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नागर खण्ड · अध्याय 155

पुष्पादित्य-माहात्म्य तथा कृपण मणिभद्र का वृत्तान्त

अध्याय 154अध्याय-सूचीअध्याय 156

श्लोक 1 (skanda.6.155.1)

सूत उवाच। तथाऽन्ये तत्र तिष्ठंति वसवोऽष्टौ द्विजोत्तमाः॥ स्थानमेकं समाश्रित्य सर्वदैव प्रपूजिताः

sūta uvāca tathā'nye tatra tiṣṭhaṁti vasavo'ṣṭau dvijottamāḥ sthānamekaṁ samāśritya sarvadaiva prapūjitāḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो, वहाँ आठों वसु भी एक ही स्थान का आश्रय लेकर सदा पूजित होते हुए स्थित हैं।

श्लोक 2 (skanda.6.155.2)

एकादश तथा रुद्रा आदित्या द्वादशैव तु ॥ देववैद्यौ तथा चान्यावश्विनौ तत्र संस्थितौ

ekādaśa tathā rudrā ādityā dvādaśaiva tu devavaidyau tathā cānyāvaśvinau tatra saṁsthitau

तथा वहाँ ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, तथा देवताओं के वैद्य दोनों अश्विनीकुमार भी स्थित हैं।

श्लोक 3 (skanda.6.155.3)

देवतास्तत्र तिष्ठंति कोटिकोटिप्रनायकाः॥ एकैका ब्राह्मणश्रेष्ठाः कलिकालभयाकुलाः

devatāstatra tiṣṭhaṁti koṭikoṭipranāyakāḥ ekaikā brāhmaṇaśreṣṭhāḥ kalikālabhayākulāḥ

हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, वहाँ करोड़ों-करोड़ों देवताओं के अगुआ ये देवगण, कलिकाल के भय से आकुल होकर एक-एक करके स्थित हैं।

श्लोक 4 (skanda.6.155.4)

हाटकेश्वरजे क्षेत्रे यज्ञभागाप्तये सदा ॥ अष्टम्यां शुक्लपक्षे तु मधुमासे व्यवस्थिते

hāṭakeśvaraje kṣetre yajñabhāgāptaye sadā aṣṭamyāṁ śuklapakṣe tu madhumāse vyavasthite

वे हाटकेश्वर क्षेत्र में सदा यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को स्थित हैं।

श्लोक 5 (skanda.6.155.5)

यस्तान्वसूञ्छुचिर्भूत्वा स्नात्वा धौतांबरो नरः ॥ तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठान्पश्चात्संपूजयेन्नरः

yastānvasūñchucirbhūtvā snātvā dhautāṁbaro naraḥ tarpayitvā dvijaśreṣṭhānpaścātsaṁpūjayennaraḥ

जो मनुष्य शुद्ध होकर, स्नान करके, धुले हुए वस्त्र धारण कर, ब्राह्मणश्रेष्ठों को तर्पण देकर, फिर उन वसुओं की पूजा करता है —

श्लोक 6 (skanda.6.155.6)

वसवस्त्वा कृण्वन्निति मन्त्रेणानेन भक्तितः ॥ नैवेद्यं च ततो दद्याद्वसवश्छंदसाविति

vasavastvā kṛṇvanniti mantreṇānena bhaktitaḥ naivedyaṁ ca tato dadyādvasavaśchaṁdasāviti

— भक्तिपूर्वक इस "वसवस्त्वा कृण्वन्" मन्त्र से, फिर "वसवश्छन्दसा" मन्त्र से नैवेद्य अर्पित करे।

श्लोक 7 (skanda.6.155.7)

ततो धूपं सुगन्धं च यो यच्छति समाहितः ॥ वसवस्त्वां जेतु तथा मन्त्रमेतमुदीरयेत्

tato dhūpaṁ sugandhaṁ ca yo yacchati samāhitaḥ vasavastvāṁ jetu tathā mantrametamudīrayet

फिर एकाग्रचित्त होकर जो सुगन्धित धूप अर्पित करता है, उसे "वसवस्त्वां जेतु" इस मन्त्र का भी उच्चारण करना चाहिए।

