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नागर खण्ड · अध्याय 183

नागतीर्थोत्पत्तिमाहात्म्य वर्णन

अध्याय 182अध्याय-सूचीअध्याय 184

श्लोक 1 (skanda.6.183.1)

सूत उवाच । द्वितीये दिवसे प्राप्ते यज्ञकर्मसमुद्भवे। द्वादश्यामभवत्तत्र शृणुध्वं तद्द्विजोत्तमाः। वृत्तान्तं सर्वदेवानां महाविस्मयकारकम्

sūta uvāca dvitīye divase prāpte yajñakarmasamudbhave dvādaśyāmabhavattatra śṛṇudhvaṁ taddvijottamāḥ vṛttāntaṁ sarvadevānāṁ mahāvismayakārakam

सूत जी ने कहा — यज्ञकर्म का दूसरा दिन आने पर, द्वादशी तिथि को, वहाँ एक घटना घटी, हे द्विजश्रेष्ठो — सुनो — समस्त देवताओं को महान आश्चर्यचकित करने वाला वृत्तान्त।

श्लोक 2 (skanda.6.183.2)

मखकर्मणि प्रारब्ध ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः । जलसर्पं समादाय बटुः कश्चित्सुनर्मकृत्

makhakarmaṇi prārabdha ṛtvigbhirvedapāragaiḥ jalasarpaṁ samādāya baṭuḥ kaścitsunarmakṛt

यज्ञकर्म चलते समय, वेदपारंगत ऋत्विजों द्वारा सम्पन्न होते हुए, किसी शरारती ब्रह्मचारी बटुक ने एक जलसर्प पकड़ लिया,

श्लोक 3 (skanda.6.183.3)

प्रविश्याथ सदस्तत्र तं सर्पं ब्राह्मणान्तिके । चिक्षेप प्रहसंश्चैव सर्वदुःखभयंकरम्

praviśyātha sadastatra taṁ sarpaṁ brāhmaṇāntike cikṣepa prahasaṁścaiva sarvaduḥkhabhayaṁkaram

और वहाँ सभा में प्रवेश करके, हँसते हुए, उसने वह सर्प ब्राह्मणों के निकट फेंक दिया, जिससे सबमें भय और दुःख फैल गया।

श्लोक 4 (skanda.6.183.4)

ततस्तु डुण्डुभस्तूर्णं भ्रममाण इतस्ततः । विप्राणां सदसिस्थानां सक्तानां यज्ञकर्मणि

tatastu ḍuṇḍubhastūrṇaṁ bhramamāṇa itastataḥ viprāṇāṁ sadasisthānāṁ saktānāṁ yajñakarmaṇi

तब एक डुण्डुभ सर्प, सभा में बैठे, यज्ञकर्म में संलग्न ब्राह्मणों के बीच, इधर-उधर तेजी से घूमने लगा —

श्लोक 5 (skanda.6.183.5)

अहो होतुः स्थिते प्रैषे दीर्घसत्रसमुद्भवे । स सर्पो वेष्टयामास तस्य गात्रं समंततः

aho hotuḥ sthite praiṣe dīrghasatrasamudbhave sa sarpo veṣṭayāmāsa tasya gātraṁ samaṁtataḥ

और, आश्चर्य, दीर्घसत्र के बीच अपने स्थान पर स्थित होतार को, उस सर्प ने सब ओर से लपेट लिया।

श्लोक 6 (skanda.6.183.6)

न चचाल निजस्थानात्प्रायश्चित्तविभीषया । नोवाच वचनं सोऽत्र चयनन्यस्तलोचनः

na cacāla nijasthānātprāyaścittavibhīṣayā novāca vacanaṁ so'tra cayananyastalocanaḥ

वे प्रायश्चित्त के भय से अपने स्थान से नहीं हिले, न ही कोई वचन बोले, उनके नेत्र यज्ञ की चयन-व्यवस्था पर ही स्थिर रहे।

श्लोक 7 (skanda.6.183.7)

हाहाकारो महाञ्जज्ञे एतस्मिन्नंतरे द्विजाः । तस्मिन्सदसि विप्राणां विषा ढ्याहिप्रशंकया

hāhākāro mahāñjajñe etasminnaṁtare dvijāḥ tasminsadasi viprāṇāṁ viṣā ḍhyāhipraśaṁkayā

