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नागर खण्ड · अध्याय 166

परशुरामोत्पत्तिवर्णन

अध्याय 165अध्याय-सूचीअध्याय 167

श्लोक 1 (skanda.6.166.1)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ ऋचीकोऽपि समादाय पुरुषैराप्तकारिभिः ॥ तानश्वान्प्रजगामाथ यत्र गाधिर्व्यवस्थितः

sūta uvāca ṛcīko'pi samādāya puruṣairāptakāribhiḥ tānaśvānprajagāmātha yatra gādhirvyavasthitaḥ

सूत जी ने कहा — ऋचीक भी विश्वासपात्र पुरुषों के साथ उन अश्वों को लेकर वहाँ गये जहाँ गाधि विराजमान थे।

श्लोक 2 (skanda.6.166.2)

तस्मै निवेदयामास कन्यार्थं तान्हयोत्तमान् ॥ गाधिस्तु तान्प्रगृह्याथ योग्यान्वाजिमखस्य च

tasmai nivedayāmāsa kanyārthaṁ tānhayottamān gādhistu tānpragṛhyātha yogyānvājimakhasya ca

उन्होंने कन्या के बदले उन उत्तम अश्वों को गाधि को अर्पित किया; और गाधि ने उन्हें अश्वमेध यज्ञ के योग्य जानकर स्वीकार करके,

श्लोक 3 (skanda.6.166.3)

एकैकं परमं तेषां स जगामाथ पार्थिवः ॥ ततस्तां प्रददौ तस्मै कन्यां त्रैलोक्यसुन्दरीम्

ekaikaṁ paramaṁ teṣāṁ sa jagāmātha pārthivaḥ tatastāṁ pradadau tasmai kanyāṁ trailokyasundarīm

उस राजा ने उनमें से एक-एक श्रेष्ठ अश्व को परखा; तत्पश्चात् उसने उन्हें वह त्रैलोक्यसुन्दरी कन्या प्रदान की।

श्लोक 4 (skanda.6.166.4)

विप्राग्निसाक्षिसंभूतां गृह्योक्तविधिनान्वितः ॥ ततो विवाहे निर्वृत्त ऋचीको मुनिसत्तमः

viprāgnisākṣisaṁbhūtāṁ gṛhyoktavidhinānvitaḥ tato vivāhe nirvṛtta ṛcīko munisattamaḥ

गृह्यसूत्र में कहे गये विधान के अनुसार ब्राह्मणों और अग्नि की साक्षी में, मुनिसत्तम ऋचीक विवाह से निवृत्त हुए।

श्लोक 5 (skanda.6.166.5)

तस्याः संवेशने चैव निष्कामः समपद्यत ॥ अथाब्रवीन्निजां भार्यां निष्कामः संस्थितो मुनिः

tasyāḥ saṁveśane caiva niṣkāmaḥ samapadyata athābravīnnijāṁ bhāryāṁ niṣkāmaḥ saṁsthito muniḥ

उसकी शय्या में भी वे निष्काम ही रहे; तब निष्काम स्थित उस मुनि ने अपनी पत्नी से कहा —

श्लोक 6 (skanda.6.166.6)

अहं यास्यामि सुश्रोणि काननं तपसः कृते ॥ त्वं प्रार्थय वरं कंचिद्येनाभीष्टं ददामि ते

ahaṁ yāsyāmi suśroṇi kānanaṁ tapasaḥ kṛte tvaṁ prārthaya varaṁ kaṁcidyenābhīṣṭaṁ dadāmi te

'हे सुश्रोणि! मैं तपस्या के लिए वन को जाऊँगा; तुम कोई वर माँग लो, जिससे मैं तुम्हारी अभीष्ट वस्तु दे सकूँ।'

श्लोक 7 (skanda.6.166.7)

सा श्रुत्वा तस्य तद्वाक्यं निष्कामस्य प्रजल्पितम् ॥ वाष्पपूर्णेक्षणा दीना जगाम जननीं प्रति

sā śrutvā tasya tadvākyaṁ niṣkāmasya prajalpitam vāṣpapūrṇekṣaṇā dīnā jagāma jananīṁ prati

उस निष्काम के इस वचन को सुनकर वह दीन होकर, अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपनी माता के पास गयी।

