नागर खण्ड · अध्याय 149
अन्धकासुरवध-केलीश्वरीप्रादुर्भाव-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.149.1)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ केलीश्वरी च या देवी श्रूयते सूतनंदन ॥ माहात्म्यं वद नस्तस्या उत्पत्तिं च सुविस्तरात्
ṛṣaya ūcuḥ kelīśvarī ca yā devī śrūyate sūtanaṁdana māhātmyaṁ vada nastasyā utpattiṁ ca suvistarāt
ऋषियों ने कहा — हे सूतनंदन! जो देवी केलीश्वरी कही जाती हैं, उनका माहात्म्य तथा उनकी उत्पत्ति हमें विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 2 (skanda.6.149.2)
कस्मिन्काले समुत्पन्ना किमर्थं च सुरेश्वरी ॥। किं तस्या जायते श्रेयः पूजया नमनेन च
kasminkāle samutpannā kimarthaṁ ca sureśvarī kiṁ tasyā jāyate śreyaḥ pūjayā namanena ca
वह देवेश्वरी किस काल में और किस प्रयोजन से उत्पन्न हुईं? उनकी पूजा और नमन से कौन सा कल्याण प्राप्त होता है?
श्लोक 3 (skanda.6.149.3)
त्वया कात्यायनी प्रोक्ता चामुण्डा च सुरेश्वरी ॥ श्रीमाता च समुत्पन्ना किमर्थं च सुरेश्वरी
tvayā kātyāyanī proktā cāmuṇḍā ca sureśvarī śrīmātā ca samutpannā kimarthaṁ ca sureśvarī
आपने कात्यायनी, चामुण्डा तथा देवेश्वरी श्रीमाता की उत्पत्ति के विषय में बताया है — वे देवेश्वरी किस प्रयोजन से उत्पन्न हुईं?
श्लोक 4 (skanda.6.149.4)
श्रीमाता च तथा तारा देवी शत्रुविनाशिनी ॥ केलीश्वरी न संप्रोक्ता तस्मात्तां वद सांप्रतम्
śrīmātā ca tathā tārā devī śatruvināśinī kelīśvarī na saṁproktā tasmāttāṁ vada sāṁpratam
श्रीमाता, तथा शत्रुओं का नाश करने वाली देवी तारा — इनके विषय में तो कहा गया, परंतु केलीश्वरी के विषय में नहीं कहा गया; अतः अब उनके विषय में बताइए।
श्लोक 5 (skanda.6.149.5)
कौतुकं नः समुत्पन्नमत्रार्थे सूतनंदन
kautukaṁ naḥ samutpannamatrārthe sūtanaṁdana
हे सूतनंदन! इस विषय में हमें बड़ा कुतूहल उत्पन्न हुआ है।
श्लोक 6 (skanda.6.149.6)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ आद्यैका देवता लोके बहुरूपा व्यवस्थिता ॥ देवतानां हितार्थाय दैत्यपक्षक्षयाय च
sūta uvāca ādyaikā devatā loke bahurūpā vyavasthitā devatānāṁ hitārthāya daityapakṣakṣayāya ca
सूत जी ने कहा — संसार में एक ही आद्य देवता अनेक रूपों में स्थित है, देवताओं के हित के लिए तथा दैत्यपक्ष के नाश के लिए।
श्लोक 7 (skanda.6.149.7)
यदायदात्र देवानां व्यसनं जायते क्वचित् ॥ तदातदा परा शक्तिर्या सा व्याप्य व्यवस्थिता
yadāyadātra devānāṁ vyasanaṁ jāyate kvacit tadātadā parā śaktiryā sā vyāpya vyavasthitā
जब-जब भी देवताओं पर कोई विपत्ति आती है, तब-तब वह परम शक्ति ही व्याप्त होकर स्थित हो जाती है।
श्लोक 8 (skanda.6.149.8)
सर्वमेतज्जगद्धात्री जन्म चक्रे धरातले ॥ महिषासुरनाशाय सा च कात्यायनी भुवि
sarvametajjagaddhātrī janma cakre dharātale mahiṣāsuranāśāya sā ca kātyāyanī bhuvi
वह सम्पूर्ण जगत् की धात्री ने पृथ्वीतल पर जन्म लिया — महिषासुर के नाश के लिए वह भूमि पर कात्यायनी बनकर अवतरित हुई।
श्लोक 9 (skanda.6.149.9)
अवतीर्णा परा मूर्तिर्गतास्मिन्भुवनत्रये ॥ यदा शुंभनिक्षंभौ च दानवौ बलदर्पितौ
avatīrṇā parā mūrtirgatāsminbhuvanatraye yadā śuṁbhanikṣaṁbhau ca dānavau baladarpitau
वह परम मूर्ति इस त्रिभुवन में अवतरित हुई; जब बल के अभिमान से मत्त शुंभ और निशुंभ दोनों दानव उत्पन्न हुए —
श्लोक 10 (skanda.6.149.10)
अवतीर्णा तदा सैव चामुंडा रूपमाश्रिता ॥ प्रोद्गते कालयवने सर्वदेवभयावहे
avatīrṇā tadā saiva cāmuṁḍā rūpamāśritā prodgate kālayavane sarvadevabhayāvahe
तब वही चामुण्डा रूप धारण करके अवतरित हुई; और जब समस्त देवताओं को भयभीत करने वाला कालयवन उत्पन्न हुआ —
श्लोक 11 (skanda.6.149.11)
श्रीमातारूपिणी देवी सैव जाता महीतले ॥ अंधासुरवधार्थाय शंभुनाऽऽक्रांतचेतसा ॥ सृष्टा केलीवरी देवी यया व्याप्तमिदं जगत्
śrīmātārūpiṇī devī saiva jātā mahītale aṁdhāsuravadhārthāya śaṁbhunā''krāṁtacetasā sṛṣṭā kelīvarī devī yayā vyāptamidaṁ jagat
वही देवी श्रीमाता के रूप में पृथ्वी पर उत्पन्न हुई। और अंधकासुर के वध के लिए, शंभु द्वारा, आक्रांत चित्त होकर, केलीवरी देवी रची गई, जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है।
श्लोक 12 (skanda.6.149.12)
ततस्तस्याः प्रभावेन हत्वा दैत्यानशेषतः ॥ अन्धको निहतः पश्चात्त्रैलोक्यव्यसनप्रदः
tatastasyāḥ prabhāvena hatvā daityānaśeṣataḥ andhako nihataḥ paścāttrailokyavyasanapradaḥ
तत्पश्चात् उसके प्रभाव से समस्त दैत्यों का वध करके, त्रैलोक्य को संकट में डालने वाला अंधक भी अंत में मारा गया।
श्लोक 13 (skanda.6.149.13)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ अन्धकः कस्य पुत्रोऽयं किंप्रभावः कथं हतः ॥ कस्माद्धतस्तु संग्रामे सर्वं विस्तरतो वद
ṛṣaya ūcuḥ andhakaḥ kasya putro'yaṁ kiṁprabhāvaḥ kathaṁ hataḥ kasmāddhatastu saṁgrāme sarvaṁ vistarato vada
ऋषियों ने कहा — यह अंधक किसका पुत्र था? उसका क्या प्रभाव था? वह कैसे मारा गया? युद्ध में किसके द्वारा वह मारा गया — यह सब विस्तार से बताइए।
श्लोक 14 (skanda.6.149.14)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ दक्षस्य दुहिता नाम्ना दितिः सर्वगुणालया ॥ हिरण्यकशिपुर्नाम तस्याः पुत्रो बभूव ह
