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नागर खण्ड · अध्याय 160

पुष्प का रहस्योद्घाटन तथा हाटकेश्वर-क्षेत्र में शुद्धि का संकल्प

अध्याय 159अध्याय-सूचीअध्याय 161

श्लोक 1 (skanda.6.160.1)

सूत उवाच। अन्यस्मिन्नहनि प्राप्ते रहस्युक्तः स भार्यया ॥ रात्रौ प्रसुप्तः पार्श्वे च पादौ संस्पृश्य तत्क्षणात्

sūta uvāca anyasminnahani prāpte rahasyuktaḥ sa bhāryayā rātrau prasuptaḥ pārśve ca pādau saṁspṛśya tatkṣaṇāt

सूत जी ने कहा — किसी अन्य दिन के आने पर, अपनी पत्नी द्वारा एकान्त में कहे जाने पर, रात्रि में सोए हुए उसके पास ही, उसी क्षण उसके दोनों चरणों का स्पर्श करके वह बोली —

श्लोक 2 (skanda.6.160.2)

त्वं तावन्मम भर्त्तासि यावज्जीवमसंशयम् ॥ तद्वदस्व विभोऽस्माकं त्वदर्थं स मयोज्झितः

tvaṁ tāvanmama bharttāsi yāvajjīvamasaṁśayam tadvadasva vibho'smākaṁ tvadarthaṁ sa mayojjhitaḥ

"तुम निःसंदेह जब तक जीवित रहोगे, तब तक ही मेरे पति हो; इसलिए हे प्रभो, हमें बताओ — तुम्हारे ही कारण उसे मैंने त्याग दिया, यह क्या रहस्य है?

श्लोक 3 (skanda.6.160.3)

इन्द्रजालमिदं किं ते किं वा मंत्रप्रसाधनम् ॥ देवानां वा प्रसादोऽयं यत्त्वं चैतादृशः स्थितः

indrajālamidaṁ kiṁ te kiṁ vā maṁtraprasādhanam devānāṁ vā prasādo'yaṁ yattvaṁ caitādṛśaḥ sthitaḥ

यह तुम्हारा क्या इन्द्रजाल है, या कोई मन्त्र-सिद्धि है? या देवताओं की यह कृपा है, कि तुम ऐसी अवस्था में स्थित हो?

श्लोक 4 (skanda.6.160.4)

मया त्वं हि तदा ज्ञातः प्रथमेऽपि दिने स्थिते ॥ यदा संभूषिता वस्त्रैस्तथा वस्तुविभूषणैः

mayā tvaṁ hi tadā jñātaḥ prathame'pi dine sthite yadā saṁbhūṣitā vastraistathā vastuvibhūṣaṇaiḥ

मैंने तो तुम्हें उसी पहले दिन पहचान लिया था, जब तुम वस्त्रों तथा अन्य आभूषणों से इस प्रकार सुसज्जित हुए थे।

श्लोक 5 (skanda.6.160.5)

यद्यहं तव वार्तां च सर्वां कपटसंभवाम् ॥ कथयामि द्वितीयस्य तत्ते पादौ स्पृशाम्यहम्

yadyahaṁ tava vārtāṁ ca sarvāṁ kapaṭasaṁbhavām kathayāmi dvitīyasya tatte pādau spṛśāmyaham

यदि मैं तुम्हारी सारी छल-कपट से भरी बात दूसरे पुरुष से कह दूँ, तो मैं तुम्हारे ही पैर छूकर यह प्रतिज्ञा करती हूँ (कि मैं ऐसा नहीं करूँगी)।"

श्लोक 6 (skanda.6.160.6)

सूत उवाच। एवमुक्तो विहस्योच्चैः स तदा ब्राह्मणोत्तमाः ॥ तामालिंग्य ततः प्राह वचनं मधुराक्षरम्

sūta uvāca evamukto vihasyoccaiḥ sa tadā brāhmaṇottamāḥ tāmāliṁgya tataḥ prāha vacanaṁ madhurākṣaram

सूत जी ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर वह उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ज़ोर से हँस पड़ा, फिर उसे आलिंगन कर मधुर वाणी में यह वचन बोला —

