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नागर खण्ड · अध्याय 174

पिप्पलाद-उत्पत्ति वर्णन

अध्याय 173अध्याय-सूचीअध्याय 175

श्लोक 1 (skanda.6.174.1)

सूत उवाच । तथान्यदपि वो वच्मि लिंगं यत्तत्र संस्थितम् । स्थापितं पिप्पलादेन कंसारेश्वरमित्यहो

sūta uvāca tathānyadapi vo vacmi liṅgaṁ yattatra saṁsthitam sthāpitaṁ pippalādena kaṁsāreśvaramityaho

सूत जी ने कहा — अब मैं तुम्हें एक और लिंग के विषय में बताता हूँ, जो वहाँ स्थापित है — आश्चर्य है कि वह पिप्पलाद द्वारा स्थापित 'कंसारेश्वर' नामक लिंग है।

श्लोक 2 (skanda.6.174.2)

यस्मिन्दृष्टे तु लोकानां पापं याति दिनोद्भवम् । नते षाण्मासिकं चैव पूजिते वर्षसंभवम्

yasmindṛṣṭe tu lokānāṁ pāpaṁ yāti dinodbhavam nate ṣāṇmāsikaṁ caiva pūjite varṣasaṁbhavam

जिसके दर्शन मात्र से लोगों का एक दिन में उत्पन्न पाप नष्ट हो जाता है; नमन करने से छह मास का, और पूजा करने से एक वर्ष में संचित पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.6.174.3)

ऋषय ऊचुः । पिप्पलादेन यल्लिंगं स्थापितं सूतनन्दन । कंसारेश्वरमित्युक्तं कस्मात्तच्च ब्रवीहि नः

ṛṣaya ūcuḥ pippalādena yalliṅgaṁ sthāpitaṁ sūtanandana kaṁsāreśvaramityuktaṁ kasmāttacca bravīhi naḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूतनन्दन! पिप्पलाद द्वारा जो लिंग स्थापित किया गया और 'कंसारेश्वर' कहा गया, वह किस कारण से ऐसा कहलाया, यह हमें बताइए।

श्लोक 4 (skanda.6.174.4)

क एष पिप्पलादस्तु कस्य पुत्रो वदस्व नः । किमर्थं स्थापितं लिंगं क्षेत्रे तत्र महात्मना

ka eṣa pippalādastu kasya putro vadasva naḥ kimarthaṁ sthāpitaṁ liṅgaṁ kṣetre tatra mahātmanā

यह पिप्पलाद कौन था, किसका पुत्र था — हमें बताइए; और उस महात्मा ने उस क्षेत्र में किस प्रयोजन से लिंग स्थापित किया?

श्लोक 5 (skanda.6.174.5)

सूत उवाच । प्रश्नभारो महानेष भवद्भिः समुदाहृतः । तथापि कथयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयंभुवम्

sūta uvāca praśnabhāro mahāneṣa bhavadbhiḥ samudāhṛtaḥ tathāpi kathayiṣyāmi namaskṛtvā svayaṁbhuvam

सूत जी ने कहा — आपने यह बहुत बड़ा प्रश्न पूछा है, फिर भी स्वयंभू ब्रह्मा को नमन करके मैं यह कथा सुनाता हूँ।

श्लोक 6 (skanda.6.174.6)

याज्ञवल्क्यस्य भगिनी कंसारीति च विश्रुता । कुमारब्रह्मचर्येण तपस्तेपे सुदारुणम्

yājñavalkyasya bhaginī kaṁsārīti ca viśrutā kumārabrahmacaryeṇa tapastepe sudāruṇam

याज्ञवल्क्य की एक बहन थी, जो कंसारी नाम से विख्यात थी; वह आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए अत्यंत घोर तपस्या करती थी।

श्लोक 7 (skanda.6.174.7)

याज्ञवल्क्याश्रमे पुण्ये बांधवेन समन्विता । कस्यचित्त्वथ कालस्य याज्ञवल्क्यस्य भो द्विजाः

yājñavalkyāśrame puṇye bāṁdhavena samanvitā kasyacittvatha kālasya yājñavalkyasya bho dvijāḥ

वह याज्ञवल्क्य के पुण्य आश्रम में अपने भाई के साथ रहती थी। हे द्विजो! कुछ समय पश्चात् याज्ञवल्क्य के —

श्लोक 8 (skanda.6.174.8)

चस्कन्द रेतः स्वप्नांते दृष्ट्वा कांचिद्वराप्सराम् । तारुण्यभावसंस्थस्य तपोयुक्तस्य सद्द्विजाः

caskanda retaḥ svapnāṁte dṛṣṭvā kāṁcidvarāpsarām tāruṇyabhāvasaṁsthasya tapoyuktasya saddvijāḥ

— जो अभी युवावस्था में स्थित और तपस्या में रत थे, स्वप्न के अंत में किसी सुंदर अप्सरा को देखकर, हे सत्पुरुषो! वीर्यस्खलन हो गया।

श्लोक 9 (skanda.6.174.9)

रेतसा तस्य महता परिधानं परिप्लुतम् । तच्च तेन परित्यक्तं प्रभाते समुपस्थिते

retasā tasya mahatā paridhānaṁ pariplutam tacca tena parityaktaṁ prabhāte samupasthite

उसके उस अत्यधिक वीर्य से उनका वस्त्र भीग गया; और प्रातःकाल होते ही उन्होंने उस वस्त्र को त्याग दिया।

श्लोक 10 (skanda.6.174.10)

कंसारिकाऽथ जग्राह स्नानार्थं वसनं च तत् । अमोघरेतसा क्लिन्नमजानन्ती द्विजोत्तमाः

kaṁsārikā'tha jagrāha snānārthaṁ vasanaṁ ca tat amogharetasā klinnamajānantī dvijottamāḥ

तब कंसारिका ने स्नान के लिए वही वस्त्र उठा लिया, यह न जानते हुए, हे द्विजश्रेष्ठो! कि वह अमोघ वीर्य से भीगा हुआ था।

श्लोक 11 (skanda.6.174.11)

कुर्वन्त्या यजनं तस्या जलं वीर्यसमन्वितम् । प्रविष्टं भगमध्ये तु ऋतुकाल उपस्थिते

kurvantyā yajanaṁ tasyā jalaṁ vīryasamanvitam praviṣṭaṁ bhagamadhye tu ṛtukāla upasthite

जब वह उस वस्त्र से अपना अनुष्ठान (शुद्धिकर्म) कर रही थी, तब वीर्य-मिश्रित वह जल, उसका ऋतुकाल आया हुआ होने के कारण, उसके गर्भाशय में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 12 (skanda.6.174.12)

ततो गर्भः समभवत्तस्यास्तूदरमध्यगः । वृद्धिं चाप्यगमन्नित्यं शुक्लपक्षे यथोडुराट्

tato garbhaḥ samabhavattasyāstūdaramadhyagaḥ vṛddhiṁ cāpyagamannityaṁ śuklapakṣe yathoḍurāṭ

