नागर खण्ड · अध्याय 170
धारातीर्थोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.170.1)
॥ सूत उवाच ॥ ॥ तथान्यदपि संजातमाश्चर्यं यदभूद्द्विजाः ॥ विश्वामित्रेण सा शक्तिर्वसिष्ठाय विसर्जिता
sūta uvāca tathānyadapi saṁjātamāścaryaṁ yadabhūddvijāḥ viśvāmitreṇa sā śaktirvasiṣṭhāya visarjitā
सूत जी ने कहा — हे द्विजो! और भी एक आश्चर्य हुआ — जो शक्ति विश्वामित्र द्वारा वसिष्ठ के विरुद्ध छोड़ी गयी थी,
श्लोक 2 (skanda.6.170.2)
वधार्थं तस्य विप्रर्षेर्वसिष्ठेन च धीमता ॥ स्तंभिताऽथर्वणैर्मन्त्रैः प्रस्वेदः समजायत
vadhārthaṁ tasya viprarṣervasiṣṭhena ca dhīmatā staṁbhitā'tharvaṇairmantraiḥ prasvedaḥ samajāyata
उस ब्रह्मर्षि के वध के लिए भेजी गयी शक्ति, बुद्धिमान वसिष्ठ द्वारा अथर्ववेद के मंत्रों से स्तंभित की जाने पर, उसमें पसीना उत्पन्न हो गया।
श्लोक 3 (skanda.6.170.3)
स्वेदात्समभवत्तोयं शीतलं तदजायत ॥ पादाभ्यां निर्गतं तोयमत्र दृश्यमजायत
svedātsamabhavattoyaṁ śītalaṁ tadajāyata pādābhyāṁ nirgataṁ toyamatra dṛśyamajāyata
उस पसीने से शीतल जल उत्पन्न हो गया; वह जल पैरों से निकलकर वहाँ दृश्यमान हो गया।
श्लोक 4 (skanda.6.170.4)
विदार्य भूमिं संजाता जलधारा सुशीतला ॥ निर्मलं पावनं स्वच्छं गंगांभ इव निःसृतम्
vidārya bhūmiṁ saṁjātā jaladhārā suśītalā nirmalaṁ pāvanaṁ svacchaṁ gaṁgāṁbha iva niḥsṛtam
पृथ्वी को विदीर्ण करके एक अत्यंत शीतल जलधारा उत्पन्न हुई, जो निर्मल, पावन और स्वच्छ थी, मानो गंगाजल के समान बह निकली हो।
श्लोक 5 (skanda.6.170.5)
गंगा प्रत्यक्षतां याता तीर्थैः सर्वैः समन्विता ॥ पूरितं वारिणा कुण्डं निर्मलं शीतलं शिवम्
gaṁgā pratyakṣatāṁ yātā tīrthaiḥ sarvaiḥ samanvitā pūritaṁ vāriṇā kuṇḍaṁ nirmalaṁ śītalaṁ śivam
गंगा स्वयं वहाँ प्रत्यक्ष हो गयी, समस्त तीर्थों से युक्त होकर; उस जल से एक निर्मल, शीतल और शुभ कुण्ड भर गया।
श्लोक 6 (skanda.6.170.6)
तस्यां या कुरुते स्नानं नारी वंध्या द्विजोत्तमाः ॥ सद्यः पुत्रवती सा स्याद्रौद्रे कलियुगे द्विजाः
tasyāṁ yā kurute snānaṁ nārī vaṁdhyā dvijottamāḥ sadyaḥ putravatī sā syādraudre kaliyuge dvijāḥ
हे द्विजोत्तमो! जो वंध्या नारी इसमें स्नान करती है, हे द्विजो! वह इस भयंकर कलियुग में भी तत्काल पुत्रवती हो जाती है।
श्लोक 7 (skanda.6.170.7)
अन्योऽपि कुरुते स्नानं सर्वतीर्थफलं लभेत्
anyo'pi kurute snānaṁ sarvatīrthaphalaṁ labhet
अन्य कोई भी जो वहाँ स्नान करता है, वह समस्त तीर्थों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 8 (skanda.6.170.8)
