नागर खण्ड · अध्याय 150
केलीश्वरी माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.6.150.1)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ शुक्रस्तस्य वचः श्रुत्वा चित्ते कृत्वा दयां ततः ॥ हाटकेश्वरजं क्षेत्रं गत्वा सिद्धिप्रदायकम्
sūta uvāca śukrastasya vacaḥ śrutvā citte kṛtvā dayāṁ tataḥ hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ gatvā siddhipradāyakam
सूत जी ने कहा — शुक्राचार्य उसकी यह बात सुनकर, मन में दया करके, सिद्धि प्रदान करने वाले उस हाटकेश्वर क्षेत्र में गए।
श्लोक 2 (skanda.6.150.2)
चकार विधिवद्धोमं स्वमांसेन हुताशने ॥ मंत्रैराथर्वणै रौद्रैः कुण्डं कृत्वा त्रिकोणकम्
cakāra vidhivaddhomaṁ svamāṁsena hutāśane maṁtrairātharvaṇai raudraiḥ kuṇḍaṁ kṛtvā trikoṇakam
उन्होंने त्रिकोणाकार कुंड बनाकर, भयंकर आथर्वण मंत्रों के साथ, अग्नि में अपने ही मांस से विधिपूर्वक हवन किया।
श्लोक 3 (skanda.6.150.3)
एवं संजुह्वतस्तस्य तेन वै विधिना तदा ॥ यथा रुद्रेण संतुष्टा देवी केलीश्वरी तदा
evaṁ saṁjuhvatastasya tena vai vidhinā tadā yathā rudreṇa saṁtuṣṭā devī kelīśvarī tadā
इस प्रकार उस विधि से हवन करते हुए, जिस प्रकार वह देवी केलीश्वरी रुद्र द्वारा संतुष्ट हुई थी, उसी प्रकार तब वह संतुष्ट हुई।
श्लोक 4 (skanda.6.150.4)
तं प्रोवाच समेत्याशु शुक्रं दैत्यपुरोहितम् ॥ मा त्वं भार्गवशार्दूल कुरु मांसपरिक्षयम्
taṁ provāca sametyāśu śukraṁ daityapurohitam mā tvaṁ bhārgavaśārdūla kuru māṁsaparikṣayam
वह शीघ्र ही उन दैत्यपुरोहित शुक्र के समक्ष आकर बोली — हे भार्गवशार्दूल! तुम अपने मांस का इस प्रकार क्षय मत करो।
श्लोक 5 (skanda.6.150.5)
भाविताऽहं त्रिनेत्रेण तत्किं ब्रूहि करोमि ते
bhāvitā'haṁ trinetreṇa tatkiṁ brūhi karomi te
मैं त्रिनेत्र शिव द्वारा पहले ही उत्पन्न हूँ; अतः बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?
श्लोक 6 (skanda.6.150.6)
॥ शुक्र उवाच ॥ ॥ यथा रुद्रस्य साहाय्यं त्वयात्र विहितं शुभे ॥ अंधकस्याऽपि कर्तव्यं तथैवैष वरो मम
śukra uvāca yathā rudrasya sāhāyyaṁ tvayātra vihitaṁ śubhe aṁdhakasyā'pi kartavyaṁ tathaivaiṣa varo mama
शुक्र ने कहा — हे शुभे! जैसी सहायता तुमने यहाँ रुद्र की की, वैसी ही सहायता अंधक की भी करनी होगी — यही मेरा वर है।
श्लोक 7 (skanda.6.150.7)
ये केचिद्दानवा युद्धे भक्षिताश्च विनाशिताः ॥ अस्य सैन्यस्य ते सर्वे पुनर्जीवंतु सत्वरम्
ye keciddānavā yuddhe bhakṣitāśca vināśitāḥ asya sainyasya te sarve punarjīvaṁtu satvaram
युद्ध में जो भी दानव भक्षित और नष्ट हुए हैं, इस सेना के वे सभी शीघ्र ही पुनर्जीवित हो जाएँ।
श्लोक 8 (skanda.6.150.8)
॥ देव्युवाच ॥ ॥ जीवयिष्यामि तान्सर्वान्दानवान्निहतान्रणे ॥ नवसंभक्षितान्विप्र प्रविष्टान्योगिनीमुखे
devyuvāca jīvayiṣyāmi tānsarvāndānavānnihatānraṇe navasaṁbhakṣitānvipra praviṣṭānyoginīmukhe