श्लोक 8 (skanda.6.166.8)

प्रोवाच वचनं तस्य सा निष्कामपतेस्तदा ॥ वरदानं तथा तेन यथोक्तं द्विजसत्तमाः

provāca vacanaṁ tasya sā niṣkāmapatestadā varadānaṁ tathā tena yathoktaṁ dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो! उसने अपने निष्काम पति के उस वचन को तथा उनके द्वारा बताए गये वरदान को सुनाया।

श्लोक 9 (skanda.6.166.9)

अथ श्रुत्वैव सा माता यथा तज्जल्पितं तया ॥ सुतया ब्राह्मणश्रेष्ठास्ततो वचनमब्रवीत्

atha śrutvaiva sā mātā yathā tajjalpitaṁ tayā sutayā brāhmaṇaśreṣṭhāstato vacanamabravīt

तब अपनी पुत्री के मुख से यह बात सुनकर, हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! उस माता ने यह वचन कहा —

श्लोक 10 (skanda.6.166.10)

यद्ययं पुत्रि ते भर्ता वरं यच्छति वांछितम् ॥ तत्प्रार्थय सुतं तस्माद्ब्राह्मण्येन समन्वितम्

yadyayaṁ putri te bhartā varaṁ yacchati vāṁchitam tatprārthaya sutaṁ tasmādbrāhmaṇyena samanvitam

'हे पुत्री! यदि तुम्हारे यह पति तुम्हें अभीष्ट वर देते हैं, तो उनसे ब्राह्मणत्व से युक्त पुत्र माँगो।'

श्लोक 11 (skanda.6.166.11)

मदर्थं चैकपुत्रं च निःशेषक्षात्त्रतेजसा ॥ संयुक्तं याचय शुभे विपुत्राऽहं यतः स्थिता

madarthaṁ caikaputraṁ ca niḥśeṣakṣāttratejasā saṁyuktaṁ yācaya śubhe viputrā'haṁ yataḥ sthitā

'हे शुभे! और मेरे लिए भी एक पुत्र, जो सम्पूर्ण क्षात्रतेज से युक्त हो, माँग लो, क्योंकि मैं पुत्रविहीन हूँ।'

श्लोक 12 (skanda.6.166.12)

सा श्रुत्वा जननीवाक्यमृचीकं प्राप्य सुव्रता ॥ अब्रवीज्जननी वाक्यं सर्वं विस्तरतो द्विजाः

sā śrutvā jananīvākyamṛcīkaṁ prāpya suvratā abravījjananī vākyaṁ sarvaṁ vistarato dvijāḥ

हे द्विजो! अपनी माता का वचन सुनकर वह सुव्रता ऋचीक के पास जाकर माता की सारी बात विस्तार से कह सुनायी।

श्लोक 13 (skanda.6.166.13)

स तस्याश्च वचः श्रुत्वा चकाराथ चरुद्वयम् ॥ पुत्रेष्टिं विधिवत्कृत्वा नमस्कृत्य स्वयंभुवम्

sa tasyāśca vacaḥ śrutvā cakārātha carudvayam putreṣṭiṁ vidhivatkṛtvā namaskṛtya svayaṁbhuvam

उसकी बात सुनकर उन्होंने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ करके तथा स्वयंभू ब्रह्मा को नमस्कार करके दो चरु तैयार किए।

श्लोक 14 (skanda.6.166.14)

एकस्मिन्योजयामास ब्राह्म्यं तेजोऽखिलं च सः ॥ क्षात्रं तेजस्तथान्यस्मिन्सकलं द्विजसत्तमाः

ekasminyojayāmāsa brāhmyaṁ tejo'khilaṁ ca saḥ kṣātraṁ tejastathānyasminsakalaṁ dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो! एक में उन्होंने सम्पूर्ण ब्राह्म तेज का संयोजन किया, तथा दूसरे में सम्पूर्ण क्षात्र तेज का।

श्लोक 15 (skanda.6.166.15)

भार्यायै प्रददौ पूर्वं ब्राह्म्यं च चरुमुत्तमम् ॥ अब्रवीत्प्राशयित्वैनमश्वत्थालिंगनं कुरु

bhāryāyai pradadau pūrvaṁ brāhmyaṁ ca carumuttamam abravītprāśayitvainamaśvatthāliṁganaṁ kuru

