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नागर खण्ड · अध्याय 164

नागरेश्वरनागरादित्यशाकम्भर्युत्पत्तिवर्णन

अध्याय 163अध्याय-सूचीअध्याय 165

श्लोक 1 (skanda.6.164.1)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ एतस्मिन्नंतरे पुष्पः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ चंडशर्मगृहं गत्वा दिष्ट्यादिष्ट्येति चाब्रवीत्

sūta uvāca etasminnaṁtare puṣpaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā caṁḍaśarmagṛhaṁ gatvā diṣṭyādiṣṭyeti cābravīt

सूत जी ने कहा — इसी बीच पुष्प अत्यंत प्रसन्न मन से चण्डशर्मा के घर जाकर बोला — 'बड़े सौभाग्य की बात है, बड़े सौभाग्य की बात है!'

श्लोक 2 (skanda.6.164.2)

विवर्णवदनं दृष्ट्वा वाष्पपूर्णेक्षणं तदा ॥ बान्धवैः सहितं सर्वैर्दारैर्भृत्यैस्तथा सुतैः

vivarṇavadanaṁ dṛṣṭvā vāṣpapūrṇekṣaṇaṁ tadā bāndhavaiḥ sahitaṁ sarvairdārairbhṛtyaistathā sutaiḥ

उस समय उसने देखा कि चण्डशर्मा का मुख उदास और नेत्र अश्रुओं से भरे हुए थे, तथा वह अपने सभी बान्धवों, पत्नी, सेवकों एवं पुत्रों सहित बैठा था।

श्लोक 3 (skanda.6.164.3)

॥ पुष्प उवाच ॥ ॥ तवार्थे च मया सूर्यः कायत्यागेन तोषितः ॥ पतितत्त्वं न ते काये तत्प्रसादाद्भविष्यति

puṣpa uvāca tavārthe ca mayā sūryaḥ kāyatyāgena toṣitaḥ patitattvaṁ na te kāye tatprasādādbhaviṣyati

पुष्प ने कहा — तुम्हारे लिए मैंने अपने शरीर का त्याग करके सूर्य को प्रसन्न किया है; उनकी कृपा से अब तुम्हारे शरीर में पतितत्व नहीं रहेगा।

श्लोक 4 (skanda.6.164.4)

तव पुत्राश्च पौत्राश्च ये भविष्यंति वंशजाः ॥ नागराणां च ते सर्वे भविष्यंति गुणाधिकाः

tava putrāśca pautrāśca ye bhaviṣyaṁti vaṁśajāḥ nāgarāṇāṁ ca te sarve bhaviṣyaṁti guṇādhikāḥ

तुम्हारे पुत्र, पौत्र और जो भी वंशज होंगे, वे सब नागरों से भी अधिक गुणवान होंगे।

श्लोक 5 (skanda.6.164.5)

तस्मादुत्तिष्ठ गच्छामो नदीं पुण्यां सरस्वतीम् ॥ तस्यास्तटे निवासाय कृत्वा चैवाश्रमं द्विज

tasmāduttiṣṭha gacchāmo nadīṁ puṇyāṁ sarasvatīm tasyāstaṭe nivāsāya kṛtvā caivāśramaṁ dvija

अतः उठो, चलो हम पुण्य सरस्वती नदी के पास चलें; हे द्विज! उसके तट पर आश्रम बनाकर वहीं निवास करें।

श्लोक 6 (skanda.6.164.6)

त्वया सह वसिष्यामि अहमेव न संशयः ॥ अस्ति मे विपुलं वित्तं ये चान्ये तेऽनुयायिनः

tvayā saha vasiṣyāmi ahameva na saṁśayaḥ asti me vipulaṁ vittaṁ ye cānye te'nuyāyinaḥ

मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा, इसमें कोई संशय नहीं; मेरे पास प्रचुर धन है, और जो भी अन्य तुम्हारे अनुयायी हैं —

श्लोक 7 (skanda.6.164.7)

