नागर खण्ड · अध्याय 154
चित्रेश्वरीपीठ-सिद्धि तथा हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्य का उपसंहार
श्लोक 1 (skanda.6.154.1)
सूत उवाच। या नारी तत्र सत्कुण्डे स्नात्वा तां पार्वतीं पुनः ॥ दृष्ट्वा स्नाति ततस्तीर्थे तस्मिन्रूपमये शुभे
sūta uvāca yā nārī tatra satkuṇḍe snātvā tāṁ pārvatīṁ punaḥ dṛṣṭvā snāti tatastīrthe tasminrūpamaye śubhe
सूत जी ने कहा — जो नारी उस उत्तम कुण्ड में स्नान करके, फिर उस पार्वती का दर्शन करके, उस रूपप्रद शुभ तीर्थ में स्नान करती है —
श्लोक 2 (skanda.6.154.2)
पुनश्च पार्वतीं पश्येच्छ्रद्धया परया युता ॥ सद्यः सा मुच्यते कृत्स्नैराजन्ममरणांतिकैः
punaśca pārvatīṁ paśyecchraddhayā parayā yutā sadyaḥ sā mucyate kṛtsnairājanmamaraṇāṁtikaiḥ
— और श्रद्धापूर्वक फिर से पार्वती का दर्शन करती है, वह तत्काल जन्म से लेकर मृत्यु तक के समस्त पापों से मुक्त हो जाती है।
श्लोक 3 (skanda.6.154.3)
तत्रैवास्ति जयानाम पार्वत्याः किंकरी द्विजाः ॥ तया तत्र कृतं कुण्डं गौरीकुण्डसमीपतः
tatraivāsti jayānāma pārvatyāḥ kiṁkarī dvijāḥ tayā tatra kṛtaṁ kuṇḍaṁ gaurīkuṇḍasamīpataḥ
हे द्विजो, वहीं पार्वती की जया नामक दासी है; उसके द्वारा गौरीकुण्ड के निकट ही एक कुण्ड बनाया गया।
श्लोक 4 (skanda.6.154.4)
या तत्र कुरुते स्नानं तृतीयादिवसेऽबला ॥ सुतसौभाग्यसंपन्ना सा भवेत्पतिवल्लभा
yā tatra kurute snānaṁ tṛtīyādivase'balā sutasaubhāgyasaṁpannā sā bhavetpativallabhā
जो अबला तृतीया के दिन वहाँ स्नान करती है, वह पुत्र और सौभाग्य से सम्पन्न होकर अपने पति की प्रिय बनती है।
श्लोक 5 (skanda.6.154.5)
तथान्यदपि तत्रास्ति विजयाकुण्डमुत्तमम् ॥ तत्र स्नाताऽपि वंध्या स्त्री जायते पुत्रसंयुता
tathānyadapi tatrāsti vijayākuṇḍamuttamam tatra snātā'pi vaṁdhyā strī jāyate putrasaṁyutā
तथा वहाँ एक और उत्तम विजयाकुण्ड भी है, जहाँ स्नान करने पर बाँझ स्त्री भी पुत्रवती हो जाती है।
श्लोक 6 (skanda.6.154.6)
न च पश्यति पुत्राणां कदाचिद्व्यसनं द्विजाः ॥ न वियोगं न दुःखं च स्वप्नांते च कदाचन
na ca paśyati putrāṇāṁ kadācidvyasanaṁ dvijāḥ na viyogaṁ na duḥkhaṁ ca svapnāṁte ca kadācana
हे द्विजो, वह स्वप्न में भी कभी अपने पुत्रों का कोई संकट, वियोग या दुःख नहीं देखती।
श्लोक 7 (skanda.6.154.7)
काकवंध्याऽपि या नारी तत्र स्नानं समाचरेत्॥ सा पुत्रान्विविधाँल्लब्ध्वा स्वर्गलोके महीयते
kākavaṁdhyā'pi yā nārī tatra snānaṁ samācaret sā putrānvividhā~llabdhvā svargaloke mahīyate
जो नारी काकवंध्या भी हो, वह भी वहाँ स्नान करने पर विविध पुत्रों को पाकर स्वर्गलोक में सम्मानित होती है।
श्लोक 8 (skanda.6.154.8)
ऋषय ऊचुः। एतेषां सूत तीर्थानां तीर्थमस्ति सुसिद्धिदम्॥ क्वचित्किंञ्चिद्भवेत्सिद्धिर्यत्र स्नानाच्छरीरजा
ṛṣaya ūcuḥ eteṣāṁ sūta tīrthānāṁ tīrthamasti susiddhidam kvacitkiṁñcidbhavetsiddhiryatra snānāccharīrajā
ऋषियों ने कहा — हे सूत, इन तीर्थों में से क्या कोई ऐसा भी तीर्थ है, जो उत्तम सिद्धि देने वाला हो, जहाँ स्नान करने मात्र से देह-सम्बन्धी कोई विशेष सिद्धि प्राप्त हो?
