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नागर खण्ड · अध्याय 167

विश्वामित्रराज्यपरित्यागवर्णन

अध्याय 166अध्याय-सूचीअध्याय 168

श्लोक 1 (skanda.6.167.1)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ गाधेस्तु याऽथ पत्नी च प्राशनाच्चरुकस्य वै ॥ सापि गर्भं दधे तत्र वासरे मन्त्रतः शुभा

sūta uvāca gādhestu yā'tha patnī ca prāśanāccarukasya vai sāpi garbhaṁ dadhe tatra vāsare mantrataḥ śubhā

सूत जी ने कहा — और गाधि की पत्नी भी उस चरु के प्राशन से, उसी दिन मंत्र के प्रभाव से शुभतापूर्वक गर्भवती हो गयी।

श्लोक 2 (skanda.6.167.2)

सा च गर्भसमोपेता यदा जाता द्विजोत्तमाः ॥ तीर्थयात्रापरा साध्वी जाता व्रतपरायणा

sā ca garbhasamopetā yadā jātā dvijottamāḥ tīrthayātrāparā sādhvī jātā vrataparāyaṇā

हे द्विजोत्तमो! जब वह गर्भवती हुई, तब वह साध्वी तीर्थयात्रा में तत्पर और व्रतपरायण हो गयी।

श्लोक 3 (skanda.6.167.3)

वेदध्वनिर्भवेद्यत्र तत्र हर्षसमन्विता ॥ पुलकांचितसर्वांगी सा शुश्राव च सर्वदा ॥ त्यक्त्वा राज्योचितान्सर्वानलंकारान्सुखानि च

vedadhvanirbhavedyatra tatra harṣasamanvitā pulakāṁcitasarvāṁgī sā śuśrāva ca sarvadā tyaktvā rājyocitānsarvānalaṁkārānsukhāni ca

जहाँ कहीं भी वेदध्वनि होती, वहाँ वह हर्ष से युक्त होकर, रोमांचित होकर सदा सुनती रहती, और राज्योचित समस्त आभूषणों तथा सुखों का त्याग कर चुकी थी।

श्लोक 4 (skanda.6.167.4)

अथ सापि द्विजश्रेष्ठा दशमे मासि संस्थिते ॥ सुषुवे सुप्रभं पुत्रं ब्राह्म्या लक्ष्म्या समावृतम्

atha sāpi dvijaśreṣṭhā daśame māsi saṁsthite suṣuve suprabhaṁ putraṁ brāhmyā lakṣmyā samāvṛtam

हे द्विजश्रेष्ठो! फिर दसवाँ मास पूर्ण होने पर उसने भी ब्राह्म-लक्ष्मी से युक्त एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 5 (skanda.6.167.5)

विश्वामित्रस्तथा ख्यातस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ ववृधे स महाभागो नित्यमेवाधिकं नृणाम्

viśvāmitrastathā khyātastrailokye sacarācare vavṛdhe sa mahābhāgo nityamevādhikaṁ nṛṇām

वह त्रैलोक्य में, चराचर सहित, विश्वामित्र के नाम से विख्यात हुआ; वह महाभाग्यशाली नित्य ही मनुष्यों में अधिकाधिक बढ़ता गया।

श्लोक 6 (skanda.6.167.6)

शुक्लपक्षं समासाद्य तारापतिरिवांबरे ॥ यदासौ यौवनोपेतः संजातो द्विजसत्तमाः

śuklapakṣaṁ samāsādya tārāpatirivāṁbare yadāsau yauvanopetaḥ saṁjāto dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो! जिस प्रकार आकाश में शुक्लपक्ष पाकर चंद्रमा बढ़ता है, उसी प्रकार जब वह युवावस्था को प्राप्त हुआ,

श्लोक 7 (skanda.6.167.7)

राज्यक्षमस्तदा राज्ये गाधिना स नियोजितः ॥ अनिच्छमानः स्वं राज्यं पितृपैतामहं महत्

rājyakṣamastadā rājye gādhinā sa niyojitaḥ anicchamānaḥ svaṁ rājyaṁ pitṛpaitāmahaṁ mahat

तब राज्य के योग्य होने पर गाधि ने उसे राज्य में नियुक्त किया — यद्यपि वह अपने उस महान पैतृक-पैतामह राज्य को नहीं चाहता था।

श्लोक 8 (skanda.6.167.8)

वेदाध्ययनसंपन्नो नित्यं च पठते हि सः ॥ ब्राह्मणोचितमार्गेण गच्छमानो दिवानिशम्

vedādhyayanasaṁpanno nityaṁ ca paṭhate hi saḥ brāhmaṇocitamārgeṇa gacchamāno divāniśam

वेदाध्ययन से सम्पन्न वह नित्य पढ़ता ही रहता था, तथा दिन-रात ब्राह्मणोचित मार्ग पर ही चलता था।

श्लोक 9 (skanda.6.167.9)

संस्थाप्याथ सुतं राज्ये बभूव वनगोचरः ॥ सकलत्रो महाभागो वानप्रस्थाश्रमे रतः

saṁsthāpyātha sutaṁ rājye babhūva vanagocaraḥ sakalatro mahābhāgo vānaprasthāśrame rataḥ

इस प्रकार अपने पुत्र को राज्य में स्थापित करके वह महाभाग्यशाली, अपनी पत्नी सहित, वानप्रस्थ आश्रम में रत होकर वनवासी हो गया।

श्लोक 10 (skanda.6.167.10)

