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नागर खण्ड · अध्याय 171

वसिष्ठ-विश्वामित्र युद्ध में दिव्यास्त्र-निवर्तन

अध्याय 170अध्याय-सूचीअध्याय 172

श्लोक 1 (skanda.6.171.1)

सूत उवाच । एतस्मिन्नेव काले तु विश्वामित्रो महामुनिः । तां शक्तिं व्यर्थतां प्राप्तां ज्ञात्वा कोपसमन्वितः

sūta uvāca etasminneva kāle tu viśvāmitro mahāmuniḥ tāṁ śaktiṁ vyarthatāṁ prāptāṁ jñātvā kopasamanvitaḥ

सूत जी ने कहा — उसी समय महामुनि विश्वामित्र, अपनी शक्ति (अस्त्र) को व्यर्थ हुआ जानकर, क्रोध से भर गए।

श्लोक 2 (skanda.6.171.2)

मुमोच तद्वधार्थाय ब्रह्मास्त्रं सोऽभिमंत्रितम् । तस्य संहितमात्रस्य प्रस्वनः समजायत

mumoca tadvadhārthāya brahmāstraṁ so'bhimaṁtritam tasya saṁhitamātrasya prasvanaḥ samajāyata

उन्होंने उस वसिष्ठ के वध के लिए मंत्राभिमंत्रित ब्रह्मास्त्र का संधान किया। उसे केवल जोड़ते ही एक भयंकर ध्वनि उत्पन्न हो गई।

श्लोक 3 (skanda.6.171.3)

ततश्चोल्काः प्रभूताश्च प्रयांति च नभस्तलात् । ततः कुन्ताः शक्तयश्च तोमराः परिघास्तथा

tataścolkāḥ prabhūtāśca prayāṁti ca nabhastalāt tataḥ kuntāḥ śaktayaśca tomarāḥ parighāstathā

तत्पश्चात् आकाश से अनेक उल्काएँ गिरने लगीं; फिर भाले, शक्तियाँ, तोमर तथा परिघ भी प्रकट होने लगे।

श्लोक 4 (skanda.6.171.4)

भिंडिपाला गदाश्चैव खड्गाश्चैव परश्वधाः । बाणाः प्रासाः शतघ्न्यश्च शतशोऽथ सहस्रशः

bhiṁḍipālā gadāścaiva khaḍgāścaiva paraśvadhāḥ bāṇāḥ prāsāḥ śataghnyaśca śataśo'tha sahasraśaḥ

भिंडिपाल, गदाएँ, खड्ग तथा परशु, बाण, प्रास एवं शतघ्नियाँ सैकड़ों-हजारों की संख्या में प्रकट हुए।

श्लोक 5 (skanda.6.171.5)

वसिष्ठोऽपि परिज्ञाय प्रेषितं गाधिसूनुना । ब्रह्मास्त्रं मृत्यवे तेन शुचिर्भूत्वा ततः परम्

vasiṣṭho'pi parijñāya preṣitaṁ gādhisūnunā brahmāstraṁ mṛtyave tena śucirbhūtvā tataḥ param

वसिष्ठ जी भी यह जान गए कि गाधिपुत्र विश्वामित्र ने उनके वध के लिए ब्रह्मास्त्र भेजा है; तब वे पवित्र होकर,

श्लोक 6 (skanda.6.171.6)

इषीकां च समादाय ब्रह्मास्त्रं तत्र योजयन् । अब्रवीद्गाधिपुत्राय स्वस्त्यस्तु तव पार्श्वतः

iṣīkāṁ ca samādāya brahmāstraṁ tatra yojayan abravīdgādhiputrāya svastyastu tava pārśvataḥ

एक ईषिका (सींक) लेकर उसमें ब्रह्मास्त्र का संधान करते हुए उन्होंने गाधिपुत्र से कहा — तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 7 (skanda.6.171.7)

हन्यतामस्त्रमेतद्धिमम वाक्यादसंशयम् । ततस्तेन हतं तच्च ब्रह्मास्त्रं तत्समुद्भवम्

hanyatāmastrametaddhimama vākyādasaṁśayam tatastena hataṁ tacca brahmāstraṁ tatsamudbhavam

मेरे इस वचन से यह अस्त्र निःसंदेह नष्ट हो जाए। तत्पश्चात् उनके द्वारा विश्वामित्र से उत्पन्न वह ब्रह्मास्त्र नष्ट कर दिया गया।