श्लोक 8 (skanda.6.155.8)

आरार्तिकं ततो भूयो यः करोति द्विजोत्तमाः ॥ वसवस्त्वां जेतु तथा श्रूयतां यत्फलं हि तत्

ārārtikaṁ tato bhūyo yaḥ karoti dvijottamāḥ vasavastvāṁ jetu tathā śrūyatāṁ yatphalaṁ hi tat

हे द्विजोत्तमो, इसके बाद जो फिर आरती उतारता है, उसे भी यही मन्त्र बोलना चाहिए; अब सुनो, उसका जो फल है वह बताता हूँ।

श्लोक 9 (skanda.6.155.9)

कन्याभिः कोटिभिर्यच्च पूजिताभिर्भवेत्फलम्॥ वसूनां चैव तत्सर्वमष्टभिस्तैः प्रपूजितैः

kanyābhiḥ koṭibhiryacca pūjitābhirbhavetphalam vasūnāṁ caiva tatsarvamaṣṭabhistaiḥ prapūjitaiḥ

करोड़ों कन्याओं की पूजा करने से जो फल मिलता है, वह सब फल उन आठों वसुओं की भलीभाँति पूजा करने से मिल जाता है।

श्लोक 10 (skanda.6.155.10)

तथा ये द्वादशादित्यास्तस्मिन्क्षेत्रे व्यवस्थिताः ॥ तान्स्थाप्य पूजयित्वा च सप्तम्यामर्कवासरे ॥ सम्यक्छ्रद्धासमोपेतः पुष्पगन्धानुलेपनैः

tathā ye dvādaśādityāstasminkṣetre vyavasthitāḥ tānsthāpya pūjayitvā ca saptamyāmarkavāsare samyakchraddhāsamopetaḥ puṣpagandhānulepanaiḥ

तथा जो बारह आदित्य उस क्षेत्र में स्थित हैं, उनकी सप्तमी को रविवार के दिन, श्रद्धायुक्त होकर पुष्प, गन्ध और अनुलेपन से भलीभाँति स्थापना और पूजा करके —

श्लोक 11 (skanda.6.155.11)

पश्चात्तत्पुरतस्तेषां समस्तान्येकविंशतिः ॥ आदित्यव्रत संज्ञानि तस्य पुण्यफलं शृणु

paścāttatpuratasteṣāṁ samastānyekaviṁśatiḥ ādityavrata saṁjñāni tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

— फिर उनके सामने उन सबकी इक्कीस "आदित्यव्रत" नामक आहुतियाँ करे; अब उसका पुण्य-फल सुनो।

श्लोक 12 (skanda.6.155.12)

कोटिद्वादशकं यस्तु सूर्याणां पूजयेन्नरः ॥ तत्फलं प्राप्नुयात्कृत्स्नं पूजयन्नात्र संशयः

koṭidvādaśakaṁ yastu sūryāṇāṁ pūjayennaraḥ tatphalaṁ prāpnuyātkṛtsnaṁ pūjayannātra saṁśayaḥ

जो मनुष्य बारह करोड़ सूर्यों की पूजा करे, उसे जो सम्पूर्ण फल मिलेगा, वही फल इनकी पूजा करने से भी निःसंदेह प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (skanda.6.155.13)

तथैकादशरुद्रा ये तत्र क्षेत्रे द्विजोत्तमाः ॥ एकस्थाने स्थितास्तेषां पूजया श्रूयतां फलम्

tathaikādaśarudrā ye tatra kṣetre dvijottamāḥ ekasthāne sthitāsteṣāṁ pūjayā śrūyatāṁ phalam

हे द्विजोत्तमो, उसी प्रकार उस क्षेत्र में एक ही स्थान पर स्थित ग्यारह रुद्रों की पूजा का फल भी सुनो।

श्लोक 14 (skanda.6.155.14)

यस्तान्पूजयते भक्त्या स्थापयित्वा सुरेश्वरान्॥ चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां जपेच्च शतरुद्रियम्

yastānpūjayate bhaktyā sthāpayitvā sureśvarān caitraśuklacaturdaśyāṁ japecca śatarudriyam

