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नागर खण्ड · अध्याय 182

रूपतीर्थोत्पत्तिपूर्वक प्रथम यज्ञदिवस वृत्तान्त वर्णन

अध्याय 181अध्याय-सूचीअध्याय 183

श्लोक 1 (skanda.6.182.1)

सूत उवाच । एवं पत्नीं समासाद्य गायत्रीं चतुराननः । संप्रहृष्टमना भूत्वा प्रस्थितो यज्ञमण्डपम्

sūta uvāca evaṁ patnīṁ samāsādya gāyatrīṁ caturānanaḥ saṁprahṛṣṭamanā bhūtvā prasthito yajñamaṇḍapam

सूत जी ने कहा — इस प्रकार गायत्री को पत्नी रूप में पाकर चतुर्मुख ब्रह्मा अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर यज्ञमण्डप की ओर प्रस्थित हुए।

श्लोक 2 (skanda.6.182.2)

गायत्र्यपि समादाय मूर्ध्नि तामरणिं मुदा । प्रतस्थे संपरित्यज्य गोपभावं विगर्हितम्

gāyatryapi samādāya mūrdhni tāmaraṇiṁ mudā pratasthe saṁparityajya gopabhāvaṁ vigarhitam

गायत्री भी हर्षपूर्वक उस अरणि (यज्ञकाष्ठ) को मस्तक पर धारण करके, अपने साधारण गोपभाव को पूर्णतः त्यागकर प्रस्थित हुईं।

श्लोक 3 (skanda.6.182.3)

वाद्यमानेषु वाद्येषु ब्रह्मघोषे दिवंगते । कलं प्रगायमानेषु गन्धर्वेषु समंततः

vādyamāneṣu vādyeṣu brahmaghoṣe divaṁgate kalaṁ pragāyamāneṣu gandharveṣu samaṁtataḥ

जब चारों ओर नाना प्रकार के वाद्य बज रहे थे, वेदघोष आकाश तक गूँज रहा था, और गन्धर्व मधुर स्वर में गान कर रहे थे,

श्लोक 4 (skanda.6.182.4)

सर्वदेवद्विजोपेतः संप्राप्तो यज्ञमण्डपे । गायत्र्या सहितो ब्रह्मा मानुषं भावमाश्रितः

sarvadevadvijopetaḥ saṁprāpto yajñamaṇḍape gāyatryā sahito brahmā mānuṣaṁ bhāvamāśritaḥ

तब ब्रह्मा समस्त देवों और ब्राह्मणों सहित, मानवभाव धारण करके, गायत्री के साथ यज्ञमण्डप में पहुँचे।

श्लोक 5 (skanda.6.182.5)

एतस्मिन्नंतरे चक्रे केशनिर्वपणं विधेः । विश्वकर्मा नखानां च गायत्र्यास्तदनंतरम्

etasminnaṁtare cakre keśanirvapaṇaṁ vidheḥ viśvakarmā nakhānāṁ ca gāyatryāstadanaṁtaram

इसी बीच विश्वकर्मा ने विधिपूर्वक विधाता के केशों का निर्वपण किया, और तदनन्तर गायत्री के नखों का भी।

श्लोक 6 (skanda.6.182.6)

औदुम्बरं ततो दण्डं पुलस्त्योऽस्मै समाददे । एणशृंगान्वितं चर्म मन्त्रवद्विजसत्तमाः

audumbaraṁ tato daṇḍaṁ pulastyo'smai samādade eṇaśṛṁgānvitaṁ carma mantravadvijasattamāḥ

फिर पुलस्त्य ने उन्हें औदुम्बर काष्ठ का दण्ड और सींगों सहित कृष्णमृगचर्म, मन्त्रपूर्वक संस्कारित करके प्रदान किया, हे द्विजसत्तमो।

श्लोक 7 (skanda.6.182.7)

पत्नीशालां गृहीत्वा च गायत्रीं मौनधारिणीम् । मेखलां निदधे चान्यां कट्यां मौंजीमयीं शुभाम्

patnīśālāṁ gṛhītvā ca gāyatrīṁ maunadhāriṇīm mekhalāṁ nidadhe cānyāṁ kaṭyāṁ mauṁjīmayīṁ śubhām

मौनव्रतधारिणी गायत्री को पत्नीशाला में ले जाकर उनकी कटि में मौंजी की एक और शुभ मेखला बाँधी।

श्लोक 8 (skanda.6.182.8)

ततश्चक्रे परं कर्म यदुक्तं यज्ञमंडपे । ऋत्विग्भिः सहितो वेधा वेदवाक्यसमादृतः

tataścakre paraṁ karma yaduktaṁ yajñamaṁḍape ṛtvigbhiḥ sahito vedhā vedavākyasamādṛtaḥ

तब विधाता ने ऋत्विजों सहित, वेदवाक्य का आदर करते हुए, यज्ञमण्डप में विहित आगे का कर्म सम्पन्न किया।

श्लोक 9 (skanda.6.182.9)

प्रवर्ग्ये जायमाने च तत्राश्चर्यमभून्महत् । जाल्मरूपधरः कश्चिद्दिग्वासा विकृताननः

pravargye jāyamāne ca tatrāścaryamabhūnmahat jālmarūpadharaḥ kaściddigvāsā vikṛtānanaḥ

प्रवर्ग्य कर्म चलते समय वहाँ एक महान आश्चर्य हुआ — कोई अत्यंत कुरूप, दिगम्बर, विकृतमुख प्राणी वहाँ प्रकट हुआ,

