नागर खण्ड · अध्याय 157
सूर्य से पुष्प की वर-प्राप्ति
श्लोक 1 (skanda.6.157.1)
सूत उवाच। एवं संबोधितस्तैस्तु लोकैः पुष्पस्तदा द्विजाः ॥ तानब्रवीत्ततः कुद्धो न करिष्यामि भोजनम्
sūta uvāca evaṁ saṁbodhitastaistu lokaiḥ puṣpastadā dvijāḥ tānabravīttataḥ kuddho na kariṣyāmi bhojanam
सूत जी ने कहा — इस प्रकार उन लोगों द्वारा समझाए जाने पर पुष्प क्रोधित होकर उनसे बोला — "मैं भोजन नहीं करूँगा,
श्लोक 2 (skanda.6.157.2)
यावन्न चास्य पापस्य करिष्यामि प्रतिक्रियाम् ॥ तद्वदध्वं महाभागा देवो वा देवताऽथवा
yāvanna cāsya pāpasya kariṣyāmi pratikriyām tadvadadhvaṁ mahābhāgā devo vā devatā'thavā
जब तक इस पापी का प्रतिकार नहीं कर लेता। इसलिए हे महाभागो, मुझे बताओ — क्या यहाँ कोई ऐसा देव या देवता है,
श्लोक 3 (skanda.6.157.3)
तथान्ये सिद्धमन्त्रा वा सद्यः प्रत्ययकारकाः ॥ आराधिता यथा सद्यो मानुषाणां वरप्रदाः
tathānye siddhamantrā vā sadyaḥ pratyayakārakāḥ ārādhitā yathā sadyo mānuṣāṇāṁ varapradāḥ
अथवा कोई अन्य सिद्ध मन्त्र, जो शीघ्र फल देने वाला हो — जिसकी आराधना से मनुष्यों को तत्काल वर मिलता हो, जैसा मैंने सुना है?"
श्लोक 4 (skanda.6.157.4)
जना ऊचुः। एको देवः स्थितश्चात्र सद्यःप्रत्ययकारकः ॥ तथैका देवता चात्र श्रूयते जगती तले
janā ūcuḥ eko devaḥ sthitaścātra sadyaḥpratyayakārakaḥ tathaikā devatā cātra śrūyate jagatī tale
लोगों ने कहा — यहाँ इस पृथ्वीतल पर एक देव और एक देवी प्रसिद्ध हैं जो तत्काल फल देने वाले सुने जाते हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.157.5)
पुष्प उवाच। कोऽसौ देवः कियद्दूरे कस्मिन्स्थाने व्यवस्थितः ॥ तथा च देवता ब्रूत दयां कृत्वा ममोपरि
puṣpa uvāca ko'sau devaḥ kiyaddūre kasminsthāne vyavasthitaḥ tathā ca devatā brūta dayāṁ kṛtvā mamopari
पुष्प ने कहा — "वह देव कौन हैं, कितनी दूर हैं, किस स्थान पर स्थित हैं? तथा वह देवी भी कौन हैं — मुझ पर दया करके बताओ।"
श्लोक 6 (skanda.6.157.6)
जना ऊचुः। चमत्कारपुरे सूर्यो याज्ञवल्क्यप्रतिष्ठितः ॥ अस्ति विप्र श्रुतोऽस्माभिः सद्यः प्रत्ययकारकः
janā ūcuḥ camatkārapure sūryo yājñavalkyapratiṣṭhitaḥ asti vipra śruto'smābhiḥ sadyaḥ pratyayakārakaḥ
लोगों ने कहा — चमत्कारपुर में याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिष्ठित सूर्य हैं, जो हे विप्र, हमने सुना है कि तत्काल फल देने वाले हैं।
श्लोक 7 (skanda.6.157.7)
सूर्यवारेण सप्तम्यां फलहस्तः प्रदक्षिणाम् ॥ यः करोति नरस्तस्य ह्यष्टोत्तरशतं द्विज
sūryavāreṇa saptamyāṁ phalahastaḥ pradakṣiṇām yaḥ karoti narastasya hyaṣṭottaraśataṁ dvija