श्लोक 7 (skanda.6.160.7)

साधु प्रिये त्वया ज्ञातं सर्वं मम विचेष्टितम् ॥ अहं स विप्रः सुभगे मणिभद्रेण यः पुरा

sādhu priye tvayā jñātaṁ sarvaṁ mama viceṣṭitam ahaṁ sa vipraḥ subhage maṇibhadreṇa yaḥ purā

"साधु, हे प्रिये, तुमने मेरी सारी चेष्टा को भलीभाँति जान लिया; हे सुभगे, मैं वही ब्राह्मण हूँ जिसे पहले मणिभद्र ने —

श्लोक 8 (skanda.6.160.8)

विडंबितो मुखं पश्यंस्त्वदीयं चंद्रसन्निभम् ॥ चमत्कारपुरं गत्वा मया चाराधितो रविः ॥ तेन तुष्टेन मे दत्तं तद्रूपं ज्ञानमेव च

viḍaṁbito mukhaṁ paśyaṁstvadīyaṁ caṁdrasannibham camatkārapuraṁ gatvā mayā cārādhito raviḥ tena tuṣṭena me dattaṁ tadrūpaṁ jñānameva ca

— तुम्हारे ही चन्द्र-सम मुख को देखते हुए, अपमानित किया गया था। चमत्कारपुर जाकर मैंने सूर्य की आराधना की, और उन संतुष्ट सूर्य ने मुझे उसका रूप और वह ज्ञान दोनों प्रदान किए।"

श्लोक 9 (skanda.6.160.9)

माहिकोवाच। त्वदीयदर्शनेनाहं कामदेववशं गता

māhikovāca tvadīyadarśanenāhaṁ kāmadevavaśaṁ gatā

माहिका ने कहा — तुम्हारे ही दर्शन से मैं कामदेव के वश में हो गई हूँ।

श्लोक 10 (skanda.6.160.10)

तस्मादाराधयिष्यामि तं गत्वा दिननायकम् ॥ येन ते तादृशं भूयः प्रतुष्टो विदधाति सः

tasmādārādhayiṣyāmi taṁ gatvā dinanāyakam yena te tādṛśaṁ bhūyaḥ pratuṣṭo vidadhāti saḥ

इसलिए मैं भी जाकर उन दिननायक सूर्य की आराधना करूँगी, जिससे वे प्रसन्न होकर तुम्हें फिर से वैसा ही रूप प्रदान करें।

श्लोक 11 (skanda.6.160.11)

किं मे चैतेन रूपेण तारुण्येनापि च प्रभो ॥ यत्ते तथाविधं रूपं संभजामि दिवानिशम्

kiṁ me caitena rūpeṇa tāruṇyenāpi ca prabho yatte tathāvidhaṁ rūpaṁ saṁbhajāmi divāniśam

हे स्वामी, इस रूप और यौवन से मुझे क्या लाभ, जब मैं तुम्हारे उस वैसे ही रूप की सेवा दिन-रात करना चाहती हूँ?

श्लोक 12 (skanda.6.160.12)

सूत उवाच। तच्छ्रुत्वा गुटिकां पुष्प समादाय मुखान्ततः ॥ दधार तादृशं रूपं यादृग्दृष्टं पुरा तया

sūta uvāca tacchrutvā guṭikāṁ puṣpa samādāya mukhāntataḥ dadhāra tādṛśaṁ rūpaṁ yādṛgdṛṣṭaṁ purā tayā

सूत जी ने कहा — यह सुनकर पुष्प ने वह गुटिका लेकर मुख पर लगा ली, और उसने वैसा ही रूप धारण कर लिया जैसा उसने पहले उसे देखा था।

श्लोक 13 (skanda.6.160.13)

ततः सा हर्षिता माही पुलकेन समन्विता ॥ तमालिंग्याभजद्गाढं वाक्यमेतदुवाच ह

tataḥ sā harṣitā māhī pulakena samanvitā tamāliṁgyābhajadgāḍhaṁ vākyametaduvāca ha

तब हर्षित होकर, रोमांचित होकर, वह माही उसका गाढ़ आलिंगन कर बैठी, और यह वचन बोली —