श्लोक 10 (skanda.6.182.10)

कपालपाणिरायातो भोजनं दीयतामिति । निषेध्यमानोऽपि च तैः प्रविष्टो याज्ञिकं सदः । स कृत्वाऽटनमन्याय्यं तर्ज्यमानोऽपि तापसैः

kapālapāṇirāyāto bhojanaṁ dīyatāmiti niṣedhyamāno'pi ca taiḥ praviṣṭo yājñikaṁ sadaḥ sa kṛtvā'ṭanamanyāyyaṁ tarjyamāno'pi tāpasaiḥ

हाथ में कपाल लिए हुए वह "भोजन दो" कहता आया; रोके जाने पर भी वह याज्ञिक सभा में घुस गया, और तपस्वियों के डाँटने पर भी अनुचित रीति से घूमने लगा।

श्लोक 11 (skanda.6.182.11)

सदस्या ऊचुः । कस्मात्पापसमेतस्त्वं प्रविष्टो यज्ञमण्डपे । कपाली नग्नरूपो यो यज्ञकर्मविवर्जितः

sadasyā ūcuḥ kasmātpāpasametastvaṁ praviṣṭo yajñamaṇḍape kapālī nagnarūpo yo yajñakarmavivarjitaḥ

सभासदों ने कहा — हे पापी, तू कपाल धारण किए, नग्न, यज्ञकर्म से रहित होकर इस यज्ञमण्डप में क्यों घुस आया है?

श्लोक 12 (skanda.6.182.12)

तस्माद्गच्छ द्रुतं मूढ यावद्ब्रह्मा न कुप्यति । तथाऽन्ये ब्राह्मणश्रेष्ठास्तथा देवाः सवासवाः

tasmādgaccha drutaṁ mūḍha yāvadbrahmā na kupyati tathā'nye brāhmaṇaśreṣṭhāstathā devāḥ savāsavāḥ

इसलिए हे मूढ़, शीघ्र यहाँ से चला जा, इससे पहले कि ब्रह्मा तथा अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मण और वासव सहित देवगण क्रुद्ध हों।

श्लोक 13 (skanda.6.182.13)

जाल्म उवाच । ब्रह्मयज्ञमिमं श्रुत्वा दूरादत्र समागतः । बुभुक्षितो द्विजश्रेष्ठास्तत्किमर्थं विगर्हथ

jālma uvāca brahmayajñamimaṁ śrutvā dūrādatra samāgataḥ bubhukṣito dvijaśreṣṭhāstatkimarthaṁ vigarhatha

उस दुष्ट ने कहा — इस ब्रह्मयज्ञ का समाचार सुनकर मैं दूर से भूखा आया हूँ, हे द्विजश्रेष्ठो, फिर तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो?

श्लोक 14 (skanda.6.182.14)

दीनांधैः कृपणैः सवैर्स्तर्पितैः क्रतुरुच्यते । अन्यथाऽसौ विनाशाय यदुक्तं ब्राह्मणैर्वचः

dīnāṁdhaiḥ kṛpaṇaiḥ savairstarpitaiḥ kraturucyate anyathā'sau vināśāya yaduktaṁ brāhmaṇairvacaḥ

यज्ञ तभी सफल कहा जाता है जब दीन, अंधे और दरिद्र भोजन से तृप्त किए जाएँ; अन्यथा ब्राह्मणों का वही कथन उसके विनाश का कारण बन जाता है।

श्लोक 15 (skanda.6.182.15)

अन्नहीनो दहेद्राष्टं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विजः । याज्ञिकं दक्षिणा हीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः

annahīno dahedrāṣṭaṁ mantrahīnastu ṛtvijaḥ yājñikaṁ dakṣiṇā hīno nāsti yajñasamo ripuḥ

अन्नहीन राष्ट्र भस्म होता है, मन्त्रहीन ऋत्विज असफल होता है, दक्षिणाहीन याज्ञिक कर्म असफल होता है — ऐसे यज्ञ के समान कोई शत्रु नहीं है।

श्लोक 16 (skanda.6.182.16)

ब्राह्मणा ऊचुः । यदि त्वं भोक्तुकामस्तु समायातो व्रज द्रुतम् । एतस्यां सत्रशालायां भुञ्जते यत्र तापसाः । दीनान्धाः कृपणाश्चैव ततः क्षुत्क्षामकंठिताः

brāhmaṇā ūcuḥ yadi tvaṁ bhoktukāmastu samāyāto vraja drutam etasyāṁ satraśālāyāṁ bhuñjate yatra tāpasāḥ dīnāndhāḥ kṛpaṇāścaiva tataḥ kṣutkṣāmakaṁṭhitāḥ

ब्राह्मणों ने कहा — यदि तुझे भोजन की इच्छा है तो शीघ्र उस सत्रशाला में जा, जहाँ भूख से क्षीणकंठ तपस्वी, दीन, अंधे और दरिद्र भोजन करते हैं।

श्लोक 17 (skanda.6.182.17)

अथवा धनकामस्त्वं वस्त्रकामोऽथ तापस । व्रज वित्तपतिर्यत्र दानशालां समाश्रितः

athavā dhanakāmastvaṁ vastrakāmo'tha tāpasa vraja vittapatiryatra dānaśālāṁ samāśritaḥ

अथवा हे तापस, यदि तुझे धन या वस्त्र की इच्छा है तो वहाँ जा जहाँ धनपति (कुबेर) दानशाला में विराजमान हैं।

श्लोक 18 (skanda.6.182.18)

अनिंद्योऽयं महामूर्ख यज्ञः पैतामहो यतः । अर्चितः सर्वतः पुण्यं तत्किं निन्दसि दुर्मते

aniṁdyo'yaṁ mahāmūrkha yajñaḥ paitāmaho yataḥ arcitaḥ sarvataḥ puṇyaṁ tatkiṁ nindasi durmate

यह पितामह का यज्ञ निन्दा से परे है, हे महामूर्ख — यह सर्वत्र पुण्यरूप में पूजित है; फिर तू, हे दुर्मते, इसकी निन्दा क्यों करता है?