तान्सर्वान्पोषयिष्यामि त्यज्यतां मानसो ज्वरः ॥ तच्छ्रुत्वा चण्डशर्मा तु पुत्रैर्बंधुभिरन्वितः

tānsarvānpoṣayiṣyāmi tyajyatāṁ mānaso jvaraḥ tacchrutvā caṇḍaśarmā tu putrairbaṁdhubhiranvitaḥ

— उन सबका मैं भरण-पोषण करूँगा; मन की व्यथा को त्याग दो। यह सुनकर चण्डशर्मा अपने पुत्रों और बान्धवों के साथ,

श्लोक 8 (skanda.6.164.8)

सरस्वतीं समुद्दिश्य निष्क्रांतो नगरात्ततः ॥ स्थानं प्रदक्षिणीकृत्य नमस्कृत्य सुदुःखितः

sarasvatīṁ samuddiśya niṣkrāṁto nagarāttataḥ sthānaṁ pradakṣiṇīkṛtya namaskṛtya suduḥkhitaḥ

सरस्वती की ओर लक्ष्य करके नगर से निकल पड़ा; उस स्थान की प्रदक्षिणा करके, प्रणाम करके, अत्यंत दुःखी होकर,

श्लोक 9 (skanda.6.164.9)

बाष्पपूर्णेक्षणो दीन उत्तराभिमुखो ययौ ॥ पुष्पेण सहितश्चैव मुहुर्मुहुः प्रबोधितः

bāṣpapūrṇekṣaṇo dīna uttarābhimukho yayau puṣpeṇa sahitaścaiva muhurmuhuḥ prabodhitaḥ

अश्रुपूर्ण नेत्रों से दीन होकर वह उत्तर दिशा की ओर मुख करके चल पड़ा, पुष्प के साथ, जो बार-बार उसे धैर्य बँधा रहा था।

श्लोक 10 (skanda.6.164.10)

ततः सरस्वतीं प्राप्य पुण्यां शीतजलां नदीम् ॥ सेवितां मुनिसंघैस्तां लोलकल्लोलमालिनीम्

tataḥ sarasvatīṁ prāpya puṇyāṁ śītajalāṁ nadīm sevitāṁ munisaṁghaistāṁ lolakallolamālinīm

तब वे शीतल जल वाली, मुनि-संघों द्वारा सेवित तथा चंचल तरंगों की माला से युक्त उस पुण्य सरस्वती नदी तक पहुँचे,

श्लोक 11 (skanda.6.164.11)

तस्या दक्षिणकूले स निवासमकरोत्तदा ॥ पुष्पस्य मतिमास्थाय बन्धुभिः सकलैर्वृतः

tasyā dakṣiṇakūle sa nivāsamakarottadā puṣpasya matimāsthāya bandhubhiḥ sakalairvṛtaḥ

उसके दक्षिण तट पर उसने पुष्प की सलाह मानकर, अपने समस्त बान्धवों से घिरे हुए, निवास बनाया।

श्लोक 12 (skanda.6.164.12)

तस्यासीन्नगरस्थस्य प्रतिज्ञा चण्डशर्मणः ॥ सप्तविंशतिभिर्लिंगैर्दृष्टैर्भोक्ष्याम्यहं सदा

tasyāsīnnagarasthasya pratijñā caṇḍaśarmaṇaḥ saptaviṁśatibhirliṁgairdṛṣṭairbhokṣyāmyahaṁ sadā

नगर में रहते समय चण्डशर्मा का यह प्रण था — 'मैं सदा सत्ताईस शिवलिंगों का दर्शन करके ही भोजन करूँगा।'

श्लोक 13 (skanda.6.164.13)

तां च संस्मरतस्तस्य प्रतिज्ञां पूर्वसंचिताम् ॥ हृदयं दह्यते तस्य दिवानक्तं द्विजोत्तमाः

tāṁ ca saṁsmaratastasya pratijñāṁ pūrvasaṁcitām hṛdayaṁ dahyate tasya divānaktaṁ dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! अपने उस पूर्वकालीन प्रण का स्मरण करते हुए उसका हृदय दिन-रात जलता रहता था।