श्लोक 9 (skanda.6.154.9)
सूत उवाच। सप्तविंशतिलिंगानि यानि संति द्विजोत्तमाः ॥ तेषां मध्येऽभवत्सिद्धिरेकस्मिन्निखिला द्विजाः
sūta uvāca saptaviṁśatiliṁgāni yāni saṁti dvijottamāḥ teṣāṁ madhye'bhavatsiddhirekasminnikhilā dvijāḥ
सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो, वहाँ जो सत्ताईस लिंग हैं, उनमें से केवल एक ही में समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
श्लोक 10 (skanda.6.154.10)
एकस्य सत्त्वयुक्तस्य वीरव्रतयुतस्य च ॥ आश्विनस्य चतुर्दश्यां कृष्णायां द्विजसत्तमाः
ekasya sattvayuktasya vīravratayutasya ca āśvinasya caturdaśyāṁ kṛṣṇāyāṁ dvijasattamāḥ
हे द्विजसत्तमो, सत्त्वगुण से युक्त और वीर-व्रत का पालन करने वाला जो कोई भी आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को —
श्लोक 11 (skanda.6.154.11)
अर्धरात्रे विधानेन तेषां पूजां करोति यः ॥ प्रागुक्तं जपनं भक्त्या स क्रमात्साधकोत्तमः
ardharātre vidhānena teṣāṁ pūjāṁ karoti yaḥ prāguktaṁ japanaṁ bhaktyā sa kramātsādhakottamaḥ
— आधी रात को विधिपूर्वक उनकी पूजा करता है, और भक्तिपूर्वक पहले बताए गए जप को क्रमशः करता है, वह श्रेष्ठ साधक बन जाता है।
श्लोक 12 (skanda.6.154.12)
अंगन्यासं विधायोच्चैः क्षुरिकासूक्तमुच्चरत् ॥ तेषामग्रे पुनः सम्यक्पूजयित्वा च शंकरम्
aṁganyāsaṁ vidhāyoccaiḥ kṣurikāsūktamuccarat teṣāmagre punaḥ samyakpūjayitvā ca śaṁkaram
अंगन्यास करके, ऊँचे स्वर में क्षुरिका-सूक्त का उच्चारण करते हुए, फिर उनके सम्मुख भलीभाँति शंकर की पूजा करके —
श्लोक 13 (skanda.6.154.13)
पृथगेकैकशो भक्त्या पूजयेद्दिक्पतींश्च वै
pṛthagekaikaśo bhaktyā pūjayeddikpatīṁśca vai
— तथा भक्तिपूर्वक अलग-अलग एक-एक करके दिक्पालों की भी पूजा करे।
श्लोक 14 (skanda.6.154.14)
अथाऽऽगत्य गणेशो वै विकरालो भयानकः ॥ लंबोदरो वै नग्नश्च कृष्णदन्तसमुद्भवः
athā''gatya gaṇeśo vai vikarālo bhayānakaḥ laṁbodaro vai nagnaśca kṛṣṇadantasamudbhavaḥ
तब गणेश स्वयं वहाँ प्रकट होते हैं — विकराल, भयानक, लम्बोदर, नग्न, तथा काले दाँतों से युक्त।
श्लोक 15 (skanda.6.154.15)
खड्गहस्तोऽब्रवीद्युद्धं प्रकुरुष्व मया समम् ॥ मुक्त्वैतत्कपटं भूमौ यदि वीरोऽसि सात्त्विकः
khaḍgahasto'bravīdyuddhaṁ prakuruṣva mayā samam muktvaitatkapaṭaṁ bhūmau yadi vīro'si sāttvikaḥ
हाथ में खड्ग लिए वे कहते हैं — "यदि तू सात्त्विक वीर है, तो पृथ्वी पर यह कपट छोड़कर मुझसे युद्ध कर।"
श्लोक 16 (skanda.6.154.16)
ततस्तत्कर्षणाच्चापि यस्तेनाशु प्रताड्यते ॥ स तेनैव शरीरेण नीयते तेन तत्पदम्
tatastatkarṣaṇāccāpi yastenāśu pratāḍyate sa tenaiva śarīreṇa nīyate tena tatpadam
