नागर खण्ड · अध्याय 158
मणिभद्र का निधन
श्लोक 1 (skanda.6.158.1)
सूत उवाच। पुष्पोऽपि गुटिके लब्ध्वा भास्कराद्वारितस्करात् ॥ चिराद्भोजनमासाद्य प्रस्थितो वैदिशं प्रति
sūta uvāca puṣpo'pi guṭike labdhvā bhāskarādvāritaskarāt cirādbhojanamāsādya prasthito vaidiśaṁ prati
सूत जी ने कहा — भास्कर से चोरों को रोकने वाली वे गुटिकाएँ पाकर पुष्प ने, बड़ी देर बाद भोजन प्राप्त कर, वैदिश की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 2 (skanda.6.158.2)
ततो वैदिशमासाद्य स पुष्पो हृष्टमानसः ॥ शुक्ला तां गुटिकां वक्त्रे चकारद्विजसत्तमाः
tato vaidiśamāsādya sa puṣpo hṛṣṭamānasaḥ śuklā tāṁ guṭikāṁ vaktre cakāradvijasattamāḥ
फिर वैदिश पहुँचकर वह हर्षित मन वाला पुष्प — हे द्विजसत्तमो, उस श्वेत गुटिका को अपने मुख पर लगा लिया।
श्लोक 3 (skanda.6.158.3)
मणिभद्रसमो जातस्तत्क्षणादेव स द्विजः ॥ हट्टमार्गं गते सोऽथ तस्मिन्गत्वाऽथ मंदिरे ॥ प्रविष्टः सहसा मध्ये प्रहृष्टेनांतरात्मना
maṇibhadrasamo jātastatkṣaṇādeva sa dvijaḥ haṭṭamārgaṁ gate so'tha tasmingatvā'tha maṁdire praviṣṭaḥ sahasā madhye prahṛṣṭenāṁtarātmanā
उसी क्षण वह ब्राह्मण मणिभद्र के समान हो गया; बाज़ार के मार्ग से जाकर, फिर उस मन्दिर में पहुँचकर, वह प्रसन्न अन्तःकरण के साथ अचानक बीच में प्रवेश कर गया।
श्लोक 4 (skanda.6.158.4)
ततश्चाकारयामास तं षंढं द्वारमाश्रितम् ॥ तस्य दत्त्वाथ वस्त्राणि पश्चात्षंढमुवाच सः
tataścākārayāmāsa taṁ ṣaṁḍhaṁ dvāramāśritam tasya dattvātha vastrāṇi paścātṣaṁḍhamuvāca saḥ
फिर उसने द्वार पर खड़े उस नपुंसक को बुलवाया, उसे वस्त्र देकर, तत्पश्चात् उस नपुंसक से कहा —
श्लोक 5 (skanda.6.158.5)
षंढकश्चित्पुमानत्र सम्यग्वेषकरो हि सः ॥ मम वेषं समाधाय भ्रमते सकले पुरे
ṣaṁḍhakaścitpumānatra samyagveṣakaro hi saḥ mama veṣaṁ samādhāya bhramate sakale pure
"यहाँ कोई एक नपुंसक है, जो अच्छा वेष बनाने वाला है; वह मेरा ही वेष धारण कर सारे नगर में घूमता रहता है।
श्लोक 6 (skanda.6.158.6)
सांप्रतं मद्गृहे सोऽथ लोभनायागमिष्यति ॥ स च कृत्रिम वेषेण निषेद्धव्यस्त्वया हि सः ॥ स तथेति प्रतिज्ञाय द्वारदेशं समाश्रितः
sāṁprataṁ madgṛhe so'tha lobhanāyāgamiṣyati sa ca kṛtrima veṣeṇa niṣeddhavyastvayā hi saḥ sa tatheti pratijñāya dvāradeśaṁ samāśritaḥ
अभी वह लोभवश मेरे ही घर आएगा; उस कृत्रिम वेष धारण किए हुए को तुम्हारे द्वारा रोका जाना चाहिए।" "ऐसा ही होगा" कहकर प्रतिज्ञा करके वह नपुंसक द्वार-प्रदेश में स्थित हो गया।
श्लोक 7 (skanda.6.158.7)
पुष्पोऽपि चाब्रवीद्भार्यां माहिकाख्यां ततः परम् ॥ माहिकेद्य मया दृष्टः स्वतातः स्वपुरः स्थितः
puṣpo'pi cābravīdbhāryāṁ māhikākhyāṁ tataḥ param māhikedya mayā dṛṣṭaḥ svatātaḥ svapuraḥ sthitaḥ
पुष्प ने भी फिर अपनी पत्नी माहिका से कहा — "हे माहिके, आज मैंने अपने ही नगर में खड़े तुम्हारे पिता को देखा —
श्लोक 8 (skanda.6.158.8)
वीरभद्रः सुदुःखार्तो मलिनांबरसंवृतः ॥ अब्रवीच्च ततः कोपान्मामेवं परुषाक्षरम्
vīrabhadraḥ suduḥkhārto malināṁbarasaṁvṛtaḥ abravīcca tataḥ kopānmāmevaṁ paruṣākṣaram
वीरभद्र, मलिन वस्त्रों से आच्छादित, अत्यन्त दुःखी होकर, क्रोधपूर्वक मुझसे इस प्रकार कठोर वचन बोले —
श्लोक 9 (skanda.6.158.9)
धिग्धिक्पाप त्वया कन्यातीव रूपवती सदा ॥ वंचयित्वा जनेतारमुदूढा सा सुमध्यमा
dhigdhikpāpa tvayā kanyātīva rūpavatī sadā vaṁcayitvā janetāramudūḍhā sā sumadhyamā
'हे पापी, तुझे धिक्कार है, धिक्कार है — तूने उस अत्यन्त रूपवती, सुमध्यमा कन्या को उसके जनक को धोखा देकर ब्याह लिया,
श्लोक 10 (skanda.6.158.10)
न दत्तं तत्पितुः किंचिन्न तस्या अथ पुत्रक ॥ विधवां यादृशीं तां च श्वेतांबरधरां सदा
na dattaṁ tatpituḥ kiṁcinna tasyā atha putraka vidhavāṁ yādṛśīṁ tāṁ ca śvetāṁbaradharāṁ sadā
किन्तु हे पुत्र, न तो उसके पिता को कुछ दिया, न ही उसे कुछ दिया; और विधवा के समान उसे सदा श्वेत वस्त्र पहनाए रखा है।
