नागर खण्ड · अध्याय 151
अन्धक की शूलाग्र-सिद्धि और भैरव-कृपा
श्लोक 1 (skanda.6.151.1)
सूत उवाच। अन्धकोऽपि परां विद्यां ज्ञात्वा शुक्रार्जितां तदा ॥ केलीश्वर्याः प्रसादं च भक्तिजं बलवृद्धिदम्
sūta uvāca andhako'pi parāṁ vidyāṁ jñātvā śukrārjitāṁ tadā kelīśvaryāḥ prasādaṁ ca bhaktijaṁ balavṛddhidam
सूत जी ने कहा — तब अन्धक ने भी शुक्राचार्य से प्राप्त परम विद्या को जानकर तथा केलीश्वरी की भक्ति से उत्पन्न बल बढ़ाने वाली कृपा को पाकर,
श्लोक 2 (skanda.6.151.2)
अवध्यतामात्मनश्च पितामहवरोद्भवम् ॥ महेश्वरं समुद्दिश्य कोपं चक्रे ततः परम्
avadhyatāmātmanaśca pitāmahavarodbhavam maheśvaraṁ samuddiśya kopaṁ cakre tataḥ param
तथा पितामह ब्रह्मा के वरदान से उत्पन्न अपनी अवध्यता को पाकर, महेश्वर के प्रति अत्यन्त क्रोध करने लगा।
श्लोक 3 (skanda.6.151.3)
दूतं च प्रेषयामास कैलासं पर्वतं प्रति ॥ गच्छ दूत हरं ब्रूहि मम वाक्येन सांप्रतम्
dūtaṁ ca preṣayāmāsa kailāsaṁ parvataṁ prati gaccha dūta haraṁ brūhi mama vākyena sāṁpratam
उसने कैलास पर्वत की ओर एक दूत भेजा — "हे दूत, जाओ और अभी मेरे वचन से हर से कहो —
श्लोक 4 (skanda.6.151.4)
शक्रमेनं परित्यज्य सुखं तिष्ठात्र पर्वते ॥ नो चेद्द्रुतं समागत्य सकैलासं सभार्यकम्
śakramenaṁ parityajya sukhaṁ tiṣṭhātra parvate no ceddrutaṁ samāgatya sakailāsaṁ sabhāryakam
'इस इन्द्र को छोड़कर तुम सुखपूर्वक इसी पर्वत पर रहो, अन्यथा शीघ्र ही आकर, कैलास सहित, अपनी पत्नी सहित,
श्लोक 5 (skanda.6.151.5)
सगणं च रणे हत्वा सुखी स्थास्यामि नंदने ॥ त्वामहं नाशयिष्यामि सत्येनात्मानमालभे
sagaṇaṁ ca raṇe hatvā sukhī sthāsyāmi naṁdane tvāmahaṁ nāśayiṣyāmi satyenātmānamālabhe
तथा गणों सहित तुम्हें युद्ध में मारकर मैं नन्दन वन में सुखपूर्वक रहूँगा। मैं तुम्हारा नाश करूँगा — यह मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ।'"
श्लोक 6 (skanda.6.151.6)
एवमुक्तः स दैत्येन दूतो गत्वा द्रुतं ततः ॥ प्रोवाच शंकरं वाक्यैः परुषैः स विशेषतः
evamuktaḥ sa daityena dūto gatvā drutaṁ tataḥ provāca śaṁkaraṁ vākyaiḥ paruṣaiḥ sa viśeṣataḥ
उस दैत्य द्वारा इस प्रकार आदिष्ट होकर वह दूत तुरन्त जाकर विशेष रूप से कठोर वचनों में शंकर से बोला।
श्लोक 7 (skanda.6.151.7)
ततः कोपपरीतात्मा भगवान्वृषभध्वजः ॥ गणान्संप्रेषयामास वधार्थं तस्य दुर्मतेः
tataḥ kopaparītātmā bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ gaṇānsaṁpreṣayāmāsa vadhārthaṁ tasya durmateḥ
तब क्रोध से व्याप्त मन वाले वृषभ-ध्वज भगवान ने उस दुर्बुद्धि के वध के लिए अपने गणों को भेजा।
श्लोक 8 (skanda.6.151.8)
वीरभद्रं महाकालं नंदिं हस्तिमुखं तथा ॥ अघोरं घोरनादं च घोरघंटं महाबलम्
vīrabhadraṁ mahākālaṁ naṁdiṁ hastimukhaṁ tathā aghoraṁ ghoranādaṁ ca ghoraghaṁṭaṁ mahābalam
वीरभद्र, महाकाल, नन्दी, हस्तिमुख, अघोर, घोरनाद तथा महाबली घोरघण्ट को —
