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नागर खण्ड · अध्याय 162

पुरश्चरणसप्तमीव्रतविधानवर्णन

अध्याय 161अध्याय-सूचीअध्याय 163

श्लोक 1 (skanda.6.162.1)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवं नाम्नि कृते तस्य भास्करस्यांशुमालिनः ॥ द्विजानां पुरतः पुष्पः कथयामास चेष्टितम्

sūta uvāca evaṁ nāmni kṛte tasya bhāskarasyāṁśumālinaḥ dvijānāṁ purataḥ puṣpaḥ kathayāmāsa ceṣṭitam

सूत जी ने कहा — इस प्रकार उस अंशुमाली भास्कर का नाम रखे जाने पर, पुष्प ने द्विजों के समक्ष अपना वृत्तांत कहा।

श्लोक 2 (skanda.6.162.2)

आत्मीयं कुत्सितं तेषां मणिभद्रवधो यथा ॥ विहितो विहिता पत्नी तस्य व्याजेन कृत्स्नशः

ātmīyaṁ kutsitaṁ teṣāṁ maṇibhadravadho yathā vihito vihitā patnī tasya vyājena kṛtsnaśaḥ

अपने उस निंदनीय कृत्य को — जिस प्रकार मणिभद्र का वध किया गया था और छल के द्वारा उसकी पत्नी को पूर्णतः स्थापित किया गया था।

श्लोक 3 (skanda.6.162.3)

ततस्ते ब्राह्मणाः प्रोचुस्तच्छ्रुत्वा कोपसंयुताः ॥ सीत्कारान्प्रचुरान्कृत्वा धिक्त्वां पाप प्रगम्यताम्

tataste brāhmaṇāḥ procustacchrutvā kopasaṁyutāḥ sītkārānpracurānkṛtvā dhiktvāṁ pāpa pragamyatām

तब वे ब्राह्मण यह सुनकर क्रोध से भर गये और अनेक धिक्कार-ध्वनियाँ करते हुए बोले — धिक्कार है तुझ पापी को! दूर हट जा।

श्लोक 4 (skanda.6.162.4)

आत्मीयं हेम चादाय न ते शुद्धिर्भविष्यति

ātmīyaṁ hema cādāya na te śuddhirbhaviṣyati

अपना स्वर्ण भी लेकर आने पर भी तेरी शुद्धि नहीं होगी।

श्लोक 5 (skanda.6.162.5)

ब्रह्मघ्नस्त्वं यतः प्रोक्तास्त्रयो वर्णा द्विजोत्तमाः ॥ ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः स्मृतिशास्त्रप्रपाठकैः

brahmaghnastvaṁ yataḥ proktāstrayo varṇā dvijottamāḥ brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ smṛtiśāstraprapāṭhakaiḥ

क्योंकि तू ब्रह्मघाती है, इसलिए कि स्मृतिशास्त्र के प्रवक्ताओं ने तीनों वर्णों — ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — को 'द्विजोत्तम' कहा है।

श्लोक 6 (skanda.6.162.6)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ ततस्तु दुःखितः पुष्पो बाष्पसंपूरितेक्षणः ॥ ब्रह्मस्थानाद्विनिर्गत्य प्ररुरोद सुदुःखितः

sūta uvāca tatastu duḥkhitaḥ puṣpo bāṣpasaṁpūritekṣaṇaḥ brahmasthānādvinirgatya praruroda suduḥkhitaḥ

सूत जी ने कहा — तब दुःखी पुष्प, जिसके नेत्र अश्रुओं से भर गये थे, ब्रह्मस्थान से बाहर निकलकर अत्यंत दुःखी होकर रोने लगा।

श्लोक 7 (skanda.6.162.7)

रोरूयमाणमालोक्य ततस्ते नागरा द्विजाः ॥ दयां च महतीं कृत्वा ततः प्रोचुः परस्परम्

rorūyamāṇamālokya tataste nāgarā dvijāḥ dayāṁ ca mahatīṁ kṛtvā tataḥ procuḥ parasparam

तब उसे इस प्रकार विलाप करते देखकर उन नागर ब्राह्मणों ने अत्यंत दया करके आपस में कहा —

श्लोक 8 (skanda.6.162.8)

नानाविधानि शास्त्राणि स्मृतयश्च पृथग्विधाः ॥ पुराणानि समस्तानि वीक्षध्वं सुसमाहिताः

nānāvidhāni śāstrāṇi smṛtayaśca pṛthagvidhāḥ purāṇāni samastāni vīkṣadhvaṁ susamāhitāḥ

विविध शास्त्रों को, अनेक प्रकार की स्मृतियों को तथा समस्त पुराणों को भली-भाँति एकाग्रचित्त होकर देखो।

श्लोक 9 (skanda.6.162.9)

कुत्रचित्क्वचिदेवास्य कथंचिच्छुद्धिरस्ति चेत् ॥ न तच्च विद्यते शास्त्रमस्मिन्स्थाने न चास्ति यत्

kutracitkvacidevāsya kathaṁcicchuddhirasti cet na tacca vidyate śāstramasminsthāne na cāsti yat

यदि किसी भी प्रकार से, कहीं भी, इसकी कुछ शुद्धि सम्भव है, तो वह अवश्य मिलेगी — क्योंकि ऐसा कोई शास्त्र नहीं है जो यहाँ इस स्थान में उपलब्ध न हो।

श्लोक 10 (skanda.6.162.10)

न स्मृतिर्न पुराणं च वेदांतं वा द्विजोत्तमाः ॥ न चास्ति ब्राह्मणः सोऽत्र सर्वज्ञप्रतिमो न यः

na smṛtirna purāṇaṁ ca vedāṁtaṁ vā dvijottamāḥ na cāsti brāhmaṇaḥ so'tra sarvajñapratimo na yaḥ