तब उसके उदर में गर्भ स्थापित हो गया, और वह नित्य वैसे ही बढ़ने लगा जैसे शुक्लपक्ष में चंद्रमा बढ़ता है।

श्लोक 13 (skanda.6.174.13)

साऽपि तं गर्भमादाय स्वोदरस्थं तपस्विनी । दुःखेन महता युक्ता लज्जयाऽथ तदाऽऽवृता

sā'pi taṁ garbhamādāya svodarasthaṁ tapasvinī duḥkhena mahatā yuktā lajjayā'tha tadā'vṛtā

उस तपस्विनी ने अपने उदर में उस गर्भ को धारण करते हुए, महान दुःख से युक्त होकर, लज्जा से आवृत हो गई।

श्लोक 14 (skanda.6.174.14)

चिन्तयामास सुचिरं विस्मयेन समन्विता । गोपायन्ती तदाऽऽत्मानं दर्शनं याति नो नृणाम्

cintayāmāsa suciraṁ vismayena samanvitā gopāyantī tadā'tmānaṁ darśanaṁ yāti no nṛṇām

वह बहुत देर तक चिंता में डूबी रही, आश्चर्य से भरी हुई; और तब वह अपने आपको छिपाते हुए मनुष्यों के सामने आने से बचती रही।

श्लोक 15 (skanda.6.174.15)

व्रतचर्यामिषं कृत्वा सदा रहसि संस्थिता । संप्राप्ते दशमे मासि निशीथे समुपस्थिते । तस्याः कुमारको जातो वालार्कसदृशद्युतिः

vratacaryāmiṣaṁ kṛtvā sadā rahasi saṁsthitā saṁprāpte daśame māsi niśīthe samupasthite tasyāḥ kumārako jāto vālārkasadṛśadyutiḥ

व्रत-आचरण का बहाना बनाकर वह सदा एकांत में रहने लगी। जब दसवाँ मास पूर्ण हुआ और मध्यरात्रि का समय आया, तब उसके एक बालक उत्पन्न हुआ, जिसकी कांति उगते सूर्य के समान थी।

श्लोक 16 (skanda.6.174.16)

अथ सा तं समादाय सूक्ष्मवस्त्रेण वेष्टितम् । कृत्वा जगाम चारण्यं मनुष्यपरिवर्जितम् । अश्रुपूर्णेक्षणा दीना रुदन्ती गुप्तमेव च

atha sā taṁ samādāya sūkṣmavastreṇa veṣṭitam kṛtvā jagāma cāraṇyaṁ manuṣyaparivarjitam aśrupūrṇekṣaṇā dīnā rudantī guptameva ca

तब उसने उस बालक को लेकर उसे एक महीन वस्त्र में लपेट दिया, और मनुष्यरहित वन की ओर चल पड़ी; उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं, वह दीन थी और गुप्त रूप से रोती जा रही थी।

श्लोक 17 (skanda.6.174.17)

ततो गत्वा च साऽश्वत्थं विजने सुमहत्तरम् । तस्याधस्ताद्विमुच्याथ वाक्यमेतदुवाच ह

tato gatvā ca sā'śvatthaṁ vijane sumahattaram tasyādhastādvimucyātha vākyametaduvāca ha

फिर वहाँ जाकर, एकांत में स्थित एक विशाल अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के नीचे उस बालक को छोड़कर, उसने यह वचन कहा।

श्लोक 18 (skanda.6.174.18)

अश्वत्थ विष्णुरूपोऽसि त्वं देवेषु प्रतिष्ठितः । तस्माद्रक्षस्व मे पुत्रं सर्वतस्त्वं वनस्पते

aśvattha viṣṇurūpo'si tvaṁ deveṣu pratiṣṭhitaḥ tasmādrakṣasva me putraṁ sarvatastvaṁ vanaspate

हे अश्वत्थ! तुम विष्णु का रूप हो, देवताओं में प्रतिष्ठित हो; अतः हे वनस्पते! मेरे इस पुत्र की सब प्रकार से रक्षा करो।

श्लोक 19 (skanda.6.174.19)

एष ते शरणं प्राप्तो मम पुत्रस्तु बालकः । पापाया निर्दयायाश्च तस्माद्रक्षां समाचर

eṣa te śaraṇaṁ prāpto mama putrastu bālakaḥ pāpāyā nirdayāyāśca tasmādrakṣāṁ samācara

यह मेरा शिशु पुत्र तुम्हारी शरण में आया है; मुझ पापिनी और निर्दय माता से इसकी रक्षा करो।

श्लोक 20 (skanda.6.174.20)

एवमुक्त्वा रुदित्वा च सुचिरं सा तपस्विनी । जगाम स्वाश्रमं पश्चाद्वाष्पव्याकुललोचना

evamuktvā ruditvā ca suciraṁ sā tapasvinī jagāma svāśramaṁ paścādvāṣpavyākulalocanā

ऐसा कहकर और बहुत देर तक रोकर, वह तपस्विनी अपने नेत्रों को आँसुओं से व्याकुल किए हुए, अपने आश्रम को लौट गई।

श्लोक 21 (skanda.6.174.21)

यावद्रोदिति सा माता तस्याधस्ताद्वनस्पतेः । तावदाकाशजा वाणी संजाता मेघनिःस्वना

yāvadroditi sā mātā tasyādhastādvanaspateḥ tāvadākāśajā vāṇī saṁjātā meghaniḥsvanā

जब तक वह माता उस वृक्ष के नीचे रोती रही, तभी आकाश से मेघ के समान गंभीर वाणी उत्पन्न हुई।

श्लोक 22 (skanda.6.174.22)

मा त्वं शोकं कुरुष्वास्य बालकस्य कृते शुभे । एष शापादुतथ्यस्य ज्येष्ठभ्रातुर्बृहस्पतिः । अवतीर्णो धरापृष्ठे योग्यतां समवाप्स्यति

mā tvaṁ śokaṁ kuruṣvāsya bālakasya kṛte śubhe eṣa śāpādutathyasya jyeṣṭhabhrāturbṛhaspatiḥ avatīrṇo dharāpṛṣṭhe yogyatāṁ samavāpsyati

हे शुभे! तुम इस बालक के लिए शोक मत करो। यह वृहस्पति ही, अपने ज्येष्ठ भ्राता उतथ्य के शाप से पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ है, और यह योग्यता को प्राप्त करेगा।

श्लोक 23 (skanda.6.174.23)

एष चाथर्वणं वेदं शतकल्पं सुविस्तरम् । शतभेदं च नवधा पंचकल्पं करिष्यति

eṣa cātharvaṇaṁ vedaṁ śatakalpaṁ suvistaram śatabhedaṁ ca navadhā paṁcakalpaṁ kariṣyati

यह अथर्ववेद को, जो सौ कल्पों में विस्तृत और सौ भेदों वाला है, नौ प्रकार से पाँच कल्पों में संक्षिप्त करेगा।

श्लोक 24 (skanda.6.174.24)

पिप्पलस्य तरोरेष रसं संभक्षयिष्यति । पिप्पलाद इति ख्यातस्ततो लोके भविष्यति

pippalasya taroreṣa rasaṁ saṁbhakṣayiṣyati pippalāda iti khyātastato loke bhaviṣyati

