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नागर खण्ड · अध्याय 176

कंसारीश्वर-उत्पत्ति-माहात्म्य वर्णन

अध्याय 175अध्याय-सूचीअध्याय 177

श्लोक 1 (skanda.6.176.1)

सूत उवाच । दृष्ट्वा प्रतिष्ठितं लिंगं याज्ञवल्क्येन धीमता । स्वमातुः शुद्धिहेतोः स तन्नाम्ना लिंगमुत्तमम्

sūta uvāca dṛṣṭvā pratiṣṭhitaṁ liṅgaṁ yājñavalkyena dhīmatā svamātuḥ śuddhihetoḥ sa tannāmnā liṅgamuttamam

सूत जी ने कहा — बुद्धिमान याज्ञवल्क्य द्वारा स्थापित उस लिंग को देखकर, उन्होंने अपनी माता की शुद्धि के लिए उसी के नाम से एक और उत्तम लिंग —

श्लोक 2 (skanda.6.176.2)

स्थापयामास विप्रेंद्राः श्रद्धया परया युतः । ततश्चानीय विप्रेंद्रं मध्यगं नागरोद्भवम्

sthāpayāmāsa viprendrāḥ śraddhayā parayā yutaḥ tataścānīya viprendraṁ madhyagaṁ nāgarodbhavam

— हे विप्रेंद्रो! अत्यंत श्रद्धा के साथ स्थापित किया। फिर उन्होंने नागर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ, मध्यवर्ती एक विप्रेंद्र को बुलवाया —

श्लोक 3 (skanda.6.176.3)

गर्तातीर्थसमुद्भूतमाहिताग्निं प्रयाजिनम् । यथैतन्नगरस्थानं तथा त्वमपि दीक्षितः

gartātīrthasamudbhūtamāhitāgniṁ prayājinam yathaitannagarasthānaṁ tathā tvamapi dīkṣitaḥ

— जो गर्ता-तीर्थ से उत्पन्न, अग्निहोत्री और यज्ञकर्ता था; और कहा — जैसे यह नगर-स्थान है, वैसे ही तुम भी दीक्षित हो।

श्लोक 4 (skanda.6.176.4)

अष्टषष्टिषु गोत्राणां नायकत्वे व्यवस्थितः । तव वाक्येन सर्वाणि गोत्राणि द्विजसत्तम

aṣṭaṣaṣṭiṣu gotrāṇāṁ nāyakatve vyavasthitaḥ tava vākyena sarvāṇi gotrāṇi dvijasattama

हे द्विजसत्तम! तुम अड़सठ गोत्रों के नायकत्व में स्थापित हो; तुम्हारे वचन से ही समस्त गोत्र —

श्लोक 5 (skanda.6.176.5)

वर्तयिष्यंति कृत्येषु यावच्चन्द्रार्कतारकाः । गोवर्धन त्वया चिंता कार्या चास्य समुद्भवा

vartayiṣyaṁti kṛtyeṣu yāvaccandrārkatārakāḥ govardhana tvayā ciṁtā kāryā cāsya samudbhavā

— जब तक सूर्य, चंद्र और तारे रहेंगे, सभी कृत्यों में आचरण करेंगे। हे गोवर्धन! तुम्हें ही इस लिंग के उद्भव की चिंता करनी है —

श्लोक 6 (skanda.6.176.6)

लिंगस्य पूजनार्थाय प्रेरणीयाश्च नागराः । पूजया तस्य लिंगस्य वृद्धिं यास्यति तेऽन्वयः

liṅgasya pūjanārthāya preraṇīyāśca nāgarāḥ pūjayā tasya liṅgasya vṛddhiṁ yāsyati te'nvayaḥ

— और लिंग की पूजा के लिए नागर ब्राह्मणों को प्रेरित करना है; उस लिंग की पूजा से तुम्हारा वंश समृद्धि को प्राप्त होगा।

श्लोक 7 (skanda.6.176.7)

अपूजया विनाशं च यास्यत्यत्र न संशयः । तव वंशोद्भवा ये च पूजयित्वा प्रभक्तितः

apūjayā vināśaṁ ca yāsyatyatra na saṁśayaḥ tava vaṁśodbhavā ye ca pūjayitvā prabhaktitaḥ

इसकी पूजा न होने पर निःसंदेह विनाश होगा। तुम्हारे वंश में उत्पन्न जो लोग भक्तिपूर्वक इस लिंग की पूजा करके —

श्लोक 8 (skanda.6.176.8)

एतल्लिंगं करिष्यंति कृत्यानि विविधानिच । तानि सिद्धिं प्रयास्यंति प्रसादादस्य दीक्षित

etalliṅgaṁ kariṣyaṁti kṛtyāni vividhāni ca tāni siddhiṁ prayāsyaṁti prasādādasya dīkṣita

— और विविध कार्य संपन्न करेंगे, वे सब इसी लिंग के प्रसाद से सिद्धि को प्राप्त होंगे, हे दीक्षित!