देवी ने कहा — हे विप्र! युद्ध में मारे गए, अभी-अभी भक्षित और योगिनियों के मुख में प्रविष्ट हुए उन सभी दानवों को मैं जीवित कर दूँगी।
श्लोक 9 (skanda.6.150.9)
एवमुक्त्वा ददौ तस्मै सा देवी हर्षितानना ॥ नाम्नाऽमृतवतीं विद्यां यया जीवंति ते मृताः
evamuktvā dadau tasmai sā devī harṣitānanā nāmnā'mṛtavatīṁ vidyāṁ yayā jīvaṁti te mṛtāḥ
ऐसा कहकर, प्रसन्नमुखी उस देवी ने उसे "अमृतवती" नामक विद्या प्रदान की, जिससे वे मृत दानव जीवित हो जाते हैं।
श्लोक 10 (skanda.6.150.10)
ततः शुक्रः प्रहृष्टात्मा गत्वांधकमुवाच ह ॥ सिद्धा केलीश्वरी देवी यथा शम्भोस्तथा मम
tataḥ śukraḥ prahṛṣṭātmā gatvāṁdhakamuvāca ha siddhā kelīśvarī devī yathā śambhostathā mama
तत्पश्चात् प्रसन्न-चित्त शुक्र ने अंधक के पास जाकर कहा — जिस प्रकार केलीश्वरी देवी शंभु के लिए सिद्ध हुई, उसी प्रकार अब मेरे लिए भी सिद्ध हुई हैं।
श्लोक 11 (skanda.6.150.11)
तया दत्ता शुभा विद्या मम दैत्या मृताश्च ये ॥ तान्सर्वांस्तत्प्रभावेन योजयिष्यामि जीविते
tayā dattā śubhā vidyā mama daityā mṛtāśca ye tānsarvāṁstatprabhāvena yojayiṣyāmi jīvite
उसके द्वारा दी गई इस शुभ विद्या के प्रभाव से, मेरे जो भी दैत्य मारे गए हैं, उन सभी को मैं पुनः जीवन से युक्त कर दूँगा।
श्लोक 12 (skanda.6.150.12)
त्वयाऽस्याः सततं भक्तिः कार्या दानव सत्तम ॥ अष्टम्यां च विशेषेण चतुर्दश्यां च सर्वदा
tvayā'syāḥ satataṁ bhaktiḥ kāryā dānava sattama aṣṭamyāṁ ca viśeṣeṇa caturdaśyāṁ ca sarvadā
हे दानवश्रेष्ठ! तुम्हें सदा इसकी भक्ति करनी चाहिए, विशेष रूप से अष्टमी और चतुर्दशी को सर्वदा।
श्लोक 13 (skanda.6.150.13)
एषा सा परमा शक्तिर्यया व्याप्तमिदं जगत्॥ केवलं भक्तिसाध्या सा न दण्डेन कथंचन
eṣā sā paramā śaktiryayā vyāptamidaṁ jagat kevalaṁ bhaktisādhyā sā na daṇḍena kathaṁcana
यही वह परम शक्ति है, जिससे यह संपूर्ण जगत् व्याप्त है; वह केवल भक्ति से ही साध्य है, बल-प्रयोग से किसी भी प्रकार नहीं।
श्लोक 14 (skanda.6.150.14)
एवमुक्तस्तु शुक्रेण स तदा दानवाधिपः ॥ तां देवीं पूजयामास भावभक्तिसमन्वितः
evamuktastu śukreṇa sa tadā dānavādhipaḥ tāṁ devīṁ pūjayāmāsa bhāvabhaktisamanvitaḥ
शुक्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, उस दानवाधिपति ने तब भावपूर्ण भक्ति से युक्त होकर उस देवी की पूजा की।
श्लोक 15 (skanda.6.150.15)
स्तुत्वा च विविधैः स्तोत्रैस्ततः प्रोवाच सादरम् ॥ तथान्या मातरः सर्वा यथाज्येष्ठं यथाक्रमम्
stutvā ca vividhaiḥ stotraistataḥ provāca sādaram tathānyā mātaraḥ sarvā yathājyeṣṭhaṁ yathākramam
विभिन्न स्तोत्रों से उसकी स्तुति करके, तथा उसी प्रकार अन्य समस्त मातृगणों को भी उनकी ज्येष्ठता और क्रम के अनुसार स्तुति करके, उसने आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 16 (skanda.6.150.16)
अज्ञानाद्यन्मया देवि कृतः कोपस्तवोपरि ॥ मर्षणीयस्तथा सोऽद्य दीनस्य प्रणतस्य च
ajñānādyanmayā devi kṛtaḥ kopastavopari marṣaṇīyastathā so'dya dīnasya praṇatasya ca