जो चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को उन देवेश्वरों की स्थापना कर भक्तिपूर्वक पूजा करता है, और शतरुद्रीय का जप करता है —

श्लोक 15 (skanda.6.155.15)

एकादशप्रमाणेन कोटयस्तेन पूजिताः ॥ भवंति नात्र संदेहः सत्यमेतन्मयोदितम्

ekādaśapramāṇena koṭayastena pūjitāḥ bhavaṁti nātra saṁdehaḥ satyametanmayoditam

— उसके द्वारा ग्यारह करोड़ रुद्रों की पूजा हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं है; यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 16 (skanda.6.155.16)

यथा तावश्विनौ तत्र देववैद्यौ व्यवस्थितौ ॥ आश्विने मासि चाश्विन्यां पूर्णिमायां तथा तिथौ

yathā tāvaśvinau tatra devavaidyau vyavasthitau āśvine māsi cāśvinyāṁ pūrṇimāyāṁ tathā tithau

इसी प्रकार वहाँ स्थित देवताओं के दोनों वैद्य अश्विनीकुमारों की, आश्विन मास में अश्विनी नक्षत्र से युक्त पूर्णिमा तिथि को —

श्लोक 17 (skanda.6.155.17)

यस्तौ संपूजयित्वा तु ह्यश्विनीसूक्तमुच्चरेत् । द्विकोटि गुणितं पुण्यं सम्यक्तेन समाप्यते

yastau saṁpūjayitvā tu hyaśvinīsūktamuccaret dvikoṭi guṇitaṁ puṇyaṁ samyaktena samāpyate

— जो उन दोनों की भलीभाँति पूजा कर अश्विनी-सूक्त का पाठ करता है, उसे दो करोड़ गुना पुण्य भलीभाँति प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 18 (skanda.6.155.18)

एतद्वः सर्वमाख्यातं माहात्म्यं वसुसंभवम् ॥ आदित्यानां च रुद्राणामश्विनोर्द्विजसत्तमाः

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ māhātmyaṁ vasusaṁbhavam ādityānāṁ ca rudrāṇāmaśvinordvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो, यह वसुओं, आदित्यों, रुद्रों तथा अश्विनीकुमारों से सम्बन्धित सम्पूर्ण माहात्म्य तुम्हें बता दिया।

श्लोक 19 (skanda.6.155.19)

सूत उवाच। तथाऽन्योऽपि च तत्रास्ति याज्ञवल्क्यप्रतिष्ठितः ॥ पुष्पादित्य इति ख्यातः सर्वकामप्रदो नृणाम्

sūta uvāca tathā'nyo'pi ca tatrāsti yājñavalkyapratiṣṭhitaḥ puṣpāditya iti khyātaḥ sarvakāmaprado nṛṇām

सूत जी ने कहा — तथा वहाँ एक और देव भी हैं, याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिष्ठित, जो पुष्पादित्य नाम से प्रसिद्ध हैं, और मनुष्यों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।

श्लोक 20 (skanda.6.155.20)

यो यं काममभिध्याय तं पूजयति मानवः ॥ स तं कृत्स्नमवाप्नोति यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्

yo yaṁ kāmamabhidhyāya taṁ pūjayati mānavaḥ sa taṁ kṛtsnamavāpnoti yadyapi syātsudurlabham

जो मनुष्य जिस कामना का ध्यान करके उनकी पूजा करता है, वह उस सम्पूर्ण कामना को प्राप्त कर लेता है, चाहे वह कितनी ही दुर्लभ क्यों न हो।

श्लोक 21 (skanda.6.155.21)

अपुत्रो लभते पुत्रान्धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥ बहुवैरोऽरिनाशं च विद्यार्थी शास्त्रविद्भवेत्

aputro labhate putrāndhanārthī dhanamāpnuyāt bahuvairo'rināśaṁ ca vidyārthī śāstravidbhavet

पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रों को प्राप्त करता है, धन का इच्छुक धन पाता है, बहुत शत्रुओं वाला शत्रु-नाश पाता है, तथा विद्यार्थी शास्त्रों का ज्ञाता बन जाता है।

