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नागर खण्ड · अध्याय 172

सरस्वती-शाप-वृत्तांत वर्णन

अध्याय 171अध्याय-सूचीअध्याय 173

श्लोक 1 (skanda.6.172.1)

सूत उवाच । ततःप्रभृति च्छिद्राणि विश्वामित्रो निरीक्षयन् । वसिष्ठस्य वधार्थाय संस्थितो द्विजसत्तमाः

sūta uvāca tataḥprabhṛti cchidrāṇi viśvāmitro nirīkṣayan vasiṣṭhasya vadhārthāya saṁsthito dvijasattamāḥ

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! तभी से विश्वामित्र छिद्र (अवसर) खोजते हुए वसिष्ठ के वध के लिए तत्पर रहने लगे।

श्लोक 2 (skanda.6.172.2)

आत्मशक्तिप्रभावेन मशकस्य यथा गजः । अन्यस्मिन्नहनि प्राप्ते विश्वामित्रेण सा नदी

ātmaśaktiprabhāvena maśakasya yathā gajaḥ anyasminnahani prāpte viśvāmitreṇa sā nadī

अपनी शक्ति के प्रभाव से वे उसे मच्छर के समान तुच्छ मानने लगे, जैसे हाथी मच्छर को कुचल डालता है। दूसरा दिन आने पर विश्वामित्र ने उस नदी सरस्वती को

श्लोक 3 (skanda.6.172.3)

समाहूता समायाता द्रुतं सा स्त्रीस्वरूपिणी । अब्रवीत्प्रांजलिर्भूत्वा आदेशो दीयतां मम । ब्रह्मर्षे येन कार्येण समाहूतास्मि सांप्रतम्

samāhūtā samāyātā drutaṁ sā strīsvarūpiṇī abravītprāṁjalirbhūtvā ādeśo dīyatāṁ mama brahmarṣe yena kāryeṇa samāhūtāsmi sāṁpratam

बुलाया। वह स्त्री-रूप धारण करके शीघ्र वहाँ आई और हाथ जोड़कर बोली — मुझे आज्ञा दीजिए। हे ब्रह्मर्षे! किस प्रयोजन से अभी मुझे बुलाया गया है?

श्लोक 4 (skanda.6.172.4)

विश्वामित्र उवाच । यदा निमज्जनं कुर्यात्तव तोये महानदि । परमं वेगमास्थाय तदाऽऽनय ममांतिकम्

viśvāmitra uvāca yadā nimajjanaṁ kuryāttava toye mahānadi paramaṁ vegamāsthāya tadā''naya mamāṁtikam

विश्वामित्र ने कहा — हे महानदी! जब वह (वसिष्ठ) तुम्हारे जल में स्नान करने उतरे, तब अत्यंत वेग धारण करके उसे मेरे समीप ले आना।

श्लोक 5 (skanda.6.172.5)

पूर्णश्रोत्रं जले नैव व्याकुलांगं व्यवस्थितम् । निहन्मि येन शीघ्रं च नान्यच्छिद्रं प्रलक्षये

pūrṇaśrotraṁ jale naiva vyākulāṁgaṁ vyavasthitam nihanmi yena śīghraṁ ca nānyacchidraṁ pralakṣaye

उसके कान जल से भर जाएँ, उसके अंग व्याकुल हो जाएँ, जिससे मैं उसे शीघ्र मार सकूँ; मुझे इसके अतिरिक्त और कोई अवसर नहीं दिखाई देता।

श्लोक 6 (skanda.6.172.6)

एवमुक्ता तदा तेन विश्वामित्रेण सा नदी । वित्रस्ता भयसंयुक्ता शापाद्वाक्यमुवाच सा

evamuktā tadā tena viśvāmitreṇa sā nadī vitrastā bhayasaṁyuktā śāpādvākyamuvāca sā

विश्वामित्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह नदी भयभीत होकर, शाप के भय से व्याकुल होकर यह वचन बोली —

श्लोक 7 (skanda.6.172.7)

नाहं द्रोहं करिष्यामि वसिष्ठस्य महात्मनः । ब्रह्मर्षे न च ते युक्तं कर्तुं वै ब्रह्मणो वधम्

nāhaṁ drohaṁ kariṣyāmi vasiṣṭhasya mahātmanaḥ brahmarṣe na ca te yuktaṁ kartuṁ vai brahmaṇo vadham

मैं महात्मा वसिष्ठ का द्रोह नहीं करूँगी। हे ब्रह्मर्षे! आपके लिए भी ब्राह्मण का वध करना उचित नहीं है।

