नागर खण्ड · अध्याय 178
पञ्चपिंडिका-गौरी-उत्पत्ति-माहात्म्य वर्णन (लक्ष्मी-व्रत-वृत्तांत)
श्लोक 1 (skanda.6.178.1)
लक्ष्मीरुवाच । एवं राज्यं मया प्राप्तं गौरीपूजा कृते विभो । सौभाग्यं परमं चैव दुर्लभं सर्वयोषिताम्
lakṣmīruvāca evaṁ rājyaṁ mayā prāptaṁ gaurīpūjā kṛte vibho saubhāgyaṁ paramaṁ caiva durlabhaṁ sarvayoṣitām
लक्ष्मी ने कहा — हे विभो! इस प्रकार गौरी की पूजा से मुझे राज्य प्राप्त हुआ, और वह परम सौभाग्य भी, जो समस्त स्त्रियों के लिए दुर्लभ है।
श्लोक 2 (skanda.6.178.2)
न चापत्यं मया लब्धं तथापि परमेश्वर । तादृशेऽपि च सौभाग्ये तारुण्ये तादृशे स्थिते
na cāpatyaṁ mayā labdhaṁ tathāpi parameśvara tādṛśe'pi ca saubhāgye tāruṇye tādṛśe sthite
फिर भी, हे परमेश्वर! मुझे संतान प्राप्त नहीं हुई, ऐसा सौभाग्य होने पर भी और ऐसी युवावस्था होने पर भी।
श्लोक 3 (skanda.6.178.3)
दह्यामि तेन दुःखेन दिवानक्तं सुखं न मे । कस्यचित्त्वथ कालस्य दुर्वासा मुनिसत्तमः
dahyāmi tena duḥkhena divānaktaṁ sukhaṁ na me kasyacittvatha kālasya durvāsā munisattamaḥ
उस दुःख से मैं दिन-रात जलती रहती थी, मुझे कोई सुख नहीं था। फिर कुछ समय पश्चात् मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा —
श्लोक 4 (skanda.6.178.4)
आनर्ताधिपतेर्हर्म्यं संप्राप्तो गौरवाय सः । चातुर्मास्यकृते चैव मृत्तिकाग्रहणाय च
ānartādhipaterharmyaṁ saṁprāpto gauravāya saḥ cāturmāsyakṛte caiva mṛttikāgrahaṇāya ca
— आनर्त के राजा के महल में आदरपूर्वक पधारे, चातुर्मास्य व्रत के लिए तथा मिट्टी ग्रहण करने के निमित्त।
श्लोक 5 (skanda.6.178.5)
ततः संपूजितो राज्ञा आनर्तेन यथाक्रमम् । दत्त्वार्घ्यं मधुपर्कं च ततः प्रोक्तं प्रणम्य च
tataḥ saṁpūjito rājñā ānartena yathākramam dattvārghyaṁ madhuparkaṁ ca tataḥ proktaṁ praṇamya ca
तब आनर्त के राजा ने विधिपूर्वक उनकी पूजा की, अर्घ्य और मधुपर्क देकर, फिर प्रणाम करते हुए कहा।
श्लोक 6 (skanda.6.178.6)
स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ भूयः सुस्वागतं च ते । नान्यो धन्यतमो लोके भूयोऽस्ति सदृशो मया
svāgataṁ te muniśreṣṭha bhūyaḥ susvāgataṁ ca te nānyo dhanyatamo loke bhūyo'sti sadṛśo mayā
हे मुनिश्रेष्ठ! आपका स्वागत है, बारंबार सुस्वागत है। संसार में मेरे समान अधिक धन्य कोई अन्य नहीं है।
श्लोक 7 (skanda.6.178.7)
यौ ते पादौ रजोध्वस्तौ केशैर्मे निर्मलीकृतौ । तद्ब्रूहि किंकरोम्यद्य गृहायातस्य ते मुने
yau te pādau rajodhvastau keśairme nirmalīkṛtau tadbrūhi kiṁkaromyadya gṛhāyātasya te mune
आपके दोनों धूल-धूसरित चरणों को मैंने अपने केशों से स्वच्छ किया है। हे मुने! बताइए, आज आपके इस घर आगमन पर मैं क्या करूँ।
श्लोक 8 (skanda.6.178.8)
अपि राज्यं प्रयच्छामि का वार्तान्येषु वस्तुषु
api rājyaṁ prayacchāmi kā vārtānyeṣu vastuṣu
मैं तो अपना राज्य तक दे सकता हूँ, अन्य वस्तुओं की तो बात ही क्या है।
श्लोक 9 (skanda.6.178.9)
दुर्वासा उवाच । चातुर्मासीविधानं ते करिष्ये नृप मंदिरे । मृत्तिकाग्रहणं तावच्छुश्रूषा क्रियतां मम । स तथेति प्रतिज्ञाय मामूचे पार्थिवोत्तमः
durvāsā uvāca cāturmāsīvidhānaṁ te kariṣye nṛpa maṁdire mṛttikāgrahaṇaṁ tāvacchuśrūṣā kriyatāṁ mama sa tatheti pratijñāya māmūce pārthivottamaḥ
दुर्वासा ने कहा — हे राजन्! मैं तुम्हारे महल में ही चातुर्मास्य व्रत का पालन करूँगा, और मिट्टी भी यहीं से ग्रहण करूँगा; तुम मेरी सेवा करो। उस श्रेष्ठ राजा ने 'ऐसा ही हो' कहकर प्रतिज्ञा की, और मुझसे बोला।
श्लोक 10 (skanda.6.178.10)
शुश्रूषा चास्य कर्तव्या सर्वदैव वरानने । चातुर्मासीव्रतं यावद्देवतार्चनपूर्वकम्
śuśrūṣā cāsya kartavyā sarvadaiva varānane cāturmāsīvrataṁ yāvaddevatārcanapūrvakam
हे वरानने! तुम्हें हमेशा इनकी सेवा करनी होगी, जब तक इनका देवतार्चनपूर्वक चातुर्मास्य व्रत चलेगा।
श्लोक 11 (skanda.6.178.11)
बाढमित्येवमुक्त्वाथ मया सर्वमनुष्ठितम् । शुश्रूषार्हं च यत्कर्म दुहितेव पितुर्यथा
bāḍhamityevamuktvātha mayā sarvamanuṣṭhitam śuśrūṣārhaṁ ca yatkarma duhiteva pituryathā
'ऐसा ही हो' कहकर, मैंने सब कुछ संपन्न किया — जो भी सेवा योग्य कार्य था, वह वैसे ही किया जैसे पुत्री अपने पिता की करती है।
श्लोक 12 (skanda.6.178.12)
चातुर्मास्यां व्यतीतायां यदा संप्रस्थितो मुनिः । तदा प्रोवाच मां तुष्टः पुत्रि किं करवाणि ते
cāturmāsyāṁ vyatītāyāṁ yadā saṁprasthito muniḥ tadā provāca māṁ tuṣṭaḥ putri kiṁ karavāṇi te
जब चातुर्मास्य व्रत पूर्ण हो गया और मुनि प्रस्थान करने को हुए, तब प्रसन्न होकर उन्होंने मुझसे कहा — हे पुत्री! तुम्हारे लिए मैं क्या करूँ?
