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नागर खण्ड · अध्याय 153

रूपतीर्थ तथा अप्सरःकुण्ड की उत्पत्ति

अध्याय 152अध्याय-सूचीअध्याय 154

श्लोक 1 (skanda.6.153.1)

सूत उवाच। तथान्यदपि तत्रास्ति रूपतीर्थमनुत्तमम् ॥ यत्र स्नातो नरः सम्यग्विरूपो रूपवान्भवेत्

sūta uvāca tathānyadapi tatrāsti rūpatīrthamanuttamam yatra snāto naraḥ samyagvirūpo rūpavānbhavet

सूत जी ने कहा — वहाँ एक और अत्युत्तम रूपतीर्थ भी है, जहाँ स्नान करने पर अत्यन्त कुरूप मनुष्य भी रूपवान हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.6.153.2)

पूर्वं भगवता तेन ब्रह्मणा लोक कर्तृणा ॥ सृष्टिं कृत्वा च विस्तीर्णां यथोक्तं च चतुर्विधाम्

pūrvaṁ bhagavatā tena brahmaṇā loka kartṛṇā sṛṣṭiṁ kṛtvā ca vistīrṇāṁ yathoktaṁ ca caturvidhām

पूर्वकाल में लोक के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने, विस्तीर्ण सृष्टि की रचना करके, जैसा कहा गया है, चार प्रकार की सृष्टि करके —

श्लोक 3 (skanda.6.153.3)

ततः स चिन्तयामास रूपसंचयसंयुताम् । एकामप्सरसं दिव्यां देवमायां सृजाम्यहम्

tataḥ sa cintayāmāsa rūpasaṁcayasaṁyutām ekāmapsarasaṁ divyāṁ devamāyāṁ sṛjāmyaham

तब उन्होंने विचार किया — "मैं रूप-राशि से युक्त एक दिव्य अप्सरा, देवमाया-स्वरूप, रचूँगा।"

श्लोक 4 (skanda.6.153.4)

ततश्च सर्वदेवानां समादाय तिलंतिलम्॥ रूपं च निर्ममे पश्चादत्याश्चर्यमयीं च ताम्

tataśca sarvadevānāṁ samādāya tilaṁtilam rūpaṁ ca nirmame paścādatyāścaryamayīṁ ca tām

फिर समस्त देवताओं से तिल-तिल अंश रूप लेकर, उन्होंने उस अत्यन्त आश्चर्यमयी नारी का निर्माण किया।

श्लोक 5 (skanda.6.153.5)

यां दृष्ट्वा क्षोभमापन्नः स्वयमेव पितामहः

yāṁ dṛṣṭvā kṣobhamāpannaḥ svayameva pitāmahaḥ

उसे देखकर स्वयं पितामह ही विचलित हो गए।

श्लोक 6 (skanda.6.153.6)

ततस्तां प्रेषयामास कैलासं प्रति पद्मजः ॥ गच्छ देवि महादेवं प्रणमस्व शुचिस्मिते

tatastāṁ preṣayāmāsa kailāsaṁ prati padmajaḥ gaccha devi mahādevaṁ praṇamasva śucismite

तब कमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने उसे कैलास की ओर भेज दिया — "हे देवि, जाओ, हे शुचिस्मिते, महादेव को प्रणाम करो।"

श्लोक 7 (skanda.6.153.7)

ततः सा सत्वरं गत्वा कैलासं पर्वतोत्तमम् ॥ अपश्यच्छंकरं तत्र निर्विष्टं पार्वतीसमम्

tataḥ sā satvaraṁ gatvā kailāsaṁ parvatottamam apaśyacchaṁkaraṁ tatra nirviṣṭaṁ pārvatīsamam

तब वह शीघ्र ही उस श्रेष्ठ कैलास पर्वत पर जाकर, वहाँ पार्वती के साथ विराजमान शंकर को देखने लगी।

श्लोक 8 (skanda.6.153.8)