विश्वामित्रोऽपि राज्यस्थो द्विजसंपूजने रतः ॥ द्विजैः सर्वैश्चचाराथ स्नानजाप्यपरायणः

viśvāmitro'pi rājyastho dvijasaṁpūjane rataḥ dvijaiḥ sarvaiścacārātha snānajāpyaparāyaṇaḥ

विश्वामित्र भी राज्य में स्थित रहकर द्विजों के सम्मान में रत रहते हुए, स्नान और जप में परायण होकर, सभी ब्राह्मणों के साथ विचरण करते थे।

श्लोक 11 (skanda.6.167.11)

कस्यचित्त्वथ कालस्य पापर्द्धिं समुपागतः ॥ प्रविवेश वनं रौद्रं नानामृगसमाकुलम्

kasyacittvatha kālasya pāparddhiṁ samupāgataḥ praviveśa vanaṁ raudraṁ nānāmṛgasamākulam

किन्तु कुछ काल पश्चात्, दुर्भाग्यवश दुर्बुद्धि को प्राप्त होकर, वे नाना प्रकार के हिंस्र पशुओं से भरे हुए एक भयंकर वन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 12 (skanda.6.167.12)

जघान स वने तत्र वराहान्संबरान्गजान् ॥ तरक्षांश्च रुरून्खड्गानारण्यान्महिषांस्तथा

jaghāna sa vane tatra varāhānsaṁbarāngajān tarakṣāṁśca rurūnkhaḍgānāraṇyānmahiṣāṁstathā

उस वन में उन्होंने वराह, सांभर, हाथी, लकड़बग्घे, कृष्णमृग, गैंडे तथा जंगली भैंसों का वध किया।

श्लोक 13 (skanda.6.167.13)

सिंहान्व्याघ्रान्महासर्पाञ्छरभांश्च द्विजोत्तमाः ॥ मृगयासक्तचित्तः स भ्रममाणो महावने

siṁhānvyāghrānmahāsarpāñcharabhāṁśca dvijottamāḥ mṛgayāsaktacittaḥ sa bhramamāṇo mahāvane

हे द्विजोत्तमो! सिंह, व्याघ्र, महासर्प तथा शरभ का भी वध किया, मृगया में आसक्तचित्त होकर उस विशाल वन में विचरण करते हुए।

श्लोक 14 (skanda.6.167.14)

मध्याह्नसमये प्राप्ते वृषस्थे च दिवाकरे ॥ क्षुत्पिपासापरिश्रांतो विश्वामित्रो द्विजोत्तमाः

madhyāhnasamaye prāpte vṛṣasthe ca divākare kṣutpipāsāpariśrāṁto viśvāmitro dvijottamāḥ

जब मध्याह्न का समय आया और सूर्य वृष राशि में स्थित हुआ, तब हे द्विजोत्तमो! भूख-प्यास से थके हुए विश्वामित्र,

श्लोक 15 (skanda.6.167.15)

आससादाश्रमं पुण्यं वसिष्ठस्य महात्मनः ॥ वसिष्ठोऽपि समालोक्य विश्वामित्रं नृपोत्तमम्

āsasādāśramaṁ puṇyaṁ vasiṣṭhasya mahātmanaḥ vasiṣṭho'pi samālokya viśvāmitraṁ nṛpottamam

महात्मा वसिष्ठ के पुण्य आश्रम में पहुँचे; और वसिष्ठ ने भी नृपश्रेष्ठ विश्वामित्र को देखकर,

श्लोक 16 (skanda.6.167.16)

निजाश्रमे तु संप्राप्तं सानन्दं सम्मुखो ययौ ॥ दत्त्वा तस्मै तदार्घ्यं च मधुपर्कं च भूभुजे

nijāśrame tu saṁprāptaṁ sānandaṁ sammukho yayau dattvā tasmai tadārghyaṁ ca madhuparkaṁ ca bhūbhuje

अपने आश्रम में आये हुए उन्हें देखकर आनंदपूर्वक सम्मुख गये, और उस राजा को अर्घ्य तथा मधुपर्क अर्पित किया।

श्लोक 17 (skanda.6.167.17)

अब्रवीच्च ततो वाक्यं स्वागतं ते महीपते ॥ वद कृत्यं करोम्येव गृहायातस्य यच्च ते

abravīcca tato vākyaṁ svāgataṁ te mahīpate vada kṛtyaṁ karomyeva gṛhāyātasya yacca te

और फिर उन्होंने यह वचन कहा — 'हे महीपते! तुम्हारा स्वागत है; बताओ, तुम्हारे इस घर आगमन पर मैं क्या सेवा करूँ।'

श्लोक 18 (skanda.6.167.18)

॥ विश्वामित्र उवाच ॥ ॥ मृगयायां परिश्रांतः पिपासाव्याकुलेन्द्रियः ॥ पानार्थमिह संप्राप्त आश्रमे ते मुनीश्वर

viśvāmitra uvāca mṛgayāyāṁ pariśrāṁtaḥ pipāsāvyākulendriyaḥ pānārthamiha saṁprāpta āśrame te munīśvara

विश्वामित्र ने कहा — हे मुनीश्वर! मृगया से थका हुआ और प्यास से व्याकुल होकर मैं जल पीने के लिए आपके आश्रम में आया हूँ।

श्लोक 19 (skanda.6.167.19)

तत्पीतं शीतलं तोयं वितृष्णोऽहं व्यवस्थितः ॥ अनुज्ञां देहि मे ब्रह्मन्येन गच्छामि मंदिरम्

tatpītaṁ śītalaṁ toyaṁ vitṛṣṇo'haṁ vyavasthitaḥ anujñāṁ dehi me brahmanyena gacchāmi maṁdiram