श्लोक 8 (skanda.6.172.8)

यदि त्वं ब्रह्मणा प्रोक्तो ब्रह्मर्षिः स्वयमेव तु । कामान्नायं वसिष्ठस्तु तस्मात्कोपं परित्यज

yadi tvaṁ brahmaṇā prokto brahmarṣiḥ svayameva tu kāmānnāyaṁ vasiṣṭhastu tasmātkopaṁ parityaja

यद्यपि स्वयं ब्रह्मा ने आपको ब्रह्मर्षि घोषित कर दिया है, तथापि केवल आपकी इच्छा से यह वसिष्ठ अपने पद से च्युत नहीं हो जाता; अतः क्रोध का त्याग कीजिए।

श्लोक 9 (skanda.6.172.9)

मनसापि वधं यस्तु ब्राह्मणस्य विचिंतयेत् । तप्तकृच्छ्रेण मुच्येत मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत्

manasāpi vadhaṁ yastu brāhmaṇasya viciṁtayet taptakṛcchreṇa mucyeta manuḥ svāyaṁbhuvo'bravīt

जो कोई मन से भी ब्राह्मण के वध का चिंतन करता है, वह तप्तकृच्छ्र व्रत से ही उस पाप से मुक्त हो सकता है — ऐसा स्वायंभुव मनु ने कहा है।

श्लोक 10 (skanda.6.172.10)

वाचया प्रवदेद्यस्तु ब्राह्मणस्य वधं नरः । चांद्रायणेन शुद्धिः स्यात्तस्य देवोऽब्रवीदिदम्

vācayā pravadedyastu brāhmaṇasya vadhaṁ naraḥ cāṁdrāyaṇena śuddhiḥ syāttasya devo'bravīdidam

और जो मनुष्य वाणी से भी ब्राह्मण के वध की बात कहता है, उसकी शुद्धि चांद्रायण व्रत से होती है — ऐसा स्वयं देव ने कहा है।

श्लोक 11 (skanda.6.172.11)

तस्मान्नाहं करिष्यामि तव वाक्यं कथंचन । वसिष्ठार्थं तु यत्प्रोक्तं कुरु यत्तव रोचते

tasmānnāhaṁ kariṣyāmi tava vākyaṁ kathaṁcana vasiṣṭhārthaṁ tu yatproktaṁ kuru yattava rocate

अतः मैं आपकी यह आज्ञा किसी भी प्रकार नहीं मानूँगी। वसिष्ठ के विषय में जो कहा, उसमें आपको जो रुचे वह कीजिए।

श्लोक 12 (skanda.6.172.12)

तच्छ्रुत्वा कुपितस्तस्या विश्वामित्रो द्विजोत्तमाः । शशाप तां नदीं श्रेष्ठां यत्तद्वक्ष्यामि श्रूयताम्

tacchrutvā kupitastasyā viśvāmitro dvijottamāḥ śaśāpa tāṁ nadīṁ śreṣṭhāṁ yattadvakṣyāmi śrūyatām

हे द्विजश्रेष्ठो! यह सुनकर विश्वामित्र उस पर क्रोधित हो गए और उस श्रेष्ठ नदी को शाप दे दिया — जो मैं कहूँगा, वह सुनिए।

श्लोक 13 (skanda.6.172.13)

यस्मात्पापे वचो मह्यं न कृतं कुनदि त्वया । तस्माद्रक्तप्रवाहस्ते जलजोऽयं भविष्यति

yasmātpāpe vaco mahyaṁ na kṛtaṁ kunadi tvayā tasmādraktapravāhaste jalajo'yaṁ bhaviṣyati

हे पापिनी नदी! चूँकि तूने मेरे वचन का पालन नहीं किया, इसलिए तेरा यह जलमय प्रवाह अब रक्त का प्रवाह बन जाएगा।

श्लोक 14 (skanda.6.172.14)

एवमुक्त्वा करात्तोयं सप्तवाराभिमंत्रितम् । चिक्षेपाथ जले तस्याः क्रोधसंरक्तलोचनः

evamuktvā karāttoyaṁ saptavārābhimaṁtritam cikṣepātha jale tasyāḥ krodhasaṁraktalocanaḥ

ऐसा कहकर, क्रोध से रक्तवर्ण नेत्रों वाले विश्वामित्र ने सात बार अभिमंत्रित जल अपने हाथ से उस नदी के जल में डाल दिया।