श्लोक 9 (skanda.6.151.9)
एतेषामनुगाश्चान्ये कोटिरेका पृथक्पृथक्॥ सर्वान्संप्रेषयामास वधार्थं तस्य दुर्मतेः
eteṣāmanugāścānye koṭirekā pṛthakpṛthak sarvānsaṁpreṣayāmāsa vadhārthaṁ tasya durmateḥ
और इनमें से प्रत्येक के साथ अलग-अलग एक-एक करोड़ अनुचरों को भी — उस दुर्बुद्धि के वध के लिए सबको भेज दिया।
श्लोक 10 (skanda.6.151.10)
अथ संप्रेषितास्तेन गणास्ते विकृताननाः ॥ हर्षेण महताविष्टा गर्जमाना यथा घनाः
atha saṁpreṣitāstena gaṇāste vikṛtānanāḥ harṣeṇa mahatāviṣṭā garjamānā yathā ghanāḥ
तब उसके द्वारा भेजे गए विकराल मुख वाले वे गण बड़े हर्ष से भरकर मेघों के समान गरजने लगे।
श्लोक 11 (skanda.6.151.11)
धृतायुधा गताः सर्वे युद्धार्थं यत्र सा पुरी ॥ शक्रस्यासादिता तेन दानवेन बलीयसा
dhṛtāyudhā gatāḥ sarve yuddhārthaṁ yatra sā purī śakrasyāsāditā tena dānavena balīyasā
शस्त्र धारण किए हुए वे सब वहाँ युद्ध के लिए गए जहाँ इन्द्र की वह नगरी उस बलशाली दानव द्वारा अधिकृत कर ली गई थी।
श्लोक 12 (skanda.6.151.12)
अथ प्राप्तान्गणान्दृष्ट्वा दानवास्ते धृतायुधाः ॥ निश्चक्रमुर्वै सहसा युद्धार्थमतिगर्विताः
atha prāptāngaṇāndṛṣṭvā dānavāste dhṛtāyudhāḥ niścakramurvai sahasā yuddhārthamatigarvitāḥ
तब गणों को आते देखकर शस्त्रधारी वे दानव अत्यन्त गर्वित होकर तत्काल युद्ध के लिए निकल पड़े।
श्लोक 13 (skanda.6.151.13)
ततः समभवद्युद्धं गणानां दानवैः सह ॥ परस्परं महारौद्रं मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्
tataḥ samabhavadyuddhaṁ gaṇānāṁ dānavaiḥ saha parasparaṁ mahāraudraṁ mṛtyuṁ kṛtvā nivartanam
तब गणों और दानवों के बीच परस्पर अत्यन्त भीषण युद्ध हुआ, जिसमें मृत्यु को ही निवृत्ति मानकर सब लड़े।
श्लोक 14 (skanda.6.151.14)
ततो हरगणाः सर्वे दानवैस्तै रणाजिरे ॥ जिता जग्मुर्दिशो भीता हरवीक्षणतत्पराः
tato haragaṇāḥ sarve dānavaistai raṇājire jitā jagmurdiśo bhītā haravīkṣaṇatatparāḥ
तब उन दानवों द्वारा रणभूमि में पराजित होकर हर के सभी गण भयभीत होकर, केवल हर के दर्शन की चाह से, दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 15 (skanda.6.151.15)
हरोऽपि तान्गणान्भग्नान्दृष्ट्वा कोपाद्विनिर्ययौ ॥ हरं दृष्ट्वा ततो दैत्या दुद्द्रुवुस्ते दिशो दश
haro'pi tāngaṇānbhagnāndṛṣṭvā kopādviniryayau haraṁ dṛṣṭvā tato daityā duddruvuste diśo daśa
अपने गणों को पराजित देखकर हर स्वयं क्रोधपूर्वक निकल पड़े; और हर को देखकर वे दैत्य दसों दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 16 (skanda.6.151.16)
अन्धकोऽपि हरं दृष्ट्वा युद्धार्थं संमुखो ययौ । ततो युद्धं समभवदंधकस्य हरेण तु ॥ वृत्रवासवयोः पूर्वं यथा युद्धमभून्महत्
andhako'pi haraṁ dṛṣṭvā yuddhārthaṁ saṁmukho yayau tato yuddhaṁ samabhavadaṁdhakasya hareṇa tu vṛtravāsavayoḥ pūrvaṁ yathā yuddhamabhūnmahat