sūta uvāca dakṣasya duhitā nāmnā ditiḥ sarvaguṇālayā hiraṇyakaśipurnāma tasyāḥ putro babhūva ha
सूत जी ने कहा — दक्ष की पुत्री, समस्त गुणों की आश्रयस्थली दिति के, हिरण्यकशिपु नामक पुत्र हुआ।
श्लोक 15 (skanda.6.149.15)
येन शक्रादयो देवा जिताः सर्वे रणाजिरे ॥ स्वर्गे राज्यं कृतं भूरि स्वयमेव महात्मना
yena śakrādayo devā jitāḥ sarve raṇājire svarge rājyaṁ kṛtaṁ bhūri svayameva mahātmanā
जिसने युद्धभूमि में शक्र आदि समस्त देवताओं को जीत लिया, और उस महात्मा ने स्वयं ही स्वर्ग में विशाल राज्य किया।
श्लोक 16 (skanda.6.149.16)
यद्भयात्सकलैर्देवैर्नानाशस्त्राण्यनेकशः ॥ निर्मितान्यतिमुख्यानि वर्मचर्मयुतानि च
yadbhayātsakalairdevairnānāśastrāṇyanekaśaḥ nirmitānyatimukhyāni varmacarmayutāni ca
जिसके भय से समस्त देवताओं ने कवच और ढाल सहित अनेक प्रकार के अत्यंत उत्कृष्ट शस्त्र बनवाए —
श्लोक 17 (skanda.6.149.17)
स्वयं विदारितो यश्च विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ करजैर्जानुनि पृष्ठे विनिधाय प्रकोपतः
svayaṁ vidārito yaśca viṣṇunā prabhaviṣṇunā karajairjānuni pṛṣṭhe vinidhāya prakopataḥ
वही अंततः स्वयं ही प्रभुशाली विष्णु द्वारा फाड़ डाला गया, जिन्होंने क्रोधपूर्वक उसे अपने घुटने की पीठ पर रखकर, अपने नखों से विदीर्ण किया।
श्लोक 18 (skanda.6.149.18)
तस्य पुत्रद्वयं जज्ञ वीर्यौदार्यगुणान्वितम् ॥ ज्येष्ठः प्रह्लाद इत्युक्तो द्वितीयश्चांधकस्तथा
tasya putradvayaṁ jajña vīryaudāryaguṇānvitam jyeṣṭhaḥ prahlāda ityukto dvitīyaścāṁdhakastathā
उसके दो पुत्र, शौर्य और औदार्य के गुणों से युक्त, उत्पन्न हुए — ज्येष्ठ प्रह्लाद कहलाया, और दूसरा अंधक।
श्लोक 19 (skanda.6.149.19)
हिरण्यकशिपौ प्राप्ते मृत्युलोकं सुहृद्गणैः ॥ अमात्यैश्च ततः प्रोक्तः प्रह्लादो विनयान्वितैः
hiraṇyakaśipau prāpte mṛtyulokaṁ suhṛdgaṇaiḥ amātyaiśca tataḥ proktaḥ prahlādo vinayānvitaiḥ
हिरण्यकशिपु के मृत्यु को प्राप्त होने पर, तत्पश्चात् विनययुक्त मित्रों तथा मंत्रियों द्वारा प्रह्लाद से यह कहा गया।
श्लोक 20 (skanda.6.149.20)
पितृपैतामहं राज्यमेतदाचर सांप्रतम् ॥ धुरं वहस्व राज्योत्थां देवान्युद्धे निपातय
pitṛpaitāmahaṁ rājyametadācara sāṁpratam dhuraṁ vahasva rājyotthāṁ devānyuddhe nipātaya
उन्होंने कहा — अब आप इस पैतृक-पैतामह राज्य का शासन कीजिए; राज्य का भार वहन कीजिए, और युद्ध में देवताओं को परास्त कीजिए।
श्लोक 21 (skanda.6.149.21)
॥ प्रह्राद उवाच ॥ ॥ नाहं राज्यं करिष्यामि कथंचिदपि भूतले ॥ यतस्ततो निबोधध्वं वचनं मम सांप्रतम्
prahrāda uvāca nāhaṁ rājyaṁ kariṣyāmi kathaṁcidapi bhūtale yatastato nibodhadhvaṁ vacanaṁ mama sāṁpratam
प्रह्लाद ने कहा — मैं इस पृथ्वीतल पर किसी भी प्रकार राज्य नहीं करूँगा; इसका कारण मेरे इस वचन से अभी जान लो।
श्लोक 22 (skanda.6.149.22)
दैत्यराज्यं न वांछंति देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ तेषां रक्षाकरो नित्यं विष्णुः स भगवान्स्वयम्
daityarājyaṁ na vāṁchaṁti devāḥ śakrapurogamāḥ teṣāṁ rakṣākaro nityaṁ viṣṇuḥ sa bhagavānsvayam
देवता, शक्र को आगे रखकर, दैत्य-राज्य नहीं चाहते; और उनकी रक्षा करने वाले सदा स्वयं भगवान् विष्णु ही हैं।
श्लोक 23 (skanda.6.149.23)
अप्यहं सन्त्यजे प्राणान्सर्वस्वं वा न संशयः ॥ हरिणा सह संग्रामं नाहं कर्तुमहो क्षमः
apyahaṁ santyaje prāṇānsarvasvaṁ vā na saṁśayaḥ hariṇā saha saṁgrāmaṁ nāhaṁ kartumaho kṣamaḥ
चाहे मैं अपने प्राण त्याग दूँ, या अपना सर्वस्व — इसमें कोई संदेह नहीं — फिर भी मैं हरि के साथ युद्ध करने में समर्थ नहीं हूँ।
श्लोक 24 (skanda.6.149.24)
यो मयाऽभ्यर्चितो नित्यं प्रणतश्च सुरेश्वरः ॥ न तेन सहितो युद्धं करिष्यामि कथञ्चन
yo mayā'bhyarcito nityaṁ praṇataśca sureśvaraḥ na tena sahito yuddhaṁ kariṣyāmi kathañcana
जिस देवेश्वर की मैं सदा पूजा करता हूँ और जिनके सम्मुख नत रहता हूँ, उनके साथ मैं किसी भी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा।
श्लोक 25 (skanda.6.149.25)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ प्रह्लादेन च संत्यक्ते राज्ये पितृसमुद्भवे ॥ अन्धकः स्थापितस्तत्र संमंत्र्य सचिवैर्मिथः
sūta uvāca prahlādena ca saṁtyakte rājye pitṛsamudbhave andhakaḥ sthāpitastatra saṁmaṁtrya sacivairmithaḥ
सूत जी ने कहा — प्रह्लाद द्वारा उस पैतृक राज्य के त्याग दिए जाने पर, मंत्रियों के साथ आपस में मंत्रणा करके, वहाँ अंधक को स्थापित किया गया।
श्लोक 26 (skanda.6.149.26)
हिरण्यकशिपोः पुत्रो देवदानवदर्पहा ॥ सोऽपि राज्यममात्येभ्यो निधाय तदनन्तरम्
hiraṇyakaśipoḥ putro devadānavadarpahā so'pi rājyamamātyebhyo nidhāya tadanantaram
हिरण्यकशिपु का वह पुत्र, देवों और दानवों दोनों के दर्प को नष्ट करने वाला, राज्य को मंत्रियों को सौंपकर, तत्पश्चात् —
श्लोक 27 (skanda.6.149.27)
तपश्चक्रे चिरं कालं ध्यायमानः पितामहम् ॥ त्यक्त्वा कामं तथा क्रोधं दंभं मत्सरमेव च
tapaścakre ciraṁ kālaṁ dhyāyamānaḥ pitāmaham tyaktvā kāmaṁ tathā krodhaṁ daṁbhaṁ matsarameva ca