श्लोक 22 (skanda.6.155.22)

सप्तम्यामर्कवारेण यस्तं पश्यति मानवः ॥ मुच्येद्दिनोद्भवात्पापान्महतोऽपिद्विजोत्तमाः

saptamyāmarkavāreṇa yastaṁ paśyati mānavaḥ mucyeddinodbhavātpāpānmahato'pidvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो, जो मनुष्य सप्तमी को रविवार के दिन उनका दर्शन करता है, वह उस दिन उत्पन्न महान पापों से भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.6.155.23)

पूजया हि प्रणश्येत पापं वर्षसमुद्भवम्॥ नाशं याति न संदेहस्तमः सूर्योदये यथा

pūjayā hi praṇaśyeta pāpaṁ varṣasamudbhavam nāśaṁ yāti na saṁdehastamaḥ sūryodaye yathā

पूजा करने से वर्षभर में उत्पन्न पाप उसी प्रकार नाश को प्राप्त होता है जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 24 (skanda.6.155.24)

अष्टोत्तरशतं चैव यः करोति प्रदक्षिणाम् ॥ फलहस्तः स मुच्येत ह्याजन्ममरणादघात्

aṣṭottaraśataṁ caiva yaḥ karoti pradakṣiṇām phalahastaḥ sa mucyeta hyājanmamaraṇādaghāt

तथा जो नारियल फल हाथ में लेकर एक सौ आठ प्रदक्षिणाएँ करता है, वह जन्म से लेकर मृत्यु तक के पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 25 (skanda.6.155.25)

प्रदक्षिणां प्रकुवाणो यो यं काममभीप्सति ॥ स तमाप्नोत्यसंदिग्धं निष्कामो मोक्षमाप्नुयात्

pradakṣiṇāṁ prakuvāṇo yo yaṁ kāmamabhīpsati sa tamāpnotyasaṁdigdhaṁ niṣkāmo mokṣamāpnuyāt

प्रदक्षिणा करते समय जो जिस कामना की इच्छा रखता है, वह उसे निश्चय ही प्राप्त कर लेता है, और जो निष्काम है, वह मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 26 (skanda.6.155.26)

संक्रांतौ सूर्यवारेण यः कुर्यात्स्नापनक्रियाम्॥ अभीष्टं सिध्यते तस्य मेषे वा यदि वा तुले

saṁkrāṁtau sūryavāreṇa yaḥ kuryātsnāpanakriyām abhīṣṭaṁ sidhyate tasya meṣe vā yadi vā tule

जो संक्रान्ति के दिन, रविवार के साथ, चाहे मेष राशि में हो या तुला राशि में, स्नान-क्रिया करता है, उसकी अभीष्ट कामना सिद्ध हो जाती है।

श्लोक 27 (skanda.6.155.27)

तस्मिन्सर्वप्रयत्नेन वांछद्भिरीप्सितं फलम् ॥ स देवो वीक्षणीयश्च पूजनीयो विशेषतः

tasminsarvaprayatnena vāṁchadbhirīpsitaṁ phalam sa devo vīkṣaṇīyaśca pūjanīyo viśeṣataḥ

इसलिए वांछित फल की इच्छा रखने वालों को सम्पूर्ण प्रयत्न से उस देव का दर्शन करना चाहिए, और उन्हें विशेष रूप से पूजनीय मानना चाहिए।

श्लोक 28 (skanda.6.155.28)

यद्देवैः सकलैर्दृष्टैश्चमत्कारपुरोद्भवैः ॥ फलमाप्नोति तद्दृष्टौ तेन तत्फलमाप्नुयात्

yaddevaiḥ sakalairdṛṣṭaiścamatkārapurodbhavaiḥ phalamāpnoti taddṛṣṭau tena tatphalamāpnuyāt

चमत्कारपुर में उत्पन्न समस्त देवताओं के दर्शन से जो फल प्राप्त होता है, वही फल इनके दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 29 (skanda.6.155.29)

