नागर खण्ड · अध्याय 181
गायत्रीविवाह एवं गायत्रीतीर्थ-माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.181.1)
सूत उवाच । एतस्मिन्नंतरे सर्वेर्नागरैर्ब्राह्मणोत्तमैः । प्रेषितो मध्यगस्तत्र गर्तातीर्थसमुद्भवः
sūta uvāca etasminnaṁtare sarvernāgarairbrāhmaṇottamaiḥ preṣito madhyagastatra gartātīrthasamudbhavaḥ
सूत जी ने कहा — इसी बीच सभी श्रेष्ठ नागर ब्राह्मणों ने गर्तातीर्थ में उत्पन्न मध्यग नामक दूत को वहाँ भेजा।
श्लोक 2 (skanda.6.181.2)
रेरे मध्यग गत्वा त्वं ब्रूहि तं कुपितामहम् । विप्रवृत्ति प्रहंतारं नीतिमार्गविवर्जितम्
rere madhyaga gatvā tvaṁ brūhi taṁ kupitāmaham vipravṛtti prahaṁtāraṁ nītimārgavivarjitam
हे मध्यग, जाकर तुम उस अपराधी पितामह से कहो, जो ब्राह्मणों की वृत्ति का नाश करने वाला और नीतिमार्ग से रहित है।
श्लोक 3 (skanda.6.181.3)
एतत्क्षेत्रं प्रदत्तं नः पूर्वेषां च द्विजन्मनाम् । महेश्वरेण तुष्टेन पूरिते सर्पजे बिले
etatkṣetraṁ pradattaṁ naḥ pūrveṣāṁ ca dvijanmanām maheśvareṇa tuṣṭena pūrite sarpaje bile
यह क्षेत्र हमें, हमारे पूर्वज ब्राह्मणों को, प्रसन्न महेश्वर ने उस समय प्रदान किया था जब उन्होंने सर्प से उत्पन्न बिल को भर दिया था।
श्लोक 4 (skanda.6.181.4)
तस्य दत्तस्य चाद्यैव पितामहशतं गतम् । पंचोत्तरमसन्दिग्धं यावत्त्वं कुपितामह
tasya dattasya cādyaiva pitāmahaśataṁ gatam paṁcottaramasandigdhaṁ yāvattvaṁ kupitāmaha
उस दान के दिए जाने से आज तक निश्चित रूप से एक सौ पाँच पितामह-पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं, हे कुपित पितामह।
श्लोक 5 (skanda.6.181.5)
न केनापि कृतोऽस्माकं तिरस्कारो यथाऽधुना । त्वां मुक्त्वा पापकर्माणं न्यायमार्गविवर्जितम्
na kenāpi kṛto'smākaṁ tiraskāro yathā'dhunā tvāṁ muktvā pāpakarmāṇaṁ nyāyamārgavivarjitam
पहले कभी किसी ने हमारा ऐसा तिरस्कार नहीं किया, जैसा अभी तुमने किया है — न्यायमार्ग से रहित पापकर्मा होकर तुमने हमें त्याग दिया।
श्लोक 6 (skanda.6.181.6)
नागरैर्ब्राह्मणैर्बाह्यं योऽत्र यज्ञं समाचरेत् । श्राद्धं वा स हि वध्यः स्यात्सर्वेषां च द्विजन्मनाम्
nāgarairbrāhmaṇairbāhyaṁ yo'tra yajñaṁ samācaret śrāddhaṁ vā sa hi vadhyaḥ syātsarveṣāṁ ca dvijanmanām
जो कोई भी नागर ब्राह्मणों को छोड़कर यहाँ यज्ञ अथवा श्राद्ध करे, वह वध्य है, और साथ ही समस्त द्विजगण भी वध्य होंगे।
श्लोक 7 (skanda.6.181.7)
न तस्य जायते श्रेयस्तत्समुत्थं कथंचन । एतत्प्रोक्तं तदा तेन यदा स्थानं ददौ हि नः
na tasya jāyate śreyastatsamutthaṁ kathaṁcana etatproktaṁ tadā tena yadā sthānaṁ dadau hi naḥ
उससे उत्पन्न कोई कल्याण कभी नहीं होता; यही बात उस समय कही गई थी जब उन्होंने हमें यह स्थान दिया था।
श्लोक 8 (skanda.6.181.8)
तस्माद्यत्कुरुषे यज्ञं ब्राह्मणैर्नागरैः कुरु । नान्यथा लप्स्यसे कर्तुं जीवद्भिर्नागरैर्द्विजैः
tasmādyatkuruṣe yajñaṁ brāhmaṇairnāgaraiḥ kuru nānyathā lapsyase kartuṁ jīvadbhirnāgarairdvijaiḥ
इसलिए जो भी यज्ञ तुम करते हो, नागर ब्राह्मणों के साथ ही करो; जब तक नागर ब्राह्मण जीवित हैं, तब तक अन्यथा तुम उसे सम्पन्न नहीं कर सकोगे।
श्लोक 9 (skanda.6.181.9)
एवमुक्तस्ततो गत्वा मध्यगो यत्र पद्मजः । यज्ञमण्डपदूरस्थो ब्राह्मणैः परिवारितः
evamuktastato gatvā madhyago yatra padmajaḥ yajñamaṇḍapadūrastho brāhmaṇaiḥ parivāritaḥ
ऐसा कहे जाने पर वह मध्यग वहाँ गया जहाँ पद्मज (ब्रह्मा) थे, और यज्ञमण्डप से दूर ब्राह्मणों से घिरे खड़े हो गए।
श्लोक 10 (skanda.6.181.10)
