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नागर खण्ड · अध्याय 180

ऋत्विक्-नियोजन एवं यज्ञारंभ वर्णन

अध्याय 179अध्याय-सूचीअध्याय 181

श्लोक 1 (skanda.6.180.1)

ऋषय ऊचुः । अत्यद्भुतमिदं सूत यत्त्वया समुदाहृतम् । ब्रह्मणा यत्कृतो यज्ञस्तत्र क्षेत्रे महात्मना

ṛṣaya ūcuḥ atyadbhutamidaṁ sūta yattvayā samudāhṛtam brahmaṇā yatkṛto yajñastatra kṣetre mahātmanā

ऋषियों ने कहा — हे सूत! यह अत्यंत अद्भुत है, जो तुमने बताया, कि उस क्षेत्र में महात्मा ब्रह्मा ने यज्ञ किया था।

श्लोक 2 (skanda.6.180.2)

अग्निष्टोमादयो यज्ञा ये वर्तन्ते धरातले । यष्टव्यस्तेषु यज्ञेषु स एव हि सुरेश्वरः

agniṣṭomādayo yajñā ye vartante dharātale yaṣṭavyasteṣu yajñeṣu sa eva hi sureśvaraḥ

जो भी अग्निष्टोम आदि यज्ञ पृथ्वी पर होते हैं, उन यज्ञों में वही देवेश्वर पूज्य होते हैं।

श्लोक 3 (skanda.6.180.3)

तेनैव यजता तत्र को हीष्टः प्रब्रवीहि नः । ऋत्विजः के स्थितास्तत्र यैस्तत्कर्म मखोद्भवम् । तत्प्रत्यक्षे कृतं सर्वमेतन्नः कौतुकं परम्

tenaiva yajatā tatra ko hīṣṭaḥ prabravīhi naḥ ṛtvijaḥ ke sthitāstatra yaistatkarma makhodbhavam tatpratyakṣe kṛtaṁ sarvametannaḥ kautukaṁ param

जब वह स्वयं यज्ञ कर रहे थे, तो वहाँ कौन पूजनीय देवता था — हमें बताइए। वहाँ कौन-कौन ऋत्विज् थे, जिन्होंने वह यज्ञकर्म संपन्न किया — यह सब हमारे लिए परम कौतुक का विषय है।

श्लोक 4 (skanda.6.180.4)

का चैव दक्षिणा दत्ता तेन तेषां द्विजन्मनाम् । कोऽध्वर्युर्विहितस्तत्र येन तद्यजनं कृतम्

kā caiva dakṣiṇā dattā tena teṣāṁ dvijanmanām ko'dhvaryurvihitastatra yena tadyajanaṁ kṛtam

उसने उन ब्राह्मणों को क्या दक्षिणा दी, और वहाँ कौन अध्वर्यु नियुक्त हुआ था, जिसने वह यज्ञ संपन्न किया?

श्लोक 5 (skanda.6.180.5)

को होता कश्च वाऽग्नीध्रः को ब्रह्मा तत्र संस्थितः । उद्गाता कः स्थितस्तत्र ह्याचार्यो यज्ञकर्मणि

ko hotā kaśca vā'gnīdhraḥ ko brahmā tatra saṁsthitaḥ udgātā kaḥ sthitastatra hyācāryo yajñakarmaṇi

वहाँ कौन होता था, कौन अग्नीध्र था, कौन ब्रह्मा के पद पर स्थित था, कौन उद्गाता था, और यज्ञकर्म में कौन आचार्य था?