स्नात्वा तत्र तु यो देवीं पश्येच्च विधिना नरः ॥ धनं धान्यं तथा पुत्रान्राज्योत्थं च सुखं लभेत्
snātvā tatra tu yo devīṁ paśyecca vidhinā naraḥ dhanaṁ dhānyaṁ tathā putrānrājyotthaṁ ca sukhaṁ labhet
और जो पुरुष वहाँ स्नान करके विधिपूर्वक देवी का दर्शन करता है, वह धन, धान्य, पुत्र तथा राज्य से उत्पन्न सुख प्राप्त करता है।
श्लोक 9 (skanda.6.170.9)
या नारी दुर्भगा वन्ध्या साऽपि पुत्रवती भवेत् ॥ चैत्रे मासि सिताष्टम्यां भक्तियोगसमन्विता ॥ महानिशायां तत्रैव नैवेद्यबलिपिंडिकाम्
yā nārī durbhagā vandhyā sā'pi putravatī bhavet caitre māsi sitāṣṭamyāṁ bhaktiyogasamanvitā mahāniśāyāṁ tatraiva naivedyabalipiṁḍikām
जो नारी दुर्भागिनी या वंध्या हो, वह भी पुत्रवती हो जाती है, यदि चैत्र मास की शुक्ल अष्टमी को, भक्तियोग से युक्त होकर, महानिशा के समय वहीं नैवेद्य-बलि की पिण्डिका को,
श्लोक 10 (skanda.6.170.10)
प्रसन्नया कुमार्या तु स्वयं चाऽथ करोति या ॥ गृह्णाति या च वै नारी पिंडिकां बलिसंयुताम्
prasannayā kumāryā tu svayaṁ cā'tha karoti yā gṛhṇāti yā ca vai nārī piṁḍikāṁ balisaṁyutām
किसी प्रसन्न कुमारी द्वारा तैयार की गयी उस बलियुक्त पिण्डिका को स्वयं बनाती है या ग्रहण करती है।
श्लोक 11 (skanda.6.170.11)
शतवर्षा तु या नारी पिंडिकां भक्षयेद्द्विजाः ॥ साऽपि पुत्रवती च स्याद्यदि वृद्धतमा भवेत्
śatavarṣā tu yā nārī piṁḍikāṁ bhakṣayeddvijāḥ sā'pi putravatī ca syādyadi vṛddhatamā bhavet
हे द्विजो! सौ वर्ष की भी नारी यदि उस पिण्डिका को खाए, तो वह भी पुत्रवती हो जाती है, भले ही वह अत्यंत वृद्धा क्यों न हो।
श्लोक 12 (skanda.6.170.12)
किं पुनर्यौवनोपेता सौभाग्येन समन्विता ॥ पुत्रसौख्यवती नारी देव्या वै दर्शनेन च
kiṁ punaryauvanopetā saubhāgyena samanvitā putrasaukhyavatī nārī devyā vai darśanena ca
फिर यौवन और सौभाग्य से युक्त नारी की तो बात ही क्या! वह देवी के दर्शन मात्र से ही पुत्र-सुख से युक्त हो जाती है।
श्लोक 13 (skanda.6.170.13)
सर्वेषां नागराणां तु भावजा देवता स्मृता ॥ सा सार्धाष्टद्विपंचाशद्गोत्राणां कुलदेवता
sarveṣāṁ nāgarāṇāṁ tu bhāvajā devatā smṛtā sā sārdhāṣṭadvipaṁcāśadgotrāṇāṁ kuladevatā
वह समस्त नागरों की भावज देवता मानी गयी है; वह साढ़े अट्ठावन गोत्रों की कुलदेवता हैं।
श्लोक 14 (skanda.6.170.14)
एतस्मात्कारणाद्यात्रा नागरैः सुकृता भवेत् ॥ न विना नागरैर्यात्रां तुष्टिं याति सुरेश्वरी
etasmātkāraṇādyātrā nāgaraiḥ sukṛtā bhavet na vinā nāgarairyātrāṁ tuṣṭiṁ yāti sureśvarī
इसी कारण नागरों के द्वारा ही यह यात्रा सुसम्पन्न होती है; नागरों के बिना यह देवेश्वरी यात्रा से संतुष्ट नहीं होतीं।