वह शीतल जल पीकर मैं अब तृष्णारहित हो गया हूँ; हे ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे मैं अपने भवन को जाऊँ।

श्लोक 20 (skanda.6.167.20)

॥ वसिष्ठ उवाच ॥ ॥ मध्याह्नसमयो रौद्रः सूर्योऽतीव सुतापदः ॥ तत्कृत्वा भोजनं राजन्नपराह्णे व्यवस्थिते ॥ गन्तासि निजमावासं भुक्त्वान्नं मम चाश्रमे

vasiṣṭha uvāca madhyāhnasamayo raudraḥ sūryo'tīva sutāpadaḥ tatkṛtvā bhojanaṁ rājannaparāhṇe vyavasthite gantāsi nijamāvāsaṁ bhuktvānnaṁ mama cāśrame

वसिष्ठ ने कहा — मध्याह्न का समय भीषण है, सूर्य अत्यंत तापदायक है; हे राजन्! भोजन करके, अपराह्न होने पर, मेरे आश्रम में भोजन ग्रहण करके ही अपने निवास को जाना।

श्लोक 21 (skanda.6.167.21)

॥ राजोवाच ॥ ॥ चतुरंगेण सैन्येन मृगयामहमागतः

rājovāca caturaṁgeṇa sainyena mṛgayāmahamāgataḥ

राजा ने कहा — मैं चतुरंगिणी सेना के साथ मृगया के लिए आया हूँ।

श्लोक 22 (skanda.6.167.22)

तवाश्रमस्य द्वारस्थं मम सैन्यं व्यवस्थितम् ॥ बुभुक्षितेषु भृत्येषु यः स्वामी कुरुतेऽशनम्

tavāśramasya dvārasthaṁ mama sainyaṁ vyavasthitam bubhukṣiteṣu bhṛtyeṣu yaḥ svāmī kurute'śanam

मेरी सेना आपके आश्रम के द्वार पर स्थित है; जो स्वामी अपने भूखे सेवकों के रहते हुए स्वयं भोजन करता है —

श्लोक 23 (skanda.6.167.23)

स याति नरकं घोरं त्यज्यते च गुणैर्द्रुतम् ॥ तस्मादाज्ञापय क्षिप्रं मां मुने स्वगृहाय भोः

sa yāti narakaṁ ghoraṁ tyajyate ca guṇairdrutam tasmādājñāpaya kṣipraṁ māṁ mune svagṛhāya bhoḥ

— वह घोर नरक को जाता है, और शीघ्र ही अपने गुणों से रहित हो जाता है; अतः हे मुने! मुझे शीघ्र अपने घर जाने की आज्ञा दीजिये।

श्लोक 24 (skanda.6.167.24)

॥ वसिष्ठ उवाच ॥ ॥ यदि ते सेवकाः संति द्वारदेशे बुभुक्षिताः ॥ सर्वानिहानय क्षिप्रं तृप्तिं नेष्याम्यहं परम्

vasiṣṭha uvāca yadi te sevakāḥ saṁti dvāradeśe bubhukṣitāḥ sarvānihānaya kṣipraṁ tṛptiṁ neṣyāmyahaṁ param

वसिष्ठ ने कहा — यदि तुम्हारे भूखे सेवक द्वार-प्रदेश में हैं, तो उन सबको शीघ्र यहाँ ले आओ; मैं स्वयं उन सबको पूर्ण तृप्ति दूँगा।

श्लोक 25 (skanda.6.167.25)

अस्ति मे नन्दिनीनाम कामधेनुः सुशोभना ॥ वांछितं यच्छते सर्वं तपसा पार्थिवोत्तम

asti me nandinīnāma kāmadhenuḥ suśobhanā vāṁchitaṁ yacchate sarvaṁ tapasā pārthivottama

हे पार्थिवोत्तम! मेरे पास नंदिनी नाम की एक सुंदर कामधेनु है, जो तप के प्रभाव से समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करती है।

श्लोक 26 (skanda.6.167.26)

तृप्तिं नेष्यति ते सर्वं सैन्यं पार्थिवसत्तम ॥ तस्मादानीयतां क्षिप्रं पश्य मे धेनुजं फलम्

tṛptiṁ neṣyati te sarvaṁ sainyaṁ pārthivasattama tasmādānīyatāṁ kṣipraṁ paśya me dhenujaṁ phalam

हे पार्थिवसत्तम! वह तुम्हारी सम्पूर्ण सेना को तृप्त कर देगी; अतः उसे शीघ्र लाया जाए — मेरी इस गौ का फल देखो।

श्लोक 27 (skanda.6.167.27)

तच्छ्रुत्वा चानयामास सर्वं सैन्यं महीपतिः ॥ स्नातश्च कृतजप्यश्च सन्तर्प्य पितृदेवताः

tacchrutvā cānayāmāsa sarvaṁ sainyaṁ mahīpatiḥ snātaśca kṛtajapyaśca santarpya pitṛdevatāḥ

यह सुनकर राजा ने अपनी सम्पूर्ण सेना को बुला लिया; और स्नान करके, जप करके, पितृ-देवताओं को तर्पण देकर,

श्लोक 28 (skanda.6.167.28)

ब्राह्मणान्वाचयित्वा च सिंहासनसमाश्रितः ॥ एतस्मिन्नंतरे धेनुः समाहूता च नंदिनी

brāhmaṇānvācayitvā ca siṁhāsanasamāśritaḥ etasminnaṁtare dhenuḥ samāhūtā ca naṁdinī

ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर वे सिंहासन पर विराजमान हुए; इसी बीच नंदिनी नामक गौ को बुलाया गया।

श्लोक 29 (skanda.6.167.29)

वसिष्ठेन समाहूता विश्वामित्रपुरःस्थिता ॥ अब्रवीच्च ततो वाक्यं वसिष्ठमृषिसत्तमम्

vasiṣṭhena samāhūtā viśvāmitrapuraḥsthitā abravīcca tato vākyaṁ vasiṣṭhamṛṣisattamam

वसिष्ठ द्वारा बुलाई जाकर वह विश्वामित्र के समक्ष खड़ी हुई; और तब उसने ऋषिसत्तम वसिष्ठ से यह वचन कहा —

श्लोक 30 (skanda.6.167.30)

आदेशो दीयतां मह्यं किं करोमि प्रशाधि माम्

ādeśo dīyatāṁ mahyaṁ kiṁ karomi praśādhi mām

'मुझे आदेश दीजिये; मैं क्या करूँ? मुझे निर्देशित कीजिये।'

श्लोक 31 (skanda.6.167.31)

॥ वसिष्ठ उवाच ॥ ॥ पादप्रक्षालनाद्यं तु कुरुष्व वचनान्मम ॥ विश्वामित्रस्य राजर्षेर्यावद्भोजनसंस्थितिम्

vasiṣṭha uvāca pādaprakṣālanādyaṁ tu kuruṣva vacanānmama viśvāmitrasya rājarṣeryāvadbhojanasaṁsthitim

वसिष्ठ ने कहा — मेरे वचन से राजर्षि विश्वामित्र के लिए पहले चरण-प्रक्षालन आदि करो, और उनके भोजन की व्यवस्था करो —

श्लोक 32 (skanda.6.167.32)

खाद्यैः सर्वैस्तथा लेह्यैश्चोष्यैः पेयैः पृथग्विधैः ॥ कुरुष्व तृप्तिपर्यन्तं ससैन्यस्य महीपतेः ॥ अश्वानां च गजानां च घासादिभिर्यथाक्रमम्

khādyaiḥ sarvaistathā lehyaiścoṣyaiḥ peyaiḥ pṛthagvidhaiḥ kuruṣva tṛptiparyantaṁ sasainyasya mahīpateḥ aśvānāṁ ca gajānāṁ ca ghāsādibhiryathākramam

सब प्रकार के खाद्य, लेह्य, चूष्य और पेय पदार्थों से सेना सहित उस राजा को तृप्ति-पर्यंत भोजन कराओ, और घोड़ों-हाथियों के लिए भी यथाक्रम घास आदि की व्यवस्था करो।

श्लोक 33 (skanda.6.167.33)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ बाढमित्येव साप्युक्त्वा ततस्तत्ससृजे क्षणात् ॥ यत्प्रोक्तं तेन मुनिना भृत्यानां चायुतं तथा

sūta uvāca bāḍhamityeva sāpyuktvā tatastatsasṛje kṣaṇāt yatproktaṁ tena muninā bhṛtyānāṁ cāyutaṁ tathā

सूत जी ने कहा — 'ऐसा ही हो' कहकर उसने उसी क्षण, उस मुनि द्वारा कहे गये सभी पदार्थों को तथा दस हजार सेवकों को भी उत्पन्न कर दिया।

श्लोक 34 (skanda.6.167.34)

ततस्ते सर्वमादाय भृत्या भोज्यं ददुस्तथा ॥ एकैकस्य पृथक्त्वेन प्रतिपत्तिपुरःसरम्

tataste sarvamādāya bhṛtyā bhojyaṁ dadustathā ekaikasya pṛthaktvena pratipattipuraḥsaram

तब उन सेवकों ने सब कुछ लेकर, प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग सम्मानपूर्वक भोजन परोसा।

श्लोक 35 (skanda.6.167.35)

एवं तया क्षणेनैव तृप्तिं नीतो महीपतिः ॥ ससैन्यः सपरीवारो गजोष्ट्राश्वैर्वृषैः सह

evaṁ tayā kṣaṇenaiva tṛptiṁ nīto mahīpatiḥ sasainyaḥ saparīvāro gajoṣṭrāśvairvṛṣaiḥ saha

इस प्रकार क्षणभर में ही वह राजा अपनी सेना और परिवार सहित, हाथी, ऊँट, घोड़े और बैलों सहित तृप्त हो गया।

श्लोक 36 (skanda.6.167.36)

ततस्तु कौतुकं दृष्ट्वा विश्वामित्रो महीपतिः ॥ सामात्यो विस्मयाविष्टो मन्त्रयामास च द्विजाः

tatastu kautukaṁ dṛṣṭvā viśvāmitro mahīpatiḥ sāmātyo vismayāviṣṭo mantrayāmāsa ca dvijāḥ

हे द्विजो! तब इस अद्भुत घटना को देखकर राजा विश्वामित्र अपने मंत्रियों सहित विस्मय से भर गये और परामर्श करने लगे।

श्लोक 37 (skanda.6.167.37)

अहो चित्रमहो चित्रं ययाऽकस्माद्वरूथिनी ॥ तृप्तिं नीतेयमस्माकं क्षुत्पिपासासमाकुला

aho citramaho citraṁ yayā'kasmādvarūthinī tṛptiṁ nīteyamasmākaṁ kṣutpipāsāsamākulā

'अहो आश्चर्य! अहो आश्चर्य! जिससे अकस्मात् भूख-प्यास से व्याकुल हमारी यह सम्पूर्ण सेना तृप्त हो गयी है!'

