नागर खण्ड · अध्याय 179
पुष्करत्रय-उत्पत्ति एवं यज्ञ-समारंभ वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.179.1)
सूत उवाच । तथान्यदपि तत्रास्ति पुष्करत्रितयं शुभम् । हाटकेश्वरजे क्षेत्रे सर्वपातकनाशनम्
sūta uvāca tathānyadapi tatrāsti puṣkaratritayaṁ śubham hāṭakeśvaraje kṣetre sarvapātakanāśanam
सूत जी ने कहा — वहाँ एक और भी वस्तु है — शुभ पुष्करत्रय, जो हाटकेश्वर क्षेत्र में स्थित है और समस्त पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.6.179.2)
यस्मिन्दृष्टेऽथवा स्पृष्टे कीर्तिते वा द्विजोत्तमाः । पातकं नाशमायाति भास्करेण तमो यथा
yasmindṛṣṭe'thavā spṛṣṭe kīrtite vā dvijottamāḥ pātakaṁ nāśamāyāti bhāskareṇa tamo yathā
हे द्विजोत्तमो! जिसके दर्शन, स्पर्श, या कीर्तन मात्र से ही पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जैसे सूर्य से अंधकार नष्ट हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.6.179.3)
पुनंति सर्वतीर्थानि स्नानाद्दानादसंशयम् । पुष्करालोकनादेव सर्वपापैः प्रमुच्यते
punaṁti sarvatīrthāni snānāddānādasaṁśayam puṣkarālokanādeva sarvapāpaiḥ pramucyate
समस्त तीर्थ स्नान और दान से निःसंदेह पवित्र करते हैं, परंतु पुष्कर के दर्शन मात्र से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 4 (skanda.6.179.4)
ऋषय ऊचुः । श्रूयते पुष्करंनाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । ब्रह्मणा निर्मितं तत्र यच्च योजनमात्रकम्
ṛṣaya ūcuḥ śrūyate puṣkaraṁnāma tīrthaṁ trailokyaviśrutam brahmaṇā nirmitaṁ tatra yacca yojanamātrakam
ऋषियों ने कहा — हमने सुना है कि पुष्कर नाम का एक तीर्थ है, जो त्रिलोक में विख्यात है, ब्रह्मा द्वारा निर्मित है, और एक योजन मात्र विस्तार का है।
श्लोक 5 (skanda.6.179.5)
उत्तरे चन्द्रभागाया नद्या यावत्सरस्वती । दक्षिणे करतोयायाः सीमेयं पुष्करत्रये
uttare candrabhāgāyā nadyā yāvatsarasvatī dakṣiṇe karatoyāyāḥ sīmeyaṁ puṣkaratraye
उत्तर में चंद्रभागा नदी से लेकर सरस्वती तक, दक्षिण में करतोया नदी तक — यही पुष्करत्रय की सीमा है।
श्लोक 6 (skanda.6.179.6)
अस्माकं तु पुरा सूत त्वयोक्तं वियति स्थितम् । एतन्नः कौतुकं सूत तत्कथं हाटकेश्वरे । तत्र क्षेत्रे समायातं तस्मात्त्वं वक्तुमर्हसि
asmākaṁ tu purā sūta tvayoktaṁ viyati sthitam etannaḥ kautukaṁ sūta tatkathaṁ hāṭakeśvare tatra kṣetre samāyātaṁ tasmāttvaṁ vaktumarhasi
हे सूत! पहले तुमने हमें बताया था कि यह आकाश में स्थित है; हे सूत! हमें यह कौतुक है कि वह हाटकेश्वर क्षेत्र में कैसे आ पहुँचा — इसलिए तुम्हें यह बताना चाहिए।
श्लोक 7 (skanda.6.179.7)
सूत उवाच । सत्यमेतन्महाभागा यद्भवद्भिरुदाहृतम् । तस्मिन्क्षेत्रे द्विजश्रेष्ठास्तच्छृणुध्वं समाहिताः
sūta uvāca satyametanmahābhāgā yadbhavadbhirudāhṛtam tasminkṣetre dvijaśreṣṭhāstacchṛṇudhvaṁ samāhitāḥ
सूत जी ने कहा — हे महाभागो! जो आपने कहा, वह सत्य है। हे द्विजश्रेष्ठो! उस क्षेत्र के विषय में, एकाग्रचित्त होकर सुनिए।
श्लोक 8 (skanda.6.179.8)
सर्वतो विस्तराद्वच्मि नमस्कृत्य स्वयंभुवम्
sarvato vistarādvacmi namaskṛtya svayaṁbhuvam
स्वयंभू ब्रह्मा को नमस्कार करके, मैं तुम्हें यह पूरा विस्तार से बताता हूँ।
