नागर खण्ड · अध्याय 168
धारोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.168.1)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवं राज्यं परित्यज्य विश्वामित्रो द्विजोत्तमाः ॥ हिमवन्तं नगं प्राप्य तपश्चक्रे सुदारुणम्
sūta uvāca evaṁ rājyaṁ parityajya viśvāmitro dvijottamāḥ himavantaṁ nagaṁ prāpya tapaścakre sudāruṇam
सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो! इस प्रकार राज्य का त्याग करके विश्वामित्र हिमालय पर्वत पर जाकर अत्यंत घोर तपस्या करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.6.168.2)
वर्षास्वाकाशशायी च हेमंते सलिलाशयः ॥ पञ्चाग्निसाधको ग्रीष्मे स्थितो वर्षशतत्रयम्
varṣāsvākāśaśāyī ca hemaṁte salilāśayaḥ pañcāgnisādhako grīṣme sthito varṣaśatatrayam
वर्षा ऋतु में आकाश में सोकर, हेमंत में जल में रहकर, ग्रीष्म में पंचाग्नि-साधना करते हुए, वे तीन सौ वर्षों तक इसी प्रकार रहे।
श्लोक 3 (skanda.6.168.3)
फलमूलकृताहारस्ततो वर्षशतत्रयम् ॥ ध्यायमानः परं ब्रह्म स्थितो ब्राह्मणसत्तमाः ॥ शीर्णपर्णाशनः पश्चात्तावत्कालं व्यवस्थितः
phalamūlakṛtāhārastato varṣaśatatrayam dhyāyamānaḥ paraṁ brahma sthito brāhmaṇasattamāḥ śīrṇaparṇāśanaḥ paścāttāvatkālaṁ vyavasthitaḥ
हे ब्राह्मणसत्तमो! फिर तीन सौ वर्षों तक फल-मूल का आहार करते हुए, परब्रह्म का ध्यान करते हुए वे स्थित रहे; और तत्पश्चात् सूखे पत्तों का भक्षण करते हुए उतने ही काल तक स्थित रहे।
श्लोक 4 (skanda.6.168.4)
ततश्चैव जलाहारस्तावन्मात्रं व्यवस्थितः ॥ कालं स वायुभक्षश्च ततश्चैवायुतं समाः
tataścaiva jalāhārastāvanmātraṁ vyavasthitaḥ kālaṁ sa vāyubhakṣaśca tataścaivāyutaṁ samāḥ
तत्पश्चात् केवल जल का आहार करते हुए वे उतने ही काल तक रहे; और उसके पश्चात् वायु का भक्षण करते हुए दस हजार वर्षों तक रहे।
श्लोक 5 (skanda.6.168.5)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ अथ दृष्ट्वा तपःशक्तिं तस्य तां त्रिदशाधिपः ॥ पातयिष्यति मां नूनमेष स्थानान्नृपोत्तमः
sūta uvāca atha dṛṣṭvā tapaḥśaktiṁ tasya tāṁ tridaśādhipaḥ pātayiṣyati māṁ nūnameṣa sthānānnṛpottamaḥ
सूत जी ने कहा — तब उनकी उस तपःशक्ति को देखकर देवराज इंद्र ने सोचा — 'यह नृपश्रेष्ठ निश्चय ही मुझे मेरे पद से च्युत कर देगा।'
श्लोक 6 (skanda.6.168.6)
ततः प्रोवाच संगत्य साम्ना परमवल्गुना ॥ विश्वामित्रं नृपश्रेष्ठं भयेन महताऽन्वितः
tataḥ provāca saṁgatya sāmnā paramavalgunā viśvāmitraṁ nṛpaśreṣṭhaṁ bhayena mahatā'nvitaḥ
तब अत्यंत भय से युक्त होकर उन्होंने नृपश्रेष्ठ विश्वामित्र के पास जाकर अत्यंत मधुर साम-वचन से कहा —
