नागर खण्ड · अध्याय 165
अश्वतीर्थोत्पत्तिवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.165.1)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ ततःप्रभृति पुण्ये च सरस्वत्यास्तटे शुभे ॥ बाह्यानां नागराणां च स्थानं जातं महत्तरम्
sūta uvāca tataḥprabhṛti puṇye ca sarasvatyāstaṭe śubhe bāhyānāṁ nāgarāṇāṁ ca sthānaṁ jātaṁ mahattaram
सूत जी ने कहा — तब से पुण्य और शुभ सरस्वती के तट पर बाह्य नागरों का एक बड़ा स्थान बन गया।
श्लोक 2 (skanda.6.165.2)
पुत्रपौत्रप्रवृद्धानां दौहित्राणां द्विजोत्तमाः ॥ चमत्कारपुरस्याग्रे यज्ज्ञातं विद्यया धनैः
putrapautrapravṛddhānāṁ dauhitrāṇāṁ dvijottamāḥ camatkārapurasyāgre yajjñātaṁ vidyayā dhanaiḥ
हे द्विजोत्तमो! पुत्र-पौत्रों और दौहित्रों से समृद्ध हुए उन लोगों का, जो विद्या और धन से चमत्कारपुर के समक्ष प्रख्यात हो गये थे,
श्लोक 3 (skanda.6.165.3)
कस्यचित्त्वथ कालस्य विश्वामित्रेण धीमता ॥ शप्ता सरस्वती कोपात्कृता रुधिरवाहिनी
kasyacittvatha kālasya viśvāmitreṇa dhīmatā śaptā sarasvatī kopātkṛtā rudhiravāhinī
अब कुछ काल के पश्चात् बुद्धिमान विश्वामित्र ने क्रोधवश सरस्वती को शाप देकर उसे रुधिर बहाने वाली नदी बना दिया।
श्लोक 4 (skanda.6.165.4)
ततः संसेव्यते हृष्टैः राक्षसैः सा दिवानिशम् ॥ गीतनृत्यपरैश्चान्यैर्भूतैः प्रेतैः पिशाचकैः
tataḥ saṁsevyate hṛṣṭaiḥ rākṣasaiḥ sā divāniśam gītanṛtyaparaiścānyairbhūtaiḥ pretaiḥ piśācakaiḥ
तत्पश्चात् वह दिन-रात प्रसन्न होकर गान-नृत्य में लगे हुए राक्षसों तथा अन्य भूत-प्रेत-पिशाचों द्वारा घेरी रहने लगी।
श्लोक 5 (skanda.6.165.5)
ततस्ते नागरा बाह्यास्तां त्यक्त्वा दूरतः स्थिताः ॥ कांदिशीकास्ततो याता भक्ष्यमाणास्तु राक्षसैः ॥ नर्मदायास्तटे पुण्ये मार्कण्डाश्रमसंनिधौ
tataste nāgarā bāhyāstāṁ tyaktvā dūrataḥ sthitāḥ kāṁdiśīkāstato yātā bhakṣyamāṇāstu rākṣasaiḥ narmadāyāstaṭe puṇye mārkaṇḍāśramasaṁnidhau
तब वे बाह्य नागर उसे त्यागकर दूर जा बसे; राक्षसों द्वारा खाए जाने के भय से भागते हुए वे नर्मदा के पुण्य तट पर, मार्कण्ड-आश्रम के समीप चले गये।
श्लोक 6 (skanda.6.165.6)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ कस्मात्सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता ॥ महानद्या कोऽपराधस्तया तस्य विनिर्मितः
ṛṣaya ūcuḥ kasmātsarasvatī śaptā viśvāmitreṇa dhīmatā mahānadyā ko'parādhastayā tasya vinirmitaḥ
ऋषियों ने कहा — बुद्धिमान विश्वामित्र ने सरस्वती को क्यों शाप दिया? उस महानदी ने उनका क्या अपराध किया था?