श्लोक 13 (skanda.6.178.13)
ततः स भगवान्प्रोक्तः प्रणिपत्य मया मुहुः । अपत्यं नास्ति मे ब्रह्मंस्तेन दह्याम्यहर्निशम्
tataḥ sa bhagavānproktaḥ praṇipatya mayā muhuḥ apatyaṁ nāsti me brahmaṁstena dahyāmyaharniśam
तब मैंने बार-बार उस भगवान को प्रणाम करके कहा — हे ब्राह्मण! मुझे कोई संतान नहीं है, इसी से मैं दिन-रात जलती रहती हूँ।
श्लोक 14 (skanda.6.178.14)
ईदृशे सति राज्ञोऽपि यौवने च महत्तरे । तत्त्वं वद मुनिश्रेष्ठ येन स्यान्मम संततिः
īdṛśe sati rājño'pi yauvane ca mahattare tattvaṁ vada muniśreṣṭha yena syānmama saṁtatiḥ
राजा होते हुए भी, और ऐसी भरपूर युवावस्था होने पर भी — हे मुनिश्रेष्ठ! आप मुझे वह उपाय बताइए, जिससे मुझे संतान प्राप्त हो।
श्लोक 15 (skanda.6.178.15)
व्रतेन नियमेनाथ दानेन च हुतेन च । ततः स सुचिरं ध्यात्वा मामुवाच स्मयन्निव
vratena niyamenātha dānena ca hutena ca tataḥ sa suciraṁ dhyātvā māmuvāca smayanniva
चाहे व्रत से हो, नियम से हो, दान से हो या हवन से — मुझे बताइए। तब वे बहुत देर तक ध्यान करके, मुस्कुराते हुए से, मुझसे बोले।
श्लोक 16 (skanda.6.178.16)
अन्यदेहांतरे पुत्रि त्वया गौरी प्रपूजिता । तप्ताभिर्वालुकाभिः सा मृत्युकाल उपस्थिते
anyadehāṁtare putri tvayā gaurī prapūjitā taptābhirvālukābhiḥ sā mṛtyukāla upasthite
हे पुत्री! अपने पूर्वजन्म में, जब मृत्यु का समय निकट आया था, तब तुमने तपती हुई बालू से गौरी की पूजा की थी।
श्लोक 17 (skanda.6.178.17)
तद्भक्त्या लब्धराज्यापि दाहेन परियुज्यसे । गौरी यत्तापसंयुक्ता बालुकाभिः कृता त्वया
tadbhaktyā labdharājyāpi dāhena pariyujyase gaurī yattāpasaṁyuktā bālukābhiḥ kṛtā tvayā
उसी भक्ति से तुमने राज्य तो प्राप्त कर लिया, परंतु दाह से भी युक्त हो रही हो, क्योंकि तुमने गौरी को तप्त बालू से बनाया था।
श्लोक 18 (skanda.6.178.18)
न देवो विद्यते काष्ठे पाषाणे मृत्तिकासु च । भावेषु विद्यते देवो मन्त्रसंयोगसंयुतः
na devo vidyate kāṣṭhe pāṣāṇe mṛttikāsu ca bhāveṣu vidyate devo mantrasaṁyogasaṁyutaḥ
देवता न काष्ठ में विद्यमान हैं, न पाषाण में, न मिट्टी में; देवता तो भाव में विद्यमान हैं, मंत्र के संयोग से युक्त होकर।
श्लोक 19 (skanda.6.178.19)
भावभक्तिसमायुक्ता मंत्रसंयोजनेन च । देवी मन्त्रसमायाता त्वया वालुकयाऽर्चिता
bhāvabhaktisamāyuktā mantrasaṁyojanena ca devī mantrasamāyātā tvayā vālukayā'rcitā
भाव-भक्ति से युक्त होकर, मंत्र के संयोजन से देवी उपस्थित हो गईं, और तुमने बालू से ही उनकी पूजा की।
श्लोक 20 (skanda.6.178.20)
त्वत्काये तेन संतापः सर्वदाऽयं व्यवस्थितः । तस्माद्रत्नमयीं गौरीं कृत्वा त्वं पंचपिंडिकाम् । हाटकेश्वरजे क्षेत्रे संस्थापय शुभानने
tvatkāye tena saṁtāpaḥ sarvadā'yaṁ vyavasthitaḥ tasmādratnamayīṁ gaurīṁ kṛtvā tvaṁ paṁcapiṁḍikām hāṭakeśvaraje kṣetre saṁsthāpaya śubhānane
इसी कारण तुम्हारे शरीर में यह संताप सदा बना रहता है। अतः हे शुभानने! रत्नों से पंचपिंडिका गौरी बनाकर उसे हाटकेश्वर क्षेत्र में स्थापित करो।
श्लोक 21 (skanda.6.178.21)
वृषस्थे भास्करे पश्चात्तस्या उपरि स्रावि यत् । जलयन्त्रं दिवारात्रं धारयस्व प्रयत्नतः
vṛṣasthe bhāskare paścāttasyā upari srāvi yat jalayantraṁ divārātraṁ dhārayasva prayatnataḥ
फिर जब सूर्य वृष राशि में हो, तब उसके ऊपर टपकने वाला जलयंत्र दिन-रात प्रयत्नपूर्वक स्थापित रखो।
श्लोक 22 (skanda.6.178.22)
ततो यथायथा तस्याः शीतभावो भविष्यति । तथातथा च ते दाहः शांतिं यास्यत्यहर्निशम्
tato yathāyathā tasyāḥ śītabhāvo bhaviṣyati tathātathā ca te dāhaḥ śāṁtiṁ yāsyatyaharniśam
फिर जैसे-जैसे वह शीतल होती जाएगी, वैसे-वैसे तुम्हारा दाह दिन-रात शांत होता जाएगा।
श्लोक 23 (skanda.6.178.23)
दाहांते भविता गर्भस्ततः पुत्रमवाप्स्यसि । राज्यभारक्षमं शूरं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्