श्लोक 8 (skanda.6.171.8)

वज्रास्त्रं च ततो मुक्तं वज्रास्त्रेण विनाशितम् । यद्यदस्त्रं क्षिपत्येष विश्वामित्रः प्रकोपितः

vajrāstraṁ ca tato muktaṁ vajrāstreṇa vināśitam yadyadastraṁ kṣipatyeṣa viśvāmitraḥ prakopitaḥ

तदनन्तर वज्रास्त्र छोड़ा गया, जिसे वज्रास्त्र से ही नष्ट कर दिया गया। क्रोधित विश्वामित्र जो-जो अस्त्र फेंकते,

श्लोक 9 (skanda.6.171.9)

तत्तद्धंति वसिष्ठस्तु मंत्रस्य च प्रभावतः । एतस्मिन्नेव काले तु क्षुभितो मकरालयः

tattaddhaṁti vasiṣṭhastu maṁtrasya ca prabhāvataḥ etasminneva kāle tu kṣubhito makarālayaḥ

वसिष्ठ जी मंत्र के प्रभाव से उस-उस अस्त्र को नष्ट कर देते थे। इसी समय सागर क्षुब्ध हो उठा,

श्लोक 10 (skanda.6.171.10)

शीर्यंते गिरिशृंगाणि रक्तवृष्टिः परा स्थिता । प्रलयस्येव चिह्नानि संजातानि धरातले । किमकाले महानेष प्रलयः संभविष्यति

śīryaṁte giriśṛṁgāṇi raktavṛṣṭiḥ parā sthitā pralayasyeva cihnāni saṁjātāni dharātale kimakāle mahāneṣa pralayaḥ saṁbhaviṣyati

पर्वत-शिखर टूटने लगे, भयंकर रक्त-वृष्टि होने लगी; पृथ्वी पर प्रलय के समान चिह्न प्रकट हो गए — क्या यह महाप्रलय असमय में ही होने जा रहा है?

श्लोक 11 (skanda.6.171.11)

ततः पितामहं जग्मुः सर्वे देवाः सवासवाः । प्रोचुः प्रलयचिह्नानि यानि संति धरातले

tataḥ pitāmahaṁ jagmuḥ sarve devāḥ savāsavāḥ procuḥ pralayacihnāni yāni saṁti dharātale

तब इंद्र सहित समस्त देवगण पितामह ब्रह्मा के पास गए और पृथ्वी पर प्रकट हुए प्रलय के चिह्नों के विषय में निवेदन किया।

श्लोक 12 (skanda.6.171.12)

ततो ब्रह्मा चिरं ध्यात्वा तानुवाच दिवौकसः । विश्वामित्र वसिष्ठाभ्यां युद्धमेतद्व्यवस्थितम्

tato brahmā ciraṁ dhyātvā tānuvāca divaukasaḥ viśvāmitra vasiṣṭhābhyāṁ yuddhametadvyavasthitam

तब ब्रह्मा जी ने चिरकाल तक ध्यान करके उन देवताओं से कहा — यह युद्ध विश्वामित्र और वसिष्ठ के बीच चल रहा है।

श्लोक 13 (skanda.6.171.13)

दिव्यास्त्रसंभवं देवास्तेनैतद्व्याकुलं जगत्

divyāstrasaṁbhavaṁ devāstenaitadvyākulaṁ jagat

हे देवगण, यह दिव्यास्त्रों से उत्पन्न हुआ है, और इसी से यह संसार व्याकुल हो उठा है।

श्लोक 14 (skanda.6.171.14)

तस्माद्गच्छामहे तत्र यावन्नो जायते क्षयः । सर्वेषामेव भूतानां दिव्यास्त्राणां प्रभावतः

tasmādgacchāmahe tatra yāvanno jāyate kṣayaḥ sarveṣāmeva bhūtānāṁ divyāstrāṇāṁ prabhāvataḥ

अतः हमें वहाँ चलना चाहिए, इससे पहले कि इन दिव्यास्त्रों के प्रभाव से समस्त प्राणियों का विनाश हो जाए।

श्लोक 15 (skanda.6.171.15)