उन्होंने पहले पत्नी को उत्तम ब्राह्म चरु दिया, और कहा — 'इसे खाकर अश्वत्थ वृक्ष का आलिंगन करो।'

श्लोक 16 (skanda.6.166.16)

ततः प्राप्स्यसि सत्पुत्रं ब्राह्म्यतेजःसमन्वितम् ॥ द्वितीयश्चरुको यश्च तं त्वं मात्रे निवेदय

tataḥ prāpsyasi satputraṁ brāhmyatejaḥsamanvitam dvitīyaścaruko yaśca taṁ tvaṁ mātre nivedaya

'इससे तुम्हें ब्राह्म तेज से युक्त सत्पुत्र प्राप्त होगा। और जो दूसरा चरु है, वह अपनी माता को दे देना।'

श्लोक 17 (skanda.6.166.17)

अब्रवीच्च ततस्तां तु ऋचीको मुनिसत्तमः ॥ त्वमेनं चरुकं प्राश्य न्यग्रोधालिंगनं कुरु

abravīcca tatastāṁ tu ṛcīko munisattamaḥ tvamenaṁ carukaṁ prāśya nyagrodhāliṁganaṁ kuru

मुनिसत्तम ऋचीक ने उससे यह भी कहा — 'तुम इस चरु को खाकर न्यग्रोध वृक्ष का आलिंगन करो।'

श्लोक 18 (skanda.6.166.18)

ततः प्राप्स्यसि सत्पुत्रं संयुक्तं क्षात्रतेजसा ॥ निःशेषेण महाभागे न मे स्याद्वचनं वृथा

tataḥ prāpsyasi satputraṁ saṁyuktaṁ kṣātratejasā niḥśeṣeṇa mahābhāge na me syādvacanaṁ vṛthā

'इससे तुम्हें सम्पूर्ण क्षात्रतेज से युक्त सत्पुत्र प्राप्त होगा, हे महाभागे! मेरा वचन व्यर्थ नहीं होगा।'

श्लोक 19 (skanda.6.166.19)

एवमुक्त्वा ऋचीकस्तु स विसृज्य च तेजसी ॥ सुहृष्टो ब्राह्मणश्रेष्ठः स्वयं च महितोऽभवत्

evamuktvā ṛcīkastu sa visṛjya ca tejasī suhṛṣṭo brāhmaṇaśreṣṭhaḥ svayaṁ ca mahito'bhavat

ऐसा कहकर, दोनों तेजों को इस प्रकार विसर्जित करके, वह श्रेष्ठ ब्राह्मण ऋचीक अत्यंत हर्षित होकर स्वयं भी सम्मानित हुए।

श्लोक 20 (skanda.6.166.20)

ते चैव तु गृहे गत्वा प्रहृष्टेनांतरात्मना ॥ ऊचतुश्च मिथस्ते च सत्यमेतद्भविष्यति

te caiva tu gṛhe gatvā prahṛṣṭenāṁtarātmanā ūcatuśca mithaste ca satyametadbhaviṣyati

और वे दोनों घर जाकर प्रसन्न मन से आपस में कहने लगीं — 'यह अवश्य सत्य होगा।'

श्लोक 21 (skanda.6.166.21)

ततो माता सुतां प्राह आत्मार्थे सकलो जनः ॥ विशेषं कुरुते कृत्ये सामान्ये च व्यवस्थिते

tato mātā sutāṁ prāha ātmārthe sakalo janaḥ viśeṣaṁ kurute kṛtye sāmānye ca vyavasthite

तब माता ने पुत्री से कहा — 'सभी लोग अपने ही स्वार्थ में, सामान्य कार्य के होते हुए भी, विशेष आग्रह करते हैं।'

श्लोक 22 (skanda.6.166.22)

तत्तवार्थं कृतोऽनेन यश्चरुश्चारुलोचने ॥ यस्तस्मिन्विहितोऽनेन मन्त्रग्रामो भविष्यति ॥ विशेषेण महाभागे सत्यमेतन्मयोदितम्

tattavārthaṁ kṛto'nena yaścaruścārulocane yastasminvihito'nena mantragrāmo bhaviṣyati viśeṣeṇa mahābhāge satyametanmayoditam