श्लोक 9 (skanda.6.179.9)
ब्रह्मलोके निवसतो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । देवर्षिर्नारदः प्राप्तो भ्रांत्वा लोकत्रयं मुनिः
brahmaloke nivasato brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ devarṣirnāradaḥ prāpto bhrāṁtvā lokatrayaṁ muniḥ
एक बार जब ब्रह्मलोक में अव्यक्त-जन्मा ब्रह्मा निवास कर रहे थे, तब त्रिलोक का भ्रमण करके देवर्षि नारद वहाँ पधारे।
श्लोक 10 (skanda.6.179.10)
स नत्वा शिरसा पादावुपविष्टस्तदग्रतः
sa natvā śirasā pādāvupaviṣṭastadagrataḥ
उन्होंने सिर झुकाकर उनके चरणों को प्रणाम किया, और फिर उनके सामने बैठ गए।
श्लोक 11 (skanda.6.179.11)
ब्रह्मोवाच । कस्माद्वत्स चिराद्दृष्टः कुतः प्राप्तोऽधुना भवान् । क्व भ्रांतस्त्वं समाचक्ष्व ब्रूहि वत्सात्र कारणम्
brahmovāca kasmādvatsa cirāddṛṣṭaḥ kutaḥ prāpto'dhunā bhavān kva bhrāṁtastvaṁ samācakṣva brūhi vatsātra kāraṇam
ब्रह्मा जी ने कहा — हे वत्स! बहुत काल बाद तुम दिखाई दिए हो; अभी तुम कहाँ से आए हो, कहाँ भ्रमण कर रहे थे — बताओ, हे वत्स, इसका कारण क्या है।
श्लोक 12 (skanda.6.179.12)
नारद उवाच । मर्त्यलोकाद्विभो प्राप्तः सांप्रतं च त्वरान्वितः । तव पादप्रपूजार्थं सत्येनात्मानमालभे
nārada uvāca martyalokādvibho prāptaḥ sāṁprataṁ ca tvarānvitaḥ tava pādaprapūjārthaṁ satyenātmānamālabhe
नारद ने कहा — हे विभो! अभी मैं मृत्युलोक से शीघ्रतापूर्वक आया हूँ; आपके चरणों की पूजा के लिए मैं सत्यनिष्ठा से स्वयं को समर्पित करता हूँ।
श्लोक 13 (skanda.6.179.13)
ब्रह्मोवाच । किंवदन्तीं ममाचक्ष्व मर्त्यलोकसमुद्भवाम् । कीदृशाः पार्थिवास्तत्र कीदृशा द्विजसत्तमाः । कीदृशा व्यवहाराश्च वर्तन्ते तत्र सांप्रतम्
brahmovāca kiṁvadantīṁ mamācakṣva martyalokasamudbhavām kīdṛśāḥ pārthivāstatra kīdṛśā dvijasattamāḥ kīdṛśā vyavahārāśca vartante tatra sāṁpratam
ब्रह्मा जी ने कहा — मृत्युलोक की कथा मुझे सुनाओ; वहाँ राजा कैसे हैं, श्रेष्ठ द्विज कैसे हैं, और अभी वहाँ किस प्रकार के व्यवहार प्रचलित हैं?
श्लोक 14 (skanda.6.179.14)
नारद उवाच । मर्त्यलोके कलिर्जातः सांप्रतं सुरसत्तम
nārada uvāca martyaloke kalirjātaḥ sāṁprataṁ surasattama
नारद ने कहा — हे सुरश्रेष्ठ! मृत्युलोक में अभी कलियुग का आरंभ हो चुका है।
श्लोक 15 (skanda.6.179.15)
राजानः सत्पथं त्यक्त्वा तथा लोभपरायणाः । पीडयंति च लोकांश्च अर्थहेतोः सुनिर्घृणाः
rājānaḥ satpathaṁ tyaktvā tathā lobhaparāyaṇāḥ pīḍayaṁti ca lokāṁśca arthahetoḥ sunirghṛṇāḥ
राजा सत्पथ को त्यागकर लोभ में लीन हैं, और धन के लोभ से निर्दयतापूर्वक प्रजा को पीड़ित करते हैं।
श्लोक 16 (skanda.6.179.16)
शौर्यभावपरित्यक्ताः परदारविमर्दकाः । पूजयन्ति न ते विप्रान्न देवान्न गुरूनपि
śauryabhāvaparityaktāḥ paradāravimardakāḥ pūjayanti na te viprānna devānna gurūnapi
वे शौर्य-भाव से रहित होकर पराई स्त्रियों का उत्पीड़न करते हैं; न वे ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं, न देवताओं का, न गुरुओं का।
श्लोक 17 (skanda.6.179.17)
वेदविक्रयकर्तारो ब्राह्मणाः शौचवर्जिताः । पापप्रतिग्रहासक्ताः सन्ध्याहीनाः सुनिर्घृणाः
