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नागर खण्ड · अध्याय 175

याज्ञवल्क्येश्वर-उत्पत्ति-माहात्म्य वर्णन

अध्याय 174अध्याय-सूचीअध्याय 176

श्लोक 1 (skanda.6.175.1)

सूत उवाच । एवं संशोचते यावदात्मानं परिगर्हयन् । ततस्तु ब्रह्मणा प्रोक्तः स्वयमभ्येत्य भो द्विजाः

sūta uvāca evaṁ saṁśocate yāvadātmānaṁ parigarhayan tatastu brahmaṇā proktaḥ svayamabhyetya bho dvijāḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजो! जब तक वे इस प्रकार स्वयं को धिक्कारते हुए शोक करते रहे, तभी ब्रह्मा जी स्वयं वहाँ पधार कर उनसे बोले।

श्लोक 2 (skanda.6.175.2)

त्वया शंका न कर्तव्या सुतस्यास्य कृते द्विज । अज्ञानादेव ते जातो दैवयोगेन बालकः

tvayā śaṁkā na kartavyā sutasyāsya kṛte dvija ajñānādeva te jāto daivayogena bālakaḥ

हे द्विज! इस पुत्र के विषय में तुम्हें कोई शंका नहीं करनी चाहिए। यह बालक अज्ञानवश ही, दैवयोग से तुम्हें प्राप्त हुआ है।

श्लोक 3 (skanda.6.175.3)

याज्ञवल्क्य उवाच । तथापि देव मे शुद्धिर्हृदयस्य न जायते । तस्माद्वद सुरश्रेष्ठ प्रायश्चित्तं विशुद्धये

yājñavalkya uvāca tathāpi deva me śuddhirhṛdayasya na jāyate tasmādvada suraśreṣṭha prāyaścittaṁ viśuddhaye

याज्ञवल्क्य ने कहा — हे देव! फिर भी मेरे हृदय की शुद्धि नहीं हो पा रही है; अतः हे सुरश्रेष्ठ! मुझे विशुद्धि हेतु प्रायश्चित्त बताइए।

श्लोक 4 (skanda.6.175.4)

ब्रह्मोवाच । यदि ते चित्तशुद्धिस्तु न कथंचित्प्रवर्तते । तत्स्थापय महाभाग लिंगं देवस्य शूलिनः

brahmovāca yadi te cittaśuddhistu na kathaṁcitpravartate tatsthāpaya mahābhāga liṅgaṁ devasya śūlinaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — यदि किसी भी प्रकार तुम्हारे चित्त की शुद्धि नहीं हो रही, तो हे महाभाग! त्रिशूलधारी शिव का लिंग स्थापित करो।

श्लोक 5 (skanda.6.175.5)

अज्ञानाज्ज्ञानतोवापि यत्पापं कुरुते नरः । ब्रह्महत्यादिकं चापि स्त्रीवधाद्वापि यद्भवेत्

ajñānājjñānatovāpi yatpāpaṁ kurute naraḥ brahmahatyādikaṁ cāpi strīvadhādvāpi yadbhavet

मनुष्य जो भी पाप अज्ञान से या जानबूझकर करता है, चाहे वह ब्रह्महत्या जैसा हो या स्त्री-वध से उत्पन्न हो —

श्लोक 6 (skanda.6.175.6)

पंचेष्टिकामयं वापि यः कुर्याद्धरमन्दिरम् । तस्य तन्नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा

paṁceṣṭikāmayaṁ vāpi yaḥ kuryāddharamandiram tasya tannāśamāyāti tamaḥ sūryodaye yathā

— यदि वह पाँच ईंटों का भी हरमंदिर (शिव मंदिर) बनवाए, तो उसका वह पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे सूर्योदय होते ही अंधकार नष्ट हो जाता है।

श्लोक 7 (skanda.6.175.7)

विशेषेण महाभाग हाटकेश्वरसंभवे । क्षेत्रे तत्र सुमेध्ये तु सर्वपातकनाशने

viśeṣeṇa mahābhāga hāṭakeśvarasaṁbhave kṣetre tatra sumedhye tu sarvapātakanāśane

विशेष रूप से, हे महाभाग! हाटकेश्वर नामक उस अत्यंत पवित्र और सर्वपातक-नाशक क्षेत्र में —

श्लोक 8 (skanda.6.175.8)

कलिकाले च संप्राप्ते यत्र पापं न विद्यते । अहमप्यत्र वांछामि यज्ञं कर्तुं द्विजोत्तम

kalikāle ca saṁprāpte yatra pāpaṁ na vidyate ahamapyatra vāṁchāmi yajñaṁ kartuṁ dvijottama