श्लोक 7 (skanda.6.168.7)
॥ इंद्र उवाच ॥ ॥ विश्वामित्र प्रतुष्टोऽस्मि तपसानेन पार्थिव ॥ वरं वरय भद्रं ते यदभीष्टं हृदिस्थितम्
iṁdra uvāca viśvāmitra pratuṣṭo'smi tapasānena pārthiva varaṁ varaya bhadraṁ te yadabhīṣṭaṁ hṛdisthitam
इंद्र ने कहा — हे राजन् विश्वामित्र! मैं इस तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ; तुम्हारा कल्याण हो, जो कुछ तुम्हारे हृदय में अभीष्ट हो, वह वर माँगो।
श्लोक 8 (skanda.6.168.8)
॥ विश्वामित्र उवाच ॥ ॥ ब्राह्मण्यं देहि मे शक्र यदि तुष्टोऽसि सांप्रतम् ॥ तदर्थं तपसश्चर्यां जानीहि त्वं पुरंदर
viśvāmitra uvāca brāhmaṇyaṁ dehi me śakra yadi tuṣṭo'si sāṁpratam tadarthaṁ tapasaścaryāṁ jānīhi tvaṁ puraṁdara
विश्वामित्र ने कहा — हे शक्र! यदि आप अभी प्रसन्न हैं, तो मुझे ब्राह्मणत्व प्रदान कीजिये; हे पुरंदर! जान लीजिये कि इसी प्रयोजन के लिए मैं तपस्या का आचरण कर रहा हूँ।
श्लोक 9 (skanda.6.168.9)
॥ इंद्र उवाच ॥ ॥ अनेनैव शरीरेण क्षत्रियः स्यात्कथं द्विजः ॥ चतुर्विंशतिसंस्कारैर्द्विगुणैर्यःप्रजायते ॥ तदन्यत्प्रार्थय क्षिप्रं यत्तेऽभीष्टतरं स्थितम्
iṁdra uvāca anenaiva śarīreṇa kṣatriyaḥ syātkathaṁ dvijaḥ caturviṁśatisaṁskārairdviguṇairyaḥprajāyate tadanyatprārthaya kṣipraṁ yatte'bhīṣṭataraṁ sthitam
इंद्र ने कहा — इसी शरीर से क्षत्रिय द्विज कैसे हो सकता है, जो चौबीस संस्कारों से द्विजत्व को प्राप्त होता है? अतः शीघ्र ही कुछ और माँगो, जो तुम्हें अधिक अभीष्ट हो।
श्लोक 10 (skanda.6.168.10)
॥ विश्वामित्र उवाच ॥ ॥ न ब्राह्मण्यात्परं किंचित्प्रार्थयामि सुरेश्वर
viśvāmitra uvāca na brāhmaṇyātparaṁ kiṁcitprārthayāmi sureśvara
विश्वामित्र ने कहा — हे सुरेश्वर! ब्राह्मणत्व से बढ़कर मैं और कुछ नहीं माँगता।
श्लोक 11 (skanda.6.168.11)
अपि त्रैलोक्यराज्यं ते वस्तुष्वन्येषु का कथा ॥ तस्माद्गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वराज्यं परिपालय
api trailokyarājyaṁ te vastuṣvanyeṣu kā kathā tasmādgaccha suraśreṣṭha svarājyaṁ paripālaya
त्रैलोक्य के राज्य की तो बात ही क्या, अन्य वस्तुओं की तो बात ही क्या! अतः हे सुरश्रेष्ठ! जाइये, अपने राज्य का पालन कीजिये।
श्लोक 12 (skanda.6.168.12)
परित्यक्ष्याम्यहं देहं यास्ये वाऽहं द्विजन्मताम् ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य देवराजो दिवं गतः
parityakṣyāmyahaṁ dehaṁ yāsye vā'haṁ dvijanmatām tacchrutvā vacanaṁ tasya devarājo divaṁ gataḥ
मैं या तो अपना शरीर त्याग दूँगा, या द्विजत्व को प्राप्त करूँगा। उनका यह वचन सुनकर देवराज स्वर्ग को चले गये।