श्लोक 19 (skanda.6.182.19)

सूत उवाच । एवमुक्तः कपालं स परिक्षिप्य धरातले । जगामादर्शनं सद्यो दीपवद्द्विजसत्तमाः

sūta uvāca evamuktaḥ kapālaṁ sa parikṣipya dharātale jagāmādarśanaṁ sadyo dīpavaddvijasattamāḥ

सूत जी ने कहा — ऐसा कहे जाने पर उसने कपाल धरती पर फेंक दिया और दीपक के समान तत्क्षण अदृश्य हो गया, हे द्विजसत्तमो।

श्लोक 20 (skanda.6.182.20)

ऋत्विज ऊचुः । कथं यज्ञक्रिया कार्या कपाले सदसि स्थिते । परिक्षिपथ तस्मात्तु एवमूचुर्द्विजोत्तमाः

ṛtvija ūcuḥ kathaṁ yajñakriyā kāryā kapāle sadasi sthite parikṣipatha tasmāttu evamūcurdvijottamāḥ

ऋत्विजों ने कहा — सभा के मध्य कपाल पड़े रहने पर यज्ञक्रिया कैसे सम्पन्न हो? इसे तत्काल फेंक दो — ऐसा श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने कहा।

श्लोक 21 (skanda.6.182.21)

अथैको बहुधा प्रोक्तः सदस्यैश्च द्विजोत्तमैः । दण्डकाष्ठं समुद्यम्य प्रचिक्षेप बहिस्तथा

athaiko bahudhā proktaḥ sadasyaiśca dvijottamaiḥ daṇḍakāṣṭhaṁ samudyamya pracikṣepa bahistathā

तब सभासदों के बारंबार कहने पर उनमें से एक ने दण्डकाष्ठ उठाकर उसे बाहर दूर फेंक दिया।

श्लोक 22 (skanda.6.182.22)

अथान्यत्तत्र संजातं कपालं तादृशं पुनः । तस्मिन्नपि तथा क्षिप्ते भूयोऽन्यत्समपद्यत

athānyattatra saṁjātaṁ kapālaṁ tādṛśaṁ punaḥ tasminnapi tathā kṣipte bhūyo'nyatsamapadyata

किन्तु फिर वहाँ वैसा ही एक और कपाल उत्पन्न हो गया; और उसे भी वैसे ही फेंकने पर पुनः दूसरा कपाल उत्पन्न हो गया।

श्लोक 23 (skanda.6.182.23)

एवं शतसहस्राणि ह्ययुतान्यर्बुदानि च । तत्र जातानि तैर्व्याप्तो यज्ञवाटः समंततः

evaṁ śatasahasrāṇi hyayutānyarbudāni ca tatra jātāni tairvyāpto yajñavāṭaḥ samaṁtataḥ

इस प्रकार वहाँ लाखों, अयुतों (दस-दस हजार) और करोड़ों कपाल उत्पन्न हो गए, जिनसे सम्पूर्ण यज्ञवाट चारों ओर से व्याप्त हो गया।

श्लोक 24 (skanda.6.182.24)

हाहाकारस्ततौ जज्ञे समस्ते यज्ञमण्डपे । दृष्ट्वा कपालसंघांस्तान्यज्ञ कर्मप्रदूषकान्

hāhākārastatau jajñe samaste yajñamaṇḍape dṛṣṭvā kapālasaṁghāṁstānyajña karmapradūṣakān

यज्ञकर्म को दूषित करने वाले उन कपालसमूहों को देखकर सम्पूर्ण यज्ञमण्डप में महान हाहाकार मच गया।

श्लोक 25 (skanda.6.182.25)

अथ संचिंतयामास ध्यानं कृत्वा पितामहः । हरारिष्टं समाज्ञाय तत्सर्वं हृष्टरूपधृक्

atha saṁciṁtayāmāsa dhyānaṁ kṛtvā pitāmahaḥ harāriṣṭaṁ samājñāya tatsarvaṁ hṛṣṭarūpadhṛk

तब पितामह ने ध्यानस्थ होकर चिन्तन किया और जान लिया कि यह सब हर (शिव) का ही अनिष्ट-कृत्य है, तथापि वे बाहर से प्रसन्नमुख बने रहे।

श्लोक 26 (skanda.6.182.26)

कृतांजलिपुटो भूत्वा ततः प्रोवाच सादरम्। महेश्वरं समासाद्य यज्ञवाटसमाश्रितम्

kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā tataḥ provāca sādaram maheśvaraṁ samāsādya yajñavāṭasamāśritam

उन्होंने हाथ जोड़कर, यज्ञवाट में उपस्थित महेश्वर के पास जाकर आदरपूर्वक यह वचन कहा —

श्लोक 27 (skanda.6.182.27)