dāhāṁte bhavitā garbhastataḥ putramavāpsyasi rājyabhārakṣamaṁ śūraṁ triṣu lokeṣu viśrutam
दाह के अंत में गर्भ स्थापित होगा, और तब तुम्हें एक पुत्र प्राप्त होगा, जो राज्यभार सँभालने में समर्थ, शूरवीर, और तीनों लोकों में विख्यात होगा।
श्लोक 24 (skanda.6.178.24)
अन्यापि कामिनी यात्र एवं तां पूजयिष्यति । ज्येष्ठे मासे तथा सापि यथा त्वं प्रभविष्यति
anyāpi kāminī yātra evaṁ tāṁ pūjayiṣyati jyeṣṭhe māse tathā sāpi yathā tvaṁ prabhaviṣyati
और जो भी अन्य स्त्री ज्येष्ठ मास में उसकी इसी प्रकार पूजा करेगी, वह भी वैसे ही समृद्धि को प्राप्त होगी जैसे तुम प्राप्त करोगी।
श्लोक 25 (skanda.6.178.25)
लक्ष्मीरुवाच । ततो मया पुनः प्रोक्तो भगवान्स मुनीश्वरः । मानुषत्वे न मे रागो विरक्तिर्महती स्थिता
lakṣmīruvāca tato mayā punaḥ prokto bhagavānsa munīśvaraḥ mānuṣatve na me rāgo viraktirmahatī sthitā
लक्ष्मी ने कहा — फिर मैंने पुनः उन भगवान मुनीश्वर से कहा — मुझे मानव-अवस्था में कोई राग नहीं है, बल्कि मुझमें महान विरक्ति स्थित है।
श्लोक 26 (skanda.6.178.26)
नदीवेगोपमं दृष्ट्वा जीवितंसर्वदेहिनाम् । तन्मे वद महाभाग यत्किंचिद्व्रतमुत्तमम्
nadīvegopamaṁ dṛṣṭvā jīvitaṁsarvadehinām tanme vada mahābhāga yatkiṁcidvratamuttamam
समस्त प्राणियों के जीवन को नदी के वेग के समान क्षणभंगुर देखकर — हे महाभाग! मुझे कोई ऐसा उत्तम व्रत बताइए —
श्लोक 27 (skanda.6.178.27)
मानुषत्वं न येन स्यात्सम्यक्चीर्णेन सद्द्विज । ततः स सुचिरं ध्यात्वा मामाह परमेश्वर
mānuṣatvaṁ na yena syātsamyakcīrṇena saddvija tataḥ sa suciraṁ dhyātvā māmāha parameśvara
— जिसका भली प्रकार पालन करने से मनुष्य-योनि पुनः प्राप्त न हो, हे सद्द्विज! तब वे बहुत देर तक ध्यान करके, हे परमेश्वर! मुझसे बोले।
श्लोक 28 (skanda.6.178.28)
अस्ति पुत्रि व्रतं पुण्यं गौरी तुष्टिकरं परम् । येन चीर्णेन वै सम्यग्योषिद्देवत्वमाप्नुयात्
asti putri vrataṁ puṇyaṁ gaurī tuṣṭikaraṁ param yena cīrṇena vai samyagyoṣiddevatvamāpnuyāt
हे पुत्री! एक पुण्य व्रत है, जो गौरी को अत्यंत संतुष्ट करने वाला है; जिसका भली प्रकार पालन करने से स्त्री देवत्व को प्राप्त हो जाती है।
श्लोक 29 (skanda.6.178.29)
गोमयाख्या महादेवी कृता वै गोमयेन सा । ततो गोलोकमापन्नाः सर्वास्ता वरवर्णिनि
gomayākhyā mahādevī kṛtā vai gomayena sā tato golokamāpannāḥ sarvāstā varavarṇini
गोमय से बनी वह महादेवी 'गोमया' कहलाती है; हे वरवर्णिनि! जो कोई ऐसा करती हैं, वे सब गोलोक को प्राप्त हो जाती हैं।
श्लोक 30 (skanda.6.178.30)
तां त्वं कुरुष्व कल्याणि येन देवत्वमाप्स्यसि । ततो मया पुनः प्रोक्तः स मुनिः सुरसत्तम
tāṁ tvaṁ kuruṣva kalyāṇi yena devatvamāpsyasi tato mayā punaḥ proktaḥ sa muniḥ surasattama
हे कल्याणि! उसी की रचना करो, जिससे तुम देवत्व प्राप्त कर सको। हे सुरसत्तम! फिर मैंने पुनः उन मुनि से कहा।
श्लोक 31 (skanda.6.178.31)
कस्मिन्काले प्रकर्तव्या विधिना केन सन्मुने । सर्वं विस्तरतो ब्रूहि येन तां प्रकरोम्यहम्
kasminkāle prakartavyā vidhinā kena sanmune sarvaṁ vistarato brūhi yena tāṁ prakaromyaham
हे सन्मुने! यह किस समय और किस विधि से करना चाहिए, वह सब विस्तार से बताइए, जिससे मैं उसे संपन्न कर सकूँ।
श्लोक 32 (skanda.6.178.32)
दुर्वासा उवाच । नभस्ये चासिते पक्षे तृतीयादिवसे स्थिते । प्रातरुत्थाय पश्चाच्च भक्षयेद्दंतधावनम्
durvāsā uvāca nabhasye cāsite pakṣe tṛtīyādivase sthite prātarutthāya paścācca bhakṣayeddaṁtadhāvanam
दुर्वासा ने कहा — भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया के दिन, प्रातःकाल उठकर पहले दातुन करना चाहिए।
श्लोक 33 (skanda.6.178.33)
ततश्च नियमं कृत्वा उपवाससमुद्भवम् । गौरीनामसमुच्चार्य श्रद्धापूतेन चेतसा
tataśca niyamaṁ kṛtvā upavāsasamudbhavam gaurīnāmasamuccārya śraddhāpūtena cetasā