दीर्घकाल तक ब्रह्मा का ध्यान करते हुए तप करने लगा, काम, क्रोध, दंभ तथा मत्सर को त्यागकर।
श्लोक 28 (skanda.6.149.28)
जितेंद्रियः सुशांतात्मा समः सर्वेषु जन्तुषु ॥ वृक्षमूलाश्रयः शांतः संतुष्टेनांतरात्मना
jiteṁdriyaḥ suśāṁtātmā samaḥ sarveṣu jantuṣu vṛkṣamūlāśrayaḥ śāṁtaḥ saṁtuṣṭenāṁtarātmanā
वह जितेंद्रिय, परम शांत-चित्त, समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रखने वाला, वृक्षमूल का आश्रय लेने वाला, शांत, तथा संतुष्ट अंतरात्मा वाला बन गया।
श्लोक 29 (skanda.6.149.29)
यावद्वर्षसहस्रांतं फलाहारो बभूव ह ॥ शीर्णपर्णाशनाहारो यावद्वर्षसहस्रकम्
yāvadvarṣasahasrāṁtaṁ phalāhāro babhūva ha śīrṇaparṇāśanāhāro yāvadvarṣasahasrakam
वह एक सहस्र वर्ष तक फलाहारी रहा, और फिर एक और सहस्र वर्ष तक झरे हुए पत्तों का आहार करने वाला रहा।
श्लोक 30 (skanda.6.149.30)
ध्यायमानो दिवानक्तं देवदेवं पितामहम् ॥ वायुभक्षस्ततो जज्ञे तावत्कालं द्विजोत्तमाः
dhyāyamāno divānaktaṁ devadevaṁ pitāmaham vāyubhakṣastato jajñe tāvatkālaṁ dvijottamāḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! दिन-रात देवाधिदेव ब्रह्मा का ध्यान करते हुए, तत्पश्चात् वह उतने ही समय तक केवल वायु का आहार करने वाला हो गया।
श्लोक 31 (skanda.6.149.31)
ततो वर्षसहस्रांते चतुर्थे समुपस्थिते ॥ तमुवाच स्वयं ब्रह्मा स्वयमभ्येत्य हर्षितः
tato varṣasahasrāṁte caturthe samupasthite tamuvāca svayaṁ brahmā svayamabhyetya harṣitaḥ
तत्पश्चात् चौथे सहस्र वर्ष के आने पर, स्वयं ब्रह्मा प्रसन्न होकर स्वयं उसके पास आए और उससे कहा।
श्लोक 32 (skanda.6.149.32)
॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ परितुष्टोऽस्मि ते वत्स वरं वरय सुव्रत ॥ तुष्टोऽहं ते प्रदास्यामि यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
brahmovāca parituṣṭo'smi te vatsa varaṁ varaya suvrata tuṣṭo'haṁ te pradāsyāmi yadyapi syātsudurlabham
ब्रह्मा ने कहा — हे वत्स! हे सुव्रत! मैं तुमसे परम संतुष्ट हूँ; वर माँगो; मैं संतुष्ट होकर तुम्हें वह प्रदान करूँगा, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।
श्लोक 33 (skanda.6.149.33)
॥ अन्धक उवाच ॥ ॥ यदि यच्छसि मे ब्रह्मन्वरं मनसि वांछितम् ॥ जरामरणनाशाय दीयतां सुरसत्तम
andhaka uvāca yadi yacchasi me brahmanvaraṁ manasi vāṁchitam jarāmaraṇanāśāya dīyatāṁ surasattama
अंधक ने कहा — हे ब्रह्मन्! यदि आप मुझे मेरे मन में इच्छित वर देना चाहते हैं, तो हे देवश्रेष्ठ! मुझे जरा और मृत्यु के नाश के लिए वर दीजिए।
श्लोक 34 (skanda.6.149.34)
॥ श्रीब्रह्मोवाच ॥ ॥ न कश्चिच्च जराहीनो विद्यतेऽत्र धरातले ॥ मरणेन विना नैव यस्य जन्म भवेत्क्षितौ
śrībrahmovāca na kaścicca jarāhīno vidyate'tra dharātale maraṇena vinā naiva yasya janma bhavetkṣitau
श्री ब्रह्मा ने कहा — इस पृथ्वीतल पर कोई भी जरा से रहित नहीं है, और जिसका जन्म पृथ्वी पर हुआ हो, उसकी मृत्यु के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।
श्लोक 35 (skanda.6.149.35)
तथापि तव दास्यामि बहुधर्मरतस्य च ॥ तस्मात्कुरु महाभाग राज्यं गत्वा निजं गृहम्
tathāpi tava dāsyāmi bahudharmaratasya ca tasmātkuru mahābhāga rājyaṁ gatvā nijaṁ gṛham
फिर भी, तुम बहुत से धर्म-कार्यों में रत हो, इसलिए मैं तुम्हें कुछ प्रदान करूँगा; अतः हे महाभाग! अपने घर जाकर राज्य करो।
श्लोक 36 (skanda.6.149.36)
भवेद्बहुफलं राज्यं श्मशानं भवनं यथा ॥ बहुकण्टकसंकीर्णं क्रूरकर्मभिरावृतम्
bhavedbahuphalaṁ rājyaṁ śmaśānaṁ bhavanaṁ yathā bahukaṇṭakasaṁkīrṇaṁ krūrakarmabhirāvṛtam
मैं वरदान देता हूँ कि यह राज्य अत्यंत फलदायी होगा, जैसे कोई श्मशान-भवन; अनेक कंटकों से भरा हुआ, तथा क्रूर कर्मों से आवृत।
श्लोक 37 (skanda.6.149.37)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवमुक्त्वा चतुर्वक्त्रस्ततश्चादर्शनं गतः ॥ कस्यचित्त्वथ कालस्य प्रेरितः कालधर्मणा ॥ प्रोवाच सचिवान्सोऽथ पितुर्वैरमनुस्मरन्
sūta uvāca evamuktvā caturvaktrastataścādarśanaṁ gataḥ kasyacittvatha kālasya preritaḥ kāladharmaṇā provāca sacivānso'tha piturvairamanusmaran
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर चतुर्मुख ब्रह्मा तत्पश्चात् अंतर्धान हो गए। कुछ समय बाद, काल के नियम से प्रेरित होकर, उसने अपने पिता के वैर का स्मरण करते हुए अपने मंत्रियों से कहा।
श्लोक 38 (skanda.6.149.38)
॥ अन्धक उवाच ॥ ॥ पितास्माकं हतो देवैः पितृव्यश्च महाबलः ॥ कपटेन न शौर्येण तस्मात्तान्सूदयाम्यहम्
andhaka uvāca pitāsmākaṁ hato devaiḥ pitṛvyaśca mahābalaḥ kapaṭena na śauryeṇa tasmāttānsūdayāmyaham
अंधक ने कहा — हमारे पिता तथा महाबली चाचा देवताओं द्वारा कपट से मारे गए, वीरता से नहीं; अतः मैं उन्हें नष्ट कर दूँगा।
श्लोक 39 (skanda.6.149.39)
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न कृत्यैः सुशंसितैः ॥ प्राकट्यं याति सर्वत्र वंशस्याग्रे ध्वजो यथा
ko'rthaḥ putreṇa jātena yo na kṛtyaiḥ suśaṁsitaiḥ prākaṭyaṁ yāti sarvatra vaṁśasyāgre dhvajo yathā
उस उत्पन्न हुए पुत्र से क्या लाभ, जो अपने प्रशंसनीय कार्यों से सर्वत्र प्रसिद्धि को प्राप्त न हो, जैसे वंश के आगे ध्वज हो?