श्लोक 14 (skanda.6.164.14)

स च स्नात्वा सरस्वत्यां शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥ षडक्षरस्य मन्त्रस्य जपं चक्रे पृथक्पृथक्

sa ca snātvā sarasvatyāṁ śucirbhūtvā samāhitaḥ ṣaḍakṣarasya mantrasya japaṁ cakre pṛthakpṛthak

अतः वह सरस्वती में स्नान करके, शुद्ध और एकाग्रचित्त होकर, षडक्षर मंत्र का जप अलग-अलग करने लगा।

श्लोक 15 (skanda.6.164.15)

नाम चोच्चार्य लिंगस्य नमस्कारान्तमादधे ॥ कर्दमेन द्विजश्रेष्ठाः पंचांगुलशतेन च

nāma coccārya liṁgasya namaskārāntamādadhe kardamena dvijaśreṣṭhāḥ paṁcāṁgulaśatena ca

लिंग के नाम का उच्चारण करके, नमस्कार के साथ, हे द्विजश्रेष्ठो! उसने पाँच सौ अंगुल परिमाण की मिट्टी से —

श्लोक 16 (skanda.6.164.16)

संस्थाप्य पूजयेद्भक्त्या पुष्पधूपानुलेपनैः ॥ प्राणरुद्राञ्जपन्पश्चाच्छ्रद्धया परया युतः

saṁsthāpya pūjayedbhaktyā puṣpadhūpānulepanaiḥ prāṇarudrāñjapanpaścācchraddhayā parayā yutaḥ

— उन्हें स्थापित कर पुष्प, धूप और अनुलेपन से भक्तिपूर्वक पूजा करता, और तत्पश्चात् परम श्रद्धा से युक्त होकर प्राणरुद्र का जप करता।

श्लोक 17 (skanda.6.164.17)

दुःस्थितं सुस्थितं वापि शिवलिंगं न चालयेत् ॥ इति मत्वा द्विजेन्द्रोऽसौ नैव तानि विसर्जयेत्

duḥsthitaṁ susthitaṁ vāpi śivaliṁgaṁ na cālayet iti matvā dvijendro'sau naiva tāni visarjayet

यह सोचकर कि शिवलिंग को — चाहे वह भली-भाँति स्थापित हो या अस्थिर हो — कभी हटाना नहीं चाहिए, वह श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें कभी नहीं हटाता था।

श्लोक 18 (skanda.6.164.18)

उपर्युपरि तेषां च कर्दमेन द्विजोत्तमाः ॥ चक्रे लिंगानि नित्यं स सप्तविंशतिसंख्यया

uparyupari teṣāṁ ca kardamena dvijottamāḥ cakre liṁgāni nityaṁ sa saptaviṁśatisaṁkhyayā

अतः हे द्विजोत्तमो! उन्हीं के ऊपर परत-दर-परत मिट्टी से वह प्रतिदिन सत्ताईस की संख्या में लिंग बनाता रहा।

श्लोक 19 (skanda.6.164.19)

ततः कालेन महता जातः कर्दमपर्वतः

tataḥ kālena mahatā jātaḥ kardamaparvataḥ

तत्पश्चात् दीर्घकाल में एक कर्दम पर्वत बन गया।

श्लोक 20 (skanda.6.164.20)

अथ तुष्टो महादेवस्तस्य भक्त्यतिरेकतः ॥ निर्भिद्य धरणीपृष्ठं तस्य लिंगमदर्शयत्

atha tuṣṭo mahādevastasya bhaktyatirekataḥ nirbhidya dharaṇīpṛṣṭhaṁ tasya liṁgamadarśayat

तब महादेव उसकी अत्यधिक भक्ति से प्रसन्न होकर, पृथ्वी की सतह को भेदकर, उसे अपना लिंग दिखाया।

श्लोक 21 (skanda.6.164.21)