यत्प्रोक्तं नागरैः सर्वैः सविशेषं तदा हि सः । तच्छ्रुत्वा पद्मजः प्राह सांत्वपूर्वमिदं वचः
yatproktaṁ nāgaraiḥ sarvaiḥ saviśeṣaṁ tadā hi saḥ tacchrutvā padmajaḥ prāha sāṁtvapūrvamidaṁ vacaḥ
नागरों ने जो कुछ विशेष रूप से कहा था, वह सब उसने कहा; उसे सुनकर पद्मज ने यह सांत्वनापूर्ण वचन कहा —
श्लोक 11 (skanda.6.181.11)
मानुषं भावमापन्न ऋत्विग्भिः परिवारितः । त्वया सत्यमिदं प्रोक्तं सर्वं मध्यगसत्तम
mānuṣaṁ bhāvamāpanna ṛtvigbhiḥ parivāritaḥ tvayā satyamidaṁ proktaṁ sarvaṁ madhyagasattama
मानव-भाव धारण किए, ऋत्विजों से घिरे हुए, मैं कहता हूँ — हे मध्यगश्रेष्ठ, तुमने जो कुछ कहा है, वह सब सत्य है।
श्लोक 12 (skanda.6.181.12)
किं करोमि वृताः सर्वे मया ते यज्ञकर्मणि । ऋत्विजोऽध्वर्यु पूर्वा ये प्रमादेन न काम्यया
kiṁ karomi vṛtāḥ sarve mayā te yajñakarmaṇi ṛtvijo'dhvaryu pūrvā ye pramādena na kāmyayā
मैं क्या करूँ? यज्ञकर्म के लिए मैंने ये सब ऋत्विज और अध्वर्यु आदि प्रमादवश चुने थे, इच्छा से नहीं।
श्लोक 13 (skanda.6.181.13)
तस्मादानय तान्सर्वानत्र स्थाने द्विजोत्तमान् । अनुज्ञातस्तु तैर्येन गच्छामि मखमण्डपे
tasmādānaya tānsarvānatra sthāne dvijottamān anujñātastu tairyena gacchāmi makhamaṇḍape
इसलिए उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों को यहाँ इस स्थान पर लाओ; उनकी अनुमति मिलने पर ही मैं यज्ञमण्डप में जाऊँगा।
श्लोक 14 (skanda.6.181.14)
मध्यग उवाच । त्वं देवत्वं परित्यज्य मानुषं भावमाश्रितः । तत्कथं ते द्विजश्रेष्ठाः समागच्छंति तेंऽतिकम्
madhyaga uvāca tvaṁ devatvaṁ parityajya mānuṣaṁ bhāvamāśritaḥ tatkathaṁ te dvijaśreṣṭhāḥ samāgacchaṁti teṁ'tikam
मध्यग ने कहा — तुमने देवत्व त्यागकर मानव-भाव धारण किया है, तो फिर वे श्रेष्ठ द्विज तुम्हारे निकट कैसे आएँगे?
श्लोक 15 (skanda.6.181.15)
श्रेष्ठा गावः पशूनां च यथा पद्मसमुद्भव । विप्राणामिह सर्वेषां तथा श्रेष्ठा हि नागराः
śreṣṭhā gāvaḥ paśūnāṁ ca yathā padmasamudbhava viprāṇāmiha sarveṣāṁ tathā śreṣṭhā hi nāgarāḥ
जैसे पशुओं में गाय श्रेष्ठ है, हे पद्मसंभव, वैसे ही समस्त ब्राह्मणों में नागर श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 16 (skanda.6.181.16)
तत्माच्चेद्वांछसि प्राप्तिं त्वमेतां यज्ञसंभवाम् । तद्भक्त्यानागरान्सर्वान्प्रसादय पितामह
tatmāccedvāṁchasi prāptiṁ tvametāṁ yajñasaṁbhavām tadbhaktyānāgarānsarvānprasādaya pitāmaha
इसलिए यदि तुम इस यज्ञ की सिद्धि चाहते हो, तो भक्तिपूर्वक समस्त नागरों को प्रसन्न करो, हे पितामह।
श्लोक 17 (skanda.6.181.17)
सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा पद्मजो भीत ऋत्विग्भिः परिवारितः । जगाम तत्र यत्रस्था नागराः कुपिता द्विजाः
sūta uvāca tacchrutvā padmajo bhīta ṛtvigbhiḥ parivāritaḥ jagāma tatra yatrasthā nāgarāḥ kupitā dvijāḥ
सूत जी ने कहा — यह सुनकर भयभीत पद्मज, ऋत्विजों से घिरे हुए, वहाँ गए जहाँ कुपित नागर ब्राह्मण खड़े थे।
श्लोक 18 (skanda.6.181.18)
प्रणिपत्य ततः सर्वान्विनयेन समन्वितः । प्रोवाच वचनं श्रुत्वा कृतांजलिपुटः स्थितः
praṇipatya tataḥ sarvānvinayena samanvitaḥ provāca vacanaṁ śrutvā kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ
फिर सबको प्रणाम करके, विनयपूर्वक, उनके वचन सुनकर हाथ जोड़कर खड़े होकर उन्होंने कहा —
श्लोक 19 (skanda.6.181.19)
जानाम्यहं द्विजश्रेष्ठाः क्षेत्रेऽस्मिन्हाटकेश्वरे । युष्मद्बाह्यं वृथा श्राद्धं यज्ञकर्म तथैव च
jānāmyahaṁ dvijaśreṣṭhāḥ kṣetre'sminhāṭakeśvare yuṣmadbāhyaṁ vṛthā śrāddhaṁ yajñakarma tathaiva ca