किमिदं युज्यते देव यज्ञेऽस्मिन्कर्मणः क्षतिः । तस्मात्संहर सर्वाणि कपालानि सुरेश्वर

kimidaṁ yujyate deva yajñe'sminkarmaṇaḥ kṣatiḥ tasmātsaṁhara sarvāṇi kapālāni sureśvara

"हे देव, यह क्या हो रहा है? यज्ञकर्म को यह क्षति क्यों? इसलिए हे सुरेश्वर, इन सब कपालों को समेट लीजिए।"

श्लोक 28 (skanda.6.182.28)

यज्ञकर्मविलोपोऽयं मा भूत्त्वयि समागते

yajñakarmavilopo'yaṁ mā bhūttvayi samāgate

"आपके यहाँ उपस्थित होते हुए भी यज्ञकर्म का यह विलोप न हो।"

श्लोक 29 (skanda.6.182.29)

ततः प्रोवाच संक्रुद्धो भगवाञ्छशिशेखरः । तन्ममेष्टतमं पात्रं भोजनाय सदा स्थितम्

tataḥ provāca saṁkruddho bhagavāñchaśiśekharaḥ tanmameṣṭatamaṁ pātraṁ bhojanāya sadā sthitam

तब भगवान शशिशेखर क्रुद्ध होकर बोले — "यह तो मेरा अत्यंत प्रिय पात्र है, जो सदा भोजन के लिए रखा रहता है।"

श्लोक 30 (skanda.6.182.30)

एते द्विजाधमाः कस्माद्विद्विषंतिपितामह । तथा न मां समुद्दिश्य जुहुवुर्जातवेदसि

ete dvijādhamāḥ kasmādvidviṣaṁtipitāmaha tathā na māṁ samuddiśya juhuvurjātavedasi

"ये अधम द्विज मुझसे क्यों द्वेष करते हैं, कि उन्होंने मेरा नाम लेकर जातवेदा (अग्नि) में हवन नहीं किया,

श्लोक 31 (skanda.6.182.31)

यथान्यादेवता स्तद्वन्मन्त्रपूतं हविर्विधे । तस्माद्यदि विधे कार्या समाप्तिर्यज्ञकर्मणि

yathānyādevatā stadvanmantrapūtaṁ havirvidhe tasmādyadi vidhe kāryā samāptiryajñakarmaṇi

जैसा अन्य देवताओं के लिए मन्त्रपूत हविष्य से किया जाता है? इसलिए हे विधे, यदि इस यज्ञकर्म की समाप्ति करनी है,

श्लोक 32 (skanda.6.182.32)

तत्कपालाश्रितं हव्यं कर्तव्यं सकलं त्विदम् । तथा च मां समु द्दिश्य विशषाज्जातवेदसि

tatkapālāśritaṁ havyaṁ kartavyaṁ sakalaṁ tvidam tathā ca māṁ samu ddiśya viśaṣājjātavedasi

तो यह सम्पूर्ण हव्य कपालों में रखकर ही अर्पित करना होगा; और वैसे ही मेरा नाम विशेष रूप से लेकर जातवेदा में

श्लोक 33 (skanda.6.182.33)

होतव्यं हविरेवात्र समाप्तिं यास्यति क्रतुः । नान्यथा सत्यमेवोक्तं तवाग्रे चतुरानन

hotavyaṁ havirevātra samāptiṁ yāsyati kratuḥ nānyathā satyamevoktaṁ tavāgre caturānana

यहाँ हव्य होम करना होगा — तभी यह यज्ञ समाप्ति को प्राप्त होगा, अन्यथा नहीं। यह सत्य मैंने तुम्हारे समक्ष कहा है, हे चतुरानन।"

श्लोक 34 (skanda.6.182.34)

पितामह उवाच । रूपाणि तव देवेश पृथग्भूतान्यनेकशः । संख्यया परिहीनानि ध्येयानि सकलानि च

pitāmaha uvāca rūpāṇi tava deveśa pṛthagbhūtānyanekaśaḥ saṁkhyayā parihīnāni dhyeyāni sakalāni ca

पितामह ने कहा — "हे देवेश, आपके रूप पृथक्-पृथक् अनेक प्रकार के हैं, संख्या से रहित, सभी ध्यान करने योग्य हैं।"

श्लोक 35 (skanda.6.182.35)

एतन्महाव्रतं रूपमाख्यातं ते त्रिलोचन । नैवं च मखकर्म स्यात्तत्रैव च न युज्यते

etanmahāvrataṁ rūpamākhyātaṁ te trilocana naivaṁ ca makhakarma syāttatraiva ca na yujyate

"आपने मुझे जो यह रूप बताया, हे त्रिलोचन, यह महाव्रत का रूप है; इस प्रकार से यज्ञकर्म सम्भव नहीं, न ही यह यहाँ उचित है।"

श्लोक 36 (skanda.6.182.36)

अद्यैतत्कर्म कर्तुं च श्रुतिबाह्यं कथंचन । तव वाक्यमपि त्र्यक्ष नान्यथा कर्तुमुत्सहे

adyaitatkarma kartuṁ ca śrutibāhyaṁ kathaṁcana tava vākyamapi tryakṣa nānyathā kartumutsahe

"आज इस प्रकार यह कर्म करना किसी भी रूप में श्रुति के बाहर होगा; तथापि, हे त्र्यक्ष, आपके वचन के विरुद्ध जाने का मुझमें साहस नहीं है।"

श्लोक 37 (skanda.6.182.37)