vedavikrayakartāro brāhmaṇāḥ śaucavarjitāḥ pāpapratigrahāsaktāḥ sandhyāhīnāḥ sunirghṛṇāḥ
ब्राह्मण वेद का विक्रय करने वाले, शौच से रहित, पापपूर्ण दान ग्रहण करने में आसक्त, संध्या-वंदन से रहित, और निर्दय हो गए हैं।
श्लोक 18 (skanda.6.179.18)
कृषिकर्मरता नित्यं वैश्यवत्पशुपालकाः । वैश्याः सर्वे समुच्छेदं प्रयाता धरणीतले
kṛṣikarmaratā nityaṁ vaiśyavatpaśupālakāḥ vaiśyāḥ sarve samucchedaṁ prayātā dharaṇītale
(ब्राह्मण) सदा खेती-बाड़ी में लगे रहते हैं, और पशुपालकों की भाँति व्यवहार करते हैं; वैश्य सब पृथ्वी पर विनाश की ओर बढ़ चले हैं।
श्लोक 19 (skanda.6.179.19)
शूद्रा नित्यं धर्मकामाः शूद्राश्चैव तपस्विनः । लोकयात्राक्रियाः सर्वे प्रहसंति व्यपत्रपाः
śūdrā nityaṁ dharmakāmāḥ śūdrāścaiva tapasvinaḥ lokayātrākriyāḥ sarve prahasaṁti vyapatrapāḥ
शूद्र सदा धर्म की इच्छा रखते और तपस्वी बने रहते हैं (जो उनका अधिकार नहीं है); लोक-मर्यादा के आचरण करने वाले सब लोग निर्लज्ज होकर उनका उपहास करते हैं।
श्लोक 20 (skanda.6.179.20)
यस्य चास्ति गृहे वित्तं तरुण्यश्च तथा स्त्रियः । तेनतेन समं सख्यं प्रकुर्वन्ति नरा भुवि
yasya cāsti gṛhe vittaṁ taruṇyaśca tathā striyaḥ tenatena samaṁ sakhyaṁ prakurvanti narā bhuvi
जिसके घर में धन हो और युवा स्त्रियाँ हों, पृथ्वी पर लोग उसी से मित्रता करते हैं।
श्लोक 21 (skanda.6.179.21)
विधवानां व्रतस्थानां सर्वेषां लिंगिनां तथा । हृदि स्थितो महान्कामो व्रतचर्याबहिःस्थिताः
vidhavānāṁ vratasthānāṁ sarveṣāṁ liṁgināṁ tathā hṛdi sthito mahānkāmo vratacaryābahiḥsthitāḥ
विधवाओं में, व्रतधारियों में, तथा समस्त लिंगधारी (साधु-वेशधारी) लोगों में भी हृदय में महान काम-भाव व्याप्त है, जबकि वे बाहर से व्रताचरण दिखाते हैं।
श्लोक 22 (skanda.6.179.22)
तीर्थानि विप्लवं यांति पापलोकश्रितानि च । कलेर्भीतानि सर्वाणि प्रद्रवन्ति दिशो दश
tīrthāni viplavaṁ yāṁti pāpalokaśritāni ca kalerbhītāni sarvāṇi pradravanti diśo daśa
तीर्थ भी विनाश की ओर बढ़ रहे हैं, पापी लोगों के आश्रय बन गए हैं; कलि से भयभीत होकर सभी तीर्थ दसों दिशाओं में भागे जा रहे हैं।
श्लोक 23 (skanda.6.179.23)
अहं तत्र स्थितो यस्मात्कलिकाले पितामह
ahaṁ tatra sthito yasmātkalikāle pitāmaha
हे पितामह! चूँकि मैं भी इसी कलिकाल में वहाँ स्थित था —
श्लोक 24 (skanda.6.179.24)
कलिकाले विशेषेण स्वैरिण्यो ललितस्पृहाः । भर्त्रा विवदमानाश्च स्त्रियः कार्मणतत्पराः । वृथा व्रतानि कुर्वंति त्यक्त्वा ताः स्वपतेः कथाम्
kalikāle viśeṣeṇa svairiṇyo lalitaspṛhāḥ bhartrā vivadamānāśca striyaḥ kārmaṇatatparāḥ vṛthā vratāni kurvaṁti tyaktvā tāḥ svapateḥ kathām
— कलिकाल में विशेषतः स्त्रियाँ स्वच्छंद, विलासिता की लालसा रखने वाली, अपने पति से झगड़ने वाली, तथा जादू-टोने में लीन हो गई हैं; अपने पति की बात को त्यागकर वे व्यर्थ के व्रत करती हैं।
श्लोक 25 (skanda.6.179.25)
कलिर्बलिष्ठः सुतरां वरदानेन ते कृतः । यदा मर्त्ये भवेद्युद्धं कंडूतिर्जायते हृदि
kalirbaliṣṭhaḥ sutarāṁ varadānena te kṛtaḥ yadā martye bhavedyuddhaṁ kaṇḍūtirjāyate hṛdi
आपके वरदान से कलि अत्यंत बलवान हो गया है। जब मृत्युलोक में युद्ध होता है, तो कलि के हृदय में गुदगुदी होने लगती है।