श्लोक 40 (skanda.6.149.40)
॥ मंत्रिण ऊचुः ॥ ॥ युक्तमेतन्महाभाग यत्त्वया व्याहृतं वचः ॥ वध्याःस्युर्विबुधाः सर्वे येऽस्माकं परिपंथिनः
maṁtriṇa ūcuḥ yuktametanmahābhāga yattvayā vyāhṛtaṁ vacaḥ vadhyāḥsyurvibudhāḥ sarve ye'smākaṁ paripaṁthinaḥ
मंत्रियों ने कहा — हे महाभाग! आपने जो यह वचन कहा है, वह उचित है; समस्त देवता, जो हमारे विरोधी हैं, वध्य होने चाहिए।
श्लोक 41 (skanda.6.149.41)
अस्माकं खल्विमे लोकाः के देवाः के द्विजातयः ॥ यज्ञभागान्हरिष्यामो हत्वा शक्रमुखान्सुरान्
asmākaṁ khalvime lokāḥ ke devāḥ ke dvijātayaḥ yajñabhāgānhariṣyāmo hatvā śakramukhānsurān
ये सभी लोक तो वस्तुतः हमारे ही हैं — देवता क्या हैं, ब्राह्मण क्या हैं? हम शक्र आदि देवताओं को मारकर उनके यज्ञ-भाग हर लेंगे।
श्लोक 42 (skanda.6.149.42)
एवं ते समयं कृत्वा सैन्येन महतान्विताः ॥ प्रजग्मुस्त्वरितास्तत्र यत्र शक्रो व्यवस्थितः
evaṁ te samayaṁ kṛtvā sainyena mahatānvitāḥ prajagmustvaritāstatra yatra śakro vyavasthitaḥ
इस प्रकार निश्चय करके, विशाल सेना से युक्त होकर, वे शीघ्रता से वहाँ चल पड़े, जहाँ इंद्र स्थित थे।
श्लोक 43 (skanda.6.149.43)
शक्रोऽपि दानवानीकं दृष्ट्वा तान्सहसागतान्॥ आरुह्यैरावणं नागं युद्धार्थं निर्ययौ तदा
śakro'pi dānavānīkaṁ dṛṣṭvā tānsahasāgatān āruhyairāvaṇaṁ nāgaṁ yuddhārthaṁ niryayau tadā
इंद्र भी उन दानव-सेना को अचानक आया हुआ देखकर, ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर युद्ध के लिए निकल पड़ा।
श्लोक 44 (skanda.6.149.44)
सह देवगणैः सर्वैर्वसुरुद्रार्कपूर्वकैः ॥ एतस्मिन्नंतरे शक्रो वज्रं रौद्रतमं च यत्
saha devagaṇaiḥ sarvairvasurudrārkapūrvakaiḥ etasminnaṁtare śakro vajraṁ raudratamaṁ ca yat
वसु, रुद्र और आदित्य आदि समस्त देवगणों के साथ। इसी बीच इंद्र ने अपने उस अत्यंत भयंकर वज्र को —
श्लोक 45 (skanda.6.149.45)
समुद्दिश्यांधकं तस्मै मुमोच परवीरहा॥ स हतस्तेन वज्रेण विहस्य दनुजोत्तमः
samuddiśyāṁdhakaṁ tasmai mumoca paravīrahā sa hatastena vajreṇa vihasya danujottamaḥ
उस शत्रु-वीरों के नाशक ने अंधक को लक्ष्य बनाकर छोड़ा; उस वज्र से मारा जाकर भी वह श्रेष्ठ दनुज हँस पड़ा।
श्लोक 46 (skanda.6.149.46)
शक्रं प्रोवाच संहृष्टस्तारनादेन संयुगे ॥ दृष्टं बाहुबलं शक्र तवाद्य सुचिरान्मया
śakraṁ provāca saṁhṛṣṭastāranādena saṁyuge dṛṣṭaṁ bāhubalaṁ śakra tavādya sucirānmayā
उसने अत्यंत हर्षित होकर, युद्ध में ऊँचे स्वर से इंद्र से कहा — हे शक्र! आज बहुत समय के बाद मैंने तुम्हारे भुजबल को देखा।
श्लोक 47 (skanda.6.149.47)
अधुना पश्य चास्माकं त्वमेव बलसूदन
adhunā paśya cāsmākaṁ tvameva balasūdana
अब हे बलसूदन! तुम भी हमारा बल देखो।
श्लोक 48 (skanda.6.149.48)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवमुक्त्वाथ चाविध्य गदां गुर्वीं मुमोच ह ॥ शतघंटामहारावां निर्मितां विश्वकर्मणा
sūta uvāca evamuktvātha cāvidhya gadāṁ gurvīṁ mumoca ha śataghaṁṭāmahārāvāṁ nirmitāṁ viśvakarmaṇā
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर उसने विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, सैकड़ों घंटियों की महाध्वनि वाली एक भारी गदा को घुमाकर छोड़ा।
श्लोक 49 (skanda.6.149.49)
सर्वायसमयीं गुर्वीं यमजिह्वाभिवापराम् ॥ शतहस्तां प्रमाणेन प्राणिनां भयवर्द्धिनीम्
sarvāyasamayīṁ gurvīṁ yamajihvābhivāparām śatahastāṁ pramāṇena prāṇināṁ bhayavarddhinīm
वह पूर्णतः लोहे की बनी, भारी, यम की जिह्वा के समान अत्यंत विकराल, सौ हाथ लंबी, और प्राणियों में भय बढ़ाने वाली थी।
श्लोक 50 (skanda.6.149.50)
तया विनिहतः शक्रो मूर्छाव्याकुलितेंद्रियः ॥ ध्वजयष्टिं समाश्रित्य निविष्टो गजमूर्द्धनि
tayā vinihataḥ śakro mūrchāvyākuliteṁdriyaḥ dhvajayaṣṭiṁ samāśritya niviṣṭo gajamūrddhani
उससे आहत होकर इंद्र, मूर्च्छा से व्याकुल इंद्रियों वाला होकर, ध्वज-दंड का सहारा लेकर हाथी के सिर पर ही बैठ गया।
श्लोक 51 (skanda.6.149.51)
अथ संमूर्छितं दृष्ट्वा शक्रं स्कन्दः प्रकोपितः ॥ मुमोचाथ निजां शक्तिममोघां वज्रसंनिभाम्
atha saṁmūrchitaṁ dṛṣṭvā śakraṁ skandaḥ prakopitaḥ mumocātha nijāṁ śaktimamoghāṁ vajrasaṁnibhām
तब इंद्र को मूर्च्छित देखकर, क्रोधित हुए स्कंद ने अपनी अमोघ, वज्र के समान शक्ति छोड़ी।
श्लोक 52 (skanda.6.149.52)
तामायांतीं समालोक्य दानवो निशितैः शरैः ॥ प्रतिलोमां ततश्चक्रे लीलयैव महाबलः
tāmāyāṁtīṁ samālokya dānavo niśitaiḥ śaraiḥ pratilomāṁ tataścakre līlayaiva mahābalaḥ
उस आती हुई शक्ति को देखकर, उस महाबली दानव ने तीक्ष्ण बाणों से उसे लीलामात्र में ही विपरीत दिशा में मोड़ दिया।
