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नागर खण्ड · अध्याय 152

अर्जुन-प्रतिष्ठित चक्रपाणि-माहात्म्य

अध्याय 151अध्याय-सूचीअध्याय 153

श्लोक 1 (skanda.6.152.1)

ऋषय ऊचुः। असंख्यातानि तीर्थानि त्वयोक्ता न्यत्र सूतज ॥ देवमानुषजातानि देवतायतनानि च ॥ तथा वानरजातानि राक्षसस्थापितानि च

ṛṣaya ūcuḥ asaṁkhyātāni tīrthāni tvayoktā nyatra sūtaja devamānuṣajātāni devatāyatanāni ca tathā vānarajātāni rākṣasasthāpitāni ca

ऋषियों ने कहा — हे सूतज! आपने यहाँ देवताओं और मनुष्यों द्वारा बनाए गए, देवालयों के तथा वानरों और राक्षसों द्वारा स्थापित किए गए असंख्य तीर्थों का वर्णन किया है।

श्लोक 2 (skanda.6.152.2)

सूतपुत्र वदास्माकं यैर्दृष्टैः स्पर्शितैरपि ॥ सर्वेषां लभ्यते पूर्णं फलं चेप्सितमत्र च

sūtaputra vadāsmākaṁ yairdṛṣṭaiḥ sparśitairapi sarveṣāṁ labhyate pūrṇaṁ phalaṁ cepsitamatra ca

हे सूतपुत्र, हमें बताइए कि किन-किन तीर्थों के दर्शन और स्पर्श मात्र से ही यहाँ सबको पूर्ण तथा वांछित फल प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (skanda.6.152.3)

सूत उवाच। सत्यमेतन्महाभागास्तत्र संख्या न विद्यते ॥ तीर्थानां चैव लिंगानामाश्र माणां तथैव च

sūta uvāca satyametanmahābhāgāstatra saṁkhyā na vidyate tīrthānāṁ caiva liṁgānāmāśra māṇāṁ tathaiva ca

सूत जी ने कहा — हे महाभागो, यह सत्य है कि वहाँ तीर्थों, लिंगों तथा आश्रमों की कोई गिनती नहीं है।

श्लोक 4 (skanda.6.152.4)

तत्र यः कुरुते स्नानं शंखतीर्थे समाहितः ॥ एकादश्यां विशेषेण सर्वेषां लभते फलम्

tatra yaḥ kurute snānaṁ śaṁkhatīrthe samāhitaḥ ekādaśyāṁ viśeṣeṇa sarveṣāṁ labhate phalam

जो वहाँ शंखतीर्थ में, विशेष रूप से एकादशी के दिन, एकाग्रचित्त होकर स्नान करता है, वह सबका फल प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 5 (skanda.6.152.5)

यः पश्यति नरो भक्त्या तत्रैकादशरुद्रकम् ॥ सिद्धेश्वरसमं तेन दृष्टाः सर्वे महेश्वराः

yaḥ paśyati naro bhaktyā tatraikādaśarudrakam siddheśvarasamaṁ tena dṛṣṭāḥ sarve maheśvarāḥ

जो मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक एकादश रुद्रों का दर्शन करता है, उसके द्वारा सिद्धेश्वर के समान सभी महेश्वरों का दर्शन हो जाता है।

श्लोक 6 (skanda.6.152.6)

यः पश्यति वटादित्यं षष्ठ्यां चैत्रे विशेषतः ॥ भास्कराकृत्स्नशो दृष्टास्तेन तत्रहि संस्थिताः

yaḥ paśyati vaṭādityaṁ ṣaṣṭhyāṁ caitre viśeṣataḥ bhāskarākṛtsnaśo dṛṣṭāstena tatrahi saṁsthitāḥ

जो चैत्र मास की षष्ठी को विशेष रूप से वटादित्य का दर्शन करता है, उसके द्वारा वहाँ स्थित समस्त सूर्य-रूपों का सम्पूर्ण दर्शन हो जाता है।

श्लोक 7 (skanda.6.152.7)