श्लोक 9 (skanda.6.176.9)

गोवर्धन उवाच । अहमर्चां करिष्यामि लिंगस्यास्य सदा द्विज । भक्तिं च प्रकरिष्यामि हेतोरस्य कृते द्विज । पूजार्थं चैव ये चान्ये मम वंशसमुद्भवाः

govardhana uvāca ahamarcāṁ kariṣyāmi liṅgasyāsya sadā dvija bhaktiṁ ca prakariṣyāmi hetorasya kṛte dvija pūjārthaṁ caiva ye cānye mama vaṁśasamudbhavāḥ

गोवर्धन ने कहा — हे द्विज! मैं सदा इस लिंग की अर्चना करूँगा, और इसकी भक्ति भी करूँगा; और मेरे वंश में उत्पन्न जो अन्य लोग हैं, उन्हें भी इसकी पूजा के लिए प्रेरित करूँगा।

श्लोक 10 (skanda.6.176.10)

पिप्पलाद उवाच । गोवर्धन द्रुतं विप्रांस्तत्र चानय नागरान् । तेषां मतेन देवस्य नाममात्रं करोम्यहम्

pippalāda uvāca govardhana drutaṁ viprāṁstatra cānaya nāgarān teṣāṁ matena devasya nāmamātraṁ karomyaham

पिप्पलाद ने कहा — हे गोवर्धन! शीघ्र वहाँ नागर ब्राह्मणों को बुला लाओ; उनकी सहमति से ही मैं इस देव का नामकरण करूँगा।

श्लोक 11 (skanda.6.176.11)

ततश्चानाययामास विप्रांश्चैव विचक्षणान् । श्रुताध्ययनसंपन्नान्यज्ञकर्मपरायणान्

tataścānāyayāmāsa viprāṁścaiva vicakṣaṇān śrutādhyayanasaṁpannānyajñakarmaparāyaṇān

तब उन्होंने चतुर, वेदाध्ययन-संपन्न और यज्ञकर्म में रत ब्राह्मणों को बुलवाया।

श्लोक 12 (skanda.6.176.12)

तानब्रवीत्प्रणम्योच्चैः पिप्पलादो महामुनिः । मम माता मृता पूर्वं कंसारीति च नामतः

tānabravītpraṇamyoccaiḥ pippalādo mahāmuniḥ mama mātā mṛtā pūrvaṁ kaṁsārīti ca nāmataḥ

महामुनि पिप्पलाद ने उन्हें ऊँचे स्वर में प्रणाम करके कहा — मेरी माता, जिनका नाम कंसारी था, पहले ही देह त्याग चुकी हैं।

श्लोक 13 (skanda.6.176.13)

तस्या उद्देशतो लिंगं मयैतत्संप्रतिष्ठितम् । युष्मद्वाक्यात्प्रसिद्धिं च प्रयातु द्विजसत्तमाः

tasyā uddeśato liṅgaṁ mayaitatsaṁpratiṣṭhitam yuṣmadvākyātprasiddhiṁ ca prayātu dvijasattamāḥ

उन्हीं के निमित्त मैंने यह लिंग स्थापित किया है। हे द्विजसत्तमो! तुम्हारे ही वचन से इसे प्रसिद्धि प्राप्त हो।

श्लोक 14 (skanda.6.176.14)

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां यश्चैतत्स्नापयिष्यति । याज्ञवल्क्येश्वरोत्थं च स वै श्रेयो ह्यवाप्स्यति

aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ yaścaitatsnāpayiṣyati yājñavalkyeśvarotthaṁ ca sa vai śreyo hyavāpsyati

जो कोई अष्टमी और चतुर्दशी को इसका अभिषेक करेगा, वह याज्ञवल्क्येश्वर के समान ही कल्याण प्राप्त करेगा।

श्लोक 15 (skanda.6.176.15)

सूत उवाच । अथ तैर्ब्राह्मणैः सर्वैस्तस्य नाम प्रतिष्ठितम् । कंसारीश्वर इत्येवं गौरवात्तस्य सन्मुनेः

sūta uvāca atha tairbrāhmaṇaiḥ sarvaistasya nāma pratiṣṭhitam kaṁsārīśvara ityevaṁ gauravāttasya sanmuneḥ

सूत जी ने कहा — तब उन सभी ब्राह्मणों ने, उस सन्मुनि के प्रति गौरव के कारण, उस लिंग का नाम 'कंसारीश्वर' रखा।

श्लोक 16 (skanda.6.176.16)

एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्ठोऽस्मि द्विजोत्तमाः । कंसारीश्वरसंज्ञस्तु यथा जातस्तु पापहा । स्थापितः पिप्पलादेन स्वयं चैव महात्मना

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭho'smi dvijottamāḥ kaṁsārīśvarasaṁjñastu yathā jātastu pāpahā sthāpitaḥ pippalādena svayaṁ caiva mahātmanā