हे द्विजश्रेष्ठो, मैं जानता हूँ कि इस हाटकेश्वर क्षेत्र में तुम्हें छोड़कर किया गया श्राद्ध और यज्ञकर्म व्यर्थ है।
श्लोक 20 (skanda.6.181.20)
कलिभीत्या मयाऽऽनीतं स्थानेऽस्मिन्पुष्करं निजम् । तीर्थं च युष्मदीयं च निक्षेपोऽयं समर्पितः
kalibhītyā mayā''nītaṁ sthāne'sminpuṣkaraṁ nijam tīrthaṁ ca yuṣmadīyaṁ ca nikṣepo'yaṁ samarpitaḥ
कलिकाल के भय से मैंने अपना पुष्कर तीर्थ इस स्थान पर लाकर स्थापित किया है — तुम्हारा यह तीर्थ भी यहाँ धरोहर के रूप में समर्पित है।
श्लोक 21 (skanda.6.181.21)
ऋत्विजोऽमी समानीता गुरुणा यज्ञसिद्धये । अजानता द्विजश्रेष्ठा आधिक्यं नागरात्मकम्
ṛtvijo'mī samānītā guruṇā yajñasiddhaye ajānatā dvijaśreṣṭhā ādhikyaṁ nāgarātmakam
गुरु द्वारा यज्ञसिद्धि के लिए ये ऋत्विज लाए गए, हे द्विजश्रेष्ठो, नागरों की विशेष महिमा को न जानते हुए।
श्लोक 22 (skanda.6.181.22)
तस्माच्च क्षम्यतां मह्यं यतश्च वरणं कृतम् । एतेषामेव विप्राणामग्निष्टोमकृते मया
tasmācca kṣamyatāṁ mahyaṁ yataśca varaṇaṁ kṛtam eteṣāmeva viprāṇāmagniṣṭomakṛte mayā
इसलिए मुझे क्षमा करो, क्योंकि जो वरण किया गया था, वह अग्निष्टोम-यज्ञ के लिए इन्हीं ब्राह्मणों के निमित्त मैंने किया था।
श्लोक 23 (skanda.6.181.23)
एतच्च मामकं तीर्थं युष्माकं पापनाशनम् । भविष्यति न सन्देहः कलिकालेऽपि संस्थिते
etacca māmakaṁ tīrthaṁ yuṣmākaṁ pāpanāśanam bhaviṣyati na sandehaḥ kalikāle'pi saṁsthite
यह मेरा तीर्थ तुम्हारे पापों का नाशक होगा — इसमें कोई सन्देह नहीं, कलिकाल में भी यह ऐसा ही रहेगा।
श्लोक 24 (skanda.6.181.24)
ब्राह्मणा ऊचुः । यदि त्वं नागरैर्बाह्यं यज्ञं चात्र करिष्यसि । तदन्येऽपि सुराः सर्वे तव मार्गानुयायि नः । भविष्यन्ति तथा भूपास्तत्कार्यो न मखस्त्वया
brāhmaṇā ūcuḥ yadi tvaṁ nāgarairbāhyaṁ yajñaṁ cātra kariṣyasi tadanye'pi surāḥ sarve tava mārgānuyāyi naḥ bhaviṣyanti tathā bhūpāstatkāryo na makhastvayā
ब्राह्मणों ने कहा — यदि तुम यहाँ नागरों को छोड़कर यज्ञ करोगे, तो अन्य सभी देवता भी तुम्हारे मार्ग का अनुसरण करेंगे, और राजा लोग भी वैसे ही करने लगेंगे — यह कर्म तुम्हें नहीं करना चाहिए।
श्लोक 25 (skanda.6.181.25)
यद्येवमपि देवेश यज्ञकर्म करिष्यसि । अवमन्य द्विजान्सर्वाक्षिप्रं गच्छास्मदंतिकात्
yadyevamapi deveśa yajñakarma kariṣyasi avamanya dvijānsarvākṣipraṁ gacchāsmadaṁtikāt
यदि फिर भी, हे देवेश, तुम समस्त ब्राह्मणों का अपमान करके यज्ञकर्म करोगे, तो शीघ्र हमारे समीप से चले जाओ।
श्लोक 26 (skanda.6.181.26)
ब्रह्मोवाच । अद्यप्रभृति यः कश्चिद्यज्ञमत्र करिष्यति । श्राद्धं वा नागरैर्बाह्यं वृथा तत्संभविष्यति
brahmovāca adyaprabhṛti yaḥ kaścidyajñamatra kariṣyati śrāddhaṁ vā nāgarairbāhyaṁ vṛthā tatsaṁbhaviṣyati
ब्रह्मा ने कहा — आज से जो कोई भी नागरों को छोड़कर यहाँ यज्ञ अथवा श्राद्ध करेगा, वह व्यर्थ होगा।
श्लोक 27 (skanda.6.181.27)
नागरोऽपि च यो न्यत्र कश्चिद्यज्ञं करिष्यति । एतत्क्षेत्रं परित्यज्य वृथा तत्संभविष्यति
nāgaro'pi ca yo nyatra kaścidyajñaṁ kariṣyati etatkṣetraṁ parityajya vṛthā tatsaṁbhaviṣyati
और जो नागर भी इस क्षेत्र को त्यागकर कहीं और यज्ञ करेगा, वह भी व्यर्थ होगा।
श्लोक 28 (skanda.6.181.28)
मर्यादेयं कृता विप्रा नागराणां मयाऽधुना । कृत्वा प्रसादमस्माकं यज्ञार्थं दातुमर्हथ । अनुज्ञां विधिवद्विप्रा येन यज्ञं करोम्यहम्
maryādeyaṁ kṛtā viprā nāgarāṇāṁ mayā'dhunā kṛtvā prasādamasmākaṁ yajñārthaṁ dātumarhatha anujñāṁ vidhivadviprā yena yajñaṁ karomyaham