'हे चारुलोचने! तुम्हारे लिए इसने जो चरु बनाया है, उसमें इसने जो मंत्र-समूह विहित किया है, वह विशेष रूप से फलीभूत होगा; हे महाभागे! यह सत्य मैं कहती हूँ।'

श्लोक 23 (skanda.6.166.23)

तस्माच्च चरुकं मह्यं त्वं गृहाण शुचिस्मिते ॥ आत्मीयं मम यच्छस्व वृक्षाभ्यां च विपर्ययः ॥ क्रियतां च महाभागे येन मे स्यात्सुतोत्तमः

tasmācca carukaṁ mahyaṁ tvaṁ gṛhāṇa śucismite ātmīyaṁ mama yacchasva vṛkṣābhyāṁ ca viparyayaḥ kriyatāṁ ca mahābhāge yena me syātsutottamaḥ

'अतः हे शुचिस्मिते! तुम मेरे लिए बनाया गया चरु ले लो, और अपना चरु मुझे दे दो; तथा हे महाभागे! दोनों वृक्षों को भी बदल दो, जिससे मुझे भी उत्तम पुत्र प्राप्त हो।'

श्लोक 24 (skanda.6.166.24)

राज्यकर्मणि दक्षश्च शूरः परबलार्दनः ॥ त्वदीयो द्विजमात्रोऽपि तव तुष्टिं करिष्यति

rājyakarmaṇi dakṣaśca śūraḥ parabalārdanaḥ tvadīyo dvijamātro'pi tava tuṣṭiṁ kariṣyati

'राज्य-कर्म में कुशल, शूर, शत्रुसेना का नाशक हो; तुम्हारा पुत्र भले ही केवल ब्राह्मण हो, वह भी तुम्हें संतोष देगा।'

श्लोक 25 (skanda.6.166.25)

अथ सा विजने प्रोक्ता तया मात्रा यशस्विनी ॥ अकरोद्व्यत्ययं वृक्षे चरौ च द्विजसत्तमाः

atha sā vijane proktā tayā mātrā yaśasvinī akarodvyatyayaṁ vṛkṣe carau ca dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो! तब उस माता के द्वारा एकांत में यह कहे जाने पर, उस यशस्विनी ने वृक्ष और चरु दोनों में अदल-बदल कर दिया।

श्लोक 26 (skanda.6.166.26)

ततः पुंसवने स्नाते ते शुभे चारुलोचने ॥ दधाते गर्भमेवाथ भर्तुः संयोगतः क्षणात्

tataḥ puṁsavane snāte te śubhe cārulocane dadhāte garbhamevātha bhartuḥ saṁyogataḥ kṣaṇāt

तत्पश्चात् पुंसवन-स्नान करके वे दोनों शुभ, चारुलोचना नारियाँ अपने-अपने पति के संयोग से उसी क्षण गर्भवती हो गयीं।

श्लोक 27 (skanda.6.166.27)

ततस्तु गर्भमासाद्य सा च त्रैलोक्यसुन्दरी ॥ क्षात्त्रेण तेजसा युक्ता तत्क्षणात्समपद्यत ॥ मनो राज्ये ततश्चक्रे हस्त्यश्वारोहणोद्भवे

tatastu garbhamāsādya sā ca trailokyasundarī kṣāttreṇa tejasā yuktā tatkṣaṇātsamapadyata mano rājye tataścakre hastyaśvārohaṇodbhave

तत्पश्चात् गर्भ धारण करने के बाद वह त्रैलोक्यसुंदरी उसी क्षण क्षात्रतेज से युक्त हो गयी, और तब उसका मन राज्य में, हाथी-घोड़ों की सवारी में लगने लगा,

श्लोक 28 (skanda.6.166.28)

युद्धवार्त्तास्तथा चक्रे देवासुरगणोद्भवाः ॥ शृणोति च तथा नित्यं विलासेषु मनो दधे ॥ अनुष्ठानं ततश्चक्रे मनोराज्यसमुद्भवम्

yuddhavārttāstathā cakre devāsuragaṇodbhavāḥ śṛṇoti ca tathā nityaṁ vilāseṣu mano dadhe anuṣṭhānaṁ tataścakre manorājyasamudbhavam