उस सभा में विषैले सर्प की आशंका से ब्राह्मणों में, हे द्विजो, महान हाहाकार मच गया।

श्लोक 8 (skanda.6.183.8)

हाहाकारो महानासीत्तं दृष्ट्वा सर्पवेष्टितम् । तस्य पुत्रो विनीतात्मा मैत्रावरुणकर्मणि

hāhākāro mahānāsīttaṁ dṛṣṭvā sarpaveṣṭitam tasya putro vinītātmā maitrāvaruṇakarmaṇi

उन्हें सर्प से लिपटा देखकर महान हाहाकार हुआ; उनके विनीत स्वभाव वाले पुत्र, जो मैत्रावरुण पद पर नियुक्त थे,

श्लोक 9 (skanda.6.183.9)

संस्थितस्तेन संदृष्टः पिता सर्पाभिवेष्टितः । ज्ञात्वा तु चेष्टितं तस्य भये सर्पसमुद्भवे । शशाप क्रोधसंयुक्तस्ततस्तं स बटुं मुनिः

saṁsthitastena saṁdṛṣṭaḥ pitā sarpābhiveṣṭitaḥ jñātvā tu ceṣṭitaṁ tasya bhaye sarpasamudbhave śaśāpa krodhasaṁyuktastatastaṁ sa baṭuṁ muniḥ

वहीं खड़े होकर अपने पिता को सर्प से लिपटा देखकर, तथा उस घटना को जानकर, सर्प से उत्पन्न भय के कारण, वे मुनि क्रोधित होकर उस बटुक को शाप देने लगे —

श्लोक 10 (skanda.6.183.10)

यस्मात्पाप त्वया सर्पः क्षिप्तः सदसि दुर्मते । तस्माद्भव द्रुतं सर्पो मम वाक्यादसंशयम्

yasmātpāpa tvayā sarpaḥ kṣiptaḥ sadasi durmate tasmādbhava drutaṁ sarpo mama vākyādasaṁśayam

"चूँकि तूने, हे पापी, सभा में सर्प फेंका, हे दुर्मते, इसलिए मेरे वचन से तू निःसंदेह तत्काल सर्प बन जा।"

श्लोक 11 (skanda.6.183.11)

बटुरुवाच । हास्येन जलसर्पोऽयं मया मुक्तोऽत्र लीलया । न ते तातं समुद्दिश्य तत्किं मां शपसि द्विज

baṭuruvāca hāsyena jalasarpo'yaṁ mayā mukto'tra līlayā na te tātaṁ samuddiśya tatkiṁ māṁ śapasi dvija

बटुक ने कहा — "यह जलसर्प मैंने यहाँ केवल हास्य और क्रीड़ावश छोड़ा था; यह तुम्हारे पिता को लक्ष्य करके नहीं था — फिर हे द्विज, तुम मुझे क्यों शाप देते हो?"

श्लोक 12 (skanda.6.183.12)

एतस्मिन्नंतरे मुक्त्वा तस्य गात्रं स पन्नगः । जगामान्यत्र तस्यापि सर्पत्वं समपद्यत

etasminnaṁtare muktvā tasya gātraṁ sa pannagaḥ jagāmānyatra tasyāpi sarpatvaṁ samapadyata

इसी बीच वह सर्प होतार के शरीर को छोड़कर कहीं और चला गया; और वह बटुक स्वयं ही सर्पत्व को प्राप्त हो गया।

श्लोक 13 (skanda.6.183.13)

सोऽपि सर्पत्वमापन्नः सनातनसुतो बटुः । दुःखशोकसमापन्नो ब्राह्मणैः परिवेष्टितः

so'pi sarpatvamāpannaḥ sanātanasuto baṭuḥ duḥkhaśokasamāpanno brāhmaṇaiḥ pariveṣṭitaḥ

वह सनातन-पुत्र भी सर्पत्व को प्राप्त होकर, दुःख और शोक से व्याकुल, ब्राह्मणों से घिरा हुआ —

श्लोक 14 (skanda.6.183.14)

अथ गत्वा भृगुं सोऽपि बाष्पव्याकुललोचनः । प्रोवाच गद्गदं वाक्यं प्रणिपत्य पुरःसरः

atha gatvā bhṛguṁ so'pi bāṣpavyākulalocanaḥ provāca gadgadaṁ vākyaṁ praṇipatya puraḥsaraḥ