हे द्विजोत्तमो! यहाँ ऐसी कोई स्मृति, पुराण या वेदान्त नहीं जो उपलब्ध न हो, और यहाँ ऐसा कोई ब्राह्मण नहीं जो सर्वज्ञ के समान न हो।

श्लोक 11 (skanda.6.162.11)

तस्माच्चिन्तयत क्षिप्रमस्य शुद्धिप्रदं हि यत् ॥ तच्च प्रमाणतां नीत्वा शुद्धिरस्य प्रदीयते

tasmāccintayata kṣipramasya śuddhipradaṁ hi yat tacca pramāṇatāṁ nītvā śuddhirasya pradīyate

इसलिए शीघ्र विचार करो कि इसे शुद्धि प्रदान करने वाला उपाय क्या है, और उसे प्रमाणपूर्वक निश्चित करके इसे शुद्धि प्रदान करो।

श्लोक 12 (skanda.6.162.12)

अथैको ब्राह्मणः प्राह चंडशर्मेति विश्रुतः ॥ मया स्कांदपुराणेऽस्मिन्पुरश्चरणसंश्रिता

athaiko brāhmaṇaḥ prāha caṁḍaśarmeti viśrutaḥ mayā skāṁdapurāṇe'sminpuraścaraṇasaṁśritā

तब चण्डशर्मा नाम से विख्यात एक ब्राह्मण ने कहा — मैंने इसी स्कन्दपुराण में पुरश्चरण से सम्बन्धित एक सप्तमी के विषय में पढ़ा है।

श्लोक 13 (skanda.6.162.13)

पठिता सप्तमी या च पुरश्चरणसंज्ञिता ॥ पुरश्चरणतः पापं विहितं तु यथा व्रजेत्

paṭhitā saptamī yā ca puraścaraṇasaṁjñitā puraścaraṇataḥ pāpaṁ vihitaṁ tu yathā vrajet

अर्थात् पुरश्चरण नाम से प्रसिद्ध वह सप्तमी, जिसके द्वारा किया गया पाप पुरश्चरण से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 14 (skanda.6.162.14)

सम्यक्तथापि विप्रेंद्रास्ततो याति न संशयः ॥ तस्मात्करोतु तामेष पुरश्चरणसप्तमीम्

samyaktathāpi vipreṁdrāstato yāti na saṁśayaḥ tasmātkarotu tāmeṣa puraścaraṇasaptamīm

हे विप्रेंद्रो! उससे वह पूर्णतः नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं। अतः यह इस पुरश्चरण सप्तमी का व्रत करे।

श्लोक 15 (skanda.6.162.15)

अपरं भूभुजादेशान्मणिभद्रो निपातितः ॥ वधकैस्तस्य तत्पापं यदि पापं प्रजायते

aparaṁ bhūbhujādeśānmaṇibhadro nipātitaḥ vadhakaistasya tatpāpaṁ yadi pāpaṁ prajāyate

इसके अतिरिक्त, राजा की आज्ञा से मणिभद्र को मारा गया; उसके वध में यदि कोई पाप उत्पन्न होता है, तो वह मारने वालों का पाप है।

श्लोक 16 (skanda.6.162.16)

राजा भूत्वा न यः सम्यग्विचारयति वादिनम् ॥ तस्य तत्पातकं घोरं राज्ञश्चैव प्रजायते

rājā bhūtvā na yaḥ samyagvicārayati vādinam tasya tatpātakaṁ ghoraṁ rājñaścaiva prajāyate

और जो राजा होकर वादी का ठीक से विचार नहीं करता, वह भयंकर पाप स्वयं राजा को ही लगता है।

श्लोक 17 (skanda.6.162.17)

तथास्य पत्न्यास्तत्पापं जानंत्या यत्तयोदितम् ॥ मत्पित्रा ब्राह्मणैर्दत्तोऽयं पुरा वह्निसंनिधौ

tathāsya patnyāstatpāpaṁ jānaṁtyā yattayoditam matpitrā brāhmaṇairdatto'yaṁ purā vahnisaṁnidhau

इसी प्रकार यह पाप उसकी पत्नी का भी है, जिसने यह जानते हुए भी कहा था कि मेरे पिता द्वारा यह पूर्वकाल में अग्नि की साक्षी में ब्राह्मणों को दिया गया था।

श्लोक 18 (skanda.6.162.18)

विडंबितेन चानेन कृतप्रतिकृतं कृतम् ॥ तस्मान्न चास्य दोषः स्याद्यतः प्रोक्तं मुनीश्वरैः

viḍaṁbitena cānena kṛtapratikṛtaṁ kṛtam tasmānna cāsya doṣaḥ syādyataḥ proktaṁ munīśvaraiḥ

और इस छले गये व्यक्ति ने तो केवल किए गए का प्रत्युत्तर ही दिया है, अतः इसमें इसका कोई दोष नहीं है, क्योंकि मुनीश्वरों ने कहा है —

श्लोक 19 (skanda.6.162.19)

कृते प्रतिकृतं कुर्याद्धिंसने प्रतिहिंसनम् ॥ न तत्र जायते दोषो यो दुष्टे दुष्टमाचरेत्

kṛte pratikṛtaṁ kuryāddhiṁsane pratihiṁsanam na tatra jāyate doṣo yo duṣṭe duṣṭamācaret

जो किया गया है उसका प्रत्युत्तर देना चाहिए, हिंसा का प्रतिहिंसा से उत्तर देना चाहिए; जो दुष्ट के प्रति दुष्टता करता है, उसे कोई दोष नहीं लगता।

श्लोक 20 (skanda.6.162.20)