श्लोक 38 (skanda.6.167.38)

तस्मात्संनीयतामेषा स्वगृहं धेनुरुत्तमा ॥ किं करिष्यति विप्रोऽयं निर्भृत्यो वनसंस्थितः

tasmātsaṁnīyatāmeṣā svagṛhaṁ dhenuruttamā kiṁ kariṣyati vipro'yaṁ nirbhṛtyo vanasaṁsthitaḥ

'अतः इस उत्तम गौ को हमारे घर ले चलो; इस निःसेवक वनवासी विप्र को इससे क्या प्रयोजन है?'

श्लोक 39 (skanda.6.167.39)

ततो वसिष्ठमाहूय वाक्यमेतदुवाच सः ॥ नंदिनी दीयतां मह्यं किं करिष्यसि चानया

tato vasiṣṭhamāhūya vākyametaduvāca saḥ naṁdinī dīyatāṁ mahyaṁ kiṁ kariṣyasi cānayā

तब वसिष्ठ को बुलाकर उन्होंने यह वचन कहा — 'नंदिनी मुझे दे दीजिये; आप इससे क्या करेंगे?'

श्लोक 40 (skanda.6.167.40)

त्वमेको वनसंस्थस्तु निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ॥ अथवा तव दास्यामि व्ययार्थे मुनिसत्तम ॥ वरान्ग्रामांश्च हस्त्यश्वानन्यांश्चापि यथेप्सितान्

tvameko vanasaṁsthastu nirdvandvo niṣparigrahaḥ athavā tava dāsyāmi vyayārthe munisattama varāngrāmāṁśca hastyaśvānanyāṁścāpi yathepsitān

'आप तो अकेले वन में निर्द्वन्द्व और निष्परिग्रह रहते हैं; अथवा हे मुनिसत्तम! मैं आपके व्यय के लिए उत्तम गाँव, हाथी-घोड़े तथा जो भी अभीष्ट हो, वह सब आपको दे दूँगा।'

श्लोक 41 (skanda.6.167.41)

॥ वसिष्ठ उवाच ॥ ॥ होमधेनुरियं राजन्नस्माकं कामदोहिनी ॥ अदेया गौर्महाराज सामान्यापि द्विजन्मनाम्

vasiṣṭha uvāca homadhenuriyaṁ rājannasmākaṁ kāmadohinī adeyā gaurmahārāja sāmānyāpi dvijanmanām

वसिष्ठ ने कहा — हे राजन्! यह हमारी होमधेनु, कामदुहा गाय है; हे महाराज! द्विजों के लिए सामान्य गौ भी अदेय होती है।

श्लोक 42 (skanda.6.167.42)

किं पुनर्नंदिनी यैषा सर्वकामप्रदायिनी ॥ अपरं शृणु राजेंद्र स्मृतिवाक्यमनुत्तमम्

kiṁ punarnaṁdinī yaiṣā sarvakāmapradāyinī aparaṁ śṛṇu rājeṁdra smṛtivākyamanuttamam

फिर सर्वकामप्रदायिनी इस नंदिनी की तो बात ही क्या! हे राजेंद्र! स्मृति का यह अनुत्तम वचन और सुनिये —

श्लोक 43 (skanda.6.167.43)

गवां हि विक्रयार्थे च यदुक्तं मनुना स्वयम् ॥ गवां विक्रयजं वित्तं यो गृह्णाति द्विजोत्तमः

gavāṁ hi vikrayārthe ca yaduktaṁ manunā svayam gavāṁ vikrayajaṁ vittaṁ yo gṛhṇāti dvijottamaḥ

क्योंकि गौओं के विक्रय के विषय में स्वयं मनु ने यह कहा है — जो श्रेष्ठ ब्राह्मण गौओं के विक्रय से उत्पन्न धन को ग्रहण करता है,

श्लोक 44 (skanda.6.167.44)

अन्त्यजः स परिज्ञेयो मातृविक्रयकारकः ॥ तस्मान्नाहं प्रदास्यामि नन्दिनीं तां महीपते

antyajaḥ sa parijñeyo mātṛvikrayakārakaḥ tasmānnāhaṁ pradāsyāmi nandinīṁ tāṁ mahīpate

— वह अपनी माता को बेचने वाला अंत्यज समझा जाता है; अतः हे महीपते! मैं वह नंदिनी नहीं दूँगा।

श्लोक 45 (skanda.6.167.45)

न साम्ना नैव भेदेन न दानेन कथंचन ॥ न दण्डेन महाराज तस्माद्गच्छ निजालयम्

na sāmnā naiva bhedena na dānena kathaṁcana na daṇḍena mahārāja tasmādgaccha nijālayam

न साम से, न भेद से, न किसी दान से, और हे महाराज! न दण्ड से भी नहीं — अतः आप अपने घर जाइये।

श्लोक 46 (skanda.6.167.46)

॥ विश्वामित्र उवाच ॥ ॥ यत्किंचिद्विद्यते रत्नं पार्थिवस्य क्षितौ द्विज ॥ तत्सर्वं राजकीयं स्यादिति वित्तविदो विदुः

viśvāmitra uvāca yatkiṁcidvidyate ratnaṁ pārthivasya kṣitau dvija tatsarvaṁ rājakīyaṁ syāditi vittavido viduḥ

विश्वामित्र ने कहा — हे द्विज! पृथ्वी पर राजा का जो भी रत्न होता है, वह सब राजा का ही होता है — ऐसा अर्थवेत्ता जानते हैं।