श्लोक 7 (skanda.6.165.7)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ आसीत्पुरा महद्वैरं विश्वामित्रवसिष्ठयोः ॥ ब्राह्मण्यस्य कृते विप्राः प्राणान्तकरणं महत् ॥ स सर्वैर्ब्राह्मणैः प्रोक्तो विश्वामित्रो महामुनिः
sūta uvāca āsītpurā mahadvairaṁ viśvāmitravasiṣṭhayoḥ brāhmaṇyasya kṛte viprāḥ prāṇāntakaraṇaṁ mahat sa sarvairbrāhmaṇaiḥ prokto viśvāmitro mahāmuniḥ
सूत जी ने कहा — हे विप्रो! पूर्वकाल में विश्वामित्र और वसिष्ठ के बीच ब्राह्मणत्व के लिए एक बड़ा वैर था, जो प्राणान्तक स्तर तक पहुँच गया था; उस महामुनि विश्वामित्र से समस्त ब्राह्मणों ने कहा —
श्लोक 8 (skanda.6.165.8)
क्षत्रियोऽपि पुरस्कृत्य देवदेवं पितामहम् ॥ न चैकेन वसिष्ठेन तेनैतद्वैरमाहितम्
kṣatriyo'pi puraskṛtya devadevaṁ pitāmaham na caikena vasiṣṭhena tenaitadvairamāhitam
'— यद्यपि तुम क्षत्रिय हो, देवाधिदेव पितामह को आगे करके तुम ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए; और यह वैर केवल वसिष्ठ के द्वारा उत्पन्न नहीं हुआ है।'
श्लोक 9 (skanda.6.165.9)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ क्षत्रियोऽपि कथं विप्रो विश्वामित्रो महामते ॥ वसिष्ठेन कथं नोक्तो यः प्रोक्तो ब्रह्मणा स्वयम्
ṛṣaya ūcuḥ kṣatriyo'pi kathaṁ vipro viśvāmitro mahāmate vasiṣṭhena kathaṁ nokto yaḥ prokto brahmaṇā svayam
ऋषियों ने कहा — हे महामते! क्षत्रिय होते हुए भी विश्वामित्र किस प्रकार विप्र बने? और जिसे स्वयं ब्रह्मा ने घोषित किया था, उसे वसिष्ठ ने क्यों स्वीकार नहीं किया?
श्लोक 10 (skanda.6.165.10)
एतन्नः सर्वमाचक्ष्व परं कौतूहलं स्थितम्
etannaḥ sarvamācakṣva paraṁ kautūhalaṁ sthitam
यह सब हमें बताइये — हमें इसमें अत्यंत कौतूहल है।
श्लोक 11 (skanda.6.165.11)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ आसीत्पुरा ऋचीकाख्यो भृगुपुत्रो महामुनिः ॥ व्रताध्ययनसंपन्नः सुतपस्वी महायशाः
sūta uvāca āsītpurā ṛcīkākhyo bhṛguputro mahāmuniḥ vratādhyayanasaṁpannaḥ sutapasvī mahāyaśāḥ
सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में ऋचीक नामक भृगु के पुत्र एक महामुनि थे, जो व्रत और अध्ययन से सम्पन्न, महान तपस्वी और महायशस्वी थे।
श्लोक 12 (skanda.6.165.12)
तीर्थयात्राप्रसंगेन स कदाचिन्मुनीश्वरः ॥ स्थानं भोजकटं नाम प्राप्तो गाधिमहीपतेः ॥ यत्र सा कौशिकीनाम नदी त्रैलोक्यविश्रुता
tīrthayātrāprasaṁgena sa kadācinmunīśvaraḥ sthānaṁ bhojakaṭaṁ nāma prāpto gādhimahīpateḥ yatra sā kauśikīnāma nadī trailokyaviśrutā
एक बार तीर्थयात्रा के प्रसंग में वह मुनीश्वर राजा गाधि के भोजकट नामक स्थान को प्राप्त हुए, जहाँ त्रैलोक्यविख्यात कौशिकी नामक नदी बहती है।
श्लोक 13 (skanda.6.165.13)
तस्यां स्नात्वा द्विजश्रेष्ठो यावत्तिष्ठति तीरगः ॥ समाधिस्थो जपं कुर्वन्संतर्प्य पितृदेवताः
tasyāṁ snātvā dvijaśreṣṭho yāvattiṣṭhati tīragaḥ samādhistho japaṁ kurvansaṁtarpya pitṛdevatāḥ
उसमें स्नान करके, जब वह श्रेष्ठ द्विज तट पर समाधिस्थ होकर, पितृ-देवताओं को तर्पण देकर जप कर रहे थे,
श्लोक 14 (skanda.6.165.14)
तावत्तत्र समायाता राजकन्या सुशोभना ॥ सर्वलक्षणसम्पूर्णा सर्वैरेव गुणैर्युता
tāvattatra samāyātā rājakanyā suśobhanā sarvalakṣaṇasampūrṇā sarvaireva guṇairyutā
उसी समय वहाँ एक सुशोभित राजकन्या आ पहुँची, जो समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न तथा सभी गुणों से युक्त थी।
श्लोक 15 (skanda.6.165.15)
स तां संवीक्षते यावत्सर्वावयवशोभनाम् ॥ तावत्कामशरैर्व्याप्तः कर्तव्यं नाभ्यविंदत
sa tāṁ saṁvīkṣate yāvatsarvāvayavaśobhanām tāvatkāmaśarairvyāptaḥ kartavyaṁ nābhyaviṁdata
जैसे ही उसने उस सर्वांग-सुंदरी को देखा, वे कामबाणों से आविष्ट हो गये और कुछ भी करणीय नहीं सूझा।
श्लोक 16 (skanda.6.165.16)
ततः पप्रच्छ लोकान्स लब्ध्वा कृच्छ्रेण चेतनाम् ॥ कस्येयं कन्यका साध्वी किमर्थमिह चागता
tataḥ papraccha lokānsa labdhvā kṛcchreṇa cetanām kasyeyaṁ kanyakā sādhvī kimarthamiha cāgatā
तब कठिनाई से चेतना प्राप्त करके उन्होंने लोगों से पूछा — 'यह साध्वी कन्या किसकी है, और किस कारण यहाँ आयी है?'