ततोऽभिगम्य ते देशं यत्र तौ मुनिसत्तमौ । विचामित्रवसिष्ठौ तौ युध्यमानौ परस्परम्

tato'bhigamya te deśaṁ yatra tau munisattamau vicāmitravasiṣṭhau tau yudhyamānau parasparam

तत्पश्चात् वे उस स्थान पर पहुँचे जहाँ वे दोनों श्रेष्ठ मुनि, विश्वामित्र और वसिष्ठ, परस्पर युद्ध कर रहे थे।

श्लोक 16 (skanda.6.171.16)

ततः प्रोवाच तौ ब्रह्मा साम्ना परमवल्गुना । निवर्त्यतामिदं युद्धमेतद्दिव्यास्त्रसंभवम् । यावन्न प्रलयो भावि समस्ते धरणीतले

tataḥ provāca tau brahmā sāmnā paramavalgunā nivartyatāmidaṁ yuddhametaddivyāstrasaṁbhavam yāvanna pralayo bhāvi samaste dharaṇītale

तब ब्रह्मा जी ने उन दोनों से अत्यंत मधुर और सांत्वनापूर्ण वाणी में कहा — दिव्यास्त्रों से उत्पन्न इस युद्ध को रोक दो, इससे पहले कि सम्पूर्ण पृथ्वी पर प्रलय आ जाए।

श्लोक 17 (skanda.6.171.17)

वसिष्ठ उवाच । नाहमस्त्रं प्रयुंजामि विश्वामित्रवधेच्छया । आत्मरक्षाकृते देव अस्त्रमस्त्रेण शामयन्

vasiṣṭha uvāca nāhamastraṁ prayuṁjāmi viśvāmitravadhecchayā ātmarakṣākṛte deva astramastreṇa śāmayan

वसिष्ठ जी ने कहा — हे देव! मैं विश्वामित्र के वध की इच्छा से अस्त्र का प्रयोग नहीं कर रहा; मैं तो केवल आत्मरक्षा के लिए अस्त्र को अस्त्र से शांत कर रहा हूँ।

श्लोक 18 (skanda.6.171.18)

अयं मम विनाशाय केवलं चास्त्रमोक्षणम् । कुरुते निर्दयो ब्रह्मंस्तं निवारय सांप्रतम्

ayaṁ mama vināśāya kevalaṁ cāstramokṣaṇam kurute nirdayo brahmaṁstaṁ nivāraya sāṁpratam

हे ब्रह्मन्! यह निर्दय व्यक्ति केवल मेरे विनाश के लिए ही अस्त्रों का प्रयोग कर रहा है; अभी इसे रोकिए।

श्लोक 19 (skanda.6.171.19)

ब्रह्मोवाच । विश्वामित्र मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठं ब्राह्मणोत्तमम् । त्वं रक्ष मम वाक्येन तथा सर्वमिदं जगत्

brahmovāca viśvāmitra muniśreṣṭha vasiṣṭhaṁ brāhmaṇottamam tvaṁ rakṣa mama vākyena tathā sarvamidaṁ jagat

ब्रह्मा जी ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र! मेरे वचन से ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठ की और इस समस्त संसार की रक्षा करो।

श्लोक 20 (skanda.6.171.20)

अस्त्रमोक्षविरामं त्वं ब्रह्मर्षे कुरु सत्वरम्

astramokṣavirāmaṁ tvaṁ brahmarṣe kuru satvaram

हे ब्रह्मर्षे! तुरंत अस्त्रों का प्रयोग बंद करो।

श्लोक 21 (skanda.6.171.21)

विश्वामित्र उवाच । न मामेष द्विजं ब्रूते कथंचित्प्रपितामह । तस्मादेष प्रकोपो मे संजातोऽस्य वधोपरि

viśvāmitra uvāca na māmeṣa dvijaṁ brūte kathaṁcitprapitāmaha tasmādeṣa prakopo me saṁjāto'sya vadhopari

विश्वामित्र ने कहा — हे प्रपितामह! यह किसी भी प्रकार मुझे द्विज (ब्राह्मण) नहीं मानता; इसी कारण इसके वध के लिए मुझे यह क्रोध उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 22 (skanda.6.171.22)

तस्माद्वदतु देवेश मामेष ब्राह्मणं द्रुतम् । निवारयामि येनास्त्रं यदस्योपरि संधितम्

tasmādvadatu deveśa māmeṣa brāhmaṇaṁ drutam nivārayāmi yenāstraṁ yadasyopari saṁdhitam