॥ ब्राह्मणा ऊचुः ॥ ॥ यद्येवं वद विप्रास्य पुरश्चरणसंज्ञिताम् ॥ सप्तमीमद्य विप्रेंद्र वराकस्य विशुद्धये

brāhmaṇā ūcuḥ yadyevaṁ vada viprāsya puraścaraṇasaṁjñitām saptamīmadya vipreṁdra varākasya viśuddhaye

ब्राह्मणों ने कहा — यदि ऐसा है, तो हे विप्र! आज इस दीन के शुद्धिकरण के लिए, हे विप्रेंद्र! पुरश्चरण नामक उस सप्तमी को बताइये।

श्लोक 21 (skanda.6.162.21)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ अथास्य कथयामास सप्तमीं तां द्विजोत्तमाः ॥ चंडशर्माभिधानस्तु कृत्वा तस्योपरि कृपाम्

sūta uvāca athāsya kathayāmāsa saptamīṁ tāṁ dvijottamāḥ caṁḍaśarmābhidhānastu kṛtvā tasyopari kṛpām

सूत जी ने कहा — तब हे द्विजोत्तमो! चण्डशर्मा नामक उस ब्राह्मण ने उस पर कृपा करके उसे वह सप्तमी-व्रत बताया।

श्लोक 22 (skanda.6.162.22)

तेनापि विहिता सम्यग्यथा तस्य मुखाच्छ्रुता ॥ ततः संवत्सरस्यांते विपाप्मा समपद्यत

tenāpi vihitā samyagyathā tasya mukhācchrutā tataḥ saṁvatsarasyāṁte vipāpmā samapadyata

उसने भी उसके मुख से सुने अनुसार भली-भाँति उसका पालन किया; तत्पश्चात् एक वर्ष के अंत में वह पापरहित हो गया।

श्लोक 23 (skanda.6.162.23)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ पुरश्चरणसंज्ञां तु सप्तमीं वद सूतज ॥ विधिना केन कर्तव्या कस्मिन्काल उपस्थिते

ṛṣaya ūcuḥ puraścaraṇasaṁjñāṁ tu saptamīṁ vada sūtaja vidhinā kena kartavyā kasminkāla upasthite

ऋषियों ने कहा — हे सूतपुत्र! पुरश्चरण नामक उस सप्तमी को बताइये — किस विधि से और किस काल में इसे करना चाहिए।

श्लोक 24 (skanda.6.162.24)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ अहं वः कीर्तयिष्यामि रोहिताश्वस्य भूपतेः ॥ मार्कंडेन पुरा प्रोक्ता पृच्छ्यमानेन भक्तितः

sūta uvāca ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi rohitāśvasya bhūpateḥ mārkaṁḍena purā proktā pṛcchyamānena bhaktitaḥ

सूत जी ने कहा — मैं आपको वह बताऊँगा जो पूर्वकाल में मार्कण्ड ने राजा रोहिताश्व के द्वारा भक्तिपूर्वक पूछे जाने पर उनसे कहा था।

श्लोक 25 (skanda.6.162.25)

सप्तकल्पस्मरो विप्रा मार्कंडाख्यो महामुनिः ॥ रोहिताश्वेन पृष्टः स हरिश्चंद्रात्मजेन च

saptakalpasmaro viprā mārkaṁḍākhyo mahāmuniḥ rohitāśvena pṛṣṭaḥ sa hariścaṁdrātmajena ca

हे विप्रो! सात कल्पों का स्मरण रखने वाले मार्कण्ड नामक महामुनि से हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहिताश्व ने प्रश्न पूछा।

श्लोक 26 (skanda.6.162.26)

॥ रोहिताश्व उवाच ॥ ॥ अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि यत्पापं कुरुते नरः ॥ उपायं तस्य नाशाय किंचिन्मे वद सन्मुने

rohitāśva uvāca ajñānājjñānato vāpi yatpāpaṁ kurute naraḥ upāyaṁ tasya nāśāya kiṁcinme vada sanmune

रोहिताश्व ने कहा — हे सन्मुने! मनुष्य अज्ञानवश या जानबूझकर जो भी पाप करता है, उसके नाश का कोई उपाय मुझे बताइये।

श्लोक 27 (skanda.6.162.27)

॥ मार्कंडेय उवाच ॥ ॥ मानसं वाचिकं चैव कायिकं च तृतीयकम् ॥ त्रिविधं पातकं लोके नराणामिह जायते

mārkaṁḍeya uvāca mānasaṁ vācikaṁ caiva kāyikaṁ ca tṛtīyakam trividhaṁ pātakaṁ loke narāṇāmiha jāyate

मार्कण्डेय ने कहा — मानसिक, वाचिक और तीसरा कायिक — इस प्रकार मनुष्यों का पाप इस लोक में तीन प्रकार का होता है।

श्लोक 28 (skanda.6.162.28)

तत्रोपाया विनाशाय तस्य संपरिकीर्तिताः ॥ तानहं ते प्रवक्ष्यामि शृणुष्व नृपसत्तम

tatropāyā vināśāya tasya saṁparikīrtitāḥ tānahaṁ te pravakṣyāmi śṛṇuṣva nṛpasattama

उसके नाश के लिए उपाय भली-भाँति बताए गये हैं; मैं तुम्हें वे बताऊँगा, हे नृपसत्तम! सुनो।

श्लोक 29 (skanda.6.162.29)

मानसं चैव यत्पापं नराणामिह जायते ॥ पश्चात्तापे कृते तस्य तत्क्षणादेव नश्यति

mānasaṁ caiva yatpāpaṁ narāṇāmiha jāyate paścāttāpe kṛte tasya tatkṣaṇādeva naśyati

