नागर खण्ड · अध्याय 156
मणिभद्र की क्रूरता तथा पुष्प ब्राह्मण की विडम्बना
श्लोक 1 (skanda.6.156.1)
सूत उवाच। एवं सम्बोधिता तेन सा भार्या विजने गता ॥ कन्याप्रदानस्य रुचिः संजाता तदनन्तरम्
sūta uvāca evaṁ sambodhitā tena sā bhāryā vijane gatā kanyāpradānasya ruciḥ saṁjātā tadanantaram
सूत जी ने कहा — इस प्रकार उसके द्वारा समझाई गई वह पत्नी एकान्त से लौट आई, और उसके बाद उसे कन्या-दान के लिए रुचि उत्पन्न हो गई।
श्लोक 2 (skanda.6.156.2)
ततः स पादौ प्रक्षाल्य मणिभद्रस्य सत्वरम्॥ उदकं साक्षतं हस्ते कन्यादानकृते ददौ
tataḥ sa pādau prakṣālya maṇibhadrasya satvaram udakaṁ sākṣataṁ haste kanyādānakṛte dadau
तब उसने शीघ्र ही मणिभद्र के पैर धोकर, कन्यादान के लिए उसके हाथ में अक्षत-सहित जल दिया।
श्लोक 3 (skanda.6.156.3)
सोऽपि हस्तकृते तोये तं क्षत्रियमुवाच ह ॥ अद्यैव कुरु मे शीघ्रं विवाहं कन्यया सह
so'pi hastakṛte toye taṁ kṣatriyamuvāca ha adyaiva kuru me śīghraṁ vivāhaṁ kanyayā saha
उस जल को हाथ में लेते ही उसने उस क्षत्रिय से कहा — "आज ही शीघ्र मेरा इस कन्या के साथ विवाह करवा दो —
श्लोक 4 (skanda.6.156.4)
यस्मादिच्छामि संस्थातुं तेन ते गृहमागतः ॥
yasmādicchāmi saṁsthātuṁ tena te gṛhamāgataḥ
— क्योंकि मैं यहाँ बसना चाहता हूँ, इसीलिए तुम्हारे घर आया हूँ।"
श्लोक 5 (skanda.6.156.5)
क्षत्रिय उवाच। नात्र नक्षत्रमर्हं तु न किंचिद्भगदैवतम्
kṣatriya uvāca nātra nakṣatramarhaṁ tu na kiṁcidbhagadaivatam
क्षत्रिय ने कहा — "अभी कोई उपयुक्त नक्षत्र नहीं है, और न ही चन्द्रमा किसी शुभ नक्षत्र से युक्त है।
श्लोक 6 (skanda.6.156.6)
विवाहस्य न वारस्तु प्रसुप्ते मधुसूदने ॥ अस्मिन्काले तु संप्राप्ते या कन्या परिणीयते
vivāhasya na vārastu prasupte madhusūdane asminkāle tu saṁprāpte yā kanyā pariṇīyate
मधुसूदन के शयन-काल में विवाह का समय नहीं होता; इस समय में यदि किसी कन्या का विवाह किया जाए —
श्लोक 7 (skanda.6.156.7)
सा च संवत्सरान्मध्ये ध्रुवं वैधव्यमाप्नुयात्॥ एवं दैवज्ञमुख्यानां श्रुतं प्रवदतां मया
sā ca saṁvatsarānmadhye dhruvaṁ vaidhavyamāpnuyāt evaṁ daivajñamukhyānāṁ śrutaṁ pravadatāṁ mayā
— तो वह एक वर्ष के भीतर निश्चय ही विधवा हो जाती है; ऐसा मैंने प्रमुख ज्योतिषियों के कहने से सुना है।
श्लोक 8 (skanda.6.156.8)
तस्माच्छुभे तु संप्राप्ते नक्षत्रे भगदैवते ॥ त्वं विवाहय मे कन्यां प्रोत्थिते मधुसूदने ॥ येन क्षेमंकरी ते स्यात्तथा पुत्रप्रपौत्रिणी
tasmācchubhe tu saṁprāpte nakṣatre bhagadaivate tvaṁ vivāhaya me kanyāṁ protthite madhusūdane yena kṣemaṁkarī te syāttathā putraprapautriṇī