फिर उपवास का नियम धारण करके, श्रद्धा से पवित्र चित्त से गौरी के नाम का उच्चारण करना चाहिए।
श्लोक 34 (skanda.6.178.34)
ततो निशागमे प्राप्ते कृत्वा गौरीचतुष्टयम् । मृन्मयं यादृशं चैव तदिहैकमनाः शृणु
tato niśāgame prāpte kṛtvā gaurīcatuṣṭayam mṛnmayaṁ yādṛśaṁ caiva tadihaikamanāḥ śṛṇu
फिर रात्रि होने पर मिट्टी की चार गौरी-मूर्तियाँ बनानी चाहिए; वह किस प्रकार की हों, यह एकाग्रचित्त होकर सुनो।
श्लोक 35 (skanda.6.178.35)
एका गौरी प्रकर्तव्या पंचपिंडा यथोदिता । प्रहरेप्रहरे प्राप्ते तासु पूजां समाचरेत् । यैर्मंत्रैस्तान्निबोध त्वमेकैकस्याः पृथक्पृथक्
ekā gaurī prakartavyā paṁcapiṁḍā yathoditā prahareprahare prāpte tāsu pūjāṁ samācaret yairmaṁtraistānnibodha tvamekaikasyāḥ pṛthakpṛthak
एक गौरी पंचपिंडा रूप में, जैसा पहले कहा गया, बनानी चाहिए। हर प्रहर में उनकी पूजा करनी चाहिए; अब तुम प्रत्येक की पूजा के लिए अलग-अलग मंत्र सुनो।
श्लोक 36 (skanda.6.178.36)
हिमाचलगृहे जाता देवि त्वं शंकरप्रिये । मेनागर्भसमुद्भूता पूजां गृह्ण नमोस्तु ते
himācalagṛhe jātā devi tvaṁ śaṁkarapriye menāgarbhasamudbhūtā pūjāṁ gṛhṇa namostu te
'हे देवि! तुम हिमाचल के घर में जन्मी हो, शंकर की प्रिया हो, मेना के गर्भ से उत्पन्न हुई हो — मेरी पूजा स्वीकार करो, तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 37 (skanda.6.178.37)
धूपं दद्यात्ततश्चैव कर्पूरं श्रद्धया सह । रक्तसूत्रेण दीपं च घृतेन परिकल्पयेत्
dhūpaṁ dadyāttataścaiva karpūraṁ śraddhayā saha raktasūtreṇa dīpaṁ ca ghṛtena parikalpayet
फिर श्रद्धापूर्वक कर्पूर सहित धूप अर्पित करना चाहिए, और लाल धागे की बत्ती से घी का दीपक जलाना चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.6.178.38)
जातिपुष्पैः समभ्यर्च्य नैवेद्ये मोदकान्न्यसेत् । रक्तवस्त्रेण संछाद्य अर्घ्यं दत्त्वा ततः परम्
jātipuṣpaiḥ samabhyarcya naivedye modakānnyaset raktavastreṇa saṁchādya arghyaṁ dattvā tataḥ param
जाति (चमेली) के पुष्पों से पूजा करके नैवेद्य में मोदक चढ़ाने चाहिए, लाल वस्त्र से ढककर, फिर उसके बाद अर्घ्य देना चाहिए।
श्लोक 39 (skanda.6.178.39)
यस्य वृक्षस्य पुष्पं च तस्य स्याद्दन्तधावनम् । मातुलिंगेन तस्यास्तु मन्त्रेणानेन भक्तितः
yasya vṛkṣasya puṣpaṁ ca tasya syāddantadhāvanam mātuliṁgena tasyāstu mantreṇānena bhaktitaḥ
जिस वृक्ष का पुष्प चढ़ाया गया हो, उसी की टहनी से दातुन करना चाहिए; बीजौरे के फल से इस मंत्र के साथ भक्तिपूर्वक —
श्लोक 40 (skanda.6.178.40)
अर्घ्यं दद्यात्प्रयत्नेन गन्धपुष्पाक्षतान्वितम् । शंकरस्य प्रिये देवि हिमाचलसुते शुभे । अर्घ्यमेनं मया दत्तं प्रतिगृह्ण नमोऽस्तु ते
arghyaṁ dadyātprayatnena gaṁdhapuṣpākṣatānvitam śaṁkarasya priye devi himācalasute śubhe arghyamenaṁ mayā dattaṁ pratigṛhṇa namo'stu te
— गंध, पुष्प और अक्षत सहित अर्घ्य प्रयत्नपूर्वक अर्पित करना चाहिए, यह कहते हुए — 'हे शुभे! शंकर की प्रिया, हिमाचल की पुत्री देवी! मेरे द्वारा दिया गया यह अर्घ्य स्वीकार करो, तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 41 (skanda.6.178.41)
तदेव प्राशनं कुर्यात्ततः कायविशुद्धये । प्रहरांते च संपूज्य अर्धनारीश्वरं ततः
tadeva prāśanaṁ kuryāttataḥ kāyaviśuddhaye prahārāṁte ca saṁpūjya ardhanārīśvaraṁ tataḥ
फिर उसी अर्घ्य का प्राशन करना चाहिए, शरीर की शुद्धि के लिए; प्रहर के अंत में अर्धनारीश्वर की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 42 (skanda.6.178.42)
सुरभ्या पूजयेद्भक्त्या मन्त्रेणानेन पार्वति । वाममर्धं शरीरस्य या हरस्य व्यवस्थिता । सा मे पूजां प्रगृह्णातु तस्यै देव्यै नमोऽस्तु ते
surabhyā pūjayedbhaktyā mantreṇānena pārvati vāmamardhaṁ śarīrasya yā harasya vyavasthitā sā me pūjāṁ pragṛhṇātu tasyai devyai namo'stu te
