नागर खण्ड · अध्याय 148
वटिकेश्वर माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.6.148.1)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवं तं निःस्पृहं ज्ञात्वा गृहं प्रति निजात्मजम् ॥ पिंगला दुःखसंयुक्ता व्यासमेतदुवाच ह
sūta uvāca evaṁ taṁ niḥspṛhaṁ jñātvā gṛhaṁ prati nijātmajam piṁgalā duḥkhasaṁyuktā vyāsametaduvāca ha
सूत जी ने कहा — इस प्रकार अपने पुत्र को घर के प्रति निःस्पृह जानकर, दुःख से भरी पिंगला ने व्यास से यह कहा।
श्लोक 2 (skanda.6.148.2)
अहं तपश्चरिष्यामि पुत्रार्थं द्विजसत्तम ॥ अनुज्ञां देहि मे येन तोषयामि महेश्वरम् ॥ पुत्रो येन भवेन्मह्यं वंशवृद्धिकरः परः
ahaṁ tapaścariṣyāmi putrārthaṁ dvijasattama anujñāṁ dehi me yena toṣayāmi maheśvaram putro yena bhavenmahyaṁ vaṁśavṛddhikaraḥ paraḥ
हे श्रेष्ठ द्विज! मैं पुत्र के लिए तप करूँगी; मुझे आज्ञा दीजिए, जिससे मैं महेश्वर को संतुष्ट कर सकूँ, और जिससे मुझे एक और श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हो, जो वंश की वृद्धि करने वाला हो।
श्लोक 3 (skanda.6.148.3)
एवं सा निश्चयं कृत्वा लब्ध्वानुज्ञां मुनेस्ततः ॥ क्षेत्रमेतत्समासाद्य तपस्तेपे पतिव्रता
evaṁ sā niścayaṁ kṛtvā labdhvānujñāṁ munestataḥ kṣetrametatsamāsādya tapastepe pativratā
इस प्रकार निश्चय करके और मुनि से आज्ञा प्राप्त करके, वह पतिव्रता इस क्षेत्र में आकर तप करने लगी।
श्लोक 4 (skanda.6.148.4)
संस्थाप्य शंकरं देवं तदग्रे निर्मलोदकम् ॥ कृत्वा वापीं सुविस्तीर्णां स्नानात्पातकनाशनीम्
saṁsthāpya śaṁkaraṁ devaṁ tadagre nirmalodakam kṛtvā vāpīṁ suvistīrṇāṁ snānātpātakanāśanīm
उसने भगवान् शंकर की स्थापना करके, उसके सामने निर्मल जल की एक विस्तृत बावड़ी बनाई, जो स्नान करने मात्र से पापों का नाश करने वाली थी।
श्लोक 5 (skanda.6.148.5)
ततस्तस्या गतस्तुष्टिं भगवांस्त्रिपुरांतकः ॥ वरदोऽस्मीति तां प्राह प्रहृष्टेनांतरात्मना
tatastasyā gatastuṣṭiṁ bhagavāṁstripurāṁtakaḥ varado'smīti tāṁ prāha prahṛṣṭenāṁtarātmanā
तत्पश्चात् उससे प्रसन्न होकर, त्रिपुरांतक भगवान् ने अत्यंत हर्षित अंतरात्मा से उससे कहा — मैं वर देने के लिए तत्पर हूँ।
श्लोक 6 (skanda.6.148.6)
॥ श्रीमहादेव उवाच ॥ ॥ परितुष्टोऽस्मि ते भद्रे वरं वरय सुव्रते ॥ यः स्थितो हृदये नित्यं नादेयं विद्यते मम
śrīmahādeva uvāca parituṣṭo'smi te bhadre varaṁ varaya suvrate yaḥ sthito hṛdaye nityaṁ nādeyaṁ vidyate mama
श्री महादेव ने कहा — हे भद्रे! हे सुव्रते! मैं तुमसे परम संतुष्ट हूँ; वर माँगो; जो कुछ भी तुम्हारे हृदय में सदा स्थित है, वह मेरे लिए अदेय नहीं है।
श्लोक 7 (skanda.6.148.7)
॥ वटिकोवाच ॥ ॥ सुतं देहि सुरश्रेष्ठ मम वंशविवर्धनम् ॥ चित्ताह्लादकरं नित्यं सुशीलं विनयान्वितम्
vaṭikovāca sutaṁ dehi suraśreṣṭha mama vaṁśavivardhanam cittāhlādakaraṁ nityaṁ suśīlaṁ vinayānvitam
वटिका ने कहा — हे देवश्रेष्ठ! मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिए, जो मेरे वंश की वृद्धि करने वाला हो, सदा मन को आनंदित करने वाला, सुशील तथा विनययुक्त हो।
श्लोक 8 (skanda.6.148.8)