फिर आँसुओं से भरे नेत्रों के साथ भृगु के पास जाकर, प्रणाम करके, गद्गद वाणी में बोला —

श्लोक 15 (skanda.6.183.15)

सनातनसुतश्चास्मि पौत्रस्तु परमेष्ठिनः । शप्तस्तव सुतेनास्मि च्यवनेन महात्मना

sanātanasutaścāsmi pautrastu parameṣṭhinaḥ śaptastava sutenāsmi cyavanena mahātmanā

"मैं सनातन का पुत्र, परमेष्ठी (ब्रह्मा) का पौत्र हूँ; मुझे आपके पुत्र, महात्मा च्यवन ने शाप दे दिया है।"

श्लोक 16 (skanda.6.183.16)

निर्दोषो ब्राह्मणश्रेष्ठ तस्माच्छापात्प्ररक्ष माम् । तच्छ्रुत्वा च्यवनं प्राह कृपाविष्टो भृगुः स्वयम्

nirdoṣo brāhmaṇaśreṣṭha tasmācchāpātprarakṣa mām tacchrutvā cyavanaṁ prāha kṛpāviṣṭo bhṛguḥ svayam

"मैं निर्दोष हूँ, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मुझे इस शाप से बचाइए।" यह सुनकर, कृपायुक्त हुए भृगु ने स्वयं च्यवन से कहा —

श्लोक 17 (skanda.6.183.17)

अयुक्तं विहितं तात यच्छप्तोऽयं बटुस्त्वया। न मां धर्षयितुं शक्तो विषाढ्योऽपि भुजंगमः

ayuktaṁ vihitaṁ tāta yacchapto'yaṁ baṭustvayā na māṁ dharṣayituṁ śakto viṣāḍhyo'pi bhujaṁgamaḥ

"हे तात, यह अनुचित किया गया कि तुमने इस बटुक को शाप दे दिया; विषयुक्त सर्प भी मुझे धर्षित करने में समर्थ नहीं है —

श्लोक 18 (skanda.6.183.18)

किं पुनर्जलसर्पोऽयं निर्विषो रज्जुसंनिभः । न मामुद्दिश्य निर्मुक्तः सर्पोऽनेन द्विजन्मना । शापमोक्षं कुरुष्वास्य तस्माच्छीघ्रं द्विजन्मनः

kiṁ punarjalasarpo'yaṁ nirviṣo rajjusaṁnibhaḥ na māmuddiśya nirmuktaḥ sarpo'nena dvijanmanā śāpamokṣaṁ kuruṣvāsya tasmācchīghraṁ dvijanmanaḥ

फिर यह जलसर्प तो निर्विष है, रस्सी के समान; और इस द्विजबालक ने भी मुझे लक्ष्य करके सर्प नहीं छोड़ा था। इसलिए इस द्विज को शीघ्र शापमुक्त करो।"

श्लोक 19 (skanda.6.183.19)

च्यवन उवाच । यदि त्यजति मर्यादामब्धिः शैत्यं व्रजेद्रविः । उष्णत्वं च क्षपानाथस्तन्मे स्यादनृतं वचः

cyavana uvāca yadi tyajati maryādāmabdhiḥ śaityaṁ vrajedraviḥ uṣṇatvaṁ ca kṣapānāthastanme syādanṛtaṁ vacaḥ

च्यवन ने कहा — "यदि समुद्र अपनी मर्यादा त्याग दे, सूर्य शीतल हो जाए, और रात्रिनाथ (चन्द्रमा) उष्ण हो जाए — तभी मेरा वचन मिथ्या हो सकता है।"

श्लोक 20 (skanda.6.183.20)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य स्वयमेव पितामहः । तत्रायातः स्थितो यत्र स पौत्रः सर्परूपधृक्

tacchrutvā vacanaṁ tasya svayameva pitāmahaḥ tatrāyātaḥ sthito yatra sa pautraḥ sarparūpadhṛk

उनका यह वचन सुनकर स्वयं पितामह वहाँ आए जहाँ वह पौत्र सर्परूप धारण किए खड़ा था।

श्लोक 21 (skanda.6.183.21)

प्रोवाच न विषादस्ते पुत्र कार्यः कथंचन । यत्सर्पत्वमनुप्राप्तः शृणुष्वात्र वचो मम

provāca na viṣādaste putra kāryaḥ kathaṁcana yatsarpatvamanuprāptaḥ śṛṇuṣvātra vaco mama