मनुष्यों को जो भी मानसिक पाप होता है, पश्चाताप करने पर वह उसी क्षण नष्ट हो जाता है।

श्लोक 30 (skanda.6.162.30)

वाचिकं चैव यत्पापं नाभुक्त्वा तत्प्रणश्यति ॥ पुरश्चरणबाह्यं तु सत्यमेतन्मयोदितम्

vācikaṁ caiva yatpāpaṁ nābhuktvā tatpraṇaśyati puraścaraṇabāhyaṁ tu satyametanmayoditam

किन्तु वाचिक पाप पुरश्चरण के बिना बिना भोगे नष्ट नहीं होता; यह सत्य मैंने कहा है।

श्लोक 31 (skanda.6.162.31)

निवेद्य ब्राह्मणेंद्राणां तदुक्तं च समाचरेत् ॥ प्रायश्चित्तं यथोक्तं तु ततः शुद्धिमवाप्नुयात्

nivedya brāhmaṇeṁdrāṇāṁ taduktaṁ ca samācaret prāyaścittaṁ yathoktaṁ tu tataḥ śuddhimavāpnuyāt

श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बताकर, उनके कहे अनुसार आचरण करना चाहिए; तदनुसार बताया गया प्रायश्चित्त करने से शुद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 32 (skanda.6.162.32)

अथवा पार्थिवो ज्ञात्वा कुरुते तस्य निग्रहम् ॥ तेन शुद्धिमवाप्नोति यद्यपि स्यात्स किल्विषी

athavā pārthivo jñātvā kurute tasya nigraham tena śuddhimavāpnoti yadyapi syātsa kilviṣī

अथवा यदि राजा जानकर उसे दण्डित करता है, तो उससे भी वह शुद्धि प्राप्त कर लेता है, भले ही वह पापी क्यों न हो।

श्लोक 33 (skanda.6.162.33)

लज्जया ब्राह्मणेंद्राणां यो न ब्रूते कथंचन ॥ न च राजा विजानाति शरीरस्थेन यो म्रियेत् ॥ तस्य निग्रहकर्ता च स्वयं वैवस्वतो यमः

lajjayā brāhmaṇeṁdrāṇāṁ yo na brūte kathaṁcana na ca rājā vijānāti śarīrasthena yo mriyet tasya nigrahakartā ca svayaṁ vaivasvato yamaḥ

जो लज्जावश श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कुछ भी नहीं कहता, और राजा भी जिसे नहीं जानता, तथा जो उसे शरीर में लिए हुए ही मर जाता है — उसका दण्डदाता स्वयं वैवस्वत यम होते हैं।

श्लोक 34 (skanda.6.162.34)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कृत्वा पापं विजानता ॥ प्रायश्चित्तं तु कर्तव्यं यथोक्तं ब्राह्मणोदितम्

tasmātsarvaprayatnena kṛtvā pāpaṁ vijānatā prāyaścittaṁ tu kartavyaṁ yathoktaṁ brāhmaṇoditam

अतः जो जानते हुए पाप करता है, उसे पूर्ण प्रयत्न के साथ ब्राह्मणों द्वारा बताया गया प्रायश्चित्त अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 35 (skanda.6.162.35)

॥ रोहिताश्व उवाच ॥ ॥ सर्वेषामेव पापानां विहितानां मुनीश्वर ॥ किंचिद्व्रतं समाचक्ष्व दानं वा होममेव वा ॥ विपाप्मा जायते येन पुरश्चरणवर्जितम्

rohitāśva uvāca sarveṣāmeva pāpānāṁ vihitānāṁ munīśvara kiṁcidvrataṁ samācakṣva dānaṁ vā homameva vā vipāpmā jāyate yena puraścaraṇavarjitam

रोहिताश्व ने कहा — हे मुनीश्वर! समस्त किए गए पापों के लिए कोई ऐसा व्रत, दान अथवा होम बताइये, जिससे पुरश्चरण के बिना भी मनुष्य पापरहित हो जाए।

श्लोक 36 (skanda.6.162.36)

नित्यं पापानि कुरुते नरः सूक्ष्माणि सर्वतः ॥ प्रायश्चित्तानि सर्वेषां कर्तुं शक्तिः कथं भवेत्

nityaṁ pāpāni kurute naraḥ sūkṣmāṇi sarvataḥ prāyaścittāni sarveṣāṁ kartuṁ śaktiḥ kathaṁ bhavet

मनुष्य प्रतिदिन सब प्रकार के सूक्ष्म पाप करता ही रहता है; उन सबका प्रायश्चित्त करने की सामर्थ्य कैसे हो सकती है?

श्लोक 37 (skanda.6.162.37)

॥ मार्कंडेय उवाच ॥ ॥ अस्ति राजन्व्रतं पुण्यं पुरश्चरणसंज्ञितम् ॥ पुरश्चरणसंज्ञा तु सप्तमी सूर्यवल्लभा

mārkaṁḍeya uvāca asti rājanvrataṁ puṇyaṁ puraścaraṇasaṁjñitam puraścaraṇasaṁjñā tu saptamī sūryavallabhā

मार्कण्डेय ने कहा — हे राजन्! पुरश्चरण नामक एक पुण्य व्रत है; यह पुरश्चरण संज्ञा सूर्य को प्रिय उस सप्तमी की है।

श्लोक 38 (skanda.6.162.38)

यया संचीर्णया राजन्कायस्थो यमसंभवः ॥ विचित्रो मार्जयेत्पापं कृतं जन्मनि संचितम्

yayā saṁcīrṇayā rājankāyastho yamasaṁbhavaḥ vicitro mārjayetpāpaṁ kṛtaṁ janmani saṁcitam

