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नागर खण्ड · अध्याय 161

पुष्पादित्यमाहात्म्यवर्णन

अध्याय 160अध्याय-सूचीअध्याय 162

श्लोक 1 (skanda.6.161.1)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ अथ तेन द्विजाः सर्वे ब्रह्मस्थाने निवेशिताः ॥ चातुश्चरणसंज्ञाश्च ततस्तस्य निवेशिताः

sūta uvāca atha tena dvijāḥ sarve brahmasthāne niveśitāḥ cātuścaraṇasaṁjñāśca tatastasya niveśitāḥ

सूत जी ने कहा — तत्पश्चात् उसके द्वारा सभी द्विज ब्रह्मस्थान में बिठाए गए, और फिर उसके लिए चतुष्पद (गौएँ) भी समर्पित किए गए।

श्लोक 2 (skanda.6.161.2)

सोऽपि केशान्परित्यज्य सर्वगात्रसमुद्भवान् ॥ निजपत्न्या समोपेतः प्रणम्य च द्विजोत्तमान्

so'pi keśānparityajya sarvagātrasamudbhavān nijapatnyā samopetaḥ praṇamya ca dvijottamān

उसने भी अपने सारे शरीर पर उगे केशों का त्याग करके, अपनी पत्नी के साथ श्रेष्ठ द्विजों को प्रणाम किया,

श्लोक 3 (skanda.6.161.3)

कृतांजलिपुटो भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ भास्करस्यास्य विहितः प्रासादोयं मया द्विजाः

kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā vākyametaduvāca ha bhāskarasyāsya vihitaḥ prāsādoyaṁ mayā dvijāḥ

और हाथ जोड़कर उसने यह वचन कहा — हे द्विजो! भास्कर का यह मंदिर मेरे द्वारा बनवाया गया है।

श्लोक 4 (skanda.6.161.4)

पुष्पादित्य इति ख्यातिं प्रयातु भुवनत्रये ॥ ॥ ब्राह्मणा ऊचुः ॥ ॥ न वयं याज्ञवल्क्यस्य कीर्तिं नेष्यामहे क्षयम्

puṣpāditya iti khyātiṁ prayātu bhuvanatraye brāhmaṇā ūcuḥ na vayaṁ yājñavalkyasya kīrtiṁ neṣyāmahe kṣayam

यह तीनों लोकों में 'पुष्पादित्य' नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त हो। ब्राह्मणों ने कहा — हम याज्ञवल्क्य की कीर्ति का क्षय नहीं होने देंगे।

श्लोक 5 (skanda.6.161.5)

प्रायश्चित्तं प्रदास्यामश्चित्तस्य हृदयंगमम् ॥ अन्ये च ब्राह्मणाः प्रोचुः केचिन्मध्यस्थवृत्तयः

prāyaścittaṁ pradāsyāmaścittasya hṛdayaṁgamam anye ca brāhmaṇāḥ procuḥ kecinmadhyasthavṛttayaḥ

हम मन को भाने वाला प्रायश्चित्त प्रदान करेंगे — इस प्रकार मध्यस्थ वृत्ति रखने वाले कुछ अन्य ब्राह्मणों ने भी कहा।

श्लोक 6 (skanda.6.161.6)

वृत्त्यर्थमस्य देवस्य लक्षं होमेऽत्र कल्प्यताम् ॥ लक्षं तु सर्वविप्राणां प्रायश्चित्तविशुद्धये

vṛttyarthamasya devasya lakṣaṁ home'tra kalpyatām lakṣaṁ tu sarvaviprāṇāṁ prāyaścittaviśuddhaye

इस देवता के निर्वाह हेतु यहाँ एक लाख आहुतियों का होम किया जाए, तथा सभी विप्रों की प्रायश्चित्त-शुद्धि हेतु भी एक लाख आहुतियाँ की जाएँ।

श्लोक 7 (skanda.6.161.7)