माहित्थां पश्यति तथा ये देवीं श्रद्धयाविताः ॥ तेन दुर्गाः समस्तास्ता वीक्षिता नात्र संशयः

māhitthāṁ paśyati tathā ye devīṁ śraddhayāvitāḥ tena durgāḥ samastāstā vīkṣitā nātra saṁśayaḥ

तथा जो श्रद्धायुक्त होकर देवी माहित्था का दर्शन करते हैं, उनके द्वारा समस्त दुर्गाओं का दर्शन हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 8 (skanda.6.152.8)

यः पश्यति गणेशं च स्वर्गद्वारप्रदं नृणाम् ॥ सर्वे विनायकास्तेन दृष्टाः स्युर्नात्र संशयः

yaḥ paśyati gaṇeśaṁ ca svargadvārapradaṁ nṛṇām sarve vināyakāstena dṛṣṭāḥ syurnātra saṁśayaḥ

जो मनुष्यों के लिए स्वर्ग का द्वार खोलने वाले गणेश का दर्शन करता है, उसके द्वारा समस्त विनायकों का दर्शन हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 9 (skanda.6.152.9)

शर्मिष्ठास्थापितां गौरीं यो ज्येष्ठां तत्र पश्यति ॥ तेन गौर्यः समस्तास्ता वीक्षिता द्विजसत्तमाः

śarmiṣṭhāsthāpitāṁ gaurīṁ yo jyeṣṭhāṁ tatra paśyati tena gauryaḥ samastāstā vīkṣitā dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो, जो वहाँ शर्मिष्ठा द्वारा स्थापित ज्येष्ठ गौरी का दर्शन करता है, उसके द्वारा समस्त गौरियों का दर्शन हो जाता है।

श्लोक 10 (skanda.6.152.10)

चक्रपाणिं च यः पश्येत्प्रातरुत्थाय मानवः ॥ वासुदेवा समस्ताश्च तेन तत्र निरीक्षिताः

cakrapāṇiṁ ca yaḥ paśyetprātarutthāya mānavaḥ vāsudevā samastāśca tena tatra nirīkṣitāḥ

और जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर चक्रपाणि का दर्शन करता है, उसके द्वारा वहाँ स्थित समस्त वासुदेवों का दर्शन हो जाता है।

श्लोक 11 (skanda.6.152.11)

ऋषय ऊचुः। त्वयासूत तथाऽस्माकं चक्रपाणिश्च यः स्थितः ॥ नाख्यातः स कथं तत्र विस्मृतः किं वदस्व नः ॥ कस्मिन्काले विशेषेण स द्रष्टव्यो मनीषिभिः

ṛṣaya ūcuḥ tvayāsūta tathā'smākaṁ cakrapāṇiśca yaḥ sthitaḥ nākhyātaḥ sa kathaṁ tatra vismṛtaḥ kiṁ vadasva naḥ kasminkāle viśeṣeṇa sa draṣṭavyo manīṣibhiḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूत, आपने हमें यह तो बताया, किन्तु वहाँ स्थित जो चक्रपाणि हैं, उनका वर्णन आपने क्यों नहीं किया, वे कैसे भूल गए, यह हमें बताइए; तथा विद्वानों को उनका दर्शन विशेष रूप से किस समय करना चाहिए।

श्लोक 12 (skanda.6.152.12)

सूत उवाच। अर्जुनेनैष विप्रेन्द्राः क्षेत्रेऽत्रैव प्रतिष्ठितः ॥ शयने बोधने चैव प्रातरुत्थाय मानवः

sūta uvāca arjunenaiṣa viprendrāḥ kṣetre'traiva pratiṣṭhitaḥ śayane bodhane caiva prātarutthāya mānavaḥ

सूत जी ने कहा — हे विप्रेन्द्रो, इसी क्षेत्र में अर्जुन द्वारा यह प्रतिष्ठित किया गया था। शयन और बोधन के अवसर पर, तथा प्रातःकाल उठकर मनुष्य —

श्लोक 13 (skanda.6.152.13)

स्नानं कृत्वा सुभक्त्या च यः पश्येच्चक्रपाणिनम् ॥ ब्रह्महत्यादिपापानि तस्य नश्यंति तत्क्षणात्

snānaṁ kṛtvā subhaktyā ca yaḥ paśyeccakrapāṇinam brahmahatyādipāpāni tasya naśyaṁti tatkṣaṇāt