श्लोक 53 (skanda.6.149.53)
ततः स्कन्दोऽपि संगृह्य चापं तं प्रति सायकान्॥ मुमोचाशीविषाकाराल्लँघ्वस्त्रं तस्य दर्शयन्
tataḥ skando'pi saṁgṛhya cāpaṁ taṁ prati sāyakān mumocāśīviṣākārālla~ghvastraṁ tasya darśayan
तत्पश्चात् स्कंद ने भी धनुष उठाकर, उसके विरुद्ध विषधर सर्पों के समान बाण छोड़े, उसे अपने लघु अस्त्र की शक्ति दिखाते हुए।
श्लोक 54 (skanda.6.149.54)
एतस्मिन्नन्तरे देवाः सर्वे शस्त्रप्रवृष्टिभिः ॥ समंताच्छादयामासुर्दानवानामनीकिनीम्
etasminnantare devāḥ sarve śastrapravṛṣṭibhiḥ samaṁtācchādayāmāsurdānavānāmanīkinīm
इसी बीच समस्त देवताओं ने शस्त्रों की वर्षा से चारों ओर से दानवों की सेना को ढँक दिया।
श्लोक 55 (skanda.6.149.55)
ततस्तु दानवाः सर्वे देवतानामनीकिनीम्॥ प्रहारैः पीडयामासुर्दुद्रुवुस्ते दिवौकसः
tatastu dānavāḥ sarve devatānāmanīkinīm prahāraiḥ pīḍayāmāsurdudruvuste divaukasaḥ
तत्पश्चात् समस्त दानवों ने देवताओं की सेना को अपने प्रहारों से पीड़ित कर दिया, जिससे वे स्वर्गवासी भाग खड़े हुए।
श्लोक 56 (skanda.6.149.56)
ततो भग्नान्सुरान्दृष्ट्वा सगणो वृषवाहनः ॥ दर्शयामास चात्मानं देवानाश्वासयन्निव
tato bhagnānsurāndṛṣṭvā sagaṇo vṛṣavāhanaḥ darśayāmāsa cātmānaṁ devānāśvāsayanniva
तब देवताओं को पराजित हुआ देखकर, अपने गणों सहित वृषभवाहन ने, मानो देवताओं को धीरज बंधाते हुए, स्वयं प्रकट होकर दर्शन दिया।
श्लोक 57 (skanda.6.149.57)
मा भैष्ट देवताः सर्वाः पश्यध्वं मद्विचेष्टितम् ॥ इत्युक्त्वा भगवाञ्छम्भुर्मंत्रैराथर्वणैस्तदा
mā bhaiṣṭa devatāḥ sarvāḥ paśyadhvaṁ madviceṣṭitam ityuktvā bhagavāñchambhurmaṁtrairātharvaṇaistadā
उन्होंने कहा — हे समस्त देवताओ! भयभीत मत होओ, मेरा यह पराक्रम देखो। ऐसा कहकर भगवान् शंभु ने तब आथर्वण मंत्रों द्वारा —
श्लोक 58 (skanda.6.149.58)
आह्वयामास विश्वेशां परां शक्तिमनुत्तमाम्॥ आहूता परमा शक्तिर्जगाम हरसंनिधिम्
āhvayāmāsa viśveśāṁ parāṁ śaktimanuttamām āhūtā paramā śaktirjagāma harasaṁnidhim
विश्व की स्वामिनी, परम अनुत्तम शक्ति का आह्वान किया। आहूत होकर वह परम शक्ति शिव के समीप आ गई।
श्लोक 59 (skanda.6.149.59)
दृष्ट्वा तामग्रतः प्राप्तां सर्वैदेवैः समन्वितः ॥ अस्तावीत्प्रणतो भूत्वा स्तोत्रेणानेन भक्तितः
dṛṣṭvā tāmagrataḥ prāptāṁ sarvaidevaiḥ samanvitaḥ astāvītpraṇato bhūtvā stotreṇānena bhaktitaḥ
उसे अपने सामने आई हुई देखकर, समस्त देवताओं के साथ, उन्होंने प्रणत होकर इस स्तोत्र द्वारा भक्तिपूर्वक उसकी स्तुति की।
श्लोक 60 (skanda.6.149.60)
॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ नमस्ते देवदेवेशि नमस्ते भक्तिवल्लभे ॥ सर्वगे सर्वदे देवि नमस्ते विश्वधारिणि
śrībhagavānuvāca namaste devadeveśi namaste bhaktivallabhe sarvage sarvade devi namaste viśvadhāriṇi
भगवान् ने कहा — हे देवाधिदेवेश्वरी! तुम्हें नमस्कार है। हे भक्ति की प्रियतमा! तुम्हें नमस्कार है। हे सर्वव्यापिनी, सर्वदात्री देवि! हे विश्व को धारण करने वाली! तुम्हें नमस्कार है।
श्लोक 61 (skanda.6.149.61)
नमस्ते शक्तिरूपेण सृष्टिप्रलयकारिणि ॥ नमस्ते प्रभया युक्ते विद्युज्ज्वलितकुण्डले
namaste śaktirūpeṇa sṛṣṭipralayakāriṇi namaste prabhayā yukte vidyujjvalitakuṇḍale
सृष्टि और प्रलय करने वाले शक्ति-रूप को नमस्कार है; प्रभा से युक्त, बिजली के समान चमकते कुंडलों वाली को नमस्कार है।
श्लोक 62 (skanda.6.149.62)
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा देवि त्वं सृष्टिस्त्वं शुचिर्धृतिः ॥ अरुंधती तथेंद्राणी त्वं लक्ष्मीस्त्वं च पार्वती
tvaṁ svāhā tvaṁ svadhā devi tvaṁ sṛṣṭistvaṁ śucirdhṛtiḥ aruṁdhatī tatheṁdrāṇī tvaṁ lakṣmīstvaṁ ca pārvatī
हे देवि! तुम ही स्वाहा हो, तुम ही स्वधा हो, तुम ही सृष्टि हो, तुम ही पवित्रता हो, तुम ही धृति हो; तुम ही अरुंधती हो, तुम ही इंद्राणी हो, तुम ही लक्ष्मी हो, और तुम ही पार्वती हो।
श्लोक 63 (skanda.6.149.63)
यत्किंचित्स्त्रीस्वरूपं च समस्तं भुवनत्रये॥ तत्सर्वं त्वत्स्वरूपं स्यादिति शास्त्रेषु निश्चयः
yatkiṁcitstrīsvarūpaṁ ca samastaṁ bhuvanatraye tatsarvaṁ tvatsvarūpaṁ syāditi śāstreṣu niścayaḥ
तीनों लोकों में जो कुछ भी स्त्री-स्वरूप है, वह सब तुम्हारा ही स्वरूप है — शास्त्रों में यही निश्चय किया गया है।
श्लोक 64 (skanda.6.149.64)
॥ श्रीदेव्युवाच ॥ ॥ किमर्थं च समाहूता त्वयाहं वृषवाहन ॥ मंत्रैराथर्वणै रौद्रैस्तत्सर्वं मे प्रकीर्तय
śrīdevyuvāca kimarthaṁ ca samāhūtā tvayāhaṁ vṛṣavāhana maṁtrairātharvaṇai raudraistatsarvaṁ me prakīrtaya