श्लोक 47 (skanda.6.167.47)

रत्नभूता ततो धेनुर्ममेयं नंदिनी स्थिता ॥ दण्डेनापि ग्रहीष्यामि साम्ना यच्छसि नो यदि

ratnabhūtā tato dhenurmameyaṁ naṁdinī sthitā daṇḍenāpi grahīṣyāmi sāmnā yacchasi no yadi

अतः रत्नस्वरूपा यह नंदिनी गौ भी मेरी ही है; यदि तुम इसे सामपूर्वक नहीं दोगे, तो मैं इसे दण्ड से भी ले लूँगा।

श्लोक 48 (skanda.6.167.48)

एवमुक्त्वा वसिष्ठं स विश्वामित्रो महीपतिः ॥ आदिदेश ततो भृत्यान्नंदिनीयं प्रगृह्यताम्

evamuktvā vasiṣṭhaṁ sa viśvāmitro mahīpatiḥ ādideśa tato bhṛtyānnaṁdinīyaṁ pragṛhyatām

वसिष्ठ से ऐसा कहकर राजा विश्वामित्र ने तब अपने सेवकों को आदेश दिया — 'यह नंदिनी पकड़ ली जाए।'

श्लोक 49 (skanda.6.167.49)

अथ सा भृत्यवर्गेण नीयमाना च नंदिनी ॥ हन्यमाना प्रहारैश्च पाषाणैर्लकुटैरपि

atha sā bhṛtyavargeṇa nīyamānā ca naṁdinī hanyamānā prahāraiśca pāṣāṇairlakuṭairapi

तब वह नंदिनी सेवकों के समूह द्वारा ले जायी जाती हुई, पत्थरों और लाठियों से भी प्रहार सहती हुई,

श्लोक 50 (skanda.6.167.50)

अश्रुपूर्णेक्षणा दीना प्रहारैर्जर्जरीकृता ॥ कृच्छ्रादुपेत्य तं प्राह वसिष्ठं मुनिसत्तमम्

aśrupūrṇekṣaṇā dīnā prahārairjarjarīkṛtā kṛcchrādupetya taṁ prāha vasiṣṭhaṁ munisattamam

अश्रुपूर्ण नेत्रों से दीन तथा प्रहारों से जर्जर होकर, कठिनाई से मुनिसत्तम वसिष्ठ के पास जाकर बोली —

श्लोक 51 (skanda.6.167.51)

किं दत्तास्मि मुनिश्रेष्ठ त्वयाहं चास्य भूपतेः ॥ येन मां कालयंत्यस्य पुरुषाः स्वामिनो यथा

kiṁ dattāsmi muniśreṣṭha tvayāhaṁ cāsya bhūpateḥ yena māṁ kālayaṁtyasya puruṣāḥ svāmino yathā

'हे मुनिश्रेष्ठ! क्या आपने मुझे इस राजा को दे दिया है, कि इसके पुरुष मुझे इस प्रकार हाँक रहे हैं मानो यह मेरा स्वामी हो?'

श्लोक 52 (skanda.6.167.52)

॥ वसिष्ठ उवाच ॥ ॥ न त्वां यच्छाम्यहं धेनो प्राणत्यागेऽपि संस्थिते ॥ तद्रक्षस्व स्वयं धेनो आत्मानं मत्प्रभावतः

vasiṣṭha uvāca na tvāṁ yacchāmyahaṁ dheno prāṇatyāge'pi saṁsthite tadrakṣasva svayaṁ dheno ātmānaṁ matprabhāvataḥ

वसिष्ठ ने कहा — हे धेनो! प्राणत्याग होने पर भी मैं तुम्हें नहीं दूँगा; अतः हे धेनो! तुम स्वयं मेरे प्रभाव से अपनी रक्षा करो।

श्लोक 53 (skanda.6.167.53)

एवमुक्ता तदा धेनुर्वसिष्ठेन महात्मना ॥ कोपाविष्टा ततश्चक्रे हुंकारान्दारुणांस्तथा

evamuktā tadā dhenurvasiṣṭhena mahātmanā kopāviṣṭā tataścakre huṁkārāndāruṇāṁstathā

महात्मा वसिष्ठ द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह गौ क्रोध से भर गयी और भयंकर हुंकार करने लगी।

श्लोक 54 (skanda.6.167.54)

तस्या हुंकारशब्दैश्च निष्क्रांताः सायुधा नराः ॥ शबराश्च पुलिंदाश्च म्लेच्छाः संख्याविवर्जिताः

tasyā huṁkāraśabdaiśca niṣkrāṁtāḥ sāyudhā narāḥ śabarāśca puliṁdāśca mlecchāḥ saṁkhyāvivarjitāḥ

उसकी हुंकार-ध्वनि से सशस्त्र पुरुष निकल आये — शबर, पुलिंद तथा असंख्य म्लेच्छ जातियाँ।

श्लोक 55 (skanda.6.167.55)

तैश्च भृत्या हताः सर्वे विश्वामित्रस्यभूपतेः ॥ ततः कोपाभिभूतोऽसौ विश्वामित्रो महीपतिः

taiśca bhṛtyā hatāḥ sarve viśvāmitrasyabhūpateḥ tataḥ kopābhibhūto'sau viśvāmitro mahīpatiḥ

उन्होंने राजा विश्वामित्र के सभी सेवकों को मार डाला; तब क्रोध से अभिभूत होकर राजा विश्वामित्र ने,

श्लोक 56 (skanda.6.167.56)