अतः जब कोई शुभ नक्षत्र आए और मधुसूदन जाग उठें, तब तुम मेरी कन्या से विवाह करना, जिससे वह तुम्हारे लिए कल्याणकारी हो तथा पुत्र-पौत्रों वाली बने।"
श्लोक 9 (skanda.6.156.9)
मणिभद्र उवाच। नक्षत्रं वह्निदैवत्यं प्रसुप्तो मधुसूदनः
maṇibhadra uvāca nakṣatraṁ vahnidaivatyaṁ prasupto madhusūdanaḥ
मणिभद्र ने कहा — "नक्षत्र अग्नि-देवता वाला है, और मधुसूदन तो सोए हुए ही हैं।
श्लोक 10 (skanda.6.156.10)
सांप्रतं वत्सरांतोऽयं विवाहे विहिते सति ॥ कामाग्निरुत्थितः काये सांप्रतं मां प्रबाधते
sāṁprataṁ vatsarāṁto'yaṁ vivāhe vihite sati kāmāgnirutthitaḥ kāye sāṁprataṁ māṁ prabādhate
अभी वर्ष का अन्त है, और यदि विवाह हो जाए तो अच्छा है, क्योंकि इस समय मेरे शरीर में उठी हुई काम-अग्नि मुझे पीड़ित कर रही है।
श्लोक 11 (skanda.6.156.11)
तस्मात्कुरु प्रसादं मे कन्याविवहितेन तु ॥ तव वित्तं प्रदास्यामि सुखी येन भविष्यसि
tasmātkuru prasādaṁ me kanyāvivahitena tu tava vittaṁ pradāsyāmi sukhī yena bhaviṣyasi
इसलिए मुझ पर कृपा करो और अभी कन्या का विवाह कर दो; मैं तुम्हें इतना धन दूँगा जिससे तुम सुखी हो जाओगे।"
श्लोक 12 (skanda.6.156.12)
सूत उवाच। तस्माच्च वित्तलोभेन क्षत्रियो द्विजसत्तमाः ॥ विवाहं कारयामास तत्क्षणादेव स द्विजाः
sūta uvāca tasmācca vittalobhena kṣatriyo dvijasattamāḥ vivāhaṁ kārayāmāsa tatkṣaṇādeva sa dvijāḥ
सूत जी ने कहा — हे द्विजसत्तमो, धन के लोभ के कारण उस क्षत्रिय ने उसी क्षण उस विवाह को सम्पन्न करवा दिया।
श्लोक 13 (skanda.6.156.13)
ददौ कन्यां सुदुःखार्तामश्रुपूर्णेक्षणां स्थिताम् ॥ सन्निधौ वह्निविप्राणां तदा तेन विवाहिता
dadau kanyāṁ suduḥkhārtāmaśrupūrṇekṣaṇāṁ sthitām sannidhau vahniviprāṇāṁ tadā tena vivāhitā
उसने अत्यन्त दुःखी और आँसुओं से भरे नेत्रों वाली उस कन्या को दे दिया, और अग्नि तथा ब्राह्मणों की उपस्थिति में उसका विवाह करवा दिया गया।
श्लोक 14 (skanda.6.156.14)
नीत्वा निजगृहं पश्चात्कामधर्मे नियोजिता ॥ अनिच्छंतीमपि सतीं तामतीव निरर्गलः
nītvā nijagṛhaṁ paścātkāmadharme niyojitā anicchaṁtīmapi satīṁ tāmatīva nirargalaḥ
उसे अपने घर ले जाकर, उस निर्लज्ज पुरुष ने न चाहते हुए भी उस सती नारी को अत्यन्त उद्दण्डतापूर्वक काम-भोग में लगा दिया।
श्लोक 15 (skanda.6.156.15)
सोऽपि निष्कामतां प्राप्य निर्भर्त्स्य च मुहुर्मुहुः ॥ भाषिकाभिरनेकाभिस्तापयित्वा च भामिनीम्
so'pi niṣkāmatāṁ prāpya nirbhartsya ca muhurmuhuḥ bhāṣikābhiranekābhistāpayitvā ca bhāminīm
वह भी अपनी कामेच्छा तृप्त करके, बार-बार उसे डाँटकर तथा अनेक कटु वचनों से उस सुन्दरी को सन्तप्त करके —
श्लोक 16 (skanda.6.156.16)