यह पीपल वृक्ष का रस पीकर जीवित रहेगा, और इसी कारण संसार में 'पिप्पलाद' के नाम से विख्यात होगा।

श्लोक 25 (skanda.6.174.25)

या त्वं विस्मयमापन्ना पुरुषेण विना शिशुः । संजातोऽयं मम प्रांशुस्ततस्तत्कारणं शृणु

yā tvaṁ vismayamāpannā puruṣeṇa vinā śiśuḥ saṁjāto'yaṁ mama prāṁśustatastatkāraṇaṁ śṛṇu

और तुम जो यह आश्चर्य कर रही हो कि बिना पुरुष-संयोग के यह शिशु मुझसे उत्पन्न कैसे हुआ, उसका कारण सुनो।

श्लोक 26 (skanda.6.174.26)

स्नानवस्त्रं च ते भ्रातू रेतसा यत्परिप्लुतम् । तत्त्वया ऋतुकाले तु परिधानं कृतं शुभे

snānavastraṁ ca te bhrātū retasā yatpariplutam tattvayā ṛtukāle tu paridhānaṁ kṛtaṁ śubhe

हे शुभे! तुम्हारे भ्राता का जो स्नान-वस्त्र वीर्य से भीग गया था, उसी को तुमने अपने ऋतुकाल में धारण किया था।

श्लोक 27 (skanda.6.174.27)

स्नानकाले तु तोयानि रेतोदकमथास्पृशन् । अमोघरेतसा तेन पुत्रोऽयं तव संस्थितः

snānakāle tu toyāni retodakamathāspṛśan amogharetasā tena putro'yaṁ tava saṁsthitaḥ

स्नान के समय जल के साथ वह वीर्य-मिश्रित जल तुम्हें छू गया; उस अमोघ वीर्य के प्रभाव से ही यह पुत्र तुम्हें प्राप्त हुआ है।

श्लोक 28 (skanda.6.174.28)

एवं ज्ञात्वा महाभागे यद्युक्तं तत्समाचर

evaṁ jñātvā mahābhāge yadyuktaṁ tatsamācara

हे महाभागे! यह जानकर जो उचित हो, वही करो।

श्लोक 29 (skanda.6.174.29)

सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा देवलोकस्य वज्रपातोपमं वचः । हाहाकारपरा भूत्वा निपपात धरातले

sūta uvāca tacchrutvā devalokasya vajrapātopamaṁ vacaḥ hāhākāraparā bhūtvā nipapāta dharātale

सूत जी ने कहा — देवलोक से आई उस वज्रपात के समान वाणी को सुनकर, वह हाहाकार करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी।

श्लोक 30 (skanda.6.174.30)

छिन्नवृक्षलता यद्वत्पतिता सा तपस्विनी

chinnavṛkṣalatā yadvatpatitā sā tapasvinī

वह तपस्विनी उस प्रकार गिर पड़ी जैसे कटी हुई वृक्ष की लता गिर जाती है।

श्लोक 31 (skanda.6.174.31)

चिरायन्त्यां तु तस्यां स याज्ञवल्क्यो महामुनिः । शून्यं तमाश्रमं दृष्ट्वा पप्रच्छान्यान्मुनीश्वरान्

cirāyantyāṁ tu tasyāṁ sa yājñavalkyo mahāmuniḥ śūnyaṁ tamāśramaṁ dṛṣṭvā papracchānyānmunīśvarān

जब वह लंबे समय तक न लौटी, तब महामुनि याज्ञवल्क्य ने आश्रम को सूना देखकर अन्य मुनीश्वरों से पूछा।

श्लोक 32 (skanda.6.174.32)

क्व च मे भगिनी याता कंसारी सुतपस्विनी । तया विनाऽद्य मे सर्वं शून्यमाश्रममंडलम्

kva ca me bhaginī yātā kaṁsārī sutapasvinī tayā vinā'dya me sarvaṁ śūnyamāśramamaṁḍalam

मेरी बहन कंसारी, जो उत्तम तपस्विनी है, कहाँ गई? आज उसके बिना मेरा सारा आश्रम-मंडल सूना पड़ा है।

श्लोक 33 (skanda.6.174.33)

आचख्यौ तापसः कश्चिद्भगिनी ते यवीयसी । निश्चेष्टा पतिता भूमावश्वत्थस्य समीपतः

ācakhyau tāpasaḥ kaścidbhaginī te yavīyasī niśceṣṭā patitā bhūmāvaśvatthasya samīpataḥ

एक तपस्वी ने बताया — तुम्हारी छोटी बहन अश्वत्थ वृक्ष के समीप निश्चेष्ट होकर भूमि पर गिरी हुई है।

श्लोक 34 (skanda.6.174.34)

मया दृष्टा मुनिश्रेष्ठ तां त्वं भावय मा चिरम् । अथासौ त्वरया युक्तः संभ्रांतस्तु प्रधावितः

mayā dṛṣṭā muniśreṣṭha tāṁ tvaṁ bhāvaya mā ciram athāsau tvarayā yuktaḥ saṁbhrāṁtastu pradhāvitaḥ

हे मुनिश्रेष्ठ! मैंने उसे स्वयं देखा है; बिना विलंब किए उसकी सुध लो। तब वे शीघ्रता और घबराहट के साथ दौड़ पड़े।

श्लोक 35 (skanda.6.174.35)

यत्र सा कथिता तेन तापसेन तपस्विनी । वीक्षते यावत्तत्रस्था श्वसमाना व्यवस्थिता

yatra sā kathitā tena tāpasena tapasvinī vīkṣate yāvattatrasthā śvasamānā vyavasthitā

वहाँ पहुँचकर जैसे ही उसने देखा, वह तपस्विनी उसी स्थान पर पड़ी हुई थी, केवल श्वास ले रही थी।

श्लोक 36 (skanda.6.174.36)

अथ तोयेन शीतेन सेचयित्वा मुहुर्मुहुः । दत्त्वा भूयोऽपि वातं च यावच्चक्रे सचेतनाम् । तावत्कात्यायनी प्राप्ता मैत्रेयी च ससंभ्रमम्

atha toyena śītena secayitvā muhurmuhuḥ dattvā bhūyo'pi vātaṁ ca yāvaccakre sacetanām tāvatkātyāyanī prāptā maitreyī ca sasaṁbhramam

तब उन्होंने बार-बार शीतल जल से उसे सींचा और पंखा झलकर हवा दी; जब तक वे उसे सचेत करते, तब तक घबराई हुई कात्यायनी और मैत्रेयी भी वहाँ आ पहुँचीं।

श्लोक 37 (skanda.6.174.37)

किमिदं किमिदं जातं ननांदर्वद मा चिरम्

kimidaṁ kimidaṁ jātaṁ nanāṁdarvada mā ciram

यह क्या हुआ, यह क्या हुआ, हे ननद! बिना विलंब किए बताओ।

श्लोक 38 (skanda.6.174.38)

किं वा सर्पेण दष्टासि सन्निपातेन दूषिता । किं वा भूतगृहीताऽसि माहेंद्रेण ज्वरेण वा

kiṁ vā sarpeṇa daṣṭāsi sannipātena dūṣitā kiṁ vā bhūtagṛhītā'si māheṁdreṇa jvareṇa vā

क्या तुम्हें सर्प ने डस लिया, या सन्निपात रोग ने ग्रस लिया? या फिर तुम भूत-गृहीत हो गई हो, अथवा तीव्र ज्वर से पीड़ित हो?