श्लोक 6 (skanda.6.180.6)

सूत उवाच । अहं वः कीर्तयिष्यामि सर्वं यज्ञस्य संभवम् । वृत्तांतं यच्च तत्रस्थमाश्चर्यं द्विजपुंगवाः

sūta uvāca ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi sarvaṁ yajñasya saṁbhavam vṛttāṁtaṁ yacca tatrasthamāścaryaṁ dvijapuṁgavāḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो! मैं तुम्हें उस यज्ञ की समस्त उत्पत्ति-कथा तथा वहाँ घटित हुए आश्चर्यजनक वृत्तांत को कहकर सुनाता हूँ।

श्लोक 7 (skanda.6.180.7)

ये सदस्याः स्थितास्तत्र ऋत्विजश्च द्विजोत्तमाः । दक्षिणा याः प्रदत्ताश्च तेभ्यस्तेन महात्मना

ye sadasyāḥ sthitāstatra ṛtvijaśca dvijottamāḥ dakṣiṇā yāḥ pradattāśca tebhyastena mahātmanā

जो सभासद और ऋत्विज् वहाँ उपस्थित थे, हे द्विजोत्तमो! और उन्हें उस महात्मा ने जो दक्षिणा दी —

श्लोक 8 (skanda.6.180.8)

यजता देवदेवेन ब्रह्मणाऽमिततेजसा । यज्ञकामं चतुर्वक्त्रं ज्ञात्वा देवः शतक्रतुः

yajatā devadevena brahmaṇā'mitatejasā yajñakāmaṁ caturvaktraṁ jñātvā devaḥ śatakratuḥ

— जब देवदेव, अमित तेजस्वी ब्रह्मा यज्ञ कर रहे थे, तब चतुर्मुख की यज्ञ-इच्छा जानकर देवराज इंद्र —

श्लोक 9 (skanda.6.180.9)

सर्वैः सुरगणैः सार्धं साहाय्यार्थमुपागतः । तथा च भगवाञ्छंभुः सर्वदेवगणैः सह

sarvaiḥ suragaṇaiḥ sārdhaṁ sāhāyyārthamupāgataḥ tathā ca bhagavāñchaṁbhuḥ sarvadevagaṇaiḥ saha

— समस्त देवगणों के साथ सहायता के लिए वहाँ आया; और उसी प्रकार भगवान शंभु भी समस्त देवगणों सहित वहाँ पधारे।

श्लोक 10 (skanda.6.180.10)

तान्दृष्ट्वाऽभ्यागतान्ब्रह्मा मर्त्यधर्मसमाश्रितान् । प्रोवाच विनयोपेतः कृतांजलिपुटः स्थितः

tāndṛṣṭvā'bhyāgatānbrahmā martyadharmasamāśritān provāca vinayopetaḥ kṛtāṁjaliputaḥ sthitaḥ

उन आए हुए देवताओं को, जो मानव-धर्म का आश्रय लेकर वहाँ पधारे थे, देखकर, ब्रह्मा जी विनयपूर्वक हाथ जोड़कर खड़े होकर बोले।

श्लोक 11 (skanda.6.180.11)

स्वागतं वः सुरश्रेष्ठाः प्रसादः क्रियतां मम । निविश्यतां यथान्यायं स्थानेषु रुचिरेषु च

svāgataṁ vaḥ suraśreṣṭhāḥ prasādaḥ kriyatāṁ mama niviśyatāṁ yathānyāyaṁ sthāneṣu rucireṣu ca

'हे सुरश्रेष्ठो! आप सबका स्वागत है, मुझ पर कृपा कीजिए; अपने उचित, सुंदर आसनों पर विराजिए।'

श्लोक 12 (skanda.6.180.12)

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यद्यूयं स्वयमागताः । मंत्राहूता यथा कृच्छ्रात्सर्वसत्रेषु गच्छथ

dhanyo'smyanugṛhīto'smi yadyūyaṁ svayamāgatāḥ maṁtrāhūtā yathā kṛcchrātsarvasatreṣu gacchatha

'मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ कि आप स्वयं पधारे हैं; मंत्रों द्वारा बुलाए जाने पर तो आप बड़ी कठिनाई से समस्त सत्रों में जाते हैं।'

श्लोक 13 (skanda.6.180.13)

देवा ऊचुः । येन यच्चात्र कर्तव्यं तच्छीघ्रं वद पद्मज । यज्ञे तव महाभाग तस्य तत्त्वं समादिश

devā ūcuḥ yena yaccātra kartavyaṁ tacchīghraṁ vada padmaja yajñe tava mahābhāga tasya tattvaṁ samādiśa

