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नागर खण्ड · अध्याय 169

धारानामोत्पत्तिवृत्तांतधारादेवीमाहात्म्यवर्णन

अध्याय 168अध्याय-सूचीअध्याय 170

श्लोक 1 (skanda.6.169.1)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ ॥ कस्मात्सा तुष्टिदा प्रोक्ता नागराणां विशेषतः ॥ धारानामेति विख्याता कस्मात्सा धरणीतले

ṛṣaya ūcuḥ kasmātsā tuṣṭidā proktā nāgarāṇāṁ viśeṣataḥ dhārānāmeti vikhyātā kasmātsā dharaṇītale

ऋषियों ने कहा — वह विशेष रूप से नागरों को संतुष्ट करने वाली क्यों कही गयी? और वह पृथ्वी पर 'धारा' नाम से क्यों विख्यात हुई?

श्लोक 2 (skanda.6.169.2)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ चमत्कारपुरे पूर्वं धारानामेति विश्रुता ॥ आसीत्तपस्विनी साध्वी नागरी ब्राह्मणोत्तमा ॥ तस्याः सख्यमरुन्धत्या आसीत्पूर्वं सुमेधया

sūta uvāca camatkārapure pūrvaṁ dhārānāmeti viśrutā āsīttapasvinī sādhvī nāgarī brāhmaṇottamā tasyāḥ sakhyamarundhatyā āsītpūrvaṁ sumedhayā

सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में चमत्कारपुर में 'धारा' नाम से विख्यात एक तपस्विनी, साध्वी, श्रेष्ठ ब्राह्मणी नागरी थी; अत्यंत बुद्धिमती उस स्त्री की अरुन्धती से पूर्वकाल में मित्रता थी।

श्लोक 3 (skanda.6.169.3)

अरुन्धती यदा प्राप्ता चमत्कारपुरे शुभे ॥ स्नानार्थं शंखतीर्थं तु वसिष्ठेन समागता

arundhatī yadā prāptā camatkārapure śubhe snānārthaṁ śaṁkhatīrthaṁ tu vasiṣṭhena samāgatā

जब अरुन्धती शुभ चमत्कारपुर में आयीं, वसिष्ठ के साथ स्नान हेतु शंखतीर्थ में आयीं,

श्लोक 4 (skanda.6.169.4)

तया दृष्टाथ सा तत्र अंगुष्ठाग्रेण संस्थिता ॥ वायुभक्षा निराहारा दिव्येन वपुषान्विता

tayā dṛṣṭātha sā tatra aṁguṣṭhāgreṇa saṁsthitā vāyubhakṣā nirāhārā divyena vapuṣānvitā

उसने वहाँ उसे पैर के अंगूठे के अग्रभाग पर खड़ी, वायुभक्षी, निराहार तथा दिव्य शरीर से युक्त देखा।

श्लोक 5 (skanda.6.169.5)

तया पृष्टा च सा साध्वी का त्वं कस्य सुता शुभे ॥ किमर्थं तु स्थिता चोग्रे तपसि ब्रूहि मे शुभे

tayā pṛṣṭā ca sā sādhvī kā tvaṁ kasya sutā śubhe kimarthaṁ tu sthitā cogre tapasi brūhi me śubhe

उसने उस साध्वी से पूछा — 'हे शुभे! तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो? और किस कारण इस उग्र तप में स्थित हो? हे शुभे! मुझे बताओ।'

श्लोक 6 (skanda.6.169.6)

॥ धारोवाच ॥ ॥ देवशर्माख्यविप्रस्य सुताहं नागरस्य च ॥ बालत्वे वर्तमानाया वैधव्यं मे व्यवस्थितम्

dhārovāca devaśarmākhyaviprasya sutāhaṁ nāgarasya ca bālatve vartamānāyā vaidhavyaṁ me vyavasthitam

धारा ने कहा — मैं देवशर्मा नामक नागर ब्राह्मण की पुत्री हूँ; बाल्यावस्था में ही रहते हुए मुझे वैधव्य प्राप्त हो गया।

श्लोक 7 (skanda.6.169.7)

शंखतीर्थस्य माहात्म्यं श्रुत्वा शंखेश्वरस्य च ॥ ततोऽहं संस्थिता ह्यत्र तस्यैवाराधने स्थिता