श्लोक 39 (skanda.6.174.39)

अथ सा चेतनां लब्ध्वा याज्ञवल्क्यं पुरः स्थितम् । भार्यया सहितं दृष्ट्वा व्रीडयाऽसून्मुमोच ह

atha sā cetanāṁ labdhvā yājñavalkyaṁ puraḥ sthitam bhāryayā sahitaṁ dṛṣṭvā vrīḍayā'sūnmumoca ha

तब चेतना पाकर, अपने सामने अपनी पत्नी सहित खड़े याज्ञवल्क्य को देखकर, लज्जा के मारे उसने अपने प्राण त्याग दिए।

श्लोक 40 (skanda.6.174.40)

अथ तां च मृतां दृष्ट्वा रुदित्वा च चिरं द्विजाः । याज्ञवल्क्यः सभार्यस्तु दत्त्वा वह्निं च शोकधृक् । जगाम स्वाश्रमं पश्चाद्दत्त्वा च सलिलाञ्जलिम्

atha tāṁ ca mṛtāṁ dṛṣṭvā ruditvā ca ciraṁ dvijāḥ yājñavalkyaḥ sabhāryastu dattvā vahniṁ ca śokadhṛk jagāma svāśramaṁ paścāddattvā ca salilāñjalim

हे द्विजो! उसे मृत देखकर याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी सहित बहुत देर तक रोए; फिर शोक से भरे हृदय से उन्होंने उसका दाह-संस्कार किया, और जलांजलि देकर अपने आश्रम को लौट गए।

श्लोक 41 (skanda.6.174.41)

सोऽपि बालोऽथ ववृधे पिप्पलास्वादपुष्टिधृक् । अश्वत्थस्य तले तस्य वृद्धिं याति शनैःशनैः

so'pi bālo'tha vavṛdhe pippalāsvādapuṣṭidhṛk aśvatthasya tale tasya vṛddhiṁ yāti śanaiḥśanaiḥ

उधर वह बालक भी पीपल के रस के स्वाद से पुष्ट होकर बढ़ने लगा; उसी अश्वत्थ वृक्ष के नीचे वह धीरे-धीरे बड़ा होता गया।

श्लोक 42 (skanda.6.174.42)

कस्यचित्त्वथ कालस्य नारदो मुनिसत्तमः । तीर्थयात्राप्रसंगेन तेन मार्गेण चागतः

kasyacittvatha kālasya nārado munisattamaḥ tīrthayātrāprasaṁgena tena mārgeṇa cāgataḥ

कुछ समय पश्चात् मुनिश्रेष्ठ नारद, तीर्थयात्रा के प्रसंग में उसी मार्ग से वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 43 (skanda.6.174.43)

स दृष्ट्वा बालकं तत्र द्वादशार्कसमप्रभम् । एकाकिनं वने शून्ये पिप्पलास्वादतत्परम् । पप्रच्छ विस्मयाविष्ट एकाकी को भवानिह

sa dṛṣṭvā bālakaṁ tatra dvādaśārkasamaprabham ekākinaṁ vane śūnye pippalāsvādatatparam papraccha vismayāviṣṭa ekākī ko bhavāniha

वहाँ उस बालक को देखकर, जो बारह सूर्यों के समान तेजस्वी था, उस सूने वन में अकेला और पीपल के स्वाद में लीन था, वे आश्चर्यचकित होकर पूछ बैठे — यहाँ अकेले तुम कौन हो?

श्लोक 44 (skanda.6.174.44)

वने शून्ये महारौद्रे सिंहव्याघ्रसमाकुले । क्व ते माता पिता चैव किमर्थं चेह तिष्ठसि

vane śūnye mahāraudre siṁhavyāghrasamākule kva te mātā pitā caiva kimarthaṁ ceha tiṣṭhasi

इस भयंकर, सिंह-व्याघ्रों से भरे सूने वन में — तुम्हारे माता-पिता कहाँ हैं, और तुम यहाँ किस कारण ठहरे हुए हो?

श्लोक 45 (skanda.6.174.45)

निवससि कथं चैव सर्वं मे विस्तराद्वद

nivasasi kathaṁ caiva sarvaṁ me vistarādvada

और यहाँ किस प्रकार रहते हो — यह सब मुझे विस्तार से बताओ।

श्लोक 46 (skanda.6.174.46)

पिप्पलाद उवाच । नाहं जानामि पितरं मातरं न च बांधवम् । नापि त्वां कोऽत्र चायातो मम पार्श्वे तु सांप्रतम्

pippalāda uvāca nāhaṁ jānāmi pitaraṁ mātaraṁ na ca bāṁdhavam nāpi tvāṁ ko'tra cāyāto mama pārśve tu sāṁpratam

पिप्पलाद ने कहा — मैं न अपने पिता को जानता हूँ, न माता को, न किसी बांधव को; और अभी यह भी नहीं जानता कि तुम कौन हो जो मेरे पास आए हो।

श्लोक 47 (skanda.6.174.47)

सूत उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा चिरं ध्यात्वा मुनीश्वरः । ततस्तं प्रहसन्प्राह ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा

sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā ciraṁ dhyātvā munīśvaraḥ tatastaṁ prahasanprāha jñātvā divyena cakṣuṣā

सूत जी ने कहा — उसकी वह बात सुनकर, वह मुनीश्वर बहुत देर तक ध्यानमग्न रहे; फिर दिव्य दृष्टि से सब जानकर, हँसते हुए उससे बोले।

श्लोक 48 (skanda.6.174.48)

नारद उवाच । मया ज्ञातोऽसि वत्स त्वं याज्ञवल्क्यस्य रेतसा । दैवयोगात्समुत्पन्नो भगिन्या उदरे ह्यृतौ

nārada uvāca mayā jñāto'si vatsa tvaṁ yājñavalkyasya retasā daivayogātsamutpanno bhaginyā udare hyṛtau

नारद ने कहा — हे वत्स! मैं जानता हूँ कि तुम याज्ञवल्क्य के वीर्य से, दैवयोग से, उनकी बहन के गर्भ में, उसके ऋतुकाल में उत्पन्न हुए हो।

श्लोक 49 (skanda.6.174.49)

उतथ्यशापदोषेण देवाचार्यो बृहस्पतिः । देवकार्यस्य सिद्ध्यर्थं तस्मात्तच्छृणु कारणम्

utathyaśāpadoṣeṇa devācāryo bṛhaspatiḥ devakāryasya siddhyarthaṁ tasmāttacchṛṇu kāraṇam