हे विप्रो, मैंने अभी नागरों के लिए यह मर्यादा स्थापित की है; हम पर कृपा करके यज्ञ हेतु विधिपूर्वक अनुमति दो, जिससे मैं यह यज्ञ सम्पन्न कर सकूँ।
श्लोक 29 (skanda.6.181.29)
सूत उवाच । ततस्तैर्ब्राह्मणैस्तुष्टैरनुज्ञातः पितामहः । चकार विधिवद्यज्ञं ये वृता ब्राह्मणाश्च तैः
sūta uvāca tatastairbrāhmaṇaistuṣṭairanujñātaḥ pitāmahaḥ cakāra vidhivadyajñaṁ ye vṛtā brāhmaṇāśca taiḥ
सूत जी ने कहा — तब उन सन्तुष्ट ब्राह्मणों की अनुमति पाकर पितामह ने विधिपूर्वक यज्ञ किया, उन्हीं वरण किए गए ब्राह्मणों के साथ।
श्लोक 30 (skanda.6.181.30)
विश्वकर्मा समागत्य ततो मस्तकमण्डनम् । चकार ब्राह्मणश्रेष्ठा नागराणां मते स्थितः
viśvakarmā samāgatya tato mastakamaṇḍanam cakāra brāhmaṇaśreṣṭhā nāgarāṇāṁ mate sthitaḥ
फिर विश्वकर्मा ने आकर, नागरों की सम्मति के अनुसार, हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, मस्तक-मण्डन (केशवपन) का कर्म सम्पन्न किया।
श्लोक 31 (skanda.6.181.31)
ब्रह्मापि परमं तोषं गत्वा नारदमब्रवीत् । सावित्रीमानय क्षिप्रं येन गच्छामि मण्डपे
brahmāpi paramaṁ toṣaṁ gatvā nāradamabravīt sāvitrīmānaya kṣipraṁ yena gacchāmi maṇḍape
परम सन्तोष को प्राप्त ब्रह्मा ने नारद के पास जाकर कहा — सावित्री को शीघ्र लाओ, जिससे मैं मण्डप में जा सकूँ।
श्लोक 32 (skanda.6.181.32)
वाद्यमानेषु वाद्येषु सिद्धकिन्नरगुह्यकैः । गन्धर्वैर्गीतसंसक्तैर्वेदोच्चारपरैर्द्विजैः । अरणिं समुपादाय पुलस्त्यो वाक्यमब्रवीत्
vādyamāneṣu vādyeṣu siddhakinnaraguhyakaiḥ gandharvairgītasaṁsaktairvedoccāraparairdvijaiḥ araṇiṁ samupādāya pulastyo vākyamabravīt
सिद्ध, किन्नर और गुह्यकों द्वारा वाद्य बजाए जाते हुए, गीत में तल्लीन गन्धर्वों तथा वेदपाठ में लीन ब्राह्मणों के बीच, पुलस्त्य ने अरणि (यज्ञ-काष्ठ) हाथ में लेकर यह वचन कहा —
श्लोक 33 (skanda.6.181.33)
पत्नी पत्नीति विप्रेन्द्राः प्रोच्चैस्तत्र व्यवस्थिताः
patnī patnīti viprendrāḥ proccaistatra vyavasthitāḥ
"पत्नी! पत्नी!" — इस प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ खड़े होकर ऊँचे स्वर में पुकारने लगे।
श्लोक 34 (skanda.6.181.34)
एतस्मिन्नंतरे ब्रह्मा नारदं मुनिसत्तमम् । संज्ञया प्रेषयामास पत्नी चानीयतामिति
etasminnaṁtare brahmā nāradaṁ munisattamam saṁjñayā preṣayāmāsa patnī cānīyatāmiti
इसी बीच ब्रह्मा ने संकेत से मुनिश्रेष्ठ नारद को भेजा — "पत्नी को लाया जाए।"
श्लोक 35 (skanda.6.181.35)
सोऽपि मंदं समागत्य सावित्रीं प्राह लीलया । युद्धप्रियोंऽतरं वांछन्सावित्र्या सह वेधसः
so'pi maṁdaṁ samāgatya sāvitrīṁ prāha līlayā yuddhapriyoṁ'taraṁ vāṁchansāvitryā saha vedhasaḥ
वे भी धीरे-धीरे जाकर, सावित्री से क्रीड़ावश किंचित विलम्ब चाहते हुए, लीलापूर्वक बोले —
श्लोक 36 (skanda.6.181.36)
अहं संप्रेषितः पित्रा तव पार्श्वे सुरेश्वरि । आगच्छ प्रस्थितः स्नातः सांप्रतं यज्ञमण्डपे
ahaṁ saṁpreṣitaḥ pitrā tava pārśve sureśvari āgaccha prasthitaḥ snātaḥ sāṁprataṁ yajñamaṇḍape
हे सुरेश्वरि, मैं तुम्हारे पिता द्वारा तुम्हारे पास भेजा गया हूँ। आओ, वे स्नान करके अभी यज्ञमण्डप की ओर प्रस्थान कर चुके हैं।
श्लोक 37 (skanda.6.181.37)
परमेकाकिनी तत्र गच्छमाना सुरेश्वरि । कीदृग्रूपा सदसि वै दृश्यसे त्वमनाथवत्
paramekākinī tatra gacchamānā sureśvari kīdṛgrūpā sadasi vai dṛśyase tvamanāthavat
हे सुरेश्वरि, वहाँ अकेली जाती हुई तुम सभा में अनाथ जैसी किस रूप में दिखोगी?