अब्रवीत्सादरं तं च मेघगम्भीरया गिरा ॥ चण्डशर्मन्प्रतुष्टोस्मि तव भक्त्याऽनया द्विज

abravītsādaraṁ taṁ ca meghagambhīrayā girā caṇḍaśarmanpratuṣṭosmi tava bhaktyā'nayā dvija

और मेघ के समान गम्भीर वाणी में उससे आदरपूर्वक बोले — 'हे चण्डशर्मन्! हे द्विज! तुम्हारी इस भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।'

श्लोक 22 (skanda.6.164.22)

तस्माल्लिंगमिदं नित्यं पूजयस्व प्रभक्तितः ॥ सप्तविंशतिलिंगानां यतः फलमवाप्स्यसि

tasmālliṁgamidaṁ nityaṁ pūjayasva prabhaktitaḥ saptaviṁśatiliṁgānāṁ yataḥ phalamavāpsyasi

'अतः इस लिंग की सदा परम भक्ति से पूजा करो, क्योंकि इससे तुम्हें सत्ताईस लिंगों के पूजन का फल प्राप्त होगा।'

श्लोक 23 (skanda.6.164.23)

अन्योपि च नरो भक्त्या यश्चैनं पूजयिष्यति ॥ सप्तविंशतिलिंगानां सोऽपि श्रेयोऽभिलप्स्यति

anyopi ca naro bhaktyā yaścainaṁ pūjayiṣyati saptaviṁśatiliṁgānāṁ so'pi śreyo'bhilapsyati

'और कोई भी अन्य मनुष्य जो भक्तिपूर्वक इसकी पूजा करेगा, वह भी सत्ताईस लिंगों के समान श्रेय प्राप्त करेगा।'

श्लोक 24 (skanda.6.164.24)

एवमुक्त्वा स भगवांस्ततश्चादर्शनं गतः ॥ चंडशर्मापि तं हृष्टः पूजयामास तत्त्वतः

evamuktvā sa bhagavāṁstataścādarśanaṁ gataḥ caṁḍaśarmāpi taṁ hṛṣṭaḥ pūjayāmāsa tattvataḥ

ऐसा कहकर वे भगवान तत्पश्चात् अंतर्धान हो गये; और चण्डशर्मा भी हर्षित होकर यथार्थ रूप से उसकी पूजा करने लगा।

श्लोक 25 (skanda.6.164.25)

प्रासादं कारयामास तस्य लिंगस्य शोभनम् ॥ नाम चक्रे ततस्तस्य विचार्य च मुहुर्मुहुः

prāsādaṁ kārayāmāsa tasya liṁgasya śobhanam nāma cakre tatastasya vicārya ca muhurmuhuḥ

उसने उस लिंग के लिए एक सुंदर मंदिर बनवाया, और फिर बार-बार विचार करके उसका नाम रखा।

श्लोक 26 (skanda.6.164.26)

नगरस्थितलिंगानां यस्मात्संस्मरणात्स्थितः ॥ नागरेश्वरसंज्ञस्तु तस्मादेष भविष्यति

nagarasthitaliṁgānāṁ yasmātsaṁsmaraṇātsthitaḥ nāgareśvarasaṁjñastu tasmādeṣa bhaviṣyati

चूँकि यह नगर में स्थित लिंगों के स्मरण से स्थापित है, इसलिए यह 'नागरेश्वर' नाम से प्रसिद्ध होगा।

श्लोक 27 (skanda.6.164.27)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवं संस्थाप्य तल्लिंगं चंडशर्मा द्विजोत्तमाः ॥ आराधयामास तदा पुष्पधूपानुलेपनैः

sūta uvāca evaṁ saṁsthāpya talliṁgaṁ caṁḍaśarmā dvijottamāḥ ārādhayāmāsa tadā puṣpadhūpānulepanaiḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो! इस प्रकार उस लिंग की स्थापना करके चण्डशर्मा ने तब पुष्प, धूप और अनुलेपन से उसकी आराधना की।