और देव-असुरों के युद्ध की कथाएँ सुनने में उसकी रुचि हो गयी, तथा वह विलासों में भी मन लगाने लगी; तब उसने अपने मनोराज्य से उत्पन्न आचरणों को अपनाया।

श्लोक 29 (skanda.6.166.29)

पितुर्गृहात्समानीय जात्यानश्वांस्तथा गजान् ॥ रक्तानि चैव वस्त्राणि काश्मीराद्यं विलेपनम्

piturgṛhātsamānīya jātyānaśvāṁstathā gajān raktāni caiva vastrāṇi kāśmīrādyaṁ vilepanam

अपने पिता के घर से उत्तम जाति के अश्व, हाथी, लाल वस्त्र तथा केसर आदि के अनुलेपन मँगाकर,

श्लोक 30 (skanda.6.166.30)

तद्दृष्ट्वा चेष्टितं तस्या राज्यार्हं बहुभोगधृक् ॥ ब्राह्मणार्हैः परित्यक्तं समाचारैश्च कृत्स्नशः

taddṛṣṭvā ceṣṭitaṁ tasyā rājyārhaṁ bahubhogadhṛk brāhmaṇārhaiḥ parityaktaṁ samācāraiśca kṛtsnaśaḥ

उसके इस राज्योचित तथा भोगप्रधान आचरण को देखकर, जो ब्राह्मण-योग्य आचारों को सर्वथा त्यागे हुए था,

श्लोक 31 (skanda.6.166.31)

अब्रवीच्च ततः क्रुद्धो धिक्पापे किमिदं कृतम् ॥ व्यत्ययो विहितो नूनं चरुकस्य नगस्य च

abravīcca tataḥ kruddho dhikpāpe kimidaṁ kṛtam vyatyayo vihito nūnaṁ carukasya nagasya ca

वे क्रोधित होकर बोले — 'धिक्कार है, हे पापिनी! यह तूने क्या किया? निश्चय ही चरु और वृक्ष का अदल-बदल किया गया है!'

श्लोक 32 (skanda.6.166.32)

त्वया पापे प्रपश्यामि येनेदृक्तव चेष्टितम् ॥ क्षत्रियार्हं द्विजाचारैः सकलैः परिवर्जितम्

tvayā pāpe prapaśyāmi yenedṛktava ceṣṭitam kṣatriyārhaṁ dvijācāraiḥ sakalaiḥ parivarjitam

'हे पापिनी! मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारा यह आचरण क्षत्रिय के योग्य हो गया है, जो समस्त द्विजाचारों से रहित है।'

श्लोक 33 (skanda.6.166.33)

चीरवल्कलसंत्यक्तं स्नानजाप्यविवर्जितम् ॥ संयुक्तं विविधैर्गन्धैर्मृगनाभिपुरःसरैः

cīravalkalasaṁtyaktaṁ snānajāpyavivarjitam saṁyuktaṁ vividhairgandhairmṛganābhipuraḥsaraiḥ

'तुमने चीर-वल्कल त्याग दिया है, स्नान और जप छोड़ दिया है, और कस्तूरी आदि विविध सुगंधों को अपना लिया है।'

श्लोक 34 (skanda.6.166.34)

तव माता शमस्था सा जपहोमपरायणा ॥ तीर्थयात्रापरा चैव वेदश्रवणलालसा

tava mātā śamasthā sā japahomaparāyaṇā tīrthayātrāparā caiva vedaśravaṇalālasā

'तुम्हारी माता तो शमपरायण हैं, जप-होम में तत्पर हैं, तीर्थयात्रा में लगी रहती हैं तथा वेद-श्रवण की उत्कण्ठा रखती हैं।'

श्लोक 35 (skanda.6.166.35)

तस्मात्ते क्षत्रियः पुत्रो भविष्यति न संशयः

tasmātte kṣatriyaḥ putro bhaviṣyati na saṁśayaḥ

'इसलिए तुम्हारा पुत्र निश्चय ही क्षत्रिय होगा, इसमें संदेह नहीं।'

श्लोक 36 (skanda.6.166.36)