— जो स्नान करके भक्तिपूर्वक चक्रपाणि का दर्शन करता है, उसके ब्रह्महत्या आदि पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 14 (skanda.6.152.14)

भूभारोत्तारणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥ ब्रह्मणावतारितौ विप्रा नरनारायणावुभौ

bhūbhārottāraṇārthāya dharmasaṁsthāpanāya ca brahmaṇāvatāritau viprā naranārāyaṇāvubhau

हे विप्रो, पृथ्वी का भार उतारने और धर्म की स्थापना करने के लिए ब्रह्मा द्वारा नर और नारायण — दोनों को अवतरित किया गया।

श्लोक 15 (skanda.6.152.15)

कृष्णार्जुनौ तदा मर्त्ये द्वापरांते द्विजोत्तमाः ॥ अवतीर्णो धरापृष्ठे मिथः स्नेहानुगौ तदा ॥ नरनारायणावेतौ स्वयमेव व्यवस्थितौ

kṛṣṇārjunau tadā martye dvāparāṁte dvijottamāḥ avatīrṇo dharāpṛṣṭhe mithaḥ snehānugau tadā naranārāyaṇāvetau svayameva vyavasthitau

हे द्विजोत्तमो, द्वापर के अन्त में वे ही नर-नारायण, परस्पर स्नेह से बँधे हुए, कृष्ण और अर्जुन के रूप में मृत्युलोक की पृथ्वी पर स्वयं अवतीर्ण हुए और स्थित हुए।

श्लोक 16 (skanda.6.152.16)

यथा रक्षोविनाशाय रामो दशरथात्मजः ॥ अवतीर्णो धरापृष्ठे तद्वत्कृष्णोऽपि चापरः

yathā rakṣovināśāya rāmo daśarathātmajaḥ avatīrṇo dharāpṛṣṭhe tadvatkṛṣṇo'pi cāparaḥ

जैसे राक्षसों के विनाश के लिए दशरथ-पुत्र राम पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए थे, वैसे ही दूसरे रूप में कृष्ण भी अवतीर्ण हुए।

श्लोक 17 (skanda.6.152.17)

यदा पार्थः समायातस्तीर्थयात्रां प्रति द्विजाः ॥ युधिष्ठिरसमादेशाच्छक्रप्रस्थात्पुरोत्तमात्

yadā pārthaḥ samāyātastīrthayātrāṁ prati dvijāḥ yudhiṣṭhirasamādeśācchakraprasthātpurottamāt

हे द्विजो, जब युधिष्ठिर की आज्ञा से पार्थ (अर्जुन) उस श्रेष्ठ नगर शक्रप्रस्थ से तीर्थयात्रा के लिए निकले —

श्लोक 18 (skanda.6.152.18)

द्रौपद्या सहितं दृष्ट्वा रहसि भ्रातरं द्विजम् ॥ प्रोवाच प्रणतो भूत्वा विनयावनतोऽर्जुनः

draupadyā sahitaṁ dṛṣṭvā rahasi bhrātaraṁ dvijam provāca praṇato bhūtvā vinayāvanato'rjunaḥ

— तब द्रौपदी के साथ एकान्त में अपने भाई युधिष्ठिर को देखकर, विनयपूर्वक झुककर, प्रणाम करके अर्जुन बोले।

श्लोक 19 (skanda.6.152.19)

अर्जुन उवाच। आयुधार्थमहं प्राप्तः सांप्रतं पार्थिवोत्तम ॥ द्विजधेनुविमोक्षाय ममाज्ञां देहि पार्थिव

arjuna uvāca āyudhārthamahaṁ prāptaḥ sāṁprataṁ pārthivottama dvijadhenuvimokṣāya mamājñāṁ dehi pārthiva

अर्जुन ने कहा — हे राजाओं में श्रेष्ठ, मैं इस समय अपने शस्त्र लेने आया हूँ; हे राजन्, ब्राह्मण की गायों को छुड़ाने के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

श्लोक 20 (skanda.6.152.20)