शांतिं नीता ततस्तेन प्रत्यूषे समुपस्थिते ॥ भृत्यवर्गः समस्तोऽपि ततो निःसारितो गृहात्
śāṁtiṁ nītā tatastena pratyūṣe samupasthite bhṛtyavargaḥ samasto'pi tato niḥsārito gṛhāt
— उसे शान्त करा दिया गया; फिर सुबह होते ही उसने समस्त सेवकवर्ग को घर से निकाल दिया।
श्लोक 17 (skanda.6.156.17)
इर्ष्याधर्मं समास्थाय परमं द्विजसत्तमाः ॥ एक एव कृतस्तेन द्वारपालो नपुंसकः
irṣyādharmaṁ samāsthāya paramaṁ dvijasattamāḥ eka eva kṛtastena dvārapālo napuṁsakaḥ
हे द्विजसत्तमो, अत्यन्त ईर्ष्या-भाव का आश्रय लेकर उसने केवल एक नपुंसक को ही द्वारपाल नियुक्त किया।
श्लोक 18 (skanda.6.156.18)
प्रोक्तं न च त्वया देयः प्रवेशोऽत्र गृहे मम ॥ भृत्यस्य भिक्षुकस्यैव वृद्धस्य व्रतिनस्तथा
proktaṁ na ca tvayā deyaḥ praveśo'tra gṛhe mama bhṛtyasya bhikṣukasyaiva vṛddhasya vratinastathā
उसने उसे आदेश दिया — "तुम्हें इस मेरे घर में किसी को भी प्रवेश नहीं देना चाहिए — चाहे वह सेवक हो, भिक्षुक हो, वृद्ध हो या व्रतधारी हो।"
श्लोक 19 (skanda.6.156.19)
एवं कृत्वा विधानं तु ततश्चक्रे जनैः समम् ॥ व्यवहारक्रियाः सर्वा द्रव्यलक्षैः सहस्रशः
evaṁ kṛtvā vidhānaṁ tu tataścakre janaiḥ samam vyavahārakriyāḥ sarvā dravyalakṣaiḥ sahasraśaḥ
इस प्रकार यह विधान बनाकर, फिर उसने लोगों के साथ लाखों-हज़ारों की मात्रा में समस्त लेन-देन के व्यवहार करने शुरू कर दिए।
श्लोक 20 (skanda.6.156.20)
श्वशुरस्यापि नो दत्तं किंचित्तेन दुरात्मना ॥ भार्यायाः श्वेतवस्त्राणि मुक्त्वाऽन्यन्नैव किंचन
śvaśurasyāpi no dattaṁ kiṁcittena durātmanā bhāryāyāḥ śvetavastrāṇi muktvā'nyannaiva kiṁcana
उस दुरात्मा ने अपने ससुर को भी कुछ नहीं दिया, और अपनी पत्नी को श्वेत वस्त्रों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दिया।
श्लोक 21 (skanda.6.156.21)
यामद्वयेऽपि संप्राप्ते दिनस्य गृहमागतः ॥ मितमन्नं तत स्तस्या भोजनार्थं प्रयच्छति
yāmadvaye'pi saṁprāpte dinasya gṛhamāgataḥ mitamannaṁ tata stasyā bhojanārthaṁ prayacchati
दिन के दो पहर बीत जाने पर वह घर आता, और उसे भोजन के लिए केवल परिमित अन्न देता था।
श्लोक 22 (skanda.6.156.22)
यावन्मात्रं च सा भुंक्त एकविप्रान्वितः स्वयम् ॥ भुक्त्वा चैव ततो याति व्यवहारकृते बहिः
yāvanmātraṁ ca sā bhuṁkta ekaviprānvitaḥ svayam bhuktvā caiva tato yāti vyavahārakṛte bahiḥ
वह स्वयं एक ही ब्राह्मण के साथ बैठकर, उतना ही खाकर, जितना वह खाती थी; फिर भोजन करके व्यापार के लिए बाहर चला जाता था।
श्लोक 23 (skanda.6.156.23)
आगच्छति पुनर्हर्म्यं संध्याकाल उपस्थिते ॥ साऽपि तिष्ठति हर्म्यस्था पत्नी तस्य दुरात्मनः