मातुश्च ब्राह्मणश्रेष्ठो ब्रह्मचर्यकथापरः ॥ भविष्यति सुतश्चिह्नैर्गर्भलक्षणसंभवैः

mātuśca brāhmaṇaśreṣṭho brahmacaryakathāparaḥ bhaviṣyati sutaścihnairgarbhalakṣaṇasaṁbhavaiḥ

'और माता का पुत्र श्रेष्ठ ब्राह्मण होगा, ब्रह्मचर्य की कथा में रत रहने वाला — यह गर्भ के लक्षणों से उत्पन्न चिह्नों से ज्ञात होता है।'

श्लोक 37 (skanda.6.166.37)

यस्मादुदीरितः पूर्वं श्लोकोऽयं शास्त्रचिन्तकैः ॥ यादृशा दोहदाः सन्ति सगर्भाणां च योषिताम्

yasmādudīritaḥ pūrvaṁ śloko'yaṁ śāstracintakaiḥ yādṛśā dohadāḥ santi sagarbhāṇāṁ ca yoṣitām

'क्योंकि शास्त्रचिन्तकों ने पूर्वकाल में यह श्लोक कहा है — गर्भवती स्त्रियों को जैसी लालसाएँ होती हैं —'

श्लोक 38 (skanda.6.166.38)

तादृगेव स्वभावेन तासां पुत्रोऽत्र जायते ॥ सैवमुक्ता भयत्रस्ता वेपमाना कृतांजलिः

tādṛgeva svabhāvena tāsāṁ putro'tra jāyate saivamuktā bhayatrastā vepamānā kṛtāṁjaliḥ

'— उसी स्वभाव का पुत्र उन्हें प्राप्त होता है।' इस प्रकार कहे जाने पर वह भयभीत और काँपती हुई, हाथ जोड़कर,

श्लोक 39 (skanda.6.166.39)

बाष्पपूर्णेक्षणा दीना वाक्यमेतदुवाच ह ॥ सत्यमेतत्प्रभो वाक्यं यत्त्वया समुदाहृतम्

bāṣpapūrṇekṣaṇā dīnā vākyametaduvāca ha satyametatprabho vākyaṁ yattvayā samudāhṛtam

अश्रुपूर्ण नेत्रों से दीन होकर यह वचन बोली — 'हे प्रभो! आपने जो यह कहा है, वह सत्य है।'

श्लोक 40 (skanda.6.166.40)

अतीतानागतं वेत्ति विना लिंगैर्भवानिह ॥ तस्मात्कुरु प्रसादं मे यथा स्याद्ब्राह्मणः सुतः ॥ क्षत्रियस्य तु पुत्रस्य भवान्नार्हः कथंचन

atītānāgataṁ vetti vinā liṁgairbhavāniha tasmātkuru prasādaṁ me yathā syādbrāhmaṇaḥ sutaḥ kṣatriyasya tu putrasya bhavānnārhaḥ kathaṁcana

'आप बिना किसी चिह्न के भी भूत-भविष्य को जानते हैं; अतः मुझ पर कृपा कीजिये कि मेरा पुत्र ब्राह्मण हो, क्योंकि आप किसी भी प्रकार क्षत्रिय पुत्र के योग्य नहीं हैं।'

श्लोक 41 (skanda.6.166.41)

॥ ऋचीक उवाच ॥ ॥ यत्किंचिद्ब्रह्मतेजः स्यात्तन्न्यस्तं ते चरौ मया ॥ क्षात्त्रं तेजश्च ते मातुर्व्यत्ययं च कथंचन ॥ करोमि वाधमो लोके शास्त्रस्य च व्यतिक्रमम्

ṛcīka uvāca yatkiṁcidbrahmatejaḥ syāttannyastaṁ te carau mayā kṣāttraṁ tejaśca te māturvyatyayaṁ ca kathaṁcana karomi vādhamo loke śāstrasya ca vyatikramam

ऋचीक ने कहा — जो कुछ भी ब्राह्मतेज था, वह मैंने तुम्हारे चरु में रखा था, और क्षात्रतेज तुम्हारी माता के चरु में; अब मैं किस प्रकार उलटफेर कर लोक में अधम और शास्त्र का उल्लंघन करने वाला बनूँ?