युधिष्ठिर उवाच। गच्छार्जुन द्रुतं तत्र नीयन्ते यत्र तस्करैः ॥ धेनवो द्विजवर्यस्य ता मोक्षय धनंजय

yudhiṣṭhira uvāca gacchārjuna drutaṁ tatra nīyante yatra taskaraiḥ dhenavo dvijavaryasya tā mokṣaya dhanaṁjaya

युधिष्ठिर ने कहा — हे अर्जुन, शीघ्र वहाँ जाओ जहाँ चोर श्रेष्ठ ब्राह्मण की गायों को ले जा रहे हैं; हे धनंजय, उन्हें छुड़ाओ।

श्लोक 21 (skanda.6.152.21)

तीर्थयात्रां ततो गच्छ यावद्द्वादशवत्सरान् ॥ ततः पापविनिर्मुक्तः समेष्यसि ममांतिकम्

tīrthayātrāṁ tato gaccha yāvaddvādaśavatsarān tataḥ pāpavinirmuktaḥ sameṣyasi mamāṁtikam

फिर बारह वर्षों तक तीर्थयात्रा पर जाओ; उसके बाद पापों से मुक्त होकर मेरे पास लौट आना।

श्लोक 22 (skanda.6.152.22)

यः सदारं नरं पश्येदेकांतस्थं तु बुद्धिमान् ॥ अपि चात्यंतपापः स्यात्किं पुनर्निजबांधवम्

yaḥ sadāraṁ naraṁ paśyedekāṁtasthaṁ tu buddhimān api cātyaṁtapāpaḥ syātkiṁ punarnijabāṁdhavam

क्योंकि जो बुद्धिमान पुरुष अपनी पत्नी सहित एकान्त में बैठे किसी और पुरुष को देखता है, वह भी अत्यन्त पापी हो जाता है, फिर अपने ही बन्धु को देखने की तो बात ही क्या।

श्लोक 23 (skanda.6.152.23)

तस्मान्न वीक्षयेत्कञ्चिदेकांतस्थं सभार्यकम् ॥ बांधवं च विशेषेण य इच्छेच्छुभमात्मनः

tasmānna vīkṣayetkañcidekāṁtasthaṁ sabhāryakam bāṁdhavaṁ ca viśeṣeṇa ya icchecchubhamātmanaḥ

इसलिए जो अपने कल्याण की इच्छा रखता हो, उसे अपनी पत्नी के साथ एकान्त में स्थित किसी को, विशेषतः अपने बन्धु को, नहीं देखना चाहिए।

श्लोक 24 (skanda.6.152.24)

स तथेति प्रतिज्ञाय रथमारुह्य सत्वरम् ॥ धनुरादाय बाणांश्च जगाम तदनन्तरम्

sa tatheti pratijñāya rathamāruhya satvaram dhanurādāya bāṇāṁśca jagāma tadanantaram

"तथास्तु" कहकर प्रतिज्ञा करके, रथ पर सवार होकर, धनुष-बाण लेकर, वे तत्काल वहाँ से चले गए।

श्लोक 25 (skanda.6.152.25)

येन मार्गेण ता गावो नीयन्ते तस्करैर्बलात् ॥ तिरस्कृत्य द्विजान्सर्वाञ्छितशस्त्रधरैर्द्विजाः

yena mārgeṇa tā gāvo nīyante taskarairbalāt tiraskṛtya dvijānsarvāñchitaśastradharairdvijāḥ

हे द्विजो, जिस मार्ग से शस्त्रधारी चोर सभी ब्राह्मणों को तिरस्कृत कर उन गायों को बलपूर्वक ले जा रहे थे —

श्लोक 26 (skanda.6.152.26)

अथ हत्वा क्षणाच्चौरान्गाः सर्वाः स्वयमाहृताः ॥ स्वाः स्वा निवेदयामास ब्राह्मणानां महात्मनाम्

atha hatvā kṣaṇāccaurāngāḥ sarvāḥ svayamāhṛtāḥ svāḥ svā nivedayāmāsa brāhmaṇānāṁ mahātmanām

— उसी मार्ग पर जाकर, क्षणभर में चोरों को मारकर, उन्होंने सभी गायों को स्वयं वापस लाकर उन महात्मा ब्राह्मणों को उनकी-उनकी गायें लौटा दीं।

श्लोक 27 (skanda.6.152.27)