किन्तु अन्धक हर को देखकर युद्ध के लिए सामने आया, और तब अन्धक तथा हर के बीच वैसा ही महान युद्ध हुआ जैसा पूर्वकाल में वृत्र और वासव के बीच हुआ था।
श्लोक 17 (skanda.6.151.17)
चक्रनालीकनाराचैस्तोमरैः खड्गमुद्गरैः॥ एवं न शक्यते हंतुं दानवो विविधायुधैः
cakranālīkanārācaistomaraiḥ khaḍgamudgaraiḥ evaṁ na śakyate haṁtuṁ dānavo vividhāyudhaiḥ
चक्र, नालीक और नाराच बाणों से, तोमरों, खड्गों और मुद्गरों से — इस प्रकार विविध शस्त्रों से भी वह दानव मारा नहीं जा सका।
श्लोक 18 (skanda.6.151.18)
अस्त्रयुद्धं परित्यज्य बाहु युद्धमुपागतौ ॥ करं करेण संगृह्य मुष्टिप्रहरणौ तदा
astrayuddhaṁ parityajya bāhu yuddhamupāgatau karaṁ kareṇa saṁgṛhya muṣṭipraharaṇau tadā
तब अस्त्रों का युद्ध छोड़कर दोनों बाहु-युद्ध पर उतर आए, हाथ से हाथ पकड़कर मुक्कों से प्रहार करने लगे।
श्लोक 19 (skanda.6.151.19)
दानवेनाथ देवेशो बंधेनाक्रम्य पीडितः । निष्पंदभावमापन्नस्ततो मूर्च्छामुपागतः
dānavenātha deveśo baṁdhenākramya pīḍitaḥ niṣpaṁdabhāvamāpannastato mūrcchāmupāgataḥ
तब दानव द्वारा एक बन्धन में जकड़कर देवेश पीड़ित हो गए और निश्चेष्ट होकर मूर्च्छा को प्राप्त हो गए।
श्लोक 20 (skanda.6.151.20)
मूर्छागतं तु तज्ज्ञात्वा ह्यन्धको निर्ययौ गृहात् ॥ तावत्स्थाणुः क्षणाल्लब्ध्वा चेतनामात्तकार्मुकः
mūrchāgataṁ tu tajjñātvā hyandhako niryayau gṛhāt tāvatsthāṇuḥ kṣaṇāllabdhvā cetanāmāttakārmukaḥ
उन्हें मूर्च्छित जानकर अन्धक अपने घर की ओर लौट चला; इतने में ही स्थाणु ने क्षणभर में चेतना प्राप्त कर धनुष उठा लिया।
श्लोक 21 (skanda.6.151.21)
आयसीं लकुटीं गृह्य प्रभुर्भारसहसि काम् ॥ दानवेन्द्रं ततः प्राप्य ताडयामास मूर्धनि
āyasīṁ lakuṭīṁ gṛhya prabhurbhārasahasi kām dānavendraṁ tataḥ prāpya tāḍayāmāsa mūrdhani
लौह-दण्ड धारण कर, भार सहने में समर्थ उस गदा को लेकर, प्रभु ने दानवेन्द्र के पास पहुँचकर उसके सिर पर प्रहार किया।
श्लोक 22 (skanda.6.151.22)
सोऽपि खड्गेन देवेशं ताडयामास वेगतः ॥ अथ देवोऽपि सस्मार कौबेरास्त्रं महाहवे
so'pi khaḍgena deveśaṁ tāḍayāmāsa vegataḥ atha devo'pi sasmāra kauberāstraṁ mahāhave
उसने भी वेगपूर्वक तलवार से देवेश पर प्रहार किया; तब उस महासंग्राम में देव ने भी कौबेर अस्त्र का स्मरण किया।
श्लोक 23 (skanda.6.151.23)
अस्त्रेण तेन हृदये ताडयामास दानवम् ॥ ततः स ताडितस्तेन रुधिरोद्गारमुद्वमन्
astreṇa tena hṛdaye tāḍayāmāsa dānavam tataḥ sa tāḍitastena rudhirodgāramudvaman
उस अस्त्र से उन्होंने दानव के हृदय पर प्रहार किया; उससे आहत होकर वह रक्त की उलटी करने लगा।
श्लोक 24 (skanda.6.151.24)
पतितोऽधोमुखो भूत्वा ततः शूलेन भेदितः॥ शूलाग्रसंस्थितः पापश्चक्रवद्भ्रमते ततः
patito'dhomukho bhūtvā tataḥ śūlena bheditaḥ śūlāgrasaṁsthitaḥ pāpaścakravadbhramate tataḥ
वह मुँह के बल गिर पड़ा, और तब त्रिशूल से बींध दिया गया; त्रिशूल के अग्रभाग पर स्थित वह पापी चक्र के समान घूमने लगा।
