नागर खण्ड · अध्याय 163
ब्राह्मनागरोत्पत्तिवृत्तांतवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.163.1)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ अथ ते नागराः सर्वे दृष्ट्वा तद्वित्तभाजनम् ॥ न केनापि ग्रहीतव्यं सर्वान्कामान्निरस्य च
sūta uvāca atha te nāgarāḥ sarve dṛṣṭvā tadvittabhājanam na kenāpi grahītavyaṁ sarvānkāmānnirasya ca
सूत जी ने कहा — तब उन सब नागरों ने उस धन-राशि को देखकर, अपनी सब इच्छाओं को त्यागकर कहा कि इसे किसी को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.6.163.2)
ततस्ते समयं कृत्वा समानीय च मध्यगम् ॥ तस्यास्येन ततः प्रोचुर्ब्रह्मस्थाने व्यवस्थिताः
tataste samayaṁ kṛtvā samānīya ca madhyagam tasyāsyena tataḥ procurbrahmasthāne vyavasthitāḥ
तब उन्होंने आपस में प्रतिज्ञा करके एक मध्यस्थ को बुलाया, और ब्रह्मस्थान में बैठे हुए उन्होंने उसके मुख से यह कहा —
श्लोक 3 (skanda.6.163.3)
अनेन लोभयुक्तेन तिरस्कृत्य द्विजोत्तमान् ॥ पुष्पवित्तमुपादाय प्रायश्चित्तं प्रकीर्तितम्
anena lobhayuktena tiraskṛtya dvijottamān puṣpavittamupādāya prāyaścittaṁ prakīrtitam
इस लोभयुक्त व्यक्ति ने श्रेष्ठ ब्राह्मणों का तिरस्कार करके पुष्प का धन लेकर स्वयं ही प्रायश्चित्त घोषित कर दिया।
श्लोक 4 (skanda.6.163.4)
तथा चैव तु षड्भागो गृहीतो विभवस्य च ॥ तस्मादेष समस्तानां बाह्यभूतो भविष्यति
tathā caiva tu ṣaḍbhāgo gṛhīto vibhavasya ca tasmādeṣa samastānāṁ bāhyabhūto bhaviṣyati
और उसी प्रकार सम्पत्ति का छठा भाग भी ग्रहण कर लिया; अतः यह हम सबके लिए बहिष्कृत हो जाएगा।
श्लोक 5 (skanda.6.163.5)
नागराणां द्विजेद्राणां यथान्यः प्राकृतस्तथा
nāgarāṇāṁ dvijedrāṇāṁ yathānyaḥ prākṛtastathā
जिस प्रकार कोई साधारण मनुष्य होता है, वैसे ही यह अब नागर द्विजों में नहीं गिना जाएगा।
श्लोक 6 (skanda.6.163.6)
अद्यप्रभृति चानेन यः संबंधं करिष्यति ॥ सोऽपि बाह्यस्तु सर्वेषां नागराणां भविष्यति
adyaprabhṛti cānena yaḥ saṁbaṁdhaṁ kariṣyati so'pi bāhyastu sarveṣāṁ nāgarāṇāṁ bhaviṣyati
और आज से जो भी इसके साथ सम्बन्ध रखेगा, वह भी समस्त नागरों के लिए बहिष्कृत हो जाएगा।
श्लोक 7 (skanda.6.163.7)
भोजनं वाथ पानीयं योऽस्य सद्मनि कर्हिचित् ॥ करिष्यति स चाऽप्येवं पतितः संभविष्यति
bhojanaṁ vātha pānīyaṁ yo'sya sadmani karhicit kariṣyati sa cā'pyevaṁ patitaḥ saṁbhaviṣyati
और जो कोई भी कभी इसके घर में भोजन या जल ग्रहण करेगा, वह भी इसी प्रकार पतित हो जाएगा।
श्लोक 8 (skanda.6.163.8)
एवमुक्त्वा ततस्तेन दत्तं तालत्रयं द्विजाः ॥ ब्रह्मस्थाने द्विजश्रेष्ठाः कृत्वा पुष्पसमं च तम्
evamuktvā tatastena dattaṁ tālatrayaṁ dvijāḥ brahmasthāne dvijaśreṣṭhāḥ kṛtvā puṣpasamaṁ ca tam
हे द्विजो! ऐसा कहकर, हे द्विजश्रेष्ठो! उसने ब्रह्मस्थान में तीन बार ताली बजाकर उसे भी पुष्प के समान बहिष्कृत घोषित कर दिया।