श्लोक 26 (skanda.6.179.26)
स्वर्गे वा मस्तके चैव पाताले चाथ पादयोः । सांप्रतं मर्त्यलोके च मया दृष्टमनेकशः
svarge vā mastake caiva pātāle cātha pādayoḥ sāṁprataṁ martyaloke ca mayā dṛṣṭamanekaśaḥ
स्वर्ग में उसका सिर, और पाताल में उसके पैर स्थित हैं; अभी मृत्युलोक में मैंने ऐसा अनेक बार देखा है।
श्लोक 27 (skanda.6.179.27)
श्वश्रूणां च वधूनां च तथा जनकपुत्रयोः । बांधवानां विशेषेण तथा च स्वामिभृत्ययोः
śvaśrūṇāṁ ca vadhūnāṁ ca tathā janakaputrayoḥ bāṁdhavānāṁ viśeṣeṇa tathā ca svāmibhṛtyayoḥ
सासों और बहुओं के बीच, तथा पिता और पुत्र के बीच, विशेष रूप से भाई-बंधुओं के बीच, तथा स्वामी और सेवक के बीच —
श्लोक 28 (skanda.6.179.28)
चौराणां पार्थिवानां च दम्पत्योश्च विशेषतः । स्वल्पोदकास्तथा मेघाः स्वल्पसस्या च मेदिनी
caurāṇāṁ pārthivānāṁ ca dampatyoścca viśeṣataḥ svalpodakāstathā meghāḥ svalpasasyā ca medinī
— चोरों और राजाओं के बीच, तथा विशेष रूप से पति-पत्नी के बीच कलह होता है; बादल अल्प जल वाले हैं, और पृथ्वी अल्प फसल वाली हो गई है।
श्लोक 29 (skanda.6.179.29)
स्वल्पक्षीरास्तथा गावः क्षीरे सर्पिर्न विद्यते । एवं युद्धानि तेषां च वीक्षमाणो दिवानिशम्
svalpakṣīrāstathā gāvaḥ kṣīre sarpirna vidyate evaṁ yuddhāni teṣāṁ ca vīkṣamāṇo divāniśam
गौएँ अल्प दूध देने वाली हो गई हैं, और उस दूध में घी नहीं बनता। इस प्रकार इन सबके कलह को दिन-रात देखते हुए —
श्लोक 30 (skanda.6.179.30)
अहं मर्त्ये परिभ्रांतश्चिरात्तेन समागतः । भूयो यास्यामि तत्रैव कण्डूतिर्महतीस्थिता
ahaṁ martye paribhrāṁtaściraṁtena samāgataḥ bhūyo yāsyāmi tatraiva kaṇḍūtirmahatīsthitā
— मैं भी बहुत काल तक मृत्युलोक में भ्रमण करता रहा, इसीलिए यहाँ आया हूँ। मैं फिर वहीं जाऊँगा, क्योंकि कलि के हृदय में महान गुदगुदी बनी हुई है।
श्लोक 31 (skanda.6.179.31)
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य नारदस्य पितामहः । पुष्करस्य कृते जातश्चिन्ताव्याकुलतेंद्रियः
tacchrutvā vacanaṁ tasya nāradasya pitāmahaḥ puṣkarasya kṛte jātaściṁtāvyākulateṁdriyaḥ
नारद का यह वचन सुनकर पितामह ब्रह्मा पुष्कर तीर्थ के विषय में चिंता से व्याकुल-इंद्रिय हो गए।
श्लोक 32 (skanda.6.179.32)
मर्त्ये च मामकं तीर्थं पुष्करंनाम विश्रुतम् । नाशं यास्यति तन्नूनं कलिकालपरिप्लुतम्
martye ca māmakaṁ tīrthaṁ puṣkaraṁnāma viśrutam nāśaṁ yāsyati tannūnaṁ kalikālapariplutam
उन्होंने सोचा — मृत्युलोक में मेरा वह विख्यात तीर्थ पुष्कर, कलिकाल में प्लावित होकर निश्चय ही नाश को प्राप्त हो जाएगा।
श्लोक 33 (skanda.6.179.33)
तस्मादन्यत्र नेष्यामि कलिर्यत्र न विद्यते । येन तत्र विमुंचामि निजं तीर्थं च पुष्करम्
tasmādanyatra neṣyāmi kaliryatra na vidyate yena tatra vimuṁcāmi nijaṁ tīrthaṁ ca puṣkaram
अतः मैं इसे कहीं और ले जाऊँगा, जहाँ कलि का अस्तित्व न हो, जिससे मैं अपने इस पुष्कर तीर्थ को वहाँ स्थापित कर दूँ।
श्लोक 34 (skanda.6.179.34)
कलिकाले च संप्राप्ते सर्वप्राणिभयंकरे । तत्र प्रयांतु तीर्थानि सर्वाण्येव विशेषतः
kalikāle ca saṁprāpte sarvaprāṇibhayaṁkare tatra prayāṁtu tīrthāni sarvāṇyeva viśeṣataḥ