देवताओं ने कहा — हे पद्मज! यहाँ किसे क्या कार्य करना है, वह शीघ्र बताइए। हे महाभाग! अपने यज्ञ में हमें उसका यथार्थ आदेश दीजिए।

श्लोक 14 (skanda.6.180.14)

ब्रह्मोवाच । विश्वकर्मन्द्रुतं गच्छ यज्ञमण्डपसिद्धये । पत्नीशालां ततश्चैव यज्ञवेदीस्तथैव च

brahmovāca viśvakarmandrutaṁ gaccha yajñamaṇḍapasiddhaye patnīśālāṁ tataścaiva yajñavedīstathaiva ca

ब्रह्मा जी ने कहा — हे विश्वकर्मन्! तुम शीघ्र जाओ, यज्ञमंडप की सिद्धि के लिए; तथा पत्नीशाला और यज्ञवेदियाँ भी बनाओ।

श्लोक 15 (skanda.6.180.15)

कुण्डानि चैव सर्वाणि यथास्थानेषु कारय । यज्ञपात्राणि सर्वाणि ग्रहाश्च चमसास्तथा

kuṇḍāni caiva sarvāṇi yathāsthāneṣu kāraya yajñapātrāṇi sarvāṇi grahāśca camasāstathā

समस्त कुंडों को भी उनके-उनके यथोचित स्थानों पर बनवाओ; समस्त यज्ञ-पात्र, ग्रह-पात्र, तथा चमस भी।

श्लोक 16 (skanda.6.180.16)

यूपाश्च यत्प्रमाणेन कर्तव्याः सचषालकाः । पचनार्थं तथा गर्ताः कर्तव्या यत्प्रमाणतः

yūpāśca yatpramāṇena kartavyāḥ sacaṣālakāḥ pacanārthaṁ tathā gartāḥ kartavyā yatpramāṇataḥ

सम्यक् प्रमाण के अनुसार चषाल-सहित यूप-स्तंभ भी बनाओ, तथा पाक-कर्म के लिए भी उचित प्रमाण के अनुसार गड्ढे बनाओ।

श्लोक 17 (skanda.6.180.17)

इष्टिकानां सहस्राणि दश चाष्टशतानि च । कर्तव्यानि त्वया शीघ्रं चयनानीति सत्वरम्

iṣṭikānāṁ sahasrāṇi daśa cāṣṭaśatāni ca kartavyāni tvayā śīghraṁ cayanānīti satvaram

दस हजार आठ सौ ईंटों को तुम शीघ्र चुनकर तैयार करो।

श्लोक 18 (skanda.6.180.18)

तथा हिरण्मयश्चापि पुरुषः कार्य एव हि । तथेत्युक्ता ततस्त्वष्टा शीघ्राच्छीघ्रतरं ययौ

tathā hiraṇmayaścāpi puruṣaḥ kārya eva hi tathetyuktā tatastvaṣṭā śīghrācchīghrataraṁ yayau

'और स्वर्णमय पुरुष (मूर्ति) भी अवश्य बनाना है।' 'ऐसा ही होगा' कहकर विश्वकर्मा अत्यंत शीघ्रता से वहाँ से चले गए।

श्लोक 19 (skanda.6.180.19)

ततस्तु पद्मजः प्राह देवाचार्यं बृहस्पतिम् । बृहस्पते त्वमानीहि यज्ञार्हानृत्विजोऽखिलान्

tatastu padmajaḥ prāha devācāryaṁ bṛhaspatim bṛhaspate tvamānīhi yajñārhānṛtvijo'khilān

फिर लोटस-जन्मा ब्रह्मा ने देवाचार्य बृहस्पति से कहा — हे बृहस्पते! तुम यज्ञ के योग्य समस्त ऋत्विजों को यहाँ ले आओ।

श्लोक 20 (skanda.6.180.20)