श्लोक 11 (skanda.6.158.11)
संधारयसि पापात्मन्नेष्टं भोज्यं प्रयच्छसि ॥ तस्मात्तस्याः पितुर्देहि त्वं सुवर्णायुतं ध्रुवम्
saṁdhārayasi pāpātmanneṣṭaṁ bhojyaṁ prayacchasi tasmāttasyāḥ piturdehi tvaṁ suvarṇāyutaṁ dhruvam
हे पापात्मन्, तू न तो उसका भरण-पोषण करता है, न ही उसे मनचाहा भोजन देता है। इसलिए तू उसके पिता को निश्चय ही दस हज़ार स्वर्ण-मुद्राएँ दे,
श्लोक 12 (skanda.6.158.12)
भूषणं वांछितं तस्या यत्तद्वै रुचिपूर्वकम् ॥ येन संधारयेद्भार्या साऽऽनंदं परमं गता
bhūṣaṇaṁ vāṁchitaṁ tasyā yattadvai rucipūrvakam yena saṁdhārayedbhāryā sā''naṁdaṁ paramaṁ gatā
तथा जो भी आभूषण उसे रुचिकर हो, वह भी उसे प्रसन्नतापूर्वक दे, जिससे तेरी पत्नी उन्हें धारण कर परम आनन्द को प्राप्त हो।
श्लोक 13 (skanda.6.158.13)
निरानंदा यतो नारी न गर्भं धारयेत्स्फुटम् ॥ निःसंतानो यतो वंशः स्वर्गादपि क्षितिं व्रजेत्
nirānaṁdā yato nārī na garbhaṁ dhārayetsphuṭam niḥsaṁtāno yato vaṁśaḥ svargādapi kṣitiṁ vrajet
क्योंकि जो नारी आनन्दहीन रहती है, वह स्पष्ट रूप से गर्भ धारण नहीं कर पाती; और सन्तानहीन कुल तो स्वर्ग से भी भूमि पर गिर जाता है।
श्लोक 14 (skanda.6.158.14)
स पतिष्यत्यसंदिग्धं कुलांगारेण च त्वया ॥ सा त्वमानय वस्त्राणि गृहमध्याच्छुभानि च
sa patiṣyatyasaṁdigdhaṁ kulāṁgāreṇa ca tvayā sā tvamānaya vastrāṇi gṛhamadhyācchubhāni ca
वह कुल, हे कुल के कलंक, तेरे ही द्वारा निश्चय ही नष्ट हो जाएगा; इसलिए तू घर से वे शुभ वस्त्र ले आ —
श्लोक 15 (skanda.6.158.15)
यानि दत्तानि भूपेन व्यवहारैस्तदा मम ॥ पञ्चांगश्च प्रसादो यो मया प्राप्तश्च तैः सह
yāni dattāni bhūpena vyavahāraistadā mama pañcāṁgaśca prasādo yo mayā prāptaśca taiḥ saha
जो राजा द्वारा उस समय मेरे व्यवहारों के फलस्वरूप मुझे दिए गए थे, तथा उनके साथ ही जो पंचांग-प्रसाद भी मुझे प्राप्त हुआ था —
श्लोक 16 (skanda.6.158.16)
त्वं संधारय गात्रैः स्वैः शीघ्रं रसवतीं कुरु ॥ भोजनायैव शीघ्रं तु त्वया सार्धं करोम्यहम्
tvaṁ saṁdhāraya gātraiḥ svaiḥ śīghraṁ rasavatīṁ kuru bhojanāyaiva śīghraṁ tu tvayā sārdhaṁ karomyaham
— उन्हें तू अपने ही शरीर पर धारण कर, और शीघ्र रसोई बना; मैं शीघ्र ही तेरे साथ मिलकर भोजन करूँगा,
श्लोक 17 (skanda.6.158.17)
एकस्मिन्नपि पात्रे च तदादेशादसंशयम् ॥ सापि सर्वं तथा चक्रे यदुक्तं तेन हर्षिता
ekasminnapi pātre ca tadādeśādasaṁśayam sāpi sarvaṁ tathā cakre yaduktaṁ tena harṣitā
एक ही पात्र में भी।' उसकी इस आज्ञा के अनुसार निःसंदेह, वह भी हर्षित होकर, जो कुछ उसने कहा था, वह सब वैसा ही कर बैठी।
श्लोक 18 (skanda.6.158.18)
भोजनाच्छादनं चैव निर्विकल्पेन चेतसा ॥ ततः कामातुरः पुष्पो मैथुनायोपचक्रमे
bhojanācchādanaṁ caiva nirvikalpena cetasā tataḥ kāmāturaḥ puṣpo maithunāyopacakrame
इस प्रकार भोजन और वस्त्र देकर, निःशंक चित्त से, तब कामातुर हुआ पुष्प मैथुन के लिए उद्यत हो गया।
श्लोक 19 (skanda.6.158.19)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो मणिभद्रः समुत्सुकः ॥ क्षुत्क्षामः स पिपासार्तो व्यवहारोत्थलिप्सया
etasminnaṁtare prāpto maṇibhadraḥ samutsukaḥ kṣutkṣāmaḥ sa pipāsārto vyavahārotthalipsayā
इसी बीच वह उत्सुक मणिभद्र, भूख और प्यास से व्याकुल होकर, अपने व्यवहार से प्राप्त होने वाले धन की चाह से वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 20 (skanda.6.158.20)
प्रवेशं कुरुते यावद्गृहमध्ये समुत्सुकः ॥ निषिद्धस्तेन षण्ढेन भर्त्सयित्वा मुहुर्मुहुः
praveśaṁ kurute yāvadgṛhamadhye samutsukaḥ niṣiddhastena ṣaṇḍhena bhartsayitvā muhurmuhuḥ
वह उत्सुक होकर जैसे ही घर के भीतर प्रवेश करने लगा, उस नपुंसक ने उसे बार-बार डाँटकर रोक दिया।
श्लोक 21 (skanda.6.158.21)
हठाद्यावत्प्रवेशं स चकार निजमंदिरे ॥ तावच्च दण्डकाष्ठेन मस्तके तेन ताडितः
haṭhādyāvatpraveśaṁ sa cakāra nijamaṁdire tāvacca daṇḍakāṣṭhena mastake tena tāḍitaḥ