मृन्मयेषु कपालेषु हविः श्राप्यं सुरेश्वर । अद्यप्रभृति यज्ञेषु पुरोडाशात्मिकं द्विजैः । तवोद्देशेन देवेश होतव्यं शतरुद्रियम्

mṛnmayeṣu kapāleṣu haviḥ śrāpyaṁ sureśvara adyaprabhṛti yajñeṣu puroḍāśātmikaṁ dvijaiḥ tavoddeśena deveśa hotavyaṁ śatarudriyam

"हे सुरेश्वर, यद्यपि मृण्मय कपालों में हविष्य आपके लिए उचित ही है, तथापि अब से समस्त यज्ञों में, ब्राह्मणों द्वारा पुरोडाश रूप में,

श्लोक 38 (skanda.6.182.38)

विशेषात्सर्वयज्ञेषु जप्यं चैव विशेषतः । कपालानां तु द्वारेण त्वया रूपं निजं कृतम्

viśeṣātsarvayajñeṣu japyaṁ caiva viśeṣataḥ kapālānāṁ tu dvāreṇa tvayā rūpaṁ nijaṁ kṛtam

आपके उद्देश्य से शतरुद्रिय का हवन किया जाएगा, हे देवेश — और विशेष रूप से इसका जप भी समस्त यज्ञों में विशेष सावधानी से किया जाएगा।"

श्लोक 39 (skanda.6.182.39)

प्रकटं च सुरश्रेष्ठ कपालेश्वरसंज्ञितः । तस्मात्त्वं भविता रुद्र क्षेत्रेऽस्मिन्द्वादशोऽपरः

prakaṭaṁ ca suraśreṣṭha kapāleśvarasaṁjñitaḥ tasmāttvaṁ bhavitā rudra kṣetre'smindvādaśo'paraḥ

"कपालों के द्वारा ही आपने अपना यह रूप प्रकट किया है, हे सुरश्रेष्ठ, जो कपालेश्वर नाम से प्रसिद्ध होगा;

श्लोक 40 (skanda.6.182.40)

अत्र यज्ञं समारभ्य यस्त्वां प्राक्पूजयिष्यति । अविघ्नेन मखस्तस्य समाप्तिं प्रव्रजिष्यति

atra yajñaṁ samārabhya yastvāṁ prākpūjayiṣyati avighnena makhastasya samāptiṁ pravrajiṣyati

इसलिए आप इस क्षेत्र में एक और, द्वादश रुद्र के रूप में विख्यात होंगे। यहाँ जो कोई यज्ञ आरम्भ कर पहले आपकी पूजा करेगा,

श्लोक 41 (skanda.6.182.41)

एवमुक्ते ततस्तेन कपालानि द्विजोत्तमाः । तानि सर्वाणि नष्टानि संख्यया रहितानि च

evamukte tatastena kapālāni dvijottamāḥ tāni sarvāṇi naṣṭāni saṁkhyayā rahitāni ca

उसका यज्ञ निर्विघ्न समाप्ति को प्राप्त होगा।" ऐसा कहे जाने पर, हे द्विजोत्तमो, वे सभी असंख्य कपाल पूर्णतः नष्ट हो गए।

श्लोक 42 (skanda.6.182.42)

ततो हृष्टश्चतुर्वक्त्रः स्थापयामास तत्क्षणात् । लिगं माहेश्वरं तत्र कपालेश्वरसंज्ञितम्

tato hṛṣṭaścaturvaktraḥ sthāpayāmāsa tatkṣaṇāt ligaṁ māheśvaraṁ tatra kapāleśvarasaṁjñitam

तब चतुर्मुख ब्रह्मा प्रसन्न होकर उसी क्षण वहाँ माहेश्वर लिंग की स्थापना कर दी, जो कपालेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 43 (skanda.6.182.43)

अब्रवीच्च ततो वाक्यं यश्चैतत्पूजयिष्यति । मम कुण्डत्रये स्नात्वा स यास्यति परां गतिम्

abravīcca tato vākyaṁ yaścaitatpūjayiṣyati mama kuṇḍatraye snātvā sa yāsyati parāṁ gatim

और उन्होंने तब यह वचन कहा — "जो कोई इसकी पूजा करेगा, मेरे तीनों कुण्डों में स्नान करके, वह परमगति को प्राप्त होगा।"

श्लोक 44 (skanda.6.182.44)

शुक्लपक्षे चतुर्दश्यां कार्तिके जागरं तु यः । करिष्यति पुनश्चास्य लिंगस्य सुसमाहितः । आजन्मप्रभवात्पापात्स विमुक्तिमवाप्स्यति

śuklapakṣe caturdaśyāṁ kārtike jāgaraṁ tu yaḥ kariṣyati punaścāsya liṁgasya susamāhitaḥ ājanmaprabhavātpāpātsa vimuktimavāpsyati

"और जो कोई कार्तिक शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को इस लिंग का पूर्ण एकाग्रचित्त होकर पुनः जागरण करेगा, वह जन्म से संचित पाप से पूर्णतः मुक्त हो जाएगा।"

श्लोक 45 (skanda.6.182.45)

एवमुक्तेऽथ विधिना प्रहृष्टस्त्रिपुरांतकः । यज्ञमण्डपमासाद्य प्रस्थितो वेदिसंनिधौ

evamukte'tha vidhinā prahṛṣṭastripurāṁtakaḥ yajñamaṇḍapamāsādya prasthito vedisaṁnidhau

विधाता द्वारा ऐसा कहे जाने पर त्रिपुरान्तक (शिव) अत्यंत प्रसन्न होकर यज्ञमण्डप में जाकर वेदी के समीप जा खड़े हुए।