श्लोक 28 (skanda.6.164.28)

सप्तविंशतिलिंगानां प्राप्नोति च तथा फलम् ॥ पूजितानां द्विजश्रेष्ठा नगरे यानि तानि च

saptaviṁśatiliṁgānāṁ prāpnoti ca tathā phalam pūjitānāṁ dvijaśreṣṭhā nagare yāni tāni ca

और इस प्रकार वह उन सत्ताईस लिंगों के पूजन का फल भी प्राप्त करता रहा, हे द्विजश्रेष्ठो! जो नगर में स्थित थे।

श्लोक 29 (skanda.6.164.29)

ततः कालेन महता नागरेश्वरतुष्टितः ॥ शिवलोकं गतः साक्षाद्यानमध्ये निवेशितः

tataḥ kālena mahatā nāgareśvaratuṣṭitaḥ śivalokaṁ gataḥ sākṣādyānamadhye niveśitaḥ

तत्पश्चात् दीर्घकाल के बाद नागरेश्वर की प्रसन्नता से वह विमान में बैठकर साक्षात् शिवलोक को प्राप्त हुआ।

श्लोक 30 (skanda.6.164.30)

पुष्पोपि स्थापयामास पुष्पादित्यमथापरम् ॥ पुण्ये सरस्वतीतीरे ततः पूजापरोऽभवत्

puṣpopi sthāpayāmāsa puṣpādityamathāparam puṇye sarasvatītīre tataḥ pūjāparo'bhavat

पुष्प ने भी सरस्वती के पुण्य तट पर एक और पुष्पादित्य की स्थापना की, और तत्पश्चात् उसकी पूजा में तत्पर हो गया।

श्लोक 31 (skanda.6.164.31)

तस्यापि दर्शनं गत्वा प्रीत्या वचनमब्रवीत् ॥ पुष्प तुष्टोस्मि भद्रं ते वरं प्रार्थय सुव्रत

tasyāpi darśanaṁ gatvā prītyā vacanamabravīt puṣpa tuṣṭosmi bhadraṁ te varaṁ prārthaya suvrata

उसे भी दर्शन देकर सूर्य ने प्रेमपूर्वक कहा — 'हे पुष्प! मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; हे सुव्रत! वर माँगो।'

श्लोक 32 (skanda.6.164.32)

अदेयमपि दास्यामि तस्मात्प्रार्थय मा चिरम्

adeyamapi dāsyāmi tasmātprārthaya mā ciram

'मैं वह भी दूँगा जो अन्यथा न देने योग्य है; अतः बिना विलंब किये माँगो।'

श्लोक 33 (skanda.6.164.33)

॥ पुष्प उवाच ॥ ॥ यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम ॥ तद्देहि याचमानस्य मम यद्धृदि संस्थितम्

puṣpa uvāca yadi tuṣṭo'si me deva yadi deyo varo mama taddehi yācamānasya mama yaddhṛdi saṁsthitam

पुष्प ने कहा — हे देव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, यदि मुझे वर देना चाहते हैं, तो मुझ याचक को वह दीजिये जो मेरे हृदय में स्थित है।

श्लोक 34 (skanda.6.164.34)

चमत्कारपुरे देव तव या मूर्तयः स्थिताः ॥ द्वादशैव प्रमाणेन पूज्याः सर्वदिवौकसाम्

camatkārapure deva tava yā mūrtayaḥ sthitāḥ dvādaśaiva pramāṇena pūjyāḥ sarvadivaukasām

'हे देव! चमत्कारपुर में जो आपकी बारह मूर्तियाँ स्थित हैं, जो समस्त देवताओं द्वारा पूज्य हैं —'

श्लोक 35 (skanda.6.164.35)

तासां पूजाफलं कृत्स्नं संप्राप्नोतु नरो भुवि ॥ यः पूजयति मूर्तिं ते यैषा संस्थापिता मया

tāsāṁ pūjāphalaṁ kṛtsnaṁ saṁprāpnotu naro bhuvi yaḥ pūjayati mūrtiṁ te yaiṣā saṁsthāpitā mayā