श्लोक 13 (skanda.6.168.13)
तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा सर्वदेवसमावृतः ॥ विश्वामित्रोऽपि तद्रूपं चकार दुश्चरं तपः
tasya taṁ niścayaṁ jñātvā sarvadevasamāvṛtaḥ viśvāmitro'pi tadrūpaṁ cakāra duścaraṁ tapaḥ
उनका वह निश्चय जानकर, समस्त देवताओं से घिरे हुए विश्वामित्र भी उसी रूप में दुष्कर तपस्या करने लगे।
श्लोक 14 (skanda.6.168.14)
अथ वर्षसहस्रे तु व्यतिक्रान्ते द्विजोत्तमाः ॥ अन्यस्मिन्वायुभक्षस्य विश्वामित्रस्य भूपतेः
atha varṣasahasre tu vyatikrānte dvijottamāḥ anyasminvāyubhakṣasya viśvāmitrasya bhūpateḥ
हे द्विजोत्तमो! फिर एक और सहस्र वर्ष बीत जाने पर, वायुभक्षी राजा विश्वामित्र के —
श्लोक 15 (skanda.6.168.15)
आजगाम स्वयं ब्रह्मा पुण्यैर्देवर्षिभिः सह ॥ अब्रवीत्तं महीपालं तपसा दग्धकिल्बिषम्
ājagāma svayaṁ brahmā puṇyairdevarṣibhiḥ saha abravīttaṁ mahīpālaṁ tapasā dagdhakilbiṣam
— स्वयं ब्रह्मा पुण्य देवर्षियों के साथ आये, और तपस्या से जिसके पाप जल चुके थे, उस राजा से कहा —
श्लोक 16 (skanda.6.168.16)
॥ श्रीब्रह्मोवाच ॥ ॥ विश्वामित्र प्रतुष्टोऽस्मि तपसानेन सत्तम ॥ वरं वरय भद्रं ते प्रदास्याम्यपि दुर्लभम्
śrībrahmovāca viśvāmitra pratuṣṭo'smi tapasānena sattama varaṁ varaya bhadraṁ te pradāsyāmyapi durlabham
श्री ब्रह्मा ने कहा — हे सत्तम विश्वामित्र! मैं इस तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ; तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो, मैं दुर्लभ वस्तु भी प्रदान करूँगा।
श्लोक 17 (skanda.6.168.17)
॥ विश्वामित्र उवाच ॥ ॥ यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम ॥ ब्राह्मण्यं देहि मे देव नान्यदिष्टतमं महत्
viśvāmitra uvāca yadi tuṣṭo'si me deva yadi deyo varo mama brāhmaṇyaṁ dehi me deva nānyadiṣṭatamaṁ mahat
विश्वामित्र ने कहा — हे देव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, यदि मुझे वर देना चाहते हैं, तो हे देव! मुझे ब्राह्मणत्व दीजिये; इससे बढ़कर मुझे अभीष्ट और कुछ नहीं है।
श्लोक 18 (skanda.6.168.18)
॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ क्षत्रियेण प्रजातस्य द्विजत्वं जायते कथम् ॥ श्रुतिस्मृतिविरुद्धं हि किमेवं वदसीप्सितम्
brahmovāca kṣatriyeṇa prajātasya dvijatvaṁ jāyate katham śrutismṛtiviruddhaṁ hi kimevaṁ vadasīpsitam
ब्रह्मा ने कहा — क्षत्रिय से उत्पन्न व्यक्ति को द्विजत्व कैसे प्राप्त हो सकता है? यह तो श्रुति-स्मृति के विरुद्ध है; तुम ऐसा अभीष्ट क्यों कहते हो?