जब वह सभी प्राणियों को भयभीत करने वाला कलिकाल आ जाएगा, तो समस्त तीर्थ भी वहीं जा पहुँचेंगे।
श्लोक 35 (skanda.6.179.35)
गते कलौ प्रयास्यंति निजस्थानमसंशयम्
gate kalau prayāsyaṁti nijasthānamasaṁśayam
और जब कलि का अंत होगा, तो वे निःसंदेह अपने-अपने स्थान को लौट जाएँगे।
श्लोक 36 (skanda.6.179.36)
एवं निश्चित्य मनसा हस्तस्थं कमलं ततः । प्रोवाच सादरं तच्च स्वयं ध्यात्वा पितामहः
evaṁ niścitya manasā hastasthaṁ kamalaṁ tataḥ provāca sādaraṁ tacca svayaṁ dhyātvā pitāmahaḥ
मन में ऐसा निश्चय करके, पितामह ब्रह्मा ने स्वयं ध्यान करके अपने हाथ में स्थित कमल से आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 37 (skanda.6.179.37)
पत त्वं पद्म भूपृष्ठे कलिर्यत्र न विद्यते । येनानयामि तत्रैव पुष्करं तीर्थमात्मनः
pata tvaṁ padma bhūpṛṣṭhe kaliryatra na vidyate yenānayāmi tatraiva puṣkaraṁ tīrthamātmanaḥ
हे कमल! तुम पृथ्वी की पीठ पर वहाँ गिरो, जहाँ कलि का अस्तित्व न हो, जिससे मैं अपने पुष्कर तीर्थ को वहीं ले आऊँ।
श्लोक 38 (skanda.6.179.38)
ततस्तत्प्रेषितं तेन पद्मं भ्रांत्वा महीतले । समस्ते पतितं क्षेत्रे हाटकेश्वरसंभवे
tatastatpreṣitaṁ tena padmaṁ bhrāṁtvā mahītale samaste patitaṁ kṣetre hāṭakeśvarasaṁbhave
तब उनके द्वारा भेजा गया वह कमल पृथ्वी पर घूमकर, अंततः हाटकेश्वर नामक उस संपूर्ण क्षेत्र में जा गिरा।
श्लोक 39 (skanda.6.179.39)
दृष्ट्वा वेदविदो विप्रान्स्वाध्यायनिरताञ्छुचीन् । तेषां यज्ञक्रियाभिश्च यज्ञोपांतैः समंततः
dṛṣṭvā vedavido viprānsvādhyāyaniratāñchucīn teṣāṁ yajñakriyābhiśca yajñopāṁtaiḥ samaṁtataḥ
वहाँ उसने वेदज्ञ, स्वाध्याय में लीन और पवित्र ब्राह्मणों को देखा; उनके यज्ञ-कर्मों तथा यज्ञ-सामग्रियों से वह सारा स्थान चारों ओर व्याप्त था।
श्लोक 40 (skanda.6.179.40)
यूपाद्यैः सर्वतो व्याप्ते सदिशे गगनांगणे । ऋग्यजुःसामघोषेण तथा चाथर्वजेन च
yūpādyaiḥ sarvato vyāpte sadiśe gaganāṁgaṇe ṛgyajuḥsāmaghoṣeṇa tathā cātharvajena ca
सैकड़ों यज्ञ-स्तंभों से सब ओर घिरे हुए उस स्थान में, आकाश-प्रांगण ऋग्, यजुर्, साम तथा अथर्व वेद की ध्वनियों से गूँज रहा था।
श्लोक 41 (skanda.6.179.41)
दिग्मण्डले तथा व्याप्ते नान्यः संश्रूयते ध्वनिः । तथा च तार्किकाणां च विवादेषु महत्सु च
digmaṇḍale tathā vyāpte nānyaḥ saṁśrūyate dhvaniḥ tathā ca tārkikāṇāṁ ca vivādeṣu mahatsu ca
पूरा दिशाओं का घेरा इसी से इस प्रकार भर गया था कि अन्य कोई ध्वनि सुनाई नहीं देती थी; और वहाँ तार्किकों के महान वाद-विवाद भी चल रहे थे।
श्लोक 42 (skanda.6.179.42)
वेदांतानां समस्तानां व्याख्याने बहुधा कृते । दृश्यन्ते मुनयो यत्र संस्थिता नियमेषु च
vedāṁtānāṁ samastānāṁ vyākhyāne bahudhā kṛte dṛśyante munayo yatra saṁsthitā niyameṣu ca
जहाँ संपूर्ण वेदांत के विविध प्रकार से व्याख्यान हो रहे थे, और जहाँ मुनि विभिन्न नियमों में स्थित दिखाई देते थे।
श्लोक 43 (skanda.6.179.43)
एकाहारा निराहारा एकांतरकृताशनाः । त्रिरात्रोपोषिताश्चान्ये कृच्छ्रचांद्रायणे रताः
ekāhārā nirāhārā ekāntarakṛtāśanāḥ trirātropoṣitāścānye kṛcchracāṁdrāyaṇe ratāḥ
कुछ एक बार भोजन करने वाले, कुछ पूर्ण उपवासी, कुछ एक दिन छोड़कर भोजन करने वाले; अन्य कुछ तीन रात के उपवास वाले, और कृच्छ्र-चांद्रायण व्रत में रत।