श्लोक 38 (skanda.6.181.38)
तस्मादानीयतां सर्वा याः काश्चिद्देवयोषितः । याभिः परिवृता देवि यास्यसि त्वं महामखे
tasmādānīyatāṁ sarvā yāḥ kāściddevayoṣitaḥ yābhiḥ parivṛtā devi yāsyasi tvaṁ mahāmakhe
इसलिए जो भी देवांगनाएँ यहाँ हैं, उन सबको बुलाया जाए, जिनसे घिरकर तुम इस महायज्ञ में जाओ।
श्लोक 39 (skanda.6.181.39)
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठो नारदो मुनिसत्तमः । अब्रवीत्पितरं गत्वा तातांबाऽऽकारिता मया
evamuktvā muniśreṣṭho nārado munisattamaḥ abravītpitaraṁ gatvā tātāṁbā''kāritā mayā
ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ नारद पिता के पास जाकर बोले — "हे तात, माता को बुला लिया गया है।"
श्लोक 40 (skanda.6.181.40)
परं तस्याः स्थिरो भावः किंचित्संलक्षितो मया । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ततो मन्युसमन्वितः
paraṁ tasyāḥ sthiro bhāvaḥ kiṁcitsaṁlakṣito mayā tasya tadvacanaṁ śrutvā tato manyusamanvitaḥ
"किन्तु उनके मन में कुछ हिचकिचाहट मुझे दिखाई दी।" उनका यह वचन सुनकर, क्रोधयुक्त होकर, ब्रह्मा ने —
श्लोक 41 (skanda.6.181.41)
पुलस्त्यं प्रेषयामास सावित्र्या सन्निधौ ततः । गच्छ वत्स त्वमानीहि स्थानं सा शिथिलात्मिका । सोमभारपरिश्रांतं पश्य मामूर्ध्वसंस्थितम्
pulastyaṁ preṣayāmāsa sāvitryā sannidhau tataḥ gaccha vatsa tvamānīhi sthānaṁ sā śithilātmikā somabhārapariśrāṁtaṁ paśya māmūrdhvasaṁsthitam
— पुलस्त्य को सावित्री के पास भेजा — "हे वत्स, जाकर उन्हें ले आओ, वे शिथिल पड़ी हैं। देखो, मैं सोम के भार से थका हुआ यहाँ ऊपर खड़ा हूँ।"
श्लोक 42 (skanda.6.181.42)
एष कालात्ययो भावि यज्ञकर्मणि सांप्रतम् । यज्ञयानमुहूर्तोऽयं सावशेषो व्यवस्थितः
eṣa kālātyayo bhāvi yajñakarmaṇi sāṁpratam yajñayānamuhūrto'yaṁ sāvaśeṣo vyavasthitaḥ
यज्ञकर्म का यह समय अभी बीत रहा है; यज्ञ-प्रस्थान का शुभ मुहूर्त्त अब बस थोड़ा ही शेष रह गया है।
श्लोक 43 (skanda.6.181.43)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुलस्त्यः सत्वरं ययौ । सावित्री तिष्ठते यत्र गीतनृत्यसमाकुला
tasya tadvacanaṁ śrutvā pulastyaḥ satvaraṁ yayau sāvitrī tiṣṭhate yatra gītanṛtyasamākulā
उनका यह वचन सुनकर पुलस्त्य शीघ्र वहाँ गए जहाँ सावित्री गीत-नृत्य में तल्लीन खड़ी थीं।
श्लोक 44 (skanda.6.181.44)
ततः प्रोवाच किं देवि त्वं तिष्ठसि निराकुला । यज्ञयानोचितः कालः सोऽयं शेषस्तु तिष्ठति
tataḥ provāca kiṁ devi tvaṁ tiṣṭhasi nirākulā yajñayānocitaḥ kālaḥ so'yaṁ śeṣastu tiṣṭhati
फिर उन्होंने कहा — हे देवी, तुम यहाँ निश्चिन्त होकर क्यों बैठी हो? यज्ञ-प्रस्थान का उचित समय है, जिसमें से अब बस थोड़ा ही शेष रह गया है।
श्लोक 45 (skanda.6.181.45)
तस्मादागच्छ गच्छामस्तातः कृच्छ्रेण तिष्ठति । सोमभारार्द्दितश्चोर्ध्वं सर्वैर्देवैः समावृतः
tasmādāgaccha gacchāmastātaḥ kṛcchreṇa tiṣṭhati somabhārārdditaścordhvaṁ sarvairdevaiḥ samāvṛtaḥ
इसलिए आओ, चलें — तुम्हारे तात कठिनाई से प्रतीक्षा कर रहे हैं, समस्त देवताओं से घिरे, सोम के भार से पीड़ित, ऊपर खड़े हुए।
श्लोक 46 (skanda.6.181.46)
सावित्र्युवाच । सर्वदेववृतस्तात तव तातो व्यवस्थितः । एकाकिनी कथं तत्र गच्छाम्यहमनाथवत्
sāvitryuvāca sarvadevavṛtastāta tava tāto vyavasthitaḥ ekākinī kathaṁ tatra gacchāmyahamanāthavat
सावित्री ने कहा — हे वत्स, तुम्हारे पिता समस्त देवताओं से घिरे खड़े हैं; मैं अकेली, अनाथ की भाँति वहाँ कैसे जाऊँ?