श्लोक 9 (skanda.6.163.9)
अथ ते ब्राह्मणाः सर्वे जग्मुः स्वंस्वं निवेशनम् ॥ चंडशर्मा स चोद्विग्नः पुष्पपार्श्वं तदा गतः
atha te brāhmaṇāḥ sarve jagmuḥ svaṁsvaṁ niveśanam caṁḍaśarmā sa codvignaḥ puṣpapārśvaṁ tadā gataḥ
तब वे सब ब्राह्मण अपने-अपने घर चले गये; और चण्डशर्मा उद्विग्न होकर उस समय पुष्प के पास गया।
श्लोक 10 (skanda.6.163.10)
एतेषामेव सर्वेषां संमतेन मया तव ॥ प्रायश्चित्तं तदा दत्तं तथापि पतितः कृतः
eteṣāmeva sarveṣāṁ saṁmatena mayā tava prāyaścittaṁ tadā dattaṁ tathāpi patitaḥ kṛtaḥ
'इन्हीं सबकी सम्मति से मैंने उस समय तुम्हें प्रायश्चित्त दिया था, फिर भी मुझे पतित बना दिया गया।'
श्लोक 11 (skanda.6.163.11)
तस्मादहं पतिष्यामि सुसमिद्धे हुताशने ॥ नैव जीवितुमिच्छामि स्वजनैः परिवर्जितः
tasmādahaṁ patiṣyāmi susamiddhe hutāśane naiva jīvitumicchāmi svajanaiḥ parivarjitaḥ
'इसलिए मैं भली-भाँति प्रज्वलित अग्नि में गिर पड़ूँगा; अपने ही लोगों से त्यागा जाकर मैं जीना नहीं चाहता।'
श्लोक 12 (skanda.6.163.12)
॥ पुष्प उवाच ॥ ॥ न विषादस्त्वया कार्यः कार्येऽस्मिद्विजसत्तम ॥ वित्तार्थं दूषितस्त्वंहि यतो ब्राह्मणसत्तमैः
puṣpa uvāca na viṣādastvayā kāryaḥ kārye'smidvijasattama vittārthaṁ dūṣitastvaṁhi yato brāhmaṇasattamaiḥ
पुष्प ने कहा — हे द्विजसत्तम! इस विषय में तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिए, क्योंकि श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने तुम्हें केवल धन के कारण दोषी ठहराया है।
श्लोक 13 (skanda.6.163.13)
नागरांस्तोषयिष्यामि तानहं विविधैर्धनैः ॥ याचयिष्यंति यन्मात्रं तव गात्रविशुद्धये
nāgarāṁstoṣayiṣyāmi tānahaṁ vividhairdhanaiḥ yācayiṣyaṁti yanmātraṁ tava gātraviśuddhaye
मैं उन नागरों को नाना प्रकार के धनों से संतुष्ट करूँगा; तुम्हारे शरीर की शुद्धि के लिए वे जितना भी माँगेंगे,
श्लोक 14 (skanda.6.163.14)
तावन्मात्रं प्रदास्यामि तेभ्यो हि तव कारणात् ॥ एवमुक्त्वा समागत्य ब्रह्मस्थानं त्वरान्वितः
tāvanmātraṁ pradāsyāmi tebhyo hi tava kāraṇāt evamuktvā samāgatya brahmasthānaṁ tvarānvitaḥ
उतना ही मैं तुम्हारे कारण उन्हें दे दूँगा। ऐसा कहकर वह शीघ्रतापूर्वक ब्रह्मस्थान में आया।
श्लोक 15 (skanda.6.163.15)
चातुश्चरणमानीय मध्यगास्येन सोऽब्रवीत् ॥ चंडशर्मा द्विजो यश्च मदर्थे पतितः कृतः
cātuścaraṇamānīya madhyagāsyena so'bravīt caṁḍaśarmā dvijo yaśca madarthe patitaḥ kṛtaḥ
चातुश्चरण सभा को बुलाकर उसने मध्यस्थ के मुख से कहा — 'चण्डशर्मा नामक जो ब्राह्मण मेरे कारण पतित किया गया है —'
श्लोक 16 (skanda.6.163.16)
युष्माभिर्वित्तलोभेन तद्वित्तं वो ददाम्यहम् ॥ समस्तं मद्गृहे यच्च क्रियतां वचनं द्विजैः
yuṣmābhirvittalobhena tadvittaṁ vo dadāmyaham samastaṁ madgṛhe yacca kriyatāṁ vacanaṁ dvijaiḥ