— जहाँ कलिकाल में भी पाप का अस्तित्व नहीं रहता। हे द्विजोत्तम! मैं भी वहाँ यज्ञ करने की इच्छा रखता हूँ।

श्लोक 9 (skanda.6.175.9)

आनयिष्यामि तत्तीर्थं पुष्करं चात्मनः प्रियम् । कलिकालभयाच्चैतद्यावन्नो व्यर्थतां व्रजेत्

ānayiṣyāmi tattīrthaṁ puṣkaraṁ cātmanaḥ priyam kalikālabhayāccaitadyāvanno vyarthatāṁ vrajet

मैं अपने प्रिय पुष्कर तीर्थ को भी वहाँ ले आऊँगा, ताकि कलिकाल के भय से वह कहीं व्यर्थ न हो जाए।

श्लोक 10 (skanda.6.175.10)

कलिकाले तु संप्राप्ते तीर्थानि सकलानि च । यास्यंति व्यर्थतां विप्र मुक्त्वेदं क्षेत्रमुत्तमम्

kalikāle tu saṁprāpte tīrthāni sakalāni ca yāsyaṁti vyarthatāṁ vipra muktvedaṁ kṣetramuttamam

जब कलिकाल आ जाएगा, हे विप्र! तब इस उत्तम क्षेत्र को छोड़कर समस्त तीर्थ व्यर्थ हो जाएँगे।

श्लोक 11 (skanda.6.175.11)

सूत उवाच । एवमुक्त्वा चतुर्वक्त्रस्ततश्चादर्शनं गतः । याज्ञवल्क्योऽपि तच्छ्रुत्वा पितामहवचोऽखिलम्

sūta uvāca evamuktvā caturvaktrastataścādarśanaṁ gataḥ yājñavalkyo'pi tacchrutvā pitāmahavaco'khilam

सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर चतुर्मुख ब्रह्मा अंतर्धान हो गए; और याज्ञवल्क्य भी पितामह के इस समस्त वचन को सुनकर —

श्लोक 12 (skanda.6.175.12)

लिंगं संस्थापयामास ज्ञात्वा क्षेत्रमनुत्तमम् । अब्रवीच्च ततो वाक्यं मेघगंभीरया गिरा

liṅgaṁ saṁsthāpayāmāsa jñātvā kṣetramanuttamam abravīcca tato vākyaṁ meghagaṁbhīrayā girā

— उस अनुपम क्षेत्र को पहचानकर वहाँ लिंग की स्थापना की, और फिर मेघ के समान गंभीर वाणी में यह वचन बोला।

श्लोक 13 (skanda.6.175.13)

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां यो लिंगं मामकं त्विदम् । स्नापयिष्यति सद्भक्त्या तस्य पापं प्रयास्यति

aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ yo liṅgaṁ māmakaṁ tvidam snāpayiṣyati sadbhaktyā tasya pāpaṁ prayāsyati

जो कोई अष्टमी और चतुर्दशी के दिन सच्ची भक्ति से मेरे इस लिंग का अभिषेक करेगा, उसका पाप नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 14 (skanda.6.175.14)

परदारकृतं यच्च मात्रापि च समं कृतम् । क्षालयिष्यति तत्पापं स्नापितं पूजितं परैः

paradārakṛtaṁ yacca mātrāpi ca samaṁ kṛtam kṣālayiṣyati tatpāpaṁ snāpitaṁ pūjitaṁ paraiḥ

यहाँ तक कि पराई स्त्री के साथ किया गया पाप, या अपनी माता के समान वर्जित कर्म भी, इस लिंग को अभिषेक और पूजा करने से धुल जाएगा।

श्लोक 15 (skanda.6.175.15)

अस्मिन्नहनि संप्राप्ते तस्य पक्षसमुद्भवम् । प्रयास्यति कृतं पापं यदज्ञानाद्विनिर्मितम्

asminnahani saṁprāpte tasya pakṣasamudbhavam prayāsyati kṛtaṁ pāpaṁ yadajñānādvinirmitam

इस दिन पर उस पक्ष में उत्पन्न, अज्ञानवश किया गया पाप भी नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 16 (skanda.6.175.16)

ततःप्रभृति विख्यातो याज्ञवल्क्येश्वरः शुभः । तस्मिन्क्षेत्रे द्विजश्रेष्ठा हाटकेश्वरसंज्ञके

tataḥprabhṛti vikhyāto yājñavalkyeśvaraḥ śubhaḥ tasminkṣetre dvijaśreṣṭhā hāṭakeśvarasaṁjñake

हे द्विजश्रेष्ठो! तभी से हाटकेश्वर नामक उस क्षेत्र में वह शुभ लिंग 'याज्ञवल्क्येश्वर' के नाम से विख्यात हुआ।

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