शंकरोऽपि च तां दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः ॥ सुदृष्टां नाकरोद्भीत्या पार्श्वस्थां वीक्ष्य पार्वतीम्॥ ततः प्रदक्षिणां चक्रे सा प्रणम्य महेश्वरम् । श्रद्धया परया युक्ता कृतांजलिपुटा स्थिता

śaṁkaro'pi ca tāṁ dṛṣṭvā vismayaṁ paramaṁ gataḥ sudṛṣṭāṁ nākarodbhītyā pārśvasthāṁ vīkṣya pārvatīm tataḥ pradakṣiṇāṁ cakre sā praṇamya maheśvaram śraddhayā parayā yuktā kṛtāṁjalipuṭā sthitā

शंकर भी उसे देखकर अत्यन्त विस्मित हुए, किन्तु पार्श्व में बैठी पार्वती को देखकर भय से उसे भरपूर दृष्टि से नहीं देख सके। तब उसने महेश्वर को प्रणाम कर प्रदक्षिणा की, और परम श्रद्धा से युक्त होकर हाथ जोड़े खड़ी रही।

श्लोक 9 (skanda.6.153.9)

यावद्दक्षिणपार्श्वस्था तावद्वक्त्रं स दक्षिणम्॥ प्रचकार महादेवस्तदुपाकृष्टलोचनः

yāvaddakṣiṇapārśvasthā tāvadvaktraṁ sa dakṣiṇam pracakāra mahādevastadupākṛṣṭalocanaḥ

जब वह उनके दाहिने पार्श्व में खड़ी हुई, तब महादेव ने, उसकी ओर आकृष्ट नेत्रों से, अपना दक्षिण मुख प्रकट कर दिया।

श्लोक 10 (skanda.6.153.10)

पश्चिमायां यदा साऽभूत्प्रदक्षिणवशाच्छुभा ॥ पश्चिमं वदनं तेन तदर्थं च कृतं ततः

paścimāyāṁ yadā sā'bhūtpradakṣiṇavaśācchubhā paścimaṁ vadanaṁ tena tadarthaṁ ca kṛtaṁ tataḥ

जब वह शुभा प्रदक्षिणा के क्रम में पश्चिम की ओर आई, तब उसी उद्देश्य से उन्होंने पश्चिमी मुख भी प्रकट कर दिया।

श्लोक 11 (skanda.6.153.11)

एवमुत्तरसंस्थायां तस्यां देवेन शंभुना ॥ उत्तरं वदनं क्लृप्तं गौरीभीतेन चेतसा ॥ न ग्रीवां चालयामास कथंचिदपि स द्विजाः

evamuttarasaṁsthāyāṁ tasyāṁ devena śaṁbhunā uttaraṁ vadanaṁ klṛptaṁ gaurībhītena cetasā na grīvāṁ cālayāmāsa kathaṁcidapi sa dvijāḥ

हे द्विजो, इसी प्रकार जब वह उत्तर दिशा में स्थित हुई, तब गौरी से भयभीत मन वाले शम्भु ने उत्तर मुख भी प्रकट कर दिया, किन्तु किसी भी प्रकार अपनी गर्दन नहीं घुमाई।

श्लोक 12 (skanda.6.153.12)

एतस्मिन्नंतरे तत्र नारदो मुनिपुंगवः॥ अब्रवीत्पार्वतीं पश्चात्प्रणिपत्य महेश्वरम्

etasminnaṁtare tatra nārado munipuṁgavaḥ abravītpārvatīṁ paścātpraṇipatya maheśvaram

इसी बीच वहाँ मुनिश्रेष्ठ नारद ने, पहले महेश्वर को प्रणाम करके, फिर पार्वती से कहा।

श्लोक 13 (skanda.6.153.13)

नारद उवाच। पश्य पार्वति ते पत्युश्चेष्टितं गर्हितं यथा ॥ दृष्ट्वा रूपवतीं नारीं कृतं। मुखचतुष्टयम्

nārada uvāca paśya pārvati te patyuśceṣṭitaṁ garhitaṁ yathā dṛṣṭvā rūpavatīṁ nārīṁ kṛtaṁ mukhacatuṣṭayam