सज्जं कृत्वा स्वसैन्यं तु चतुरंगं प्रकोपतः ॥ युद्धं चक्रे च तैः सार्धं मरणे कृतनिश्चयः

sajjaṁ kṛtvā svasainyaṁ tu caturaṁgaṁ prakopataḥ yuddhaṁ cakre ca taiḥ sārdhaṁ maraṇe kṛtaniścayaḥ

क्रोधवश अपनी चतुरंगिणी सेना को सज्जित करके उनके साथ युद्ध किया, मरने का निश्चय करके।

श्लोक 57 (skanda.6.167.57)

अथ ते सैनिकास्तस्य ते गजास्ते च वाजिनः ॥ पश्यतो निहताः सर्वे पुरुषैर्धेनुसंभवैः

atha te sainikāstasya te gajāste ca vājinaḥ paśyato nihatāḥ sarve puruṣairdhenusaṁbhavaiḥ

तब उसके सैनिक, हाथी और घोड़े — वे सब उसकी आँखों के सामने ही गौ से उत्पन्न पुरुषों द्वारा मार डाले गये।

श्लोक 58 (skanda.6.167.58)

विश्वामित्रं परित्यज्य शेषं सर्वं निपातितम् ॥ तं दृष्ट्वा वेष्टितं म्लेच्छैर्युध्यमानं महीपतिम्

viśvāmitraṁ parityajya śeṣaṁ sarvaṁ nipātitam taṁ dṛṣṭvā veṣṭitaṁ mlecchairyudhyamānaṁ mahīpatim

विश्वामित्र को छोड़कर शेष सब मार डाले गये; और उस राजा को म्लेच्छों से घिरा हुआ, युद्ध करते हुए देखकर,

श्लोक 59 (skanda.6.167.59)

कृपां कृत्वा वसिष्ठस्तु नन्दिनीमिदमब्रवीत् ॥ रक्ष नंदिनि भूपालं म्लेच्छैरेतैः समावृतम्

kṛpāṁ kṛtvā vasiṣṭhastu nandinīmidamabravīt rakṣa naṁdini bhūpālaṁ mlecchairetaiḥ samāvṛtam

वसिष्ठ ने दया करके नंदिनी से यह कहा — 'हे नंदिनि! इन म्लेच्छों से घिरे हुए राजा की रक्षा करो।'

श्लोक 60 (skanda.6.167.60)

राजा हि यत्नतो रक्ष्यो यत्प्रसादादिदं जगत् ॥ सन्मार्गे वर्तते सर्वं न चामार्गे प्रवर्तते

rājā hi yatnato rakṣyo yatprasādādidaṁ jagat sanmārge vartate sarvaṁ na cāmārge pravartate

'क्योंकि राजा की सतर्कतापूर्वक रक्षा करनी चाहिए, जिसकी कृपा से यह सम्पूर्ण जगत् सन्मार्ग पर चलता है और कुमार्ग पर नहीं जाता।'

श्लोक 61 (skanda.6.167.61)

ततस्तु नंदिनीं यावन्निषेधयितुमागताम् ॥ विश्वामित्रोऽसिमुद्यम्य प्रहर्तुमुपचक्रमे

tatastu naṁdinīṁ yāvanniṣedhayitumāgatām viśvāmitro'simudyamya prahartumupacakrame

तब जैसे ही नंदिनी उसे रोकने के लिए आगे आयी, विश्वामित्र ने तलवार उठाकर उस पर प्रहार करना आरम्भ किया।

श्लोक 62 (skanda.6.167.62)

वसिष्ठोऽपि समालोक्य वध्यमानां च तां तदा ॥ बाहुं संस्तंभयामास खड्गं तस्य च भूपतेः

vasiṣṭho'pi samālokya vadhyamānāṁ ca tāṁ tadā bāhuṁ saṁstaṁbhayāmāsa khaḍgaṁ tasya ca bhūpateḥ

वसिष्ठ ने भी उसे मारे जाने की स्थिति में देखकर उस राजा की भुजा और उसकी तलवार को उसी क्षण स्तंभित कर दिया।

श्लोक 63 (skanda.6.167.63)

अथ वैलक्ष्यमापन्नो विश्वामित्रो महीपतिः ॥ प्रोवाच व्रीडया युक्तो वसिष्ठं मुनिसत्तमम्

atha vailakṣyamāpanno viśvāmitro mahīpatiḥ provāca vrīḍayā yukto vasiṣṭhaṁ munisattamam

तब लज्जित होकर राजा विश्वामित्र ने संकोच से युक्त होकर मुनिसत्तम वसिष्ठ से यह कहा —

श्लोक 64 (skanda.6.167.64)

रक्ष मां त्वं मुनिश्रेष्ठ वध्यमानं सुदारुणैः ॥ म्लेच्छैः कुरुष्व मे बाहुं स्तम्भेन तु विवर्जितम्

rakṣa māṁ tvaṁ muniśreṣṭha vadhyamānaṁ sudāruṇaiḥ mlecchaiḥ kuruṣva me bāhuṁ stambhena tu vivarjitam

'हे मुनिश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिये, जो इन भयंकर म्लेच्छों द्वारा मारा जाने वाला हूँ; मेरी इस भुजा को स्तम्भन से मुक्त कीजिये।'

श्लोक 65 (skanda.6.167.65)

ममापराधात्संनष्टं सर्वं सैन्यमनन्तकम् ॥ तस्माद्यास्याम्यहं हर्म्यं न युद्धेन प्रयोजनम्

mamāparādhātsaṁnaṣṭaṁ sarvaṁ sainyamanantakam tasmādyāsyāmyahaṁ harmyaṁ na yuddhena prayojanam

