नागर खण्ड · अध्याय 177
पञ्चपिंडिका-गौरी-उत्पत्ति-माहात्म्य वर्णन (पद्मावती-वृत्तांत)
श्लोक 1 (skanda.6.177.1)
सूत उवाच । तथान्यापि च तत्रास्ति गौरी वै पञ्चपिंडिका । लक्ष्म्या संस्थापिता चैव मानुषत्वंव्यवस्थया
sūta uvāca tathānyāpi ca tatrāsti gaurī vai paṁcapiṁḍikā lakṣmyā saṁsthāpitā caiva mānuṣatvaṁvyavasthayā
सूत जी ने कहा — वहाँ एक और भी देवी हैं, गौरी, जो पंचपिंडिका के रूप में हैं, और लक्ष्मी जी ने ही मानव-रूप में स्थित रहते हुए उन्हें स्थापित किया था।
श्लोक 2 (skanda.6.177.2)
तस्या दर्शनमात्रेण नारी सौभाग्यमामुयात् । ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे वृषस्थे च दिवाकरे
tasyā darśanamātreṇa nārī saubhāgyamāmuyāt jyeṣṭhe māsi site pakṣe vṛṣasthe ca divākare
उनके दर्शन मात्र से ही स्त्री सौभाग्य प्राप्त कर लेती है, विशेषतः ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में, जब सूर्य वृष राशि में स्थित हो।
श्लोक 3 (skanda.6.177.3)
तस्या उपरि नारी या जलयन्त्रं दधाति वै । स्राव्यमाणं दिवानक्तं सौभाग्यं परमं लभेत्
tasyā upari nārī yā jalayantraṁ dadhāti vai srāvyamāṇaṁ divānaktaṁ saubhāgyaṁ paramaṁ labhet
जो स्त्री उनके ऊपर दिन-रात टपकता हुआ जलयंत्र स्थापित करती है, वह परम सौभाग्य को प्राप्त करती है।
श्लोक 4 (skanda.6.177.4)
यत्फलं लभते नारी समस्तैर्विहितैर्व्रतैः । गौरीसमुद्भवैश्चैव दानैर्दत्तैस्तदिष्टजैः । तत्फलं लभते सर्वं जलयन्त्रस्य कारणात्
yatphalaṁ labhate nārī samastairvihitairvrataiḥ gaurīsamudbhavaiścaiva dānairdattaistadiṣṭajaiḥ tatphalaṁ labhate sarvaṁ jalayantrasya kāraṇāt
जो फल स्त्री समस्त विहित व्रतों से, गौरी से संबंधित दानों से, तथा अभीष्ट यज्ञों से प्राप्त करती है, वही समस्त फल केवल जलयंत्र के कारण भी प्राप्त कर लेती है।
श्लोक 5 (skanda.6.177.5)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्त्रीभिः सौभाग्यकारणात् । जलयन्त्रं विधातव्यं ज्येष्ठे गौर्याः प्रयत्नतः
tasmātsarvaprayatnena strībhiḥ saubhāgyakāraṇāt jalayantraṁ vidhātavyaṁ jyeṣṭhe gauryāḥ prayatnataḥ
अतः स्त्रियों को सौभाग्य के लिए सब प्रकार से प्रयत्नपूर्वक ज्येष्ठ मास में गौरी के समक्ष जलयंत्र स्थापित करना चाहिए।
श्लोक 6 (skanda.6.177.6)
किं व्रतैर्नियमैर्वापि स्त्रीणां ब्राह्मणसत्तमाः । जपैर्होमैः कृतैरन्यैर्बहुक्लेशकरैश्च तैः
kiṁ vrataiḥ niyamairvāpi strīṇāṁ brāhmaṇasattamāḥ japairhomaiḥ kṛtairanyairbahukleśakaraiśca taiḥ
हे ब्राह्मणसत्तमो! स्त्रियों के लिए अन्य कठिन क्लेशकारी व्रतों, नियमों, जप और होमों से क्या लाभ?