रविवार को सप्तमी तिथि में जो मनुष्य फल हाथ में लेकर उनकी एक सौ आठ प्रदक्षिणाएँ करता है, हे द्विज —
श्लोक 8 (skanda.6.157.8)
तस्य सिद्धिप्रदः सम्यङ्मनसा वांछितं ददेत् ॥ तथान्या शारदा नाम देवी काश्मीरसंस्थिता
tasya siddhipradaḥ samyaṅmanasā vāṁchitaṁ dadet tathānyā śāradā nāma devī kāśmīrasaṁsthitā
उसे वह सम्यक् रूप से सिद्धि प्रदान करते हैं, मन से जो भी वांछित हो। तथा एक और देवी हैं, शारदा नामक, काश्मीर में स्थित —
श्लोक 9 (skanda.6.157.9)
उपवासकृतेरेव सापि सिद्धिप्रदायिनी ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां जनानां स द्विजोत्तमाः
upavāsakṛtereva sāpi siddhipradāyinī tacchrutvā vacanaṁ teṣāṁ janānāṁ sa dvijottamāḥ
वह भी उपवास करने मात्र से सिद्धि देने वाली हैं। यह उनकी बात सुनकर वह द्विजोत्तम —
श्लोक 10 (skanda.6.157.10)
समुद्दिश्य चमत्कारं तस्मात्स्थानात्ततः परम् ॥ चमत्कारपुरं प्राप्य सप्तम्यां सूर्यवासरे
samuddiśya camatkāraṁ tasmātsthānāttataḥ param camatkārapuraṁ prāpya saptamyāṁ sūryavāsare
चमत्कार (देव) का लक्ष्य बनाकर, उस स्थान से आगे, चमत्कारपुर पहुँचकर, सप्तमी को रविवार के दिन —
श्लोक 11 (skanda.6.157.11)
तत्रागत्य ततः स्नात्वा शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥ गतः संति ष्ठते यत्र याज्ञवल्क्यकृतो रविः
tatrāgatya tataḥ snātvā śucirbhūtvā samāhitaḥ gataḥ saṁti ṣṭhate yatra yājñavalkyakṛto raviḥ
वहाँ पहुँचकर स्नान कर, शुद्ध होकर, एकाग्रचित्त होकर, वहाँ गया जहाँ याज्ञवल्क्य द्वारा स्थापित सूर्य विराजमान थे।
श्लोक 12 (skanda.6.157.12)
ततः प्रदक्षिणाः कृत्वा अष्टोत्तरशतं मिताः ॥ नालिकेराणि चादाय श्रद्धया परयाः युतः
tataḥ pradakṣiṇāḥ kṛtvā aṣṭottaraśataṁ mitāḥ nālikerāṇi cādāya śraddhayā parayāḥ yutaḥ
फिर एक सौ आठ प्रदक्षिणाएँ पूर्ण करके, नारियल लेकर, परम श्रद्धा से युक्त होकर —
श्लोक 13 (skanda.6.157.13)
ततः क्षुत्क्षामकंठः स परिश्रांतस्तदग्रतः ॥ उपविष्टो जपं कुर्वन्सूर्येष्टैः स्तवनैस्तदा
tataḥ kṣutkṣāmakaṁṭhaḥ sa pariśrāṁtastadagrataḥ upaviṣṭo japaṁ kurvansūryeṣṭaiḥ stavanaistadā
भूख से क्षीण कंठ वाला, अत्यन्त थका हुआ, उनके सामने बैठकर सूर्य की स्तुतियों से जप करता रहा।
श्लोक 14 (skanda.6.157.14)
मंडलब्राह्मणाद्यैश्च तारं स्वरमुपाश्रितः ॥ सप्तयुंजर वाद्यैश्च अग्निरेवेति भक्तितः
maṁḍalabrāhmaṇādyaiśca tāraṁ svaramupāśritaḥ saptayuṁjara vādyaiśca agnireveti bhaktitaḥ
मण्डल-ब्राह्मण आदि मन्त्रों से, उच्च स्वर का आश्रय लेकर, सप्त-अश्व-युक्त रथ के देवता 'अग्निरेव' आदि मन्त्रों से भक्तिपूर्वक —
श्लोक 15 (skanda.6.157.15)
आदित्यव्रतसंज्ञाद्यैः सामभिर्दृढभक्तिभाक् ॥ क्षुरिकामंत्रपूर्वैश्च तथैवाथर्वणोद्भवैः