नारद ने कहा — हे पार्वती, देखो, तुम्हारे पति का आचरण कितना निन्दनीय है — एक रूपवती नारी को देखकर उन्होंने चार मुख बना लिए।

श्लोक 14 (skanda.6.153.14)

अहमेतद्विजानामि न त्वया सदृशी क्वचित् ॥ अस्ति नारी तथाऽन्योपि विजानाति सुरेश्वरि

ahametadvijānāmi na tvayā sadṛśī kvacit asti nārī tathā'nyopi vijānāti sureśvari

हे सुरेश्वरी, मैं यह जानता हूँ कि तुम्हारे समान कहीं कोई नारी नहीं है, और अन्य लोग भी यह जानते हैं।

श्लोक 15 (skanda.6.153.15)

हास्यस्य पदवीमद्य त्वं गमिष्यसि पार्वति ॥ सर्वासां देवपत्नीनां ज्ञात्वान्यासक्तमीश्वरम्

hāsyasya padavīmadya tvaṁ gamiṣyasi pārvati sarvāsāṁ devapatnīnāṁ jñātvānyāsaktamīśvaram

फिर भी, हे पार्वती, ईश्वर को किसी अन्य में आसक्त जानकर, आज तुम समस्त देवपत्नियों के बीच हँसी का पात्र बन जाओगी।

श्लोक 16 (skanda.6.153.16)

एतद्देवि विजानासि यादृक्चित्तं शिवोद्भवम् ॥ अस्या उपरि वेश्याया निंदिताया विचक्षणैः

etaddevi vijānāsi yādṛkcittaṁ śivodbhavam asyā upari veśyāyā niṁditāyā vicakṣaṇaiḥ

हे देवि, तुम यह भी जान लो कि शिव का मन इस निन्दित वेश्या के प्रति कैसा हो गया है, जिसे विद्वान लोग निंदा करते हैं —

श्लोक 17 (skanda.6.153.17)

समादाय निजे हर्म्य एतां संस्थापयिष्यति ॥ परं लज्जासमोपेतो न ब्रवीति वचः शुभे

samādāya nije harmya etāṁ saṁsthāpayiṣyati paraṁ lajjāsamopeto na bravīti vacaḥ śubhe

— कि वे इसे अपने ही महल में ले जाकर बसा लेंगे; किन्तु हे शुभे, लज्जावश वे यह बात कह नहीं पा रहे हैं।

श्लोक 18 (skanda.6.153.18)

सूत उवाच। नारदस्य वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा कांतं चतुर्मुखम् ॥ क्रोधेन महताविष्टा विकृतं वीक्ष्य तं हरम्

sūta uvāca nāradasya vacaḥ śrutvā dṛṣṭvā kāṁtaṁ caturmukham krodhena mahatāviṣṭā vikṛtaṁ vīkṣya taṁ haram

सूत जी ने कहा — नारद के वचन सुनकर तथा अपने पति के चार सुन्दर मुख देखकर, विकृत हुए उन हर को देखकर, वह अत्यन्त क्रोध से भर गई।

श्लोक 19 (skanda.6.153.19)

ततो निरोधया मास द्रुतं सा पर्वतात्मजा ॥ सर्वनेत्राणि देवस्य महिषीधर्ममाश्रिता

tato nirodhayā māsa drutaṁ sā parvatātmajā sarvanetrāṇi devasya mahiṣīdharmamāśritā

तब पर्वत-पुत्री ने, महिषी-धर्म का आश्रय लेकर, तुरन्त देव के सभी नेत्रों को बन्द कर दिया।

श्लोक 20 (skanda.6.153.20)

एतस्मिन्नंतरे शैला विशीर्यंति समंततः ॥ मर्यादां संत्यजंति स्म सर्वे च मकरालयाः

etasminnaṁtare śailā viśīryaṁti samaṁtataḥ maryādāṁ saṁtyajaṁti sma sarve ca makarālayāḥ

इसी बीच सब ओर पर्वत बिखरने लगे, और समस्त समुद्र अपनी मर्यादा त्यागने लगे।

श्लोक 21 (skanda.6.153.21)