उसने कहा — हे देवि! अज्ञानवश मैंने आपके प्रति जो क्रोध किया था, उसे आज इस दीन और प्रणत पुरुष का क्षम्य समझिए।
श्लोक 17 (skanda.6.150.17)
॥ श्रीदेव्युवाच ॥ ॥ परितुष्टाऽस्मि ते वत्स प्रभावाद्भार्गवस्य च ॥ वरं वरय तस्मात्त्वं न वृथा दर्शनं मम
śrīdevyuvāca parituṣṭā'smi te vatsa prabhāvādbhārgavasya ca varaṁ varaya tasmāttvaṁ na vṛthā darśanaṁ mama
श्री देवी ने कहा — हे वत्स! शुक्राचार्य के प्रभाव से मैं तुमसे संतुष्ट हूँ; अतः वर माँगो, मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता।
श्लोक 18 (skanda.6.150.18)
॥ अन्धक उवाच ॥ ॥ अनेनैव तु रूपेण ये त्वां ध्यायंति देहिनः ॥ पूजयंति च सद्भक्त्या संस्थाप्य प्रतिमां तव ॥ तेषां सिद्धिः प्रदातव्या त्वया हृदयवांछिता
andhaka uvāca anenaiva tu rūpeṇa ye tvāṁ dhyāyaṁti dehinaḥ pūjayaṁti ca sadbhaktyā saṁsthāpya pratimāṁ tava teṣāṁ siddhiḥ pradātavyā tvayā hṛdayavāṁchitā
अंधक ने कहा — जो भी प्राणी इसी रूप में आपका ध्यान करते हैं, और आपकी प्रतिमा स्थापित कर सद्भक्ति से आपकी पूजा करते हैं, उन्हें आप उनके हृदय में इच्छित सिद्धि प्रदान कीजिए।
श्लोक 19 (skanda.6.150.19)
देव्युवाच ॥ ॥ यो मामनेन रूपेण स्थापयिष्यति मानवः ॥ तस्य मोक्षं प्रदास्यामि पापस्यापि न संशयः
devyuvāca yo māmanena rūpeṇa sthāpayiṣyati mānavaḥ tasya mokṣaṁ pradāsyāmi pāpasyāpi na saṁśayaḥ
देवी ने कहा — जो मनुष्य मुझे इसी रूप में स्थापित करेगा, चाहे वह पापी ही क्यों न हो, मैं उसे मोक्ष प्रदान करूँगी, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 20 (skanda.6.150.20)
योऽष्टम्यां च चतुर्दश्यां मम पूजां करिष्यति ॥ तस्मै स्वर्गं प्रदास्यामि पापस्यापि दनूत्तम
yo'ṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ mama pūjāṁ kariṣyati tasmai svargaṁ pradāsyāmi pāpasyāpi danūttama
हे दानवश्रेष्ठ! जो अष्टमी और चतुर्दशी को मेरी पूजा करेगा, उसे मैं स्वर्ग प्रदान करूँगी, चाहे वह पापी ही क्यों न हो।
श्लोक 21 (skanda.6.150.21)
केवलं दर्शनं यश्च ध्यानं वा मे करिष्यति ॥ तस्य राज्यं प्रदास्यामि भोगान्मानुषसंभवान्
kevalaṁ darśanaṁ yaśca dhyānaṁ vā me kariṣyati tasya rājyaṁ pradāsyāmi bhogānmānuṣasaṁbhavān
और जो केवल मेरा दर्शन करेगा, अथवा मेरा ध्यान करेगा, उसे मैं राज्य तथा मनुष्य-जन्म से उत्पन्न होने वाले भोग प्रदान करूँगी।
श्लोक 22 (skanda.6.150.22)
एवमुक्त्वाऽथ सा देवी ततश्चादर्शनं गता ॥ तैश्च मातृगणैः सार्धं पश्यतस्तस्य तत्क्षणात्
evamuktvā'tha sā devī tataścādarśanaṁ gatā taiśca mātṛgaṇaiḥ sārdhaṁ paśyatastasya tatkṣaṇāt
ऐसा कहकर वह देवी, उन समस्त मातृगणों के साथ, उसके देखते-देखते उसी क्षण अंतर्धान हो गई।
श्लोक 23 (skanda.6.150.23)
शक्रोऽपि दानवान्सर्वांस्तया संसिद्धया ततः ॥ मृतान्संजीवयामास दैतेयान्नवभक्षितान्
śakro'pi dānavānsarvāṁstayā saṁsiddhayā tataḥ mṛtānsaṁjīvayāmāsa daiteyānnavabhakṣitān