श्लोक 14 (skanda.6.160.14)

अद्य मे सफलं जन्म यौवनं रूपमेव च ॥ यत्त्वं हृद्वांछितः कांतः प्रलब्धो मदनोपमः

adya me saphalaṁ janma yauvanaṁ rūpameva ca yattvaṁ hṛdvāṁchitaḥ kāṁtaḥ pralabdho madanopamaḥ

"आज मेरा जन्म, मेरा यौवन और मेरा रूप — सब सफल हो गया, कि मुझे हृदय से चाहा हुआ, कामदेव के समान प्रिय मिल गया।

श्लोक 15 (skanda.6.160.15)

एतावंति दिनान्येव न मया कामजं सुखम् ॥ अपि स्वल्पतरं लब्धं कथंचिद्वृद्धसेवया

etāvaṁti dinānyeva na mayā kāmajaṁ sukham api svalpataraṁ labdhaṁ kathaṁcidvṛddhasevayā

इतने दिनों तक मुझे यह काम-सुख कभी नहीं मिला, किसी तरह वृद्ध की सेवा से इसका थोड़ा-सा भी नहीं मिला था।

श्लोक 16 (skanda.6.160.16)

भजस्व स्वेच्छया विप्र दासी तेऽहं व्यवस्थिता

bhajasva svecchayā vipra dāsī te'haṁ vyavasthitā

हे विप्र, अपनी इच्छानुसार मुझे स्वीकार करो — मैं तुम्हारी दासी होकर स्थित हूँ।"

श्लोक 17 (skanda.6.160.17)

पुष्प उवाच। प्रविशामि किमंगेषु भवन्तीं किं मिलाम्यहम् ॥ प्रिये चिरेण लब्धासि न जाने कर वाणि किम्

puṣpa uvāca praviśāmi kimaṁgeṣu bhavantīṁ kiṁ milāmyaham priye cireṇa labdhāsi na jāne kara vāṇi kim

पुष्प ने कहा — "क्या मैं तुम्हारे अंगों में समा जाऊँ, या तुमसे मिल जाऊँ? हे प्रिये, बड़ी देर से तुम्हें पाया है — नहीं जानता, क्या करूँ?"

श्लोक 18 (skanda.6.160.18)

एवमुक्त्वा ततस्तौ च मैथुनाय कृतक्षणौ ॥ प्रवृत्तौ ब्राह्मणश्रेष्ठाः कामदेववशंगतौ

evamuktvā tatastau ca maithunāya kṛtakṣaṇau pravṛttau brāhmaṇaśreṣṭhāḥ kāmadevavaśaṁgatau

इस प्रकार कहकर वे दोनों संभोग के लिए तत्पर हुए; हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, कामदेव के वश में आए हुए वे दोनों उसमें प्रवृत्त हो गए।

श्लोक 19 (skanda.6.160.19)

अथ रात्र्यां व्यतीतायामुदिते सूर्यमण्डले ॥ वक्त्रे तां गुटिकां कृत्वा स पुष्पस्तादृशोऽभवत्

atha rātryāṁ vyatītāyāmudite sūryamaṇḍale vaktre tāṁ guṭikāṁ kṛtvā sa puṣpastādṛśo'bhavat

फिर रात्रि बीत जाने पर, सूर्यमण्डल के उदय होने पर, मुख पर वह गुटिका रखकर, पुष्प फिर वैसा ही मणिभद्र-रूप हो गया।

श्लोक 20 (skanda.6.160.20)

एवं तस्य स्थितस्यात्र महान्कालो व्यजायत ॥ पुत्राः पौत्रास्तथा जाताः कन्यकाश्च तथैव च

evaṁ tasya sthitasyātra mahānkālo vyajāyata putrāḥ pautrāstathā jātāḥ kanyakāśca tathaiva ca

इस प्रकार वहाँ स्थित उसका बहुत लम्बा समय बीत गया; पुत्र, पौत्र तथा कन्याएँ भी इसी प्रकार उत्पन्न हुईं।

श्लोक 21 (skanda.6.160.21)