श्लोक 46 (skanda.6.182.46)

ब्राह्मणैश्च ततः कर्म प्रारब्धं यज्ञसम्भवम् । विस्मयोत्फुल्लनयनैर्नमस्कृत्य महेश्वरम्

brāhmaṇaiśca tataḥ karma prārabdhaṁ yajñasambhavam vismayotphullanayanairnamaskṛtya maheśvaram

तब ब्राह्मणों ने आश्चर्यचकित नेत्रों से महेश्वर को नमस्कार करके आरम्भ किया गया यज्ञकर्म पुनः प्रारम्भ किया।

श्लोक 47 (skanda.6.182.47)

सूत उवाच । एवं च यज तस्तस्य चतुर्वक्त्रस्य तत्र च । ऋषीणां कोटिरायाता दक्षिणापथवासिनाम्

sūta uvāca evaṁ ca yaja tastasya caturvaktrasya tatra ca ṛṣīṇāṁ koṭirāyātā dakṣiṇāpathavāsinām

सूत जी ने कहा — इस प्रकार चतुर्मुख के इस यज्ञ के चलते हुए, दक्षिणापथवासी करोड़ों ऋषि वहाँ आ पहुँचे,

श्लोक 48 (skanda.6.182.48)

श्रुत्वा पैतामहं यज्ञं कौतुकेन समन्विताः । कीदृशो भविता यज्ञो दीक्षितो यत्र पद्मजः

śrutvā paitāmahaṁ yajñaṁ kautukena samanvitāḥ kīdṛśo bhavitā yajño dīkṣito yatra padmajaḥ

पितामह के यज्ञ का समाचार सुनकर कौतूहलपूर्वक — "कैसा होगा यह यज्ञ, जिसमें स्वयं पद्मज ही दीक्षित हैं?

श्लोक 49 (skanda.6.182.49)

कीदृक्क्षेत्रं च तत्पुण्यं हाटकेश्वरसंज्ञितम् । कीदृशास्ते च विप्रेन्द्रा ऋत्विजस्तत्र ये स्थिताः

kīdṛkkṣetraṁ ca tatpuṇyaṁ hāṭakeśvarasaṁjñitam kīdṛśāste ca viprendrā ṛtvijastatra ye sthitāḥ

हाटकेश्वर नामक यह पुण्यक्षेत्र कैसा है? वहाँ स्थित वे श्रेष्ठ विप्रेन्द्र ऋत्विज कैसे हैं?"

श्लोक 50 (skanda.6.182.50)

अथ ते सुपरिश्रांता मध्यंदिनगते रवौ । रविवारेण संप्राप्ते नक्षत्रे चाश्विसंस्थिते

atha te supariśrāṁtā madhyaṁdinagate ravau ravivāreṇa saṁprāpte nakṣatre cāśvisaṁsthite

तब वे अत्यंत परिश्रान्त होकर, मध्याह्न में सूर्य के पहुँचने पर, रविवार को, अश्विनी नक्षत्र में चन्द्रमा के स्थित होने पर,

श्लोक 51 (skanda.6.182.51)

वैवस्वत्यां तिथौ चैव प्राप्ता घर्मपीडिताः । कंचिज्जलाशयं प्राप्य प्रविष्टाः सलिलं शुभम्

vaivasvatyāṁ tithau caiva prāptā gharmapīḍitāḥ kaṁcijjalāśayaṁ prāpya praviṣṭāḥ salilaṁ śubham

उसी रविवारीय तिथि में, गर्मी से पीड़ित होकर, किसी जलाशय को पाकर उसके शुभ जल में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 52 (skanda.6.182.52)

शंकुकर्णा महाकर्णा वकनासास्तथापरे । महोदरा बृहद्दन्ता दीर्घोष्ठाः स्थूलमस्तकाः

śaṁkukarṇā mahākarṇā vakanāsāstathāpare mahodarā bṛhaddantā dīrghoṣṭhāḥ sthūlamastakāḥ

उनमें से कुछ के कान शंकु के समान, कुछ के महाकर्ण, कुछ की नासिका वक्र थी, तथा अन्य कुछ के

श्लोक 53 (skanda.6.182.53)

चिपिटाक्षास्तथा चान्ये दीर्घग्रीवास्तथा परे। कृष्णांगाः स्फुटितैः पादैर्नखैर्दीर्घैः समुत्थितैः

cipiṭākṣāstathā cānye dīrghagrīvāstathā pare kṛṣṇāṁgāḥ sphuṭitaiḥ pādairnakhairdīrghaiḥ samutthitaiḥ

बड़े उदर, बड़े दाँत, लम्बे होंठ, स्थूल मस्तक थे; कुछ के नेत्र चपटे, कुछ की गर्दन लम्बी, शरीर काले, पैर फटे हुए, नख लम्बे और उभरे हुए थे।

श्लोक 54 (skanda.6.182.54)

ततो यावद्विनिष्क्रांताः प्रपश्यन्ति परस्परम्। तावद्वैरूपस्यनिर्मुक्ताः संजाताः कामसन्निभाः

tato yāvadviniṣkrāṁtāḥ prapaśyanti parasparam tāvadvairūpasyanirmuktāḥ saṁjātāḥ kāmasannibhāḥ

फिर जैसे ही वे जल से बाहर निकलकर एक-दूसरे को देखने लगे, वे उस कुरूपता से मुक्त होकर कामदेव के समान सुन्दर रूप को प्राप्त हो गए।

श्लोक 55 (skanda.6.182.55)