'मेरे ही अपराध से मेरी सम्पूर्ण अनन्त सेना नष्ट हो गयी; अतः मैं अब अपने भवन को जाऊँगा, युद्ध से मुझे कोई प्रयोजन नहीं।'

श्लोक 66 (skanda.6.167.66)

दुर्विनीतः श्रियं प्राप्य विद्यामैश्वर्यमेव च ॥ न तिष्ठति चिरं युद्धे यथाहं मदगर्वितः

durvinītaḥ śriyaṁ prāpya vidyāmaiśvaryameva ca na tiṣṭhati ciraṁ yuddhe yathāhaṁ madagarvitaḥ

'जो अशिष्ट है और ऐश्वर्य, विद्या तथा प्रभुत्व पाकर मद से गर्वित हो जाता है, वह युद्ध में अधिक देर तक नहीं टिक सकता — जैसा मैं आज हूँ।'

श्लोक 67 (skanda.6.167.67)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवमुक्तो वसिष्ठस्तु विश्वामित्रेण भूभुजा ॥ चकार तं भुजं तस्य स्तंभदोषविवर्जितम्

sūta uvāca evamukto vasiṣṭhastu viśvāmitreṇa bhūbhujā cakāra taṁ bhujaṁ tasya staṁbhadoṣavivarjitam

सूत जी ने कहा — राजा विश्वामित्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वसिष्ठ ने उसकी भुजा को स्तम्भ-दोष से मुक्त कर दिया।

श्लोक 68 (skanda.6.167.68)

अब्रवीत्प्रहसन्वाक्यं विधाय स शुभं करम् ॥ गच्छ राजन्विमुक्तोऽसि स्तंभदोषेण वै मया

abravītprahasanvākyaṁ vidhāya sa śubhaṁ karam gaccha rājanvimukto'si staṁbhadoṣeṇa vai mayā

और उसकी भुजा को ठीक करके उन्होंने हँसते हुए यह वचन कहा — 'हे राजन्! जाओ, मैंने तुम्हें स्तम्भ-दोष से मुक्त कर दिया है।'

श्लोक 69 (skanda.6.167.69)

माकार्शीर्ब्राह्मणैः सार्धं विरोधं भूय एव हि ॥ अनुज्ञातः स तेनाथ विश्वामित्रो महीपतिः

mākārśīrbrāhmaṇaiḥ sārdhaṁ virodhaṁ bhūya eva hi anujñātaḥ sa tenātha viśvāmitro mahīpatiḥ

'ब्राह्मणों के साथ पुनः विरोध मत करना।' तब उनके द्वारा इस प्रकार अनुमति दिये जाने पर राजा विश्वामित्र,

श्लोक 70 (skanda.6.167.70)

सव्रीडं प्रययौ हर्म्यं पद्भ्यामेव द्विजोत्तमाः ॥ स्वपुरद्वारमासाद्य सुगुप्ते रजनीमुखे

savrīḍaṁ prayayau harmyaṁ padbhyāmeva dvijottamāḥ svapuradvāramāsādya sugupte rajanīmukhe

हे द्विजोत्तमो! लज्जित होकर वे पैदल ही अपने भवन को गये, और रात्रि के आरम्भ में, गुप्त रूप से अपने नगर के द्वार पर पहुँचे।

श्लोक 71 (skanda.6.167.71)

प्रलापमकरोत्तत्र बाष्पपर्याकुलेक्षणः ॥ धिग्बलं क्षत्रियाणां च धिग्वीर्यं धिक्प्रजीवितम्

pralāpamakarottatra bāṣpaparyākulekṣaṇaḥ dhigbalaṁ kṣatriyāṇāṁ ca dhigvīryaṁ dhikprajīvitam

वहाँ अश्रुओं से व्याकुल नेत्रों के साथ वे विलाप करने लगे — 'धिक्कार है क्षत्रियों के बल को! धिक्कार है वीरता को! धिक्कार है मेरे इस जीवन को!'

श्लोक 72 (skanda.6.167.72)

श्लाघ्यं ब्रह्मबलं चैकं ब्राह्म्यं तेजश्च केवलम्

ślāghyaṁ brahmabalaṁ caikaṁ brāhmyaṁ tejaśca kevalam

'केवल ब्रह्मबल ही प्रशंसनीय है, केवल ब्राह्मतेज ही सराहनीय है।'

श्लोक 73 (skanda.6.167.73)

एतत्कर्म मया कार्यं यथा स्याद्ब्रह्मजं बलम् ॥ त्यक्त्वा चैव निजं राज्यं चरिष्यामि महत्तपः ॥ एवं स निश्चयं कृत्वा राज्ये संस्थाप्य वै सुतम् ॥ नाम्ना विश्वसहं ख्यातं प्रजगाम तपोवनम्

etatkarma mayā kāryaṁ yathā syādbrahmajaṁ balam tyaktvā caiva nijaṁ rājyaṁ cariṣyāmi mahattapaḥ evaṁ sa niścayaṁ kṛtvā rājye saṁsthāpya vai sutam nāmnā viśvasahaṁ khyātaṁ prajagāma tapovanam

'मुझे यह कार्य करना चाहिए, जिससे मुझे ब्रह्मबल प्राप्त हो; अपने राज्य का त्याग करके मैं महान् तप करूँगा।' ऐसा निश्चय करके उन्होंने अपने पुत्र, जो विश्वसह नाम से विख्यात था, को राज्य में स्थापित किया और तपोवन को चले गये।

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