श्लोक 44 (skanda.6.179.44)
महापाराकिणश्चान्ये तथा मासोपवासिनः । अश्मकुट्टाशिनश्चान्ये दन्तोलूखलिकास्तथा
mahāpārākiṇaścānye tathā māsopavāsinaḥ aśmakuṭṭāśinaścānye dantolūkhalikāstathā
अन्य कुछ महापाराक (बारह दिवसीय उपवास) करने वाले, कुछ मासभर उपवास रखने वाले; अन्य पत्थर से कूटा हुआ अन्न खाने वाले, और दाँतों को ही मूसल की तरह प्रयोग करने वाले तपस्वी।
श्लोक 45 (skanda.6.179.45)
शीर्णपर्णाशिनश्चैके फलाहारा महर्षयः । तद्दृष्ट्वा तादृशं क्षेत्रं संयुक्तं विविधैर्गुणैः
śīrṇaparṇāśinaścaike phalāhārā maharṣayaḥ taddṛṣṭvā tādṛśaṁ kṣetraṁ saṁyuktaṁ vividhairguṇaiḥ
कुछ महर्षि सूखे पत्ते खाने वाले, और कुछ केवल फलों का आहार लेने वाले थे। ऐसे विविध गुणों से युक्त उस क्षेत्र को देखकर —
श्लोक 46 (skanda.6.179.46)
ततस्तत्पतितं तत्र पुण्यं ज्ञात्वा महीतले । यत्र स्थानेऽपतत्पूर्वं तस्मादुच्चलितं पुनः
tatastatpatitaṁ tatra puṇyaṁ jñātvā mahītale yatra sthāne'patatpūrvaṁ tasmāducchalitaṁ punaḥ
— उस पवित्र भूमि पर गिरा हुआ वह कमल, जिस स्थान पर पहले गिरा था, वहाँ से पुनः उछल गया।
श्लोक 47 (skanda.6.179.47)
अन्यस्मिंश्च ततः स्थाने द्वितीये द्विजसत्तमाः । तस्मादपि तृतीये तु तृतीयं पंकजं हितम्
anyasmiṁśca tataḥ sthāne dvitīye dvijasattamāḥ tasmādapi tṛtīye tu tṛtīyaṁ paṁkajaṁ hitam
हे द्विजसत्तमो! फिर वह दूसरे स्थान पर गिरा, और उससे भी उछलकर तीसरे स्थान पर तीसरी बार वह कमल स्थिर हुआ।
श्लोक 48 (skanda.6.179.48)
ततो गर्तात्रयं जातं तेषु स्थानेषु च त्रिषु । गर्तासु च जलं जातं स्वच्छं स्फटिकसंनिभम्
tato gartātrayaṁ jātaṁ teṣu sthāneṣu ca triṣu gartāsu ca jalaṁ jātaṁ svacchaṁ sphaṭikasaṁnibham
उन तीनों स्थानों में तीन गड्ढे बन गए, और उन गड्ढों में स्फटिक के समान स्वच्छ जल भर गया।
श्लोक 49 (skanda.6.179.49)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तः स्वयमेव पितामहः । तत्र स्थाने द्विजश्रेष्ठा यज्ञकर्मप्रसिद्धये
etasminnaṁtare prāptaḥ svayameva pitāmahaḥ tatra sthāne dvijaśreṣṭhā yajñakarmaprasiddhaye
इसी बीच, हे द्विजश्रेष्ठो! स्वयं पितामह ब्रह्मा उस स्थान पर यज्ञकर्म की सिद्धि के लिए स्वयं पधारे।
श्लोक 50 (skanda.6.179.50)
दृष्ट्वा समंततः क्षेत्रं हाटकेश्वरसंज्ञितम् । नानाविप्रैः समाकीर्णं वेदवेदांगपारगैः । तपस्विभिस्तथानेकैर्व्रतचर्यापरायणैः
dṛṣṭvā samaṁtataḥ kṣetraṁ hāṭakeśvarasaṁjñitam nānāviprairsamākīrṇaṁ vedavedāṁgapāragaiḥ tapasvibhistathānekairvratacaryāparāyaṇaiḥ
उस चारों ओर से हाटकेश्वर नामक क्षेत्र को देखा, जो वेद-वेदांग के पारंगत अनेक ब्राह्मणों से भरा हुआ था, और अनेक व्रताचरण में रत तपस्वियों से युक्त था।
श्लोक 51 (skanda.6.179.51)
अहो क्षेत्रमहो क्षेत्रं पुण्यं रम्यं द्विजप्रियम् । तस्मायज्ञं करिष्यामि क्षेत्रेऽस्मिंश्च द्विजाश्रये
aho kṣetramaho kṣetraṁ puṇyaṁ ramyaṁ dvijapriyam tasmāyajñaṁ kariṣyāmi kṣetre'smiṁśca dvijāśraye
— उन्होंने कहा — अहो, क्या क्षेत्र है, कैसा पवित्र, रमणीय, द्विजप्रिय क्षेत्र है! अतः इसी द्विजाश्रित क्षेत्र में मैं यज्ञ करूँगा।
श्लोक 52 (skanda.6.179.52)