श्लोक 7 (skanda.6.177.7)
स्त्रीणां ब्राह्मणशार्दूला जलेयन्त्रे धृते सति । गौर्या उपरि सद्भक्त्या वृषस्थे तीक्ष्णदीधितौ
strīṇāṁ brāhmaṇaśārdūlā jalayantre dhṛte sati gauryā upari sadbhaktyā vṛṣasthe tīkṣṇadīdhitau
हे ब्राह्मण-श्रेष्ठो! जब सूर्य वृष राशि में हो, तब गौरी के ऊपर सच्ची भक्ति से जलयंत्र स्थापित करने पर —
श्लोक 8 (skanda.6.177.8)
नैवं संजायते वंध्या काकवन्ध्या न जायते । न दौर्भाग्यसमोपेता सप्तजन्मांतराणि सा
naivaṁ saṁjāyate vaṁdhyā kākavaṁdhyā na jāyate na daurbhāgyasamopetā saptajanmāṁtarāṇi sā
— वह कभी वंध्या नहीं होती, न ककवंध्या (एक ही संतान वाली) होती है, और न ही सात जन्मों तक दुर्भाग्य से युक्त होती है।
श्लोक 9 (skanda.6.177.9)
ऋषय ऊचुः । गौरी चतुर्भुजा प्रोक्ता दृश्यते परमेश्वरी । पञ्चपिंडा कथं जाता ह्येतं नः संशयं वद
ṛṣaya ūcuḥ gaurī caturbhujā proktā dṛśyate parameśvarī paṁcapiṁḍā kathaṁ jātā hyetaṁ naḥ saṁśayaṁ vada
ऋषियों ने कहा — गौरी को चतुर्भुजा परमेश्वरी कहा गया है, तो वह पंचपिंडा रूप में कैसे प्रकट हुई? हमारे इस संशय को दूर कीजिए।
श्लोक 10 (skanda.6.177.10)
सूत उवाच । यदा च प्रलयो भावि तदा त्मानं करोत्यसौ । पश्चपिंडीमयं विप्राः कुरुते रूपमुत्तमम्
sūta uvāca yadā ca pralayo bhāvi tadātmānaṁ karotyasau paṁcapiṁḍīmayaṁ viprāḥ kurute rūpamuttamam
सूत जी ने कहा — जब प्रलय होने को होता है, तब वह देवी अपने आपको, हे विप्रो! पंचपिंडमय उस उत्तम रूप में बदल लेती है।
श्लोक 11 (skanda.6.177.11)
एषा सा परमा शक्तिः सर्वं व्याप्य सुरेश्वरी । तया सर्वमिदं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्
eṣā sā paramā śaktiḥ sarvaṁ vyāpya sureśvarī tayā sarvamidaṁ vyāptaṁ trailokyaṁ sacarācaram
यही वह परम शक्ति, देवेश्वरी है, जो सर्वत्र व्याप्त है; उसी के द्वारा यह संपूर्ण त्रिलोक, चराचर सहित, व्याप्त है।
श्लोक 12 (skanda.6.177.12)
पृथिव्यापश्च तेजश्च वायुराकाशमेव च । सृष्ट्यर्थं रक्षयेदेषा ततः स्यात्पंचपिंडिका
pṛthivyāpaśca tejaśca vāyurākāśameva ca sṛṣṭyarthaṁ rakṣayedeṣā tataḥ syātpaṁcapiṁḍikā
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश — सृष्टि की रक्षा के लिए वह इन पाँचों को धारण करती है, इसीलिए वह पंचपिंडिका कहलाती है।
श्लोक 13 (skanda.6.177.13)
यदस्यां पूजितायां तु प्रत्यक्षायां प्रजायते । सहस्रत्रिगुणं तच्च यत्र स्यात्पञ्चपिण्डिका
yadasyāṁ pūjitāyāṁ tu pratyakṣāyāṁ prajāyate sahasratriguṇaṁ tacca yatra syātpaṁcapiṇḍikā
जब इनकी प्रत्यक्ष रूप में पूजा की जाती है, तो जो फल उत्पन्न होता है, वह जहाँ पंचपिंडिका विराजमान हों, वहाँ तीन हजार गुना अधिक होता है।
श्लोक 14 (skanda.6.177.14)
ज्येष्ठे मासि विशेषेण जलयंत्रार्चनेन च । अत्र वः कीर्तयिष्यामि त्विति हासं पुरातनम्
jyeṣṭhe māsi viśeṣeṇa jalayaṁtrārcanena ca atra vaḥ kīrtayiṣyāmi tviti hāsaṁ purātanam
विशेष रूप से ज्येष्ठ मास में जलयंत्र से पूजा करने पर। इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ।
श्लोक 15 (skanda.6.177.15)
यद्वृत्तं काशिराजस्य भार्याया द्विजसत्तमाः । यच्च प्रोक्तं पुरा लक्ष्म्या विष्णवे परिपृष्टया
yadvṛttaṁ kāśirājasya bhāryāyā dvijasattamāḥ yacca proktaṁ purā lakṣmyā viṣṇave paripṛṣṭayā
हे द्विजसत्तमो! यह वृत्तांत काशिराज की पत्नी का है, जिसे पूर्वकाल में विष्णु द्वारा पूछे जाने पर लक्ष्मी ने कहा था।