śaṁkhatīrthasya māhātmyaṁ śrutvā śaṁkheśvarasya ca tato'haṁ saṁsthitā hyatra tasyaivārādhane sthitā

शंखतीर्थ और शंखेश्वर के माहात्म्य को सुनकर मैं यहाँ आकर उन्हीं की आराधना में स्थित हो गयी।

श्लोक 8 (skanda.6.169.8)

॥ अरुन्धत्युवाच ॥ ॥ तवोपरि महान्स्नेहो दर्शनात्ते व्यवस्थितः ॥ तस्मादागच्छ गच्छावो ममाश्रमपदं शुभम्

arundhatyuvāca tavopari mahānsneho darśanātte vyavasthitaḥ tasmādāgaccha gacchāvo mamāśramapadaṁ śubham

अरुन्धती ने कहा — तुम्हें देखते ही मेरे मन में महान् स्नेह उत्पन्न हो गया है; अतः आओ, हम दोनों मेरे शुभ आश्रम को चलें।

श्लोक 9 (skanda.6.169.9)

सरस्वत्यास्तटे शुभ्रे सर्वपातकनाशने ॥ शास्त्रगोष्ठीरता नित्यं तत्र तिष्ठ मया सह

sarasvatyāstaṭe śubhre sarvapātakanāśane śāstragoṣṭhīratā nityaṁ tatra tiṣṭha mayā saha

वहाँ सरस्वती के उज्ज्वल, सर्वपाप-नाशक तट पर, नित्य शास्त्र-गोष्ठी में रत होकर मेरे साथ रहो।

श्लोक 10 (skanda.6.169.10)

ततः संप्रस्थिता सा तु तया सार्धं तपस्विनी ॥ अनुज्ञाता स्वपित्रा तु जनन्या बांधवैस्तथा

tataḥ saṁprasthitā sā tu tayā sārdhaṁ tapasvinī anujñātā svapitrā tu jananyā bāṁdhavaistathā

तब वह तपस्विनी अपने पिता, माता तथा बान्धवों से अनुमति पाकर उसके साथ चल पड़ी।

श्लोक 11 (skanda.6.169.11)

तस्याः सख्यं चिरं कालं तया सह बभूव ह ॥ कस्यचित्त्वथ कालस्य सा शक्तिस्तत्र चागता

tasyāḥ sakhyaṁ ciraṁ kālaṁ tayā saha babhūva ha kasyacittvatha kālasya sā śaktistatra cāgatā

उसकी मैत्री उसके साथ दीर्घकाल तक बनी रही; तत्पश्चात् कुछ समय बाद वह शक्ति वहाँ आ पहुँची।

श्लोक 12 (skanda.6.169.12)

विश्वामित्रेण संसृष्टा वसिष्ठस्य वधाय च ॥ सा स्तंभिता वसिष्ठेन कृता देवीस्वरूपिणी ॥ संपूज्या देवमर्त्यानां सर्वरक्षाप्रदा शुभा

viśvāmitreṇa saṁsṛṣṭā vasiṣṭhasya vadhāya ca sā staṁbhitā vasiṣṭhena kṛtā devīsvarūpiṇī saṁpūjyā devamartyānāṁ sarvarakṣāpradā śubhā

— जो विश्वामित्र द्वारा वसिष्ठ के वध के लिए रची गयी थी; वसिष्ठ द्वारा उसे स्तंभित करके देवी-स्वरूपिणी बना दिया गया, जो देवताओं और मनुष्यों दोनों के लिए पूज्य, शुभ और सर्वरक्षाप्रदा हुई।

श्लोक 13 (skanda.6.169.13)

ततस्तु धारया तस्याः कैलासशिखरोपमः ॥ प्रासादो निर्मितो विप्रा नानारत्नविचित्रितः

tatastu dhārayā tasyāḥ kailāsaśikharopamaḥ prāsādo nirmito viprā nānāratnavicitritaḥ

हे विप्रो! तत्पश्चात् धारा के द्वारा उसके लिए कैलाश शिखर के समान, नाना रत्नों से सुसज्जित एक मंदिर बनवाया गया।

श्लोक 14 (skanda.6.169.14)

चकाराथ ततः स्तोत्रं तस्याः सा च तपस्विनी

cakārātha tataḥ stotraṁ tasyāḥ sā ca tapasvinī

और तब उस तपस्विनी ने उसका स्तोत्र रचा।

श्लोक 15 (skanda.6.169.15)