हे राजन्! जिसका आचरण करने से यम से उत्पन्न, शरीर में स्थित रहने वाला वह विचित्र (चित्रगुप्त) जन्मभर संचित किए गए पाप को मिटा देता है।

श्लोक 39 (skanda.6.162.39)

तस्मात्कुरु महाराज तथाशु वचनं मम ॥ येन वा मुच्यते पापात्सर्वस्मात्कायसंभवात्

tasmātkuru mahārāja tathāśu vacanaṁ mama yena vā mucyate pāpātsarvasmātkāyasaṁbhavāt

अतः हे महाराज! शीघ्र मेरे वचन का पालन करो, जिससे शरीर से उत्पन्न समस्त पाप से मुक्ति मिलती है।

श्लोक 40 (skanda.6.162.40)

॥ रोहिताश्व उवाच ॥ ॥ पुरश्चरणसंज्ञा तु सप्तमी मुनिसत्तम ॥ विधिना केन कर्तव्या कस्मिन्काले वद स्व मे

rohitāśva uvāca puraścaraṇasaṁjñā tu saptamī munisattama vidhinā kena kartavyā kasminkāle vada sva me

रोहिताश्व ने कहा — हे मुनिसत्तम! पुरश्चरण नामक वह सप्तमी किस विधि से और किस काल में करनी चाहिए, मुझे बताइये।

श्लोक 41 (skanda.6.162.41)

॥ मार्कंडेय उवाच ॥ ॥ माघमासे सिते पक्षे मकरस्थे दिवाकरे ॥ सूर्यवारेण सप्तम्यां व्रतमेतत्समाचरेत्

mārkaṁḍeya uvāca māghamāse site pakṣe makarasthe divākare sūryavāreṇa saptamyāṁ vratametatsamācaret

मार्कण्डेय ने कहा — माघ मास के शुक्ल पक्ष में, जब सूर्य मकर राशि में हो, रविवार से युक्त सप्तमी को यह व्रत करना चाहिए।

श्लोक 42 (skanda.6.162.42)

पाखंडैः पतितैः सार्धं तस्मिन्नहनि नालपेत् ॥ भक्षयित्वा नृपश्रेष्ठ प्रभाते दन्तधावनम् ॥ मंत्रेणानेन पश्चाच्च कर्तव्यो नियमो नृप

pākhaṁḍaiḥ patitaiḥ sārdhaṁ tasminnahani nālapet bhakṣayitvā nṛpaśreṣṭha prabhāte dantadhāvanam maṁtreṇānena paścācca kartavyo niyamo nṛpa

उस दिन पाखण्डियों और पतितों के साथ बातचीत न करे; हे नृपश्रेष्ठ! प्रातःकाल दन्तधावन के पश्चात्, हे राजन्! इस मंत्र के साथ नियम का पालन करना चाहिए।

श्लोक 43 (skanda.6.162.43)

पुरश्चरणकृत्यायां सप्तम्यां दिवसाधिप ॥ उपवासं करिष्यामि अद्य त्वं शरणं मम

puraścaraṇakṛtyāyāṁ saptamyāṁ divasādhipa upavāsaṁ kariṣyāmi adya tvaṁ śaraṇaṁ mama

हे दिवसाधिप! पुरश्चरण-कृत्य की इस सप्तमी को मैं उपवास करूँगा; आज आप ही मेरी शरण हैं।

श्लोक 44 (skanda.6.162.44)

ततोऽपराह्णसमये स्नात्वा धौतांबरः शुचिः ॥ प्रतिमां पूजयेद्भक्त्या दिनाधिपसमुद्भवाम्

tato'parāhṇasamaye snātvā dhautāṁbaraḥ śuciḥ pratimāṁ pūjayedbhaktyā dinādhipasamudbhavām

तत्पश्चात् अपराह्न-काल में स्नान करके, धुले हुए वस्त्र पहनकर, शुद्ध होकर, दिनाधिप की प्रतिमा की भक्तिपूर्वक पूजा करे।

श्लोक 45 (skanda.6.162.45)

रक्तैः पुष्पैर्महावीर पादाद्यं पूजयेत्ततः ॥ पतंगाय नमः पादौ मार्तंडायेति जानुनी

raktaiḥ puṣpairmahāvīra pādādyaṁ pūjayettataḥ pataṁgāya namaḥ pādau mārtaṁḍāyeti jānunī

हे महावीर! तदनन्तर लाल पुष्पों से चरणादि की पूजा करे — 'पतंगाय नमः' कहकर चरणों की, 'मार्तण्डाय नमः' कहकर घुटनों की;

श्लोक 46 (skanda.6.162.46)

गुह्यं दिवसनाथाय नाभिं द्वादशमूर्तये ॥ बाहू च पद्महस्ताय हृदयं तीक्ष्णदीधिते

guhyaṁ divasanāthāya nābhiṁ dvādaśamūrtaye bāhū ca padmahastāya hṛdayaṁ tīkṣṇadīdhite

'दिवसनाथाय नमः' कहकर गुह्य भाग की, 'द्वादशमूर्तये नमः' कहकर नाभि की, 'पद्महस्ताय नमः' कहकर भुजाओं की, 'तीक्ष्णदीधितये नमः' कहकर हृदय की;

श्लोक 47 (skanda.6.162.47)

कंठं पद्मदलाभाय शिरस्तेजोमयाय च ॥ एवं संपूज्य विधिवद्धूपं कर्पूरमाददेत्

kaṁṭhaṁ padmadalābhāya śirastejomayāya ca evaṁ saṁpūjya vidhivaddhūpaṁ karpūramādadet

'पद्मदलाभाय नमः' कहकर कण्ठ की, तथा 'तेजोमयाय नमः' कहकर शिर की — इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा करके कर्पूर का धूप अर्पित करे।