श्लोक 47 (skanda.6.181.47)
तद्ब्रूहि पितरं गत्वा मुहूर्तं परिपाल्यताम्
tadbrūhi pitaraṁ gatvā muhūrtaṁ paripālyatām
इसलिए जाकर पिता से कहो कि वे एक मुहूर्त प्रतीक्षा करें।
श्लोक 48 (skanda.6.181.48)
यावदभ्येति शक्राणी गौरी लक्ष्मीस्तथा पराः । देवकन्याः समाजेऽत्र ताभिरेष्याम्यहं द्रुतम्
yāvadabhyeti śakrāṇī gaurī lakṣmīstathā parāḥ devakanyāḥ samāje'tra tābhireṣyāmyahaṁ drutam
जब तक शची (इन्द्राणी), गौरी, लक्ष्मी तथा अन्य देवकन्याएँ इस सभा में एकत्र न हो जाएँ — उन्हीं के साथ मैं शीघ्र आऊँगी।
श्लोक 49 (skanda.6.181.49)
सर्वासां प्रेषितो वायुर्निमत्रणकृते मया । आगमिष्यन्ति ताः शीघ्रमेवं वाच्यः पिता त्वया
sarvāsāṁ preṣito vāyurnimatraṇakṛte mayā āgamiṣyanti tāḥ śīghramevaṁ vācyaḥ pitā tvayā
मैंने उन सबके निमन्त्रण हेतु वायु को भेजा है; वे शीघ्र ही आएँगी — पिता से यही कहना।
श्लोक 50 (skanda.6.181.50)
सूत उवाच । सोऽपि गत्वा द्रुतं प्राह सोमभारार्दितं विधिम् । नैषाभ्येति जगन्नाथ प्रसक्ता गृहकर्मणि
sūta uvāca so'pi gatvā drutaṁ prāha somabhārārditaṁ vidhim naiṣābhyeti jagannātha prasaktā gṛhakarmaṇi
सूत जी ने कहा — वे भी शीघ्र जाकर सोम के भार से पीड़ित विधाता से बोले — "वह नहीं आ रही, हे जगन्नाथ, वह गृहकार्य में लगी हुई है।"
श्लोक 51 (skanda.6.181.51)
सा मां प्राह च देवानां पत्नीभिः सहिता मखे । अहं यास्यामि तासां च नैकाद्यापि प्रदृश्यते
sā māṁ prāha ca devānāṁ patnībhiḥ sahitā makhe ahaṁ yāsyāmi tāsāṁ ca naikādyāpi pradṛśyate
"उसने मुझसे कहा — मैं देवताओं की पत्नियों सहित यज्ञ में जाऊँगी, और उनमें से एक भी अभी दिखाई नहीं दे रही है।"
श्लोक 52 (skanda.6.181.52)
एवं ज्ञात्वा सुरश्रेष्ठ कुरु यत्ते सुरोचते । अतिक्रामति कालोऽयं यज्ञयानसमुद्रवः । तिष्ठते च गृहव्यग्रा सापि स्त्री शिथिलात्मिका
evaṁ jñātvā suraśreṣṭha kuru yatte surocate atikrāmati kālo'yaṁ yajñayānasamudravaḥ tiṣṭhate ca gṛhavyagrā sāpi strī śithilātmikā
"यह जानकर, हे सुरश्रेष्ठ, जो तुम्हें उचित लगे वह करो। यज्ञ-प्रस्थान का यह समय बीता जा रहा है, और वह स्त्री भी गृहकार्य में व्यग्र, शिथिल बनी हुई है।"
श्लोक 53 (skanda.6.181.53)
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य पुलस्त्यस्य पितामहः । समीपस्थं तदा शक्रं प्रोवाच वचनं द्विजाः
tacchrutvā vacanaṁ tasya pulastyasya pitāmahaḥ samīpasthaṁ tadā śakraṁ provāca vacanaṁ dvijāḥ
पुलस्त्य का यह वचन सुनकर पितामह ने पास खड़े शक्र (इन्द्र) से यह वचन कहा, हे द्विजो —
श्लोक 54 (skanda.6.181.54)
ब्रह्मोवाच । शक्र नायाति सावित्री सापि स्त्री शिथिलात्मिका । अनया भार्यया यज्ञो मया कार्योऽयमेव तु
brahmovāca śakra nāyāti sāvitrī sāpi strī śithilātmikā anayā bhāryayā yajño mayā kāryo'yameva tu
ब्रह्मा ने कहा — हे शक्र, सावित्री नहीं आ रही, वह स्त्री भी शिथिल है; किन्तु यह यज्ञ मुझे इसी पत्नी के साथ करना है।
श्लोक 55 (skanda.6.181.55)
गच्छ शक्र समानीहि कन्यां कांचित्त्वरान्वितः । यावन्न क्रमते कालो यज्ञयानसमुद्भवः
gaccha śakra samānīhi kanyāṁ kāṁcittvarānvitaḥ yāvanna kramate kālo yajñayānasamudbhavaḥ
जाओ शक्र, शीघ्रतापूर्वक किसी कन्या को ले आओ, इससे पहले कि यज्ञ-प्रस्थान का समय बीत जाए।
श्लोक 56 (skanda.6.181.56)
पितामहवचः श्रुत्वा तदर्थं कन्यका द्विजाः । शक्रेणासादिता शीघ्रं भ्रममाणा समीपतः
pitāmahavacaḥ śrutvā tadarthaṁ kanyakā dvijāḥ śakreṇāsāditā śīghraṁ bhramamāṇā samīpataḥ
पितामह का वचन सुनकर, उसी प्रयोजन के लिए, हे द्विजो, समीप में भ्रमण करती हुई एक कन्या शक्र को शीघ्र मिल गई।
श्लोक 57 (skanda.6.181.57)
अथ तक्रघटव्यग्रमस्तका तेन वीक्षिता । कन्यका गोपजा तन्वी चंद्रास्या पद्मलोचना
atha takraghaṭavyagramastakā tena vīkṣitā kanyakā gopajā tanvī caṁdrāsyā padmalocanā
तब उन्होंने देखा — तक्र (छाछ) के घड़े से भारित मस्तक वाली, कृशांगी गोपकन्या को, चन्द्रमुखी और कमललोचना।
श्लोक 58 (skanda.6.181.58)
सर्वलक्षणसंपूर्णा यौवनारंभमाश्रिता । सा शक्रेणाथ संपृष्टा का त्वं कमललोचने
sarvalakṣaṇasaṁpūrṇā yauvanāraṁbhamāśritā sā śakreṇātha saṁpṛṣṭā kā tvaṁ kamalalocane
सर्वलक्षणसम्पन्ना, यौवन के आरम्भ में स्थित उस कन्या से शक्र ने पूछा — हे कमललोचने, तुम कौन हो?