सुगंधित द्रव्यों से भक्तिपूर्वक इस मंत्र से पूजा करनी चाहिए — 'हे पार्वति! जो शिव के शरीर का वाम अर्ध हो, वह मेरी पूजा स्वीकार करे; उस देवी को नमस्कार है।'
श्लोक 43 (skanda.6.178.43)
अगरुं च ततो भक्त्या धूपं दद्यात्तथा शुभे । नैवेद्ये गुणकांश्चैव नालिकेरेण चार्घकम्
agaruṁ ca tato bhaktyā dhūpaṁ dadyāttathā śubhe naivedye guṇakāṁścaiva nālikereṇa cārghakam
फिर हे शुभे! भक्तिपूर्वक अगर की धूप अर्पित करनी चाहिए; नैवेद्य में गुण (मिष्ठान्न) और नारियल से अर्घ्य देना चाहिए।
श्लोक 44 (skanda.6.178.44)
मन्त्रेणानेन दातव्यं तदेव प्राशनं स्मृतम् । अर्धनारीश्वरौ यौ च संस्थितौ परमेश्वरौ
mantreṇānena dātavyaṁ tadeva prāśanaṁ smṛtam ardhanārīśvarau yau ca saṁsthitau parameśvarau
यह अर्घ्य इसी मंत्र से देना चाहिए, और उसी को प्राशन कहा गया है — 'अर्धनारीश्वर के रूप में स्थित हे दोनों परमेश्वर!'
श्लोक 45 (skanda.6.178.45)
अर्घ्यो मे गृह्यतां देवौ स्यातं सर्वसुखप्रदौ । तृतीये प्रहरे प्राप्ते शतपत्र्या प्रपूजयेत्
arghyo me gṛhyatāṁ devau syātaṁ sarvasukhapradau tṛtīye prahare prāpte śatapatryā prapūjayet
— हे देवो! मेरा यह अर्घ्य ग्रहण करो, और तुम सर्वसुखप्रद बनो।' तीसरे प्रहर में शतपत्री (गुलाब) पुष्प से पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 46 (skanda.6.178.46)
उमामहेश्वरौ देवौ मंत्रेणानेन पूजयेत्
umāmaheśvarau devau mantreṇānena pūjayet
उमा-महेश्वर दोनों देवों की इसी मंत्र से पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 47 (skanda.6.178.47)
उमामहेश्वरौ देवौ यौ तौ सृष्टिलयान्वितौ । तौ गृह्णीतामिमां पूजां मया दत्तां प्रभक्तितः
umāmaheśvarau devau yau tau sṛṣṭilayānvitau tau gṛhṇītāmimāṁ pūjāṁ mayā dattāṁ prabhaktitaḥ
'हे उमा-महेश्वर देवद्वय, जो सृष्टि और प्रलय से युक्त हैं, आप दोनों मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पित यह पूजा स्वीकार करें।'
श्लोक 48 (skanda.6.178.48)
गुग्गुलोत्थं ततो धूपं नैवेद्यं घारिकात्मकम् । जातीफलेन चार्घ्यं च तदेव प्राशनं स्मृतम्
guggulotthaṁ tato dhūpaṁ naivedyaṁ ghārikātmakam jātīphalena cārghyaṁ ca tadeva prāśanaṁ smṛtam
फिर गुग्गुल का धूप, घेवर के रूप में नैवेद्य, और जायफल से अर्घ्य देना चाहिए, और उसी को प्राशन माना गया है।
श्लोक 49 (skanda.6.178.49)
ततश्चार्घ्यः प्रदातव्यो मंत्रेणानेन भक्तितः । ग्रंथिचूर्णेन धूपं च अर्घ्यं मदनजं फलम्
tataścārghyaḥ pradātavyo mantreṇānena bhaktitaḥ graṁthicūrṇena dhūpaṁ ca arghyaṁ madanajaṁ phalam
फिर इसी मंत्र से भक्तिपूर्वक अर्घ्य देना चाहिए; सोंठ के चूर्ण से धूप, और मदनफल से अर्घ्य देना चाहिए।
श्लोक 50 (skanda.6.178.50)
तदेव प्राशनं कार्यं ततः कायविशुद्धये
tadeva prāśanaṁ kāryaṁ tataḥ kāyaviśuddhaye
उसी का प्राशन करना चाहिए, शरीर की शुद्धि के लिए।
श्लोक 51 (skanda.6.178.51)
उमामहेश्वरौ देवौ सर्वकामसुखप्रदौ । गृह्णीतामर्घ्यमेतं मे दयां कृत्वा महत्तमाम्
umāmaheśvarau devau sarvakāmasukhapradau gṛhṇītāmarghyametaṁ me dayāṁ kṛtvā mahattamām
'हे उमा-महेश्वर देवद्वय, जो समस्त कामनाओं और सुखों को देने वाले हो, महान कृपा करके मेरा यह अर्घ्य ग्रहण करो।'
श्लोक 52 (skanda.6.178.52)
चतुर्थे प्रहरे प्राप्ते तां गौरीं पंचपिंडिकाम् । भृंगराजेन संपूज्य मंत्रेणानेन भक्तितः
caturthe prahare prāpte tāṁ gaurīṁ paṁcapiṁḍikām bhṛṁgarājena saṁpūjya mantreṇānena bhaktitaḥ
चौथे प्रहर में उस पंचपिंडिका गौरी को भृंगराज के पुष्प से इसी मंत्र से भक्तिपूर्वक पूजना चाहिए।
श्लोक 53 (skanda.6.178.53)
पृथिव्यादीनि भूतानि यानि प्रोक्तानि पंच च । पंचरूपाणि देवेशि पूजां गृह्ण नमोऽस्तु ते
pṛthivyādīni bhūtāni yāni proktāni paṁca ca paṁcarūpāṇi deveśi pūjāṁ gṛhṇa namo'stu te