श्लोक 19 (skanda.6.168.19)
यन्न जातं धरापृष्ठे न भविष्यति कर्हिचित्
yanna jātaṁ dharāpṛṣṭhe na bhaviṣyati karhicit
जो कभी पृथ्वी पर हुआ ही नहीं, वह कभी भी नहीं होगा।
श्लोक 20 (skanda.6.168.20)
॥ विश्वामित्र उवाच ॥ ॥ गच्छ त्वं देवदेवेश ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ॥ अहं त्यक्ष्यामि वा प्राणान्संप्राप्स्ये वा द्विजन्मताम्
viśvāmitra uvāca gaccha tvaṁ devadeveśa brahmalokamanuttamam ahaṁ tyakṣyāmi vā prāṇānsaṁprāpsye vā dvijanmatām
विश्वामित्र ने कहा — हे देवदेवेश! आप अपने अनुत्तम ब्रह्मलोक को जाइये; मैं या तो अपने प्राण त्याग दूँगा, या द्विजत्व को प्राप्त करूँगा।
श्लोक 21 (skanda.6.168.21)
अथ देवर्षिमध्यस्थ ऋचीको वाक्यमब्रवीत् ॥ अस्य जन्मकृते देव ब्राह्म्यैर्मंत्रैर्मया चरुः
atha devarṣimadhyastha ṛcīko vākyamabravīt asya janmakṛte deva brāhmyairmaṁtrairmayā caruḥ
तब देवर्षियों के मध्य खड़े ऋचीक ने यह वचन कहा — 'हे देव! इसके जन्म के लिए मैंने ब्राह्म मंत्रों से चरु बनाया था —'
श्लोक 22 (skanda.6.168.22)
अभितो ब्रह्मसर्वस्वं तत्र सयोजितं मया ॥ तेनैव क्षत्रजन्माऽयं ब्राह्मणश्चतुरानन
abhito brahmasarvasvaṁ tatra sayojitaṁ mayā tenaiva kṣatrajanmā'yaṁ brāhmaṇaścaturānana
'— जिसमें मैंने ब्रह्म का सम्पूर्ण सर्वस्व संयोजित कर दिया था; हे चतुरानन! उसी के प्रभाव से यह क्षत्रिय-जन्मा भी ब्राह्मण है।'
श्लोक 23 (skanda.6.168.23)
ब्रह्मर्षिकीर्तयस्वैनं तस्मात्त्वं प्रपितामह ॥ राज्यस्थोऽपि द्विजार्हाणि सत्कृत्यान्यकरोदसौ
brahmarṣikīrtayasvainaṁ tasmāttvaṁ prapitāmaha rājyastho'pi dvijārhāṇi satkṛtyānyakarodasau
'अतः हे प्रपितामह! आप इसे ब्रह्मर्षि घोषित कीजिये; क्योंकि राज्य में स्थित रहते हुए भी इसने द्विजोचित सत्कर्म किए हैं।'
श्लोक 24 (skanda.6.168.24)
ब्राह्ममन्त्रप्रभावेन तस्माद्ब्रह्मर्षिमाह्वय ॥ येन कीर्तामहे सर्वे विश्वामित्रं द्विजोत्तमम्
brāhmamantraprabhāvena tasmādbrahmarṣimāhvaya yena kīrtāmahe sarve viśvāmitraṁ dvijottamam
'ब्राह्ममंत्र के प्रभाव से अतः इसे ब्रह्मर्षि घोषित कीजिये, जिससे हम सब विश्वामित्र को द्विजोत्तम कहकर सम्मानित कर सकें।'
श्लोक 25 (skanda.6.168.25)
अथ ब्रह्मा चिरं ध्यात्वा ब्राह्म्यैर्मंत्रैश्च तेजसा ॥ समुत्पन्नं ततः प्राह ब्राह्मणस्त्वं मया कृतः
atha brahmā ciraṁ dhyātvā brāhmyairmaṁtraiśca tejasā samutpannaṁ tataḥ prāha brāhmaṇastvaṁ mayā kṛtaḥ
तब ब्रह्मा ने बहुत देर तक ध्यान करके, तथा ब्राह्म-मंत्रों के तेज से उत्पन्न हुआ जानकर कहा — 'मैंने तुम्हें ब्राह्मण बना दिया है।'
श्लोक 26 (skanda.6.168.26)
त्यजेदं दुष्करं घोरं तपो मद्वचनाद्द्रुतम् ॥ स यदा ब्रह्मणा प्रोक्तो ब्रह्मर्षिस्त्वमसंशयम्
tyajedaṁ duṣkaraṁ ghoraṁ tapo madvacanāddrutam sa yadā brahmaṇā prokto brahmarṣistvamasaṁśayam