ततो विस्मयमापन्ना मिथः प्रोचुः प्रहर्षिताः। रूपव्यत्ययमालोक्य ज्ञात्वा तीर्थं तदुत्तमम्। अत्र स्नानादिदं रूपमस्माभिः प्राप्तमुत्तमम्

tato vismayamāpannā mithaḥ procuḥ praharṣitāḥ rūpavyatyayamālokya jñātvā tīrthaṁ taduttamam atra snānādidaṁ rūpamasmābhiḥ prāptamuttamam

आश्चर्यचकित और आनन्दित होकर वे परस्पर बोल उठे, और अपने रूप के इस परिवर्तन को देखकर उन्होंने इस उत्तम तीर्थ की महिमा जान ली — "यहाँ स्नान करने से हमें यह उत्तम रूप प्राप्त हुआ है।"

श्लोक 56 (skanda.6.182.56)

यस्मात्तस्मादिदं तीर्थं रूपतीर्थं भविष्यति। त्रैलोक्ये सकले ख्यातं सर्वपातकनाशनम्

yasmāttasmādidaṁ tīrthaṁ rūpatīrthaṁ bhaviṣyati trailokye sakale khyātaṁ sarvapātakanāśanam

"इसी कारण यह तीर्थ रूपतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध होगा; यह त्रैलोक्य में सर्वपातकनाशक के रूप में विख्यात होगा।"

श्लोक 57 (skanda.6.182.57)

येऽत्र स्नानं करिष्यन्ति श्रद्धया परया युताः। सुरूपास्ते भविष्यंति सदा जन्मनि जन्मनि

ye'tra snānaṁ kariṣyanti śraddhayā parayā yutāḥ surūpāste bhaviṣyaṁti sadā janmani janmani

"जो यहाँ परम श्रद्धा से युक्त होकर स्नान करेंगे, वे सदा जन्म-जन्म में सुन्दर रूप वाले होंगे।"

श्लोक 58 (skanda.6.182.58)

पितॄंश्च तर्पयिष्यन्ति य त्र श्रद्धासमन्विताः। जलेनापि गयाश्राद्धात्ते लप्स्यन्ते धिकं फलम्

pitṝṁśca tarpayiṣyanti ya tra śraddhāsamanvitāḥ jalenāpi gayāśrāddhātte lapsyante dhikaṁ phalam

"जो श्रद्धासहित यहाँ पितरों को तर्पण देंगे, वे जल से भी गया-श्राद्ध से प्राप्त फल से कहीं अधिक फल पाएँगे।"

श्लोक 59 (skanda.6.182.59)

येऽत्र रत्नप्रदानं च प्रकरिष्यन्ति मानवाः। भविष्यंति न संदेहो राजानस्ते भवेभवे

ye'tra ratnapradānaṁ ca prakariṣyanti mānavāḥ bhaviṣyaṁti na saṁdeho rājānaste bhavebhave

"जो मनुष्य यहाँ रत्नों का दान करेंगे, वे निःसंदेह जन्म-जन्मान्तर में राजा होंगे।"

श्लोक 60 (skanda.6.182.60)

स्थास्यामो वयमत्रैव सांप्रतं कृतनिश्चयाः। न यास्यामो वयं तीर्थं यद्यपि स्यात्सुशोभनम्

sthāsyāmo vayamatraiva sāṁprataṁ kṛtaniścayāḥ na yāsyāmo vayaṁ tīrthaṁ yadyapi syātsuśobhanam

"अब हम यहीं निश्चय करके स्थिर रहेंगे; चाहे वह कितना भी सुशोभित हो, हम अन्य तीर्थ को नहीं जाएँगे।"

श्लोक 61 (skanda.6.182.61)

एवमुक्त्वाऽथ व्यभजंस्तत्सर्वं मुनयश्च ते। यज्ञोपवीतमात्राणि स्वानि तीर्थानि चक्रिरे

evamuktvā'tha vyabhajaṁstatsarvaṁ munayaśca te yajñopavītamātrāṇi svāni tīrthāni cakrire

ऐसा कहकर उन मुनियों ने वहाँ का सम्पूर्ण स्थान आपस में बाँट लिया, और यज्ञोपवीत जितने मात्र के अपने-अपने तीर्थ बना लिए।

श्लोक 62 (skanda.6.182.62)

सूत उवाच । अद्यापि च द्विजश्रेष्ठास्तत्र तीर्थे जगद्गुरुः। प्रथमं स्पृशते तोयं नित्यं स्याद्दयितं शुभम्

sūta uvāca adyāpi ca dvijaśreṣṭhāstatra tīrthe jagadguruḥ prathamaṁ spṛśate toyaṁ nityaṁ syāddayitaṁ śubham

सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो, आज भी उस तीर्थ में जगद्गुरु सर्वप्रथम उस जल का स्पर्श करते हैं, जो सदा प्रिय और शुभ रहता है।

श्लोक 63 (skanda.6.182.63)

निष्कामस्तु पुनर्मर्त्यो यः स्नानं तत्र श्रद्धया। कुरुते स परं श्रेयः प्राप्नुयात्सिद्धिलक्षणम्

niṣkāmastu punarmartyo yaḥ snānaṁ tatra śraddhayā kurute sa paraṁ śreyaḥ prāpnuyātsiddhilakṣaṇam

और जो निष्काम मनुष्य वहाँ श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह परम श्रेय प्राप्त करता है और सिद्धि के लक्षण को पाता है।

श्लोक 64 (skanda.6.182.64)