ततस्तीर्थान्यनेकानि स दृष्ट्वायतनानि च ॥ क्षेत्रेऽत्रैव समायातः स्नानार्थं पांडुनन्दनः

tatastīrthānyanekāni sa dṛṣṭvāyatanāni ca kṣetre'traiva samāyātaḥ snānārthaṁ pāṁḍunandanaḥ

तत्पश्चात् वे पाण्डुनन्दन (अर्जुन) अनेक तीर्थों और देवायतनों का दर्शन करते हुए स्नान के लिए इसी क्षेत्र में आए।

श्लोक 28 (skanda.6.152.28)

तेन पूर्वमपि प्रायस्तत्क्षेत्रमवलोकितम् ॥ दुर्योधनसमायुक्तो यदा तत्र समागतः

tena pūrvamapi prāyastatkṣetramavalokitam duryodhanasamāyukto yadā tatra samāgataḥ

उन्होंने इस क्षेत्र को पहले भी प्रायः देखा था, जब वे दुर्योधन के साथ वहाँ आए थे।

श्लोक 29 (skanda.6.152.29)

अथ संपूजयामास यल्लिंगं स्थापितं पुरा ॥ अर्जुनेश्वर संज्ञं तु पुष्पधूपानुलेपनैः

atha saṁpūjayāmāsa yalliṁgaṁ sthāpitaṁ purā arjuneśvara saṁjñaṁ tu puṣpadhūpānulepanaiḥ

तब उन्होंने पुष्प, धूप और अनुलेपन से, पूर्वकाल में स्थापित उस अर्जुनेश्वर नामक लिंग की पूजा की —

श्लोक 30 (skanda.6.152.30)

अन्येषां कौरवेन्द्राणां पांडवानां विशेषतः

anyeṣāṁ kauravendrāṇāṁ pāṁḍavānāṁ viśeṣataḥ

— जिसे अन्य कौरवेन्द्रों ने, और विशेष रूप से पाण्डवों ने भी, पहले स्थापित किया था।

श्लोक 31 (skanda.6.152.31)

अथ संचिंतयामास मनसा पांडुनंदनः ॥ अहं नरः स्वयं साक्षात्कृष्णो नारायणः स्वयम्

atha saṁciṁtayāmāsa manasā pāṁḍunaṁdanaḥ ahaṁ naraḥ svayaṁ sākṣātkṛṣṇo nārāyaṇaḥ svayam

तब पाण्डु-पुत्र मन में विचार करने लगे — "मैं स्वयं साक्षात् नर हूँ, और कृष्ण स्वयं साक्षात् नारायण हैं।

श्लोक 32 (skanda.6.152.32)

तस्मादत्र करिष्यामि चक्रपाणिं सुरेश्वरम् ॥ प्रासादो मानवश्चैव यादृङ्नास्ति धरातले

tasmādatra kariṣyāmi cakrapāṇiṁ sureśvaram prāsādo mānavaścaiva yādṛṅnāsti dharātale

अतः यहाँ मैं देवेश्वर चक्रपाणि को स्थापित करूँगा, तथा ऐसा मन्दिर बनवाऊँगा जैसा पृथ्वी पर मनुष्यों द्वारा बनाया हुआ अन्य कोई नहीं है।

श्लोक 33 (skanda.6.152.33)

कल्पांतेऽपि न नाशः स्यादस्य क्षेत्रस्य कर्हिचित् ॥ प्रासादोऽपि तथाप्येवमत्र क्षेत्रे भविष्यति

kalpāṁte'pi na nāśaḥ syādasya kṣetrasya karhicit prāsādo'pi tathāpyevamatra kṣetre bhaviṣyati

इस क्षेत्र का नाश कल्प के अन्त में भी कभी नहीं होगा, और यह मन्दिर भी इसी क्षेत्र में इसी प्रकार बना रहेगा।"

श्लोक 34 (skanda.6.152.34)

एवं स निश्चयं कृत्वा स्वचित्ते पांडवानुजः ॥ प्रासादं निर्ममे पश्चाद्वैष्णवं द्विजसत्तमाः

evaṁ sa niścayaṁ kṛtvā svacitte pāṁḍavānujaḥ prāsādaṁ nirmame paścādvaiṣṇavaṁ dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो, मन में ऐसा निश्चय करके पाण्डु के इस पुत्र ने तत्पश्चात् एक वैष्णव मन्दिर बनवाया।