ऋषय ऊचुः। याज्ञवल्क्येन देवोऽसौ यदि तावत्प्रतिष्ठितः ॥ पुष्पादित्यः कथं प्रोक्त एतन्नो वक्तुमर्हसि

ṛṣaya ūcuḥ yājñavalkyena devo'sau yadi tāvatpratiṣṭhitaḥ puṣpādityaḥ kathaṁ prokta etanno vaktumarhasi

ऋषियों ने कहा — यदि यह देव याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिष्ठित किया गया है, तो फिर यह पुष्पादित्य क्यों कहलाए, यह हमें बताने योग्य हैं।

श्लोक 30 (skanda.6.155.30)

सूत उवाच। अत्र वः कीर्तयिष्यामि चेतिहासं पुरातनम् ॥ पुष्पादित्यो यथा जातो याज्ञवल्क्यप्रतिष्ठितः

sūta uvāca atra vaḥ kīrtayiṣyāmi cetihāsaṁ purātanam puṣpādityo yathā jāto yājñavalkyapratiṣṭhitaḥ

सूत जी ने कहा — इस विषय में मैं तुम्हें वह प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा, जिसमें बताया गया है कि याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिष्ठित होकर भी वे किस प्रकार पुष्पादित्य कहलाए।

श्लोक 31 (skanda.6.155.31)

अस्त्यत्र मेदिनीपृष्ठे सुपुरं वैदिशं महत् ॥ नानासौध समाकीर्णं वरप्राकारशोभितम्

astyatra medinīpṛṣṭhe supuraṁ vaidiśaṁ mahat nānāsaudha samākīrṇaṁ varaprākāraśobhitam

इस पृथ्वी पर वैदिश नामक एक विशाल सुन्दर नगर है, जो अनेक भवनों से भरा हुआ और उत्तम प्राचीरों से शोभित है।

श्लोक 32 (skanda.6.155.32)

उद्यानशतसंकीर्णं तडागैरुपशोभितम् ॥ तत्रासीत्पार्थिवश्रेष्ठश्चित्रवर्मेति विश्रुतः

udyānaśatasaṁkīrṇaṁ taḍāgairupaśobhitam tatrāsītpārthivaśreṣṭhaścitravarmeti viśrutaḥ

सैकड़ों उद्यानों से भरा हुआ और सरोवरों से सुशोभित उस नगर में चित्रवर्मा नाम से प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ राजा था।

श्लोक 33 (skanda.6.155.33)

न दुर्भिक्षं न च व्याधिर्न च चौरकृतं भयम् ॥ तस्मिञ्छासति धर्मज्ञे सततं धर्मवत्सले

na durbhikṣaṁ na ca vyādhirna ca caurakṛtaṁ bhayam tasmiñchāsati dharmajñe satataṁ dharmavatsale

उस धर्मज्ञ तथा सदा धर्म में अनुरक्त राजा के शासन में न कोई अकाल था, न रोग था, और न चोरों का भय था।

श्लोक 34 (skanda.6.155.34)

तत्पुरे क्षत्रियो जात्या मणिभद्र इति स्मृतः ॥ स वै धनेन संयुक्तः पितृपैतामहेन च

tatpure kṣatriyo jātyā maṇibhadra iti smṛtaḥ sa vai dhanena saṁyuktaḥ pitṛpaitāmahena ca

उस नगर में जन्म से क्षत्रिय, मणिभद्र नाम से विख्यात एक व्यक्ति था; वह अपने पिता और पितामह के धन से युक्त था।

श्लोक 35 (skanda.6.155.35)

तत्पुरं सकलं चैव स राजा मंत्रिभिः सह ॥ कुसीदाहृतवित्तेन वर्तते कार्य उत्थिते

tatpuraṁ sakalaṁ caiva sa rājā maṁtribhiḥ saha kusīdāhṛtavittena vartate kārya utthite

वह उस सम्पूर्ण नगर को, यहाँ तक कि राजा को भी मंत्रियों सहित, सूदखोरी से अर्जित धन के द्वारा, अपने कार्य में लगाए रखता था।

श्लोक 36 (skanda.6.155.36)