'पृथ्वी आदि जो पाँच तत्त्व कहे गए हैं, हे देवेशि! तुम उन्हीं पाँच रूपों में हो — मेरी पूजा स्वीकार करो, तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 54 (skanda.6.178.54)
नैवेद्ये घृतपूपांश्च दद्याद्देव्याः प्रभक्तितः । ग्रंथिचूर्णेन धूपं च ह्यर्घ्यं मदनजं फलम् । तदेव प्राशनं कार्यमर्घ्यमंत्रमिदं स्मृतम्
naivedye ghṛtapūpāṁśca dadyāddevyāḥ prabhaktitaḥ graṁthicūrṇena dhūpaṁ ca hyarghyaṁ madanajaṁ phalam tadeva prāśanaṁ kāryamarghyamaṁtramidaṁ smṛtam
देवी को नैवेद्य में घी में तली पूरियाँ भक्तिपूर्वक अर्पित करनी चाहिए; सोंठ के चूर्ण से धूप, और मदनफल से अर्घ्य देना चाहिए। उसी का प्राशन करना चाहिए, और यही अर्घ्य-मंत्र माना गया है।
श्लोक 55 (skanda.6.178.55)
पंचभूतमयी देवी पंचधा या व्यवस्थिता । अर्घ्यमेनं मया दत्तं सा गृह्णातु सुरेश्वरी
paṁcabhūtamayī devī paṁcadhā yā vyavasthitā arghyamenaṁ mayā dattaṁ sā gṛhṇātu sureśvarī
'पंचभूतमयी वह देवी, जो पाँच प्रकार से स्थित है, मेरे द्वारा दिया गया यह अर्घ्य ग्रहण करे — वह देवेश्वरी।'
श्लोक 56 (skanda.6.178.56)
एवं सर्वा निशा सा च गीतवाद्यादिनिःस्वनैः । तासां चैवाग्रतो नेया नैव निद्रां समाचरेत्
evaṁ sarvā niśā sā ca gītavādyādiniḥsvanaiḥ tāsāṁ caivāgrato neyā naiva nidrāṁ samācaret
इस प्रकार वह पूरी रात गीत, वाद्य आदि के स्वरों से उन देवियों के समक्ष बितानी चाहिए; निद्रा बिल्कुल नहीं लेनी चाहिए।
श्लोक 57 (skanda.6.178.57)
ततः प्रभाते विमले प्रोद्गते रविमण्डले । स्नात्वा संपूजयेद्विप्रं सह पत्न्या प्रभक्तितः
tataḥ prabhāte vimale prodgate ravimaṇḍale snātvā saṁpūjayedvipraṁ saha patnyā prabhaktitaḥ
फिर विमल प्रातःकाल होने पर, सूर्यमंडल के उदय होने पर, स्नान करके पत्नी सहित ब्राह्मण की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.6.178.58)
वस्त्रैराभरणैश्चैव स्वशक्त्या नृपनंदिनि । गौर्यै भक्ष्यं च दातव्यं मिष्टान्नेन शुचिस्मिते
vastrairābharaṇaiścaiva svaśaktyā nṛpanaṁdini gauryai bhakṣyaṁ ca dātavyaṁ miṣṭānnena śucismite
हे नृपनंदिनि! वस्त्रों और आभूषणों से यथाशक्ति उसका सम्मान करना चाहिए; हे शुचिस्मिते! गौरी को मिष्ठान्न का भोग भी अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 59 (skanda.6.178.59)
ततः करेणुमानीय वडवां वा सुमध्यमे । गौरीचतुष्टयं तच्च समारोप्य तथोपरि
tataḥ kareṇumānīya vaḍavāṁ vā sumadhyame gaurīcatuṣṭayaṁ tacca samāropya tathopari
फिर हे सुमध्यमे! एक हथिनी या घोड़ी लाकर, उन चारों गौरी-मूर्तियों को उसके ऊपर आरूढ़ कराना चाहिए।
श्लोक 60 (skanda.6.178.60)
गीतवादित्रशब्देन वेदध्वनियुतेन च । नद्यां वाऽथ तडागे वा वाप्यां वाथ परिक्षिपेत्
gītavāditraśabdena vedadhvaniyutena ca nadyāṁ vā'tha taḍāge vā vāpyāṁ vātha parikṣipet
गीत-वाद्य की ध्वनि और वेद-मंत्रों के घोष के साथ, उन्हें नदी में, अथवा तालाब में, अथवा बावड़ी में विसर्जित करना चाहिए।
श्लोक 61 (skanda.6.178.61)
मंत्रेणानेन सद्भक्त्या तवेदं वच्मि सुन्दरि
maṁtreṇānena sadbhaktyā tavedaṁ vacmi sundari
'हे सुंदरि! इसी मंत्र से, सच्ची भक्ति के साथ, मैं तुमसे यह कहता हूँ।'
श्लोक 62 (skanda.6.178.62)
आहूतासि मया देवि पूजितासि मया शुभे । मम सौभाग्यदानाय यथेष्टं गम्यतामिति
āhūtāsi mayā devi pūjitāsi mayā śubhe mama saubhāgyadānāya yatheṣṭaṁ gamyatāmiti
'हे देवि! तुम्हें मैंने आवाहित किया, हे शुभे! तुम्हारी पूजा भी मैंने की; अब मुझे सौभाग्य प्रदान करने के लिए तुम अपनी इच्छानुसार प्रस्थान करो।'
श्लोक 63 (skanda.6.178.63)
लक्ष्मीरुवाच । एवं मया कृता देव सा तृतीया यथोदिता । नभस्ये मासि संप्राप्ते भक्त्या परमया विभो
lakṣmīruvāca evaṁ mayā kṛtā deva sā tṛtīyā yathoditā nabhasye māsi saṁprāpte bhaktyā paramayā vibho
लक्ष्मी ने कहा — हे देव! इस प्रकार मैंने वह तृतीया-व्रत, जैसा कहा गया था, भाद्रपद मास में परम भक्ति के साथ संपन्न किया, हे विभो!