श्लोक 35 (skanda.6.152.35)

ततो विप्रान्समाहूय चमत्कारपुरोद्भवान्॥ प्रतिष्ठां कारयामास मतं तेषां समाश्रितः

tato viprānsamāhūya camatkārapurodbhavān pratiṣṭhāṁ kārayāmāsa mataṁ teṣāṁ samāśritaḥ

फिर चमत्कारपुर में उत्पन्न ब्राह्मणों को बुलाकर, उनके मत का आश्रय लेकर, उन्होंने प्रतिष्ठा करवाई।

श्लोक 36 (skanda.6.152.36)

दत्त्वा दानान्यनेकानि शासनानि बहूनि च ॥ अन्यच्च प्रददौ पश्चात्स तेषां तुष्टिदायकम्

dattvā dānānyanekāni śāsanāni bahūni ca anyacca pradadau paścātsa teṣāṁ tuṣṭidāyakam

उन्हें अनेक दान, बहुत से शासन-पत्र (भूमि-अनुदान) तथा उसके बाद और भी वह सब कुछ दिया जिससे वे संतुष्ट हों।

श्लोक 37 (skanda.6.152.37)

ततः प्रोवाच तान्सर्वान्कृतांजलिपुटः स्थितः॥ नरोऽहं ब्राह्मणाज्जातः पाण्डोर्भूमिं प्रपेदिवान्

tataḥ provāca tānsarvānkṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ naro'haṁ brāhmaṇājjātaḥ pāṇḍorbhūmiṁ prapedivān

फिर हाथ जोड़कर खड़े होकर उन सबसे बोले — "मैं नर हूँ, जो एक ब्राह्मण से उत्पन्न हुआ और पाण्डु के कुल में भूमि पर अवतरित हुआ।

श्लोक 38 (skanda.6.152.38)

मानुषेणैव रूपेण त्यक्त्वा तां बदरीं शुभाम् ॥ प्रसिद्ध्यर्थं मया चात्र प्रासादोऽयं विनि र्मितः ॥ मन्नाम्ना नरसंज्ञश्च श्रद्धापूतेन चेतसा

mānuṣeṇaiva rūpeṇa tyaktvā tāṁ badarīṁ śubhām prasiddhyarthaṁ mayā cātra prāsādo'yaṁ vini rmitaḥ mannāmnā narasaṁjñaśca śraddhāpūtena cetasā

उस पावन बदरी को छोड़कर मैंने मनुष्य के ही रूप में, अपनी प्रसिद्धि के लिए, श्रद्धा से पवित्र हुए चित्त से यहाँ यह मन्दिर बनवाया है, जो मेरे नाम पर 'नर' नाम से जाना जाएगा।

श्लोक 39 (skanda.6.152.39)

तस्मादेष भवद्भिश्च चक्रपाणिरिति द्विजाः ॥ कीर्तनीयः सदा येन मम नाम प्रकाश्य ताम्

tasmādeṣa bhavadbhiśca cakrapāṇiriti dvijāḥ kīrtanīyaḥ sadā yena mama nāma prakāśya tām

हे द्विजो, इसलिए यह देव आपके द्वारा सदा 'चक्रपाणि' कहकर कीर्तित किया जाए, जिससे मेरा नाम सदा प्रकाशित रहे —

श्लोक 40 (skanda.6.152.40)

विष्णुलोके ध्वनिर्याति यावच्चंद्रदिवाकरौ

viṣṇuloke dhvaniryāti yāvaccaṁdradivākarau

— यह ध्वनि जब तक चन्द्रमा और सूर्य रहेंगे, तब तक विष्णुलोक तक पहुँचती रहे।

श्लोक 41 (skanda.6.152.41)

तथा महोत्सवः कार्यः शयने बोधने हरेः ॥ चैत्रमासे विशेषेण संप्राप्ते विष्णुवासरे

tathā mahotsavaḥ kāryaḥ śayane bodhane hareḥ caitramāse viśeṣeṇa saṁprāpte viṣṇuvāsare