फिर उस खींचातानी में जो भी उसके द्वारा शीघ्र आहत हो जाता है, वह उसी शरीर के साथ उसी गणेश द्वारा उस परम पद को ले जाया जाता है।
श्लोक 17 (skanda.6.154.17)
यत्र स्थाने जरामृत्युर्न शोकश्च कदाचन ॥ तथा चित्रेश्वरीपीठे सिद्धिरेकस्य कीर्तिता
yatra sthāne jarāmṛtyurna śokaśca kadācana tathā citreśvarīpīṭhe siddhirekasya kīrtitā
उस स्थान पर न कभी बुढ़ापा-मृत्यु है, न शोक। इसी प्रकार चित्रेश्वरी-पीठ में भी एक की सिद्धि कही गई है।
श्लोक 18 (skanda.6.154.18)
माघकृष्णचतुर्दश्यां यः पीठं तत्र पूजयेत् ॥ आगमोक्तविधानेन सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः
māghakṛṣṇacaturdaśyāṁ yaḥ pīṭhaṁ tatra pūjayet āgamoktavidhānena samyakchraddhāsamanvitaḥ
जो माघ कृष्ण चतुर्दशी को, आगम में कहे गए विधान के अनुसार, भलीभाँति श्रद्धा से युक्त होकर उस पीठ की पूजा करता है —
श्लोक 19 (skanda.6.154.19)
पश्चात्कपालमादाय महामांसप्रपूरितम् ॥ अहमस्य करोम्यद्य महामांसस्य विक्रयम्
paścātkapālamādāya mahāmāṁsaprapūritam ahamasya karomyadya mahāmāṁsasya vikrayam
— फिर मांस से भरा हुआ एक कपाल लेकर कहे — "आज मैं इस महामांस का विक्रय करता हूँ।"
श्लोक 20 (skanda.6.154.20)
सिद्धिमूल्ये न गृह्णातु कश्चिच्चेदस्ति सात्त्विकः ॥ ततश्च याचते यश्च प्रगृह्णाति च सद्द्विजाः
siddhimūlye na gṛhṇātu kaściccedasti sāttvikaḥ tataśca yācate yaśca pragṛhṇāti ca saddvijāḥ
यदि कोई सात्त्विक हो तो सिद्धि के मूल्य में उसे ग्रहण न करे; तत्पश्चात्, हे सद्द्विजो, जो भी उसे माँगता है और ग्रहण करता है —
श्लोक 21 (skanda.6.154.21)
स तमादाय निर्याति यत्र देवो महेश्वरः ॥ हाटकेश्वरजं लिंगं चित्रशर्मप्रतिष्ठितम्
sa tamādāya niryāti yatra devo maheśvaraḥ hāṭakeśvarajaṁ liṁgaṁ citraśarmapratiṣṭhitam
— वह उसे लेकर वहाँ चला जाता है जहाँ देव महेश्वर हैं — चित्रशर्मा द्वारा प्रतिष्ठित वह हाटकेश्वर लिंग।
श्लोक 22 (skanda.6.154.22)
तस्य स्थानस्य मध्यस्थो यस्तं पूजयते नरः ॥ शिवरात्रौ निशीथे च पुष्पलक्षणभक्तितः ॥ सुसिद्धिमाप्नुयात्तूर्णं स शरीरेण तत्क्षणात्
tasya sthānasya madhyastho yastaṁ pūjayate naraḥ śivarātrau niśīthe ca puṣpalakṣaṇabhaktitaḥ susiddhimāpnuyāttūrṇaṁ sa śarīreṇa tatkṣaṇāt
उस स्थान के मध्य में स्थित होकर जो मनुष्य शिवरात्रि की मध्यरात्रि में पुष्पों तथा लक्षणों से युक्त भक्ति से उनकी पूजा करता है, वह उसी क्षण अपने शरीर सहित शीघ्र ही उत्तम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 23 (skanda.6.154.23)
सिद्धिस्थानानि सर्वाणि तस्मिन्क्षेत्रे स्थितानि वै॥ वीरव्रतप्रयुक्तानां मानवानां द्विजोत्तमाः