श्लोक 15 (skanda.6.172.15)

ततश्च तत्क्षणाज्जातं तत्तोयं रुधिरं द्विजाः । सारस्वतं सुपुण्यं च यदासीच्छंखसंनिभम्

tataśca tatkṣaṇājjātaṁ tattoyaṁ rudhiraṁ dvijāḥ sārasvataṁ supuṇyaṁ ca yadāsīcchaṁkhasaṁnibham

हे द्विजो! तत्क्षण ही वह परम पवित्र सारस्वत जल, जो शंख के समान श्वेत था, रक्त बन गया।

श्लोक 16 (skanda.6.172.16)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्ता भूतप्रेतनिशाचराः । पीत्वापीत्वा प्रनृत्यंति गायंति च हसंति च

etasminnaṁtare prāptā bhūtapretaniśācarāḥ pītvāpītvā pranṛtyaṁti gāyaṁti ca hasaṁti ca

इसी बीच भूत, प्रेत तथा निशाचर वहाँ आ पहुँचे और बार-बार उस रक्त को पीकर नाचने, गाने तथा हँसने लगे।

श्लोक 17 (skanda.6.172.17)

ये तत्र तापसाः केचित्तटे तस्या व्यवस्थिताः । ते सर्वेऽपि च तां त्यक्ता दूरदेशं समाश्रिताः

ye tatra tāpasāḥ kecittaṭe tasyā vyavasthitāḥ te sarve'pi ca tāṁ tyaktā dūradeśaṁ samāśritāḥ

वहाँ जो कुछ तपस्वी उसके तट पर रहते थे, वे सब उसे छोड़कर दूर देश में जा बसे।

श्लोक 18 (skanda.6.172.18)

बहिर्वासाश्च ये तत्र नागराः समवस्थिताः । चण्डशर्म प्रभृतयस्तेऽपि याताः सुदूरतः

bahirvāsāśca ye tatra nāgarāḥ samavasthitāḥ caṇḍaśarma prabhṛtayaste'pi yātāḥ sudūrataḥ

और वहाँ जो नागरिक बाहर बसे हुए थे, चण्डशर्मा आदि, वे भी बहुत दूर चले गए।

श्लोक 19 (skanda.6.172.19)

वसिष्ठोऽपि मुनिश्रेष्ठो जगामार्बुदपर्वतम् । विश्वामित्रस्तु विप्रर्षिश्चमत्कारपुरं गतः

vasiṣṭho'pi muniśreṣṭho jagāmārbudaparvatam viśvāmitrastu viprarṣiścamatkārapuraṁ gataḥ

मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ अर्बुद पर्वत को चले गए, और विप्रर्षि विश्वामित्र चमत्कारपुर गए।

श्लोक 20 (skanda.6.172.20)

हाटकेश्वरजे क्षेत्रे यत्स्थितं विप्रसंकुलम् । तत्राश्रमपदं कृत्वा तपस्तेपे सुदारुणम्

hāṭakeśvaraje kṣetre yatsthitaṁ viprasaṁkulam tatrāśramapadaṁ kṛtvā tapastepe sudāruṇam

हाटकेश्वर नामक क्षेत्र में, जहाँ ब्राह्मणों का समूह निवास करता था, वहाँ आश्रम बनाकर उन्होंने अत्यंत घोर तपस्या की।

श्लोक 21 (skanda.6.172.21)

येन सृष्टिक्षमो जातः स्पर्धते ब्रह्मणा सह । एतद्वः सर्वमाख्यातं यथा सारस्वतं जलम्

yena sṛṣṭikṣamo jātaḥ spardhate brahmaṇā saha etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yathā sārasvataṁ jalam

उस तप के प्रभाव से वे सृष्टि करने में समर्थ हो गए, यहाँ तक कि ब्रह्मा से स्पर्धा करने योग्य बन गए। यह सब मैंने तुम्हें बता दिया कि किस प्रकार सारस्वत जल

श्लोक 22 (skanda.6.172.22)

रुधिरत्वमनुप्राप्तं विश्वामित्रस्य शापतः । चंडशर्मादयो विप्रा यथा देशांतरं गताः

rudhiratvamanuprāptaṁ viśvāmitrasya śāpataḥ caṁḍaśarmādayo viprā yathā deśāṁtaraṁ gatāḥ

विश्वामित्र के शाप से रक्तरूप को प्राप्त हुआ, तथा चण्डशर्मा आदि ब्राह्मण किस प्रकार अन्य देश को चले गए।

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