यावत्षोडशसंख्याश्च नान्यस्यैतद्धि युज्यते । त्वया शक्र सदा कार्या शुश्रूषा च द्विजन्मनाम्

yāvatṣoḍaśasaṁkhyāśca nānyasyaitaddhi yujyate tvayā śakra sadā kāryā śuśrūṣā ca dvijanmanām

पूरे सोलह की संख्या में, क्योंकि यह कार्य किसी और के लिए उपयुक्त नहीं है। हे शक्र! तुम्हें सदा उन ब्राह्मणों की सेवा करनी है।

श्लोक 21 (skanda.6.180.21)

हस्तपादावमर्द्दश्च श्रांतानां पृष्ठमर्द्दनम् । धनाध्यक्ष त्वया देया दक्षिणा कालसंभवा

hastapādāvamarddaśca śrāṁtānāṁ pṛṣṭhamarddanam dhanādhyakṣa tvayā deyā dakṣiṇā kālasaṁbhavā

थके हुए ब्राह्मणों के हाथ-पैर और पीठ की मालिश भी तुम्हें ही करनी है। हे धनाध्यक्ष (कुबेर)! समय-समय पर देय दक्षिणा तुम्हें ही देनी है।

श्लोक 22 (skanda.6.180.22)

सुवस्त्राणि हिरण्यं च तथान्यद्वापि वांछितम् । त्वया विष्णो सदा कार्यं कृत्याकृत्यपरीक्षणम्

suvastrāṇi hiraṇyaṁ ca tathānyadvāpi vāṁchitam tvayā viṣṇo sadā kāryaṁ kṛtyākṛtyaparīkṣaṇam

उत्तम वस्त्र, सुवर्ण, तथा जो कुछ भी वांछित हो, वह सब तुम्हें ही देना है। हे विष्णु! तुम्हें सदा यह देखना है कि क्या करने योग्य है और क्या नहीं।

श्लोक 23 (skanda.6.180.23)

युक्तं कृतमथो नैव सावधानेन सर्वदा । लोकपालाश्च ये सर्वे रक्षंतु सकला दिशः । भूतप्रेतपिशाचानां प्रवेशं राक्षसोद्भवम्

yuktaṁ kṛtamatho naiva sāvadhānena sarvadā lokapālāśca ye sarve rakṣaṁtu sakalā diśaḥ bhūtapretapiśācānāṁ praveśaṁ rākṣasodbhavam

क्या सम्यक् किया गया और क्या नहीं, इसकी सदा सावधानी से जाँच करते रहना। और समस्त लोकपाल सब दिशाओं की रक्षा करें, जिससे भूत, प्रेत, पिशाच तथा राक्षसों का प्रवेश न हो सके।

श्लोक 24 (skanda.6.180.24)

यो यं कामयते कामं किंचिद्वस्त्रं धनं च वा । विचार्य तस्य तद्देयं सर्वयज्ञाधिपेन तु

yo yaṁ kāmayate kāmaṁ kiṁcidvastraṁ dhanaṁ ca vā vicārya tasya taddeyaṁ sarvayajñādhipena tu

जो कोई जिस वस्तु की, वस्त्र की, या धन की कामना करे, उस पर विचार करके सर्वयज्ञाधिप द्वारा ही उसे वह प्रदान किया जाए।

श्लोक 25 (skanda.6.180.25)

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः । भवंतु परिवेष्टारो भोक्तुकामजनस्य च

ādityā vasavo rudrā viśvedevā marudgaṇāḥ bhavaṁtu pariveṣṭāro bhoktukāmajanasya ca

आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण, विश्वेदेव, तथा मरुद्गण — भोजन की कामना रखने वाले जनों को परोसने वाले बनें।

श्लोक 26 (skanda.6.180.26)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो विश्वकर्मा त्वरान्वितः । अब्रवीत्पंकजभवं संसिद्धो यज्ञमण्डपः

etasminnaṁtare prāpto viśvakarmā tvarānvitaḥ abravītpaṁkajabhavaṁ saṁsiddho yajñamaṇḍapaḥ