जब उसने हठपूर्वक अपने ही घर में प्रवेश किया, तब उसने दण्ड-काष्ठ से उसके सिर पर प्रहार किया।
श्लोक 22 (skanda.6.158.22)
अथ संपतितो भूमौ मूर्छया संपरिप्लुतः ॥ कर्तव्यं नैव जानाति तत्प्रहारप्रपीडितः
atha saṁpatito bhūmau mūrchayā saṁpariplutaḥ kartavyaṁ naiva jānāti tatprahāraprapīḍitaḥ
तब वह मूर्च्छा से घिरकर भूमि पर गिर पड़ा, और उस प्रहार से पीड़ित होकर उसे यह भी पता न रहा कि क्या करे।
श्लोक 23 (skanda.6.158.23)
ततः कोलाहलो जातस्तस्य द्वारे गृहस्य च ॥ जनस्य संप्रयातस्य हाहाकारपरस्य च
tataḥ kolāhalo jātastasya dvāre gṛhasya ca janasya saṁprayātasya hāhākāraparasya ca
तब उसके घर के द्वार पर, तथा वहाँ आए हुए, हाहाकार करते हुए लोगों का बड़ा कोलाहल मच गया।
श्लोक 24 (skanda.6.158.24)
पप्रच्छुस्तं जनाः केचि द्धिक्पाप किमिदं कृतम् ॥ वृत्तिभंगः कृतोऽनेन अथ त्वं व्यंतरार्दितः
papracchustaṁ janāḥ keci ddhikpāpa kimidaṁ kṛtam vṛttibhaṁgaḥ kṛto'nena atha tvaṁ vyaṁtarārditaḥ
कुछ लोगों ने उससे पूछा — "हे पापी, धिक्कार है, यह तूने क्या किया? क्या इसने तेरी वृत्ति ही भंग कर दी, या तू किसी व्यन्तर से पीड़ित है,
श्लोक 25 (skanda.6.158.25)
इमामवस्थां यन्नीतः संप्राप्तोऽसि नृपाद्वधम्
imāmavasthāṁ yannītaḥ saṁprāpto'si nṛpādvadham
— कि तू इस दशा को पहुँचा, या तूने राजा से वध का दण्ड पा लिया?"
श्लोक 26 (skanda.6.158.26)
षंढ उवाच। न वृत्तिर्गर्हिता तेन नाहं व्यंतरपीडितः ॥ मणिभद्रो न चैष स्यादेष वेषकरः पुमान्
ṣaṁḍha uvāca na vṛttirgarhitā tena nāhaṁ vyaṁtarapīḍitaḥ maṇibhadro na caiṣa syādeṣa veṣakaraḥ pumān
नपुंसक ने कहा — "न मेरी वृत्ति निन्दित है, न मैं किसी व्यन्तर से पीड़ित हूँ; यह भी मणिभद्र नहीं है, यह तो वेष बनाने वाला कोई पुरुष है —
श्लोक 27 (skanda.6.158.27)
माणिभद्रं वपुः कृत्वा संप्राप्तो याचितुं धनम् ॥ हठात्प्रविश्यमानस्तु स मया मूर्ध्नि ताडितः
māṇibhadraṁ vapuḥ kṛtvā saṁprāpto yācituṁ dhanam haṭhātpraviśyamānastu sa mayā mūrdhni tāḍitaḥ
— मणिभद्र का रूप धारण कर, धन माँगने के लिए आया; हठपूर्वक प्रवेश करते हुए मैंने उसके सिर पर प्रहार किया।
श्लोक 28 (skanda.6.158.28)
मणिभद्रो गृहस्यांतर्भुक्त्वा शयनमाश्रितः ॥ संतिष्ठते न जानाति वृत्तांतमिदमा स्थितम्
maṇibhadro gṛhasyāṁtarbhuktvā śayanamāśritaḥ saṁtiṣṭhate na jānāti vṛttāṁtamidamā sthitam
मणिभद्र तो घर के भीतर, भोजन कर, शयन में लीन हैं — इस पूरी घटना का उन्हें कुछ भी पता नहीं है।"
श्लोक 29 (skanda.6.158.29)
ततः पुष्पोऽपि तच्छ्रुत्वा तं च कोलाहलं बहिः ॥ मणिभद्रस्य रूपेण द्वारदेशं समागतः
tataḥ puṣpo'pi tacchrutvā taṁ ca kolāhalaṁ bahiḥ maṇibhadrasya rūpeṇa dvāradeśaṁ samāgataḥ
इसके बाद पुष्प ने भी यह सुनकर, तथा बाहर हुए इस कोलाहल को सुनकर, मणिभद्र के ही रूप में द्वार-प्रदेश में आ गया।
श्लोक 30 (skanda.6.158.30)
अब्रवीन्नित्यमभ्येति मम रूपेण चाधमः ॥ एष वेषधरः कश्चिद्याचितुं धनमेव हि
abravīnnityamabhyeti mama rūpeṇa cādhamaḥ eṣa veṣadharaḥ kaścidyācituṁ dhanameva hi
उसने कहा — "यह अधम मेरे ही रूप में हमेशा यहाँ आता रहता है; धन माँगने के लिए यह कोई वेषधारी है —
श्लोक 31 (skanda.6.158.31)
एतेनापि च षंढेन न च भद्रमनुष्ठितम् ॥ यत्कुब्जोऽयं हतो मूर्ध्नि याचितुं समु पस्थितः
etenāpi ca ṣaṁḍhena na ca bhadramanuṣṭhitam yatkubjo'yaṁ hato mūrdhni yācituṁ samu pasthitaḥ
तथा इस नपुंसक ने भी कोई भला काम नहीं किया, कि यह कुबड़ा भी सिर पर मारा गया, जबकि वह याचना करने के लिए ही आया था।"
श्लोक 32 (skanda.6.158.32)
एतस्मिन्नन्तरे सोऽपि चेतनां प्राप्य कृत्स्नशः ॥ वीक्षते पुरतो यावत्तावदात्मसमः पुमान्
etasminnantare so'pi cetanāṁ prāpya kṛtsnaśaḥ vīkṣate purato yāvattāvadātmasamaḥ pumān
इसी बीच वह भी होश में आकर पूरी तरह चेतना पाकर, सामने जितनी दूर तक देख सकता था, उतनी दूर तक देखने लगा, तभी उसे अपने ही समान वह पुरुष दिखाई दिया।