ādityavratasaṁjñādyaiḥ sāmabhirdṛḍhabhaktibhāk kṣurikāmaṁtrapūrvaiśca tathaivātharvaṇodbhavaiḥ
आदित्य-व्रत नामक साम-मन्त्रों से, दृढ़ भक्ति से युक्त होकर, क्षुरिका-मन्त्रों तथा अथर्ववेद से उत्पन्न मन्त्रों से भी —
श्लोक 16 (skanda.6.157.16)
यावदन्योर्कवारस्तु नैव तुष्टो दिवाकरः ॥ पौर्णमासीदिने प्राप्ते वैराग्यं परमं गतः
yāvadanyorkavārastu naiva tuṣṭo divākaraḥ paurṇamāsīdine prāpte vairāgyaṁ paramaṁ gataḥ
— फिर भी अगले रविवार तक सूर्य देव संतुष्ट नहीं हुए; पूर्णिमा का दिन आने पर वह परम वैराग्य को प्राप्त हो गया।
श्लोक 17 (skanda.6.157.17)
ततः पुष्पो विधायाथ स्नानं धौतांबरः शुचिः ॥ भूनाम्ना साध्य भूमिं च स्थंडिलार्थं द्विजोत्तमाः
tataḥ puṣpo vidhāyātha snānaṁ dhautāṁbaraḥ śuciḥ bhūnāmnā sādhya bhūmiṁ ca sthaṁḍilārthaṁ dvijottamāḥ
तब पुष्प ने स्नान कर, धुले वस्त्र पहनकर, शुद्ध होकर, हे द्विजोत्तमो, भूमि को शुद्ध कर स्थण्डिल (वेदी) के लिए —
श्लोक 18 (skanda.6.157.18)
स्थंडिलं हस्तमात्रं च स्थंडिले प्रत्यकल्पयत् ॥ अग्निमीळेतिमंत्रेण ततोऽग्निं स निधाय च
sthaṁḍilaṁ hastamātraṁ ca sthaṁḍile pratyakalpayat agnimīḻetimaṁtreṇa tato'gniṁ sa nidhāya ca
— एक हाथ भर का स्थण्डिल उस स्थण्डिल-भूमि पर बनाया; फिर 'अग्निमीळे' मन्त्र से अग्नि को वहाँ स्थापित कर —
श्लोक 19 (skanda.6.157.19)
तृणैः परिस्तृणामीतिकृत्वोपस्तरणं ततः ॥ आब्रह्मन्निति मन्त्रेण दत्त्वा ब्रह्मासनं ततः
tṛṇaiḥ paristṛṇāmītikṛtvopastaraṇaṁ tataḥ ābrahmanniti mantreṇa dattvā brahmāsanaṁ tataḥ
तृणों से 'परिस्तृणामि' मन्त्र से आस्तरण करके, 'आब्रह्मन्' मन्त्र से ब्रह्मासन देकर —
श्लोक 20 (skanda.6.157.20)
सुत्रामाणमिति प्रोच्य समिधःस्थापनं च यत् ॥ प्रोक्षणीपात्रमासाद्य प्रोक्षणं कृतवांस्ततः
sutrāmāṇamiti procya samidhaḥsthāpanaṁ ca yat prokṣaṇīpātramāsādya prokṣaṇaṁ kṛtavāṁstataḥ
'सुत्रामाणम्' कहकर समिधाओं का स्थापन करके, प्रोक्षणी पात्र लेकर प्रोक्षण किया —
श्लोक 21 (skanda.6.157.21)
पात्राणामथ सर्वेषां स्रुवादीनां यथाक्रमम् ॥ ततः प्रकल्पयामास हविःस्थाने निजां तनुम्
pātrāṇāmatha sarveṣāṁ sruvādīnāṁ yathākramam tataḥ prakalpayāmāsa haviḥsthāne nijāṁ tanum
फिर स्रुव आदि समस्त पात्रों को क्रमशः तैयार कर, हवि के स्थान पर अपने शरीर को नियोजित किया।
श्लोक 22 (skanda.6.157.22)
न्यायं तु देवतास्थाने स आचार्यविधानतः ॥ ग्रहणं प्रोक्षणं चैव सूर्याय त्वेति चोत्तरम्
nyāyaṁ tu devatāsthāne sa ācāryavidhānataḥ grahaṇaṁ prokṣaṇaṁ caiva sūryāya tveti cottaram
आचार्य की विधि के अनुसार देवता-स्थान में ग्रहण और प्रोक्षण करके, 'सूर्याय त्वा' इस उत्तर मन्त्र के साथ —