siddhisthānāni sarvāṇi tasminkṣetre sthitāni vai vīravrataprayuktānāṁ mānavānāṁ dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, वीर-व्रत का पालन करने वाले मनुष्यों के लिए सिद्धि प्रदान करने वाले वे सभी स्थान उसी क्षेत्र में स्थित हैं।
श्लोक 24 (skanda.6.154.24)
ऋषय ऊचुः। तामसो यस्त्वया प्रोक्तः सिद्धिमार्गो महामते ॥ अनर्हो ब्राह्मणेन्द्राणां श्रोत्रियाणां विशेषतः
ṛṣaya ūcuḥ tāmaso yastvayā proktaḥ siddhimārgo mahāmate anarho brāhmaṇendrāṇāṁ śrotriyāṇāṁ viśeṣataḥ
ऋषियों ने कहा — हे महामते, आपने जो तामसिक सिद्धि-मार्ग बताया है, वह ब्राह्मणश्रेष्ठों के, विशेषतः श्रोत्रिय ब्राह्मणों के लिए अनुचित है।
श्लोक 25 (skanda.6.154.25)
शुद्धान्तः करणैः सूत भूतहिंसाविवर्जितैः ॥ यथा संप्राप्यते मोक्षो ब्राह्मणैः सुचिरादपि
śuddhāntaḥ karaṇaiḥ sūta bhūtahiṁsāvivarjitaiḥ yathā saṁprāpyate mokṣo brāhmaṇaiḥ sucirādapi
हे सूत, जिस प्रकार शुद्ध अन्तःकरण वाले तथा प्राणि-हिंसा से रहित ब्राह्मणों द्वारा दीर्घकाल में भी मोक्ष प्राप्त किया जाता है —
श्लोक 26 (skanda.6.154.26)
तत्त्वं ब्रूहि महाभाग मोक्षोपायं द्विजन्मनाम्
tattvaṁ brūhi mahābhāga mokṣopāyaṁ dvijanmanām
हे महाभाग, वह द्विजों के लिए मोक्ष का उपाय हमें बताइए।
श्लोक 27 (skanda.6.154.27)
सूत उवाच। रुद्रैर्दशभिः संयुक्तमानंदेश्वरकं तथा ॥ स्नात्वा तदग्रतः कुण्डे शास्त्रदृष्टेन कर्मणा
sūta uvāca rudrairdaśabhiḥ saṁyuktamānaṁdeśvarakaṁ tathā snātvā tadagrataḥ kuṇḍe śāstradṛṣṭena karmaṇā
सूत जी ने कहा — दस रुद्रों से युक्त उस आनन्देश्वर के सामने स्थित कुण्ड में शास्त्रोक्त विधि से स्नान करके —
श्लोक 28 (skanda.6.154.28)
संसिद्धिमाप्नुयान्मर्त्यो दुर्लभां त्रिदशैरपि ॥ माघमासे नरः स्नात्वा विश्वामित्रह्रदे नरः
saṁsiddhimāpnuyānmartyo durlabhāṁ tridaśairapi māghamāse naraḥ snātvā viśvāmitrahrade naraḥ
— मनुष्य वह सिद्धि प्राप्त करता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। तथा माघ मास में विश्वामित्र-ह्रद में स्नान करके मनुष्य —
श्लोक 29 (skanda.6.154.29)
प्रत्यूषे तिलपात्रं च ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्म लोके महीयते
pratyūṣe tilapātraṁ ca brāhmaṇāya nivedayet sarvapāpavinirmukto brahma loke mahīyate
— प्रातःकाल एक पात्र तिल किसी ब्राह्मण को दान करे, तो वह समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 30 (skanda.6.154.30)
यद्यपि स्याद्दुराचारः सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥ सुपर्णाख्यस्य देवस्य पुरतः श्रद्धयाऽन्वितः
yadyapi syāddurācāraḥ sarvāśī sarvavikrayī suparṇākhyasya devasya purataḥ śraddhayā'nvitaḥ