इसी बीच विश्वकर्मा शीघ्रतापूर्वक वहाँ पधारे, और लोटस-जन्मा ब्रह्मा से बोले — यज्ञमंडप पूर्णतः तैयार हो गया है।

श्लोक 27 (skanda.6.180.27)

सर्वमन्यत्समादिष्टं यत्त्वयोक्तं चतुर्मुख

sarvamanyatsamādiṣṭaṁ yattvayoktaṁ caturmukha

हे चतुर्मुख! आपने जो कुछ आदेश दिया था, वह सब भी पूर्ण कर दिया गया है।

श्लोक 28 (skanda.6.180.28)

ततो बृहस्पतिः प्राह समभ्येत्य पितामहम् । समानीता मया देव ब्राह्मणा यज्ञकर्मणि

tato bṛhaspatiḥ prāha samabhyetya pitāmaham samānītā mayā deva brāhmaṇā yajñakarmaṇi

तब बृहस्पति ने पितामह के पास आकर कहा — हे देव! मैं यज्ञकर्म के लिए ब्राह्मणों को ले आया हूँ।

श्लोक 29 (skanda.6.180.29)

विप्राः षोडशसंख्याश्च ऋत्विक्कर्मणि योजय । स्वयं परीक्ष्य देवेश यज्ञकर्मप्रसिद्धये

viprāḥ ṣoḍaśasaṁkhyāśca ṛtvikkarmaṇi yojaya svayaṁ parīkṣya deveśa yajñakarmaprasiddhaye

हे देवेश! उन सोलह ब्राह्मणों को स्वयं परीक्षा करके यज्ञकर्म की सिद्धि के लिए ऋत्विक्-कर्म में नियुक्त कीजिए।

श्लोक 30 (skanda.6.180.30)

ततो ब्रह्मा स्वयं दृष्ट्वा तान्परीक्ष्य प्रयत्नतः । ऋत्विक्त्वे च नियोज्याथ ततश्चक्रे तदर्हणम्

tato brahmā svayaṁ dṛṣṭvā tānparīkṣya prayatnataḥ ṛtviktve ca niyojyātha tataścakre tadarhaṇam

तब ब्रह्मा जी ने स्वयं देखकर, प्रयत्नपूर्वक उनकी परीक्षा करके, उन्हें ऋत्विक् पद पर नियुक्त किया, और फिर उनका यथोचित सम्मान किया।

श्लोक 31 (skanda.6.180.31)

ऋषय ऊचुः । ऋत्विजां चैव सर्वेषां सूत नामानि कीर्तय । येन यो विहितस्तत्र पदार्थः सूत तं वद

ṛṣaya ūcuḥ ṛtvijāṁ caiva sarveṣāṁ sūta nāmāni kīrtaya yena yo vihitastatra padārthaḥ sūta taṁ vada

ऋषियों ने कहा — हे सूत! उन समस्त ऋत्विजों के नाम बताओ, और यह भी बताओ कि किसे किस पद पर नियुक्त किया गया।

श्लोक 32 (skanda.6.180.32)

सूत उवाच । भृगुर्हौत्रे ततस्तेन वृतो ब्राह्मणसत्तमाः । मैत्रावरुणसंज्ञस्तु तथैव च्यवनो मुनिः

sūta uvāca bhṛgurhautre tatastena vṛto brāhmaṇasattamāḥ maitrāvaruṇasaṁjñastu tathaiva cyavano muniḥ

सूत जी ने कहा — हे ब्राह्मणसत्तमो! भृगु मुनि होता के पद पर नियुक्त किए गए; और च्यवन मुनि मैत्रावरुण के पद पर नियुक्त हुए।

श्लोक 33 (skanda.6.180.33)

अच्छावाको मरीचिश्च ग्रावस्तुद्गालवो मुनिः । पुलस्त्यश्च तथाऽध्वर्युः प्रस्थातात्रिश्च संस्थितः

acchāvāko marīciśca grāvastudgālavo muniḥ pulastyaśca tathā'dhvaryuḥ prasthātātriśca saṁsthitaḥ

