca pitryamakhilaṁ na vibhāti kṛtyaṁ tasmādgṛhe nivasatātmahitaṁ pracintyam

व्यास ने कहा — वन में सदा निवास करने वाले मनुष्य को केवल अपने शरीर से उत्पन्न कष्ट ही नहीं होता, बल्कि देव-कार्य और पितृ-कार्य — दोनों ही उसके लिए संभव नहीं रहते; अतः घर में रहते हुए ही अपना कल्याण भलीभाँति सोचना चाहिए।

श्लोक 55 (skanda.6.147.55)

॥ श्रीशुकदेव उवाच ॥ ॥ भावेन भावितमहातपसां मुनीनां तिष्ठन्ति तावदखिलानि तपःफलानि ॥ यत्ते निकाशशरणाः पुरुषा न जातु पश्यंत्यसज्जनमुखानि सुखं तदेव

śrīśukadeva uvāca bhāvena bhāvitamahātapasāṁ munīnāṁ tiṣṭhanti tāvadakhilāni tapaḥphalāni yatte nikāśaśaraṇāḥ puruṣā na jātu paśyaṁtyasajjanamukhāni sukhaṁ tadeva

श्री शुकदेव ने कहा — भाव से युक्त होकर महान तप करने वाले मुनियों के लिए ही उनके तप के समस्त फल स्थिर रहते हैं; उनकी शरण में रहने वाले पुरुष कभी दुर्जनों के मुख नहीं देखते — यही तो सच्चा सुख है।

श्लोक 56 (skanda.6.147.56)

॥ व्यास उवाच ॥ ॥ गृहं परिग्रहः पुंसां गृहस्थाश्रमधर्मिणाम् ॥ इहलोके परे चैव सुखं यच्छति शाश्वतम्

vyāsa uvāca gṛhaṁ parigrahaḥ puṁsāṁ gṛhasthāśramadharmiṇām ihaloke pare caiva sukhaṁ yacchati śāśvatam

व्यास ने कहा — गृहस्थाश्रम-धर्म में रहने वाले पुरुषों के लिए घर तथा परिवार ही इस लोक और परलोक में शाश्वत सुख प्रदान करता है।

श्लोक 57 (skanda.6.147.57)

॥ श्रीशुक उवाच ॥ ॥ शीतं हुताशादपि दैवयोगात्सञ्जायते चन्द्रमसोऽपि तापः ॥ परिग्रहात्सौख्यसमुद्भवोऽत्र भूतोऽभवद्भावि न मर्त्यलोके

śrīśuka uvāca śītaṁ hutāśādapi daivayogātsañjāyate candramaso'pi tāpaḥ parigrahātsaukhyasamudbhavo'tra bhūto'bhavadbhāvi na martyaloke

श्री शुक ने कहा — दैवयोग से अग्नि से भी शीतलता उत्पन्न हो सकती है, और चंद्रमा से भी ताप उत्पन्न हो सकता है, परन्तु इस मर्त्यलोक में परिग्रह से सुख की उत्पत्ति न कभी हुई है, न होती है, न कभी होगी।

श्लोक 58 (skanda.6.147.58)

॥ व्यास उवाच ॥ ॥ सुपुण्यैर्लभ्यते कृच्छ्रान्मानुष्यं भुवि दुर्लभम् ॥ तस्मिँल्लब्धे न किं लब्धं यदि स्याद्गृहधर्मवित्

vyāsa uvāca supuṇyairlabhyate kṛcchrānmānuṣyaṁ bhuvi durlabham tasmi~llabdhe na kiṁ labdhaṁ yadi syādgṛhadharmavit

व्यास ने कहा — पृथ्वी पर दुर्लभ यह मनुष्य-जन्म महान पुण्यों से, कठिनाई से प्राप्त होता है; उसे प्राप्त कर, यदि कोई गृहस्थ-धर्म का ज्ञाता हो जाए, तो फिर उसे क्या प्राप्त नहीं हुआ?

श्लोक 59 (skanda.6.147.59)

॥ श्रीशुकदेव उवाच ॥ ॥ यदि स्याज्ज्ञानसंयुक्तो जन्मकालेत्र मानवः ॥ निजावस्थां समालोक्य तज्ज्ञानं हि विलीयते

śrīśukadeva uvāca yadi syājjñānasaṁyukto janmakāletra mānavaḥ nijāvasthāṁ samālokya tajjñānaṁ hi vilīyate

श्री शुकदेव ने कहा — यदि मनुष्य जन्म के समय ज्ञान से युक्त भी हो, तो अपनी उस गृहस्थ अवस्था को देखकर वह ज्ञान भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 60 (skanda.6.147.60)

॥ व्यास उवाच ॥ ॥ मुदितस्यापि पुत्रस्य गर्दभस्यार्भकस्य च ॥ भस्मलोलस्य लोकस्य शब्दोऽपि रटतो मुदे

vyāsa uvāca muditasyāpi putrasya gardabhasyārbhakasya ca bhasmalolasya lokasya śabdo'pi raṭato mude