तथा हरि के शयन और बोधन के अवसरों पर, विशेष रूप से चैत्र मास में विष्णु-दिवस के आने पर, महोत्सव मनाया जाए।

श्लोक 42 (skanda.6.152.42)

एतेषु त्रिषु लोकेषु त्यक्त्वेमां बदरीमहम् ॥ पूजामस्य करिष्यामि स्वयं विष्णोर्द्विजोत्तमाः

eteṣu triṣu lokeṣu tyaktvemāṁ badarīmaham pūjāmasya kariṣyāmi svayaṁ viṣṇordvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो, इन तीनों लोकों में इस बदरी को छोड़कर मैं स्वयं यहीं विष्णु की इस पूजा को ग्रहण करूँगा।

श्लोक 43 (skanda.6.152.43)

यस्तत्र दिवसे मर्त्यः पूजामस्य विधा स्यति ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स यास्यति

yastatra divase martyaḥ pūjāmasya vidhā syati sarvapāpavinirmukto viṣṇulokaṁ sa yāsyati

जो मरणधर्मा मनुष्य उस दिन इनकी पूजा करेगा, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होगा।

श्लोक 44 (skanda.6.152.44)

तथा ये वासुदेवस्य क्षेत्रे केचिद्व्यवस्थिताः ॥ तेषां प्रदर्शनं श्रेयो नित्यं दृष्ट्वा च लप्स्यते

tathā ye vāsudevasya kṣetre kecidvyavasthitāḥ teṣāṁ pradarśanaṁ śreyo nityaṁ dṛṣṭvā ca lapsyate

तथा जो अन्य वासुदेव-रूप वहाँ इस क्षेत्र में स्थित हैं, उनका दर्शन भी कल्याणकारी है; उन्हें नित्य देखने से भी वही फल प्राप्त होगा।"

श्लोक 45 (skanda.6.152.45)

सूत उवाच। बाढमित्येव तैरुक्तो दाशार्हः पांडुनंदनः॥ तेषां तद्भारमावेश्य प्रशांतेनांतरात्मना॥ ययौ तीर्थानि चान्यानि कृतकृत्यस्ततः परम्

sūta uvāca bāḍhamityeva tairukto dāśārhaḥ pāṁḍunaṁdanaḥ teṣāṁ tadbhāramāveśya praśāṁtenāṁtarātmanā yayau tīrthāni cānyāni kṛtakṛtyastataḥ param

सूत जी ने कहा — "ऐसा ही हो" कहकर उन ब्राह्मणों द्वारा सम्मत होने पर, दाशार्ह-कुल के उस पाण्डु-पुत्र ने उन पर वह भार सौंपकर, शान्त अन्तःकरण से, कृतकृत्य होकर, फिर अन्य तीर्थों की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 46 (skanda.6.152.46)

एवं तत्र स्थितो देवश्चक्रपाणिवपुर्द्धरः॥ स्वयमेव हृषीकेशो जंतूनां पापनाशनः

evaṁ tatra sthito devaścakrapāṇivapurddharaḥ svayameva hṛṣīkeśo jaṁtūnāṁ pāpanāśanaḥ

इस प्रकार वहाँ चक्रपाणि का रूप धारण किए हुए स्वयं हृषीकेश देव, प्राणियों के पापों का नाश करने वाले, स्थित हैं।

श्लोक 47 (skanda.6.152.47)

अद्याऽपि च कला विष्णोः प्राप्ते चैकादशीत्रये ॥ पूर्वोक्तेन विधानेन तस्माच्छ्रद्धासमन्वितैः ॥ सदैव पूजनीयश्च वन्दनीयो विशेषतः

adyā'pi ca kalā viṣṇoḥ prāpte caikādaśītraye pūrvoktena vidhānena tasmācchraddhāsamanvitaiḥ sadaiva pūjanīyaśca vandanīyo viśeṣataḥ

आज भी विष्णु की वह कला वहाँ विद्यमान है; अतः तीनों एकादशियों के आने पर, पूर्वोक्त विधि से, श्रद्धायुक्त जनों द्वारा वे सदा पूज्य और विशेष रूप से वन्दनीय हैं।

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