स च कायेन कुब्जः स्याज्जराव्याप्तस्तथैव च ॥ वलीपलितगात्रश्च ह्यत्यंतं च विरूपधृक्

sa ca kāyena kubjaḥ syājjarāvyāptastathaiva ca valīpalitagātraśca hyatyaṁtaṁ ca virūpadhṛk

वह शरीर से कुबड़ा था, बुढ़ापे से ग्रस्त था, उसके अंग झुर्रियों और सफेद बालों से भरे थे, तथा वह अत्यन्त कुरूप था।

श्लोक 37 (skanda.6.155.37)

तथा चैव कुकीनाशः प्रभूतेऽपि धने सति ॥ न ददाति स पापात्मा कस्यचित्किञ्चिदेव हि ॥ न भक्षयति तृष्णार्तः स्वयमेव कथंचन

tathā caiva kukīnāśaḥ prabhūte'pi dhane sati na dadāti sa pāpātmā kasyacitkiñcideva hi na bhakṣayati tṛṣṇārtaḥ svayameva kathaṁcana

इतना ही नहीं, वह अत्यन्त कंजूस भी था — अपार धन होने पर भी वह पापी किसी को कुछ भी नहीं देता था, और तृष्णा से पीड़ित होकर स्वयं भी किसी प्रकार कुछ नहीं खाता था।

श्लोक 38 (skanda.6.155.38)

एवंविधोऽपि सोऽतीवविरूपोऽपि सुदुर्मतिः ॥ प्रार्थयामास वै कन्यां स्वजात्यां वीक्ष्य सुंदरीम्

evaṁvidho'pi so'tīvavirūpo'pi sudurmatiḥ prārthayāmāsa vai kanyāṁ svajātyāṁ vīkṣya suṁdarīm

ऐसा होते हुए भी, अत्यन्त कुरूप होते हुए भी, वह दुर्बुद्धि अपनी ही जाति में एक सुन्दर कन्या को देखकर उसकी याचना करने लगा —

श्लोक 39 (skanda.6.155.39)

बिंबोष्ठीं चारुदेहां च मुष्टिग्राह्यकृशोदरीम्॥ पद्मपत्रविशालाक्षीं गूढगुल्फां सुकेशिकाम्

biṁboṣṭhīṁ cārudehāṁ ca muṣṭigrāhyakṛśodarīm padmapatraviśālākṣīṁ gūḍhagulphāṁ sukeśikām

— जिसके होंठ बिम्बफल के समान लाल थे, जिसका शरीर सुन्दर था, जिसकी कमर मुट्ठी में समा सके इतनी कृश थी, जिसके नेत्र कमल-पत्र के समान विशाल थे, जिसके टखने छिपे हुए थे, और जिसके केश सुन्दर थे —

श्लोक 40 (skanda.6.155.40)

रक्तां सप्तसु गात्रेषु त्रिगंभीरां तथा पुनः ॥ सर्वलक्षणसंपूर्णां जातीयां सुमनोरमाम्

raktāṁ saptasu gātreṣu trigaṁbhīrāṁ tathā punaḥ sarvalakṣaṇasaṁpūrṇāṁ jātīyāṁ sumanoramām

— जिसके सात अंग लालिमा युक्त थे, जो तीन स्थानों में गम्भीर थी, और जो समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, कुलीन तथा अत्यन्त मनोहर थी।

श्लोक 41 (skanda.6.155.41)

क्षत्रियाद्द्विजशार्दूला दरिद्रेण च पीडितात् ॥ तेन तत्सकलं वृत्तं भार्यायै संनिवेदितम्

kṣatriyāddvijaśārdūlā daridreṇa ca pīḍitāt tena tatsakalaṁ vṛttaṁ bhāryāyai saṁniveditam

हे द्विजश्रेष्ठो, वह कन्या एक निर्धनता से पीड़ित क्षत्रिय की पुत्री थी; उसने अपनी सारी बात अपनी पत्नी को बता दी।

श्लोक 42 (skanda.6.155.42)