श्लोक 25 (skanda.6.151.25)
अन्धकोऽपि तदात्मानं तथावस्थमवेक्ष्य च ॥ ततो वाग्भिः सुपुष्टाभिरस्तौद्देवं महेश्वरम्
andhako'pi tadātmānaṁ tathāvasthamavekṣya ca tato vāgbhiḥ supuṣṭābhirastauddevaṁ maheśvaram
अन्धक भी अपने आप को उस दशा में देखकर, तब सुपुष्ट वचनों से महेश्वर देव की स्तुति करने लगा।
श्लोक 26 (skanda.6.151.26)
अन्धक उवाच। नमस्ते जगतां धात्रे शर्वाय त्रिगुणात्मने ॥ वृषभासनसंस्थाय शशांककृतभूषण
andhaka uvāca namaste jagatāṁ dhātre śarvāya triguṇātmane vṛṣabhāsanasaṁsthāya śaśāṁkakṛtabhūṣaṇa
अन्धक ने कहा — जगत् के धाता, त्रिगुणस्वरूप शर्व को नमस्कार है; वृषभ के आसन पर विराजमान, चन्द्रमा से विभूषित प्रभु को नमस्कार है।
श्लोक 27 (skanda.6.151.27)
नमः खट्वांगहस्ताय नमः शूलधराय च ॥ नमो डमरुकोदण्डकपालानलधारिणे
namaḥ khaṭvāṁgahastāya namaḥ śūladharāya ca namo ḍamarukodaṇḍakapālānaladhāriṇe
खट्वांग को हाथ में धारण करने वाले को नमस्कार है, शूलधारी को नमस्कार है; डमरू, दण्ड, कपाल और अग्नि को धारण करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 28 (skanda.6.151.28)
स्मरदेहविनाशाय मूर्त्यष्टकमयात्मने ॥ नमः स्वरूपदेहाय ह्यरूपबहुरू पिणे
smaradehavināśāya mūrtyaṣṭakamayātmane namaḥ svarūpadehāya hyarūpabahurū piṇe
काम के शरीर का नाश करने वाले, आठ मूर्तियों में स्वयं व्याप्त रहने वाले को नमस्कार है; स्वस्वरूप देह वाले, अरूप होते हुए भी बहुरूप धारण करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 29 (skanda.6.151.29)
उत्तमांगविनाशाय विरिंचेः सृष्टिकारिणे ॥ स्मशानवासिने नित्यं नमो भैरवरूपिणे
uttamāṁgavināśāya viriṁceḥ sṛṣṭikāriṇe smaśānavāsine nityaṁ namo bhairavarūpiṇe
विरिंचि के उत्तमांग का नाश करने वाले, सृष्टि के कर्ता को, तथा नित्य श्मशानवासी भैरव-रूप वाले को नमस्कार है।
श्लोक 30 (skanda.6.151.30)
सर्वगः सर्वकर्ता च त्वं हर्ता नान्य एव हि ॥ त्वं भूमिस्त्वं रजश्चैव त्वं ज्योतिस्त्वं तमस्तथा
sarvagaḥ sarvakartā ca tvaṁ hartā nānya eva hi tvaṁ bhūmistvaṁ rajaścaiva tvaṁ jyotistvaṁ tamastathā
आप ही सर्वव्यापी हैं, आप ही सबके कर्ता और संहारकर्ता हैं, कोई अन्य नहीं; आप ही पृथ्वी हैं, आप ही रज हैं, आप ही ज्योति हैं और आप ही तम हैं।
श्लोक 31 (skanda.6.151.31)
त्वं वपुः सर्वभूतानां जीवभूतो महेश्वर ॥ अस्तौदेवं दानवेन्द्रो देवशूलाग्र संस्थितः
tvaṁ vapuḥ sarvabhūtānāṁ jīvabhūto maheśvara astaudevaṁ dānavendro devaśūlāgra saṁsthitaḥ
हे महेश्वर, आप ही समस्त प्राणियों के शरीर और उनके जीव-रूप में स्थित हैं। इस प्रकार त्रिशूल के अग्रभाग पर स्थित दानवेन्द्र ने देव की स्तुति की।
श्लोक 32 (skanda.6.151.32)
सूत उवाच। एवं तस्य स्तुतिं श्रुत्वा परितुष्टो महेश्वरः ॥ ततः प्रोवाच तं हर्षाच्छूलाग्रस्थं दनूत्तमम्
sūta uvāca evaṁ tasya stutiṁ śrutvā parituṣṭo maheśvaraḥ tataḥ provāca taṁ harṣācchūlāgrasthaṁ danūttamam