अतः हे देवेश! यह शीघ्र मुझे ब्राह्मण कह दे, जिससे मैं इस पर संधान किए गए अस्त्र को हटा लूँ।

श्लोक 23 (skanda.6.171.23)

ब्रह्मोवाच । त्वं वसिष्ठाधुना ब्रूहि विश्वामित्रं ममाज्ञया । ब्राह्मणो जायते तेन तव जीवस्य रक्षणम्

brahmovāca tvaṁ vasiṣṭhādhunā brūhi viśvāmitraṁ mamājñayā brāhmaṇo jāyate tena tava jīvasya rakṣaṇam

ब्रह्मा जी ने कहा — हे वसिष्ठ! अब मेरी आज्ञा से विश्वामित्र को ब्राह्मण कह दो; इससे तुम्हारे प्राणों की रक्षा होगी।

श्लोक 24 (skanda.6.171.24)

वसिष्ठ उवाच । नाहं क्षत्रियसंजातं ब्राह्मणं वच्मि पद्मज । न वधे मम शक्तोऽयं कथंचित्क्षत्रियोद्भवः

vasiṣṭha uvāca nāhaṁ kṣatriyasaṁjātaṁ brāhmaṇaṁ vacmi padmaja na vadhe mama śakto'yaṁ kathaṁcitkṣatriyodbhavaḥ

वसिष्ठ जी ने कहा — हे पद्मज! मैं क्षत्रिय-कुल में उत्पन्न को ब्राह्मण नहीं कहूँगा। क्षत्रिय-वंश में जन्मा यह किसी भी प्रकार मेरा वध करने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 25 (skanda.6.171.25)

ब्राह्म्यं तेजो न क्षा त्त्रेण तेजसा संप्रणश्यति । एवं ज्ञात्वा चतुर्वक्त्र यद्युक्तं तत्समाचर

brāhmyaṁ tejo na kṣā ttreṇa tejasā saṁpraṇaśyati evaṁ jñātvā caturvaktra yadyuktaṁ tatsamācara

ब्राह्मतेज क्षत्रियतेज से कभी नष्ट नहीं होता। हे चतुर्मुख! यह जानकर जो उचित हो, वही कीजिए।

श्लोक 26 (skanda.6.171.26)

ब्रह्मोवाच । विश्वामित्र द्विजश्रेष्ठ त्यक्त्वा दिव्यास्त्रसंभवम् । कुरु युद्धं वसिष्ठेन नो चेच्छप्स्यामहं च ते

brahmovāca viśvāmitra dvijaśreṣṭha tyaktvā divyāstrasaṁbhavam kuru yuddhaṁ vasiṣṭhena no cecchapsyāmahaṁ ca te

ब्रह्मा जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ विश्वामित्र! दिव्यास्त्रों का त्याग करके वसिष्ठ से युद्ध करो, अन्यथा मैं तुम्हें शाप दूँगा।

श्लोक 27 (skanda.6.171.27)

विश्वामित्र उवाच । दिव्यास्त्राणि च संत्यज्य मया वध्यः सुदुर्मतिः । किंचिच्छिद्रं समासाद्य त्वं गच्छ निजसंश्रयम्

viśvāmitra uvāca divyāstrāṇi ca saṁtyajya mayā vadhyaḥ sudurmatiḥ kiṁcicchidraṁ samāsādya tvaṁ gaccha nijasaṁśrayam

विश्वामित्र ने कहा — दिव्यास्त्रों का त्याग करने पर भी, यह दुर्बुद्धि किसी न किसी छिद्र (अवसर) को पाकर मेरे द्वारा वध्य ही रहेगा। आप अपने धाम को जाइए।

श्लोक 28 (skanda.6.171.28)

सूत उवाच । बाढमित्येवमुक्ता च ब्रह्मलोकं गतो विधिः । विश्वामित्रवसिष्ठौ च सरस्वत्यास्तटे स्थितौ

sūta uvāca bāḍhamityevamuktā ca brahmalokaṁ gato vidhiḥ viśvāmitravasiṣṭhau ca sarasvatyāstaṭe sthitau

सूत जी ने कहा — ऐसा ही हो, यह कहकर विधाता ब्रह्मलोक को चले गए, और विश्वामित्र तथा वसिष्ठ सरस्वती के तट पर ही रह गए।

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