श्लोक 33 (skanda.6.158.33)
सर्वतः स तमालोक्य ततो वचनमब्रवीत्
sarvataḥ sa tamālokya tato vacanamabravīt
उसे चारों ओर से देखकर, फिर उसने यह वचन कहा —
श्लोक 34 (skanda.6.158.34)
क्व चोरः संप्रविष्टो मे मम रूपेण मंदिरे ॥ भेदयित्वा तु षण्डाख्यमेवं दत्त्वा च वाससी
kva coraḥ saṁpraviṣṭo me mama rūpeṇa maṁdire bhedayitvā tu ṣaṇḍākhyamevaṁ dattvā ca vāsasī
"मेरे घर में मेरे ही रूप में यह चोर कहाँ से घुस आया? इस नपुंसक को धोखा देकर, इसे ये दोनों वस्त्र देकर —
श्लोक 35 (skanda.6.158.35)
यावद्भूपगृहं गत्वा त्वां षंढेन समन्वितम् ॥ वधाय योजयाम्येव तावद्द्रुततरं व्रज
yāvadbhūpagṛhaṁ gatvā tvāṁ ṣaṁḍhena samanvitam vadhāya yojayāmyeva tāvaddrutataraṁ vraja
जब तक मैं राजभवन जाकर तुझे इस नपुंसक सहित वध के लिए सौंप न दूँ, तब तक तू शीघ्रातिशीघ्र यहाँ से चला जा।"
श्लोक 36 (skanda.6.158.36)
पुष्प उवाच। मम रूपं समाधाय त्वमायातो गृहे मम ॥ शून्यं मत्वा ततो ज्ञातस्त्वयाऽहं गृहसंस्थितः
puṣpa uvāca mama rūpaṁ samādhāya tvamāyāto gṛhe mama śūnyaṁ matvā tato jñātastvayā'haṁ gṛhasaṁsthitaḥ
पुष्प ने कहा — "मेरा ही रूप धारण कर तू मेरे ही घर में आया है; इसे शून्य समझकर तू यहाँ घुस आया, किन्तु मैंने तुझे जान लिया कि तू यहाँ मेरे घर में बैठा है —
श्लोक 37 (skanda.6.158.37)
ततो नृपाय दास्यामि वधार्थं च न संशयः ॥ नो चेद्गच्छ द्रुतं पाप यदि जीवितुमिच्छसि
tato nṛpāya dāsyāmi vadhārthaṁ ca na saṁśayaḥ no cedgaccha drutaṁ pāpa yadi jīvitumicchasi
इसलिए अब मैं तुझे राजा को सौंपकर वध करवाऊँगा, इसमें कोई संदेह नहीं; अन्यथा, हे पापी, यदि जीना चाहता है तो शीघ्र भाग जा।"
श्लोक 38 (skanda.6.158.38)
सूत उवाच। एवमुक्त्त्वा ततस्तौ च बाहुयुद्धेन वै मिथः ॥ युध्यमानौ नरैरन्यैः कृच्छ्रेण तु निवारितौ
sūta uvāca evamukttvā tatastau ca bāhuyuddhena vai mithaḥ yudhyamānau narairanyaiḥ kṛcchreṇa tu nivāritau
सूत जी ने कहा — इस प्रकार कहकर फिर वे दोनों आपस में बाहु-युद्ध करने लगे; अन्य लोगों द्वारा उन्हें बड़ी कठिनाई से रोका गया।
श्लोक 39 (skanda.6.158.39)
ततस्ते स्वजना ये तु मणिभ द्रस्य चागताः ॥ परिजानंति नो द्वाभ्यां विशेषं माणिभद्रकम्
tataste svajanā ye tu maṇibha drasya cāgatāḥ parijānaṁti no dvābhyāṁ viśeṣaṁ māṇibhadrakam
तब मणिभद्र के जो भी स्वजन वहाँ आए थे, वे दोनों में मणिभद्र को पहचान नहीं पा रहे थे।
श्लोक 40 (skanda.6.158.40)
वालिसुग्रीवयोर्युद्धं तारार्थे युध्यमानयोः ॥ एवं विवदमानौ तु क्रोधताम्रा यतेक्षणौ
vālisugrīvayoryuddhaṁ tārārthe yudhyamānayoḥ evaṁ vivadamānau tu krodhatāmrā yatekṣaṇau
जैसे बालि और सुग्रीव तारा के लिए परस्पर युद्ध कर रहे थे, वैसे ही वे दोनों विवाद करते हुए, क्रोध से ताम्रवर्ण नेत्रों वाले हो गए।
श्लोक 41 (skanda.6.158.41)
राजद्वारं समासाद्य स्थितौ स्वजनसंवृतौ ॥ द्वाःस्थेन सूचितौ राज्ञे सभातलमुपस्थितौ
rājadvāraṁ samāsādya sthitau svajanasaṁvṛtau dvāḥsthena sūcitau rājñe sabhātalamupasthitau
वे राजद्वार पर जाकर अपने-अपने स्वजनों से घिरे हुए खड़े हो गए; द्वारपाल द्वारा राजा को उनकी सूचना दी गई, और वे दोनों सभा-भवन में उपस्थित हुए।
श्लोक 42 (skanda.6.158.42)
चौरचौरेति जल्पन्तौ पर स्परवधैषिणौ ॥ भूभुजा वीक्षितौ तौ च द्विजौ तु द्विजसत्तमाः
cauracaureti jalpantau para sparavadhaiṣiṇau bhūbhujā vīkṣitau tau ca dvijau tu dvijasattamāḥ
हे द्विजसत्तमो, "चोर, चोर" कहते हुए, परस्पर एक-दूसरे के वध की इच्छा रखते हुए, राजा ने उन दोनों को देखा।
श्लोक 43 (skanda.6.158.43)
न विशेषोऽस्ति विश्लेषस्तयोरेकोपिकायतः ॥ ततश्च व्यवहारेषु समती तेषु वै तदा
na viśeṣo'sti viśleṣastayorekopikāyataḥ tataśca vyavahāreṣu samatī teṣu vai tadā
दोनों में कोई भेद, कोई अन्तर, कहीं से भी नहीं दिखाई दिया; तब उनके व्यापारों में भी वे दोनों समान ही पाए गए।
श्लोक 44 (skanda.6.158.44)
पृष्टौ गुह्येषु सर्वेषु प्रत्यक्षेषु विशेषतः॥ वदतस्तौ यथावृत्तं पृथक्पृथग्व्यवस्थितम्