श्लोक 23 (skanda.6.157.23)
अयं त इध्म आत्मेति जप्त्वाथ समिधं ततः ॥ अग्निसोमेति मन्त्राभ्यां हुत्वा चाज्याहुती ततः
ayaṁ ta idhma ātmeti japtvātha samidhaṁ tataḥ agnisometi mantrābhyāṁ hutvā cājyāhutī tataḥ
'अयं त इध्म आत्मा' कहकर समिधा का जप कर, फिर 'अग्निसोम' मन्त्र से आज्य की दो आहुतियाँ देकर —
श्लोक 24 (skanda.6.157.24)
कृत्वा व्याहृतिहोमं तु भूर्भुवः स्वेति भो द्विजाः ॥ ये ते शतेति मन्त्राद्यैर्हुत्वात्रैव च दारुणम्
kṛtvā vyāhṛtihomaṁ tu bhūrbhuvaḥ sveti bho dvijāḥ ye te śateti mantrādyairhutvātraiva ca dāruṇam
'भूर्भुवः स्वः' कहकर व्याहृति-होम करके, हे द्विजो, 'ये ते शतम्' आदि मन्त्रों से वहीं भयंकर आहुति देकर —
श्लोक 25 (skanda.6.157.25)
आह्वयामास वह्निं च प्रत्यक्षो भव देव मे ॥ एवं मन्त्रेण कृत्वा तं संमुखं ज्वलनं ततः
āhvayāmāsa vahniṁ ca pratyakṣo bhava deva me evaṁ mantreṇa kṛtvā taṁ saṁmukhaṁ jvalanaṁ tataḥ
अग्नि का आवाहन करके, "हे देव, मेरे सामने प्रत्यक्ष हों" — इस मन्त्र से, उस प्रज्वलित अग्नि को अपने सम्मुख करके —
श्लोक 26 (skanda.6.157.26)
कालीकरालिकाद्याश्च सप्तजिह्वाश्च याः स्मृताः ॥ तासामाह्वानकं कृत्वा ततो दीप्ते हविर्भुजि
kālīkarālikādyāśca saptajihvāśca yāḥ smṛtāḥ tāsāmāhvānakaṁ kṛtvā tato dīpte havirbhuji
काली, करालिका आदि जो सप्त जिह्वाएँ स्मृत हैं, उनका आवाहन करके, फिर उस प्रदीप्त हविर्भोक्ता अग्नि में —
श्लोक 27 (skanda.6.157.27)
जुहाव च स मांसानि स्वानि चोत्कृत्त्य शस्त्रतः ॥ लोमभ्यः स्वाहेति विदिशो दिग्भ्यो दत्त्वा ततः परम्
juhāva ca sa māṁsāni svāni cotkṛttya śastrataḥ lomabhyaḥ svāheti vidiśo digbhyo dattvā tataḥ param
अपने ही शस्त्र से काटकर अपना मांस उसमें होम किया; 'लोमभ्यः स्वाहा' कहकर विदिशाओं और दिशाओं को भी अर्पित करके —
श्लोक 28 (skanda.6.157.28)
अग्नये स्विष्टकृतइति यावदात्मानमाक्षिपेत् ॥ तावद्धृतः स सूर्येण स्वहस्तेन समंततः
agnaye sviṣṭakṛtaiti yāvadātmānamākṣipet tāvaddhṛtaḥ sa sūryeṇa svahastena samaṁtataḥ
'अग्नये स्विष्टकृते' कहकर, जब तक वह अपने ही शरीर को अग्नि में झोंकने ही वाला था, तभी सूर्य ने उसे अपने ही हाथ से सब ओर से थाम लिया।
श्लोक 29 (skanda.6.157.29)
धृतश्च सादरं तेन मा विप्र कुरु साहसम् ॥ नेदृग्घोमः कृतः क्वापि कदाचित्केनचिद्द्विज
dhṛtaśca sādaraṁ tena mā vipra kuru sāhasam nedṛgghomaḥ kṛtaḥ kvāpi kadācitkenaciddvija
आदरपूर्वक उसे थामकर बोले — "हे विप्र, ऐसा साहस मत करो; ऐसा होम कहीं भी, किसी के द्वारा, कभी नहीं किया गया।
श्लोक 30 (skanda.6.157.30)
तुष्टोऽहं च महाभाग ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ अदेयमपि दास्यामि यत्ते मनसिवर्तते