श्लोक 17 (skanda.6.165.17)
क्व यास्यति वरारोहा सर्वं मे कथ्यतां जनाः
kva yāsyati varārohā sarvaṁ me kathyatāṁ janāḥ
'यह सुंदरी कहाँ जाएगी? हे लोगो! मुझे यह सब बताओ।'
श्लोक 18 (skanda.6.165.18)
॥ जना ऊचुः ॥ ॥ एषा गाधिसुता नाम ख्याता त्रैलोक्यसुन्दरी ॥ अन्तःपुरात्समायाता गौरीपूजनलालसा
janā ūcuḥ eṣā gādhisutā nāma khyātā trailokyasundarī antaḥpurātsamāyātā gaurīpūjanalālasā
लोगों ने कहा — यह गाधि की पुत्री है, जो त्रैलोक्यसुन्दरी के नाम से विख्यात है; वह अंतःपुर से गौरी की पूजा की उत्कण्ठा में यहाँ आयी है।
श्लोक 19 (skanda.6.165.19)
वांछमाना सुभर्त्तारं सर्वैः समुदितंगुणैः ॥ प्रासादोऽयं स्थितो योऽत्र नदीतीरे बृहत्तरः
vāṁchamānā subharttāraṁ sarvaiḥ samuditaṁguṇaiḥ prāsādo'yaṁ sthito yo'tra nadītīre bṛhattaraḥ
— वह समस्त गुणों से युक्त एक उत्तम पति की कामना करती है; नदी के तट पर स्थित यह विशाल मंदिर,
श्लोक 20 (skanda.6.165.20)
उमा संतिष्ठते चात्र सर्वैः संपूजिता सुरैः ॥ एतां च स्नापयित्वेयं पूजयित्वा यथा क्रमम्
umā saṁtiṣṭhate cātra sarvaiḥ saṁpūjitā suraiḥ etāṁ ca snāpayitveyaṁ pūjayitvā yathā kramam
यहाँ उमा विराजमान हैं, जो समस्त देवताओं द्वारा पूजित हैं; इनकी मूर्ति को स्नान कराकर तथा यथाविधि पूजा करके,
श्लोक 21 (skanda.6.165.21)
नैवेद्यं विविधं दत्त्वा करिष्यति ततः परम् ॥ वीणाविनोदमात्रं च श्रुतिमार्गसुखावहम्
naivedyaṁ vividhaṁ dattvā kariṣyati tataḥ param vīṇāvinodamātraṁ ca śrutimārgasukhāvaham
और नाना प्रकार का नैवेद्य अर्पित करके, तत्पश्चात् वह केवल वीणा-वादन के आनंद में, जो श्रवण-सुखद है, रत होगी।
श्लोक 22 (skanda.6.165.22)
ततो यास्यति हर्म्यं स्वं मन्दीभूते च भास्करे ॥ ऋचीकस्तु तदाकर्ण्य लोकानां वचनं च यत्
tato yāsyati harmyaṁ svaṁ mandībhūte ca bhāskare ṛcīkastu tadākarṇya lokānāṁ vacanaṁ ca yat
फिर, सूर्य के मंद होने पर, वह अपने महल को चली जाएगी। और ऋचीक ने लोगों की यह बात सुनकर,
श्लोक 23 (skanda.6.165.23)
ययौ गाधिगृहं शीघ्रं कामबाणप्रपीडितः ॥ तं दृष्ट्वा सहसा प्राप्तमृचीकं भृगुसत्तमम् ॥ संमुखः प्रययौ तूर्णं गाधिः पार्थिवसत्तमः
yayau gādhigṛhaṁ śīghraṁ kāmabāṇaprapīḍitaḥ taṁ dṛṣṭvā sahasā prāptamṛcīkaṁ bhṛgusattamam saṁmukhaḥ prayayau tūrṇaṁ gādhiḥ pārthivasattamaḥ
कामबाण से पीड़ित होकर वे शीघ्र ही गाधि के घर गये। भृगुश्रेष्ठ ऋचीक को अचानक आया हुआ देखकर राजा गाधि शीघ्र ही उनके सम्मुख गये।
श्लोक 24 (skanda.6.165.24)
गृह्योक्तेन विधानेन कृत्वा चैवार्हणं ततः ॥ कृतांजलिपुटो भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह
gṛhyoktena vidhānena kṛtvā caivārhaṇaṁ tataḥ kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā vākyametaduvāca ha
फिर गृह्यसूत्र में कहे गये विधान के अनुसार उनका सत्कार करके, हाथ जोड़कर उसने यह वचन कहा —
श्लोक 25 (skanda.6.165.25)
निःस्पृहस्यापि ते विप्र किमागमनकारणम् ॥ तत्सर्वं मे समाचक्ष्व येन यच्छामि तेऽखिलम्
niḥspṛhasyāpi te vipra kimāgamanakāraṇam tatsarvaṁ me samācakṣva yena yacchāmi te'khilam
'हे विप्र! आप जैसे निःस्पृह के आगमन का क्या कारण है? वह सब मुझे बताइये, जिससे मैं आपको वह सब कुछ प्रदान कर सकूँ।'
श्लोक 26 (skanda.6.165.26)
॥ ऋचीक उवाच ॥ ॥ तव कन्याऽस्ति विप्रेंद्र वरार्हा वरवर्णिनी ॥ ब्राह्मोक्तेन विवाहेन तां मे देहि महीपते
ṛcīka uvāca tava kanyā'sti vipreṁdra varārhā varavarṇinī brāhmoktena vivāhena tāṁ me dehi mahīpate
ऋचीक ने कहा — हे विप्रेंद्र! आपकी एक वरणीय, सुंदरवर्णा कन्या है; हे महीपते! उसे मुझे ब्राह्म-विवाह विधि से दीजिये।
श्लोक 27 (skanda.6.165.27)
एतदर्थमहं प्राप्तो गृहे तव स्मरार्दितः ॥ सा मया वीक्षिता राजन्गौरीपूजार्थमागता
etadarthamahaṁ prāpto gṛhe tava smarārditaḥ sā mayā vīkṣitā rājangaurīpūjārthamāgatā
इसी कारण मैं कामपीड़ित होकर आपके घर आया हूँ; हे राजन्! मैंने उसे तब देखा था जब वह गौरी-पूजा के लिए आयी थी।
श्लोक 28 (skanda.6.165.28)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ तच्छ्रुत्वा भयसंत्रस्तो गाधिः पार्थिवसत्तमः ॥ असवर्णं च तं मत्वा दरिद्रं वृद्धमेवच ॥ अदाने शापभीतस्तु ततो व्याजमुवाच सः
sūta uvāca tacchrutvā bhayasaṁtrasto gādhiḥ pārthivasattamaḥ asavarṇaṁ ca taṁ matvā daridraṁ vṛddhamevaca adāne śāpabhītastu tato vyājamuvāca saḥ
सूत जी ने कहा — यह सुनकर राजा गाधि भय से व्याकुल हो गये, और उसे असवर्ण, दरिद्र तथा वृद्ध समझते हुए भी, न देने पर शाप के भय से, उन्होंने एक बहाना बना दिया —
श्लोक 29 (skanda.6.165.29)
अस्माकं कन्यकादाने शुल्कमस्ति द्विजोत्तम ॥ तच्चेद्यच्छसि कन्यां तां तुभ्यं दास्याम्यसंशयम्
asmākaṁ kanyakādāne śulkamasti dvijottama taccedyacchasi kanyāṁ tāṁ tubhyaṁ dāsyāmyasaṁśayam
'हे द्विजोत्तम! हमारे यहाँ कन्यादान में एक शुल्क होता है; यदि आप वह दे सकें, तो मैं निःसंदेह वह कन्या आपको दे दूँगा।'
श्लोक 30 (skanda.6.165.30)
॥ ऋचीक उवाच ॥ ॥ ब्रूहि पार्थिवशार्दूल कन्याशुल्कं मम द्रुतम् ॥ येन यच्छामि ते सर्वं यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
ṛcīka uvāca brūhi pārthivaśārdūla kanyāśulkaṁ mama drutam yena yacchāmi te sarvaṁ yadyapi syātsudurlabham
ऋचीक ने कहा — हे नृपश्रेष्ठ! शीघ्र बताइये कि कन्या का शुल्क क्या है, जिससे मैं आपको वह सब दे सकूँ, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।