श्लोक 16 (skanda.6.177.16)
लक्ष्मीरुवाच । काशिराजः पुरा ह्यासीज्जयसेन इति श्रुतः । तस्य भार्यासहस्रं तु ह्यासीद्रूपसमन्वितम्
lakṣmīruvāca kāśirājaḥ purā hyāsījjayasena iti śrutaḥ tasya bhāryāsahasraṁ tu hyāsīdrūpasamanvitam
लक्ष्मी ने कहा — प्राचीन काल में काशिराज थे, जो जयसेन नाम से विख्यात थे; उनकी एक हजार पत्नियाँ थीं, जो सभी रूपवती थीं।
श्लोक 17 (skanda.6.177.17)
अथ चान्या प्रिया तेन लब्धा भार्या सुशोभना । मनुष्यत्वव्यवस्थाया मम चांशकला हि या । सुता मद्राधिराजस्य विष्वक्सेनस्य धीमतः
atha cānyā priyā tena labdhā bhāryā suśobhanā manuṣyatvavyavasthāyā mama cāṁśakalā hi yā sutā madrādhirājasya viṣvaksenasya dhīmataḥ
फिर उसने एक और अत्यंत सुंदर प्रिय पत्नी प्राप्त की, जो मानव-रूप में मेरी ही अंशकला थी — वह मद्र के महाराजा विद्वान विष्वक्सेन की पुत्री थी।
श्लोक 18 (skanda.6.177.18)
सा गत्वा प्रातरुत्थाय शुभे गंगातटे तदा । पञ्चपिंडात्मिकां गौरीं कृत्वा कर्द्दमसंभवाम्
sā gatvā prātarutthāya śubhe gaṁgātaṭe tadā paṁcapiṁḍātmikāṁ gaurīṁ kṛtvā karddamasaṁbhavām
वह प्रातःकाल उठकर पवित्र गंगा-तट पर जाकर, मिट्टी से पंचपिंडात्मिका गौरी की मूर्ति बनाकर —
श्लोक 19 (skanda.6.177.19)
ततः संपूजयामास मन्त्रैः पंचभिरेव च । ततो गन्धैः परैर्माल्यैर्धूपैर्वस्त्रैः सुशोभनैः
tataḥ saṁpūjayāmāsa mantraiḥ paṁcabhireva ca tato gaṁdhaiḥ parairmālyairdhūpairvastraiḥ suśobhanaiḥ
— और उसे पाँच मंत्रों से पूजती थी; फिर उत्तम गंध, माल्य, धूप और सुंदर वस्त्रों से भी पूजा करती थी।
श्लोक 20 (skanda.6.177.20)
नैवेद्यैः परमान्नैश्च गीतैर्नृत्यैः प्रवादितैः । ततो विसृज्य तां देवीं तदुद्देशेन वै ततः
naivedyaiḥ paramānnaiśca gītairnṛtyaiḥ pravāditaiḥ tato visṛjya tāṁ devīṁ taduddeśena vai tataḥ
उत्तम भोजन के नैवेद्य, गीत, नृत्य और वाद्य से भी पूजा करती; फिर उस देवी के निमित्त उसका विसर्जन करके —
श्लोक 21 (skanda.6.177.21)
दत्त्वा दानानि भूरीणि गौरिणीनां द्विजन्मनाम् । ततश्च गृहमभ्येति भूरिवादित्रनिःस्वनैः
dattvā dānāni bhūrīṇi gauriṇīnāṁ dvijanmanām tataśca gṛhamabhyeti bhūrivāditraniḥsvanaiḥ
फिर द्विजों में सुहागिन स्त्रियों को प्रचुर दान देकर, वह अनेक वाद्यों की ध्वनि के साथ घर लौट आती थी।
श्लोक 22 (skanda.6.177.22)
यथायथा च तां पूजां तस्या गौर्या करोति सा । तथातथा तु सौभाग्यं तस्याश्चाप्यधिकं भवेत्
yathāyathā ca tāṁ pūjāṁ tasyā gauryā karoti sā tathātathā tu saubhāgyaṁ tasyāścāpyadhikaṁ bhavet
जैसे-जैसे वह उस गौरी की पूजा करती जाती, वैसे-वैसे उसका सौभाग्य भी अधिकाधिक बढ़ता जाता।
श्लोक 23 (skanda.6.177.23)
सर्वासां च सपत्नीनां सौभाग्यं वाधिकं भवेत्
sarvāsāṁ ca sapatnīnāṁ saubhāgyaṁ vādhikaṁ bhavet
और वह अपनी समस्त सौतों की तुलना में अधिक सौभाग्यशाली बन गई।
श्लोक 24 (skanda.6.177.24)
अथ तस्याः सपत्न्यो या सर्वा दुःखसमन्विताः । दृष्ट्वा सौभाग्यवृद्धिं तां तस्या एव दिनेदिने
atha tasyāḥ sapatnyo yā sarvā duḥkhasamanvitāḥ dṛṣṭvā saubhāgyavṛddhiṁ tāṁ tasyā eva dinedine
तब उसकी सारी सौतें, जो दुःख से भरी थीं, उसके दिन-प्रतिदिन बढ़ते सौभाग्य को देखकर —
श्लोक 25 (skanda.6.177.25)
एकाः प्रोचुः कर्म चैतद्यदेषा कुरुते सदा । मृन्मयांश्च समादाय पूजयेत्पंचपिंडकान्