तच्छ्रुत्वा सा च दुःखेन मूर्च्छिता संबभूव ह ॥ संबोधिता ततस्तेन वाक्यैर्दृष्टांतसंभवैः

tacchrutvā sā ca duḥkhena mūrcchitā saṁbabhūva ha saṁbodhitā tatastena vākyairdṛṣṭāṁtasaṁbhavaiḥ

यह सुनकर वह दुःख से मूर्च्छित हो गई; तब उसने उसे दृष्टान्तपूर्ण वचनों से समझाया।

श्लोक 43 (skanda.6.155.43)

क्षत्रिय उवाच। न सा विद्या न तच्छिल्पं न तत्कार्यं न सा कला ॥ अर्थार्थिभिर्न तज्ज्ञानं धनिनां यन्न दीयते

kṣatriya uvāca na sā vidyā na tacchilpaṁ na tatkāryaṁ na sā kalā arthārthibhirna tajjñānaṁ dhanināṁ yanna dīyate

क्षत्रिय ने कहा — ऐसी कोई विद्या नहीं, कोई शिल्प नहीं, कोई कार्य नहीं, कोई कला नहीं, कोई ज्ञान नहीं, जो धन के इच्छुक लोगों द्वारा धनवानों को न दिया जाता हो।

श्लोक 44 (skanda.6.155.44)

इह लोके च धनिनां परोऽपि स्वजनायते ॥ स्वजनोऽपि दरिद्राणां कार्यार्थे दुर्जनायते

iha loke ca dhanināṁ paro'pi svajanāyate svajano'pi daridrāṇāṁ kāryārthe durjanāyate

इस संसार में धनवानों के लिए पराया भी अपना बन जाता है, जबकि निर्धनों के लिए अपने कार्य के समय अपने ही लोग भी दुर्जन बन जाते हैं।

श्लोक 45 (skanda.6.155.45)

अर्थेभ्यो हि विवृद्धेभ्यः संभृतेभ्यस्ततस्ततः ॥ प्रवर्तंते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्यो यथापगाः

arthebhyo hi vivṛddhebhyaḥ saṁbhṛtebhyastatastataḥ pravartaṁte kriyāḥ sarvāḥ parvatebhyo yathāpagāḥ

क्योंकि जिस प्रकार पर्वतों से नदियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार बढ़े हुए और सब ओर से संचित धन से ही सारे कार्य सिद्ध होते हैं।

श्लोक 46 (skanda.6.155.46)

पूज्यते यदपूज्योऽपि यदगम्योऽपि गम्यते ॥ वंद्यते यदवन्द्योऽपि ह्यनुबंधो धनस्य सः

pūjyate yadapūjyo'pi yadagamyo'pi gamyate vaṁdyate yadavandyo'pi hyanubaṁdho dhanasya saḥ

जिसके कारण अपूज्य भी पूजा जाता है, अगम्य के पास भी पहुँच बन जाती है, और अवन्द्य भी वन्दित होता है, वह धन का ही प्रताप है।

श्लोक 47 (skanda.6.155.47)

अशनादिंद्रिया णीव स्युः कार्याण्यखिलानिह ॥ सर्वस्मात्कारणाद्वित्तं सर्वसाधनमुच्यते

aśanādiṁdriyā ṇīva syuḥ kāryāṇyakhilāniha sarvasmātkāraṇādvittaṁ sarvasādhanamucyate

जिस प्रकार भोजन से इन्द्रियाँ काम करती हैं, उसी प्रकार यहाँ सारे कार्य धन से चलते हैं; इसीलिए हर कारण में धन को ही सर्वसाधन कहा जाता है।

श्लोक 48 (skanda.6.155.48)

अर्थार्थी जीवलोकोऽयं श्मशानमपि सेवते ॥ जनितारमपि त्यक्त्वा निःस्वः संयाति दूरतः

arthārthī jīvaloko'yaṁ śmaśānamapi sevate janitāramapi tyaktvā niḥsvaḥ saṁyāti dūrataḥ

यह प्राणी-जगत् धन का इच्छुक होकर श्मशान की भी सेवा करता है, जबकि निर्धन होने पर जनक को भी त्यागकर दूर चला जाता है।

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