प्रलयस्य समुत्थानं संजातं द्विजसत्तमाः ॥ तावद्ब्रह्मदिनं प्राप्तं परमं सृष्टिलक्षणम्

pralayasya samutthānaṁ saṁjātaṁ dvijasattamāḥ tāvadbrahmadinaṁ prāptaṁ paramaṁ sṛṣṭilakṣaṇam

हे द्विजसत्तमो, प्रलय का उदय होने लगा; उतने ही में ब्रह्मा का वह परम सृष्टि-लक्षण दिन समाप्त होकर रात्रि आ पहुँची।

श्लोक 22 (skanda.6.153.22)

निमेषेण पुनस्तस्य प्रलयस्य प्रजापतेः ॥ ब्रह्मणः सा निशा प्रोक्ता सर्वं तोयमयं भवेत्

nimeṣeṇa punastasya pralayasya prajāpateḥ brahmaṇaḥ sā niśā proktā sarvaṁ toyamayaṁ bhavet

प्रजापति ब्रह्मा की एक निमेष-मात्र में ही वह प्रलय की रात्रि कही गई, जिसमें सब कुछ जलमय हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.6.153.23)

अथ तत्र गणाः सर्वे भृगिनंदिपुरःसराः ॥ सोऽपि देवमुनिर्भीतस्तामुवाच सुरेश्वरीम्

atha tatra gaṇāḥ sarve bhṛginaṁdipuraḥsarāḥ so'pi devamunirbhītastāmuvāca sureśvarīm

तब वहाँ भृंगी-नन्दी आदि सभी गण भयभीत हो गए; उस देवर्षि ने भी भयभीत होकर उस देवेश्वरी से कहा।

श्लोक 24 (skanda.6.153.24)

मुंचमुंच सुरज्येष्ठे देवनेत्राणि संप्रति ॥ नोचेन्नाशः समस्तस्य लोकस्यास्य भविष्यति

muṁcamuṁca surajyeṣṭhe devanetrāṇi saṁprati nocennāśaḥ samastasya lokasyāsya bhaviṣyati

"हे देवश्रेष्ठे, अभी देव के नेत्रों को छोड़ दो, छोड़ दो, अन्यथा इस सम्पूर्ण लोक का नाश हो जाएगा।"

श्लोक 25 (skanda.6.153.25)

एवं प्रोक्ताऽपि सा देवी यावच्च न मुमोच तम् ॥ तावद्देवेन लालाटं विसृष्टं लोचनं परम्

evaṁ proktā'pi sā devī yāvacca na mumoca tam tāvaddevena lālāṭaṁ visṛṣṭaṁ locanaṁ param

इस प्रकार कहे जाने पर भी जब तक उस देवी ने उन्हें नहीं छोड़ा, तब तक देव ने अपने ललाट में एक और परम नेत्र प्रकट कर दिया।

श्लोक 26 (skanda.6.153.26)

कृपाविष्टेन लोकानां येन रक्षा प्रजायते ॥ न शक्तो वारितुं देवीं प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्

kṛpāviṣṭena lokānāṁ yena rakṣā prajāyate na śakto vārituṁ devīṁ prāṇebhyo'pi garīyasīm

करुणा से भरे उस देव ने, जिससे लोकों की रक्षा होती है, अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय देवी को रोक पाने में स्वयं को असमर्थ पाकर, यह किया।

श्लोक 27 (skanda.6.153.27)

अंबिकां विबुधाः प्राहुस्त्र्यंबकाणि यतो द्विजाः ॥ तस्मात्संकीर्त्यते लोके त्र्यंबकश्च सुरेश्वरः

aṁbikāṁ vibudhāḥ prāhustryaṁbakāṇi yato dvijāḥ tasmātsaṁkīrtyate loke tryaṁbakaśca sureśvaraḥ

हे द्विजो, चूँकि इससे देवगण अम्बिका को त्र्यम्बका (तीन नेत्रों वाली) कहते हैं, इसीलिए वे देवेश्वर भी लोक में त्र्यम्बक कहलाते हैं।

