नागर खण्ड · अध्याय 173
सरस्वती-शापमोचन तथा साभ्रमती-उत्पत्ति वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.173.1)
ऋषय ऊचुः । अहो बत महाश्चर्यं विश्वामित्रस्य सन्मुनेः । मंत्रप्रभावतो येन तत्तोयं रुधिरीकृतम्
ṛṣaya ūcuḥ aho bata mahāścaryaṁ viśvāmitrasya sanmuneḥ maṁtraprabhāvato yena tattoyaṁ rudhirīkṛtam
ऋषियों ने कहा — अहो! सन्मुनि विश्वामित्र का यह कैसा महान आश्चर्य है, जिन्होंने मंत्र के प्रभाव से उस जल को रक्त बना दिया!
श्लोक 2 (skanda.6.173.2)
ततःप्रभृति संप्राप्तं कथं तोयं प्रकीर्तय । सरस्वत्या महाभाग सर्वं विस्तरतो वद
tataḥprabhṛti saṁprāptaṁ kathaṁ toyaṁ prakīrtaya sarasvatyā mahābhāga sarvaṁ vistarato vada
हे महाभाग! तत्पश्चात् सरस्वती को पुनः जल कैसे प्राप्त हुआ, यह हमें विस्तार से बताइए।
श्लोक 3 (skanda.6.173.3)
सूत उवाच । बहुकालं प्रवाहः स सरस्वत्या द्विजोत्तमाः । महान्रक्तमयो जातो भूतराक्षससेवितः
sūta uvāca bahukālaṁ pravāhaḥ sa sarasvatyā dvijottamāḥ mahānraktamayo jāto bhūtarākṣasasevitaḥ
सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो! सरस्वती का वह विशाल प्रवाह बहुत काल तक रक्तमय बना रहा, जिसमें भूत तथा राक्षस निवास करते थे।
श्लोक 4 (skanda.6.173.4)
कस्यचित्त्वथ कालस्य वसिष्ठो मुनिसत्तमः । अर्बुदस्थस्तया प्रोक्तो दीनया दुःखयुक्तया
kasyacittvatha kālasya vasiṣṭho munisattamaḥ arbudasthastayā prokto dīnayā duḥkhayuktayā
कुछ समय पश्चात् अर्बुद पर्वत पर निवास करते हुए मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ से, दीन और दुःखयुक्त हुई उस सरस्वती ने कहा —
श्लोक 5 (skanda.6.173.5)
तवार्थाय मुने शप्ता विश्वामित्रेण कोपतः । रुधिरौघवहाजाता तपस्विजनवर्जिता
tavārthāya mune śaptā viśvāmitreṇa kopataḥ rudhiraughavahājātā tapasvijanavarjitā
हे मुने! आपके ही कारण विश्वामित्र ने क्रोधवश मुझे शाप दिया; अब मैं रक्त की धारा बहाने वाली और तपस्वीजनों से त्यक्त हो गई हूँ।
श्लोक 6 (skanda.6.173.6)
तस्मात्कुरु प्रसादं मे यथा स्यात्सलिलं पुनः । प्रवाहे मम विप्रेन्द्र प्रयाति रुधिरं क्षयम्
tasmātkuru prasādaṁ me yathā syātsalilaṁ punaḥ pravāhe mama viprendra prayāti rudhiraṁ kṣayam
अतः हे विप्रेन्द्र! मुझ पर कृपा कीजिए, जिससे मेरी धारा पुनः जलमय हो जाए और मेरे प्रवाह में बहता रक्त नष्ट हो जाए।
श्लोक 7 (skanda.6.173.7)
त्रैलोक्यकरणे विप्र संक्षये वा स्थितौ हि वा । नाशक्तिर्विद्यते काचित्तव सर्वमुनीश्वर
trailokyakaraṇe vipra saṁkṣaye vā sthitau hi vā nāśaktirvidyate kācittava sarvamunīśvara
हे विप्र! त्रिलोक की रचना में, संहार में अथवा स्थिति में, हे सर्वमुनीश्वर! आपमें किसी प्रकार की अशक्ति नहीं है।
श्लोक 8 (skanda.6.173.8)
वसिष्ठ उवाच । तथा भद्रे करिष्यामि यथा स्यात्सलिलं पुनः । प्रवाहे तव निर्याति सर्वं रक्तं परिक्षयम्
vasiṣṭha uvāca tathā bhadre kariṣyāmi yathā syātsalilaṁ punaḥ pravāhe tava niryāti sarvaṁ raktaṁ parikṣayam
वसिष्ठ जी ने कहा — हे भद्रे! ऐसा ही करूँगा, जिससे तुम्हारी धारा पुनः जलमय हो जाए और तुम्हारे प्रवाह का सारा रक्त पूर्णतः नष्ट हो जाए।