चाहे वह दुराचारी, सर्वभक्षी अथवा सब कुछ बेचने वाला ही क्यों न हो, यदि श्रद्धायुक्त होकर सुपर्ण नामक देव के सामने —
श्लोक 31 (skanda.6.154.31)
प्रायोपवेशनं कृत्वा ह्युपवासपरो नरः ॥ यस्त्यजेन्मानवः प्राणान्न स भूयोऽभिजायते
prāyopaveśanaṁ kṛtvā hyupavāsaparo naraḥ yastyajenmānavaḥ prāṇānna sa bhūyo'bhijāyate
— प्रायोपवेशन करके, उपवासपरायण मनुष्य जो अपने प्राणों को त्याग देता है, वह पुनः जन्म नहीं लेता।
श्लोक 32 (skanda.6.154.32)
एवं सिद्धित्रयं प्रोक्तं ब्राह्मणानां हितावहम् ॥ सात्त्विकं ब्राह्मणश्रेष्ठाः शंसितं त्रिदशैरपि
evaṁ siddhitrayaṁ proktaṁ brāhmaṇānāṁ hitāvaham sāttvikaṁ brāhmaṇaśreṣṭhāḥ śaṁsitaṁ tridaśairapi
हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, इस प्रकार ब्राह्मणों के हितकारी, सात्त्विक तीन प्रकार की सिद्धियाँ बताई गईं, जिनकी प्रशंसा देवताओं द्वारा भी की गई है।
श्लोक 33 (skanda.6.154.33)
अन्यानि तत्र तीर्थानि देवतायतनानि च ॥ तानि स्वर्गप्रदान्याहुर्मुनयः शंसितव्रताः
anyāni tatra tīrthāni devatāyatanāni ca tāni svargapradānyāhurmunayaḥ śaṁsitavratāḥ
वहाँ जो अन्य तीर्थ और देवायतन हैं, उन्हें व्रत में प्रशंसित मुनियों ने स्वर्ग-प्रदायक कहा है।
श्लोक 34 (skanda.6.154.34)
एतद्वः सर्वमाख्यातं क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ हाटकेश्वरदेवस्य सर्वपातकनाशनम्
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ kṣetramāhātmyamuttamam hāṭakeśvaradevasya sarvapātakanāśanam
यह सब मैंने तुम्हें बता दिया — हाटकेश्वर देव के क्षेत्र का यह उत्तम, समस्त पापों का नाश करने वाला माहात्म्य।
श्लोक 35 (skanda.6.154.35)
योऽत्र सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा पश्यति भक्तितः ॥ सर्वाण्यायतनान्येव स पापोऽपि विमुच्यते
yo'tra sarveṣu tīrtheṣu snātvā paśyati bhaktitaḥ sarvāṇyāyatanānyeva sa pāpo'pi vimucyate
जो यहाँ समस्त तीर्थों में स्नान करके भक्तिपूर्वक समस्त देवायतनों का दर्शन करता है, वह पापी होते हुए भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 36 (skanda.6.154.36)
एतत्खंडं पुराणस्य प्रथमं परिकीर्तितम् ॥ कार्तिकेयप्रणीतस्य सर्वपापहरं शुभम्
etatkhaṁḍaṁ purāṇasya prathamaṁ parikīrtitam kārtikeyapraṇītasya sarvapāpaharaṁ śubham
कार्तिकेय द्वारा रचित इस पुराण का यह प्रथम खण्ड कहा गया है, जो समस्त पापों को हरने वाला और कल्याणकारी है।
श्लोक 37 (skanda.6.154.37)
यश्चैतत्कीर्तयेद्भक्त्या शृणुयाद्वा समाहितः ॥ इह भुक्त्वा सुविपुलान्भोगान्याति त्रिविष्टपम्
yaścaitatkīrtayedbhaktyā śṛṇuyādvā samāhitaḥ iha bhuktvā suvipulānbhogānyāti triviṣṭapam