॥ पुष्प उवाच ॥ ॥ तस्मात्सर्वे द्विजश्रेष्ठा मन्नाम्ना कीर्तयंत्विमम् ॥ पुष्पादित्यमिति ख्यातिं कीर्तयंतु तथानिशम्

puṣpa uvāca tasmātsarve dvijaśreṣṭhā mannāmnā kīrtayaṁtvimam puṣpādityamiti khyātiṁ kīrtayaṁtu tathāniśam

पुष्प ने कहा — इसलिए हे द्विजश्रेष्ठो! आप सब मेरे नाम से इनका कीर्तन करें, और सदा 'पुष्पादित्य' इस प्रसिद्धि का उच्चारण करते रहें।

श्लोक 8 (skanda.6.161.8)

अनया भार्यया मह्यं मान्या या स्थापिता पुरा ॥ दुर्गाऽस्याश्चात्र नाम्ना वै भूयात्ख्याताऽत्र सत्पुरे

anayā bhāryayā mahyaṁ mānyā yā sthāpitā purā durgā'syāścātra nāmnā vai bhūyātkhyātā'tra satpure

मेरी इस पत्नी के द्वारा, जो पूर्वकाल में मान्या रूप में यहाँ स्थापित की गई थी — यहाँ इस पुण्य नगरी में उसका नाम 'दुर्गा' के रूप में प्रसिद्ध हो।

श्लोक 9 (skanda.6.161.9)

॥ ब्राह्मणा ऊचुः ॥ ॥ दुःशीलेन पुराऽकारि प्रासादो हरसंभवः ॥ दुर्वासःस्थापितस्यापि भवद्भिस्तुष्ट मानसैः

brāhmaṇā ūcuḥ duḥśīlena purā'kāri prāsādo harasaṁbhavaḥ durvāsaḥsthāpitasyāpi bhavadbhistuṣṭa mānasaiḥ

ब्राह्मणों ने कहा — पूर्वकाल में दुःशील के द्वारा हरसंभव (शिव से उत्पन्न) मंदिर बनवाया गया था, तथा दुर्वासा द्वारा स्थापित मंदिर को भी आपने संतुष्ट मन से स्वीकार किया था।

श्लोक 10 (skanda.6.161.10)

तथाप्यस्य तु दीनस्य प्रासादः क्रियतां द्विजाः

tathāpyasya tu dīnasya prāsādaḥ kriyatāṁ dvijāḥ

तथापि हे द्विजो! इस दीन पुरुष के मंदिर को भी स्वीकृति दी जाए।

श्लोक 11 (skanda.6.161.11)

नाममात्रेण देवस्य दुःशीलेन यया पुरा ॥ अनेनाराधितः पूर्वं स्वमांसैरेष भास्करः

nāmamātreṇa devasya duḥśīlena yayā purā anenārādhitaḥ pūrvaṁ svamāṁsaireṣa bhāskaraḥ

जैसे पूर्वकाल में दुःशील के द्वारा केवल नाममात्र से देवता की आराधना हुई थी, वैसे ही इसने भी पहले अपने ही मांस से इस भास्कर की आराधना की थी।

श्लोक 12 (skanda.6.161.12)

तस्मान्न क्षतिरस्याथ दत्ते नाम्नि यथा पुरा ॥ नाम्ना माहिकया नाम माहीत्येव च सा भवेत्

tasmānna kṣatirasyātha datte nāmni yathā purā nāmnā māhikayā nāma māhītyeva ca sā bhavet

इसलिए पूर्ववत् नाम देने में कोई हानि नहीं है; और माहिका नाम से वह देवी 'माही' इस नाम से प्रसिद्ध हो।

श्लोक 13 (skanda.6.161.13)

॥ सूत उवाच ॥ पुष्पेण दाने दत्तेऽथ संमतेनाग्रजन्मनाम् ॥ मध्यमेन कृतं नाम पुष्पादित्य इति श्रुतम्

sūta uvāca puṣpeṇa dāne datte'tha saṁmatenāgrajanmanām madhyamena kṛtaṁ nāma puṣpāditya iti śrutam