'मेरे वचन से इस दुष्कर और घोर तप को तुरन्त त्याग दो।' जब ब्रह्मा के द्वारा उसे निःसंदेह ब्रह्मर्षि घोषित किया गया,
श्लोक 27 (skanda.6.168.27)
ऋचीकाद्यैस्ततः सर्वैः प्रोक्तो देवर्षिभिस्तथा
ṛcīkādyaistataḥ sarvaiḥ prokto devarṣibhistathā
— तब ऋचीक आदि समस्त देवर्षियों ने भी उसे उसी प्रकार घोषित किया।
श्लोक 28 (skanda.6.168.28)
अथ तेषां मध्यगतो वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ सोऽब्रवीत्कोपसंयुक्तो नाहं वक्ष्यामि कर्हिचित्
atha teṣāṁ madhyagato vasiṣṭho munisattamaḥ so'bravītkopasaṁyukto nāhaṁ vakṣyāmi karhicit
किन्तु उनके मध्य खड़े मुनिसत्तम वसिष्ठ ने क्रोधित होकर कहा — 'मैं कभी भी ऐसा नहीं कहूँगा।'
श्लोक 29 (skanda.6.168.29)
ब्राह्मणं क्षत्रियाज्जातं जानन्नपि पितामह ॥ ऋचीकस्य च दाक्षिण्यात्तथा त्वं वदसि प्रभो
brāhmaṇaṁ kṣatriyājjātaṁ jānannapi pitāmaha ṛcīkasya ca dākṣiṇyāttathā tvaṁ vadasi prabho
'हे पितामह! यह जानते हुए भी कि वह क्षत्रिय से उत्पन्न हुआ है, हे प्रभो! आप ऋचीक के प्रति सौजन्यवश ही ऐसा कहते हैं।'
श्लोक 30 (skanda.6.168.30)
प्रोच्यमानोऽपि बहुधा वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ पितामहेन मुनिभिर्नारदाद्यैरनेकधा ॥ जगामाथ परित्यज्य तान्सर्वान्द्विजसत्तमान्
procyamāno'pi bahudhā vasiṣṭho munisattamaḥ pitāmahena munibhirnāradādyairanekadhā jagāmātha parityajya tānsarvāndvijasattamān
पितामह और नारद आदि मुनियों के द्वारा अनेक प्रकार से बार-बार समझाए जाने पर भी, मुनिसत्तम वसिष्ठ उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों को छोड़कर वहाँ से चले गये।
श्लोक 31 (skanda.6.168.31)
स चागत्य मुनिश्रेष्ठो देशं चानर्तसंज्ञितम् ॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे शंखतीर्थसमीपतः
sa cāgatya muniśreṣṭho deśaṁ cānartasaṁjñitam hāṭakeśvaraje kṣetre śaṁkhatīrthasamīpataḥ
वह श्रेष्ठ मुनि आनर्त नामक देश में, हाटकेश्वर क्षेत्र में, शंखतीर्थ के समीप आये।
श्लोक 32 (skanda.6.168.32)
यत्र ब्रह्मशिला पुण्या श्वेतद्वीपसमन्विता ॥ सरस्वती स्थिता यत्र नदी पापहरा शुभा
yatra brahmaśilā puṇyā śvetadvīpasamanvitā sarasvatī sthitā yatra nadī pāpaharā śubhā
— जहाँ पुण्य ब्रह्मशिला श्वेतद्वीप से युक्त स्थित है, और जहाँ पापहारिणी शुभ सरस्वती नदी बहती है।
श्लोक 33 (skanda.6.168.33)
तत्राश्रमपदं कृत्वा चकार विपुलं तपः ॥ विश्वामित्रोऽपि सामर्षस्तद्वधार्थं समागतः
tatrāśramapadaṁ kṛtvā cakāra vipulaṁ tapaḥ viśvāmitro'pi sāmarṣastadvadhārthaṁ samāgataḥ
वहाँ आश्रम बनाकर उन्होंने विशाल तपस्या की; और विश्वामित्र भी क्रोध से भरे हुए उसका वध करने के लिए वहाँ आये।
श्लोक 34 (skanda.6.168.34)
तस्याश्रमस्य दूरे स याम्यां दिशि समाश्रितः ॥ कृत्वाश्रमपदं तत्र तस्य च्छिद्राणि चिन्तयन्