श्लोक 28 (skanda.6.153.28)

ततः संत्यज्य तं देवं देवी पर्वतपुत्रिका ॥ प्रोवाच कोपरक्ताक्षी पुरःस्थां तां तिलोत्तमाम्

tataḥ saṁtyajya taṁ devaṁ devī parvataputrikā provāca koparaktākṣī puraḥsthāṁ tāṁ tilottamām

तब उस देव को छोड़कर पर्वत-पुत्री देवी ने, क्रोध से लाल नेत्रों वाली होकर, सामने खड़ी उस तिलोत्तमा से कहा।

श्लोक 29 (skanda.6.153.29)

यस्मान्मे दयितः पापे त्वया रूपाद्विडंबितः ॥ चतुर्वक्त्रः कृतस्तस्मात्त्वं विरूपा भव द्रुतम्

yasmānme dayitaḥ pāpe tvayā rūpādviḍaṁbitaḥ caturvaktraḥ kṛtastasmāttvaṁ virūpā bhava drutam

"हे पापिनी, चूँकि तूने अपने रूप से मेरे प्रियतम को मोहित कर उन्हें चतुर्मुख बना दिया, इसलिए तू अभी इसी क्षण कुरूप हो जा।"

श्लोक 30 (skanda.6.153.30)

ततः सा सहसा भूत्वा तत्क्षणाद्भग्ननासिका ॥ शीर्णकेशा बृहद्दंता चिपिटाक्षी महोदरा

tataḥ sā sahasā bhūtvā tatkṣaṇādbhagnanāsikā śīrṇakeśā bṛhaddaṁtā cipiṭākṣī mahodarā

तब वह उसी क्षण अचानक भग्ननासिका, जीर्ण-केश वाली, बड़े-बड़े दाँतों वाली, चपटी आँखों वाली और बड़े पेट वाली हो गई।

श्लोक 31 (skanda.6.153.31)

अथ वीक्ष्य निजं देहं तथाभूतं वराप्सराः ॥ प्रोवाच वेपमाना सा कृतांजलिपुटा स्थिता

atha vīkṣya nijaṁ dehaṁ tathābhūtaṁ varāpsarāḥ provāca vepamānā sā kṛtāṁjalipuṭā sthitā

तब अपने शरीर को उस दशा में देखकर वह श्रेष्ठ अप्सरा काँपती हुई, हाथ जोड़े खड़ी होकर बोली।

श्लोक 32 (skanda.6.153.32)

अहं संप्रेषिता देवि प्रणामार्थं त्रिशूलिनः ॥ ब्रह्मणा तेन चायाता युष्माकं च विशेषतः

ahaṁ saṁpreṣitā devi praṇāmārthaṁ triśūlinaḥ brahmaṇā tena cāyātā yuṣmākaṁ ca viśeṣataḥ

"हे देवि, मैं त्रिशूलधारी को प्रणाम करने के लिए ब्रह्मा द्वारा भेजी गई थी, और विशेष रूप से आपके ही लिए भी आई थी।

श्लोक 33 (skanda.6.153.33)

निर्दोषाया विरागायास्तस्माद्युक्तं न ते भवेत् ॥ शापं दातुं प्रसादं मे तस्मात्त्वं कर्तुमर्हसि

nirdoṣāyā virāgāyāstasmādyuktaṁ na te bhavet śāpaṁ dātuṁ prasādaṁ me tasmāttvaṁ kartumarhasi

मैं निर्दोष और विराग-भाव वाली हूँ, अतः मुझे शाप देना आपके लिए उचित नहीं है; इसलिए आप मुझ पर कृपा करने योग्य हैं।"

श्लोक 34 (skanda.6.153.34)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा दीनं सत्यं च पार्वती ॥ पश्चात्तापसमोपेता ततः प्रोवाच सुप्रियम्

tasyāstadvacanaṁ śrutvā dīnaṁ satyaṁ ca pārvatī paścāttāpasamopetā tataḥ provāca supriyam