श्लोक 48 (skanda.6.162.48)

गुडौदनं च नैवेद्यं रक्तवस्त्राभिवेष्टितम् ॥ रक्तसूत्रेण दीपं च तथैवारार्तिकं नृप

guḍaudanaṁ ca naivedyaṁ raktavastrābhiveṣṭitam raktasūtreṇa dīpaṁ ca tathaivārārtikaṁ nṛpa

गुड़ भात का नैवेद्य लाल वस्त्र में लपेटकर, लाल धागे की बत्ती से दीप, तथा हे राजन्! उसी प्रकार आरती भी करे।

श्लोक 49 (skanda.6.162.49)

शंखे तोयं समादाय रक्तचन्दनमिश्रितम् ॥ सफलं च ततः कृत्वा अर्घ्यं दद्यात्ततः परम्

śaṁkhe toyaṁ samādāya raktacandanamiśritam saphalaṁ ca tataḥ kṛtvā arghyaṁ dadyāttataḥ param

शंख में लाल चन्दन मिश्रित जल लेकर, उसमें फल डालकर, तत्पश्चात् अर्घ्य दे।

श्लोक 50 (skanda.6.162.50)

कुकृतं यत्कृतं किंचिदज्ञानाज्ज्ञानतोऽपि वा ॥ प्रायश्चित्तं कृतं देव ममार्घ्यश्च प्रगृह्यताम्

kukṛtaṁ yatkṛtaṁ kiṁcidajñānājjñānato'pi vā prāyaścittaṁ kṛtaṁ deva mamārghyaśca pragṛhyatām

'हे देव! मैंने अज्ञानवश या जानबूझकर जो भी कुकृत्य किया हो, वह मेरा प्रायश्चित्त हो जाए; और मेरा यह अर्घ्य स्वीकार कीजिये।'

श्लोक 51 (skanda.6.162.51)

ततः संपूजयद्विप्रं गन्धपुष्पानुलेपनैः ॥ दत्त्वा तु भोजनं तस्मै दक्षिणां च स्वशक्तितः ॥ प्राशनं कायशुद्ध्यर्थं पञ्चगव्यस्य चाचरेत्

tataḥ saṁpūjayadvipraṁ gandhapuṣpānulepanaiḥ dattvā tu bhojanaṁ tasmai dakṣiṇāṁ ca svaśaktitaḥ prāśanaṁ kāyaśuddhyarthaṁ pañcagavyasya cācaret

तत्पश्चात् गन्ध, पुष्प और अनुलेपन से ब्राह्मण की पूजा करे, उसे भोजन कराकर अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा दे, और शरीर की शुद्धि के लिए पंचगव्य का प्राशन करे।

श्लोक 52 (skanda.6.162.52)

कृतांजलिपुटो भूत्वा समुद्वीक्ष्य दिवाकरम् ॥ दिवाकरं गतश्चैव मन्त्रमेतं समुच्चरेत्

kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā samudvīkṣya divākaram divākaraṁ gataścaiva mantrametaṁ samuccaret

हाथ जोड़कर सूर्य की ओर देखते हुए, तथा सूर्यास्त होने पर, इस मंत्र का उच्चारण करे —

श्लोक 53 (skanda.6.162.53)

इदं व्रतं मया देव गृहीतं पुरतस्तव ॥ अविघ्नं सिद्धिमायातु प्रसादात्तव भास्कर

idaṁ vrataṁ mayā deva gṛhītaṁ puratastava avighnaṁ siddhimāyātu prasādāttava bhāskara

'हे देव! यह व्रत मैंने आपके समक्ष ग्रहण किया है; हे भास्कर! आपकी कृपा से यह निर्विघ्न सिद्धि को प्राप्त हो।'

श्लोक 54 (skanda.6.162.54)

ततश्च फाल्गुने मासि संप्राप्ते मुनिसत्तम ॥ कुन्देन पूजयेद्देवं तेनैव विधिना ततः

tataśca phālgune māsi saṁprāpte munisattama kundena pūjayeddevaṁ tenaiva vidhinā tataḥ

और हे मुनिसत्तम! तत्पश्चात् फाल्गुन मास आने पर, उसी विधि से कुन्द पुष्पों द्वारा देवता की पूजा करे।

श्लोक 55 (skanda.6.162.55)

धूपं च गुग्गुलुं दद्यान्नैवेद्यं भक्तमेव च ॥ प्राशनं गोमयं प्रोक्तं सर्वपापविशुद्धये

dhūpaṁ ca gugguluṁ dadyānnaivedyaṁ bhaktameva ca prāśanaṁ gomayaṁ proktaṁ sarvapāpaviśuddhaye

धूप में गुग्गुल तथा नैवेद्य में भात अर्पित करे; समस्त पापों की शुद्धि के लिए गोमय जल का प्राशन बताया गया है।

श्लोक 56 (skanda.6.162.56)

चैत्रे मासि तु संप्राप्ते सुरभ्या पूज्येद्धरिम् ॥ नैवेद्यं गुणिकाः प्रोक्ता धूपं सर्जरसोद्भवम्

caitre māsi tu saṁprāpte surabhyā pūjyeddharim naivedyaṁ guṇikāḥ proktā dhūpaṁ sarjarasodbhavam

किन्तु चैत्र मास आने पर सुगन्धित पुष्पों से हरि की पूजा करे; नैवेद्य में गुणिका तथा धूप में साल के रस से बना धूप बताया गया है।

श्लोक 57 (skanda.6.162.57)

कुशोदकं च संप्राश्य कायशुद्धिमवाप्नुयात् ॥ वैशाखे किंशुकैः पूजां यथावच्च घृताशनैः

kuśodakaṁ ca saṁprāśya kāyaśuddhimavāpnuyāt vaiśākhe kiṁśukaiḥ pūjāṁ yathāvacca ghṛtāśanaiḥ