तत्पश्चात् उस सिद्ध हुई विद्या के द्वारा, उन्होंने उन सभी मृत तथा अभी भक्षित हुए दैत्य-दानवों को पुनर्जीवित कर दिया।
श्लोक 24 (skanda.6.150.24)
तैः समेत्य स दैत्येन्द्रः प्रहृष्टेनांतरात्मना ॥ तां पुरीं प्राप्य शक्रस्य राज्यं चक्रे दिवानिशम्
taiḥ sametya sa daityendraḥ prahṛṣṭenāṁtarātmanā tāṁ purīṁ prāpya śakrasya rājyaṁ cakre divāniśam
उनके साथ मिलकर, प्रसन्न अंतरात्मा से युक्त वह दैत्येंद्र, उस पुरी को प्राप्त कर, दिन-रात इंद्र के उस राज्य पर शासन करने लगा।
श्लोक 25 (skanda.6.150.25)
तां देवीं ध्यायमानस्तु पूजयानो दिवानिशम् ॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां विशेषेण महाबलः
tāṁ devīṁ dhyāyamānastu pūjayāno divāniśam aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ viśeṣeṇa mahābalaḥ
वह महाबली, उस देवी का ध्यान करते हुए तथा दिन-रात उसकी पूजा करते हुए, विशेष रूप से अष्टमी और चतुर्दशी को उसकी आराधना में तत्पर रहा।
श्लोक 26 (skanda.6.150.26)
अथ तस्याः प्रभावं तं ज्ञात्वा व्याससमुद्भवः ॥ स्थानेऽत्र स्थापयामास संसिद्धिं प परां गतः
atha tasyāḥ prabhāvaṁ taṁ jñātvā vyāsasamudbhavaḥ sthāne'tra sthāpayāmāsa saṁsiddhiṁ pa parāṁ gataḥ
तत्पश्चात् उसके उस प्रभाव को जानकर, व्यास से उत्पन्न मुनि ने इसी स्थान पर उसे स्थापित किया, और स्वयं परम सिद्धि को प्राप्त हो गए।
श्लोक 27 (skanda.6.150.27)
॥ सूत उवाच । ॥ एवं केलीश्वर देवी संजाता परमेश्वरी ॥ तस्मात्स्थाप्या च पूज्या च ध्येया चैव विशेषतः
sūta uvāca evaṁ kelīśvara devī saṁjātā parameśvarī tasmātsthāpyā ca pūjyā ca dhyeyā caiva viśeṣataḥ
सूत जी ने कहा — इस प्रकार परमेश्वरी केलीश्वरी देवी प्रकट हुईं; अतः वे विशेष रूप से स्थापन, पूजन तथा ध्यान के योग्य हैं।
श्लोक 28 (skanda.6.150.28)
एवं देव्या नरो यश्च पठते वा शृणोति वा ॥ वाच्यमानं स मुच्येत व्यसनेन गरीयसा
evaṁ devyā naro yaśca paṭhate vā śṛṇoti vā vācyamānaṁ sa mucyeta vyasanena garīyasā
इस प्रकार जो मनुष्य इस देवी के इस आख्यान को पढ़ता है या सुनता है, अथवा दूसरों को सुनाता है, वह अत्यंत गंभीर विपत्ति से भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 29 (skanda.6.150.29)
भ्रष्टराज्योऽथवा राजा यः शृणोत्यष्टमीदिने ॥ स राज्यं लभते भूयो निखिलं हतकंटकम्
bhraṣṭarājyo'thavā rājā yaḥ śṛṇotyaṣṭamīdine sa rājyaṁ labhate bhūyo nikhilaṁ hatakaṁṭakam
राज्यभ्रष्ट हुआ राजा भी, यदि अष्टमी के दिन इसे सुनता है, तो वह अपने संपूर्ण राज्य को पुनः निष्कंटक प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 30 (skanda.6.150.30)
युद्धकाले च संप्राप्ते यश्चैतच्छृणुयान्नरः ॥ स हत्वा शत्रुसंघातं विजयं च समाप्नुयात्
yuddhakāle ca saṁprāpte yaścaitacchṛṇuyānnaraḥ sa hatvā śatrusaṁghātaṁ vijayaṁ ca samāpnuyāt
और जो मनुष्य युद्ध का समय आने पर इसे सुनता है, वह अपने शत्रुओं के समूह का वध करके विजय को प्राप्त करता है।