श्लोक 59 (skanda.6.181.59)
कुमारी वा सनाथा वा सुता कस्य ब्रवीहि नः
kumārī vā sanāthā vā sutā kasya bravīhi naḥ
क्या तुम कुमारी हो या किसी की पत्नी? किसकी पुत्री हो, हमें बताओ।
श्लोक 60 (skanda.6.181.60)
कन्यो वाच । गोपकन्यास्मि भद्रं ते तक्रं विक्रेतुमागता । यदि गृह्णासि मे मूल्यं तच्छीघ्रं देहि मा चिरम्
kanyo vāca gopakanyāsmi bhadraṁ te takraṁ vikretumāgatā yadi gṛhṇāsi me mūlyaṁ tacchīghraṁ dehi mā ciram
कन्या ने कहा — मैं गोपकन्या हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; तक्र बेचने आई हूँ। यदि तुम इसे लेना चाहो तो शीघ्र मूल्य दो, विलम्ब मत करो।
श्लोक 61 (skanda.6.181.61)
तच्छ्रुत्वा त्रिदिवेन्द्रोऽपि मत्वा तां गोपकन्यकाम् । जगृहे त्वरया युक्तस्तक्रं चोत्सृज्य भूतले
tacchrutvā tridivendro'pi matvā tāṁ gopakanyakām jagṛhe tvarayā yuktastakraṁ cotsṛjya bhūtale
यह सुनकर त्रिदिवेन्द्र (इन्द्र) ने भी उसे उपयुक्त गोपकन्या मानकर शीघ्रतापूर्वक पकड़ लिया, और तक्र को भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 62 (skanda.6.181.62)
अथ तां रुदतीं शक्रः समादाय त्वरान्वितः । गोवक्त्रेण प्रवेश्याथ गुह्येनाकर्षयत्ततः
atha tāṁ rudatīṁ śakraḥ samādāya tvarānvitaḥ govaktreṇa praveśyātha guhyenākarṣayattataḥ
फिर उस रोती हुई कन्या को शीघ्रतापूर्वक लेकर शक्र ने उसे गाय के मुख से प्रविष्ट कराकर गुह्य मार्ग से बाहर खींचा।
श्लोक 63 (skanda.6.181.63)
एवं मेध्यतमां कृत्वा संस्नाप्य सलिलैः शुभैः । ज्येष्ठकुण्डस्य विप्रेन्द्राः परिधाय्य सुवाससी
evaṁ medhyatamāṁ kṛtvā saṁsnāpya salilaiḥ śubhaiḥ jyeṣṭhakuṇḍasya viprendrāḥ paridhāyya suvāsasī
इस प्रकार उसे अत्यन्त पवित्र बनाकर, शुभ जल से स्नान कराकर, हे विप्रेन्द्रो, ज्येष्ठकुण्ड के तट पर उसे सुन्दर वस्त्र पहनाए।
श्लोक 64 (skanda.6.181.64)
ततश्च हर्षसंयुक्तः प्रोवाच चतुराननम् । द्रुतं गत्वा पुरो धृत्वा सर्वदेवसमागमे
tataśca harṣasaṁyuktaḥ provāca caturānanam drutaṁ gatvā puro dhṛtvā sarvadevasamāgame
फिर हर्षयुक्त होकर वे शीघ्र चतुरानन (ब्रह्मा) के पास जाकर, समस्त देवताओं की सभा में उपस्थित होकर बोले —
श्लोक 65 (skanda.6.181.65)
कन्यकेयं सुरश्रेष्ठ समानीता मयाऽधुना । तवार्थाय सुरूपांगी सर्वलक्षणलक्षिता
kanyakeyaṁ suraśreṣṭha samānītā mayā'dhunā tavārthāya surūpāṁgī sarvalakṣaṇalakṣitā
हे सुरश्रेष्ठ, यह कन्या मैंने अभी तुम्हारे लिए लाई है — सुन्दर अंगों वाली, सभी शुभ लक्षणों से युक्त।
श्लोक 66 (skanda.6.181.66)
गोपकन्या विदित्वेमां गोवक्त्रेण प्रवेश्य च । आकर्षिता च गुह्येन पावनार्थं चतुर्मुख
gopakanyā viditvemāṁ govaktreṇa praveśya ca ākarṣitā ca guhyena pāvanārthaṁ caturmukha
यह गोपकन्या जानकर, गाय के मुख से प्रवेश कराकर, हे चतुर्मुख, गुह्य मार्ग से खींचकर, पवित्र करने हेतु ऐसा किया गया है।
श्लोक 67 (skanda.6.181.67)
श्रीवासुदेव उवाच । गवां च ब्राह्मणानां च कुलमेकं द्विधा कृतम् । एकत्र मंत्रास्तिष्ठंति हविरन्यत्र तिष्ठति
śrīvāsudeva uvāca gavāṁ ca brāhmaṇānāṁ ca kulamekaṁ dvidhā kṛtam ekatra maṁtrāstiṣṭhaṁti haviranyatra tiṣṭhati
श्रीवासुदेव ने कहा — गौओं और ब्राह्मणों का कुल एक ही है, जो दो भागों में विभक्त है; एक भाग में मन्त्र रहते हैं, दूसरे भाग में हवि।
श्लोक 68 (skanda.6.181.68)
धेनूदराद्विनिष्क्रांता तज्जातेयं द्विजन्मनाम् । अस्याः पाणिग्रहं देव त्वं कुरुष्व मखाप्तये