स वृद्धत्वं यदा प्राप्तो जराविप्लवतां गतः ॥ तदा स चिन्तयामास मया पापं महत्कृतम्

sa vṛddhatvaṁ yadā prāpto jarāviplavatāṁ gataḥ tadā sa cintayāmāsa mayā pāpaṁ mahatkṛtam

जब वह वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ, तथा जरा के विनाश की ओर बढ़ने लगा, तब उसने मन में विचार किया — "मैंने बड़ा पाप किया है —

श्लोक 22 (skanda.6.160.22)

मणिभद्रो वराकोऽसौ मिथ्याचारेण घातितः ॥ तस्य भार्या हृता चैव प्रसूतिं च नियोजिता

maṇibhadro varāko'sau mithyācāreṇa ghātitaḥ tasya bhāryā hṛtā caiva prasūtiṁ ca niyojitā

उस बेचारे मणिभद्र को मिथ्या आचरण से मरवा डाला, और उसकी पत्नी भी छीन ली, तथा उसे संतान-उत्पत्ति में भी नियोजित किया।

श्लोक 23 (skanda.6.160.23)

हाटकेश्वरजं क्षेत्रं तस्माद्गत्वा करोम्य हम् ॥ पुरश्चरणसंज्ञं च येन शुद्धिः प्रजायते

hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ tasmādgatvā karomya ham puraścaraṇasaṁjñaṁ ca yena śuddhiḥ prajāyate

इसलिए वहाँ हाटकेश्वर क्षेत्र में जाकर मैं पुरश्चरण नामक वह विधि करूँगा, जिससे शुद्धि प्राप्त होती है।"

श्लोक 24 (skanda.6.160.24)

एवं स निश्चयं कृत्वा पुष्पश्चित्ते निजे तदा ॥ असंख्यं वित्तमादाय चमत्कारपुरंगतः

evaṁ sa niścayaṁ kṛtvā puṣpaścitte nije tadā asaṁkhyaṁ vittamādāya camatkārapuraṁgataḥ

इस प्रकार मन में यह निश्चय करके, पुष्प उसी समय अत्यन्त धन लेकर चमत्कारपुर की ओर चला गया।

श्लोक 25 (skanda.6.160.25)

पुत्रेभ्योऽपि यथासंख्यं दत्त्वा चैव पृथक्पृथक् ॥ प्रासादं कारयामास तस्य सूर्यस्य शोभनम्

putrebhyo'pi yathāsaṁkhyaṁ dattvā caiva pṛthakpṛthak prāsādaṁ kārayāmāsa tasya sūryasya śobhanam

अपने पुत्रों को भी यथासंख्य अलग-अलग धन देकर, उसने उस सूर्य का एक सुन्दर मन्दिर बनवाया —

श्लोक 26 (skanda.6.160.26)

यस्मिन्सिद्धिं गतः सोऽत्र याज्ञवल्क्यप्रतिष्ठिते ॥ ततो मध्यममाहूय प्रणिपत्याभिवाद्य च ॥ सोऽब्रवीद्ब्राह्मणानां मे चातुश्चरणमानय

yasminsiddhiṁ gataḥ so'tra yājñavalkyapratiṣṭhite tato madhyamamāhūya praṇipatyābhivādya ca so'bravīdbrāhmaṇānāṁ me cātuścaraṇamānaya

— जिसमें, याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिष्ठित होकर, उसे स्वयं सिद्धि प्राप्त हुई थी। फिर मध्यम पुत्र को बुलाकर, प्रणाम कर, अभिवादन कर, उसने कहा — "मेरे लिए चार वेदों में पारंगत ब्राह्मणों को ले आओ,

श्लोक 27 (skanda.6.160.27)

येनाहमग्रतो भूत्वा प्रायश्चित्तं विशुद्धये ॥ पुरश्चरणसंज्ञं तु प्रार्थयामि यथाविधि

yenāhamagrato bhūtvā prāyaścittaṁ viśuddhaye puraścaraṇasaṁjñaṁ tu prārthayāmi yathāvidhi

— जिससे मैं आगे बढ़कर, शुद्धि के लिए वह प्रायश्चित्त — जिसे पुरश्चरण कहते हैं — विधिपूर्वक कर सकूँ।"

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