'— उसे आप लोगों ने धन के लोभ से पतित किया है, वह धन मैं आपको देता हूँ — जो कुछ भी मेरे घर में है, वह सब। हे द्विजो! मेरे वचन का पालन कीजिये।'
श्लोक 17 (skanda.6.163.17)
अथ ते कुपिताः प्रोचुः सर्व एव द्विजोत्तमाः ॥ सीत्कारान्विविधान्कृत्वा क्रोध संरक्तलोचनाः
atha te kupitāḥ procuḥ sarva eva dvijottamāḥ sītkārānvividhānkṛtvā krodha saṁraktalocanāḥ
तब वे सब श्रेष्ठ ब्राह्मण क्रोधित होकर, नाना प्रकार के धिक्कार-स्वर करते हुए, क्रोध से लाल नेत्रों के साथ बोले —
श्लोक 18 (skanda.6.163.18)
धिग्धिक्पापसमाचार जिह्वा ते शतधा ततः ॥ किं न याति यदेवं त्वं प्रजल्पसि विगर्हितम्
dhigdhikpāpasamācāra jihvā te śatadhā tataḥ kiṁ na yāti yadevaṁ tvaṁ prajalpasi vigarhitam
'धिक्कार है, धिक्कार है तुझ पापाचारी को! तेरी जिह्वा सौ टुकड़े क्यों नहीं हो जाती, जो तू ऐसी निंदनीय बात बोलता है?'
श्लोक 19 (skanda.6.163.19)
पतितोऽयं कृतोऽस्माभिर्नैव वित्तस्य कारणात् ॥ प्रायश्चित्तं यतो दत्तमेकेनापि दुरात्मना
patito'yaṁ kṛto'smābhirnaiva vittasya kāraṇāt prāyaścittaṁ yato dattamekenāpi durātmanā
'हमने इसे पतित इसलिए नहीं किया कि धन के कारण, अपितु इसलिए कि प्रायश्चित्त एक ही दुरात्मा द्वारा अकेले दिया गया था।'
श्लोक 20 (skanda.6.163.20)
स्मृतयो दूषितास्तेन पुराणानि विशेषतः ॥ स्थानं चैवास्मदीयं च कर्म चैतत्प्रकुर्वता
smṛtayo dūṣitāstena purāṇāni viśeṣataḥ sthānaṁ caivāsmadīyaṁ ca karma caitatprakurvatā
'इस कर्म को करते हुए उसने स्मृतियों को, और विशेषतः पुराणों को, तथा हमारे इस स्थान को भी दूषित कर दिया है।'
श्लोक 21 (skanda.6.163.21)
प्रायश्चित्तं प्रदातव्यं चतुर्भिरपरैः सह ॥ संमन्त्र्य मनुना प्रोक्तमेतदेव द्विजोत्तमाः
prāyaścittaṁ pradātavyaṁ caturbhiraparaiḥ saha saṁmantrya manunā proktametadeva dvijottamāḥ
'प्रायश्चित्त सदैव चार अन्य लोगों के साथ मिलकर, परामर्श करके देना चाहिए — हे द्विजोत्तमो! यही मनु के द्वारा कहा गया है।'
श्लोक 22 (skanda.6.163.22)
त्वदीयं पातकं चास्य शरीरेऽद्य व्यवस्थितम् ॥ एकाकिना यतो दत्तं तेनायं पतितः स्थितः
tvadīyaṁ pātakaṁ cāsya śarīre'dya vyavasthitam ekākinā yato dattaṁ tenāyaṁ patitaḥ sthitaḥ
'और अब उसका पाप आज तुम्हारे शरीर में स्थित हो गया है — क्योंकि उसने अकेले ही यह दिया था, इसलिए वह पतित हो गया है।'
श्लोक 23 (skanda.6.163.23)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवमुक्त्वा द्विजाः सर्वे जग्मुः स्वंस्वं निकेतनम् ॥ पुष्पोपि च समुद्विग्नो वैलक्ष्यं परमं गतः
sūta uvāca evamuktvā dvijāḥ sarve jagmuḥ svaṁsvaṁ niketanam puṣpopi ca samudvigno vailakṣyaṁ paramaṁ gataḥ
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर सब ब्राह्मण अपने-अपने घर चले गये; और पुष्प भी अत्यंत उद्विग्न होकर घोर विषाद को प्राप्त हुआ।
श्लोक 24 (skanda.6.163.24)
जगामाथ निजावासं निःश्वसन्नुरगो यथा