'— उन सबकी पूजा का सम्पूर्ण फल पृथ्वी पर वह मनुष्य प्राप्त करे, जो आपकी इस मूर्ति की पूजा करता है, जिसे मैंने स्थापित किया है।'

श्लोक 36 (skanda.6.164.36)

नागरादित्य इत्येषा ख्याता भवतु भूतले ॥ येयं सरस्वतीतीरे प्रासादे स्थापिता मया

nāgarāditya ityeṣā khyātā bhavatu bhūtale yeyaṁ sarasvatītīre prāsāde sthāpitā mayā

'यह जो सरस्वती के तट पर मंदिर में मेरे द्वारा स्थापित की गयी है, यह पृथ्वी पर नागरादित्य नाम से विख्यात हो।'

श्लोक 37 (skanda.6.164.37)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ स तथेति प्रतिज्ञाय गतश्चादर्शनं रविः ॥ दीपवद्ब्राह्मणश्रेष्ठास्तदद्भुतमिवाभवत्

sūta uvāca sa tatheti pratijñāya gataścādarśanaṁ raviḥ dīpavadbrāhmaṇaśreṣṭhāstadadbhutamivābhavat

सूत जी ने कहा — 'ऐसा ही हो' कहकर सूर्य अंतर्धान हो गये; हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! वह दीपक के समान बुझ जाना मानो एक अद्भुत घटना हो गयी।

श्लोक 38 (skanda.6.164.38)

ततः कालेन महता पुष्पोपि द्विजसत्तमाः ॥ सूर्यलोकमनुप्राप्तो विमानेन सुवर्चसा

tataḥ kālena mahatā puṣpopi dvijasattamāḥ sūryalokamanuprāpto vimānena suvarcasā

तत्पश्चात् दीर्घकाल बाद, हे द्विजसत्तमो! पुष्प भी एक तेजस्वी विमान द्वारा सूर्यलोक को प्राप्त हुआ।

श्लोक 39 (skanda.6.164.39)

शाकम्भरीति विख्याता भार्याऽऽसीच्चंडशर्मणः ॥ तया संस्थापिता दुर्गा सरस्वत्याः शुभे तटे

śākambharīti vikhyātā bhāryā''sīccaṁḍaśarmaṇaḥ tayā saṁsthāpitā durgā sarasvatyāḥ śubhe taṭe

चण्डशर्मा की पत्नी शाकम्भरी नाम से विख्यात थी; उसके द्वारा सरस्वती के शुभ तट पर दुर्गा की स्थापना की गयी।

श्लोक 40 (skanda.6.164.40)

आराधिताऽथ सद्भक्त्या दिवानक्तं द्विजोत्तमाः ॥ ततस्तुष्टा वरं तस्याः सा ददौ द्विजसत्तमाः

ārādhitā'tha sadbhaktyā divānaktaṁ dvijottamāḥ tatastuṣṭā varaṁ tasyāḥ sā dadau dvijasattamāḥ

हे द्विजोत्तमो! वह दिन-रात सच्ची भक्ति से आराधित हुई; तब प्रसन्न होकर, हे द्विजसत्तमो! उस देवी ने उसे वर दिया।

श्लोक 41 (skanda.6.164.41)

पुत्रि तुष्टास्मि भद्रं ते शाकंभरि प्रगृह्यताम् ॥ वरं यत्ते सदाभीष्टं मत्प्रसादादसंशयम्

putri tuṣṭāsmi bhadraṁ te śākaṁbhari pragṛhyatām varaṁ yatte sadābhīṣṭaṁ matprasādādasaṁśayam

'हे पुत्री! मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; हे शाकम्भरि! तुम्हें सदा अभीष्ट वर मेरी कृपा से निःसंदेह प्राप्त हो।'

श्लोक 42 (skanda.6.164.42)