देवगुरु बृहस्पति ही उतथ्य के शाप-दोष से, देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए इस रूप में आए हैं; अतः उसका कारण सुनो।

श्लोक 50 (skanda.6.174.50)

अथर्ववेदो यश्चैष शतशाखो विनिर्मितः । शतकल्पश्च गूढार्थो भूपानां कार्यसिद्धये

atharvavedo yaścaiṣa śataśākho vinirmitaḥ śatakalpaśca gūḍhārtho bhūpānāṁ kāryasiddhaye

यह जो अथर्ववेद सौ शाखाओं में और सौ कल्पों में रचित है, गूढ़ अर्थ वाला और राजाओं के कार्य की सिद्धि के लिए है —

श्लोक 51 (skanda.6.174.51)

नवशाखः पंचकल्पस्त्वया कार्यः सुखावहः

navaśākhaḥ paṁcakalpastvayā kāryaḥ sukhāvahaḥ

— इसे तुम्हें नौ शाखाओं और पाँच कल्पों में सुखदायक रूप में रचना है।

श्लोक 52 (skanda.6.174.52)

तव मात्रा महाभाग रेतसा च परिप्लुतम् । यद्वस्त्रं याज्ञवल्क्यस्य परिधानं कृतं च यत्

tava mātrā mahābhāga retasā ca pariplutam yadvastraṁ yājñavalkyasya paridhānaṁ kṛtaṁ ca yat

हे महाभाग! तुम्हारी माता ने याज्ञवल्क्य का वह वस्त्र, जो वीर्य से भीगा हुआ था, धारण किया था —

श्लोक 53 (skanda.6.174.53)

भगिन्या सुतपस्विन्या स्नानार्थं न च काम्यया । तद्रेतो जलमिश्रं तु भगमध्ये विनिर्गतम्

bhaginyā sutapasvinyā snānārthaṁ na ca kāmyayā tadreto jalamiśraṁ tu bhagamadhye vinirgatam

— उस उत्तम तपस्विनी बहन ने वह वस्त्र केवल स्नान के लिए धारण किया था, किसी कामना से नहीं; उस जल में मिला हुआ वीर्य उसके गर्भाशय में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 54 (skanda.6.174.54)

अमोघं तेन संभूतस्त्वमत्र जगतीतले । माता वै मृत्युमापन्ना ज्ञात्वैवं लज्जया तया

amoghaṁ tena saṁbhūtastvamatra jagatītale mātā vai mṛtyumāpannā jñātvaivaṁ lajjayā tayā

उस अमोघ वीर्य से तुम इस पृथ्वी पर उत्पन्न हुए; और यह सब जानकर तुम्हारी माता ने लज्जा के कारण अपने प्राण त्याग दिए।

श्लोक 55 (skanda.6.174.55)

चमत्कारपुरे तुभ्यं मातुलो जनकस्तथा । संतिष्ठते महाभाग तत्पार्श्वे त्वमितो वज

camatkārapure tubhyaṁ mātulo janakastathā saṁtiṣṭhate mahābhāga tatpārśve tvamito vaja

हे महाभाग! तुम्हारा मामा, जो तुम्हारा पिता भी है, चमत्कारपुर में रहता है; उसके पास तुम यहाँ से जाओ।

श्लोक 56 (skanda.6.174.56)

सांप्रतं व्रतकालस्ते वर्षं चैवाष्टमं स्थितम् । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य लज्जयाऽधोमुखः स्थितः

sāṁprataṁ vratakālaste varṣaṁ caivāṣṭamaṁ sthitam tacchrutvā vacanaṁ tasya lajjayā'dhomukhaḥ sthitaḥ

अभी तुम्हारी आठवें वर्ष की अवस्था है, जो व्रतबंध का समय है। उनका यह वचन सुनकर वह बालक लज्जा से सिर नीचा किए खड़ा रहा।

श्लोक 57 (skanda.6.174.57)

ततश्चिरेण दीनं स वाक्यमेतदुवाच तम् । किं मया पापमाख्याहि पूर्वदेहांतरे कृतम्

tataścireṇa dīnaṁ sa vākyametaduvāca tam kiṁ mayā pāpamākhyāhi pūrvadehāṁtare kṛtam

फिर बहुत देर बाद उसने दीन वाणी में उनसे कहा — कहिए, मैंने अपने पूर्व जन्म में कौन-सा पाप किया था —

श्लोक 58 (skanda.6.174.58)

येनेदं गर्हितं जन्म वियोगो मातृसंभवः । परित्यक्ष्यामि जीवं स्वं दुःखेनानेन सन्मुने

yenedaṁ garhitaṁ janma viyogo mātṛsaṁbhavaḥ parityakṣyāmi jīvaṁ svaṁ duḥkhenānena sanmune

— जिसके कारण मुझे यह निंदनीय जन्म और माता का वियोग मिला? हे सन्मुने! इस दुःख से मैं अपने प्राण त्याग दूँगा।

श्लोक 59 (skanda.6.174.59)

नारद उवाच । न त्वया दुष्कृतं किंचित्पूर्वदेहांतरे कृतम् । परं येन सुसंजातं तवेदं व्यसनं शृणु

nārada uvāca na tvayā duṣkṛtaṁ kiṁcitpūrvadehāṁtare kṛtam paraṁ yena susaṁjātaṁ tavedaṁ vyasanaṁ śṛṇu

नारद ने कहा — तुमने पूर्वजन्म में कोई पाप नहीं किया; परंतु जिस कारण तुम्हें यह संकट प्राप्त हुआ है, वह सुनो।

श्लोक 60 (skanda.6.174.60)

जन्मस्थेन भवाञ्जातः शनिना नाऽत्र संशयः । तेनावस्थामिमां प्राप्तो नान्यदस्ति हि कारणम्

janmasthena bhavāñjātaḥ śaninā nā'tra saṁśayaḥ tenāvasthāmimāṁ prāpto nānyadasti hi kāraṇam

तुम शनि के जन्म-स्थान (लग्न) में उत्पन्न हुए हो, इसमें कोई संदेह नहीं; उसी के कारण तुम्हें यह दशा प्राप्त हुई है, इसका अन्य कोई कारण नहीं है।

श्लोक 61 (skanda.6.174.61)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कोपसंरक्तलोचनः । ऊर्ध्वमालोकयामास समुद्दिश्य शनैश्चरम्

tacchrutvā vacanaṁ tasya kopasaṁraktalocanaḥ ūrdhvamālokayāmāsa samuddiśya śanaiścaram

यह सुनकर, क्रोध से लाल हुए नेत्रों वाले उस बालक ने ऊपर की ओर शनि की दिशा में देखा।

श्लोक 62 (skanda.6.174.62)

तस्य दृष्टिनिपातेन न्यपतत्स तु तत्क्षणात् । विमानात्स्वाद्रवेः पुत्रो ययातिरिव नाहुषः

tasya dṛṣṭinipātena nyapatatsa tu tatkṣaṇāt vimānātsvādraveḥ putro yayātiriva nāhuṣaḥ