उसके उस दीन और सत्य वचन को सुनकर पार्वती पश्चात्ताप से भर गई, और फिर प्रिय वचन में बोली।

श्लोक 35 (skanda.6.153.35)

स्त्रीस्वभावात्समायातः कोपोऽयं त्वां प्रति द्रुतम् ॥ तस्मादागच्छ गच्छावो मया सार्धं धरातले

strīsvabhāvātsamāyātaḥ kopo'yaṁ tvāṁ prati drutam tasmādāgaccha gacchāvo mayā sārdhaṁ dharātale

"स्त्री-स्वभाव के कारण ही यह क्रोध तुम्हारे प्रति तुरन्त उमड़ आया था; इसलिए आओ, मेरे साथ पृथ्वीलोक चलें।

श्लोक 36 (skanda.6.153.36)

तत्रास्ति रूपदं तीर्थं मया चोत्पादितं स्वयम् ॥ माघशुक्लतृतीयायां स्नानार्थं विमलोदकम्

tatrāsti rūpadaṁ tīrthaṁ mayā cotpāditaṁ svayam māghaśuklatṛtīyāyāṁ snānārthaṁ vimalodakam

वहाँ मेरे द्वारा स्वयं उत्पन्न किया गया एक रूप-प्रदायक तीर्थ है, जिसका निर्मल जल माघ शुक्ल तृतीया को स्नान के लिए है।

श्लोक 37 (skanda.6.153.37)

या नारी प्रातरुत्थाय तत्र स्नानं समाचरेत् ॥ सा स्याद्रूपवती नूनमदृष्टे रविमंडले

yā nārī prātarutthāya tatra snānaṁ samācaret sā syādrūpavatī nūnamadṛṣṭe ravimaṁḍale

जो नारी प्रातःकाल उठकर, सूर्यमण्डल के उदय होने से पहले, वहाँ स्नान करती है, वह निश्चय ही रूपवती हो जाती है।

श्लोक 38 (skanda.6.153.38)

सदा माघे तृतीयायां तत्र स्नानं करोम्यहम् ॥ अद्य सा तत्र यास्यामि स्नानाय कृतनिश्चया

sadā māghe tṛtīyāyāṁ tatra snānaṁ karomyaham adya sā tatra yāsyāmi snānāya kṛtaniścayā

मैं स्वयं सदा माघ की तृतीया को वहाँ स्नान करती हूँ; आज मैं भी वहाँ स्नान का निश्चय करके जाऊँगी।"

श्लोक 39 (skanda.6.153.39)

सूत उवाच। एवमुक्त्वा समादाय सा देवी तां तिलोत्तमाम् ॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे रूपतीर्थं जगाम च

sūta uvāca evamuktvā samādāya sā devī tāṁ tilottamām hāṭakeśvaraje kṣetre rūpatīrthaṁ jagāma ca

सूत जी ने कहा — इस प्रकार कहकर वह देवी उस तिलोत्तमा को साथ लेकर हाटकेश्वर क्षेत्र में स्थित रूपतीर्थ को गईं।

श्लोक 40 (skanda.6.153.40)

तत्र स्नानं स्वयं चक्रे विधिपूर्वं सुरेश्वरी ॥ तस्या ह्यनन्तरं सापि भक्तियुक्ता तिलोत्तमा

tatra snānaṁ svayaṁ cakre vidhipūrvaṁ sureśvarī tasyā hyanantaraṁ sāpi bhaktiyuktā tilottamā

वहाँ सुरेश्वरी ने स्वयं विधिपूर्वक स्नान किया, और उनके पश्चात् भक्तियुक्त होकर तिलोत्तमा ने भी स्नान किया।

श्लोक 41 (skanda.6.153.41)

ततः कांतिमती जाता तत्क्षणादेव भामिनी ॥ पूर्वमासीयद्थारूपा तथासाऽभूद्विशेषतः

tataḥ kāṁtimatī jātā tatkṣaṇādeva bhāminī pūrvamāsīyadthārūpā tathāsā'bhūdviśeṣataḥ