tuṣṭo'haṁ ca mahābhāga brūhi kiṁ karavāṇi te adeyamapi dāsyāmi yatte manasivartate
हे महाभाग, मैं तुमसे संतुष्ट हूँ; बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? जो तुम्हारे मन में हो, वह भी दुर्लभ हो तो भी दूँगा।"
श्लोक 31 (skanda.6.157.31)
पुष्प उवाच। यदि तुष्टोसि देवेश यदि देयो वरो मम ॥ तद्देयं गुटिकायुग्मं यदर्थं प्रार्थयाम्यहम्
puṣpa uvāca yadi tuṣṭosi deveśa yadi deyo varo mama taddeyaṁ guṭikāyugmaṁ yadarthaṁ prārthayāmyaham
पुष्प ने कहा — "हे देवेश, यदि आप संतुष्ट हैं, यदि मुझे वर देना चाहते हैं, तो जिस प्रयोजन से मैं प्रार्थना कर रहा हूँ वह वर मुझे दीजिए —
श्लोक 32 (skanda.6.157.32)
वैदिशे नगरे चास्ति मणिभद्रो महाधनी ॥ कुब्जांगः क्षत्रियो देव जरावलिसमन्वितः
vaidiśe nagare cāsti maṇibhadro mahādhanī kubjāṁgaḥ kṣatriyo deva jarāvalisamanvitaḥ
वैदिश नगर में मणिभद्र नाम का एक अत्यन्त धनी क्षत्रिय है, हे देव, वह कुबड़े शरीर वाला और बुढ़ापे से युक्त है,
श्लोक 33 (skanda.6.157.33)
अब्रह्मण्यो महानीचः कीनाशो जनदूषितः ॥ द्वयोरेकां यदा वक्त्रे सदा चैव करोम्यहम्
abrahmaṇyo mahānīcaḥ kīnāśo janadūṣitaḥ dvayorekāṁ yadā vaktre sadā caiva karomyaham
ब्राह्मणों का विरोधी, अत्यन्त नीच, कंजूस, और लोगों द्वारा दूषित माना जाता है। इन दो में से जब भी मैं एक को मुख पर लगाऊँ —
श्लोक 34 (skanda.6.157.34)
तदा मे तादृशं रूपमविकल्पं भवत्विति ॥ यदा पुनर्गृहीत्वा तां द्वितीयां प्रक्षिपाम्यहम्
tadā me tādṛśaṁ rūpamavikalpaṁ bhavatviti yadā punargṛhītvā tāṁ dvitīyāṁ prakṣipāmyaham
तब मुझे उसी का रूप बिना किसी भेद के प्राप्त हो जाए, और जब मैं दूसरी को लेकर उसे फेंक दूँ —
श्लोक 35 (skanda.6.157.35)
ततश्च सहजं रूपं मम भूयात्सुरेश्वर ॥ वैदिशे नगरे चास्ति मणिभद्रः सुरेश्वर
tataśca sahajaṁ rūpaṁ mama bhūyātsureśvara vaidiśe nagare cāsti maṇibhadraḥ sureśvara
तब मुझे मेरा अपना ही स्वरूप पुनः प्राप्त हो जाए, हे सुरेश्वर। वैदिश नगर में मणिभद्र नामक सुरेश्वर हैं —
श्लोक 36 (skanda.6.157.36)
अपरं तस्य यत्किंचिद्धनधान्यादिकं गृहे ॥ तत्सर्वं विदितं मे स्यात्तथा देव प्रजायताम्
aparaṁ tasya yatkiṁciddhanadhānyādikaṁ gṛhe tatsarvaṁ viditaṁ me syāttathā deva prajāyatām
उसके घर में जो भी धन-धान्य आदि हो, वह सब मुझे ज्ञात हो जाए, हे देव — यह भी कर दीजिए।
श्लोक 37 (skanda.6.157.37)
किं वानेन बहूक्तेन तस्य मित्राणि बांधवाः ॥ व्यवहारास्तथा सर्वे प्रकटाः स्युः सदैव हि
kiṁ vānena bahūktena tasya mitrāṇi bāṁdhavāḥ vyavahārāstathā sarve prakaṭāḥ syuḥ sadaiva hi