pṛṣṭau guhyeṣu sarveṣu pratyakṣeṣu viśeṣataḥ vadatastau yathāvṛttaṁ pṛthakpṛthagvyavasthitam
जब उन दोनों से समस्त गोपनीय तथा विशेष रूप से प्रत्यक्ष बातों के विषय में पूछा गया, तो वे दोनों पृथक्-पृथक् खड़े होकर एक ही जैसा वृत्तान्त कहते रहे।
श्लोक 45 (skanda.6.158.45)
ततस्तु स्वजनैः सर्वैरेको नीत्व थ चान्यतः ॥ पृष्टो गोत्रान्वयं सर्वं द्वितीयस्तु ततः परम्
tatastu svajanaiḥ sarvaireko nītva tha cānyataḥ pṛṣṭo gotrānvayaṁ sarvaṁ dvitīyastu tataḥ param
फिर उनके सभी स्वजनों ने एक को अलग ले जाकर उससे उसके गोत्र और वंश के विषय में पूरी तरह पूछा, फिर उसके बाद दूसरे को भी उसी प्रकार पूछा।
श्लोक 46 (skanda.6.158.46)
तेषामपि तथा सर्वं यथासम्यङ्निवेदितम् ॥ अथ राजा बृहत्सेनः सर्वांस्तानि दमब्रवीत्
teṣāmapi tathā sarvaṁ yathāsamyaṅniveditam atha rājā bṛhatsenaḥ sarvāṁstāni damabravīt
उन दोनों के उत्तर भी उतने ही सही निकले जितने बताए जाने चाहिए थे; तब राजा बृहत्सेन ने उन सबसे कहा —
श्लोक 47 (skanda.6.158.47)
पत्नी चानीयतां तस्य मणिभद्रस्य वै गृहात् ॥ निजकान्तस्य विज्ञाने सा प्रमाणं भविष्यति
patnī cānīyatāṁ tasya maṇibhadrasya vai gṛhāt nijakāntasya vijñāne sā pramāṇaṁ bhaviṣyati
"मणिभद्र की पत्नी को उसके घर से यहाँ लाया जाए; अपने ही पति को पहचानने में वह प्रमाण होगी।"
श्लोक 48 (skanda.6.158.48)
ततो गत्वा च सा प्रोक्ता पुरुषैर्नृपसंभवैः ॥ आगच्छ कांतं जानीहि त्वं प्रमाणं भविष्यसि
tato gatvā ca sā proktā puruṣairnṛpasaṁbhavaiḥ āgaccha kāṁtaṁ jānīhi tvaṁ pramāṇaṁ bhaviṣyasi
तब राजा के भेजे हुए पुरुषों द्वारा वहाँ जाकर उससे कहा गया — "आओ, अपने प्रियतम को पहचानो; तुम्हीं इसका प्रमाण बनोगी।"
श्लोक 49 (skanda.6.158.49)
ततः सा व्रीडया युक्ता प्रच्छादितशिरास्ततः ॥ नृपाग्रे संस्थिता प्रोचे विद्धिसम्यङ्निजं प्रियम्
tataḥ sā vrīḍayā yuktā pracchāditaśirāstataḥ nṛpāgre saṁsthitā proce viddhisamyaṅnijaṁ priyam
तब वह लज्जा से युक्त होकर, अपना सिर ढँककर राजा के सामने खड़ी होकर बोली — "अपने ही प्रिय को भलीभाँति पहचान लीजिए —
श्लोक 50 (skanda.6.158.50)
न वयं निश्चयं विद्मो न चैते स्वजनास्तव
na vayaṁ niścayaṁ vidmo na caite svajanāstava
हम तो निश्चय नहीं जानते, और न ही ये आपके स्वजन हैं।"
श्लोक 51 (skanda.6.158.51)
ततः सा चिन्तयामास निजचित्ते वरांगना ॥ मणिभद्रेण दग्धाहमीर्ष्यावह्निगताऽनिशम्
tataḥ sā cintayāmāsa nijacitte varāṁganā maṇibhadreṇa dagdhāhamīrṣyāvahnigatā'niśam
तब उस सुन्दरी ने अपने ही मन में विचार किया — "मैं मणिभद्र द्वारा निरन्तर ईर्ष्या की अग्नि में जलाई गई हूँ,
श्लोक 52 (skanda.6.158.52)
वंचयित्वा तु पितरं गृहीतास्मि ततः परम् ॥ न किंचित्पाप्मना दत्तं जल्पयित्वा धनं बहु
vaṁcayitvā tu pitaraṁ gṛhītāsmi tataḥ param na kiṁcitpāpmanā dattaṁ jalpayitvā dhanaṁ bahu
अपने ही पिता को धोखा देकर मुझे यहाँ ले लिया गया, और उस पापी ने बहुत धन देने की बात कहकर भी कुछ भी नहीं दिया।
श्लोक 53 (skanda.6.158.53)
द्वितीयेन तु मे पुंसा मर्त्यलोके सुखं कृतम् ॥ दत्त्वा वस्त्राणि चित्राणि तथैवाभरणानि च
dvitīyena tu me puṁsā martyaloke sukhaṁ kṛtam dattvā vastrāṇi citrāṇi tathaivābharaṇāni ca
दूसरे इस पुरुष ने मुझे मृत्युलोक में सुख दिया, मुझे विचित्र वस्त्र और उसी प्रकार आभूषण भी दिए,
श्लोक 54 (skanda.6.158.54)
प्रदास्यति च तातस्य सुवर्णं कथितं च यत् ॥ यद्गृह्णामि स्वहस्तेन मणिभद्रं द्वितीयकम्
pradāsyati ca tātasya suvarṇaṁ kathitaṁ ca yat yadgṛhṇāmi svahastena maṇibhadraṁ dvitīyakam
और मेरे पिता को भी जो सोना देने की बात उसने कही थी — अतः मैं अपने ही हाथ से इस दूसरे मणिभद्र को ग्रहण करूँगी।"
श्लोक 55 (skanda.6.158.55)
एवं निश्चित्य मनसा दृष्ट्वा रक्तपरिप्लुतम् ॥ प्रथमं मणिभद्रं सा जगृहेऽथ द्वितीयकम्
evaṁ niścitya manasā dṛṣṭvā raktapariplutam prathamaṁ maṇibhadraṁ sā jagṛhe'tha dvitīyakam