सूत जी ने कहा — इस प्रकार पुष्प द्वारा दान दिए जाने पर और द्विजों की सम्मति से, मध्यस्थ के द्वारा किया गया 'पुष्पादित्य' नाम सुना जाता है।

श्लोक 14 (skanda.6.161.14)

तत्पत्न्या चापि या तत्र दुर्गा देवी द्विजोत्तमाः ॥ नाम्ना माहिकया नाम माहीत्येव च साऽभवत्

tatpatnyā cāpi yā tatra durgā devī dvijottamāḥ nāmnā māhikayā nāma māhītyeva ca sā'bhavat

हे द्विजोत्तमो! उसकी पत्नी भी, जो वहाँ दुर्गा देवी थी, माहिका नाम से अर्थात् 'माही' इस नाम से प्रसिद्ध हुई।

श्लोक 15 (skanda.6.161.15)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोस्मि द्विजोत्तमाः ॥ पुष्पा दित्यो यथा जातो याज्ञवल्क्यप्रतिष्ठितः

sūta uvāca etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭosmi dvijottamāḥ puṣpā dityo yathā jāto yājñavalkyapratiṣṭhitaḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो! जो आपने पूछा था, वह सब मैंने आपको बता दिया — किस प्रकार याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिष्ठित पुष्पादित्य उत्पन्न हुए।

श्लोक 16 (skanda.6.161.16)

अद्यापि कलिकाले स दृष्टो भक्त्या सुरेश्वरः ॥ नाशयेद्दिनजं पापं नराणां नात्र संशयः

adyāpi kalikāle sa dṛṣṭo bhaktyā sureśvaraḥ nāśayeddinajaṁ pāpaṁ narāṇāṁ nātra saṁśayaḥ

आज भी इस कलिकाल में वे देवेश्वर भक्तिपूर्वक दर्शन करने से मनुष्यों के दिनकृत पाप का नाश करते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 17 (skanda.6.161.17)

तथा च सप्तमीयुक्ते रवेर्वारे द्विजोत्तमाः ॥ अष्टोत्तरशतंयावत्फलहस्तः करोति यः ॥ प्रदक्षिणां च सद्भक्त्या स लभेद्वांछितं फलम्

tathā ca saptamīyukte ravervāre dvijottamāḥ aṣṭottaraśataṁyāvatphalahastaḥ karoti yaḥ pradakṣiṇāṁ ca sadbhaktyā sa labhedvāṁchitaṁ phalam

हे द्विजोत्तमो! इसी प्रकार सप्तमी से युक्त रविवार को जो पुरुष हाथ में फल लेकर एक सौ आठ बार प्रदक्षिणा सद्भक्ति से करता है, वह अभीष्ट फल प्राप्त करता है।

श्लोक 18 (skanda.6.161.18)

माहीकामपि यो दुर्गां नित्यमेव प्रपश्यति ॥ न स पश्यति कष्टानि तस्मिन्नहनि कर्हिचित्

māhīkāmapi yo durgāṁ nityameva prapaśyati na sa paśyati kaṣṭāni tasminnahani karhicit

जो मनुष्य नित्य ही देवी माहिका दुर्गा के दर्शन करता है, वह उस दिन कभी भी कष्टों को नहीं देखता।

श्लोक 19 (skanda.6.161.19)

चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां यस्तां पूजयते नरः । तस्य संवत्सरंयावन्नापत्संजायते क्वचित्

caitraśuklacaturdaśyāṁ yastāṁ pūjayate naraḥ tasya saṁvatsaraṁyāvannāpatsaṁjāyate kvacit

जो मनुष्य चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को उनकी पूजा करता है, उसे एक वर्षपर्यंत कहीं भी कोई आपत्ति नहीं आती।

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