tasyāśramasya dūre sa yāmyāṁ diśi samāśritaḥ kṛtvāśramapadaṁ tatra tasya cchidrāṇi cintayan
उसके आश्रम से दूर, दक्षिण दिशा में जाकर उन्होंने वहीं आश्रम बनाया और उसके छिद्रों की टोह लेते रहे।
श्लोक 35 (skanda.6.168.35)
संस्थितः सुचिरं कालं न च पश्यति किंचन ॥ अथाभिचारिकं तेन प्रारब्धं तस्य चोपरि
saṁsthitaḥ suciraṁ kālaṁ na ca paśyati kiṁcana athābhicārikaṁ tena prārabdhaṁ tasya copari
वे बहुत दीर्घकाल तक वहाँ रहे, किन्तु कुछ भी दोष नहीं देख पाये; तब उन्होंने उसके विरुद्ध अभिचार-कर्म आरम्भ किया।
श्लोक 36 (skanda.6.168.36)
यदुक्तं सामविधिना सामवेदे वधात्मकम् ॥ तस्य तैर्दारुणैर्मंत्रैर्जुह्वतो जातवेदसम्
yaduktaṁ sāmavidhinā sāmavede vadhātmakam tasya tairdāruṇairmaṁtrairjuhvato jātavedasam
सामवेद में सामविधि के अनुसार जो वधकारी विधान कहा गया है, उन भयंकर मंत्रों के साथ अग्नि में हवन करते हुए,
श्लोक 37 (skanda.6.168.37)
निष्क्रांता दारुणा शक्तिर्मुक्तकेशी भयानका ॥ वानरस्कंधमारूढा कुर्वाणा किल्किलाध्वनिम्
niṣkrāṁtā dāruṇā śaktirmuktakeśī bhayānakā vānaraskaṁdhamārūḍhā kurvāṇā kilkilādhvanim
एक भयानक शक्ति उत्पन्न हुई, जिसके केश बिखरे हुए थे, जो वानर के कंधे पर सवार होकर किलकिल शब्द करती हुई निकली।
श्लोक 38 (skanda.6.168.38)
नानायुधसमोपेता यमजिह्वा यथा परा ॥ साब्रवीद्वद विप्रेंद्र किं ते कृत्यं करोम्यहम्
nānāyudhasamopetā yamajihvā yathā parā sābravīdvada vipreṁdra kiṁ te kṛtyaṁ karomyaham
नाना प्रकार के शस्त्रों से युक्त, मानो यम की दूसरी जिह्वा हो, वह बोली — 'हे विप्रेंद्र! बताइये, मैं आपके लिए क्या कार्य करूँ?'
श्लोक 39 (skanda.6.168.39)
त्रैलोक्यमपि कृत्स्नं च संहरामि तवाज्ञया
trailokyamapi kṛtsnaṁ ca saṁharāmi tavājñayā
'आपकी आज्ञा से मैं संपूर्ण त्रैलोक्य का भी संहार कर सकती हूँ।'
श्लोक 40 (skanda.6.168.40)
॥ विश्वामित्र उवाच ॥ ॥ मम शत्रुर्मान्योऽत्र वसिष्ठः स मुनिः स्थितः ॥ तं त्वं जहि द्रुतं गत्वा तदर्थं च मया कृता
viśvāmitra uvāca mama śatrurmānyo'tra vasiṣṭhaḥ sa muniḥ sthitaḥ taṁ tvaṁ jahi drutaṁ gatvā tadarthaṁ ca mayā kṛtā
विश्वामित्र ने कहा — मेरा शत्रु, वह मुनि वसिष्ठ, यहीं रहता है; तुम शीघ्र जाकर उसका वध करो; इसी प्रयोजन के लिए मैंने तुम्हें उत्पन्न किया है।
श्लोक 41 (skanda.6.168.41)
एवमुक्ता तु सा तेन विश्वामित्रेण धीमता ॥ वसिष्ठाश्रममुद्दिश्य प्रस्थिता चोत्तरामुखी
evamuktā tu sā tena viśvāmitreṇa dhīmatā vasiṣṭhāśramamuddiśya prasthitā cottarāmukhī
बुद्धिमान विश्वामित्र द्वारा इस प्रकार आदेश दिये जाने पर वह वसिष्ठ के आश्रम की ओर लक्ष्य करके उत्तर दिशा की ओर मुख करके चल पड़ी।
श्लोक 42 (skanda.6.168.42)
एतस्मिन्नेव काले तु वसिष्ठस्याश्रमे द्विजाः ॥ दुर्निमित्तानि जातानि प्रभूतानि महांति च