āgacchati punarharmyaṁ saṁdhyākāla upasthite sā'pi tiṣṭhati harmyasthā patnī tasya durātmanaḥ
सन्ध्याकाल होने पर वह फिर महल में लौट आता; और उस दुरात्मा की वह पत्नी भी महल में ही बन्द रहती।
श्लोक 24 (skanda.6.156.24)
वैराग्यं परमं प्राप्ता दुःखशोकसमन्विता । मत्सीव पतिता तोयादन्यस्मिंस्तु स्थलांतिके
vairāgyaṁ paramaṁ prāptā duḥkhaśokasamanvitā matsīva patitā toyādanyasmiṁstu sthalāṁtike
वह अत्यन्त वैराग्य को प्राप्त, दुःख-शोक से युक्त रहती थी — मानो जल से निकालकर किसी अन्य स्थल पर पड़ी हुई मछली के समान।
श्लोक 25 (skanda.6.156.25)
चक्रवाकी विमुक्तेव संप्राप्ते दिवसक्षये ॥ हंसी हंसवियुक्तेव मृगीव मृगवर्जिता
cakravākī vimukteva saṁprāpte divasakṣaye haṁsī haṁsaviyukteva mṛgīva mṛgavarjitā
वह दिन के अन्त में अपने प्रिय से बिछुड़ी हुई चक्रवाकी के समान, हंस से वियुक्त हंसिनी के समान, तथा मृग से वंचित मृगी के समान थी।
श्लोक 26 (skanda.6.156.26)
सोऽपि नित्यं ददौ भोज्यं विप्रस्यैकस्य च द्विजाः ॥ प्रोच्य तं ब्राह्मणं पूर्वं सामपूर्वमिदं वचः
so'pi nityaṁ dadau bhojyaṁ viprasyaikasya ca dvijāḥ procya taṁ brāhmaṇaṁ pūrvaṁ sāmapūrvamidaṁ vacaḥ
हे द्विजो, वह प्रतिदिन केवल एक ही ब्राह्मण को भोजन देता था; और उस ब्राह्मण से पहले सामनीति से युक्त होकर यह बात कहता था —
श्लोक 27 (skanda.6.156.27)
अधोवक्त्रेण भोक्तव्यं सदा विप्र गृहे मम । यदि पश्यसि मे भार्यां संप्राप्स्यसि विडंबनाम्
adhovaktreṇa bhoktavyaṁ sadā vipra gṛhe mama yadi paśyasi me bhāryāṁ saṁprāpsyasi viḍaṁbanām
"हे विप्र, मेरे घर में सदा नीचा मुँह करके ही भोजन करना; यदि तुमने मेरी पत्नी को देख लिया, तो तुम्हारा अपमान होगा।"
श्लोक 28 (skanda.6.156.28)
एवं विडंबितास्तेन ह्यूर्ध्ववक्त्रावलोकिनः ॥ ये चान्ये भयसंत्रस्ता न यांति च तदालयम्
evaṁ viḍaṁbitāstena hyūrdhvavaktrāvalokinaḥ ye cānye bhayasaṁtrastā na yāṁti ca tadālayam
इस प्रकार जिन ब्राह्मणों ने ऊपर मुँह करके देखा, वे इस प्रकार अपमानित हुए, और इसी भय से आतंकित होकर अन्य ब्राह्मण उसके घर नहीं जाते थे।
श्लोक 29 (skanda.6.156.29)
कस्यचित्त्वथ कालस्य पुष्पोनाम द्विजोत्तमः ॥ तीर्थयात्राप्रसंगेन संप्राप्तस्तत्पुरं प्रति
kasyacittvatha kālasya puṣponāma dvijottamaḥ tīrthayātrāprasaṁgena saṁprāptastatpuraṁ prati
तभी किसी समय पुष्प नाम के एक श्रेष्ठ ब्राह्मण तीर्थयात्रा के प्रसंग में उस नगर की ओर आ पहुँचे।
श्लोक 30 (skanda.6.156.30)
पूर्वे वयसि संस्थश्च दर्शनीयतमाकृतिः ॥ क्षुत्क्षामः सुपरिश्रांतो मध्याह्ने समुपस्थिते
pūrve vayasi saṁsthaśca darśanīyatamākṛtiḥ kṣutkṣāmaḥ supariśrāṁto madhyāhne samupasthite