ekāḥ procuḥ karma caitadyadeṣā kurute sadā mṛnmayāṁśca samādāya pūjayetpaṁcapiṁḍakān
कुछ ने कहा — यह जो सदा करती है, वह यही अनुष्ठान है — मिट्टी की पंचपिंडिकाएँ बनाकर उनकी पूजा करना।
श्लोक 26 (skanda.6.177.26)
अन्यास्तां मंत्रसंसिद्धां प्रवदंति महर्षयः । अन्या वदन्ति पुण्यानि ह्यस्याः पूर्वकृतानि च
anyāstāṁ mantrasaṁsiddhāṁ pravadaṁti maharṣayaḥ anyā vadanti puṇyāni hyasyāḥ pūrvakṛtāni ca
अन्य कुछ कहती हैं कि वह मंत्र-सिद्धि से युक्त है, जैसा कि महर्षियों ने कहा है; और अन्य कहती हैं कि यह उसके पूर्वजन्म के पुण्यों का फल है।
श्लोक 27 (skanda.6.177.27)
एवं तासां सुदुःखानां महान्कालो जगाम ह । कस्यचित्त्वथ कालस्य सर्वाः संमंत्र्य ता मिथः
evaṁ tāsāṁ suduḥkhānāṁ mahānkālo jagāma ha kasyacittvatha kālasya sarvāḥ saṁmaṁtrya tā mithaḥ
इस प्रकार उन दुःखी सौतों का लंबा समय बीत गया; फिर कुछ समय पश्चात् वे सब आपस में सलाह करके —
श्लोक 28 (skanda.6.177.28)
तस्याः संनिधिमाजग्मुस्तस्मिन्नेव जलाशये । यत्र सा पूजयेद्गौरीं कृत्वा तां पञ्चपिंडिकाम्
tasyāḥ saṁnidhimājagmustasminneva jalāśaye yatra sā pūjayedgaurīṁ kṛtvā tāṁ paṁcapiṁḍikām
उसी जलाशय के पास गईं, जहाँ वह पंचपिंडिका बनाकर गौरी की पूजा करती थी।
श्लोक 29 (skanda.6.177.29)
ततः सर्वाः समालोक्य त्यक्त्वा गौरीप्रपूजनम् । संमुखी प्रययौ तूर्णं कृतांजलिपुटा स्थिता
tataḥ sarvāḥ samālokya tyaktvā gaurīprapūjanam saṁmukhī prayayau tūrṇaṁ kṛtāṁjaliputā sthitā
उन सबको देखकर, वह गौरी की पूजा को छोड़कर, हाथ जोड़े हुए तुरंत उनके सम्मुख आ गई।
श्लोक 30 (skanda.6.177.30)
स्वागतं वो महाभागा भूयः सुस्वागतं च वः । कृत्यं निवेद्यतां शीघ्रं येनाशु प्रकरोम्यहम्
svāgataṁ vo mahābhāgā bhūyaḥ susvāgataṁ ca vaḥ kṛtyaṁ nivedyatāṁ śīghraṁ yenāśu prakaromyaham
स्वागत है आप सबका, हे महाभागाओ! बार-बार स्वागत है। शीघ्र बताइए कि आपका क्या प्रयोजन है, जिसे मैं तुरंत पूरा कर दूँ।
श्लोक 31 (skanda.6.177.31)
सपत्न्य ऊचुः । वयं सर्वाः समायाताः कौतुके तवांतिकम् । दौर्भाग्यवह्निनिर्दग्धास्तव सौभाग्यजेनच
sapatnya ūcuḥ vayaṁ sarvāḥ samāyātāḥ kautuke tavāṁtikam daurbhāgyavahninirdagdhāstava saubhāgyajenaca
सौतों ने कहा — हम सब कौतुकवश तुम्हारे पास आई हैं; तुम्हारे सौभाग्य से उत्पन्न दुर्भाग्य की अग्नि से हम जल रही हैं।
श्लोक 32 (skanda.6.177.32)
तस्माद्वद महाभागे मृन्मयां पंचपिंडिकाम् । नित्यमर्चयसि त्वं किं सौभाग्यस्य विवर्धनम्
tasmādvada mahābhāge mṛnmayāṁ paṁcapiṁḍikām nityamarcayasi tvaṁ kiṁ saubhāgyasya vivardhanam
अतः हे महाभागे! बताओ, क्या नित्य मिट्टी की पंचपिंडिका की पूजा करना ही तुम्हारे सौभाग्य की वृद्धि का कारण है?
श्लोक 33 (skanda.6.177.33)
किं ते कारणमेतद्धि किं वा मन्त्रसमुद्भवः । प्रभावोऽयं महाभागेगुह्यं चेन्नो वदस्व नः
kiṁ te kāraṇametaddhi kiṁ vā mantrasamudbhavaḥ prabhāvo'yaṁ mahābhāge guhyaṁ cenno vadasva naḥ
क्या इसका यही कारण है, अथवा यह मंत्र से उत्पन्न प्रभाव है? हे महाभागे! यदि यह गुह्य न हो, तो हमें बताओ।
श्लोक 34 (skanda.6.177.34)
पद्मावत्युवाच । रहस्यं परमं गुह्यं यत्पृष्टास्मि शुभाननाः । अवक्तव्यं वदिष्यामि भवतीनां तथापि च
padmāvatyuvāca rahasyaṁ paramaṁ guhyaṁ yatpṛṣṭāsmi śubhānanāḥ avaktavyaṁ vadiṣyāmi bhavatīnāṁ tathāpi ca