श्लोक 64 (skanda.6.178.64)
द्वितीये च तथा प्राप्ते तृतीये च विशेषतः । यावत्पश्यामि प्रत्यूषे तावद्गौरीचतुष्टयम् । जातं रत्नमयं तच्च मया यत्परिपूजितम्
dvitīye ca tathā prāpte tṛtīye ca viśeṣataḥ yāvatpaśyāmi pratyūṣe tāvadgaurīcatuṣṭayam jātaṁ ratnamayaṁ tacca mayā yatparipūjitam
दूसरे वर्ष और विशेष रूप से तीसरे वर्ष जब यह किया गया, तब जितनी बार मैं प्रातःकाल देखती, उतनी बार वह गौरी-चतुष्टय, जिसकी मैंने पूजा की थी, रत्नमय बना हुआ मिलता।
श्लोक 65 (skanda.6.178.65)
प्रस्थितां मां नदीतीरमुद्दिश्य च विसर्जनम् । करिष्यामीति सा प्राह व्यक्तीभूता सुरेश्वरी
prasthitāṁ māṁ nadītīramuddiśya ca visarjanam kariṣyāmīti sā prāha vyaktībhūtā sureśvarī
जब मैं विसर्जन के लिए नदी-तट की ओर प्रस्थान करने को थी, तब वह देवेश्वरी साक्षात् प्रकट होकर बोलीं।
श्लोक 66 (skanda.6.178.66)
मा पुत्रि जलमध्येऽत्र मम मूर्तिचतुष्टयम् । परिभावय मद्वाक्यं श्रुत्वा चैव विधीयताम्
mā putri jalamadhye'tra mama mūrticatuṣṭayam paribhāvaya madvākyaṁ śrutvā caiva vidhīyatām
'हे पुत्री! मेरी इन चारों मूर्तियों को जल में मत डालो; मेरा वचन सुनकर वैसा ही करो जैसा मैं कहती हूँ।'
श्लोक 67 (skanda.6.178.67)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे स्थापय त्वं च मा क्षिप । अक्षयं जायते येन सर्वस्त्रीणां हिताय च
hāṭakeśvaraje kṣetre sthāpaya tvaṁ ca mā kṣipa akṣayaṁ jāyate yena sarvastrīṇāṁ hitāya ca
'उन्हें हाटकेश्वर क्षेत्र में स्थापित करो, मत फेंको, जिससे यह अक्षय बने और समस्त स्त्रियों के हित के लिए हो।'
श्लोक 68 (skanda.6.178.68)
त्वं प्रार्थय वरं सर्वं ददाम्यहमिहार्चिता । अभ्यर्चिता गिरिसुता मया प्रोक्ता सुरेश्वरी
tvaṁ prārthaya varaṁ sarvaṁ dadāmyahamihārcitā abhyarcitā girisutā mayā proktā sureśvarī
'तुम जो चाहो वर माँगो, मैं यहाँ पूजित होकर सब कुछ दूँगी।' इस प्रकार भलीभाँति पूजित उस पर्वत-पुत्री देवेश्वरी से मैंने कहा।
श्लोक 69 (skanda.6.178.69)
यदि यच्छसि मे देवि वरं तुष्टा सुरेश्वरि । तदहं मानुषे गर्भे मा भूयासं कथंचन
yadi yacchasi me devi varaṁ tuṣṭā sureśvari tadahaṁ mānuṣe garbhe mā bhūyāsaṁ kathaṁcana
'हे देवि, हे सुरेश्वरि! यदि तुम प्रसन्न होकर मुझे वर देना चाहती हो, तो ऐसा करो कि मुझे फिर कभी मानव-गर्भ में जन्म न लेना पड़े।'
श्लोक 70 (skanda.6.178.70)
भर्त्ता भवतु मे विष्णुः शाश्वताभीष्टदः सदा । नान्यत्किंचिदभीष्टं मे राज्यं त्रिदिवशोभनम्
bhartā bhavatu me viṣṇuḥ śāśvatābhīṣṭadaḥ sadā nānyatkiṁcidabhīṣṭaṁ me rājyaṁ tridivaśobhanam
'मेरे पति सदा विष्णु ही हों, जो सनातन रूप से मेरी कामनाएँ पूर्ण करते रहें; मुझे और कुछ अभीष्ट नहीं, स्वर्ग-सा शोभायमान राज्य ही मेरी कामना है।'
श्लोक 71 (skanda.6.178.71)
अन्यापि कुरुते या च व्रतमेतत्समाहिता । सर्वैव्रतैर्यथातुष्टिस्तथा देवि प्रजायते
anyāpi kurute yā ca vratametatsamāhitā sarvaivratairyathātuṣṭistathā devi prajāyate
और जो अन्य कोई भी स्त्री एकाग्रचित्त होकर इस व्रत का पालन करती है, हे देवि! उसे भी सभी व्रतों के समान संतुष्टि प्राप्त होती है।
श्लोक 72 (skanda.6.178.72)
तथा तस्याः प्रकर्तव्यमेकेनानेन पार्वति । तथेति गौरी मामुक्त्वा ततश्चादर्शनं गता
tathā tasyāḥ prakartavyamekenānena pārvati tatheti gaurī māmuktvā tataścādarśanaṁ gatā
इस एक ही व्रत से, हे पार्वति! उसका सारा प्रयोजन पूर्ण हो जाता है। 'ऐसा ही हो' कहकर गौरी मुझसे यह कहकर अंतर्धान हो गईं।