आनयिष्यामि तच्चापि पुष्करत्रितयं शुभम् । गर्तास्वेतासु पुण्यासु ज्येष्ठं मध्यं कनीयकम्
ānayiṣyāmi taccāpi puṣkaratritayaṁ śubham gartāsvetāsu puṇyāsu jyeṣṭhaṁ madhyaṁ kanīyakam
और मैं उस शुभ पुष्करत्रय को भी यहाँ ले आऊँगा — इन्हीं पवित्र गड्ढों में ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ पुष्कर को स्थापित करूँगा।
श्लोक 53 (skanda.6.179.53)
कलिकाले च संप्राप्ते येन लोपं न गच्छति । स्वयं निश्चित्य मनसा चोपविश्य धरातले
kalikāle ca saṁprāpte yena lopaṁ na gacchati svayaṁ niścitya manasā copaviśya dharātale
जिससे कलिकाल के आने पर भी इसका लोप न हो। मन में ऐसा स्वयं निश्चय करके, वे पृथ्वी पर बैठ गए।
श्लोक 54 (skanda.6.179.54)
ध्यात्वा च सुचिरं कालमानयामास तत्र च । पुष्करत्रितयं श्रेष्ठं ज्येष्ठमध्यकनीयकम्
dhyātvā ca suciraṁ kālamānayāmāsa tatra ca puṣkaratritayaṁ śreṣṭhaṁ jyeṣṭhamadhyakanīyakam
और बहुत देर तक ध्यान करके, उन्होंने वहाँ श्रेष्ठ पुष्करत्रय — ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ — को ला दिया।
श्लोक 55 (skanda.6.179.55)
ततोऽब्रवीत्स हृष्टात्मा ह्येतद्धि पुष्करत्रयम् । मया सम्यक्समानीतं कलिकालभयेन च
tato'bravītsa hṛṣṭātmā hyetaddhi puṣkaratrayam mayā samyaksamānītaṁ kalikālabhayena ca
फिर प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने कहा — यह पुष्करत्रय मैंने कलिकाल के भय से भलीभाँति यहाँ ला दिया है।
श्लोक 56 (skanda.6.179.56)
येऽत्र स्नानं करिष्यंति श्रद्धया परया युताः । ते यास्यंति परां सिद्धिमक्षयां मत्प्रसादतः
ye'tra snānaṁ kariṣyaṁti śraddhayā parayā yutāḥ te yāsyaṁti parāṁ siddhimakṣayāṁ matprasādataḥ
जो कोई यहाँ परम श्रद्धा के साथ स्नान करेंगे, वे मेरी कृपा से परम अक्षय सिद्धि को प्राप्त होंगे।
श्लोक 57 (skanda.6.179.57)
ये च श्राद्धं करिष्यंति कार्तिक्यां सुसमाहिताः । करिष्यंति गयाशीर्षे तेषां पुण्यं महत्तमम्
ye ca śrāddhaṁ kariṣyaṁti kārtikyāṁ susamāhitāḥ kariṣyaṁti gayāśīrṣe teṣāṁ puṇyaṁ mahattamam
जो कोई कार्तिक पूर्णिमा को एकाग्रचित्त होकर यहाँ श्राद्ध करेंगे, उनका पुण्य गया-शीर्ष में किए गए श्राद्ध से भी बढ़कर होगा।
श्लोक 58 (skanda.6.179.58)
तत्राद्यात्पुष्करात्पुण्यं लभिष्यंति शताधिकम् । मया यज्ञः कृतस्तत्र कार्तिक्यां पूर्वपुष्करे
tatrādyātpuṣkarātpuṇyaṁ labhiṣyaṁti śatādhikam mayā yajñaḥ kṛtastatra kārtikyāṁ pūrvapuṣkare
वहाँ, उस प्रथम पुष्कर से, वे सौ गुना अधिक पुण्य प्राप्त करेंगे; मैंने ही वहाँ कार्तिक पूर्णिमा को प्रथम पुष्कर में यज्ञ किया है।
श्लोक 59 (skanda.6.179.59)
वैशाख्यां च करिष्यामि अत्राहं च द्वितीयके
vaiśākhyāṁ ca kariṣyāmi atrāhaṁ ca dvitīyake
और वैशाख पूर्णिमा को मैं यहाँ दूसरे पुष्कर में भी यज्ञ करूँगा।
श्लोक 60 (skanda.6.179.60)
एवमुक्त्वा ततो ब्रह्मा ह्यादिदेश सदागतिम् । ममादेशाद्द्रुतं वायो समानय पुरंदरम्
evamuktvā tato brahmā hyādideśa sadāgatim mamādeśāddrutaṁ vāyo samānaya puraṁdaram
ऐसा कहकर ब्रह्मा जी ने सदागति (वायु) को आदेश दिया — हे वायु! मेरी आज्ञा से शीघ्र इंद्र को यहाँ ले आओ।
श्लोक 61 (skanda.6.179.61)