इस बहुत कहने से क्या लाभ — उसके मित्र, बन्धु, तथा उसके समस्त व्यवहार भी सदा मुझ पर स्पष्ट रूप से प्रकट हों —
श्लोक 38 (skanda.6.157.38)
न कश्चिज्जायते तत्र विकल्पः कस्यचित्क्वचित् ॥ मम तस्याधम स्यापि सर्वकृत्येषु सर्वदा
na kaścijjāyate tatra vikalpaḥ kasyacitkvacit mama tasyādhama syāpi sarvakṛtyeṣu sarvadā
जिससे उसके और मेरे बीच सब कार्यों में सदा कहीं भी किसी को कोई भेद प्रतीत न हो।"
श्लोक 39 (skanda.6.157.39)
भास्कर उवाच। गृहाण त्वं महाभाग गुटिकाद्वितयं शुभम् ॥ शुक्लं कृष्णं च वक्त्रस्थं विभेद जननं महत्
bhāskara uvāca gṛhāṇa tvaṁ mahābhāga guṭikādvitayaṁ śubham śuklaṁ kṛṣṇaṁ ca vaktrasthaṁ vibheda jananaṁ mahat
सूर्य ने कहा — "हे महाभाग, इन दो शुभ गुटिकाओं को ग्रहण करो — एक श्वेत और एक कृष्ण — जो मुख पर रखने से महान भेद उत्पन्न करती हैं।
श्लोक 40 (skanda.6.157.40)
शुक्लया तस्य रूपं च तव नूनं भविष्यति ॥ कृष्णयापि पुनः स्वं च संप्राप्स्यसि महाद्विज
śuklayā tasya rūpaṁ ca tava nūnaṁ bhaviṣyati kṛṣṇayāpi punaḥ svaṁ ca saṁprāpsyasi mahādvija
श्वेत गुटिका से तुम्हें उसका रूप निश्चय ही प्राप्त होगा, और हे महाद्विज, कृष्ण गुटिका से तुम फिर अपना ही रूप प्राप्त कर लोगे।"
श्लोक 41 (skanda.6.157.41)
पुष्प उवाच। अपरं वद मे देव संदेहं हृदये स्थितम् ॥ यत्त्वां पृच्छामि देवेश तव कीर्तिविवर्धनम्
puṣpa uvāca aparaṁ vada me deva saṁdehaṁ hṛdaye sthitam yattvāṁ pṛcchāmi deveśa tava kīrtivivardhanam
पुष्प ने कहा — "हे देव, मेरे हृदय में स्थित एक और संशय भी बताइए, जो मैं आपसे पूछ रहा हूँ, हे देवेश, जो आपकी कीर्ति को ही बढ़ाने वाला है —
श्लोक 42 (skanda.6.157.42)
मया श्रुतं सुरश्रेष्ठ सप्तम्यां सूर्यवासरे ॥ यस्ते प्रदक्षिणानां च कुर्यादष्टोत्तरं शतम् ॥ तस्य त्वं तत्क्षणादेव फलहस्तस्य सिद्धिदः
mayā śrutaṁ suraśreṣṭha saptamyāṁ sūryavāsare yaste pradakṣiṇānāṁ ca kuryādaṣṭottaraṁ śatam tasya tvaṁ tatkṣaṇādeva phalahastasya siddhidaḥ
मैंने सुना है, हे सुरश्रेष्ठ, कि रविवार को सप्तमी के दिन जो आपकी एक सौ आठ प्रदक्षिणाएँ करता है, उसे आप उसी क्षण फल-हस्त सिद्धि देने वाले हैं —
श्लोक 43 (skanda.6.157.43)
मूर्खस्यापि च पापस्य सर्वदोषान्वितस्य च ॥ चतुर्वेदस्य मे कस्मात्तीर्थयात्रापरस्य च
mūrkhasyāpi ca pāpasya sarvadoṣānvitasya ca caturvedasya me kasmāttīrthayātrāparasya ca
तो मुझ जैसे मूर्ख, पापी, समस्त दोषों से युक्त, किन्तु चारों वेदों के ज्ञाता और तीर्थयात्रा में रत व्यक्ति के लिए, आपको —
श्लोक 44 (skanda.6.157.44)
सप्तरात्रे गते तुष्टो होम एवंविधे कृते
saptarātre gate tuṣṭo homa evaṁvidhe kṛte
सात रातें बीत जाने पर ही, इतना विधिपूर्ण होम करने पर ही, संतुष्ट होना पड़ा?"