हे द्विजोत्तमो! जो कुछ मुझसे पूछा गया, वह सब मैंने कह दिया — कैसे यह पाप-नाशक लिंग, कंसारीश्वर के नाम से, स्वयं महात्मा पिप्पलाद द्वारा स्थापित हुआ।

श्लोक 17 (skanda.6.176.17)

यश्चैतत्पुण्यमाख्यानं तस्य देवस्य संनिधौ । संपठेच्छृणुयाद्वापि सम्यक्छक्तिसमन्वितः

yaścaitatpuṇyamākhyānaṁ tasya devasya saṁnidhau saṁpaṭhecchṛṇuyādvāpi samyakchaktisamanvitaḥ

जो कोई इस पुण्य आख्यान को उस देवता के समीप, यथाशक्ति भली भाँति पढ़े या सुने —

श्लोक 18 (skanda.6.176.18)

मनसा चिंतितं पापं परदारकृतं च यत् । तस्य तन्नाशमायाति पिप्पलाद वचो यथा

manasā ciṁtitaṁ pāpaṁ paradārakṛtaṁ ca yat tasya tannāśamāyāti pippalāda vaco yathā

— उसका मन से चिंतित पाप, तथा पराई स्त्री के संबंध में किया गया पाप भी, पिप्पलाद के वचन के अनुसार नष्ट हो जाता है।

श्लोक 19 (skanda.6.176.19)

यस्तस्य पुरतो भक्त्या नीलरुद्रान्सदा जपेत् । प्राणरुद्रान्विशेषेण भवरुद्रसमन्वितान्

yastasya purato bhaktyā nīlarudrānsadā japet prāṇarudrānviśeṣeṇa bhavarudrasamanvitān

जो कोई उस देवता के सामने भक्तिपूर्वक सदा नीलरुद्र-मंत्रों का जप करे, विशेषतः प्राणरुद्र और भवरुद्र से युक्त मंत्रों का —

श्लोक 20 (skanda.6.176.20)

ब्रह्महत्योद्भवं चैव अपि तस्य प्रणश्यति । परचक्रभये जाते ह्यनावृष्टिभये तथा

brahmahatyodbhavaṁ caiva api tasya praṇaśyati paracakrabhaye jāte hyanāvṛṣṭibhaye tathā

— उसका ब्रह्महत्या से उत्पन्न पाप भी नष्ट हो जाता है। शत्रु-सेना के भय में तथा अनावृष्टि के भय में भी —

श्लोक 21 (skanda.6.176.21)

अथर्ववेदे साद्यंते पठिते तस्य चाग्रतः । शत्रुर्विलयमभ्येति वृष्टिः सञ्जायते द्रुतम्

atharvavede sādyaṁte paṭhite tasya cāgrataḥ śatrurvilayamabhyeti vṛṣṭiḥ sañjāyate drutam

— उस देवता के समक्ष अथर्ववेद का सांगोपांग पाठ करने से शत्रु का नाश हो जाता है, और वर्षा शीघ्र होने लगती है।

श्लोक 22 (skanda.6.176.22)

राजदौःस्थ्ये समुत्पन्ने राजा भवति धार्मिकः । सर्वरोगविनिर्मुक्तः प्रजापालनतत्परः

rājadauḥsthye samutpanne rājā bhavati dhārmikaḥ sarvarogavinirmuktaḥ prajāpālanatatparaḥ

जब राज्य पर संकट आता है, तो राजा धर्मात्मा, सर्वरोगमुक्त, और प्रजापालन में तत्पर हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.6.176.23)

उपसर्गभये जाते तस्य दोषः प्रशाम्यति । शनैः शनैरसंदिग्धं पिप्पलादवचो यथा

upasargabhaye jāte tasya doṣaḥ praśāmyati śanaiḥ śanairasaṁdigdhaṁ pippalādavaco yathā

जब उपद्रव अथवा महामारी का भय आ जाए, तो उसका दोष धीरे-धीरे शांत हो जाता है, यह पिप्पलाद के वचन के अनुसार निःसंदेह सत्य है।

श्लोक 24 (skanda.6.176.24)

किं वा ते बहुनोक्तेन यत्किंचिद्व्यसनं महत् । तत्तस्य व्यसनं किंचिदथर्वणः प्रकीर्तनात्

kiṁ vā te bahunoktena yatkiṁcidvyasanaṁ mahat tattasya vyasanaṁ kiṁcidatharvaṇaḥ prakīrtanāt

अधिक कहने से क्या लाभ? जो भी बड़ा संकट हो, अथर्ववेद के पाठ से वह संकट क्षीण हो जाता है।

श्लोक 25 (skanda.6.176.25)

अस्य देवस्य पुरतो याति नाशं च वै द्रुतम्

asya devasya purato yāti nāśaṁ ca vai drutam

इस देवता के समक्ष वह शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाता है।

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