तब वह सुन्दरी उसी क्षण कान्तिमती हो गई, और जैसा उसका पहले का रूप था, ठीक वैसा ही वह विशेष रूप से फिर हो गई।

श्लोक 42 (skanda.6.153.42)

अथ तुष्टिसमायुक्ता तां प्रणम्य सुरेश्वरीम् ॥ प्रोवाच विस्मयाविष्टा हर्षगद्गदया गिरा

atha tuṣṭisamāyuktā tāṁ praṇamya sureśvarīm provāca vismayāviṣṭā harṣagadgadayā girā

तब संतोष से भरी हुई वह उस देवेश्वरी को प्रणाम कर, विस्मय से भरकर, हर्ष से गद्गद वाणी में बोली।

श्लोक 43 (skanda.6.153.43)

प्राप्तं रूपं महादेवि त्वत्प्रसादाच्चिरन्तनम्॥ ब्रह्मलोकं गमिष्यामि मामनुज्ञातुमर्हसि

prāptaṁ rūpaṁ mahādevi tvatprasādāccirantanam brahmalokaṁ gamiṣyāmi māmanujñātumarhasi

"हे महादेवि, आपकी कृपा से मैंने अपना पूर्व रूप पुनः प्राप्त कर लिया है। अब मैं ब्रह्मलोक जाऊँगी; आप मुझे अनुमति देने योग्य हैं।"

श्लोक 44 (skanda.6.153.44)

गौर्युवाच। वरं यच्छामि ते पुत्रि यत्किंचिद्धृदि संस्थितम्॥ तस्मात्प्रार्थय विश्रब्धा न वृथा मम दर्शनम्

gauryuvāca varaṁ yacchāmi te putri yatkiṁciddhṛdi saṁsthitam tasmātprārthaya viśrabdhā na vṛthā mama darśanam

गौरी ने कहा — हे पुत्री, जो भी तुम्हारे हृदय में हो, मैं तुम्हें वर दूँगी; इसलिए निश्चिंत होकर माँगो, मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।

श्लोक 45 (skanda.6.153.45)

तिलोत्तमोवाच। अहमत्र करिष्यामि क्षेत्रे तीर्थं निजं शुभे ॥ त्वत्प्रसादेन तद्देवि यातु ख्यातिं धरातले

tilottamovāca ahamatra kariṣyāmi kṣetre tīrthaṁ nijaṁ śubhe tvatprasādena taddevi yātu khyātiṁ dharātale

तिलोत्तमा ने कहा — हे शुभे, मैं यहाँ इसी क्षेत्र में अपना निजी तीर्थ बनाऊँगी; हे देवि, आपकी कृपा से वह पृथ्वी पर प्रसिद्धि पाए।

श्लोक 46 (skanda.6.153.46)

त्वया तत्रापि कर्तव्यं वर्षांते स्नानमेव हि ॥ हितार्थं सर्वनारीणां रूपसौभाग्यदायकम्

tvayā tatrāpi kartavyaṁ varṣāṁte snānameva hi hitārthaṁ sarvanārīṇāṁ rūpasaubhāgyadāyakam

वहाँ भी, समस्त नारियों के हित के लिए, रूप और सौभाग्य देने वाला स्नान वर्ष के अन्त में आपके द्वारा किया जाना चाहिए।

श्लोक 47 (skanda.6.153.47)

गौर्युवाच। चैत्रशुक्लतृतीयायां सदाहं त्वत्कृते शुभे ॥ स्नानं तत्र करिष्यामि मध्याह्ने समुपस्थिते

gauryuvāca caitraśuklatṛtīyāyāṁ sadāhaṁ tvatkṛte śubhe snānaṁ tatra kariṣyāmi madhyāhne samupasthite

गौरी ने कहा — हे शुभे, चैत्र शुक्ल तृतीया को, तुम्हारे ही निमित्त, मध्याह्न काल आने पर, मैं वहाँ सदा स्नान करूँगी।

श्लोक 48 (skanda.6.153.48)