सूत जी ने कहा — इस प्रकार उसकी स्तुति सुनकर महेश्वर अत्यन्त संतुष्ट हुए, और तब हर्षपूर्वक त्रिशूल के अग्रभाग पर स्थित उस श्रेष्ठ दनुपुत्र से बोले।
श्लोक 33 (skanda.6.151.33)
श्रीभगवानुवाच। नेदं वीरव्रतं दैत्य यच्छत्रुकरपीडनात् ॥ प्रोच्यन्ते सामवाक्यानि विशेषाद्दैत्यजन्मना
śrībhagavānuvāca nedaṁ vīravrataṁ daitya yacchatrukarapīḍanāt procyante sāmavākyāni viśeṣāddaityajanmanā
श्रीभगवान ने कहा — हे दैत्य, यह वीरोचित व्रत नहीं है कि शत्रु के हाथों पीड़ित होकर, दैत्य-कुल में जन्म लेने पर भी, विशेष रूप से सामवचन बोले जाएँ।
श्लोक 34 (skanda.6.151.34)
अन्धक उवाच। निर्विण्णोऽस्मि सुरश्रेष्ठ त्रिशूलाऽग्रं समाश्रितः ॥ तस्मात्सूदय मां येन द्रुतं स्यान्मे व्यथाक्षयः
andhaka uvāca nirviṇṇo'smi suraśreṣṭha triśūlā'graṁ samāśritaḥ tasmātsūdaya māṁ yena drutaṁ syānme vyathākṣayaḥ
अन्धक ने कहा — हे सुरश्रेष्ठ, त्रिशूल के अग्रभाग पर टँगा हुआ मैं अत्यन्त खिन्न हूँ; अतः मुझे मार डालिए, जिससे मेरी पीड़ा शीघ्र ही समाप्त हो जाए।
श्लोक 35 (skanda.6.151.35)
श्रीभगवानुवाच। न तेऽस्ति मरणं दैत्य कथंचिच्चिंतितं मया ॥ तेनेत्थं विधृतं व्योम्नि भित्त्वा शूलेन वक्षसि
śrībhagavānuvāca na te'sti maraṇaṁ daitya kathaṁcicciṁtitaṁ mayā tenetthaṁ vidhṛtaṁ vyomni bhittvā śūlena vakṣasi
श्रीभगवान ने कहा — हे दैत्य, किसी भी प्रकार मैंने तुम्हारे लिए मृत्यु का विचार नहीं किया है; इसीलिए तुम्हें छाती में शूल से बींधकर आकाश में इस प्रकार धारण किया गया है।
श्लोक 36 (skanda.6.151.36)
तस्मात्त्वं गणतां गच्छ सांप्रतं पापवर्जितः ॥ त्यक्त्वा दानवजं भावं श्रद्धया परया युतः
tasmāttvaṁ gaṇatāṁ gaccha sāṁprataṁ pāpavarjitaḥ tyaktvā dānavajaṁ bhāvaṁ śraddhayā parayā yutaḥ
इसलिए अब तुम पाप से मुक्त होकर, दानव-भाव को त्यागकर और परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी गणता को प्राप्त करो।
श्लोक 37 (skanda.6.151.37)
अन्धक उवाच। गतो मे दानवो भावः सांप्रतं तव किंकरः ॥ भविष्यामि न सन्देहः सत्येनात्मानमालभे
andhaka uvāca gato me dānavo bhāvaḥ sāṁprataṁ tava kiṁkaraḥ bhaviṣyāmi na sandehaḥ satyenātmānamālabhe
अन्धक ने कहा — मेरा दानव-भाव अब नष्ट हो गया है; अब मैं आपका सेवक बनूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं — मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ।
श्लोक 38 (skanda.6.151.38)
शंकर उवाच। परितुष्टोऽस्मि ते वत्स ब्रूहि यत्तेऽभिवांछितम् ॥ प्रार्थयस्व प्रयच्छामि यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
śaṁkara uvāca parituṣṭo'smi te vatsa brūhi yatte'bhivāṁchitam prārthayasva prayacchāmi yadyapi syātsudurlabham
शंकर ने कहा — हे वत्स, मैं तुमसे संतुष्ट हूँ; जो तुम्हारे मन में अभीष्ट है, वह कहो। माँगो, मैं दूँगा, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।