॥ श्रीमहादेव उवाच ॥ ॥ भविष्यति न संदेहस्तव पुत्रः सुशोभने ॥ यादृक्त्वया महाभागे प्रार्थितस्तद्विशेषतः
śrīmahādeva uvāca bhaviṣyati na saṁdehastava putraḥ suśobhane yādṛktvayā mahābhāge prārthitastadviśeṣataḥ
श्री महादेव ने कहा — हे सुशोभने! तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा, इसमें कोई संदेह नहीं; हे महाभागे! जैसा तुमने विशेष रूप से प्रार्थना की है, वैसा ही होगा।
श्लोक 9 (skanda.6.148.9)
अन्यापि मानुषी याऽत्र वाप्यां स्नात्वा समाहिता ॥ पञ्चम्यां वत्सरं यावच्छुक्लपक्षे ह्युपस्थिते ॥ पूजयिष्यति मल्लिंगं यच्चाद्य स्थापितं त्वया
anyāpi mānuṣī yā'tra vāpyāṁ snātvā samāhitā pañcamyāṁ vatsaraṁ yāvacchuklapakṣe hyupasthite pūjayiṣyati malliṁgaṁ yaccādya sthāpitaṁ tvayā
और भी कोई अन्य स्त्री, यहाँ इस बावड़ी में स्नान करके, एकाग्रचित्त होकर, वर्षभर शुक्ल पक्ष की पंचमी के आने पर, आज तुम्हारे द्वारा स्थापित इस मेरे लिंग की पूजा करेगी —
श्लोक 10 (skanda.6.148.10)
साथ लप्स्यति सत्पुत्रं दत्त्वा फलमनुत्तमम् ॥ या च दौर्भाग्यसंयुक्ता तृतीयादिवसेऽत्र वै
sātha lapsyati satputraṁ dattvā phalamanuttamam yā ca daurbhāgyasaṁyuktā tṛtīyādivase'tra vai
वह इस प्रकार उत्तम फल पाकर एक सुयोग्य पुत्र प्राप्त करेगी। और जो स्त्री दुर्भाग्य से युक्त हो, वह तृतीया के दिन यहाँ —
श्लोक 11 (skanda.6.148.11)
स्नात्वाऽत्र सलिले पश्चान्मल्लिंगं पूजयिष्यति ॥ सा सौभाग्य समोपेता वर्षांते च भविष्यति
snātvā'tra salile paścānmalliṁgaṁ pūjayiṣyati sā saubhāgya samopetā varṣāṁte ca bhaviṣyati
इस जल में स्नान करके, तत्पश्चात् मेरे लिंग की पूजा करेगी, तो वह वर्ष के अंत तक सौभाग्य से युक्त हो जाएगी।
श्लोक 12 (skanda.6.148.12)
यः पुनः पुरुषश्चात्र स्नात्वा मां पूजयिष्यति ॥ सकामो लप्स्यते कामान्विकामो मोक्षमेव च
yaḥ punaḥ puruṣaścātra snātvā māṁ pūjayiṣyati sakāmo lapsyate kāmānvikāmo mokṣameva ca
और जो भी पुरुष यहाँ स्नान करके मेरी पूजा करेगा, वह सकाम हो तो अपनी कामनाओं को प्राप्त करेगा, और निष्काम हो तो मोक्ष को ही प्राप्त करेगा।
श्लोक 13 (skanda.6.148.13)
एवमुक्त्वा महादेवस्ततश्चादर्शनं गतः ॥ साऽपि लेभे सुतं व्यासात्कपिंजलमिति श्रुतम्
evamuktvā mahādevastataścādarśanaṁ gataḥ sā'pi lebhe sutaṁ vyāsātkapiṁjalamiti śrutam
ऐसा कहकर महादेव तत्पश्चात् अंतर्धान हो गए। उसने भी व्यास से "कपिंजल" नामक पुत्र प्राप्त किया, जो प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 14 (skanda.6.148.14)
यादृक्तेन पुरा प्रोक्तो देवदेवेन शूलिना ॥ येनैव स्थापिता चात्र देवी केलीवरी पुरा ॥ सर्वसिद्धिप्रदा लोके तत्र याऽऽराधिता पुरा
yādṛktena purā prokto devadevena śūlinā yenaiva sthāpitā cātra devī kelīvarī purā sarvasiddhipradā loke tatra yā''rādhitā purā
जैसा पहले उस शूलधारी देवाधिदेव द्वारा कहा गया था, वैसा ही हुआ; और उसी के द्वारा यहाँ पूर्वकाल में केलीवरी देवी भी स्थापित की गई थी, जो लोक में समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाली हैं, और जिनकी वहाँ पूर्वकाल में आराधना की गई थी।