वह अपनी युवावस्था में था, अत्यन्त सुन्दर रूप वाला था, तथा दोपहर होते ही भूख से क्षीण और अत्यन्त थका हुआ था।
श्लोक 31 (skanda.6.156.31)
परिभ्रमति वै नृणां स गृहाणि समंततः ॥ मणिभद्रः समादिष्टस्तस्य केनापि भोज्यदः
paribhramati vai nṛṇāṁ sa gṛhāṇi samaṁtataḥ maṇibhadraḥ samādiṣṭastasya kenāpi bhojyadaḥ
वह लोगों के घरों में चारों ओर भोजन के लिए भटकने लगा; किसी ने उसे भोजन देने वाले के रूप में मणिभद्र का नाम बता दिया।
श्लोक 32 (skanda.6.156.32)
ततस्तं प्रार्थयामास गत्वा भोज्यं च स द्विजाः ॥ तेनापि स द्विजः प्रोक्तस्तदासौ द्विजसत्तमाः
tatastaṁ prārthayāmāsa gatvā bhojyaṁ ca sa dvijāḥ tenāpi sa dvijaḥ proktastadāsau dvijasattamāḥ
तब हे द्विजो, वहाँ जाकर उस ब्राह्मण ने उससे भोजन की याचना की; तब हे द्विजसत्तमो, उसने भी उस ब्राह्मण से कहा —
श्लोक 33 (skanda.6.156.33)
अधोवक्त्रेण भोक्तव्यं त्वया वीक्ष्या न मे प्रिया ॥ नो चेद्विडंबनां विप्र संप्राप्स्यसि न संशयः
adhovaktreṇa bhoktavyaṁ tvayā vīkṣyā na me priyā no cedviḍaṁbanāṁ vipra saṁprāpsyasi na saṁśayaḥ
"तुम्हें नीचा मुँह करके भोजन करना होगा, मेरी प्रिया को देखना नहीं है; अन्यथा हे विप्र, तुम निश्चय ही अपमानित होगे।
श्लोक 34 (skanda.6.156.34)
एवं ज्ञात्वा महाभाग यत्क्षेमं तत्समाचर
evaṁ jñātvā mahābhāga yatkṣemaṁ tatsamācara
हे महाभाग, यह जानकर जो कल्याणकारी हो, वही करो।"
श्लोक 35 (skanda.6.156.35)
पुष्प उवाच। क्षुत्क्षामस्य न मे कार्यं परदारविलोकनैः ॥ वेदाध्ययनयुक्तस्य तीर्थयात्रारतस्य च
puṣpa uvāca kṣutkṣāmasya na me kāryaṁ paradāravilokanaiḥ vedādhyayanayuktasya tīrthayātrāratasya ca
पुष्प ने कहा — "भूख से पीड़ित, वेदाध्ययन में लगे तथा तीर्थयात्रा में रत मुझ जैसे व्यक्ति को दूसरे की पत्नी को देखने से क्या प्रयोजन?"
श्लोक 36 (skanda.6.156.36)
मणिभद्र उवाच। तदागच्छ मया सार्धं सांप्रतं मम मंदिरम् ॥ विशेषात्तव दास्यामि भोजनं दक्षिणान्वितम्
maṇibhadra uvāca tadāgaccha mayā sārdhaṁ sāṁprataṁ mama maṁdiram viśeṣāttava dāsyāmi bhojanaṁ dakṣiṇānvitam
मणिभद्र ने कहा — "तो अभी मेरे साथ मेरे घर चलो; मैं तुम्हें विशेष रूप से दक्षिणा-सहित भोजन दूँगा।"
श्लोक 37 (skanda.6.156.37)
एवं तौ संविदं कृत्वा ययतुर्ब्राह्मणोत्तमाः ॥ हट्टमार्गे गतौ तत्र यत्र षंढो व्यव स्थितः
evaṁ tau saṁvidaṁ kṛtvā yayaturbrāhmaṇottamāḥ haṭṭamārge gatau tatra yatra ṣaṁḍho vyava sthitaḥ
हे ब्राह्मणोत्तमो, इस प्रकार समझौता करके वे दोनों चल पड़े, और बाज़ार के मार्ग से उस स्थान पर पहुँचे जहाँ वह नपुंसक द्वारपाल खड़ा था।