उसकी दृष्टि पड़ते ही सूर्यपुत्र शनि उसी क्षण अपने विमान से नीचे गिर पड़े, जैसे नहुष का पुत्र ययाति (स्वर्ग से) गिरा था।

श्लोक 63 (skanda.6.174.63)

अधोवक्त्रो द्विजश्रेष्ठाः पितुरादेशमाश्रितः । बालभावेऽपि तेनैव दग्धौ पादौ तदा रवेः

adhovaktro dvijaśreṣṭhāḥ piturādeśamāśritaḥ bālabhāve'pi tenaiva dagdhau pādau tadā raveḥ

हे द्विजश्रेष्ठो! अपने पिता (सूर्य) के आदेश का पालन करते हुए वे मुख नीचे किए हुए गिरे; बाल्यावस्था में होते हुए भी उस बालक की दृष्टि से रवि-पुत्र शनि के दोनों पैर जल गए।

श्लोक 64 (skanda.6.174.64)

अथ तं नारदः प्राह पतमानमधोमुखम् । बाल्यभावादनेन त्वं पातितोऽसि शनैश्चर

atha taṁ nāradaḥ prāha patamānamadhomukham bālyabhāvādanena tvaṁ pātito'si śanaiścara

तब नारद ने मुख के बल गिरते हुए शनि से कहा — हे शनैश्चर! इसकी बाल-अवस्था के कारण ही तुम गिराए गए हो।

श्लोक 65 (skanda.6.174.65)

तस्मान्मा वीक्षयस्वैनं भविष्यति प्रकोपभाक् । मा पतस्व तथा भूमौ बलान्मद्वाक्यसंभवात्

tasmānmā vīkṣayasvainaṁ bhaviṣyati prakopabhāk mā patasva tathā bhūmau balānmadvākyasaṁbhavāt

अतः इसकी ओर मत देखो, अन्यथा तुम अत्यंत प्रकोप के भागी बनोगे। और मेरे वचन के प्रभाव से बलपूर्वक भूमि पर मत गिरो।

श्लोक 66 (skanda.6.174.66)

स्तंभयित्वा तथाप्येवं गगनस्थं शनैश्चरम् । ततः प्रोवाच तं बालं पिप्पलादं मुनीश्वरः

staṁbhayitvā tathāpyevaṁ gaganasthaṁ śanaiścaram tataḥ provāca taṁ bālaṁ pippalādaṁ munīśvaraḥ

इस प्रकार शनैश्चर को आकाश में ही स्तंभित करके, तब उस मुनीश्वर ने बालक पिप्पलाद से कहा।

श्लोक 67 (skanda.6.174.67)

मा कोपं कुरु बाल त्वमेष सूर्यसुतो ग्रहः । देवानामपि पीडां च कुरुतेऽष्टमराशिगः

mā kopaṁ kuru bāla tvameṣa sūryasuto grahaḥ devānāmapi pīḍāṁ ca kurute'ṣṭamarāśigaḥ

हे बालक! क्रोध मत करो; यह सूर्यपुत्र ग्रह है, जो आठवीं राशि में स्थित होकर देवताओं को भी पीड़ा देता है।

श्लोक 68 (skanda.6.174.68)

जन्मस्थस्तु विशेषेण द्वितीयस्तु तथापरः । यद्येष कुपितस्त्वां तु वीक्षयिष्यति कर्हिचित्

janmasthastu viśeṣeṇa dvitīyastu tathāparaḥ yadyeṣa kupitastvāṁ tu vīkṣayiṣyati karhicit

विशेष रूप से जन्म-राशि में, और उसी प्रकार दूसरी राशि में स्थित होकर भी वह पीड़ा देता है। यदि यह कभी कुपित होकर तुम्हें देख ले —

श्लोक 69 (skanda.6.174.69)

करिष्यति न संदेहो भस्मराशिं ममाग्रतः । अनेन वीक्षितौ पादौ जातमात्रेण सूर्यकौ

kariṣyati na saṁdeho bhasmarāśiṁ mamāgrataḥ anena vīkṣitau pādau jātamātreṇa sūryakau

— तो निःसंदेह वह मुझे भी अपने सामने भस्म का ढेर बना देगा। इस बालक की दृष्टि से जन्म लेते ही सूर्य-पुत्र के दोनों पैर देखे जा चुके हैं (जल चुके हैं)।

श्लोक 70 (skanda.6.174.70)

आयातस्य तु तुष्टस्य पुत्रदर्शनवाञ्छया । अन्तर्धानीकृते वस्त्रे ज्ञात्वा तं रौद्रचक्षुषम्

āyātasya tu tuṣṭasya putradarśanavāṁchayā antardhānīkṛte vastre jñātvā taṁ raudracakṣuṣam

जब वह प्रसन्न होकर पुत्र को देखने की इच्छा से आया, और उसका वस्त्र अंतर्धान (अदृश्य) कर दिया गया, तब उस भयंकर नेत्रों वाले बालक को जानकर —

श्लोक 71 (skanda.6.174.71)

ततो दग्धावुभौ चापि तिष्ठतश्चर्मवेष्टितौ । दृश्येतेऽद्यापि मूर्त्तौ तौ घटितायां धरातले

tato dagdhāvubhau cāpi tiṣṭhataścarmaveṣṭitau dṛśyete'dyāpi mūrttau tau ghaṭitāyāṁ dharātale

— तब उसके दोनों पैर जल गए और वे चमड़े से लिपटे रह गए; वे दोनों मूर्तियाँ आज भी उस बनी हुई पृथ्वी पर देखी जाती हैं।

श्लोक 72 (skanda.6.174.72)

सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य नारदस्य स बालकः । भयेन महता युक्तस्ततः पप्रच्छ तं मुनिम्

sūta uvāca tacchrutvā vacanaṁ tasya nāradasya sa bālakaḥ bhayena mahatā yuktastataḥ papraccha taṁ munim

सूत जी ने कहा — नारद का यह वचन सुनकर वह बालक अत्यंत भयभीत हो गया, और उस मुनि से पूछ बैठा।

श्लोक 73 (skanda.6.174.73)

कथं यास्यति मे तुष्टिं वदैष मम सन्मुने । अज्ञानात्पातितो व्योम्नः शक्तिं चास्याविजानता

kathaṁ yāsyati me tuṣṭiṁ vadaiṣa mama sanmune ajñānātpātito vyomnaḥ śaktiṁ cāsyāvijānatā

हे सन्मुने! कैसे यह मुझसे प्रसन्न होगा, यह मुझे बताइए। मैंने अज्ञानवश और इसकी शक्ति को न जानते हुए इसे आकाश से गिरा दिया।

श्लोक 74 (skanda.6.174.74)

नारद उवाच । ग्रहा गावो नरेंद्राश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः । पूजिताः प्रतिपूज्यंते निर्दहंत्यपमानिताः

nārada uvāca grahā gāvo narendrāśca brāhmaṇāśca viśeṣataḥ pūjitāḥ pratipūjyaṁte nirdahaṁtyapamānitāḥ

नारद ने कहा — ग्रह, गौएँ, राजा, और विशेषतः ब्राह्मण — यदि इनका सम्मान किया जाए तो ये सम्मान लौटाते हैं, परंतु अपमानित होने पर भस्म कर देते हैं।