जो कोई भक्तिपूर्वक इसका कीर्तन करता है, अथवा एकाग्रचित्त होकर सुनता है, वह यहाँ अत्यन्त विपुल भोगों को भोगकर स्वर्ग को प्राप्त होता है।
श्लोक 38 (skanda.6.154.38)
सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वदानैश्च यत्फलम् ॥ तत्फलं समवाप्नोति शृण्वञ्छ्रद्धासमन्वितः
sarvatīrtheṣu yatpuṇyaṁ sarvadānaiśca yatphalam tatphalaṁ samavāpnoti śṛṇvañchraddhāsamanvitaḥ
समस्त तीर्थों में जो पुण्य है और समस्त दानों से जो फल मिलता है, वह फल श्रद्धायुक्त होकर सुनने वाला व्यक्ति प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 39 (skanda.6.154.39)
श्रुत्वा पुराणमेतद्धि जन्मकोटिसमुद्भवात् ॥ पातकाद्विप्रमुच्येत कुलानामुद्धरेच्छतम्
śrutvā purāṇametaddhi janmakoṭisamudbhavāt pātakādvipramucyeta kulānāmuddharecchatam
इस पुराण को सुनकर मनुष्य करोड़ों जन्मों में संचित पापों से मुक्त हो जाता है, और अपने सौ कुलों का उद्धार करता है।
श्लोक 40 (skanda.6.154.40)
ततो व्यासः पूजनीयो वस्त्रदानादिभूषणैः ॥ गोभूहिरण्यनिर्वापैर्दानैश्च विविधैरपि
tato vyāsaḥ pūjanīyo vastradānādibhūṣaṇaiḥ gobhūhiraṇyanirvāpairdānaiśca vividhairapi
अतः व्यास जी की वस्त्र, आभूषण आदि दान से, तथा गौ, भूमि, स्वर्ण अर्पण और विविध दानों से पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 41 (skanda.6.154.41)
तेन संपूजितो व्यासः कृष्णद्वैपायनः मनुः ॥ साक्षात्सत्यवतीपुत्रो येन व्यासः सुपूजितः
tena saṁpūjito vyāsaḥ kṛṣṇadvaipāyanaḥ manuḥ sākṣātsatyavatīputro yena vyāsaḥ supūjitaḥ
उससे कृष्णद्वैपायन व्यास मुनि सम्यक् पूजित होते हैं, जो साक्षात् सत्यवती के पुत्र हैं — जिनके द्वारा व्यास सुपूजित होते हैं, उसका फल महान है।
श्लोक 42 (skanda.6.154.42)
एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत्॥ पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद्दत्त्वा ह्यनृणी भवेत्
ekamapyakṣaraṁ yastu guruḥ śiṣye nivedayet pṛthivyāṁ nāsti taddravyaṁ yaddattvā hyanṛṇī bhavet
गुरु जो एक भी अक्षर शिष्य को सिखाता है, पृथ्वी पर ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे देकर शिष्य उस ऋण से मुक्त हो सके।
श्लोक 43 (skanda.6.154.43)
एतत्पवित्रमायुष्यं धन्यं स्व स्त्ययनं महत्॥ यच्छ्रुत्वा सर्वदुःखेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः
etatpavitramāyuṣyaṁ dhanyaṁ sva styayanaṁ mahat yacchrutvā sarvaduḥkhebhyo mucyate nātra saṁśayaḥ
यह पवित्र, आयुवर्धक, धन्य तथा महान कल्याणकारी है; इसे सुनकर मनुष्य समस्त दुःखों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।