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नागर खण्ड · अध्याय 159

पुष्प की विभव-प्राप्ति

अध्याय 158अध्याय-सूचीअध्याय 160

श्लोक 1 (skanda.6.159.1)

सूत उवाच। पुष्पोऽपि तां समादाय माहिकाख्यां वरांगनाम् ॥ स तदा प्रययौ हृष्टो मणिभद्रस्य मंदिरम्

sūta uvāca puṣpo'pi tāṁ samādāya māhikākhyāṁ varāṁganām sa tadā prayayau hṛṣṭo maṇibhadrasya maṁdiram

सूत जी ने कहा — पुष्प भी उस श्रेष्ठ नारी माहिका को साथ लेकर, हर्षित होकर, उसी क्षण मणिभद्र के घर की ओर चल पड़ा।

श्लोक 2 (skanda.6.159.2)

शंखतूर्यनिनादेन सर्वैस्तैः स्वजनैर्वृतः ॥ न कस्य तत्र संभूतो विकल्पस्तत्समुद्भवः

śaṁkhatūryaninādena sarvaistaiḥ svajanairvṛtaḥ na kasya tatra saṁbhūto vikalpastatsamudbhavaḥ

शंख और तुरही की ध्वनि के साथ, अपने समस्त स्वजनों से घिरा हुआ — किसी को भी वहाँ उस समानता में कोई संशय उत्पन्न नहीं हुआ।

श्लोक 3 (skanda.6.159.3)

भास्करस्य प्रसादेन तथैवान्यस्य कर्हिचित् ॥ सोऽपि मंदिरमासाद्य यथात्मपितृसंभवम्

bhāskarasya prasādena tathaivānyasya karhicit so'pi maṁdiramāsādya yathātmapitṛsaṁbhavam

यह भास्कर की ही कृपा थी, और उसी प्रकार किसी अन्य समय भी। वह भी अपने ही पिता के घर के समान उस मन्दिर में पहुँचकर —

श्लोक 4 (skanda.6.159.4)

उपविश्य ततो मध्ये बन्धून्सर्वान्समाह्वयत् ॥ अद्य तावद्दिने मह्यं तुलाग्रं कमला श्रिता

upaviśya tato madhye bandhūnsarvānsamāhvayat adya tāvaddine mahyaṁ tulāgraṁ kamalā śritā

बीच में बैठकर उसने समस्त बन्धुओं को बुलाया — "आज इस दिन मुझ पर लक्ष्मी का उदय तुला की नोक तक पहुँच गया है,

श्लोक 5 (skanda.6.159.5)

चलितापि पुनश्चास्याः सुपत्न्या वाक्यतः स्थिता ॥ कियंतं चैव कालं मे कार्पण्यं महदास्थितम्

calitāpi punaścāsyāḥ supatnyā vākyataḥ sthitā kiyaṁtaṁ caiva kālaṁ me kārpaṇyaṁ mahadāsthitam

जो हिलती हुई भी, अपनी सुपत्नी के वचन से फिर स्थिर हो गई है। कितने ही काल तक मुझ पर बड़ी कृपणता छाई रही —

श्लोक 6 (skanda.6.159.6)

ज्ञातमद्य चला लक्ष्मीस्तेन त्यक्तं सुदूरतः ॥ तस्माद्बंधुजनैः सार्धं देवैर्विप्रैश्च कृत्स्नशः ॥ संविभक्तां करिष्यामि सत्येनात्मानमालभे

jñātamadya calā lakṣmīstena tyaktaṁ sudūrataḥ tasmādbaṁdhujanaiḥ sārdhaṁ devairvipraiśca kṛtsnaśaḥ saṁvibhaktāṁ kariṣyāmi satyenātmānamālabhe

आज मैंने जान लिया कि लक्ष्मी चंचल है, इसीलिए उसे दूर रखा गया था; इसलिए अब बन्धुजनों के साथ, देवताओं और ब्राह्मणों के साथ मिलकर, मैं उसका सम्पूर्ण विभाजन करूँगा — सत्य की शपथ लेकर मैं यह कहता हूँ।"

श्लोक 7 (skanda.6.159.7)

एवमुक्त्वा ततः सर्वान्समाहूय पृथक्पृथक् ॥ स नामभिर्ददौ वस्त्रं भूषणानि यथार्हतः

evamuktvā tataḥ sarvānsamāhūya pṛthakpṛthak sa nāmabhirdadau vastraṁ bhūṣaṇāni yathārhataḥ

ऐसा कहकर, फिर सबको अलग-अलग बुलाकर, उसने नाम लेकर यथायोग्य वस्त्र और आभूषण दिए।

श्लोक 8 (skanda.6.159.8)

ततो वेदविदो विप्रान्समाहूय स नामभिः ॥ एकैकस्य ददौ वित्तं सवस्त्रं श्रद्धयान्वितः

tato vedavido viprānsamāhūya sa nāmabhiḥ ekaikasya dadau vittaṁ savastraṁ śraddhayānvitaḥ

फिर वेदज्ञ ब्राह्मणों को नाम लेकर बुलाकर, उसने प्रत्येक को श्रद्धापूर्वक वस्त्र सहित धन दिया।

श्लोक 9 (skanda.6.159.9)

ततस्तु नर्तकेभ्यश्च दीनांधेभ्यो विशेषतः ॥ ददौ भोज्यं समि ष्टान्नं सवस्त्रं च द्विजोत्तमाः

tatastu nartakebhyaśca dīnāṁdhebhyo viśeṣataḥ dadau bhojyaṁ sami ṣṭānnaṁ savastraṁ ca dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो, फिर नर्तकों को तथा विशेष रूप से दीन-अन्धों को उसने भोजन, उत्तम अन्न, तथा वस्त्र भी दिए।

श्लोक 10 (skanda.6.159.10)

ततस्तु स्वयमेवान्नं बुभुजे भार्यया सह ॥ विसृज्य तान्समायातान्स्वजनान्ब्राह्मणैः सह

tatastu svayamevānnaṁ bubhuje bhāryayā saha visṛjya tānsamāyātānsvajanānbrāhmaṇaiḥ saha

फिर स्वयं भी अपनी पत्नी के साथ भोजन किया, वहाँ आए हुए समस्त स्वजनों तथा ब्राह्मणों को विदा करके।

श्लोक 11 (skanda.6.159.11)

एवं तेन तदा प्राप्तं वित्तं च परसंभवम् ॥ बुभुजे स्वेच्छया नित्यं तदा भार्यासमन्वितः

evaṁ tena tadā prāptaṁ vittaṁ ca parasaṁbhavam bubhuje svecchayā nityaṁ tadā bhāryāsamanvitaḥ

इस प्रकार उसे उस समय दूसरे का प्राप्त हुआ वह धन मिला, जिसे वह प्रतिदिन अपनी इच्छानुसार, अपनी पत्नी सहित भोगता रहा।

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