श्लोक 75 (skanda.6.174.75)

तस्मात्कुरु स्तुतिं चास्य स्वशक्त्या भास्करेः प्रभो । प्रसादं गच्छते येन कोपं त्यजति पातजम्

tasmātkuru stutiṁ cāsya svaśaktyā bhāskareḥ prabho prasādaṁ gacchate yena kopaṁ tyajati pātajam

अतः हे प्रभो! अपनी शक्ति के अनुसार सूर्यपुत्र शनि की स्तुति करो, जिससे वह प्रसन्न होकर अपने पतन से उत्पन्न क्रोध को त्याग दे।

श्लोक 76 (skanda.6.174.76)

ततः कृतांजलिर्भूत्वा स्तुतिं चक्रे स बालकः । भयेन महता युक्तस्ततः संपृच्छ्य तं मुनिम्

tataḥ kṛtāṁjalirbhūtvā stutiṁ cakre sa bālakaḥ bhayena mahatā yuktastataḥ saṁpṛcchya taṁ munim

तब हाथ जोड़कर, अत्यंत भय से युक्त होकर, उस मुनि से पूछते हुए, उस बालक ने स्तुति की।

श्लोक 77 (skanda.6.174.77)

पिप्पलादो द्विजश्रेष्ठाः प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः । नमस्ते क्रोधसंस्थाय पिंगलाय नमोऽस्तु ते

pippalādo dvijaśreṣṭhāḥ praṇipatya muhurmuhuḥ namaste krodhasaṁsthāya piṁgalāya namo'stu te

हे द्विजश्रेष्ठो! पिप्पलाद ने बार-बार प्रणाम करते हुए कहा — क्रोध में स्थित तुम्हें नमस्कार, पिंगल-वर्ण तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 78 (skanda.6.174.78)

नमस्ते वसुरूपाय कृष्णाय च नमोऽस्तु ते । नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चांतकाय च

namaste vasurūpāya kṛṣṇāya ca namo'stu te namaste raudradehāya namaste cāṁtakāya ca

वसु-रूप तुम्हें नमस्कार, कृष्ण-वर्ण तुम्हें नमस्कार; रौद्र-देह तुम्हें नमस्कार, और अंतक-रूप तुम्हें भी नमस्कार।

श्लोक 79 (skanda.6.174.79)

नमस्ते यमसंज्ञाय नमस्ते सौरये विभो । नमस्ते मन्दसंज्ञाय शनैश्चर नमोऽस्तु ते

namaste yamasaṁjñāya namaste saurave vibho namaste mandasaṁjñāya śanaiścara namo'stu te

यम-संज्ञक तुम्हें नमस्कार, हे विभो! सूर्य-पुत्र तुम्हें नमस्कार; मंद-संज्ञक तुम्हें नमस्कार, हे शनैश्चर! तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 80 (skanda.6.174.80)

प्रसादं कुरु देवेश दीनस्य प्रणतस्य च

prasādaṁ kuru deveśa dīnasya praṇatasya ca

हे देवेश! इस दीन और शरणागत पर कृपा कीजिए।

श्लोक 81 (skanda.6.174.81)

शनैश्चर उवाच । परितुष्टोऽस्मि ते वत्स स्तोत्रेणानेन सांप्रतम् । वरं वरय भद्रं ते येन यच्छामि सांप्रतम्

śanaiścara uvāca parituṣṭo'smi te vatsa stotreṇānena sāṁpratam varaṁ varaya bhadraṁ te yena yacchāmi sāṁpratam

शनैश्चर ने कहा — हे वत्स! इस स्तोत्र से मैं तुम पर अभी अत्यंत प्रसन्न हुआ हूँ; तुम्हारा कल्याण हो, अब वर माँगो, जो मैं तुम्हें प्रदान करूँ।

श्लोक 82 (skanda.6.174.82)

पिप्पलाद उवाच । अद्यप्रभृति नो पीडा बालानां सूर्यनन्दन । त्वया कार्या महाभाग स्वकीया च कथंचन

pippalāda uvāca adyaprabhṛti no pīḍā bālānāṁ sūryanandana tvayā kāryā mahābhāga svakīyā ca kathaṁcana

पिप्पलाद ने कहा — हे सूर्यनन्दन! आज से बालकों को तुम्हारे द्वारा किसी भी प्रकार पीड़ा न दी जाए, यह मैं चाहता हूँ।

श्लोक 83 (skanda.6.174.83)

यावद्वर्षाष्टमं जातं मम वाक्येन सूर्यज । स्तोत्रेणानेन योऽत्र त्वां स्तूयात्प्रातः समुत्थितः

yāvadvarṣāṣṭamaṁ jātaṁ mama vākyena sūryaja stotreṇānena yo'tra tvāṁ stūyātprātaḥ samutthitaḥ

हे सूर्यपुत्र! जब तक बालक आठ वर्ष का न हो जाए, मेरे इस वचन से यह हो; और जो कोई प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्र से तुम्हारी स्तुति करे —

श्लोक 84 (skanda.6.174.84)

तस्य पीडा न कर्तव्या त्वया भास्करनन्दन । तव वारे च संजाते तैलाभ्यंगं करोति यः

tasya pīḍā na kartavyā tvayā bhāskaranandana tava vāre ca saṁjāte tailābhyaṁgaṁ karoti yaḥ

— उसे तुम, हे भास्करनन्दन! कभी पीड़ित मत करना। और जो तुम्हारे वार के दिन तेल-मालिश करता है —

श्लोक 85 (skanda.6.174.85)

दिनाष्टकं न कर्तव्या तस्य पीडा कथंचन । यस्त्वां लोहमयं कृत्वा तैलमध्ये ह्यधोमुखम्

dināṣṭakaṁ na kartavyā tasya pīḍā kathaṁcana yastvāṁ lohamayaṁ kṛtvā tailamadhye hyadhomukham

— उसे आठ दिनों तक कोई पीड़ा नहीं होनी चाहिए। और जो तुम्हारी लौह की मूर्ति बनाकर उसे तेल के भीतर मुख नीचे करके —

श्लोक 86 (skanda.6.174.86)

धारयेत्तेन तैलेन ततः स्नानं समाचरेत् । तस्य पीडा न कर्तव्या देयो लाभो महीभुजः

dhārayettena tailena tataḥ snānaṁ samācaret tasya pīḍā na kartavyā deyo lābho mahībhujaḥ

— धारण करता है, और फिर उस तेल से स्नान करता है — उसे भी पीड़ा नहीं देनी चाहिए, बल्कि राजा को लाभ प्रदान करना चाहिए।

श्लोक 87 (skanda.6.174.87)

अध्यर्द्धाष्टमिकायोगे तावके संस्थिते नरः । तववारे तु संप्राप्ते यस्तिलाँल्लोहसंयुतान्

adhyarddhāṣṭamikāyoge tāvake saṁsthite naraḥ tavavāre tu saṁprāpte yastilāṁllohasaṁyutān