कुश-जल का प्राशन करने से शरीर की शुद्धि प्राप्त होती है; वैशाख में किंशुक पुष्पों से तथा घृत में तले पदार्थों से यथाविधि पूजा करे।

श्लोक 58 (skanda.6.162.58)

नैवेद्यं च सुरामांसं धूपं च विनिवेदयेत् ॥ दधिप्राशनमेवात्र कर्तव्यं कायशुद्धये

naivedyaṁ ca surāmāṁsaṁ dhūpaṁ ca vinivedayet dadhiprāśanamevātra kartavyaṁ kāyaśuddhaye

नैवेद्य में सुरा और मांस, तथा धूप निवेदित करे; और यहाँ शरीर-शुद्धि के लिए दधि का प्राशन करना चाहिए।

श्लोक 59 (skanda.6.162.59)

पुष्पपाटलया पूजा विधातव्या रवेर्नृप ॥ नैवेद्ये सक्तवः प्रोक्ताः प्राशनं च घृतं स्मृतम्

puṣpapāṭalayā pūjā vidhātavyā ravernṛpa naivedye saktavaḥ proktāḥ prāśanaṁ ca ghṛtaṁ smṛtam

हे राजन्! पाटला पुष्प से सूर्य की पूजा करनी चाहिए; नैवेद्य में सत्तू बताया गया है, तथा प्राशन में घृत कहा गया है।

श्लोक 60 (skanda.6.162.60)

कपिलाया महावीर सर्वपापविशुद्धये ॥ आषाढे मुनिपुष्पैश्च पूजयेद्भास्करं नृप

kapilāyā mahāvīra sarvapāpaviśuddhaye āṣāḍhe munipuṣpaiśca pūjayedbhāskaraṁ nṛpa

हे महावीर! सम्पूर्ण पापों की शुद्धि के लिए कपिला गाय के दुग्ध का प्राशन करे; हे राजन्! आषाढ़ में मुनिपुष्पों से भास्कर की पूजा करे।

श्लोक 61 (skanda.6.162.61)

नैवेद्ये घारिका प्रोक्ता प्राशनं मधुसर्पिषोः ॥ धूपं चैवागरुं दद्यात्परया श्रद्धया युतः

naivedye ghārikā proktā prāśanaṁ madhusarpiṣoḥ dhūpaṁ caivāgaruṁ dadyātparayā śraddhayā yutaḥ

नैवेद्य में घारिका बतायी गयी है, प्राशन में मधु और घृत, तथा परम श्रद्धायुक्त होकर अगुरु का धूप अर्पित करे।

श्लोक 62 (skanda.6.162.62)

श्रावणे तु कदंबेन पूजनं तीक्ष्णदीधितेः ॥ नैवेद्ये मोदकाश्चैव तगरं धूपमाददेत्

śrāvaṇe tu kadaṁbena pūjanaṁ tīkṣṇadīdhiteḥ naivedye modakāścaiva tagaraṁ dhūpamādadet

श्रावण में कदम्ब पुष्प से तीक्ष्णदीधिति की पूजा करे; नैवेद्य में मोदक तथा धूप में तगर लें।

श्लोक 63 (skanda.6.162.63)

गोशृंगोदकमादाय सद्यः पापात्प्रमुच्यते ॥ जात्या भाद्रपदे पूजा क्षीरनैवेद्यमाददेत्

gośṛṁgodakamādāya sadyaḥ pāpātpramucyate jātyā bhādrapade pūjā kṣīranaivedyamādadet

गोशृंगोदक लेने से मनुष्य तत्काल पाप से मुक्त हो जाता है; भाद्रपद में जाती पुष्प से पूजा करे और नैवेद्य में क्षीर लें।

श्लोक 64 (skanda.6.162.64)

धूपं नखसमुद्भूतं प्राशनं क्षीरमेव च ॥ आश्विने कमलैः पूजा नैवेद्ये घृतपूरिका

dhūpaṁ nakhasamudbhūtaṁ prāśanaṁ kṣīrameva ca āśvine kamalaiḥ pūjā naivedye ghṛtapūrikā

धूप में नख तथा प्राशन में क्षीर लें; आश्विन में कमल पुष्पों से पूजा करे और नैवेद्य में घृतपूरिका अर्पित करे।

श्लोक 65 (skanda.6.162.65)

धूपं कुंकुमजं प्रोक्तं कर्पूरप्राशनं स्मृतम्

dhūpaṁ kuṁkumajaṁ proktaṁ karpūraprāśanaṁ smṛtam

कुंकुम से बना धूप बताया गया है, और कर्पूर का प्राशन कहा गया है।

श्लोक 66 (skanda.6.162.66)

तुलस्या कार्तिके पूजा भास्करस्य प्रकीर्तिता ॥ नैवेद्ये चैव खंडाख्यं धूपं कौसुंभिकं नृप

tulasyā kārtike pūjā bhāskarasya prakīrtitā naivedye caiva khaṁḍākhyaṁ dhūpaṁ kausuṁbhikaṁ nṛpa

कार्तिक में तुलसी से भास्कर की पूजा कही गयी है; नैवेद्य में खण्ड तथा हे राजन्! धूप में कौसुम्भिक लें।

श्लोक 67 (skanda.6.162.67)

प्राशनं च लवंगाख्यं सर्वपापविशोधनम् ॥ भृंगराजेन पूजा च सौम्ये मासि समाचरेत्

prāśanaṁ ca lavaṁgākhyaṁ sarvapāpaviśodhanam bhṛṁgarājena pūjā ca saumye māsi samācaret