नमस्ते परमे ब्राह्मि धारयोगे नमोनमः ॥ अर्धमात्रे परे शून्ये तस्यार्धार्धे नमोस्तु ते

namaste parame brāhmi dhārayoge namonamaḥ ardhamātre pare śūnye tasyārdhārdhe namostu te

'हे परम ब्राह्मि! तुम्हें नमस्कार है, हे धारायोगस्वरूपिणी! नमस्कार, नमस्कार। हे परम अर्धमात्रे, हे शून्य, हे उसके अर्धार्ध! तुम्हें नमस्कार हो।'

श्लोक 16 (skanda.6.169.16)

नमस्ते जगदाधारे नमस्ते भूतधारिणि ॥ नमस्ते पद्मपत्राक्षि नमस्ते कांचनद्युते

namaste jagadādhāre namaste bhūtadhāriṇi namaste padmapatrākṣi namaste kāṁcanadyute

'हे जगदाधारे! नमस्कार है; हे भूतधारिणी! नमस्कार है; हे पद्मपत्राक्षि! नमस्कार है; हे कांचनद्युते! नमस्कार है।'

श्लोक 17 (skanda.6.169.17)

नमस्ते सिंहयानाढ्ये नमस्तेऽस्तुमहाभुजे ॥ नमस्ते देवताभीष्टे नमस्ते दैत्यसूदिनि

namaste siṁhayānāḍhye namaste'stumahābhuje namaste devatābhīṣṭe namaste daityasūdini

'हे सिंहवाहिनि! नमस्कार है; हे महाभुजे! नमस्कार हो; हे देवताभीष्टे! नमस्कार है; हे दैत्यसूदिनि! नमस्कार है।'

श्लोक 18 (skanda.6.169.18)

नमस्ते महिषाक्रांतशरीरच्छिन्नमस्तके ॥ नमस्ते विंध्यनिरते सुरामांसबलिप्रिये

namaste mahiṣākrāṁtaśarīracchinnamastake namaste viṁdhyanirate surāmāṁsabalipriye

'हे महिष के शरीर को रौंदने वाली, हे छिन्नमस्तके! नमस्कार है; हे विंध्यनिरते! हे सुरामांसबलिप्रिये! नमस्कार है।'

श्लोक 19 (skanda.6.169.19)

त्वं लक्ष्मीस्त्वं शची गौरी त्वं सिद्धिस्त्वं विभावरी ॥ त्वं स्वाहा त्वं स्वधा तुष्टिस्त्वं पुष्टिस्त्वं सुरेश्वरी

tvaṁ lakṣmīstvaṁ śacī gaurī tvaṁ siddhistvaṁ vibhāvarī tvaṁ svāhā tvaṁ svadhā tuṣṭistvaṁ puṣṭistvaṁ sureśvarī

'तुम लक्ष्मी हो, तुम शची हो, गौरी हो; तुम सिद्धि हो, तुम रात्रि हो; तुम स्वाहा हो, तुम स्वधा हो, तुष्टि हो; तुम पुष्टि हो, तुम सुरेश्वरी हो।'

श्लोक 20 (skanda.6.169.20)

शक्तिरूपासि देवि त्वं सृष्टिसंहारकारिणी ॥ त्वयि दृष्टमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्

śaktirūpāsi devi tvaṁ sṛṣṭisaṁhārakāriṇī tvayi dṛṣṭamidaṁ sarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram

'हे देवि! तुम शक्तिस्वरूपा हो, सृष्टि और संहार करने वाली; तुम्हारे भीतर ही यह चराचर सहित सम्पूर्ण त्रैलोक्य दृष्ट होता है।'

श्लोक 21 (skanda.6.169.21)

यथा तिलेस्थितं तैलं दधिसंस्थं यथा घृतम् ॥ हविर्भुजश्च काष्ठस्थः सुगुप्तं लभ्यते न हि

yathā tilesthitaṁ tailaṁ dadhisaṁsthaṁ yathā ghṛtam havirbhujaśca kāṣṭhasthaḥ suguptaṁ labhyate na hi

'जिस प्रकार तिल में तेल छिपा रहता है, दधि में घृत छिपा रहता है, तथा काष्ठ में अग्नि गुप्त रूप से छिपी रहती है और सहज नहीं मिलती —'