श्लोक 39 (skanda.6.151.39)
अन्धक उवाच। अनेनैव तु रूपेण शृलाग्रस्थितमत्तनुम् ॥ यो मर्त्योर्च्चां प्रकृत्वा ते स्थापयिष्यति भूतले
andhaka uvāca anenaiva tu rūpeṇa śṛlāgrasthitamattanum yo martyorccāṁ prakṛtvā te sthāpayiṣyati bhūtale
अन्धक ने कहा — इसी रूप में, शूल के अग्रभाग पर स्थित मेरे इस शरीर की, जो भी मरणधर्मा मनुष्य अर्चा बनाकर पृथ्वी पर आपकी स्थापना करेगा —
श्लोक 40 (skanda.6.151.40)
तस्य मोक्षस्त्वया देयो मद्वाक्यात्सुरसत्तम ॥ तथेत्युक्त्वा महेशस्तं शूलाग्रात्प्रमुमोच ह ॥ अस्थिशेषं कृशांगं च चामुण्डासदृशं द्विजाः
tasya mokṣastvayā deyo madvākyātsurasattama tathetyuktvā maheśastaṁ śūlāgrātpramumoca ha asthiśeṣaṁ kṛśāṁgaṁ ca cāmuṇḍāsadṛśaṁ dvijāḥ
हे सुरसत्तम, मेरे इस वचन के अनुसार आप उसे मोक्ष प्रदान करें। "तथास्तु" कहकर महेश ने उसे त्रिशूल के अग्रभाग से मुक्त कर दिया — हड्डियों के शेष, कृशकाय, चामुण्डा के समान उस रूप में।
श्लोक 41 (skanda.6.151.41)
ततः स गणतां प्राप्तो गीतं चक्रे मनोहरम् ॥ पुरतो देवदेवस्य पार्वत्याश्च विशेषतः
tataḥ sa gaṇatāṁ prāpto gītaṁ cakre manoharam purato devadevasya pārvatyāśca viśeṣataḥ
तब गणपद को प्राप्त कर उसने देवों के देव तथा विशेष रूप से पार्वती के समक्ष मनोहर गीत गाया।
श्लोक 42 (skanda.6.151.42)
भृंगवद्रटनं यस्मात्तस्य श्रोत्रसुखा वहम् ॥ भृंगीरिटि इति प्रोक्तस्ततः स त्रिपुरारिणा
bhṛṁgavadraṭanaṁ yasmāttasya śrotrasukhā vaham bhṛṁgīriṭi iti proktastataḥ sa tripurāriṇā
क्योंकि उसका स्वर भ्रमर के समान श्रवण-सुखद गुंजार करने वाला था, इसीलिए त्रिपुरारि ने उसे "भृंगीरिटि" नाम से पुकारा।
श्लोक 43 (skanda.6.151.43)
एवं स गणतां प्राप्तो देवदेवस्य शूलिनः ॥ विश्वास्यः सर्वकृत्येषु तत्परं समपद्यत
evaṁ sa gaṇatāṁ prāpto devadevasya śūlinaḥ viśvāsyaḥ sarvakṛtyeṣu tatparaṁ samapadyata
इस प्रकार गणपद को प्राप्त होकर वह त्रिशूलधारी देवदेव का सर्वकार्यों में विश्वासपात्र और परम भक्त हो गया।
श्लोक 44 (skanda.6.151.44)
ततःप्रभृति लोकेऽत्र देवदेवो महेश्वरः ॥ तादृशेनैव रूपेण स्थाप्यते भूतले जनैः
tataḥprabhṛti loke'tra devadevo maheśvaraḥ tādṛśenaiva rūpeṇa sthāpyate bhūtale janaiḥ
तभी से इस लोक में देवदेव महेश्वर लोगों द्वारा उसी भैरव-रूप में पृथ्वी पर स्थापित किए जाते हैं।
श्लोक 45 (skanda.6.151.45)
प्राप्यतेऽत्र परा सिद्धिस्तत्प्रसादादलौ किकी ॥ कस्यचित्त्वथ कालस्य राज्याद्भ्रष्टो महीपतिः
prāpyate'tra parā siddhistatprasādādalau kikī kasyacittvatha kālasya rājyādbhraṣṭo mahīpatiḥ
उनकी कृपा से यहाँ अलौकिक परम सिद्धि प्राप्त होती है। तत्पश्चात् किसी समय एक राजा अपने राज्य से भ्रष्ट हो गया।
श्लोक 46 (skanda.6.151.46)
सुरथाख्यः प्रसिद्धोऽत्र सूर्यवंशसमुद्भवः ॥ ततो वसिष्ठमासाद्य स चात्मीयं पुरो हितम् ॥ प्रोवाच प्रणतो भूत्वा बाष्पव्याकुललोचनः