और लवंग नामक प्राशन समस्त पापों को शुद्ध करता है; सौम्य मास में भृंगराज पुष्पों से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 68 (skanda.6.162.68)

नैवेद्ये फेणिका देया धूपं गुडसमुद्भवम् ॥ कंकोलप्राशनं चैव भास्करस्य प्रतुष्टये

naivedye pheṇikā deyā dhūpaṁ guḍasamudbhavam kaṁkolaprāśanaṁ caiva bhāskarasya pratuṣṭaye

नैवेद्य में फेणिका देनी चाहिए, धूप गुड़ से बना, तथा भास्कर की पूर्ण प्रसन्नता के लिए कंकोल का प्राशन करे।

श्लोक 69 (skanda.6.162.69)

शतपत्रिकया पूजा पौषे मासि रवेः स्मृता ॥ सहजं धूपमादिष्टं नैवेद्ये शुष्कली तथा

śatapatrikayā pūjā pauṣe māsi raveḥ smṛtā sahajaṁ dhūpamādiṣṭaṁ naivedye śuṣkalī tathā

पौष मास में शतपत्रिका से सूर्य की पूजा कही गयी है; धूप में सहज तथा नैवेद्य में शुष्कली निर्दिष्ट है।

श्लोक 70 (skanda.6.162.70)

प्राशने पूर्वमुक्तानि सर्वाण्येव समाचरेत् ॥ समाप्तौ च ततो दद्यात्षड्भागं गृहसंभवम्

prāśane pūrvamuktāni sarvāṇyeva samācaret samāptau ca tato dadyātṣaḍbhāgaṁ gṛhasaṁbhavam

प्राशन में पहले बताई गई सभी वस्तुओं का पालन करे; और व्रत की समाप्ति पर अपने घर की संपत्ति का छठा भाग दे।

श्लोक 71 (skanda.6.162.71)

ब्राह्मणाय नृपश्रेष्ठ सर्वपापविशुद्धये ॥ इष्टभोज्यं ततः कार्यं स्वशक्त्या पार्थिवोत्तम

brāhmaṇāya nṛpaśreṣṭha sarvapāpaviśuddhaye iṣṭabhojyaṁ tataḥ kāryaṁ svaśaktyā pārthivottama

हे नृपश्रेष्ठ! समस्त पापों की शुद्धि के लिए यह ब्राह्मण को दे; तत्पश्चात् हे पार्थिवोत्तम! अपनी शक्ति के अनुसार इष्ट भोज कराए।

श्लोक 72 (skanda.6.162.72)

एवं तु कुरुते योऽत्र सप्तमीं भास्करोद्भवाम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो निर्मलत्वं स गच्छति

evaṁ tu kurute yo'tra saptamīṁ bhāskarodbhavām sarvapāpavinirmukto nirmalatvaṁ sa gacchati

जो इस प्रकार भास्कर से सम्बंधित इस सप्तमी को करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर निर्मलता को प्राप्त होता है।

श्लोक 73 (skanda.6.162.73)

॥ ब्राह्मणा ऊचुः ॥ ॥ एवं पुरा वै कथिता रोहिताश्वाय धीमते ॥ मार्कंडेन महाभाग तस्मात्त्वमपि तां कुरु

brāhmaṇā ūcuḥ evaṁ purā vai kathitā rohitāśvāya dhīmate mārkaṁḍena mahābhāga tasmāttvamapi tāṁ kuru

ब्राह्मणों ने कहा — इस प्रकार पूर्वकाल में यह बुद्धिमान रोहिताश्व को मार्कण्ड ने बताया था; हे महाभाग! अतः तुम भी इसका पालन करो।

श्लोक 74 (skanda.6.162.74)

येन संजायते सम्यक्पुरश्चरणमेव ते

yena saṁjāyate samyakpuraścaraṇameva te

जिससे तुम्हारा यह पुरश्चरण भली-भाँति सम्पन्न हो जाएगा।

श्लोक 75 (skanda.6.162.75)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुष्पोऽपि द्विजसत्तमाः ॥ तां चक्रे सप्तमीं हृष्टो यथा तेन निवेदिता

sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā puṣpo'pi dvijasattamāḥ tāṁ cakre saptamīṁ hṛṣṭo yathā tena niveditā

सूत जी ने कहा — हे द्विजसत्तमो! उसका वह वचन सुनकर पुष्प ने भी हर्षित होकर उस सप्तमी को उसी प्रकार सम्पन्न किया जैसे उसे बताई गयी थी।

श्लोक 76 (skanda.6.162.76)

षड्भागं प्रददौ तस्मै ब्राह्मणाय महात्मने ॥ स्ववित्तस्य गृहस्थस्य कुप्याकुप्यस्य कृत्स्नशः

ṣaḍbhāgaṁ pradadau tasmai brāhmaṇāya mahātmane svavittasya gṛhasthasya kupyākupyasya kṛtsnaśaḥ

उसने उस महात्मा ब्राह्मण को अपनी गृहस्थी की सम्पूर्ण सम्पत्ति — नाशवान और अविनाशी दोनों प्रकार की वस्तुओं — का छठा भाग दिया।

श्लोक 77 (skanda.6.162.77)

सोऽपि जग्राह तद्वित्तं प्रहृष्टेनांतरात्मना ॥ सुवर्णमणि रत्नानि संख्यया परिवर्जितम्

so'pi jagrāha tadvittaṁ prahṛṣṭenāṁtarātmanā suvarṇamaṇi ratnāni saṁkhyayā parivarjitam

उसने भी अत्यंत प्रसन्न मन से वह धन ग्रहण किया — स्वर्ण, मणि और रत्न, जो गणना से परे थे।

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