पद्मावती ने कहा — हे शुभाननाओ! जो मुझसे पूछा गया है वह अत्यंत गोपनीय रहस्य है, फिर भी जो अवाच्य है, वह भी मैं तुम्हारे लिए कह दूँगी।
श्लोक 35 (skanda.6.177.35)
गौरीपूजनकाले तु यस्माच्चैव समागताः । सर्वा मम भगिन्यः स्थ ईर्ष्याधर्मो न मेऽस्ति च
gaurīpūjanakāle tu yasmāccaiva samāgatāḥ sarvā mama bhaginyaḥ stha īrṣyādharmo na me'sti ca
क्योंकि तुम सब मेरी गौरी-पूजा के समय आई हो, और तुम सब मेरी बहनें हो, इसलिए मुझमें ईर्ष्या का भाव नहीं है।
श्लोक 36 (skanda.6.177.36)
अहमासं पुरा कन्या पुरे कुसुमसंज्ञिते । वीरसेनस्य शूद्रस्य वणिक्पुत्रस्य धीमतः । तेन दत्ताऽस्मि धर्मेण विवाहार्थं महात्मना
ahamāsaṁ purā kanyā pure kusumasaṁjñite vīrasenasya śūdrasya vaṇikputrasya dhīmataḥ tena dattā'smi dharmeṇa vivāhārthaṁ mahātmanā
पहले मैं कुसुम नामक नगर में एक कन्या थी, शूद्र वणिक्-पुत्र वीरसेन की — उस बुद्धिमान महात्मा ने ही मुझे विवाह के लिए धर्मपूर्वक दान किया था।
श्लोक 37 (skanda.6.177.37)
ततो विवाहसमये मम दत्तानि वृद्धये । पंचाक्षराणि श्रेष्ठानि योषिता दीक्षया सह । गौरी पूजाकृते चैव प्रोक्ता चाहं ततः परम्
tato vivāhasamaye mama dattāni vṛddhaye paṁcākṣarāṇi śreṣṭhāni yoṣitā dīkṣayā saha gaurī pūjākṛte caiva proktā cāhaṁ tataḥ param
फिर विवाह के समय, मेरी समृद्धि के लिए, एक स्त्री ने मुझे दीक्षा के साथ पाँच श्रेष्ठ अक्षर (मंत्र) प्रदान किए, और तब मुझसे कहा कि यह गौरी की पूजा के लिए है।
श्लोक 38 (skanda.6.177.38)
यावत्पुत्रि त्वमात्मानमेतैः पूजयसेऽक्षरैः । जलपानं न कर्तव्यं तावच्चैव कथञ्चन
yāvatputri tvamātmānametaiḥ pūjayase'kṣaraiḥ jalapānaṁ na kartavyaṁ tāvaccaiva kathañcana
उसने कहा — हे पुत्री! जब तक तुम इन अक्षरों से अपनी आराधना नहीं कर लेतीं, तब तक तुम्हें किसी भी प्रकार जलपान नहीं करना चाहिए।
श्लोक 39 (skanda.6.177.39)
येन संप्राप्स्यसेऽभीष्टं तत्प्रभावाद्यदीप्सितम् । तथेति च मया प्रोक्तं तस्याश्चैव वरानने
yena saṁprāpsyase'bhīṣṭaṁ tatprabhāvādyadīpsitam tatheti ca mayā proktaṁ tasyāścaiva varānane
इसी शक्ति से तुम अपनी अभिलषित कामना को प्राप्त करोगी। हे वरानने! मैंने भी उससे 'ऐसा ही होगा' कहा।
श्लोक 40 (skanda.6.177.40)
ततो विवाहे निर्वृत्ते गताऽहं पतिना सह । श्वशुरस्तिष्ठते यत्र श्वश्रूश्चैव सुदारुणा
tato vivāhe nirvṛtte gatā'haṁ patinā saha śvaśurastiṣṭhate yatra śvaśrūścaiva sudāruṇā
फिर विवाह संपन्न होने पर मैं अपने पति के साथ वहाँ गई, जहाँ मेरे श्वसुर रहते थे, और जहाँ मेरी अत्यंत कठोर सास भी थी।
श्लोक 41 (skanda.6.177.41)
गौरीपूजाकृते मां च निवारयति सर्वदा । ततोऽहं भयसन्त्रस्ता गौरीभक्तिपरायणा । जलार्थं यत्र गच्छामि तस्मिंश्चैव जलाश्रये
gaurīpūjākṛte māṁ ca nivārayati sarvadā tato'haṁ bhayasantrastā gaurībhaktiparāyaṇā jalārthaṁ yatra gacchāmi tasmiṁścaiva jalāśraye
वह सदा मुझे गौरी-पूजा से रोकती थी; तब मैं भयभीत होकर भी गौरी-भक्ति में तत्पर रहते हुए, जिस जलाशय पर जल लेने जाती थी —
श्लोक 42 (skanda.6.177.42)
ततः कर्द्दममादाय मन्त्रैः पंचभिरेवच । तैरेव पूजयाम्येव गौरीं भक्तिपरायणा
tataḥ karddamamādāya mantraiḥ paṁcabhireva ca taireva pūjayāmyeva gaurīṁ bhaktiparāyaṇā
— वहीं मिट्टी लेकर, उन्हीं पाँच मंत्रों से, भक्तिपूर्वक गौरी की पूजा करती थी।
श्लोक 43 (skanda.6.177.43)