dhenūdarādviniṣkrāṁtā tajjāteyaṁ dvijanmanām asyāḥ pāṇigrahaṁ deva tvaṁ kuruṣva makhāptaye
गाय के उदर से निकली यह कन्या उसी द्विजकुल में उत्पन्न है; हे देव, यज्ञ की सिद्धि हेतु तुम इसका पाणिग्रहण करो —
श्लोक 69 (skanda.6.181.69)
यावन्न चलते कालो यज्ञयानसमुद्भवः
yāvanna calate kālo yajñayānasamudbhavaḥ
— इससे पहले कि यज्ञ-प्रस्थान का समय बीत जाए।
श्लोक 70 (skanda.6.181.70)
रुद्र उवाच । प्रविष्टा गोमुखे यस्मादपानेन विनिर्गता । गायत्रीनाम ते पत्नी तस्मादेषा भविष्यति
rudra uvāca praviṣṭā gomukhe yasmādapānena vinirgatā gāyatrīnāma te patnī tasmādeṣā bhaviṣyati
रुद्र ने कहा — चूँकि यह गाय के मुख से प्रविष्ट होकर गुदा-मार्ग से बाहर निकली है, इसलिए इसका नाम गायत्री होगा, और यह तुम्हारी पत्नी बनेगी।
श्लोक 71 (skanda.6.181.71)
ब्रह्मोवाच । वदन्तु ब्राह्मणाः सर्वे गोपकन्याप्यसौ यदि । संभूय ब्राह्मणीश्रेष्ठा यथा पत्नी भवेन्मम
brahmovāca vadantu brāhmaṇāḥ sarve gopakanyāpyasau yadi saṁbhūya brāhmaṇīśreṣṭhā yathā patnī bhavenmama
ब्रह्मा ने कहा — समस्त ब्राह्मण कहें — यदि यह गोपकन्या भी संस्कारित होकर ब्राह्मणियों में श्रेष्ठ मेरी पत्नी बन सके...
श्लोक 72 (skanda.6.181.72)
ब्राह्मणा ऊचुः । एषा स्याद्ब्राह्मणश्रेष्ठा गोपजातिविवर्जिता । अस्मद्वाक्याच्चतुर्वक्त्र कुरु पाणिग्रहं द्रुतम्
brāhmaṇā ūcuḥ eṣā syādbrāhmaṇaśreṣṭhā gopajātivivarjitā asmadvākyāccaturvaktra kuru pāṇigrahaṁ drutam
ब्राह्मणों ने कहा — यह गोपजाति से मुक्त होकर ब्राह्मणियों में श्रेष्ठ होगी। हमारे वचन से, हे चतुर्मुख, शीघ्र पाणिग्रहण करो।
श्लोक 73 (skanda.6.181.73)
सूत उवाच । ततः पाणिग्रहं चक्रे तस्या देवः पितामहः । कृत्वा सोमं ततो मूर्ध्नि गृह्योक्तविधिना द्विजाः
sūta uvāca tataḥ pāṇigrahaṁ cakre tasyā devaḥ pitāmahaḥ kṛtvā somaṁ tato mūrdhni gṛhyoktavidhinā dvijāḥ
सूत जी ने कहा — तब देव पितामह ने उसका पाणिग्रहण किया, और गृह्यसूत्रोक्त विधि के अनुसार, हे द्विजो, उसके मस्तक पर सोम रखा।
श्लोक 74 (skanda.6.181.74)
संतिष्ठति च तत्रस्था महादेवी सुपावनी । अद्यापि लोके विख्याता धनसौभाग्यदायिनी
saṁtiṣṭhati ca tatrasthā mahādevī supāvanī adyāpi loke vikhyātā dhanasaubhāgyadāyinī
वह वहाँ महादेवी के रूप में स्थित रहती है, अत्यन्त पवित्र; आज भी लोक में धन और सौभाग्य देने वाली देवी के रूप में विख्यात है।
श्लोक 75 (skanda.6.181.75)
यस्तस्यां कुरुते मर्त्यः कन्यादानं समाहितः । समस्तं फलमाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः
yastasyāṁ kurute martyaḥ kanyādānaṁ samāhitaḥ samastaṁ phalamāpnoti rājasūyāśvamedhayoḥ
जो मनुष्य सावधानीपूर्वक वहाँ कन्यादान करता है, वह राजसूय और अश्वमेध यज्ञ का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।
श्लोक 76 (skanda.6.181.76)
कन्या हस्तग्रहं तत्र याऽऽप्नोति पतिना सह । सा स्यात्पुत्रवती साध्वी सुखसौभाग्यसंयुता
kanyā hastagrahaṁ tatra yā''pnoti patinā saha sā syātputravatī sādhvī sukhasaubhāgyasaṁyutā
जिस कन्या का पाणिग्रहण वहाँ पति के साथ होता है, वह पुत्रवती, साध्वी, सुख-सौभाग्य से युक्त होती है।
श्लोक 77 (skanda.6.181.77)
पिंडदानं नरस्तस्यां यः करोति द्विजोत्तमाः । पितरस्तस्य संतुष्टास्तर्पिताः पितृतीर्थवत्
piṁḍadānaṁ narastasyāṁ yaḥ karoti dvijottamāḥ pitarastasya saṁtuṣṭāstarpitāḥ pitṛtīrthavat
जो मनुष्य वहाँ पिण्डदान करता है, हे द्विजश्रेष्ठो, उसके पितर सन्तुष्ट होकर पितृतीर्थ के समान तृप्त हो जाते हैं।