आदित्यैर्वसुभिः सार्धं रुद्रैश्चैव मरुद्गणैः । गंधर्वैर्लोकपालैश्च सिद्धैर्विद्याधरैस्तथा
ādityairvasubhiḥ sārdhaṁ rudraiścaiva marudgaṇaiḥ gaṁdharvairlokapālaiśca siddhairvidyādharaistathā
आदित्यों, वसुओं, रुद्रों तथा मरुद्गणों के साथ, गंधर्वों, लोकपालों, सिद्धों तथा विद्याधरों के साथ भी उसे बुलाओ।
श्लोक 62 (skanda.6.179.62)
येन मे स्यात्सहायत्वं समस्ते यज्ञकर्मणि । तच्छ्रुत्वा सकलं वायुर्गत्वा शक्रनिवेशनम् । कथयामास तत्सर्वं यदुक्तं परमेष्ठिना
yena me syātsahāyatvaṁ samaste yajñakarmaṇi tacchrutvā sakalaṁ vāyurgatvā śakraniveśanam kathayāmāsa tatsarvaṁ yaduktaṁ parameṣṭhinā
'जिससे मुझे इस संपूर्ण यज्ञकर्म में सहायता प्राप्त हो।' यह सब सुनकर वायु देव इंद्र के भवन को गए, और परमेष्ठी ब्रह्मा ने जो कुछ कहा था, वह सब उनसे कह दिया।
श्लोक 63 (skanda.6.179.63)
सत्वरं प्रययौ तत्र सर्वैर्देवगणैः सह । प्रणिपत्य ततस्तं स ब्रह्माणं वाक्यमब्रवीत्
satvaraṁ prayayau tatra sarvairdevagaṇaiḥ saha praṇipatya tatastaṁ sa brahmāṇaṁ vākyamabravīt
तब इंद्र सभी देवगणों के साथ शीघ्र वहाँ गए, और ब्रह्मा को प्रणाम करके उनसे यह वचन कहा।
श्लोक 64 (skanda.6.179.64)
आदेशो दीयतां देव ह्यहमाकारितस्त्वया । यदर्थं तत्करिष्यामि तस्माच्छीघ्रं निवेदय
ādeśo dīyatāṁ deva hyahamākāritastvayā yadarthaṁ tatkariṣyāmi tasmācchīghraṁ nivedaya
हे देव! आज्ञा दीजिए, आपने मुझे बुलाया है; जिस प्रयोजन के लिए बुलाया है, वह शीघ्र बताइए, मैं वह करूँगा।
श्लोक 65 (skanda.6.179.65)
ब्रह्मोवाच । मया शक्रात्र चानीतं सुपुण्यं पुष्करत्रयम् । कलिकालभयाच्चैव करिष्ये तदहं स्थिरम्
brahmovāca mayā śakrātra cānītaṁ supuṇyaṁ puṣkaratrayam kalikālabhayāccaiva kariṣye tadahaṁ sthiram
ब्रह्मा जी ने कहा — हे शक्र! मैंने इस अत्यंत पवित्र पुष्करत्रय को यहाँ ला दिया है, कलिकाल के भय से, और मैं इसे स्थायी बनाऊँगा।
श्लोक 66 (skanda.6.179.66)
अग्निष्टोमत्रयं कृत्वा वैशाख्यां च यथार्चितम् । संभारमाहरस्वाशु तदर्थं सर्वमेव हि
agniṣṭomatrayaṁ kṛtvā vaiśākhyāṁ ca yathārcitam saṁbhāramāharasvāśu tadarthaṁ sarvameva hi
अतः तीन अग्निष्टोम यज्ञ करके, वैशाख के अनुरूप विधिपूर्वक — उसके लिए सारी आवश्यक सामग्री शीघ्र लाओ।
श्लोक 67 (skanda.6.179.67)
ब्राह्मणांश्च तदर्हांश्च वेदवेदांगपारगान् । तच्छ्रुत्वा विनयाच्छक्रस्तथेत्युक्त्वा त्वरान्वितः
brāhmaṇāṁśca tadarhāṁśca vedavedāṁgapāragān tacchrutvā vinayācchakrastathetyuktvā tvarānvitaḥ
और उसके योग्य वेद-वेदांग-पारंगत ब्राह्मणों को भी लाओ। यह सुनकर इंद्र ने विनयपूर्वक 'ऐसा ही होगा' कहकर, शीघ्रतापूर्वक —
श्लोक 68 (skanda.6.179.68)
संभारानानयामास तदर्हांश्च द्विजोत्तमान्
saṁbhārānānayāmāsa tadarhāṁśca dvijottamān
— उसके योग्य समस्त सामग्री और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को ले आया।
श्लोक 69 (skanda.6.179.69)
ततश्चकार विधिवद्यज्ञं स प्रपितामहः । यथोक्तविधिना सर्वं तथा संपूर्णदक्षिणम्
tataścakāra vidhivadyajñaṁ sa prapitāmahaḥ yathoktavidhinā sarvaṁ tathā saṁpūrṇadakṣiṇam
तब उस प्रपितामह ब्रह्मा ने विधिपूर्वक, जैसा शास्त्रों में कहा गया था, वह संपूर्ण दक्षिणा से युक्त यज्ञ संपन्न किया।