श्री देवी ने कहा — हे वृषभवाहन! तुमने मुझे इन भयंकर आथर्वण मंत्रों द्वारा किस प्रयोजन से बुलाया है? वह सब मुझे बताओ।
श्लोक 65 (skanda.6.149.65)
येन ते कृत्स्नशः कृत्यं प्रकरोमि यथोदितम्
yena te kṛtsnaśaḥ kṛtyaṁ prakaromi yathoditam
जिससे मैं वह संपूर्ण कार्य, जैसा कहा जाए, कर सकूँ।
श्लोक 66 (skanda.6.149.66)
॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ एते शक्रादयो देवाः सर्वे स्वर्गाद्विवासिताः ॥ अंधकेन महाभागे दैत्यानामधिपेन च
śrībhagavānuvāca ete śakrādayo devāḥ sarve svargādvivāsitāḥ aṁdhakena mahābhāge daityānāmadhipena ca
भगवान् ने कहा — हे महाभागे! ये शक्र आदि समस्त देवता, दैत्यों के अधिपति अंधक द्वारा, स्वर्ग से निकाल दिए गए हैं।
श्लोक 67 (skanda.6.149.67)
तस्मात्तस्य वधार्थाय गच्छमानस्य मे शृणु ॥ साहाय्यं कुरु मे चाशु सूदयामि रणाजिरे
tasmāttasya vadhārthāya gacchamānasya me śṛṇu sāhāyyaṁ kuru me cāśu sūdayāmi raṇājire
अतः उसके वध के लिए जा रहे मेरे लिए सुनो; शीघ्र मेरी सहायता करो, जिससे मैं युद्धभूमि में उसे नष्ट कर सकूँ।
श्लोक 68 (skanda.6.149.68)
एते मातृगणाः सर्वे मया दत्तास्तवाधुना ॥ क्षुत्क्षामाः सूदयिष्यंति दानवान्ये पुरः स्थिताः
ete mātṛgaṇāḥ sarve mayā dattāstavādhunā kṣutkṣāmāḥ sūdayiṣyaṁti dānavānye puraḥ sthitāḥ
ये सभी मातृगण मैंने अभी तुम्हें दिए हैं; भूख से क्षीण होकर, वे उन दानवों को नष्ट करेंगी जो सम्मुख खड़े होंगे।
श्लोक 69 (skanda.6.149.69)
यस्मात्केलीमयं रूपं विधाय त्वं सहस्रधा ॥ अनेकैर्विकृतै रूपैः समाहूताग्निमध्यतः
yasmātkelīmayaṁ rūpaṁ vidhāya tvaṁ sahasradhā anekairvikṛtai rūpaiḥ samāhūtāgnimadhyataḥ
चूँकि क्रीड़ामय रूप धारण करके, तुमने सहस्र प्रकार से, अनेक विकृत रूपों के साथ, अग्नि के मध्य से आह्वान किया है —
श्लोक 70 (skanda.6.149.70)
तस्मात्केलीश्वरीनाम त्रैलोक्ये त्वं भविष्यसि ॥ अनेनैव तु रूपेण यस्त्वां भक्त्याऽर्चयिष्यति
tasmātkelīśvarīnāma trailokye tvaṁ bhaviṣyasi anenaiva tu rūpeṇa yastvāṁ bhaktyā'rcayiṣyati
इसीलिए तुम त्रैलोक्य में केलीश्वरी नाम से प्रसिद्ध होगी; इसी रूप में जो कोई तुम्हारी भक्तिपूर्वक पूजा करेगा —
श्लोक 71 (skanda.6.149.71)
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां तस्याभीष्टं भविष्यति ॥ युद्धकालेऽथ संप्राप्ते स्तोत्रेणानेन ते स्तुतिम्
aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ tasyābhīṣṭaṁ bhaviṣyati yuddhakāle'tha saṁprāpte stotreṇānena te stutim
अष्टमी और चतुर्दशी को, उसकी अभीष्ट कामना पूर्ण होगी; और युद्ध का समय आने पर, इस स्तोत्र से तुम्हारी स्तुति —
श्लोक 72 (skanda.6.149.72)
यः करिष्यति भूपालो जयस्तस्य भविष्यति ॥ अपि स्वल्पस्वसैन्यस्य स्वल्पाश्वस्य च संगरे
yaḥ kariṣyati bhūpālo jayastasya bhaviṣyati api svalpasvasainyasya svalpāśvasya ca saṁgare
जो भी राजा करेगा, उसे विजय प्राप्त होगी; भले ही युद्ध में उसकी सेना और घोड़े अल्प ही क्यों न हों।
श्लोक 73 (skanda.6.149.73)
भविष्यति जयो नूनं त्वत्प्रसादादसंशयम् ॥ एवं सा देवदेवेन प्रोक्ता केलीश्वरी तदा
bhaviṣyati jayo nūnaṁ tvatprasādādasaṁśayam evaṁ sā devadevena proktā kelīśvarī tadā
तुम्हारी कृपा से निश्चय ही, निःसंदेह विजय प्राप्त होगी। इस प्रकार देवाधिदेव द्वारा उस समय केलीश्वरी से यह कहा गया।
श्लोक 74 (skanda.6.149.74)
प्रस्थिता पुरतस्तस्य भवसैन्यस्य हर्षिता ॥ सर्वैर्मातृगणैः सार्धं रौद्रारावैःसुभीषणैः
prasthitā puratastasya bhavasainyasya harṣitā sarvairmātṛgaṇaiḥ sārdhaṁ raudrārāvaiḥsubhīṣaṇaiḥ
तत्पश्चात् प्रसन्न होकर वह उस शिव की सेना के आगे-आगे, समस्त मातृगणों के साथ, अत्यंत भयंकर, रौद्र गर्जनाओं के साथ चल पड़ी।
श्लोक 75 (skanda.6.149.75)
युद्धोत्साहपरै रौद्रैर्नानाशस्त्रप्रहारिभिः॥ अथ ते दानवा दृष्ट्वा स्त्रीसैन्यं तत्समागतम्
yuddhotsāhaparai raudrairnānāśastraprahāribhiḥ atha te dānavā dṛṣṭvā strīsainyaṁ tatsamāgatam
वे भयंकर मातृगण युद्धोत्साह में तत्पर, नाना प्रकार के शस्त्रों से प्रहार करने वाली थीं। तब उन दानवों ने उस स्त्री-सेना को आया हुआ देखा।
श्लोक 76 (skanda.6.149.76)
विकृतं विकृताकारं विकृताकाररावणम् ॥ शस्त्रोद्यतकरं सर्वयुद्धवांछापरायणम्
vikṛtaṁ vikṛtākāraṁ vikṛtākārarāvaṇam śastrodyatakaraṁ sarvayuddhavāṁchāparāyaṇam
वह विकृत, विकृत आकार वाली, विकृत गर्जना करने वाली, हाथों में शस्त्र उठाए हुए, तथा पूर्णतः युद्ध की कामना में तत्पर सेना थी।
श्लोक 77 (skanda.6.149.77)