etasminneva kāle tu vasiṣṭhasyāśrame dvijāḥ durnimittāni jātāni prabhūtāni mahāṁti ca
हे द्विजो! इसी समय वसिष्ठ के आश्रम में अनेक बड़े दुर्निमित्त उत्पन्न हुए।
श्लोक 43 (skanda.6.168.43)
पपात महती चोल्का निहत्य रविमण्डलम् ॥ तथा रुधिरवृष्टिश्च अस्थिमिश्रा व्यजायत
papāta mahatī colkā nihatya ravimaṇḍalam tathā rudhiravṛṣṭiśca asthimiśrā vyajāyata
सूर्य-मंडल को छूती हुई एक बड़ी उल्का गिरी, और अस्थियों से मिश्रित रक्त की वर्षा हुई।
श्लोक 44 (skanda.6.168.44)
दीप्तां दिशं समासाद्य रुरोद च तथा शिवा ॥ तां दृष्ट्वा सुमहोत्पातान्वसिष्ठो मुनिपुंगवः
dīptāṁ diśaṁ samāsādya ruroda ca tathā śivā tāṁ dṛṣṭvā sumahotpātānvasiṣṭho munipuṁgavaḥ
एक सियारिन जलती हुई दिशा की ओर मुख करके रोने लगी; इन महान् उत्पातों को देखकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ,
श्लोक 45 (skanda.6.168.45)
यावदालोकते रूपं ज्वालामालासमाकुलम् ॥ ततः सम्यक्परिज्ञाय सर्वं दिव्येन चक्षुषा
yāvadālokate rūpaṁ jvālāmālāsamākulam tataḥ samyakparijñāya sarvaṁ divyena cakṣuṣā
ज्वाला-मालाओं से घिरे हुए एक रूप को देखते ही, तब दिव्य नेत्र से सब कुछ भली-भाँति जानकर,
श्लोक 46 (skanda.6.168.46)
विश्वामित्रप्रयुक्तेयं शक्तिर्मम वधाय च ॥ कृत्या रूपा सुमंत्रैश्च सामवेदसमुद्भवैः
viśvāmitraprayukteyaṁ śaktirmama vadhāya ca kṛtyā rūpā sumaṁtraiśca sāmavedasamudbhavaiḥ
उन्होंने जान लिया — 'यह विश्वामित्र द्वारा मेरे वध के लिए भेजी गयी शक्ति है, सामवेद से उत्पन्न सुमंत्रों द्वारा निर्मित कृत्या रूप है।'
श्लोक 47 (skanda.6.168.47)
तिष्ठतिष्ठेति तेनोक्ता ततः सा निश्चलाभवत् ॥ निजमंत्रैश्च सा तेन स्तंभिताथर्वणोद्भवैः
tiṣṭhatiṣṭheti tenoktā tataḥ sā niścalābhavat nijamaṁtraiśca sā tena staṁbhitātharvaṇodbhavaiḥ
उनके द्वारा 'ठहरो, ठहरो' कहे जाने पर वह वहीं स्तब्ध हो गयी, उनके अथर्ववेदोत्पन्न मंत्रों से स्तंभित होकर।
श्लोक 48 (skanda.6.168.48)
ततः स्त्रीरूपमादाय प्रोवाच मुनिपुंगवम् ॥ सामवेदस्तु वेदानां प्राधान्येन व्यवस्थितः
tataḥ strīrūpamādāya provāca munipuṁgavam sāmavedastu vedānāṁ prādhānyena vyavasthitaḥ
तब स्त्री का रूप लेकर उसने मुनिश्रेष्ठ से कहा — 'सामवेद तो वेदों में प्रधानता से स्थित है —'
श्लोक 49 (skanda.6.168.49)
विधिना तेन संसृष्टा विश्वामित्रेण धीमता ॥ मा कुरुत्वप्रमाणंतु प्रहारं सह मे मुने ॥ रक्षयिष्यामि ते प्राणान्स्वल्पस्पर्शेन ते मुने
vidhinā tena saṁsṛṣṭā viśvāmitreṇa dhīmatā mā kurutvapramāṇaṁtu prahāraṁ saha me mune rakṣayiṣyāmi te prāṇānsvalpasparśena te mune
'— और उसी विधि से बुद्धिमान विश्वामित्र द्वारा मैं रची गयी हूँ; हे मुने! मुझ पर प्रहार को असीमित मत कीजिये। हे मुने! मैं केवल हल्के स्पर्श से ही आपके प्राणों की रक्षा करूँगी।'