surathākhyaḥ prasiddho'tra sūryavaṁśasamudbhavaḥ tato vasiṣṭhamāsādya sa cātmīyaṁ puro hitam provāca praṇato bhūtvā bāṣpavyākulalocanaḥ
वह सूर्यवंश में उत्पन्न सुरथ नाम से प्रसिद्ध था। तब वह अपने पुरोहित वसिष्ठ के पास जाकर, प्रणाम करके, आँसुओं से व्याकुल नेत्रों के साथ बोला।
श्लोक 47 (skanda.6.151.47)
त्वया नाथेन मे ब्रह्मन्संस्थितेनाऽपि शत्रुभिः ॥ बलाच्च यद्धृतं राज्यं मन्द भाग्यस्य सांप्रतम्
tvayā nāthena me brahmansaṁsthitenā'pi śatrubhiḥ balācca yaddhṛtaṁ rājyaṁ manda bhāgyasya sāṁpratam
हे ब्रह्मन्, आपके स्वामी रूप में विद्यमान रहते हुए भी शत्रुओं ने बलपूर्वक जो मेरा राज्य छीन लिया है, वह अब इस अभागे की दशा है।
श्लोक 48 (skanda.6.151.48)
तस्मात्कुरु प्रसादं मे येन मे राज्यसंस्थितिः ॥ भूयोऽपि त्वत्प्रसादेन नान्या मे विद्यते गतिः
tasmātkuru prasādaṁ me yena me rājyasaṁsthitiḥ bhūyo'pi tvatprasādena nānyā me vidyate gatiḥ
अतः मुझ पर कृपा कीजिए, जिससे मेरा राज्य फिर से स्थिर हो सके; आपकी कृपा के अतिरिक्त मेरे लिए और कोई गति नहीं है।
श्लोक 49 (skanda.6.151.49)
वसिष्ठ उवाच। यद्येवं ते महाराज मद्वाक्यात्सत्वरं व्रज ॥ हाटकेश्वरजं क्षेत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम्
vasiṣṭha uvāca yadyevaṁ te mahārāja madvākyātsatvaraṁ vraja hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ sarvasiddhipradāyakam
वसिष्ठ ने कहा — हे महाराज, यदि ऐसा है, तो मेरे वचन से शीघ्र ही उस हाटकेश्वर क्षेत्र को जाओ, जो समस्त सिद्धियाँ देने वाला है।
श्लोक 50 (skanda.6.151.50)
तत्र भैरवरूपेण स्थापयित्वा महेश्वरम् ॥ भुजोद्यतोग्रशूलाग्रविद्धान्धककलेवरम्
tatra bhairavarūpeṇa sthāpayitvā maheśvaram bhujodyatograśūlāgraviddhāndhakakalevaram
वहाँ भुजा में उठाए हुए भयंकर त्रिशूल के अग्रभाग पर बींधे गए अन्धक के शरीर सहित भैरव-रूप में महेश्वर की स्थापना करके —
श्लोक 51 (skanda.6.151.51)
नारसिंहेन मंत्रेण ततः पूजय तं नृप ॥ रक्तपुष्पैस्तथा धूपै रक्तैश्चैवानुलेपनैः
nārasiṁhena maṁtreṇa tataḥ pūjaya taṁ nṛpa raktapuṣpaistathā dhūpai raktaiścaivānulepanaiḥ
हे राजन्, तब नारसिंह मन्त्र से, लाल पुष्पों, लाल धूप और लाल अनुलेपन से उनकी पूजा करो।
श्लोक 52 (skanda.6.151.52)
ततः सद्वीर्य मासाद्य तेजोवीर्यसमन्वितः ॥ हनिष्यस्यखिलाञ्छत्रूंस्तत्प्रसादादसंशयम्
tataḥ sadvīrya māsādya tejovīryasamanvitaḥ haniṣyasyakhilāñchatrūṁstatprasādādasaṁśayam
तब सच्चा पराक्रम पाकर, तेज और वीर्य से सम्पन्न होकर, उनकी कृपा से तुम निश्चय ही समस्त शत्रुओं को नष्ट कर दोगे।
श्लोक 53 (skanda.6.151.53)
परं शौचसमेतेन संपूज्यो भगवांस्त्वया ॥ अन्यथा प्राप्स्यसे विघ्नान्सत्यमेतन्मयोदितम्
paraṁ śaucasametena saṁpūjyo bhagavāṁstvayā anyathā prāpsyase vighnānsatyametanmayoditam
किन्तु भगवान को पूर्ण शौच से युक्त होकर ही पूजना चाहिए, अन्यथा तुम्हें विघ्नों का सामना करना पड़ेगा — यह मैंने सत्य कहा है।