श्लोक 73 (skanda.6.178.73)
सा देवी च मया तत्र तच्च गौरीचतुष्टयम् । हाटकेश्वरजे क्षेत्रे शुभे संस्थापितं विभो
sā devī ca mayā tatra tacca gaurīcatuṣṭayam hāṭakeśvaraje kṣetre śubhe saṁsthāpitaṁ vibho
हे विभो! तब मैंने उस देवी और उस चतुर्विध गौरी-मूर्ति को हाटकेश्वर के शुभ क्षेत्र में स्थापित कर दिया।
श्लोक 74 (skanda.6.178.74)
तत्प्रभावान्मया लब्धो भर्त्ता त्वं परमेश्वर । शाश्वतश्चाक्षयश्चैव मुखप्रेक्षश्च सर्वदा
tatprabhāvānmayā labdho bhartā tvaṁ parameśvara śāśvataścākṣayaścaiva mukhaprekṣaśca sarvadā
उसी के प्रभाव से, हे परमेश्वर! मुझे तुम्हारा साथ प्राप्त हुआ — सनातन, अक्षय पति, जो सदा मेरे मुख की ओर देखता रहता है।
श्लोक 75 (skanda.6.178.75)
एतत्सर्वमाख्यातं यत्पृष्टास्मि सुरेश्वर । सत्येनानेन देवेश तव पादौ स्पृशाम्यहम्
etatsarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭāsmi sureśvara satyenānena deveśa tava pādau spṛśāmyaham
हे सुरेश्वर! जो कुछ मुझसे पूछा गया, वह सब मैंने बता दिया। हे देवेश! इसी सत्य के साथ मैं तुम्हारे चरणों का स्पर्श करती हूँ।
श्लोक 76 (skanda.6.178.76)
सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः शंखचक्रगदाधरः । विहस्याथ महालक्ष्मीं तामुवाच प्रहर्षितः । मुहुर्मुहुः समालिंग्य वक्षसश्चोपरि स्थिताम्
sūta uvāca tacchrutvā vacanaṁ tasyāḥ śaṁkhacakragadādharaḥ vihasyātha mahālakṣmīṁ tāmuvāca prahaṛṣitaḥ muhurmuhuḥ samāliṁgya vakṣasaścopari sthitām
सूत जी ने कहा — उसकी यह बात सुनकर, शंख-चक्र-गदाधारी विष्णु, हँसते हुए और अत्यंत प्रसन्न होकर, अपने वक्षस्थल पर स्थित उस महालक्ष्मी को बार-बार आलिंगन करते हुए बोले।
श्लोक 77 (skanda.6.178.77)
साधुमाधु महाभागे सत्यमेतत्त्वयोदितम् । जानतापि मया पृष्टा भवतीं वरवर्णिनि
sādhumādhu mahābhāge satyametattvayoditam jānatāpi mayā pṛṣṭā bhavatīṁ varavarṇini
'साधु, साधु, हे महाभागे! तुमने जो कहा वह सत्य है। हे वरवर्णिनि! यह सब जानते हुए भी मैंने तुमसे यह पूछा था।'
श्लोक 78 (skanda.6.178.78)
सूत उवाच । एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि द्विजोत्तमाः । चतुर्भुजा यथा गौरी संजाता पंचपिंडिका
sūta uvāca etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi dvijottamāḥ caturbhujā yathā gaurī saṁjātā paṁcapiṁḍikā
सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो! जो कुछ मुझसे पूछा गया, वह सब मैंने बता दिया — किस प्रकार चतुर्भुजा गौरी पंचपिंडिका के रूप में प्रकट हुईं।
श्लोक 79 (skanda.6.178.79)
यश्चैतत्पठते भक्त्या प्रातरुत्थाय मानवः । न स लक्ष्म्या विमुच्येत न च दौर्भाग्यमाप्नुयात्
yaścaitatpaṭhate bhaktyā prātarutthāya mānavaḥ na sa lakṣmyā vimucyeta na ca daurbhāgyamāpnuyāt
जो कोई मनुष्य प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक इसे पढ़ता है, वह लक्ष्मी से कभी वंचित नहीं होता, और न ही दुर्भाग्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 80 (skanda.6.178.80)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पठनीयमिदं शुभम् । आख्यानं गौरिकं विप्रा यन्मया परिकीर्तितम्
tasmātsarvaprayatnena paṭhanīyamidaṁ śubham ākhyānaṁ gaurikaṁ viprā yanmayā parikīrtitam
अतः हे विप्रो! इस शुभ, गौरी संबंधी आख्यान को, जो मैंने कहा है, सब प्रकार से प्रयत्नपूर्वक पढ़ना चाहिए।