श्लोक 50 (skanda.6.168.50)
॥ वसिष्ठ उवाच ॥ ॥ यद्येवं कुरु मे स्पर्शं न मर्म स्पर्शनं शुभे ॥ मया चाथर्वणा मंत्राः संहृताः कृपया तव
vasiṣṭha uvāca yadyevaṁ kuru me sparśaṁ na marma sparśanaṁ śubhe mayā cātharvaṇā maṁtrāḥ saṁhṛtāḥ kṛpayā tava
वसिष्ठ ने कहा — यदि ऐसा है, तो हे शुभे! मुझे स्पर्श करो, किन्तु मर्मस्थान को नहीं; तुम पर दया करके मैं अपने अथर्वण मंत्रों को समेट लेता हूँ।
श्लोक 51 (skanda.6.168.51)
ततः सा दारुणा शक्तिर्विश्वामित्रप्रयोजिता ॥ तस्यांगदेशं स्पृष्ट्वाथ निपपात धरातले
tataḥ sā dāruṇā śaktirviśvāmitraprayojitā tasyāṁgadeśaṁ spṛṣṭvātha nipapāta dharātale
तब विश्वामित्र द्वारा प्रयुक्त वह भयंकर शक्ति उनके शरीर के एक अंग को स्पर्श करके पृथ्वी पर गिर पड़ी।
श्लोक 52 (skanda.6.168.52)
ततस्तुष्टो वसिष्ठस्तु तामाह मधुरं वचः ॥ अद्यप्रभृति ते पूजां करिष्यंति समाहिताः ॥ जनाः सर्वे महाभागे भक्त्या परमया युताः
tatastuṣṭo vasiṣṭhastu tāmāha madhuraṁ vacaḥ adyaprabhṛti te pūjāṁ kariṣyaṁti samāhitāḥ janāḥ sarve mahābhāge bhaktyā paramayā yutāḥ
तब प्रसन्न होकर वसिष्ठ ने उससे मधुर वचन कहा — 'हे महाभागे! आज से समस्त लोग एकाग्रचित्त होकर परम भक्ति से युक्त होकर तुम्हारी पूजा करेंगे।'
श्लोक 53 (skanda.6.168.53)
चैत्रमासे सिते पक्षे अष्टमीदिवसे स्थिते ॥ ये ते पूजां करिष्यंति श्रद्धया परया युताः
caitramāse site pakṣe aṣṭamīdivase sthite ye te pūjāṁ kariṣyaṁti śraddhayā parayā yutāḥ
'चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को जो लोग परम श्रद्धा से युक्त होकर तुम्हारी पूजा करेंगे —'
श्लोक 54 (skanda.6.168.54)
ते सर्वे वत्सरंयावद्भविष्यंति निरामयाः ॥ तस्मादत्रैव स्थातव्यं सदैव मम वाक्यतः
te sarve vatsaraṁyāvadbhaviṣyaṁti nirāmayāḥ tasmādatraiva sthātavyaṁ sadaiva mama vākyataḥ
'— वे सब एक वर्षपर्यंत रोगरहित रहेंगे। अतः मेरे वचन से तुम्हें सदैव यहीं रहना चाहिए।'
श्लोक 55 (skanda.6.168.55)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ एवमुक्ता च सा तेन वसिष्ठेन महात्मना ॥ स्थिता तत्रैव सा देवी तस्य वाक्येन तत्क्षणात्
sūta uvāca evamuktā ca sā tena vasiṣṭhena mahātmanā sthitā tatraiva sā devī tasya vākyena tatkṣaṇāt
सूत जी ने कहा — महात्मा वसिष्ठ द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह देवी उनके वचन से उसी क्षण वहीं स्थिर हो गयी।
श्लोक 56 (skanda.6.168.56)
प्राप्नोति परमां पूजां विशेषान्नागरैः कृताम् ॥ धारानामेति विख्याता भक्तलोकसुखप्रदा
prāpnoti paramāṁ pūjāṁ viśeṣānnāgaraiḥ kṛtām dhārānāmeti vikhyātā bhaktalokasukhapradā
वह विशेष रूप से नागरों द्वारा की गयी परम पूजा प्राप्त करती है; 'धारा' नाम से विख्यात होकर वह भक्तजनों को सुख प्रदान करती है।