व्यास ने कहा — प्रसन्न पुत्र का, गधे के बच्चे का, तथा राख में लोटते हुए बालक का — इनका रोता हुआ स्वर भी लोगों के लिए हर्ष का कारण बनता है।

श्लोक 61 (skanda.6.147.61)

॥ श्रीशुक उवाच ॥ ॥ रसता सर्पता धूलि लोके त्वशुचिना चिरम् ॥ मुनेऽत्र शिशुना लोकस्तुष्टिं याति स बालिशः

śrīśuka uvāca rasatā sarpatā dhūli loke tvaśucinā ciram mune'tra śiśunā lokastuṣṭiṁ yāti sa bāliśaḥ

श्री शुक ने कहा — हे मुने! जो कोई अपवित्र धूल के साथ लंबे समय तक रेंगते हुए शिशु से इस संसार में संतोष पाता है, वह मूर्ख ही है।

श्लोक 62 (skanda.6.147.62)

॥ व्यास उवाच ॥ ॥ पुंनामास्ति महारौद्रो नरको यममन्दिरे ॥ पुत्रहीनो व्रजेत्तत्र तेन पुत्रः प्रशस्यते

vyāsa uvāca puṁnāmāsti mahāraudro narako yamamandire putrahīno vrajettatra tena putraḥ praśasyate

व्यास ने कहा — यम के भवन में "पुं" नामक एक महाभयंकर नरक है, जहाँ पुत्रहीन व्यक्ति जाता है; इसीलिए पुत्र की प्रशंसा की जाती है।

श्लोक 63 (skanda.6.147.63)

॥ श्रीशुक उवाच ॥ ॥ यदि स्यात्पुत्रतः स्वर्गः सर्वेषां स्यान्महामुने ॥ शूकराणां शुनां चैव शलभानां विशेषतः

śrīśuka uvāca yadi syātputrataḥ svargaḥ sarveṣāṁ syānmahāmune śūkarāṇāṁ śunāṁ caiva śalabhānāṁ viśeṣataḥ

श्री शुक ने कहा — हे महामुने! यदि पुत्र होने मात्र से स्वर्ग प्राप्त होता हो, तो सूअरों, कुत्तों तथा विशेष रूप से टिड्डियों तक को भी स्वर्ग प्राप्त हो जाएगा।

श्लोक 64 (skanda.6.147.64)

॥ व्यास उवाच ॥ ॥ पितॄणामनृणो मर्त्यो जायते पुत्रदर्शनात् ॥ पौत्रस्यापि च देवानां प्रपौत्रस्य दिवाश्रयः

vyāsa uvāca pitṝṇāmanṛṇo martyo jāyate putradarśanāt pautrasyāpi ca devānāṁ prapautrasya divāśrayaḥ

व्यास ने कहा — पुत्र के दर्शन से मनुष्य पितरों के ऋण से मुक्त हो जाता है, पौत्र के दर्शन से देवताओं के ऋण से, और प्रपौत्र के दर्शन से स्वर्ग का आश्रय प्राप्त होता है।

श्लोक 65 (skanda.6.147.65)

शुक उवाच ॥ ॥ चिरायुर्ज्जायते गृध्रः संततिं पश्यते निजाम् ॥ क्रमेण संततं किं न स मोक्षं प्रतिपद्यते

śuka uvāca cirāyurjjāyate gṛdhraḥ saṁtatiṁ paśyate nijām krameṇa saṁtataṁ kiṁ na sa mokṣaṁ pratipadyate

शुक ने कहा — गिद्ध दीर्घायु होता है और क्रमशः अपनी संतानों की संतति को भी देख लेता है; तो क्या वह इस प्रकार निरंतर देखते हुए भी मोक्ष को प्राप्त नहीं करता?

श्लोक 66 (skanda.6.147.66)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवमुक्त्वा परित्यज्य पितरं स वनं गतः ॥ मातरं च सुदुःखार्तां प्रलपन्तीमनेकधा

sūta uvāca evamuktvā parityajya pitaraṁ sa vanaṁ gataḥ mātaraṁ ca suduḥkhārtāṁ pralapantīmanekadhā

सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर, अपने पिता को तथा अत्यंत दुःख से पीड़ित होकर बारंबार विलाप करती अपनी माता को त्यागकर, वह वन को चला गया।

श्लोक 67 (skanda.6.147.67)

तं दृष्ट्वा दुःखितो व्यासो निराशः पुत्रदर्शने ॥ पुत्रशोकाभिसंतप्तो भार्यया सहितोऽभवत्

taṁ dṛṣṭvā duḥkhito vyāso nirāśaḥ putradarśane putraśokābhisaṁtapto bhāryayā sahito'bhavat

उसे इस प्रकार जाते देखकर, दुःखी व्यास, अपने पुत्र के फिर से दर्शन की आशा खोकर, पुत्र-शोक से संतप्त होकर अपनी पत्नी के साथ रह गए।

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