॥ शाकम्भर्युवाच ॥ ॥ चतुःषष्टिगणा देवि मातृणां ये व्यवस्थिताः ॥ चमत्कारपुरे ख्याता हास्यात्तुष्टिं व्रजंति याः

śākambharyuvāca catuḥṣaṣṭigaṇā devi mātṛṇāṁ ye vyavasthitāḥ camatkārapure khyātā hāsyāttuṣṭiṁ vrajaṁti yāḥ

शाकम्भरी ने कहा — हे देवि! मातृकाओं के जो चौंसठ गण चमत्कारपुर में विख्यात होकर स्थित हैं, जो हँसी मात्र से भी संतुष्ट हो जाती हैं —

श्लोक 43 (skanda.6.164.43)

या रात्रौ बलिदानेन जाते वृद्धौ ततः परम् ॥ तत्सर्वं जायतां पुण्यं यस्ते मूर्तिं प्रपूजयेत्

yā rātrau balidānena jāte vṛddhau tataḥ param tatsarvaṁ jāyatāṁ puṇyaṁ yaste mūrtiṁ prapūjayet

— जिन्हें घर में वृद्धि होने पर रात्रि में बलि दी जाती है, उससे जो भी पुण्य उत्पन्न होता है, वह सब उसे प्राप्त हो जो आपकी इस मूर्ति की पूजा करता है।

श्लोक 44 (skanda.6.164.44)

अत्रागत्य नदीतीरे यैषा संस्थापिता मया

atrāgatya nadītīre yaiṣā saṁsthāpitā mayā

— यह जो मैंने यहाँ आकर नदी के तट पर स्थापित की है।

श्लोक 45 (skanda.6.164.45)

॥ श्रीदेव्युवाच ॥ ॥ आश्विनस्य सिते पक्षे महानवमिसंज्ञिते ॥ यो ममाग्रे समागत्य पूजयिष्यति भक्तितः

śrīdevyuvāca āśvinasya site pakṣe mahānavamisaṁjñite yo mamāgre samāgatya pūjayiṣyati bhaktitaḥ

श्री देवी ने कहा — आश्विन के शुक्ल पक्ष में, महानवमी नामक तिथि को, जो कोई मेरे समक्ष आकर भक्तिपूर्वक पूजा करेगा,

श्लोक 46 (skanda.6.164.46)

तस्य कृत्स्नं फलं सद्यो भविष्यति न संशयः ॥ नागरस्य विशेषेण सत्यमेतन्मयोदितम्

tasya kṛtsnaṁ phalaṁ sadyo bhaviṣyati na saṁśayaḥ nāgarasya viśeṣeṇa satyametanmayoditam

— उसे तत्काल संपूर्ण फल प्राप्त होगा, इसमें संदेह नहीं; विशेषतः नागर के लिए तो यह सत्य मैंने कहा है।

श्लोक 47 (skanda.6.164.47)

एवमुक्त्वा तु सा देवी ततश्चादर्शनं गता ॥ तस्या नाम्ना च सा देवी प्रोक्ता शाकम्भरी भुवि

evamuktvā tu sā devī tataścādarśanaṁ gatā tasyā nāmnā ca sā devī proktā śākambharī bhuvi

ऐसा कहकर वह देवी तत्पश्चात् अंतर्धान हो गयी; और उसी के नाम से वह देवी पृथ्वी पर 'शाकम्भरी' कहलायी।

श्लोक 48 (skanda.6.164.48)

वृद्धेरनंतरं तस्या यः पूजां कुरुते नरः ॥ तस्य वृद्धेर्न विघ्नः स्यात्कदाचिद्द्विजसत्तमाः

vṛddheranaṁtaraṁ tasyā yaḥ pūjāṁ kurute naraḥ tasya vṛddherna vighnaḥ syātkadāciddvijasattamāḥ

जो मनुष्य वृद्धि होने के तुरंत बाद उसकी पूजा करता है, हे द्विजसत्तमो! उसकी उस वृद्धि में कभी कोई विघ्न नहीं होता।

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