श्लोक 45 (skanda.6.157.45)
श्रीसूर्य उवाच। तामसेन तु भावेन त्ववा सर्वमिदं कृतम्॥ तेन सर्वं वृथा जातं त्वया सर्वं च यत्कृतम्
śrīsūrya uvāca tāmasena tu bhāvena tvavā sarvamidaṁ kṛtam tena sarvaṁ vṛthā jātaṁ tvayā sarvaṁ ca yatkṛtam
श्रीसूर्य ने कहा — "तामसिक भाव से ही तुमने यह सब किया था; इसीलिए तुम्हारे द्वारा किया गया वह सब व्यर्थ हो गया।
श्लोक 46 (skanda.6.157.46)
यत्किंचित्क्रियते विप्र तामसं भावमाश्रितैः ॥ तत्सर्वं जायते व्यर्थं किं न वेत्ति भवा निदम्
yatkiṁcitkriyate vipra tāmasaṁ bhāvamāśritaiḥ tatsarvaṁ jāyate vyarthaṁ kiṁ na vetti bhavā nidam
हे विप्र, तामसिक भाव का आश्रय लेकर जो कुछ भी किया जाता है, वह सब व्यर्थ हो जाता है — क्या तुम यह नहीं जानते?
श्लोक 47 (skanda.6.157.47)
एवमुक्त्वा ततः सूर्यस्तस्य गात्राण्युपास्पृशत् ॥ खंडितानि स्वहस्तेन निर्व्रणानि कृतानि च
evamuktvā tataḥ sūryastasya gātrāṇyupāspṛśat khaṁḍitāni svahastena nirvraṇāni kṛtāni ca
ऐसा कहकर सूर्य ने उसके अंगों को अपने ही हाथ से छू दिया, जिससे वे कटे हुए अंग फिर से बिना घाव के हो गए।
श्लोक 48 (skanda.6.157.48)
अब्रवीच्च पुनः पुष्पं प्रसन्न वदनः स्थितः ॥ अनेनैव विधानेन यः करोति कुशंडिकाम्
abravīcca punaḥ puṣpaṁ prasanna vadanaḥ sthitaḥ anenaiva vidhānena yaḥ karoti kuśaṁḍikām
फिर उन्होंने प्रसन्न मुख होकर पुष्प से फिर कहा — "जो भी इसी विधि से कुशाण्डिका (होम-विधि) करता है —
श्लोक 49 (skanda.6.157.49)
सोम्यभावं समाश्रित्य समिद्भिश्चार्कसंभवैः ॥ तिलाक्षतैर्विशेषेण होमं यस्तु समाचरेत्
somyabhāvaṁ samāśritya samidbhiścārkasaṁbhavaiḥ tilākṣatairviśeṣeṇa homaṁ yastu samācaret
— सौम्य भाव का आश्रय लेकर, सूर्य से उत्पन्न समिधाओं से, विशेष रूप से तिल और अक्षतों से जो होम करता है —
श्लोक 50 (skanda.6.157.50)
छन्दऋषिसमोपेतमेकं यावत्सहस्रकम् ॥ तस्य दास्याम्यहं हृत्स्थमधिकेभ्योऽधिकं फलम्
chandaṛṣisamopetamekaṁ yāvatsahasrakam tasya dāsyāmyahaṁ hṛtsthamadhikebhyo'dhikaṁ phalam
— छन्द और ऋषि सहित एक हज़ार तक, उसे मैं हृदय में स्थित फल से भी अधिक फल दूँगा।"
श्लोक 51 (skanda.6.157.51)
एवमुक्त्वा सहस्रांशुस्तत्रैवां तरधीयत ॥ दीपवल्लक्षितो नैव केन मार्गेण निर्गतः
evamuktvā sahasrāṁśustatraivāṁ taradhīyata dīpavallakṣito naiva kena mārgeṇa nirgataḥ
ऐसा कहकर सहस्रांशु (सूर्य) वहीं अन्तर्धान हो गए; दीपक की लौ के समान भी वे किस मार्ग से गए, यह किसी ने नहीं जाना।