हितार्थं सर्वनारीणां तव वाक्यादसंशयम् ॥ या तत्र दिवसे नारी तस्मिंस्तीर्थे करिष्यति

hitārthaṁ sarvanārīṇāṁ tava vākyādasaṁśayam yā tatra divase nārī tasmiṁstīrthe kariṣyati

तुम्हारे वचन के अनुसार यह निःसंदेह समस्त नारियों के हित के लिए होगा। उस दिन जो भी नारी उस तीर्थ में स्नान करेगी —

श्लोक 49 (skanda.6.153.49)

स्नानं सा सौख्यसंयुक्ता भविष्यति सुखान्विता ॥ स्पृहणीया च नारीणां सर्वासां धरणीतले

snānaṁ sā saukhyasaṁyuktā bhaviṣyati sukhānvitā spṛhaṇīyā ca nārīṇāṁ sarvāsāṁ dharaṇītale

— वह सुख से युक्त और सौख्यवती हो जाएगी, तथा पृथ्वी पर समस्त नारियों द्वारा ईर्ष्या करने योग्य बन जाएगी।

श्लोक 50 (skanda.6.153.50)

पुरुषोऽपि सुभक्त्या यस्तत्र स्नानं करिष्यति ॥ सप्तजन्मानि रूपाढ्यः ससौभाग्यो भविष्यति

puruṣo'pi subhaktyā yastatra snānaṁ kariṣyati saptajanmāni rūpāḍhyaḥ sasaubhāgyo bhaviṣyati

और जो पुरुष भी सच्ची भक्ति से वहाँ स्नान करेगा, वह सात जन्मों तक रूपवान और सौभाग्यशाली रहेगा।

श्लोक 51 (skanda.6.153.51)

सूत उवाच। एवमुक्ता तदा देव्या साप्सरा द्विजसत्तमाः ॥ चक्रे कुण्डं सुविस्तीर्णं विमलोदप्रपूरितम्

sūta uvāca evamuktā tadā devyā sāpsarā dvijasattamāḥ cakre kuṇḍaṁ suvistīrṇaṁ vimalodaprapūritam

सूत जी ने कहा — हे द्विजसत्तमो, देवी द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उस अप्सरा ने वहाँ एक अत्यन्त विस्तृत, निर्मल जल से भरा हुआ कुण्ड बनाया।

श्लोक 52 (skanda.6.153.52)

उपकंठे ततस्तस्य स्थापयामास पार्वतीम् ॥ ततो जगाम संहृष्टा ब्रह्मलोकं तिलोत्तमा

upakaṁṭhe tatastasya sthāpayāmāsa pārvatīm tato jagāma saṁhṛṣṭā brahmalokaṁ tilottamā

फिर उसके तट पर उसने पार्वती की स्थापना की; तत्पश्चात् तिलोत्तमा अत्यन्त प्रसन्न होकर ब्रह्मलोक चली गई।

श्लोक 53 (skanda.6.153.53)

ततः प्रभृति संजातं कुण्डमप्सरसा कृतम् ॥ स्नानमात्रैर्नरैर्यत्र सौभाग्यं लभ्यते द्विजाः

tataḥ prabhṛti saṁjātaṁ kuṇḍamapsarasā kṛtam snānamātrairnarairyatra saubhāgyaṁ labhyate dvijāḥ

हे द्विजो, तभी से यह अप्सरा द्वारा बनवाया गया कुण्ड प्रसिद्ध हुआ, जहाँ मनुष्यों को केवल स्नान करने मात्र से सौभाग्य प्राप्त होता है।

श्लोक 54 (skanda.6.153.54)

नारीभिश्च विशेषेण पुत्रप्राप्तिरनुत्तमा ॥ तथान्यदपि यत्किंचिद्वांछितं हृदये स्थितम्

nārībhiśca viśeṣeṇa putraprāptiranuttamā tathānyadapi yatkiṁcidvāṁchitaṁ hṛdaye sthitam

तथा नारियों को विशेष रूप से उत्तम पुत्र-प्राप्ति होती है, और साथ ही हृदय में स्थित जो भी अन्य कामना हो, वह भी पूर्ण होती है।

अध्याय 152अध्याय-सूचीअध्याय 154