जहसुः सुस्वरं केचित्केचिन्निर्भर्त्सयंति च ॥ अन्ये स्त्रीति परिज्ञाय प्रहरंति न दानवाः
jahasuḥ susvaraṁ kecitkecinnirbhartsayaṁti ca anye strīti parijñāya praharaṁti na dānavāḥ
कुछ दानव जोर से हँस पड़े, कुछ उन्हें धिक्कारने लगे; और अन्य, उन्हें स्त्री जानकर, उन पर प्रहार नहीं करते थे।
श्लोक 78 (skanda.6.149.78)
वध्यमानापि लज्जंतः पौरुषे स्वे व्यवस्थिताः ॥ एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो नारदो मुनिसत्तमः
vadhyamānāpi lajjaṁtaḥ pauruṣe sve vyavasthitāḥ etasminnaṁtare prāpto nārado munisattamaḥ
वे मारे जाते हुए भी, अपने पौरुष में स्थित रहकर, संकोच करते रहे। इसी बीच मुनिश्रेष्ठ नारद वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 79 (skanda.6.149.79)
अन्धकाय स वृत्तांतं कथयामास कृत्स्नशः ॥ नैताः स्त्रियो दनुश्रेष्ठ युद्धार्थं समुपस्थिताः
andhakāya sa vṛttāṁtaṁ kathayāmāsa kṛtsnaśaḥ naitāḥ striyo danuśreṣṭha yuddhārthaṁ samupasthitāḥ
उन्होंने अंधक को संपूर्ण वृत्तांत बताया — हे दनुश्रेष्ठ! ये युद्ध के लिए आई हुई सामान्य स्त्रियाँ नहीं हैं।
श्लोक 80 (skanda.6.149.80)
एषा कृत्या वधार्थाय तव रुद्रेण निर्मिता ॥ यैषा सिंहसमारूढा चक्रांकितकरा स्थिता
eṣā kṛtyā vadhārthāya tava rudreṇa nirmitā yaiṣā siṁhasamārūḍhā cakrāṁkitakarā sthitā
यह तुम्हारे वध के लिए रुद्र द्वारा रची गई एक कृत्या है; जो यह सिंह पर आरूढ़, हाथ में चक्र-चिह्न धारण किए स्थित है —
श्लोक 81 (skanda.6.149.81)
एषा केलीश्वरीनाम वह्निकुण्डाद्विनिर्गता ॥ एताभिः सह रौद्राभिः स्त्रीभिर्मंत्रबलाश्रयात्
eṣā kelīśvarīnāma vahnikuṇḍādvinirgatā etābhiḥ saha raudrābhiḥ strībhirmaṁtrabalāśrayāt
यह केलीश्वरी नामक शक्ति अग्निकुंड से प्रकट हुई है; इन्हीं भयंकर स्त्रियों के साथ, मंत्र के बल के आश्रय से,
श्लोक 82 (skanda.6.149.82)
स्वरक्तेन कृते होमे देवदेवेन शम्भुना ॥ स एष भगवान्क्रुद्धः स्वयमभ्येति तेंऽतिकम्
svaraktena kṛte home devadevena śambhunā sa eṣa bhagavānkruddhaḥ svayamabhyeti teṁ'tikam
देवाधिदेव शंभु द्वारा अपने ही रक्त से किए गए हवन में उत्पन्न हुई। वे भगवान् शिव भी क्रुद्ध होकर स्वयं तुम्हारे निकट आ रहे हैं।
श्लोक 83 (skanda.6.149.83)
युद्धाय निजहर्म्ये तान्स्थापयित्वा सुरोत्तमान् ॥॥ प्रतिज्ञाय वधं तुभ्यं पुरतः परमेष्ठिनः
yuddhāya nijaharmye tānsthāpayitvā surottamān pratijñāya vadhaṁ tubhyaṁ purataḥ parameṣṭhinaḥ
उन श्रेष्ठ देवताओं को अपने ही भवन में स्थापित करके, ब्रह्मा के समक्ष तुम्हारे वध की प्रतिज्ञा करके, युद्ध के लिए आ रहे हैं।
श्लोक 84 (skanda.6.149.84)
एतज्ज्ञात्वा महाभाग यद्युक्तं तत्समाचर
etajjñātvā mahābhāga yadyuktaṁ tatsamācara
हे महाभाग! यह जानकर जो उचित हो, वही करो।
श्लोक 85 (skanda.6.149.85)
॥ अन्धक उवाच ॥ ॥ नाहं बिभेमि रुद्रस्य तथान्यस्यापि कस्यचित् ॥ न स्त्रीणां प्रहरिष्यामि पालयन्पुरुषव्रतम्
andhaka uvāca nāhaṁ bibhemi rudrasya tathānyasyāpi kasyacit na strīṇāṁ prahariṣyāmi pālayanpuruṣavratam
अंधक ने कहा — मैं न तो रुद्र से डरता हूँ, न किसी और से; परंतु पुरुष-व्रत का पालन करते हुए मैं स्त्रियों पर प्रहार नहीं करूँगा।
श्लोक 86 (skanda.6.149.86)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवं प्रवदतस्तस्य दानवस्य महात्मनः ॥ आक्रंदः सुमहाञ्जज्ञे तस्मिन्देशे समंततः
sūta uvāca evaṁ pravadatastasya dānavasya mahātmanaḥ ākraṁdaḥ sumahāñjajñe tasmindeśe samaṁtataḥ
सूत जी ने कहा — उस महात्मा दानव के इस प्रकार कहते ही, उस स्थान पर चारों ओर एक महान आक्रंद उत्पन्न हो गया।
श्लोक 87 (skanda.6.149.87)
भक्ष्यन्ते दानवाः केचिद्वध्यन्ते त्वथ चापरे ॥ अर्धभक्षित गात्राश्च प्रणश्यंति तथा परे
bhakṣyante dānavāḥ kecidvadhyante tvatha cāpare ardhabhakṣita gātrāśca praṇaśyaṁti tathā pare
कुछ दानव भक्षण किए जा रहे थे, कुछ मारे जा रहे थे, और अन्य, आधे खाए हुए शरीर वाले, नष्ट हो रहे थे।
श्लोक 88 (skanda.6.149.88)
युध्यमानास्तथैवान्ये शक्तिमंतोऽपि दानवाः ॥ भक्ष्यंते मातृभिस्तत्र सायुधाश्च सवाहनाः
yudhyamānāstathaivānye śaktimaṁto'pi dānavāḥ bhakṣyaṁte mātṛbhistatra sāyudhāśca savāhanāḥ
इसी प्रकार अन्य शक्तिशाली दानव भी, युद्ध करते हुए ही, अपने शस्त्रों और वाहनों सहित उन मातृगणों द्वारा भक्षित होते जा रहे थे।
श्लोक 89 (skanda.6.149.89)
तच्छ्रुत्वा स महाक्रंदमंधकः क्रोधमूर्छितः॥ आदाय खड्गमुत्तस्थौ किमिदं किमिदं ब्रुवन्
tacchrutvā sa mahākraṁdamaṁdhakaḥ krodhamūrchitaḥ ādāya khaḍgamuttasthau kimidaṁ kimidaṁ bruvan