श्लोक 54 (skanda.6.151.54)
अथ तस्य वचः श्रुत्वा स राजा सत्वरं ययौ ॥ तत्र क्षेत्रे ततो देवं स्थापयामास भैरवम्
atha tasya vacaḥ śrutvā sa rājā satvaraṁ yayau tatra kṣetre tato devaṁ sthāpayāmāsa bhairavam
तब उनके वचन सुनकर वह राजा शीघ्र ही चल पड़ा, और उस क्षेत्र में जाकर भैरव देव की स्थापना की।
श्लोक 55 (skanda.6.151.55)
ततः संपूजयामास नारसिंहेन भक्तितः ॥ मन्त्रेण प्रयतो भूत्वा ब्रह्मचर्यपरायणः
tataḥ saṁpūjayāmāsa nārasiṁhena bhaktitaḥ mantreṇa prayato bhūtvā brahmacaryaparāyaṇaḥ
तत्पश्चात् वह शुद्ध होकर तथा ब्रह्मचर्य में तत्पर होकर नारसिंह मन्त्र से भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करने लगा।
श्लोक 56 (skanda.6.151.56)
ततो दशसहस्रांते तस्य मंत्रस्य संख्यया ॥ भैरवस्तुष्टिमापन्नः प्रोवा च तदनन्तरम्
tato daśasahasrāṁte tasya maṁtrasya saṁkhyayā bhairavastuṣṭimāpannaḥ provā ca tadanantaram
तब उस मन्त्र की दस हजार संख्या पूर्ण होने पर भैरव संतुष्ट हुए और उसके बाद बोले।
श्लोक 57 (skanda.6.151.57)
श्रीभैरव उवाच। परितुष्टोऽस्मि ते राजन्मंत्रेणानेन पूजितः ॥ तस्मात्प्रार्थय यच्चेष्टं येन सर्वं ददाम्यहम्
śrībhairava uvāca parituṣṭo'smi te rājanmaṁtreṇānena pūjitaḥ tasmātprārthaya yacceṣṭaṁ yena sarvaṁ dadāmyaham
श्रीभैरव ने कहा — हे राजन्, इस मन्त्र से पूजित होकर मैं तुमसे संतुष्ट हूँ; अतः जो भी अभीष्ट हो, माँगो, मैं सब कुछ दूँगा।
श्लोक 58 (skanda.6.151.58)
सुरथ उवाच। शत्रुभिर्मे हृतं राज्यं त्वत्प्रसादात्सुरेश्वर ॥ तन्मे भवतु भूयोऽपि शत्रुभिः परिवर्ज्जितम्
suratha uvāca śatrubhirme hṛtaṁ rājyaṁ tvatprasādātsureśvara tanme bhavatu bhūyo'pi śatrubhiḥ parivarjjitam
सुरथ ने कहा — हे सुरेश्वर, आपकी कृपा से मेरा शत्रुओं द्वारा छीना गया राज्य फिर से मुझे मिले, और शत्रुओं से रहित हो।
श्लोक 59 (skanda.6.151.59)
अन्योऽपि यः पुमानित्थं त्वामिहागत्य पूजयेत् ॥ अनेनैव तु मंत्रेण तस्य सिद्धिस्त्वया विभो
anyo'pi yaḥ pumānitthaṁ tvāmihāgatya pūjayet anenaiva tu maṁtreṇa tasya siddhistvayā vibho
हे विभो, इसके अतिरिक्त जो भी अन्य पुरुष यहाँ आकर इसी मन्त्र से आपकी पूजा करे, उसे भी आपके द्वारा सिद्धि प्राप्त हो।
श्लोक 60 (skanda.6.151.60)
देया देव सहस्रांते यथा मम सुरेश्वर ॥ तथेति तं प्रतिज्ञाय गतश्चादर्शनं हरः
deyā deva sahasrāṁte yathā mama sureśvara tatheti taṁ pratijñāya gataścādarśanaṁ haraḥ
हे देव, जैसे मुझे मिली, वैसे ही हे सुरेश्वर, एक हजार जप पूर्ण होने पर उसे भी सिद्धि दी जाए। "तथास्तु" कहकर यह वचन देकर हर अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 61 (skanda.6.151.61)
सुरथोऽपि निजं राज्यं प्राप हत्वा रणे रिपून्
suratho'pi nijaṁ rājyaṁ prāpa hatvā raṇe ripūn
सुरथ ने भी रणभूमि में शत्रुओं का वध करके अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।