श्लोक 31 (skanda.6.165.31)
॥ गाधिरुवाच ॥ ॥ एकतः श्यामकर्णानामश्वानां वातरंहसाम् ॥ शतानि सप्त विप्रेंद्र श्वेतानां चैव सर्वतः
gādhiruvāca ekataḥ śyāmakarṇānāmaśvānāṁ vātaraṁhasām śatāni sapta vipreṁdra śvetānāṁ caiva sarvataḥ
गाधि ने कहा — हे विप्रेंद्र! एक ओर श्यामकर्ण, वायुवेगी सात सौ अश्व, और सब ओर से श्वेत अश्व भी —
श्लोक 32 (skanda.6.165.32)
य आनीय प्रदद्यान्मे तस्मै कन्यां ददाम्यहम्
ya ānīya pradadyānme tasmai kanyāṁ dadāmyaham
'— जो कोई इन्हें लाकर मुझे दे देगा, उसे ही मैं यह कन्या दूँगा।'
श्लोक 33 (skanda.6.165.33)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ स तथेति प्रतिज्ञाय ऋचीको मुनिसत्तमः ॥ कान्यकुब्जं समासाद्य गंगातीरे विवेश ह
sūta uvāca sa tatheti pratijñāya ṛcīko munisattamaḥ kānyakubjaṁ samāsādya gaṁgātīre viveśa ha
सूत जी ने कहा — 'ऐसा ही होगा' यह प्रतिज्ञा करके मुनिसत्तम ऋचीक कान्यकुब्ज पहुँचकर गंगा के तट पर गये।
श्लोक 34 (skanda.6.165.34)
अश्वो वोढेति यत्सूक्तं चतुःषष्टिसमुद्भवम् ॥ छंदऋषिदेवतायुक्तं जपं चक्रे ततः परम्
aśvo voḍheti yatsūktaṁ catuḥṣaṣṭisamudbhavam chaṁdaṛṣidevatāyuktaṁ japaṁ cakre tataḥ param
'अश्वो वोढेति' नामक जो सूक्त चौंसठ ऋचाओं से युक्त है, छन्द, ऋषि और देवता सहित, उसका उन्होंने तत्पश्चात् जप किया।
श्लोक 35 (skanda.6.165.35)
विनियोगं वाजिकृतं गाधिना यत्प्रकीर्तितम् ॥ ततस्ते वाजिनस्तस्मान्निष्क्रांताः सलिलाद्द्विजाः
viniyogaṁ vājikṛtaṁ gādhinā yatprakīrtitam tataste vājinastasmānniṣkrāṁtāḥ salilāddvijāḥ
उस विनियोग को घोड़ों की सिद्धि के लिए, जैसा गाधि ने बताया था, उसी प्रकार लागू किया; तत्पश्चात्, हे द्विजो! वे अश्व उस जल से निकल आये।
श्लोक 36 (skanda.6.165.36)
सर्वश्वेताः सुवेगाश्च श्यामैकश्रवणास्तथा ॥ शतानि सप्तसंख्यानि तावत्संख्यैर्नरैयुताः
sarvaśvetāḥ suvegāśca śyāmaikaśravaṇāstathā śatāni saptasaṁkhyāni tāvatsaṁkhyairnaraiyutāḥ
सभी श्वेत, वेगवान तथा एक कान श्याम वर्ण के — सात सौ की संख्या में, उतनी ही संख्या के पुरुषों के साथ।
श्लोक 37 (skanda.6.165.37)
ततः प्रभृति विख्यातमश्वतीर्थं धरातले ॥ गंगातीरे शुभे पुण्ये कान्यकुब्जसमीपगम् ॥ यस्मिन्स्नाने कृते मर्त्यो वाजिमेधफलं लभेत्
tataḥ prabhṛti vikhyātamaśvatīrthaṁ dharātale gaṁgātīre śubhe puṇye kānyakubjasamīpagam yasminsnāne kṛte martyo vājimedhaphalaṁ labhet
तब से यह अश्वतीर्थ, गंगा के शुभ और पुण्य तट पर, कान्यकुब्ज के समीप, पृथ्वी पर विख्यात हुआ — जहाँ स्नान करने से मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।