मरीचि अच्छावाक बने, मुनि गालव ग्रावस्तुत् बने; पुलस्त्य अध्वर्यु के पद पर, और अत्रि प्रस्थाता के पद पर स्थित हुए।

श्लोक 34 (skanda.6.180.34)

तत्र रैभ्यो मुनिर्नेष्टा तत्रोन्नेता सनातनः । ब्रह्मा च नारदो गर्गो ब्राह्मणाच्छंसिरेव च

tatra raibhyo munirneṣṭā tatronnetā sanātanaḥ brahmā ca nārado gargo brāhmaṇācchaṁsireva ca

मुनि रैभ्य नेष्टा बने, सनातन उन्नेता के पद पर स्थित हुए; नारद ब्रह्मा के पद पर, और गर्ग ब्राह्मणाच्छंसी के पद पर नियुक्त हुए।

श्लोक 35 (skanda.6.180.35)

आग्नीध्रश्च भरद्वाजो होता पाराशरस्तथा । तथैव तत्र क्षेत्रे च उद्गाता गोभिलो मुनिः

āgnīdhraśca bharadvājo hotā pārāśarastathā tathaiva tatra kṣetre ca udgātā gobhilo muniḥ

भरद्वाज अग्नीध्र बने, और पाराशर होता बने; उसी क्षेत्र में मुनि गोभिल उद्गाता के पद पर नियुक्त हुए।

श्लोक 36 (skanda.6.180.36)

तथैव कौथुमो जज्ञे प्रस्तौता यज्ञकर्मणि । शांडिल्यः प्रतिहर्त्ता च सुब्रह्मण्यस्तथांगिराः

tathaiva kauthumo jajñe prastautā yajñakarmaṇi śāṁḍilyaḥ pratihartā ca subrahmaṇyastathāṁgirāḥ

उसी प्रकार कौथुम उस यज्ञकर्म में प्रस्तोता बने, शांडिल्य प्रतिहर्ता बने, और अंगिरा सुब्रह्मण्य के पद पर नियुक्त हुए।

श्लोक 37 (skanda.6.180.37)

तस्य यज्ञस्य सिद्ध्यर्थमित्येते षोडशर्त्विजः । वस्त्राभरणशोभाढ्या विनयेन कृताश्च ते

tasya yajñasya siddhyarthamityete ṣoḍaśartvijaḥ vastrābharaṇaśobhāḍhyā vinayena kṛtāśca te

उस यज्ञ की सिद्धि के लिए ये सोलह ऋत्विज नियुक्त हुए; वे वस्त्र और आभूषणों से सुशोभित किए गए, और विनयपूर्वक सम्मानित किए गए।

श्लोक 38 (skanda.6.180.38)

ततः कृत्वा स्वयं ब्रह्मा सर्वेषामर्हणक्रियाम् । गृह्योक्तेन विधानेन ततः प्रोवाच सादरम्

tataḥ kṛtvā svayaṁ brahmā sarveṣāmarhaṇakriyām gṛhyoktena vidhānena tataḥ provāca sādaram

तब ब्रह्मा जी ने स्वयं उन सबका, गृह्यसूत्रों में कहे गए विधान के अनुसार, सत्कार किया, और फिर आदरपूर्वक कहा।

श्लोक 39 (skanda.6.180.39)

एषोऽहं शरणं प्राप्तो युष्माकं द्विजसत्तमाः । अनुगृह्णीत मां सर्वे दीक्षायै यज्ञकर्मणः

eṣo'haṁ śaraṇaṁ prāpto yuṣmākaṁ dvijasattamāḥ anugṛhṇīta māṁ sarve dīkṣāyai yajñakarmaṇaḥ

'हे द्विजसत्तमो! मैं आप सबकी शरण में आया हूँ; आप सब कृपा करके मुझे इस यज्ञकर्म की दीक्षा प्रदान करें।'

अध्याय 179अध्याय-सूचीअध्याय 181