ऐसा मन में निश्चय करके, रक्त से लथपथ व्यक्ति को देखकर, उसने पहले वाले मणिभद्र को नहीं, बल्कि दूसरे को पकड़ लिया।
श्लोक 56 (skanda.6.158.56)
अब्रवीच्च ततो वाक्यं सर्वलोकस्य शृण्वतः ॥ अहं तातेन दत्तास्य विवाहे अग्निसंनिधौ
abravīcca tato vākyaṁ sarvalokasya śṛṇvataḥ ahaṁ tātena dattāsya vivāhe agnisaṁnidhau
फिर वह सम्पूर्ण सभा के सुनते हुए यह वचन बोली — "मुझे मेरे पिता ने अग्नि की उपस्थिति में विवाह में इसी को दिया था।
श्लोक 57 (skanda.6.158.57)
द्वितीयोऽयं दुराचारो वेषकर्ता समा गतः ॥ मां च प्रार्थयते गुप्तां नानाचारैः पृथग्विधैः
dvitīyo'yaṁ durācāro veṣakartā samā gataḥ māṁ ca prārthayate guptāṁ nānācāraiḥ pṛthagvidhaiḥ
यह दूसरा तो दुराचारी, वेष बनाने वाला, यहाँ आया है, और गुप्त रूप से नाना छलों से मुझे ही चाहता रहा है।"
श्लोक 58 (skanda.6.158.58)
ततस्तु पार्थिवः क्रुद्धस्तस्य शाखावलंबनम् ॥ आदिदेश द्विजश्रेष्ठा मणिभद्रस्य दुर्मतेः
tatastu pārthivaḥ kruddhastasya śākhāvalaṁbanam ādideśa dvijaśreṣṭhā maṇibhadrasya durmateḥ
तब उस राजा ने क्रोधित होकर, हे द्विजश्रेष्ठो, उस दुर्बुद्धि मणिभद्र को वृक्ष की शाखा से लटकाने का आदेश दिया।
श्लोक 59 (skanda.6.158.59)
एतस्मिन्नंतरे सोऽथ वधकानां समर्पितः ॥ तं वृक्षं नीयमानस्तु श्लोकानेतांस्तदापठत्
etasminnaṁtare so'tha vadhakānāṁ samarpitaḥ taṁ vṛkṣaṁ nīyamānastu ślokānetāṁstadāpaṭhat
इसी बीच वह वधिकों को सौंप दिया गया; जब उसे उस वृक्ष तक ले जाया जा रहा था, तब उसने ये श्लोक पढ़े —
श्लोक 60 (skanda.6.158.60)
निर्दयत्वं तथा द्रोहं कुटिलत्वं विशेषतः ॥ अशौचं निर्घृणत्वं च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः
nirdayatvaṁ tathā drohaṁ kuṭilatvaṁ viśeṣataḥ aśaucaṁ nirghṛṇatvaṁ ca strīṇāṁ doṣāḥ svabhāvajāḥ
"निर्दयता, द्रोह, विशेष रूप से कुटिलता, अपवित्रता तथा निष्ठुरता — ये स्त्रियों के स्वभावसिद्ध दोष हैं।
श्लोक 61 (skanda.6.158.61)
अन्तर्विषमया ह्येता बहिर्भागे मनोरमाः ॥ गुञ्जाफलसमाकारा योषितः सर्व दैवहि
antarviṣamayā hyetā bahirbhāge manoramāḥ guñjāphalasamākārā yoṣitaḥ sarva daivahi
ये भीतर से विषैली होती हैं, बाहर से मनोहर दिखती हैं; स्त्रियाँ सदा गुंजाफल के समान होती हैं।
श्लोक 62 (skanda.6.158.62)
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः ॥ मन्वादयस्तथान्येऽपि स्त्रीबुद्धेस्तत्र किंच न
uśanā veda yacchāstraṁ yacca veda bṛhaspatiḥ manvādayastathānye'pi strībuddhestatra kiṁca na
शुक्राचार्य जो शास्त्र जानते हैं, बृहस्पति जो जानते हैं, मनु आदि अन्य भी जो जानते हैं, स्त्रियों की बुद्धि के विषय में उनसे भला क्या कम है?
श्लोक 63 (skanda.6.158.63)
पीयूषमधरे वासं हृदि हालाहलं विषम् ॥ आस्वाद्यतेऽधरस्तेन हृदयं च प्रपीड्यते
pīyūṣamadhare vāsaṁ hṛdi hālāhalaṁ viṣam āsvādyate'dharastena hṛdayaṁ ca prapīḍyate
उनके अधर में अमृत का वास है, हृदय में हलाहल विष है; अधर का तो आस्वादन किया जाता है, पर हृदय द्वारा पीड़ित किया जाता है।
श्लोक 64 (skanda.6.158.64)
अलक्तको यथा रक्तो नरः कामी तथैव च ॥ हृतसारस्तथा सोऽपि पादमूले निपा त्यते
alaktako yathā rakto naraḥ kāmī tathaiva ca hṛtasārastathā so'pi pādamūle nipā tyate
जैसे लाख का रंग लाल होता है, वैसे ही कामी पुरुष भी उनसे रंगा जाता है; सार खोकर वह भी उनके चरणों में गिर पड़ता है।
श्लोक 65 (skanda.6.158.65)
संसारविषवृक्षस्य कुकर्मकुसुमस्य च ॥ नरकार्तिफलस्योक्ता मूलमेषा नितंबिनी
saṁsāraviṣavṛkṣasya kukarmakusumasya ca narakārtiphalasyoktā mūlameṣā nitaṁbinī
संसार-रूपी विषवृक्ष के, कुकर्म-रूपी पुष्पों के, तथा नरक-पीड़ा-रूपी फल के मूल के रूप में यह नितम्बिनी नारी ही कही गई है।
श्लोक 66 (skanda.6.158.66)
कस्य नो जायते त्रासो दृष्ट्वा दूरा दपि स्त्रियम्
kasya no jāyate trāso dṛṣṭvā dūrā dapi striyam
दूर से भी स्त्री को देखकर किसे भय उत्पन्न नहीं होता?