जब तुम्हारी साढ़े सात वर्ष की दशा (साढ़ेसाती) व्यक्ति पर स्थित हो, और तुम्हारे वार के दिन जो व्यक्ति लोहे के साथ तिल —

श्लोक 88 (skanda.6.174.88)

स्वशक्त्या राति नो तस्य पीडा कार्या त्वया विभो । कृष्णां गां यस्तु विप्राय तवोद्देशेन यच्छति

svaśaktyā rāti no tasya pīḍā kāryā tvayā vibho kṛṣṇāṁ gāṁ yastu viprāya tavoddeśena yacchati

— अपनी शक्ति के अनुसार दान करता है, हे विभो! उसे तुम पीड़ित मत करना। और जो तुम्हारे निमित्त किसी ब्राह्मण को काली गाय दान करता है —

श्लोक 89 (skanda.6.174.89)

अध्यर्द्धाष्टमजा पीडा नाऽस्य कार्या त्वया विभो । शमी समिद्भिर्यो होमं तवोद्देशेन यच्छति

adhyarddhāṣṭamajā pīḍā nā'sya kāryā tvayā vibho śamī samidbhiryo homaṁ tavoddeśena yacchati

— हे विभो! उसे साढ़ेसाती की पीड़ा मत देना। और जो शमी की समिधाओं से तुम्हारे निमित्त हवन करता है —

श्लोक 90 (skanda.6.174.90)

तथा कृष्णतिलैश्चैव कृष्णपुष्पानुलेपनैः । पूजां करोति यस्तुभ्यं धूपं वै गुग्गुलं दहेत् । कृष्णवस्त्रेण संवेष्ट्य त्याज्या तस्य व्यथा त्वया

tathā kṛṣṇatilaiścaiva kṛṣṇapuṣpānulepanaiḥ pūjāṁ karoti yastubhyaṁ dhūpaṁ vai guggulaṁ dahet kṛṣṇavastreṇa saṁveṣṭya tyājyā tasya vyathā tvayā

— और काले तिलों तथा काले पुष्पों और अनुलेपन से जो तुम्हारी पूजा करता है, गुग्गुल का धूप जलाता है, और तुम्हें काले वस्त्र में लपेटता है — उसकी व्यथा तुम्हें त्याग देनी चाहिए।

श्लोक 91 (skanda.6.174.91)

सूत उवाच । एवमुक्तः शनिस्तेन बाढमित्येव जल्प्य च । नारदं समनुज्ञाप्य जगाम निजसंश्रयम्

sūta uvāca evamuktaḥ śanistena bāḍhamityeva jalpya ca nāradaṁ samanujñāpya jagāma nijasaṁśrayam

सूत जी ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर शनि ने 'ऐसा ही हो' कहकर, नारद से अनुमति लेकर अपने धाम को प्रस्थान किया।

श्लोक 92 (skanda.6.174.92)

नारदोऽपि तमादाय वालकं कृपयान्वितः । चमत्कारपुरं गत्वा याज्ञवल्क्याय चार्पयत्

nārado'pi tamādāya vālakaṁ kṛpayānvitaḥ camatkārapuraṁ gatvā yājñavalkyāya cārpayat

नारद जी भी उस बालक को दया से लेकर चमत्कारपुर गए, और उसे याज्ञवल्क्य को सौंप दिया।

श्लोक 93 (skanda.6.174.93)

कथयामास वृत्तांतं तस्य संभूतिसंभवम् । यद्दृष्टं ज्ञानदीपेन तस्मै सर्वं न्यवेदयत्

kathayāmāsa vṛttāṁtaṁ tasya saṁbhūtisaṁbhavam yaddṛṣṭaṁ jñānadīpena tasmai sarvaṁ nyavedayat

उन्होंने उसके जन्म का सारा वृत्तांत उसे बताया; ज्ञान-दीप से जो कुछ देखा था, वह सब उससे निवेदन किया।

श्लोक 94 (skanda.6.174.94)

एष ते वीर्यसंभूतो बालको भगिनीसुतः । मयाऽश्वत्थतले लब्धः काननेऽश्वत्थसंनिधौ

eṣa te vīryasaṁbhūto bālako bhaginīsutaḥ mayā'śvatthatale labdhaḥ kānane'śvatthasaṁnidhau

यह बालक, जो तुम्हारी बहन का पुत्र है, तुम्हारे ही वीर्य से उत्पन्न हुआ है; मैंने इसे वन में अश्वत्थ वृक्ष के तल पर, उसके निकट पाया है।

श्लोक 95 (skanda.6.174.95)

व्रतबंधं कुरुष्वास्य सांप्रतं चाष्टवार्षिकः । नात्र दोषोऽस्ति विप्रेंद्र न भगिन्यास्तथा तव । तस्माद्गृहाण पुत्रं स्वं भागिनेयं विशेषतः

vratabaṁdhaṁ kuruṣvāsya sāṁprataṁ cāṣṭavārṣikaḥ nātra doṣo'sti viprendra na bhaginyāstathā tava tasmādgṛhāṇa putraṁ svaṁ bhāgineyaṁ viśeṣataḥ

यह अभी आठ वर्ष का है, अतः इसका व्रतबंध (उपनयन) करो। हे विप्रेंद्र! इसमें न तुम्हारा दोष है, न तुम्हारी बहन का; इसलिए अपने पुत्र, विशेष रूप से अपने भांजे को, स्वीकार करो।

श्लोक 96 (skanda.6.174.96)

सूत उवाच । एवमुक्त्वा स देवर्षिस्ततश्चादर्शनं गतः । याज्ञवल्क्योऽपि तच्छ्रुत्वा विषादं परमं गतः

sūta uvāca evamuktvā sa devarṣistataścādarśanaṁ gataḥ yājñavalkyo'pi tacchrutvā viṣādaṁ paramaṁ gataḥ

सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर वह देवर्षि अंतर्धान हो गए; और याज्ञवल्क्य भी यह सुनकर अत्यंत विषाद को प्राप्त हुए।

श्लोक 97 (skanda.6.174.97)

पापं तच्चिंतयन्नेव न शांतिमधिगच्छति । आत्मानं गर्हयन्नित्यं दिवानक्तं च शोचति

pāpaṁ taccintayanneva na śāntimadhigacchati ātmānaṁ garhayannityaṁ divānaktaṁ ca śocati

वह उस पाप को बार-बार सोचते हुए शांति नहीं पा सके; वे सदा स्वयं को धिक्कारते हुए दिन-रात शोक करते रहे।

श्लोक 98 (skanda.6.174.98)

तं च पुत्रं परिज्ञाय तैस्तैश्चिह्नैर्निजैः स्थितैः । ततस्तु पोषयित्वा तं व्रतेन समयोजयत्

taṁ ca putraṁ parijñāya taistaiścihnairnijaiḥ sthitaiḥ tatastu poṣayitvā taṁ vratena samayojayat

तब उन विभिन्न पारिवारिक चिह्नों से उस बालक को अपना पुत्र पहचानकर, उन्होंने उसका पालन-पोषण किया और उसे व्रतबंध से संयुक्त किया।

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