श्लोक 22 (skanda.6.169.22)

तथा त्वमपि देवेशि सर्वगापि न लक्ष्यसे

tathā tvamapi deveśi sarvagāpi na lakṣyase

'— उसी प्रकार, हे देवेशि! तुम भी सर्वव्यापी होकर भी दिखाई नहीं देतीं।'

श्लोक 23 (skanda.6.169.23)

॥ सूत उवाच ॥ ॥ एतेन स्तोत्रमुख्येन स्मृता सा परमेश्वरी ॥ बहूनि वर्षपूगानि पूजयंत्या दिनेदिने

sūta uvāca etena stotramukhyena smṛtā sā parameśvarī bahūni varṣapūgāni pūjayaṁtyā dinedine

सूत जी ने कहा — इस प्रधान स्तोत्र के द्वारा उस परमेश्वरी का स्मरण करते हुए, वह अनेक वर्षों तक प्रतिदिन उनकी पूजा करती रही।

श्लोक 24 (skanda.6.169.24)

कस्यचित्त्वथ कालस्य चैत्रशुक्लाष्टमी सिता ॥ तस्मिन्नहनि देवी सा नद्यां संस्नाप्य पूजिता

kasyacittvatha kālasya caitraśuklāṣṭamī sitā tasminnahani devī sā nadyāṁ saṁsnāpya pūjitā

तत्पश्चात् कुछ काल बाद, चैत्र शुक्ल अष्टमी को, उस दिन उस देवी को नदी में स्नान कराकर पूजा की गयी।

श्लोक 25 (skanda.6.169.25)

बलिपूजां ततो दत्त्वा स्तोत्रेणानेन च स्तुता ॥ ततः प्रत्यक्षतां गत्वा तामुवाच तपस्विनीम्

balipūjāṁ tato dattvā stotreṇānena ca stutā tataḥ pratyakṣatāṁ gatvā tāmuvāca tapasvinīm

तत्पश्चात् बलि-पूजा अर्पित करके इस स्तोत्र से स्तुति की गयी; तब वह देवी प्रत्यक्ष होकर उस तपस्विनी से बोलीं —

श्लोक 26 (skanda.6.169.26)

पुत्रि तुष्टास्मि भद्रं ते स्तोत्रेणानेन चानघे ॥ वरं वरय भद्रं ते तव दास्यामि वांछितम्

putri tuṣṭāsmi bhadraṁ te stotreṇānena cānaghe varaṁ varaya bhadraṁ te tava dāsyāmi vāṁchitam

'हे पुत्री! हे निष्पाप! इस स्तोत्र से मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हारी अभीष्ट वस्तु दूँगी।'

श्लोक 27 (skanda.6.169.27)

॥ धारोवाच ॥ ॥ यदि तुष्टासि मे देवि यदि देयो वरो मम ॥ तन्मे नाम तवाप्यस्तु प्रासादेऽत्र हि केवलम्

dhārovāca yadi tuṣṭāsi me devi yadi deyo varo mama tanme nāma tavāpyastu prāsāde'tra hi kevalam

धारा ने कहा — हे देवि! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, यदि मुझे वर देना चाहती हैं, तो इस मंदिर में मेरा नाम भी आपका हो जाए।

श्लोक 28 (skanda.6.169.28)

अपरं नागरो योऽत्र त्वस्मिन्नहनि संस्थिते ॥ प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा तव दत्त्वा फलत्रयम्

aparaṁ nāgaro yo'tra tvasminnahani saṁsthite pradakṣiṇātrayaṁ kṛtvā tava dattvā phalatrayam

इसके अतिरिक्त, जो भी नागर इसी दिन तीन प्रदक्षिणाएँ करके और आपको तीन फल अर्पित करके,

श्लोक 29 (skanda.6.169.29)

स्तोत्रेणानेन भवतीं स्तुत्वा च कुरुते नतिम् ॥ तस्य संवत्सरंयावद्रोगो रक्ष्यस्त्वयाऽखिलः

stotreṇānena bhavatīṁ stutvā ca kurute natim tasya saṁvatsaraṁyāvadrogo rakṣyastvayā'khilaḥ

इस स्तोत्र से आपकी स्तुति करके प्रणाम करता है, उसकी एक वर्षपर्यंत समस्त बीमारी से आप रक्षा करें।