श्लोक 42 (skanda.6.166.42)

॥ पत्न्युवाच ॥ ॥ यद्येवं भृगुशार्दूल मम पौत्रोऽत्र यो भवेत् ॥ क्षात्त्रं तेजोऽखिलं तस्य गात्रे भूयात्त्वयाऽऽहृतम्

patnyuvāca yadyevaṁ bhṛguśārdūla mama pautro'tra yo bhavet kṣāttraṁ tejo'khilaṁ tasya gātre bhūyāttvayā''hṛtam

पत्नी ने कहा — हे भृगुशार्दूल! यदि ऐसा है, तो जो भी मेरा पौत्र यहाँ होगा, उसके शरीर में आपके द्वारा खींचा गया सम्पूर्ण क्षात्रतेज स्थित हो जाए।

श्लोक 43 (skanda.6.166.43)

पुत्रस्तु ब्राह्मणश्रेष्ठो भूयादभ्यधिकस्तव

putrastu brāhmaṇaśreṣṭho bhūyādabhyadhikastava

'किन्तु मेरा पुत्र आपसे भी अधिक श्रेष्ठ ब्राह्मण हो।'

श्लोक 44 (skanda.6.166.44)

॥ ऋचीक उवाच ॥ ॥ एवं भवतु मद्वाक्यात्पुत्रस्ते ब्राह्मणः शुभे ॥ पौत्रः सुदुर्द्धरः संख्ये संयुक्तः क्षात्त्रतेजसा

ṛcīka uvāca evaṁ bhavatu madvākyātputraste brāhmaṇaḥ śubhe pautraḥ sudurddharaḥ saṁkhye saṁyuktaḥ kṣāttratejasā

ऋचीक ने कहा — हे शुभे! मेरे वचन से ऐसा ही हो; तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होगा, और पौत्र क्षात्रतेज से युक्त, युद्ध में दुर्धर्ष होगा।

श्लोक 45 (skanda.6.166.45)

ततः सत्यं वरं लब्ध्वा प्रसन्नवदना सती ॥ मातुर्निवेदयामास तत्सर्वं कांतजल्पितम्

tataḥ satyaṁ varaṁ labdhvā prasannavadanā satī māturnivedayāmāsa tatsarvaṁ kāṁtajalpitam

तत्पश्चात् वह सती सत्य वर पाकर प्रसन्नमुख होकर अपने पति के कहे हुए सारे वचन को माता को सुनायी।

श्लोक 46 (skanda.6.166.46)

ततः सा दशमे मासि संप्राप्ते गुरुदैवते ॥ नक्षत्रे जनयामास पुत्रं बालार्कसन्निभम्

tataḥ sā daśame māsi saṁprāpte gurudaivate nakṣatre janayāmāsa putraṁ bālārkasannibham

तत्पश्चात् दसवें मास में, गुरु के अधिष्ठाता नक्षत्र के आने पर, उसने बाल-सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 47 (skanda.6.166.47)

ब्राह्म्या लक्ष्म्या समोपेतं निधानं तपसां शुचि ॥ जमदग्निरिति ख्यातो योऽसौ त्रैलोक्यविश्रुतः ॥ तस्य पुत्रोभवत्ख्यातो रामोनाम महायशाः

brāhmyā lakṣmyā samopetaṁ nidhānaṁ tapasāṁ śuci jamadagniriti khyāto yo'sau trailokyaviśrutaḥ tasya putrobhavatkhyāto rāmonāma mahāyaśāḥ

वह ब्राह्म-लक्ष्मी से युक्त, तपस्याओं का पवित्र भण्डार, 'जमदग्नि' नाम से विख्यात हुआ, जो त्रैलोक्यविश्रुत हुआ; और उसका पुत्र महायशस्वी 'राम' नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 48 (skanda.6.166.48)

एकविंशतिदा येन धरा निःक्षत्रिया कृता ॥ क्षात्त्रतेजःप्रभावेन पितामहप्रसादतः

ekaviṁśatidā yena dharā niḥkṣatriyā kṛtā kṣāttratejaḥprabhāvena pitāmahaprasādataḥ

जिसने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियरहित कर दिया — यह पितामह की कृपा से प्राप्त क्षात्रतेज के प्रभाव से हुआ।

अध्याय 165अध्याय-सूचीअध्याय 167