प्रक्षिपामि ततस्तोये ततो गच्छामि मन्दिरम् । कस्यचित्त्वथ कालस्य भर्ता मे प्रस्थितः शुभः । देशांतरं वणिग्वृत्त्या सोऽपि मार्गं तमाश्रितः
prakṣipāmi tatastoye tato gacchāmi mandiram kasyacittvatha kālasya bhartā me prasthitaḥ śubhaḥ deśāṁtaraṁ vaṇigvṛttyā so'pi mārgaṁ tamāśritaḥ
फिर उस मूर्ति को जल में विसर्जित करके घर लौट आती थी। कुछ काल पश्चात् मेरे शुभ पति व्यापार के निमित्त अन्य देश को प्रस्थान हुए, और वे भी उसी मार्ग पर चल पड़े।
श्लोक 44 (skanda.6.177.44)
स गच्छन्मरुमार्गेण मां समादाय स्नेहतः । संप्राप्तो निर्जलं देशं सुरौद्रं मरुमंडलम्
sa gacchanmarumārgeṇa māṁ samādāya snehataḥ saṁprāpto nirjalaṁ deśaṁ suraudraṁ marumaṇḍalam
वे स्नेहवश मुझे भी साथ लेकर मरुभूमि के मार्ग से चले, और अत्यंत भयंकर, जलरहित मरुस्थल-क्षेत्र में जा पहुँचे।
श्लोक 45 (skanda.6.177.45)
तथा रौद्रतरे काले वृषस्थे दिवसाधिपे । ततः सार्थः समस्तश्च विश्रांतः स्थलमध्यगः
tathā raudratare kāle vṛṣasthe divasādhipe tataḥ sārthaḥ samastaśca viśrāṁtaḥ sthalamadhyagaḥ
उसी अत्यंत भीषण समय में, जब सूर्य वृष राशि में था, तब सारा व्यापारी-दल उस स्थल के मध्य में विश्राम करने लगा।
श्लोक 46 (skanda.6.177.46)
कूपमेकं समाश्रित्य गम्भीरं जलदोपमम् । एतस्मिन्नेव काले तु मया दृष्टः समीपगः । तोयाकारो मरुद्देशस्तश्चित्ते विचिन्तितम्
kūpamekaṁ samāśritya gambhīraṁ jaladopamam etasminneva kāle tu mayā dṛṣṭaḥ samīpagaḥ toyākāro marudeśastaścitte vicintitam
एक गहरे, बादल के समान कुएँ के पास डेरा डाला गया। उसी समय मुझे समीप ही मरुस्थल का एक भाग जल के समान दिखाई दिया, और मैंने मन में सोचा —
श्लोक 47 (skanda.6.177.47)
यत्तच्च दृश्यते तोयं समीपस्थं तथा बहु । अत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा गौरीमभ्यर्च्य भक्तितः । पिबामि सलिलं पश्चात्सुस्वादु सरसीभवम्
yattacca dṛśyate toyaṁ samīpasthaṁ tathā bahu atra snātvā śucirbhūtvā gaurīmabhyarcya bhaktitaḥ pibāmi salilaṁ paścātsusvādu sarasībhavam
यह जो जल समीप ही, इतना अधिक दिखाई दे रहा है — यहाँ स्नान करके, शुद्ध होकर, भक्तिपूर्वक गौरी की पूजा करके, फिर मैं उस मीठे सरोवर के जल को पीऊँगी।
श्लोक 48 (skanda.6.177.48)
ततः संप्रस्थिता यावत्प्रगच्छामि पदात्पदम् । यावद्दूरतरं यामि तावत्सा मृगतृष्णिका
tataḥ saṁprasthitā yāvatpragacchāmi padātpadam yāvaddūrataraṁ yāmi tāvatsā mṛgatṛṣṇikā
फिर जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ती गई, कदम-दर-कदम, वह मरीचिका उतनी ही दूर होती गई।
श्लोक 49 (skanda.6.177.49)
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो नभोमध्यं दिवाकरः । वृषस्थो येन दह्यामि ह्युपरिष्टाच्छुभानना
etasminnantare prāpto nabhomadhyaṁ divākaraḥ vṛṣastho yena dahyāmi hyupariṣṭācchubhānanā
इसी बीच सूर्य आकाश के मध्य में पहुँच गया, और वृष राशि में स्थित होने के कारण, हे शुभानने! मैं ऊपर से जलने लगी।
श्लोक 50 (skanda.6.177.50)
अधोभागे सुतप्ताभिर्वालुकाभिः समंततः । तृष्णार्ताऽहं ततस्तस्मिन्मरुदेशे समाकुला
adhobhāge sutaptābhirvālukābhiḥ samaṁtataḥ tṛṣṇārtā'haṁ tatastasminmarudeśe samākulā
और नीचे से सब ओर तपती हुई बालू से, प्यास से पीड़ित होकर, मैं उस मरुभूमि में व्याकुल हो गई।
श्लोक 51 (skanda.6.177.51)
ततश्च पतिता भूमौ विस्फोटकसमावृता । ततो मया स्मृता चित्ते कथा भारतसंभवा