श्लोक 38 (skanda.6.156.38)
तत्पार्श्वे ब्राह्मणं धृत्वा प्रविष्टो गृहमध्यतः ॥ भार्यया श्रपयामास धान्यं मानमितं तदा
tatpārśve brāhmaṇaṁ dhṛtvā praviṣṭo gṛhamadhyataḥ bhāryayā śrapayāmāsa dhānyaṁ mānamitaṁ tadā
उस नपुंसक के पास ब्राह्मण को रोककर वह स्वयं घर के भीतर गया, और अपनी पत्नी से एक परिमित मात्रा में अन्न पकवाया।
श्लोक 39 (skanda.6.156.39)
ततो देवार्चनं कृत्वा वैश्वदेवांत आगतम् ॥ पुष्पमाहूय तत्पादौ प्रक्षाल्य च निवेश्य च
tato devārcanaṁ kṛtvā vaiśvadevāṁta āgatam puṣpamāhūya tatpādau prakṣālya ca niveśya ca
फिर देव-पूजा करके, वैश्वदेव कर्म समाप्त होने पर, उसने पुष्प को बुलाकर, उसके पैर धुलाकर तथा उसे बिठाकर —
श्लोक 40 (skanda.6.156.40)
कृत्वार्चनविधिं तस्य दत्त्वान्नं च सुसंस्कृतम् ॥ उपविश्य ततः पश्चाद्भोजनार्थं ततो द्विजाः। पुष्पोऽपि वीक्षते तस्याः पादौ पंकजसंनिभौ
kṛtvārcanavidhiṁ tasya dattvānnaṁ ca susaṁskṛtam upaviśya tataḥ paścādbhojanārthaṁ tato dvijāḥ puṣpo'pi vīkṣate tasyāḥ pādau paṁkajasaṁnibhau
— उसकी पूजा-विधि करके, उसे सुसंस्कृत अन्न देकर, फिर स्वयं भी भोजन के लिए बैठा; हे द्विजो, तब पुष्प ने उसकी कमल-सदृश दोनों चरणों को देख लिया।
श्लोक 41 (skanda.6.156.41)
यथायथा स कौतुक्याद्वीक्षते यौवनाश्रितः॥ कौतुक्यात्तेन च ततस्तस्या वक्त्रं निरीक्षितम्
yathāyathā sa kautukyādvīkṣate yauvanāśritaḥ kautukyāttena ca tatastasyā vaktraṁ nirīkṣitam
जैसे-जैसे वह युवावस्था के वशीभूत होकर कुतूहलवश देखता गया, वैसे-वैसे कुतूहलवश उसने उसका मुख भी देख लिया।
श्लोक 42 (skanda.6.156.42)
ततश्चाकारयामास मणिभद्रः प्रकोपतः॥ तं षण्ढमुक्तवाञ्जारं त्वमेनं च विडंबय
tataścākārayāmāsa maṇibhadraḥ prakopataḥ taṁ ṣaṇḍhamuktavāñjāraṁ tvamenaṁ ca viḍaṁbaya
तब मणिभद्र ने अत्यन्त क्रोध से उस नपुंसक को बुलवाया, और कहा — "यह जार है, तुम इसे अपमानित करो।"
श्लोक 43 (skanda.6.156.43)
ततस्तेन द्विजश्रेष्ठाः स पुष्पो मूर्ध्नि ताडितः
tatastena dvijaśreṣṭhāḥ sa puṣpo mūrdhni tāḍitaḥ
हे द्विजश्रेष्ठो, तब उसके द्वारा उस पुष्प को सिर पर मारा गया।
श्लोक 44 (skanda.6.156.44)
अधो निपतितं भूमौ रुधिरेण परिप्लुतम् ॥ चरणाभ्यां समाकृष्य दूतो मार्गं समाश्रितः
adho nipatitaṁ bhūmau rudhireṇa pariplutam caraṇābhyāṁ samākṛṣya dūto mārgaṁ samāśritaḥ
वह रक्त से लथपथ होकर भूमि पर गिर पड़ा; तब उस दूत ने उसे दोनों पैरों से घसीटकर सड़क पर डाल दिया।
श्लोक 45 (skanda.6.156.45)
यावच्चतुष्पथं नीतो यत्र संचरते जनः ॥ हाहाकारो महानासीत्तस्मिन्पुरवरे तदा
yāvaccatuṣpathaṁ nīto yatra saṁcarate janaḥ hāhākāro mahānāsīttasminpuravare tadā