श्लोक 67 (skanda.6.158.67)
संसारभ्रमणं नारी प्रथमेऽपि समागमे ॥ वह्निप्रदक्षिणन्यायव्याजेनैव प्रदर्शयेत्
saṁsārabhramaṇaṁ nārī prathame'pi samāgame vahnipradakṣiṇanyāyavyājenaiva pradarśayet
प्रथम समागम में ही स्त्री, अग्नि-प्रदक्षिणा के बहाने से, संसार-भ्रमण को ही दिखा देती है।
श्लोक 68 (skanda.6.158.68)
एतास्तु निर्घृणत्वेन निर्दय त्वेन नित्यशः ॥ विशेषाज्जाड्यकृत्येन दूषयंति कुलत्रयम्
etāstu nirghṛṇatvena nirdaya tvena nityaśaḥ viśeṣājjāḍyakṛtyena dūṣayaṁti kulatrayam
ये सदा निष्ठुरता और निर्दयता से, विशेष रूप से जड़ता के कर्म से, कुल-त्रय को दूषित करती हैं।
श्लोक 69 (skanda.6.158.69)
कुलत्रयगृहं कीर्त्या निजया धवलीकृतम् ॥ कृष्णं करोत्यकृ त्येन नारी दीपशिखेव तु
kulatrayagṛhaṁ kīrtyā nijayā dhavalīkṛtam kṛṣṇaṁ karotyakṛ tyena nārī dīpaśikheva tu
जिस कुल-त्रय के घर को अपनी कीर्ति से उजला किया जाता है, नारी उसी को अकृत्य से काला कर देती है, दीपक की लौ के समान।
श्लोक 70 (skanda.6.158.70)
धर्मवृक्षस्य वाताली चित्तपद्मशशिप्रभा ॥ सृष्टा कामार्णवग्राही केन मोक्षदृढार्गला
dharmavṛkṣasya vātālī cittapadmaśaśiprabhā sṛṣṭā kāmārṇavagrāhī kena mokṣadṛḍhārgalā
धर्म-वृक्ष के लिए आँधी, चित्त-कमल के लिए चन्द्रमा की कान्ति, काम-रूपी सागर की ग्राहिणी — विधाता ने ऐसी स्त्री को किस मोक्ष के लिए दृढ़ अर्गला बनाया?
श्लोक 71 (skanda.6.158.71)
कारा संतानकूटस्य संसारवनवागुरा ॥ स्वर्गमार्गमहागर्ता पुंसां स्त्री वेधसा कृता
kārā saṁtānakūṭasya saṁsāravanavāgurā svargamārgamahāgartā puṁsāṁ strī vedhasā kṛtā
यह संतति-रूपी दुर्ग का कारागार है, संसार-वन का जाल है; स्वर्ग-मार्ग की महाखाई है — विधाता ने पुरुषों के लिए स्त्री को ऐसा बनाया।
श्लोक 72 (skanda.6.158.72)
वेधसा बंधनं किंचिन्नृणामन्यदपश्यता ॥ स्त्रीरूपेण ततः कोऽपि पाशोऽयं सुदृढः कृतः
vedhasā baṁdhanaṁ kiṁcinnṛṇāmanyadapaśyatā strīrūpeṇa tataḥ ko'pi pāśo'yaṁ sudṛḍhaḥ kṛtaḥ
मनुष्यों के लिए और कोई बन्धन देखे बिना, विधाता ने यह और कुछ नहीं, बल्कि स्त्री के रूप में यह अत्यन्त दृढ़ पाश बनाया।
श्लोक 73 (skanda.6.158.73)
इत्येवं बहुधा सोऽपि विललाप सुदुःखितः ॥ स्त्रीचिन्तां बहुधा कृत्वा आत्मानं चाप्यगर्हयत्
ityevaṁ bahudhā so'pi vilalāpa suduḥkhitaḥ strīcintāṁ bahudhā kṛtvā ātmānaṁ cāpyagarhayat
इस प्रकार वह भी अत्यन्त दुःखी होकर, अनेक प्रकार से विलाप करने लगा, बहुधा स्त्री-सम्बन्धी चिन्ता करके, अपने आप को भी धिक्कारने लगा।
श्लोक 74 (skanda.6.158.74)
अहो कुबुद्धिना नैव लब्धं संसारजं फलम्॥ न कदाचिन्मया दत्तं तृष्णाव्याकुलचेतसा
aho kubuddhinā naiva labdhaṁ saṁsārajaṁ phalam na kadācinmayā dattaṁ tṛṣṇāvyākulacetasā
"अरे, मूर्खतावश मैंने संसार में मिलने वाला कोई फल भी नहीं पाया; तृष्णा से व्याकुल चित्त होकर मैंने कभी कुछ दान भी नहीं दिया।
श्लोक 75 (skanda.6.158.75)
ऐश्वर्येऽपि स्थिते भूरि न मया सुकृतं कृतम् ॥ कदाचिन्नैव जप्तं च न हुतं च हुताशने
aiśvarye'pi sthite bhūri na mayā sukṛtaṁ kṛtam kadācinnaiva japtaṁ ca na hutaṁ ca hutāśane
इतना ऐश्वर्य होते हुए भी मैंने कोई पुण्य-कर्म नहीं किया; कभी जप भी नहीं किया, अग्नि में हवन भी नहीं किया।
श्लोक 76 (skanda.6.158.76)
अथवा सत्यमेवोक्तं केनापि च महात्मना ॥ कृपणेन समो दाता न भूतो न भविष्यति ॥ अस्पृष्ट्वापि च वित्तं स्वं यः परेभ्यः प्रयच्छति
athavā satyamevoktaṁ kenāpi ca mahātmanā kṛpaṇena samo dātā na bhūto na bhaviṣyati aspṛṣṭvāpi ca vittaṁ svaṁ yaḥ parebhyaḥ prayacchati
अथवा किसी महात्मा ने यह भी सच ही कहा है कि कृपण के समान कोई दाता न कभी हुआ और न होगा — जो अपने ही धन को छुए बिना भी उसे दूसरों को दे देता है।
श्लोक 77 (skanda.6.158.77)
शरणं किं प्रपन्नानां विषवन्मारयंति किम् ॥ न दीयते न भुज्यंते कृपणेन धनानि च
śaraṇaṁ kiṁ prapannānāṁ viṣavanmārayaṁti kim na dīyate na bhujyaṁte kṛpaṇena dhanāni ca
शरण में आए हुओं के लिए क्या यह आश्रय है? क्या वे विष के समान उन्हें मार डालते हैं? कृपण न तो दान देता है, न स्वयं भोगता है — ऐसा है उसका धन।
श्लोक 78 (skanda.6.158.78)
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवंति वित्तस्य ॥ यो न ददाति न भुंक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति
dānaṁ bhogo nāśastisro gatayo bhavaṁti vittasya yo na dadāti na bhuṁkte tasya tṛtīyā gatirbhavati
दान, भोग और नाश — ये धन की तीन ही गतियाँ होती हैं; जो न देता है, न भोगता है, उसके धन की तीसरी ही गति होती है।
श्लोक 79 (skanda.6.158.79)
धनिनोप्यदानविभवा गण्यंते धुरि दरिद्राणाम्॥ नहि हंति यत्पिपासामतः समुद्रोऽपि मरुरेव
dhaninopyadānavibhavā gaṇyaṁte dhuri daridrāṇām nahi haṁti yatpipāsāmataḥ samudro'pi marureva
दान न देने वाले धनवान भी दरिद्रों में ही सबसे आगे गिने जाते हैं; क्योंकि प्यास न बुझाने वाला समुद्र भी मरुस्थल के समान ही है।
श्लोक 80 (skanda.6.158.80)
अत्युपयुक्ताः सद्भिर्गतागतैरहरहः सुनिर्विण्णाः ॥ कृपणजनसंनिकाशं संप्राप्यार्थाः स्वपंतीह
atyupayuktāḥ sadbhirgatāgatairaharahaḥ sunirviṇṇāḥ kṛpaṇajanasaṁnikāśaṁ saṁprāpyārthāḥ svapaṁtīha
सज्जनों द्वारा बार-बार आने-जाने से अत्यन्त उपयोग में लाया गया, अत्यन्त निर्वेद को प्राप्त हुआ धन, कृपण मनुष्य के पास पहुँचकर वहीं सो जाता है।
श्लोक 81 (skanda.6.158.81)
प्राप्तान्न लभंते ते भोगान्भोक्तुं स्वकर्मणा कृपणाः ॥ मुखपाकः किल भवति द्राक्षापाके बलिभुजानाम्
prāptānna labhaṁte te bhogānbhoktuṁ svakarmaṇā kṛpaṇāḥ mukhapākaḥ kila bhavati drākṣāpāke balibhujānām
कृपण लोग अपने ही कर्म से प्राप्त भोगों को भी भोग नहीं पाते; दाख पकने पर तो भोजन के भोक्ताओं का मुख ही पक जाता है।
श्लोक 82 (skanda.6.158.82)
दातव्यं भोक्तव्यं सति विभवे संचयो न कर्तव्यः ॥ पश्येह मधुकरीणां संचितमर्थं हरंत्यन्ये
dātavyaṁ bhoktavyaṁ sati vibhave saṁcayo na kartavyaḥ paśyeha madhukarīṇāṁ saṁcitamarthaṁ haraṁtyanye
धन होने पर दान देना और भोगना चाहिए, संचय नहीं करना चाहिए — देखो, मधुमक्खियों के संचित धन को भी दूसरे ही हर लेते हैं।
श्लोक 83 (skanda.6.158.83)
याचितं द्विजवरे न दीयते संचितं क्रतुवरे न योज्यते ॥ तत्कदर्यपरिरक्षितं धनं चौरपार्थिवगृहेषु भुज्यते
yācitaṁ dvijavare na dīyate saṁcitaṁ kratuvare na yojyate tatkadaryaparirakṣitaṁ dhanaṁ caurapārthivagṛheṣu bhujyate
हे द्विजश्रेष्ठ, जो याचना करने पर भी नहीं दिया जाता, जो यज्ञ में भी नहीं लगाया जाता, वह कृपण-रक्षित धन अन्ततः चोरों और राजाओं के घरों में ही भोगा जाता है।
श्लोक 84 (skanda.6.158.84)
त्यागो गुणो वित्तवतां वित्तं त्यागवतां गुणः ॥ परस्परवियुक्तौ तु वित्त त्यागौ विडम्बनम्
tyāgo guṇo vittavatāṁ vittaṁ tyāgavatāṁ guṇaḥ parasparaviyuktau tu vitta tyāgau viḍambanam
त्याग धनवानों का गुण है, त्याग करने वालों का गुण ही धन है; धन और त्याग जब परस्पर अलग हो जाते हैं, तब वह केवल विडम्बना ही रह जाती है।
श्लोक 85 (skanda.6.158.85)
किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला ॥ या न वेश्येव सामान्या पथिकैरपि भुज्यते
kiṁ tayā kriyate lakṣmyā yā vadhūriva kevalā yā na veśyeva sāmānyā pathikairapi bhujyate
उस लक्ष्मी से क्या लाभ, जो केवल पत्नी के समान एकांगी बनी रहे — जो, वेश्या के समान, राहगीरों द्वारा भी भोगी नहीं जाती?
श्लोक 86 (skanda.6.158.86)
अर्थोष्मणा भवेत्प्राणो भवेद्भक्ष्यैर्विना नृणाम् ॥ यतः संधार्यते भूमिः कृपणस्योष्मणा हि सा
arthoṣmaṇā bhavetprāṇo bhavedbhakṣyairvinā nṛṇām yataḥ saṁdhāryate bhūmiḥ kṛpaṇasyoṣmaṇā hi sā
धन के ताप से ही मनुष्यों का प्राण, भोजन के बिना भी, टिका रहता है; क्योंकि यह पृथ्वी भी कृपण के ही ताप से धारण की जाती है।
श्लोक 87 (skanda.6.158.87)
कृपणानां प्रसादेन शेषो धारयते महीम् ॥ यतस्ते भूगतं वित्तं कुर्वते तस्य चोष्मणा
kṛpaṇānāṁ prasādena śeṣo dhārayate mahīm yataste bhūgataṁ vittaṁ kurvate tasya coṣmaṇā
कृपणों की ही कृपा से शेषनाग पृथ्वी को धारण करते हैं, क्योंकि वे भूमि में गड़े हुए उनके धन को ही उसके ताप में बदल देते हैं।
श्लोक 88 (skanda.6.158.88)
एवं बहुविधा वाचः प्रलपन्मणिभद्रकः ॥ नीत्वा तैः पार्थिवोद्दिष्टैः पुरुषैः परुषाक्षरम् ॥ बहुधा प्रलपं श्चैव कृतः शाखावलंबनः
evaṁ bahuvidhā vācaḥ pralapanmaṇibhadrakaḥ nītvā taiḥ pārthivoddiṣṭaiḥ puruṣaiḥ paruṣākṣaram bahudhā pralapaṁ ścaiva kṛtaḥ śākhāvalaṁbanaḥ
इस प्रकार, राजा द्वारा नियुक्त पुरुषों के द्वारा ले जाए जाते हुए, कठोर वचन सुनते हुए, अनेक प्रकार से इस तरह प्रलाप करते हुए, वह शाखा से लटका दिया गया।