jagāmātha nijāvāsaṁ niḥśvasannurago yathā
वह सर्प के समान लम्बी साँसें लेता हुआ अपने घर गया।
श्लोक 25 (skanda.6.163.25)
ततः स चिन्तयामास यावन्नो साहसं कृतम् ॥ तावत्सिद्धिर्मनुष्याणां न कथंचित्प्रजायते
tataḥ sa cintayāmāsa yāvanno sāhasaṁ kṛtam tāvatsiddhirmanuṣyāṇāṁ na kathaṁcitprajāyate
तब उसने सोचा — 'जब तक साहस नहीं किया जाता, तब तक मनुष्यों को किसी भी प्रकार सिद्धि प्राप्त नहीं होती।'
श्लोक 26 (skanda.6.163.26)
तस्मादहं करिष्यामि चण्डशर्मकृते महत् ॥ कृतघ्नता यथा न स्यात्प्रोक्तं चैव यतो बुधैः
tasmādahaṁ kariṣyāmi caṇḍaśarmakṛte mahat kṛtaghnatā yathā na syātproktaṁ caiva yato budhaiḥ
'इसलिए मैं चण्डशर्मा के लिए कुछ महान् कार्य करूँगा, ताकि कृतघ्नता न हो — क्योंकि विद्वानों ने कहा है —'
श्लोक 27 (skanda.6.163.27)
ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा ॥ निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः
brahmaghne ca surāpe ca caure bhagnavrate tathā niṣkṛtirvihitā sadbhiḥ kṛtaghne nāsti niṣkṛtiḥ
'ब्रह्महत्यारे के लिए, मद्यपायी के लिए, चोर के लिए तथा व्रतभंजक के लिए भी सज्जनों ने प्रायश्चित्त बताया है, किन्तु कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है।'
श्लोक 28 (skanda.6.163.28)
एवं निश्चित्य मनसा सूर्यवारेण सप्तमी ॥ यदाऽऽयाता द्विजश्रेष्ठास्तदा चाष्टोत्तरं शतम्
evaṁ niścitya manasā sūryavāreṇa saptamī yadā''yātā dvijaśreṣṭhāstadā cāṣṭottaraṁ śatam
मन में ऐसा निश्चय करके, हे द्विजश्रेष्ठो! जब रविवार से युक्त सप्तमी आयी, तब एक सौ आठ —
श्लोक 29 (skanda.6.163.29)
प्रदक्षिणाः कृतास्तेन पुष्पादित्यस्य धीमता ॥ तीक्ष्णं शस्त्रं समादाय पूर्वोक्तविधिना ततः ॥ छित्त्वाछित्त्वा निजांगानि जुहुयाज्जातवेदसि
pradakṣiṇāḥ kṛtāstena puṣpādityasya dhīmatā tīkṣṇaṁ śastraṁ samādāya pūrvoktavidhinā tataḥ chittvāchittvā nijāṁgāni juhuyājjātavedasi
— प्रदक्षिणाएँ उस बुद्धिमान ने पुष्पादित्य की कीं; फिर तीक्ष्ण शस्त्र लेकर, पूर्वोक्त विधि के अनुसार, अपने अंगों को बार-बार काट-काटकर अग्नि में हवन करने लगा।
श्लोक 30 (skanda.6.163.30)
ततः पूर्णाहुतिं यावत्कायशेषेण यच्छति ॥ तावत्प्रत्यक्षतां गत्वा स प्रोक्तो भास्वता स्वयम्
tataḥ pūrṇāhutiṁ yāvatkāyaśeṣeṇa yacchati tāvatpratyakṣatāṁ gatvā sa prokto bhāsvatā svayam
तत्पश्चात् जब वह अपने शेष शरीर से पूर्णाहुति देने ही वाला था, तभी सूर्य स्वयं प्रत्यक्ष होकर उससे बोले —
श्लोक 31 (skanda.6.163.31)
पुष्प मा साहसं कार्षीः परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ ॥ भूय एव महाभाग ब्रूहि किं ते ददाम्यहम्
puṣpa mā sāhasaṁ kārṣīḥ parituṣṭo'smi te'nagha bhūya eva mahābhāga brūhi kiṁ te dadāmyaham
'हे पुष्प! ऐसा दुःसाहस मत कर; हे निष्पाप! मैं तुझसे अत्यंत प्रसन्न हूँ। हे महाभाग! फिर से कह, मैं तुझे क्या दूँ?'