उसे चौराहे तक ले जाया गया, जहाँ लोग आते-जाते थे; तब उस श्रेष्ठ नगर में बड़ा हाहाकार मच गया।
श्लोक 46 (skanda.6.156.46)
सर्वेषामेव पौराणां तदवस्थं विलोक्य तम् ॥ ततोऽन्यैः शीततोयेन सोभिषिक्तो दयान्वितैः
sarveṣāmeva paurāṇāṁ tadavasthaṁ vilokya tam tato'nyaiḥ śītatoyena sobhiṣikto dayānvitaiḥ
उसे उस दशा में देखकर सभी नगरवासियों ने, दयायुक्त होकर, उस पर ठंडा जल छिड़का।
श्लोक 47 (skanda.6.156.47)
कृत्वा वायुप्रदानं च गमितश्चेतनां प्रति ॥ स प्राप्य चेतनां कृच्छ्रात्तत्तोयात्तानथाब्रवीत्
kṛtvā vāyupradānaṁ ca gamitaścetanāṁ prati sa prāpya cetanāṁ kṛcchrāttattoyāttānathābravīt
उसे हवा करके होश में लाया गया; बड़ी कठिनाई से चेतना पाकर, उस जल से सचेत होकर उसने उनसे कहा।
श्लोक 48 (skanda.6.156.48)
न मया विहितं चौर्यं परदारा न सेविताः ॥ पश्यध्वं मणिभद्रेण यथाहं क्लेशितो जनाः
na mayā vihitaṁ cauryaṁ paradārā na sevitāḥ paśyadhvaṁ maṇibhadreṇa yathāhaṁ kleśito janāḥ
"मैंने न कोई चोरी की, न किसी पराई स्त्री का सेवन किया; हे लोगो, देखो, मणिभद्र ने मुझे किस प्रकार सताया है।
श्लोक 49 (skanda.6.156.49)
तीर्थयात्रापरो विप्रो ब्रह्मचर्यपरायणः ॥ भोजनार्थं समामन्त्र्य नीतोऽवस्थामिमां ततः
tīrthayātrāparo vipro brahmacaryaparāyaṇaḥ bhojanārthaṁ samāmantrya nīto'vasthāmimāṁ tataḥ
तीर्थयात्रा में रत, ब्रह्मचर्य में तत्पर एक ब्राह्मण को भोजन के लिए बुलाकर उसने मुझे इस दशा में पहुँचा दिया।
श्लोक 50 (skanda.6.156.50)
किं नास्ति वात्र भूपालो येनैतदसमंजसम् ॥ ब्राह्मणस्य विशेषेण निर्दोषस्य महाजनाः
kiṁ nāsti vātra bhūpālo yenaitadasamaṁjasam brāhmaṇasya viśeṣeṇa nirdoṣasya mahājanāḥ
हे महाजनो, क्या यहाँ कोई राजा भी नहीं है, जिसके रहते हुए यह अनुचित कार्य, वह भी विशेष रूप से एक निर्दोष ब्राह्मण के साथ, हो सका?"
श्लोक 51 (skanda.6.156.51)
जना ऊचुः। बहवस्तेन पापेन विप्राः पूर्वं विडंबिताः ॥ राजप्रसादयुक्तेन चेर्ष्यां प्राप्य शरीरिणा
janā ūcuḥ bahavastena pāpena viprāḥ pūrvaṁ viḍaṁbitāḥ rājaprasādayuktena cerṣyāṁ prāpya śarīriṇā
लोगों ने कहा — उस पापी ने, जो राजा की कृपा से सम्पन्न है, ईर्ष्या के वशीभूत होकर पहले भी अनेक ब्राह्मणों को इसी प्रकार अपमानित किया है।
श्लोक 52 (skanda.6.156.52)
कोऽपि राजप्रसादान्न किंचिद्ब्रूतेऽस्य सम्मुखम् ॥ तस्मादुत्तिष्ठ गच्छामो दास्यामस्तेऽशनं वयम्
ko'pi rājaprasādānna kiṁcidbrūte'sya sammukham tasmāduttiṣṭha gacchāmo dāsyāmaste'śanaṁ vayam
राजा की कृपा के कारण कोई भी उसके सामने कुछ नहीं बोलता। इसलिए अब उठो, चलें; हम तुम्हें भोजन देंगे।