tataśca patitā bhūmau visphoṭakasamāvṛtā tato mayā smṛtā citte kathā bhāratasaṁbhavā
मैं फफोलों से ढकी हुई भूमि पर गिर पड़ी; तब मुझे मन में महाभारत की एक कथा स्मरण हो आई।
श्लोक 52 (skanda.6.177.52)
नृगेण तु यथा यज्ञो वालुकाभिर्विनिर्मितः । कूपान्तः क्षिप्यमाणेन तृणलोष्टांबुवर्जितम्
nṛgeṇa tu yathā yajño vālukābhirvinirmitaḥ kūpāntaḥ kṣipyamāṇena tṛṇaloṣṭāṁbuvarjitam
जैसे राजा नृग ने एक कुएँ में गिराए जाते समय, तिनके, ढेले और जल से रहित, बालू से ही यज्ञ का सृजन किया था —
श्लोक 53 (skanda.6.177.53)
भक्तिग्राह्यास्ततो देवास्तुष्टास्तस्य महात्मनः । तदहं वालुकाभिश्च पूजयामि हरप्रियाम्
bhaktigrāhyāstato devāstuṣṭāstasya mahātmanaḥ tadahaṁ vālukābhiśca pūjayāmi harapriyām
— और देवता भक्ति से ही ग्रहण करने वाले हैं, इसलिए वे उस महात्मा से प्रसन्न हुए। उसी प्रकार मैं भी बालू से ही शिवप्रिया गौरी की पूजा करती हूँ।
श्लोक 54 (skanda.6.177.54)
तेन तुष्टा तु सा देवी मम राज्यं प्रयच्छति । अद्य देहान्तरे प्राप्ते मनोभीष्टमनंतकम्
tena tuṣṭā tu sā devī mama rājyaṁ prayacchati adya dehāntare prāpte manobhīṣṭamanaṁtakam
उससे प्रसन्न होकर वह देवी मुझे राज्य प्रदान करे; अब इस देह के अंत में मुझे अनंत मनोवांछित फल प्राप्त हो।
श्लोक 55 (skanda.6.177.55)
ततस्तु पंचभिर्मन्त्रैस्तैरेव स्मृतिमागतैः । पंचभिर्मुष्टिभिर्देवी वालुकोत्थैः प्रपूजिता
tatastu paṁcabhirmantraistaireva smṛtimāgataiḥ paṁcabhirmuṣṭibhirdevī vālukotthaiḥ prapūjitā
फिर उन्हीं पाँच मंत्रों से, जो मुझे स्मरण थे, बालू की पाँच मुट्ठियों से मैंने देवी की पूजा की।
श्लोक 56 (skanda.6.177.56)
ततः पञ्चत्वमापन्ना तत्कालेऽहं वरांगनाः । दशार्णाधिपतेर्जाता सदने लोकविश्रुते
tataḥ paṁcatvamāpannā tatkāle'haṁ varāṁganāḥ daśārṇādhipaterjātā sadane lokaviśrute
उसी समय मैं देह त्यागकर, हे श्रेष्ठ स्त्रियो! लोकविख्यात दशार्ण के राजा के घर में उत्पन्न हुई।
श्लोक 57 (skanda.6.177.57)
जातिस्मरणसंयुक्ता तस्या देव्याः प्रसादतः । भवतीनां कनिष्ठास्मि ज्येष्ठा सौभाग्यतः स्थिता
jātismaraṇasaṁyuktā tasyā devyāḥ prasādataḥ bhavatīnāṁ kaniṣṭhāsmi jyeṣṭhā saubhāgyataḥ sthitā
उस देवी की कृपा से मुझे पूर्वजन्म का स्मरण भी बना रहा। मैं तुम सबमें आयु में सबसे छोटी हूँ, परंतु सौभाग्य में सबसे बड़ी हूँ।
श्लोक 58 (skanda.6.177.58)
एतस्मात्कारणाद्गौरीं मुक्त्वैतान्पञ्चपिण्डकान् । कर्द्दमेन विधायाथ पूजयामि दिनेदिने
etasmātkāraṇādgaurīṁ muktvaitānpaṁcapiṇḍakān karddamena vidhāyātha pūjayāmi dinedine
इसी कारण मैं गौरी को छोड़कर, इन पंचपिंडकों को मिट्टी से बनाकर, प्रतिदिन उन्हीं की पूजा करती हूँ।
श्लोक 59 (skanda.6.177.59)
एतद्गुह्यं मया ख्यातं भवतीनामसंशयम् । सत्येनानेन मे गौरी मनोभीष्टं प्रयच्छतु
etadguhyaṁ mayā khyātaṁ bhavatīnāmasaṁśayam satyenānena me gaurī manobhīṣṭaṁ prayacchatu
यह गुह्य रहस्य मैंने तुम्हें बिना किसी संशय के बता दिया। इसी सत्य के प्रभाव से गौरी मुझे मनोवांछित फल प्रदान करें।
श्लोक 60 (skanda.6.177.60)
लक्ष्मीरुवाच । ततः सर्वाः सपत्न्यस्ताः कृतांजलिपुटाः स्थिताः । मामूचुर्विनयाद्वाचा प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः
lakṣmīruvāca tataḥ sarvāḥ sapatnyastāḥ kṛtāṁjaliputāḥ sthitāḥ māmūcurvinayādvācā praṇipatya muhurmuhuḥ