श्लोक 32 (skanda.6.163.32)
॥ पुष्प उवाच ॥ ॥ चण्डशर्मा द्विजेन्द्रोऽयं मदर्थे पतितः कृतः ॥ समस्तैर्नागरैर्देव तं तैर्नय समानताम्
puṣpa uvāca caṇḍaśarmā dvijendro'yaṁ madarthe patitaḥ kṛtaḥ samastairnāgarairdeva taṁ tairnaya samānatām
पुष्प ने कहा — हे देव! यह श्रेष्ठ ब्राह्मण चण्डशर्मा मेरे कारण समस्त नागरों के द्वारा पतित किया गया है; उसे उन्हीं के समान बना दीजिये।
श्लोक 33 (skanda.6.163.33)
शास्त्रं दृष्ट्वा प्रदत्तं मे प्रायश्चित्तं महात्मना ॥ तथापि दूषितः क्षुद्रैः समस्तैरसहिष्णुभिः
śāstraṁ dṛṣṭvā pradattaṁ me prāyaścittaṁ mahātmanā tathāpi dūṣitaḥ kṣudraiḥ samastairasahiṣṇubhiḥ
शास्त्र देखकर उस महात्मा ने मुझे प्रायश्चित्त प्रदान किया था, फिर भी उन सब क्षुद्र, असहिष्णु लोगों ने उसे दूषित ठहरा दिया।
श्लोक 34 (skanda.6.163.34)
॥ भगवानुवाच ॥ ॥ एकस्यापि वचो नैव शक्यते कर्तुमन्यथा ॥ नागरस्य द्विजश्रेष्ठ समस्तानां च किं पुनः
bhagavānuvāca ekasyāpi vaco naiva śakyate kartumanyathā nāgarasya dvijaśreṣṭha samastānāṁ ca kiṁ punaḥ
भगवान ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ! एक भी नागर के वचन को अन्यथा नहीं किया जा सकता, फिर समस्त नागरों के वचन की तो बात ही क्या!
श्लोक 35 (skanda.6.163.35)
परमेष द्विजः पूतश्चंडशर्मा भविष्यति ॥ ब्राह्मोऽयं नागरः ख्यातः समस्ते धरणीतले
parameṣa dvijaḥ pūtaścaṁḍaśarmā bhaviṣyati brāhmo'yaṁ nāgaraḥ khyātaḥ samaste dharaṇītale
किन्तु यह चण्डशर्मा परम पवित्र ब्राह्मण होगा; यह 'ब्राह्म नागर' के नाम से सम्पूर्ण पृथ्वी पर विख्यात होगा।
श्लोक 36 (skanda.6.163.36)
एतस्य ये सुताश्चैव भविष्यंति धरातले ॥ विख्यातिं तेऽपि यास्यंति मान्याः पूज्या महीभृताम्
etasya ye sutāścaiva bhaviṣyaṁti dharātale vikhyātiṁ te'pi yāsyaṁti mānyāḥ pūjyā mahībhṛtām
इसके जो भी पुत्र पृथ्वी पर होंगे, वे भी ख्याति को प्राप्त करेंगे, राजाओं के द्वारा मान्य और पूज्य होंगे।
श्लोक 37 (skanda.6.163.37)
ये चापि बांधवाश्चास्य सुहृदश्च समागमम् ॥ करिष्यंति समं तेऽपि भविष्यंति सुशोभनाः
ye cāpi bāṁdhavāścāsya suhṛdaśca samāgamam kariṣyaṁti samaṁ te'pi bhaviṣyaṁti suśobhanāḥ
और इसके जो भी बान्धव और मित्र इसके साथ सम्बन्ध रखेंगे, वे भी अत्यंत सुशोभित होंगे।
श्लोक 38 (skanda.6.163.38)
त्वं चापि मत्प्रसादेन संपूर्णांगो भविष्यसि
tvaṁ cāpi matprasādena saṁpūrṇāṁgo bhaviṣyasi
और तू भी मेरी कृपा से पूर्ण अंगों वाला हो जाएगा।
श्लोक 39 (skanda.6.163.39)
एवमुक्त्वा सहस्रांशुस्ततश्चादर्शनं गतः ॥ पुष्पोऽपि चाक्षतांगत्वं तत्क्षणात्समपद्यत
evamuktvā sahasrāṁśustataścādarśanaṁ gataḥ puṣpo'pi cākṣatāṁgatvaṁ tatkṣaṇātsamapadyata
ऐसा कहकर सहस्ररश्मि सूर्य तत्पश्चात् अंतर्धान हो गये; और पुष्प भी उसी क्षण अक्षत-अंग हो गया।