एवं ते मुनयः सर्वे विभज्य तन्महत्सरः। सायंतनं च तत्रैव कृत्वा कर्म सुविस्तरम्

evaṁ te munayaḥ sarve vibhajya tanmahatsaraḥ sāyaṁtanaṁ ca tatraiva kṛtvā karma suvistaram

इस प्रकार उन सभी मुनियों ने उस महान सरोवर को आपस में बाँटकर वहीं अपना विस्तृत सायंकालीन कर्म सम्पन्न किया,

श्लोक 65 (skanda.6.182.65)

ततो निशामुखे प्राप्ता यत्र देवः पितामहः। दीक्षितस्त्वथ मौनी च यज्ञमण्डपसंश्रितः

tato niśāmukhe prāptā yatra devaḥ pitāmahaḥ dīkṣitastvatha maunī ca yajñamaṇḍapasaṁśritaḥ

फिर रात्रि के आरम्भ में वे वहाँ पहुँचे जहाँ देव पितामह मौन और दीक्षित होकर यज्ञमण्डप में स्थित थे।

श्लोक 66 (skanda.6.182.66)

तं प्रणम्य ततः सर्वे गता यत्रर्त्विजः स्थिताः। उपविष्टाः परिश्रान्ता दिवा यज्ञियकर्मणा

taṁ praṇamya tataḥ sarve gatā yatrartvijaḥ sthitāḥ upaviṣṭāḥ pariśrāntā divā yajñiyakarmaṇā

उन्हें प्रणाम करके सभी वहाँ गए जहाँ दिनभर के यज्ञकर्म से थके हुए ऋत्विज बैठे थे,

श्लोक 67 (skanda.6.182.67)

इन्द्रादिकैः सुरैर्भक्त्या मृद्यमानाङ्घ्रयः स्थिताः। अभिवाद्याथ तान्सर्वानुपविष्टास्ततो ग्रतः

indrādikaiḥ surairbhaktyā mṛdyamānāṅghrayaḥ sthitāḥ abhivādyātha tānsarvānupaviṣṭāstato grataḥ

जिनके चरण इन्द्रादि देवगण भक्तिपूर्वक दबा रहे थे; उन सभी का अभिवादन करके वे उनके आगे बैठ गए।

श्लोक 68 (skanda.6.182.68)

चक्रुश्चाथ कथाश्चित्रा यज्ञकर्मसमुद्भवाः। सोमपानस्य संबन्धो व्यत्ययं च समुद्भवम्

cakruścātha kathāścitrā yajñakarmasamudbhavāḥ somapānasya saṁbandho vyatyayaṁ ca samudbhavam

तब उन्होंने यज्ञकर्म से उत्पन्न विविध विचित्र कथाएँ कीं — सोमपान के सम्बन्ध, उसके व्यत्यय और उत्पत्ति के विषय में,

श्लोक 69 (skanda.6.182.69)

उद्गातुः प्रभवं चैव तथाध्वर्योः परस्परम्। प्रोचुस्ते तत्त्वमाश्रित्य तथान्ये दूषयन्ति तत्

udgātuḥ prabhavaṁ caiva tathādhvaryoḥ parasparam procuste tattvamāśritya tathānye dūṣayanti tat

उद्गाता के प्रादुर्भाव तथा अध्वर्युओं के परस्पर सम्बन्ध के विषय में; कुछ ने एक सिद्धान्त का आश्रय लेकर कहा, तो अन्य ने उसका खण्डन किया।

श्लोक 70 (skanda.6.182.70)

अन्ये मीमांसकास्तत्र कोपसंरक्तलोचनाः। हन्युस्तेषां मतं वादमाश्रिता वाग्विचक्षणाः

anye mīmāṁsakāstatra kopasaṁraktalocanāḥ hanyusteṣāṁ mataṁ vādamāśritā vāgvicakṣaṇāḥ

वहाँ अन्य मीमांसक थे, जिनके नेत्र क्रोध से लाल थे, वाग्विचक्षण होकर वाद का आश्रय लेकर वे उनके मत को खण्डित करना चाहते थे।

श्लोक 71 (skanda.6.182.71)

परिशिष्टविदश्चान्ये मध्यस्था द्विजसत्तमाः। प्रोचुर्वादं परित्यज्य साभिप्रायं यथोदितम्

pariśiṣṭavidaścānye madhyasthā dvijasattamāḥ procurvādaṁ parityajya sābhiprāyaṁ yathoditam

अन्य कुछ परिशिष्टवेत्ता, मध्यस्थ रहकर, श्रेष्ठ ब्राह्मणों में वाद को त्यागकर, शास्त्रोक्त अपने-अपने अभिप्राय से युक्त वचन कहते थे।

श्लोक 72 (skanda.6.182.72)

महावीरपुरोडाशचयनप्रमुखांस्तथा। विवादांश्चक्रिरे चान्ये स्वंस्वं पक्षं समाश्रिताः

mahāvīrapuroḍāśacayanapramukhāṁstathā vivādāṁścakrire cānye svaṁsvaṁ pakṣaṁ samāśritāḥ

अन्य कुछ ने महावीर पात्र और पुरोडाश के चयन आदि विषयों को लेकर अपने-अपने पक्ष का आश्रय लेकर विवाद किया।

श्लोक 73 (skanda.6.182.73)

एवं सा रजनी तेषामतिक्रान्ता द्विजन्मनाम्

evaṁ sā rajanī teṣāmatikrāntā dvijanmanām

इस प्रकार उन द्विजों की वह रात्रि व्यतीत हो गई।

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