लक्ष्मी ने कहा — तब वे सभी सौतें हाथ जोड़कर खड़ी हुईं, और बार-बार प्रणाम करते हुए विनम्र वाणी में मुझसे बोलीं।
श्लोक 61 (skanda.6.177.61)
प्रसादं कुरु चास्माकं दीयतां मन्त्रपंचकम् । तदेव येन ते देवी तुष्टा सा परमेश्वरी
prasādaṁ kuru cāsmākaṁ dīyatāṁ mantrapaṁcakam tadeva yena te devī tuṣṭā sā parameśvarī
हम पर कृपा कीजिए और वही पाँच मंत्र हमें भी प्रदान कीजिए, जिनसे वह परमेश्वरी देवी आप पर प्रसन्न हुईं।
श्लोक 62 (skanda.6.177.62)
मया प्रोक्ताश्च ता सर्वाः प्रार्थयध्वं यथेच्छया । अहं सर्वं प्रदास्यामि तत्सत्यं वचनं मम
mayā proktāśca tā sarvāḥ prārthayadhvaṁ yathecchayā ahaṁ sarvaṁ pradāsyāmi tatsatyaṁ vacanaṁ mama
मैंने भी उन सबसे कहा — जो चाहो, माँग लो; मैं तुम सबको सब कुछ दूँगी, यह मेरा सत्य वचन है।
श्लोक 63 (skanda.6.177.63)
ततो देव मया प्रोक्तं तासां तन्मंत्रपंचकम् । शिष्यत्वं गमितानां च वाङ्मनःकायकर्मभिः
tato deva mayā proktaṁ tāsāṁ tanmaṁtrapaṁcakam śiṣyatvaṁ gamitānāṁ ca vāṅmanaḥkāyakarmabhiḥ
हे देव! तब मैंने उन्हें वे पाँच मंत्र प्रदान किए, जब वे मन, वचन और कर्म से मेरी शिष्यता को प्राप्त हो गईं।
श्लोक 64 (skanda.6.177.64)
विष्णुरुवाच । ममापि वद देवेशि कीदृक्तन्मन्त्रपञ्चकम् । यत्त्वयाऽनुष्ठितं पूर्वं तया तासां निवेदितम्
viṣṇuruvāca mamāpi vada deveśi kīdṛktanmantrapañcakam yattvayā'nuṣṭhitaṁ pūrvaṁ tayā tāsāṁ niveditam
विष्णु ने कहा — हे देवेशि! मुझे भी बताओ, वे पाँच मंत्र कैसे हैं, जिनका पूर्वकाल में तुमने आचरण किया था, और जिन्हें उसने (पद्मावती ने) उन सबको बताया था।
श्लोक 65 (skanda.6.177.65)
लक्ष्मीरुवाच । नमः पृथिव्यै क्षांतीशि नम आपोमये शुभे । तेजस्विनि नमस्तुभ्यं नमस्ते वायुरूपिणि
lakṣmīruvāca namaḥ pṛthivyai kṣāṁtīśi nama āpomaye śubhe tejasvini namastubhyaṁ namaste vāyurūpiṇi
लक्ष्मी ने कहा — पृथ्वी-रूपिणी, क्षमामयी को नमस्कार; जल-रूपिणी शुभे को नमस्कार; तेजस्विनी को नमस्कार; वायु-रूपिणी को नमस्कार।
श्लोक 66 (skanda.6.177.66)
आकाशरूपसंपन्ने पंचरूपे नमोनमः
ākāśarūpasaṁpanne paṁcarūpe namonamaḥ
आकाश-रूप से युक्त, पंचरूपिणी को बारंबार नमस्कार।
श्लोक 67 (skanda.6.177.67)
एभिर्मन्त्रैर्मया पूर्वं पूजिता परमेश्वरी । तेन राज्यं मया प्राप्तं सर्वस्त्रीणां सुदुर्लभम्
ebhirmantrairmayā pūrvaṁ pūjitā parameśvarī tena rājyaṁ mayā prāptaṁ sarvastrīṇāṁ sudurlabham
इन्हीं मंत्रों से मैंने पूर्वकाल में उस परमेश्वरी की पूजा की थी; उसी के प्रभाव से मुझे वह राज्य प्राप्त हुआ, जो सभी स्त्रियों के लिए अत्यंत दुर्लभ है।
श्लोक 68 (skanda.6.177.68)
ततश्च स्थापिता देवी कृत्वा रत्नमयी शुभा । हाटकेश्वरजे क्षेत्रे मया तत्र सुरेश्वर
tataśca sthāpitā devī kṛtvā ratnamayī śubhā hāṭakeśvaraje kṣetre mayā tatra sureśvara
हे सुरेश्वर! फिर मैंने उस देवी को रत्नमयी और शुभ रूप में बनाकर हाटकेश्वर क्षेत्र में स्थापित कर दिया।
श्लोक 69 (skanda.6.177.69)
तां या पूजयते नारी सद्योऽपि पतिवल्लभा । जायते नात्र सन्देहः सर्वपापविवर्जिता
tāṁ yā pūjayate nārī sadyo'pi pativallabhā jāyate nātra sandehaḥ sarvapāpavivarjitā
जो स्त्री उनकी पूजा करती है, वह शीघ्र ही अपने पति की प्रिय बन जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं, और वह समस्त पापों से मुक्त हो जाती है।