श्लोक 9 (skanda.6.173.9)
एवमुक्त्वा स विप्रर्षिरवतीर्य धरातले । गतः प्लक्षतरुं यस्मा दवतीर्णा सरस्वती
evamuktvā sa viprarṣiravatīrya dharātale gataḥ plakṣataruṁ yasmā davatīrṇā sarasvatī
ऐसा कहकर वे विप्रर्षि पृथ्वी पर उतरकर उस प्लक्ष वृक्ष के पास गए, जहाँ से सरस्वती का अवतरण हुआ था।
श्लोक 10 (skanda.6.173.10)
समाधिं तत्र संधाय निविष्टो धरणीतले । संभ्रमं परमं गत्वा विश्वामित्रस्य चोपरि
samādhiṁ tatra saṁdhāya niviṣṭo dharaṇītale saṁbhramaṁ paramaṁ gatvā viśvāmitrasya copari
वहाँ समाधि लगाकर वे पृथ्वी पर बैठ गए, और विश्वामित्र के प्रति अत्यंत क्षुब्ध होकर,
श्लोक 11 (skanda.6.173.11)
वारुणेन तु मन्त्रेण वीक्ष यन्वसुधातलम् । ततो निर्भिद्य वसुधां भूरितोयं विनिर्गतम्
vāruṇena tu mantreṇa vīkṣa yanvasudhātalam tato nirbhidya vasudhāṁ bhūritoyaṁ vinirgatam
वारुण मंत्र से पृथ्वीतल को निहारते हुए उन्होंने पृथ्वी को भेद डाला, जिससे प्रचुर जल वहाँ से निकल पड़ा।
श्लोक 12 (skanda.6.173.12)
रन्ध्रद्वयेन विप्रेन्द्रा लोचनाभ्यां निरीक्षणात् । एकस्य सलिलं क्षिप्रं यत्र जाता सरस्वती
randhradvayena viprendrā locanābhyāṁ nirīkṣaṇāt ekasya salilaṁ kṣipraṁ yatra jātā sarasvatī
हे विप्रेन्द्रो! उनके दोनों नेत्रों की दृष्टि से दो छिद्र बन गए; उनमें से एक से शीघ्र ही जल निकला, जिससे सरस्वती (पुनः) उत्पन्न हुई।
श्लोक 13 (skanda.6.173.13)
प्लक्षमूले ततस्तस्य वेगेनापहृतं बलात् । तद्रक्तं तेन संपूर्णं ततस्तेन महानदी
plakṣamūle tatastasya vegenāpahṛtaṁ balāt tadraktaṁ tena saṁpūrṇaṁ tatastena mahānadī
तत्पश्चात् प्लक्ष वृक्ष की जड़ में, उसके वेग से वह रक्त बलपूर्वक बहा दिया गया; उस नवीन जल से भरकर वह महानदी पुनः शुद्ध हो गई।
श्लोक 14 (skanda.6.173.14)
द्वितीयस्तु प्रवाहो यः संभ्रमा त्तस्य निर्गतः । सा च साभ्रमती नाम नदी जाता धरातले
dvitīyastu pravāho yaḥ saṁbhramā ttasya nirgataḥ sā ca sābhramatī nāma nadī jātā dharātale
और दूसरा प्रवाह, जो उनके संभ्रम (उद्वेग) से निकला, पृथ्वी पर साभ्रमती नामक नदी बन गया।
श्लोक 15 (skanda.6.173.15)
एवं प्रकृतिमापन्ना भूय एव सरस्वती । यत्पृष्टोऽस्मि महाभागाः सरस्वत्याः कृते द्विजाः
evaṁ prakṛtimāpannā bhūya eva sarasvatī yatpṛṣṭo'smi mahābhāgāḥ sarasvatyāḥ kṛte dvijāḥ
इस प्रकार सरस्वती पुनः अपने स्वाभाविक शुद्ध रूप को प्राप्त हो गई। हे महाभाग द्विजो! सरस्वती के विषय में जो मुझसे पूछा गया था, यह वही उत्तर है।
श्लोक 16 (skanda.6.173.16)
एतत्सारस्वतं नाम व्याख्यानमतिबुद्धिदम् । यः पठेच्छ्रणुयाद्वापि मतिस्तस्य विवर्द्धते । सरस्वत्याः प्रसादेन सत्यमेतन्म योदितम्
etatsārasvataṁ nāma vyākhyānamatibuddhidam yaḥ paṭhecchraṇuyādvāpi matistasya vivarddhate sarasvatyāḥ prasādena satyametanma yoditam
यह 'सारस्वत' नामक आख्यान अत्यंत बुद्धि प्रदान करने वाला है। जो कोई इसे पढ़ता या सुनता है, उसकी बुद्धि बढ़ जाती है। सरस्वती की कृपा से ही मैंने यह सत्य कहा है।