उस महान आक्रंद को सुनकर, क्रोध से विह्वल अंधक, तलवार उठाकर उठ खड़ा हुआ, "यह क्या है, यह क्या है" कहते हुए।
श्लोक 90 (skanda.6.149.90)
अथ पश्यति विध्वस्तान्दानवान्बलदर्पितान् ॥ भक्ष्यमाणास्तथैवान्यान्पलायनपरायणान्
atha paśyati vidhvastāndānavānbaladarpitān bhakṣyamāṇāstathaivānyānpalāyanaparāyaṇān
तब उसने बल के अभिमान से मत्त दानवों को नष्ट होते हुए देखा, और अन्य दानवों को भक्षित होते हुए, तथा भागने में तत्पर होते हुए देखा।
श्लोक 91 (skanda.6.149.91)
अन्येषां निहतानां च रुदंत्यो निकटस्थिताः ॥ स पश्यति प्रिया भार्याः प्रलपंत्योऽतिदुःखिताः
anyeṣāṁ nihatānāṁ ca rudaṁtyo nikaṭasthitāḥ sa paśyati priyā bhāryāḥ pralapaṁtyo'tiduḥkhitāḥ
और मारे गए अन्य दानवों की प्रिय पत्नियाँ, अत्यंत दुःखी होकर विलाप करती हुई, उनके पास रो रही थीं — उसने यह भी देखा।
श्लोक 92 (skanda.6.149.92)
अथ तत्कदनं दृष्ट्वा अंधकः क्रोधमूर्छितः ॥ भर्त्सयामास ताः सर्वा योगिनीः समरोद्यताः
atha tatkadanaṁ dṛṣṭvā aṁdhakaḥ krodhamūrchitaḥ bhartsayāmāsa tāḥ sarvā yoginīḥ samarodyatāḥ
उस विनाश को देखकर, क्रोध से विह्वल अंधक ने युद्ध के लिए तत्पर उन सभी योगिनियों को धिक्कारा।
श्लोक 93 (skanda.6.149.93)
न च तास्तस्य दैत्यस्य भयं चक्रुः कथंचन ॥। केवलं सूदयंति स्म भक्षयंति च दानवान्
na ca tāstasya daityasya bhayaṁ cakruḥ kathaṁcana kevalaṁ sūdayaṁti sma bhakṣayaṁti ca dānavān
परंतु उन्होंने उस दैत्य से किसी भी प्रकार भय नहीं माना; वे केवल दानवों का वध और भक्षण करती रहीं।
श्लोक 94 (skanda.6.149.94)
ततः स दानवस्तासां दृष्ट्वा तच्चेष्टितं रुषा ॥ स्वस्य गात्रस्य रक्षां स चकार भयसंकुलः
tataḥ sa dānavastāsāṁ dṛṣṭvā tacceṣṭitaṁ ruṣā svasya gātrasya rakṣāṁ sa cakāra bhayasaṁkulaḥ
तब उस दानव ने क्रोध से उनकी उस चेष्टा को देखकर, भय से व्याकुल होकर, अपने ही शरीर की रक्षा करने लगा।
श्लोक 95 (skanda.6.149.95)
तमोऽस्त्रं मुमुचे रौद्रं कृत्वा रावं स तत्क्षणात् ॥ एतस्मिन्नंतरे कृत्स्नं त्रैलोक्यं तमसा वृतम्
tamo'straṁ mumuce raudraṁ kṛtvā rāvaṁ sa tatkṣaṇāt etasminnaṁtare kṛtsnaṁ trailokyaṁ tamasā vṛtam
उसने उसी क्षण भयंकर गर्जना करते हुए तमोऽस्त्र (अंधकार का अस्त्र) छोड़ दिया; इसी बीच संपूर्ण त्रिलोक अंधकार से आच्छादित हो गया।
श्लोक 96 (skanda.6.149.96)
न किंचिज्ज्ञायते तत्र समं विषममेव च ॥ केवलं दानवेन्द्रश्च सर्वं पश्यति नेतरः
na kiṁcijjñāyate tatra samaṁ viṣamameva ca kevalaṁ dānavendraśca sarvaṁ paśyati netaraḥ
वहाँ न तो समतल भूमि पहचानी जा सकती थी, न ऊँची-नीची; केवल दानवेंद्र ही सब कुछ देख पा रहा था, कोई और नहीं।
श्लोक 97 (skanda.6.149.97)
ततः स सूदयामास योगिनीस्ताः शितैः शरैः ॥ यथायथा परा नार्यस्तादृग्रूपा भवन्ति च
tataḥ sa sūdayāmāsa yoginīstāḥ śitaiḥ śaraiḥ yathāyathā parā nāryastādṛgrūpā bhavanti ca
तत्पश्चात् उसने तीक्ष्ण बाणों से उन योगिनियों का वध करना आरंभ किया; परंतु जैसे-जैसे वे मरतीं, वैसे-वैसे नई-नई स्त्रियाँ उसी रूप में प्रकट होती जातीं।
श्लोक 98 (skanda.6.149.98)
अथ दृष्ट्वा परां वृद्धिं योगिनीनां स दानवः ॥ संहारं तस्य चास्त्रस्य चकार भयसंकुलः
atha dṛṣṭvā parāṁ vṛddhiṁ yoginīnāṁ sa dānavaḥ saṁhāraṁ tasya cāstrasya cakāra bhayasaṁkulaḥ
तब योगिनियों की अत्यधिक वृद्धि होते देखकर, भय से व्याकुल हुए उस दानव ने अपने उस अस्त्र को संहृत कर लिया।
श्लोक 99 (skanda.6.149.99)
ततः शुक्रं समासाद्य दीनः प्राह कृतांजलिः ॥ पश्य मे भार्गवश्रेष्ठ स्त्रीभिर्यत्कदनं कृतम्
tataḥ śukraṁ samāsādya dīnaḥ prāha kṛtāṁjaliḥ paśya me bhārgavaśreṣṭha strībhiryatkadanaṁ kṛtam
तत्पश्चात् दुःखी होकर, हाथ जोड़कर, उसने शुक्राचार्य के पास जाकर कहा — हे भार्गवश्रेष्ठ! देखिए, इन स्त्रियों ने मुझ पर कैसा संहार किया है।
श्लोक 100 (skanda.6.149.100)
अवध्याभिर्ममास्त्राणां मंत्रशक्त्या सुरद्विषः ॥ उत्पन्नाभिः प्रभूताभिर्हतं मे सर्वतो बलम्
avadhyābhirmamāstrāṇāṁ maṁtraśaktyā suradviṣaḥ utpannābhiḥ prabhūtābhirhataṁ me sarvato balam
हे असुर-शत्रुओं के नाशक! मेरे अस्त्रों से अवध्य, मंत्र-शक्ति से उत्पन्न हुई इन अगणित स्त्रियों द्वारा मेरा समस्त बल सब ओर से नष्ट कर दिया गया है।
श्लोक 101 (skanda.6.149.101)
तस्मात्त्वमपि तां विद्यां प्रसाधय महामते ॥ यदि मे वांछसि श्रेयो नान्यथास्ति जयो रणे
tasmāttvamapi tāṁ vidyāṁ prasādhaya mahāmate yadi me vāṁchasi śreyo nānyathāsti jayo raṇe
अतः हे महामते! यदि आप मेरा कल्याण चाहते हैं, तो आप भी उस विद्या को सिद्ध कीजिए; अन्यथा युद्ध में मेरी विजय नहीं हो सकती।