श्लोक 30 (skanda.6.169.30)

या च वंध्या भवेन्नारी सा भूयात्पुत्रसंयुता ॥ दुर्भगा च ससौभाग्या कुरूपा रूपसंभवा ॥ रोगिणी रोगनिर्मुक्ता सर्वसौख्यसमन्विता

yā ca vaṁdhyā bhavennārī sā bhūyātputrasaṁyutā durbhagā ca sasaubhāgyā kurūpā rūpasaṁbhavā rogiṇī roganirmuktā sarvasaukhyasamanvitā

और जो नारी वंध्या हो, वह पुत्रवती हो जाए; जो दुर्भागिनी हो, वह सौभाग्यशालिनी हो जाए; जो कुरूपा हो, वह रूपवती हो जाए; जो रोगिणी हो, वह रोगमुक्त होकर सर्वसुखों से युक्त हो जाए।

श्लोक 31 (skanda.6.169.31)

॥ देव्युवाच ॥ ॥ अहं धारेति विख्याता प्रासादेऽत्र त्वया कृते ॥ भविष्यामि न सन्देहस्तव कीर्तिकृते सदा

devyuvāca ahaṁ dhāreti vikhyātā prāsāde'tra tvayā kṛte bhaviṣyāmi na sandehastava kīrtikṛte sadā

देवी ने कहा — इस मंदिर में जो तुमने बनवाया है, मैं 'धारा' नाम से विख्यात होऊँगी, तुम्हारी कीर्ति के लिए सदा, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 32 (skanda.6.169.32)

अत्र यो नागरो भक्त्या समागत्य तपस्विनि ॥ प्रदक्षिणात्रयं कुर्याद्दत्त्वा मम फलत्रयम्

atra yo nāgaro bhaktyā samāgatya tapasvini pradakṣiṇātrayaṁ kuryāddattvā mama phalatrayam

'हे तपस्विनि! यहाँ जो भी नागर भक्तिपूर्वक आकर मुझे तीन फल अर्पित करके तीन प्रदक्षिणाएँ करेगा —'

श्लोक 33 (skanda.6.169.33)

सोऽपि संवत्सरं यावद्भविता रोगवर्जितः ॥ एवमुक्ता तु सा देवीततश्चादर्शनं गता

so'pi saṁvatsaraṁ yāvadbhavitā rogavarjitaḥ evamuktā tu sā devītataścādarśanaṁ gatā

'— वह भी एक वर्षपर्यंत रोगरहित रहेगा।' ऐसा कहकर वह देवी तत्पश्चात् अंतर्धान हो गयीं।

श्लोक 34 (skanda.6.169.34)

धारापि संस्थिता तत्र अरुन्धत्या समन्विता ॥ अद्यापि दृश्यते व्योम्नि तस्याश्चापि समीपगा

dhārāpi saṁsthitā tatra arundhatyā samanvitā adyāpi dṛśyate vyomni tasyāścāpi samīpagā

धारा भी अरुन्धती के साथ वहीं स्थित रहीं; आज भी वे आकाश में उनके समीप दिखाई देती हैं।

श्लोक 35 (skanda.6.169.35)

एतद्धारोद्भवं योऽत्र वृत्तांतं कीर्तयिष्यति ॥ शृणुयाद्वा द्विजश्रेष्ठा मुच्येत्पापाद्दिनोद्भवात्

etaddhārodbhavaṁ yo'tra vṛttāṁtaṁ kīrtayiṣyati śṛṇuyādvā dvijaśreṣṭhā mucyetpāpāddinodbhavāt

हे द्विजश्रेष्ठो! जो कोई धारा की इस उत्पत्ति-कथा का कीर्तन करेगा अथवा श्रवण करेगा, वह दिनकृत पाप से मुक्त हो जाएगा।

श्लोक 36 (skanda.6.169.36)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पठनीयं विशेषतः ॥ श्रोतव्यं च प्रभक्त्येदं नागरैश्च विशेषतः

tasmātsarvaprayatnena paṭhanīyaṁ viśeṣataḥ śrotavyaṁ ca prabhaktyedaṁ nāgaraiśca viśeṣataḥ

अतः इसे विशेष रूप से पूर्ण प्रयत्न से पढ़ना चाहिए, और विशेषतः नागरों द्वारा परम भक्ति से सुनना चाहिए।

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