उन्होंने कहा — "हे पुत्र, सर्पत्व को प्राप्त होने पर तुझे किसी प्रकार भी विषाद नहीं करना चाहिए; यहाँ मेरा वचन सुन।"

श्लोक 22 (skanda.6.183.22)

पुरा संस्रष्टुकामोऽहं नागानां नवमं कुलम् । तद्भविष्यति त्वत्पार्श्वात्समर्यादं धरातले

purā saṁsraṣṭukāmo'haṁ nāgānāṁ navamaṁ kulam tadbhaviṣyati tvatpārśvātsamaryādaṁ dharātale

"पूर्वकाल में मैं नागों के नवम कुल की सृष्टि करना चाहता था; वह कुल अब तुझसे ही, इस पृथ्वी पर, मर्यादा में बँधकर उत्पन्न होगा।"

श्लोक 23 (skanda.6.183.23)

मन्त्रौषधियुजां पुंसां न पीडामाचरिष्यति । संप्राप्स्यति परां पूजां समस्ते जगतीतले

mantrauṣadhiyujāṁ puṁsāṁ na pīḍāmācariṣyati saṁprāpsyati parāṁ pūjāṁ samaste jagatītale

"यह मन्त्र और औषधि से युक्त पुरुषों को कभी पीड़ा नहीं पहुँचाएगा, और सम्पूर्ण जगत् में परम पूजा को प्राप्त करेगा।"

श्लोक 24 (skanda.6.183.24)

अत्राऽस्ति सुशुभं तोयं हाटकेश्वरसंज्ञिते । क्षेत्रे तत्र समावासः पुत्र कार्यस्त्वया सदा

atrā'sti suśubhaṁ toyaṁ hāṭakeśvarasaṁjñite kṣetre tatra samāvāsaḥ putra kāryastvayā sadā

"यहाँ हाटकेश्वर नामक क्षेत्र में अत्यंत शुभ जल है; वहाँ, हे पुत्र, तुझे सदा निवास करना चाहिए।"

श्लोक 25 (skanda.6.183.25)

तत्रस्थस्य तपस्थस्य नागः कर्कोटको निजम् । तव दास्यति सत्कन्यां ततः सृष्टिर्भविष्यति

tatrasthasya tapasthasya nāgaḥ karkoṭako nijam tava dāsyati satkanyāṁ tataḥ sṛṣṭirbhaviṣyati

"वहाँ तपस्या में स्थित तुझे नाग कर्कोटक अपनी सुयोग्य कन्या देगा, जिससे तेरी सृष्टि (संतान) उत्पन्न होगी।"

श्लोक 26 (skanda.6.183.26)

नवमस्य कुलस्यात्र समर्यादस्य भूतले । श्रावणे कृष्णपक्षे तु संप्राप्ते पंचमीदिने

navamasya kulasyātra samaryādasya bhūtale śrāvaṇe kṛṣṇapakṣe tu saṁprāpte paṁcamīdine

"इस पृथ्वी पर मर्यादाबद्ध इस नवम कुल का, श्रावण मास के कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि आने पर,"

श्लोक 27 (skanda.6.183.27)

संप्राप्स्यति परां पूजां पृथिव्यां नवमं कुलम् । अद्यप्रभृति तत्तोयं नागतीर्थमिति स्मृतम्

saṁprāpsyati parāṁ pūjāṁ pṛthivyāṁ navamaṁ kulam adyaprabhṛti tattoyaṁ nāgatīrthamiti smṛtam

इस नवम कुल को पृथ्वी पर परम पूजा प्राप्त होगी; और आज से वह जल नागतीर्थ के नाम से स्मृत होगा।"

श्लोक 28 (skanda.6.183.28)

ख्यातिं यास्यति भूपृष्ठे सर्वपातकनाशनम्। येऽत्र स्नानं करिष्यंति संप्राप्ते पंचमीदिने

khyātiṁ yāsyati bhūpṛṣṭhe sarvapātakanāśanam ye'tra snānaṁ kariṣyaṁti saṁprāpte paṁcamīdine

"यह पृथ्वी पर सर्वपातकनाशक के रूप में ख्याति प्राप्त करेगा; जो यहाँ पंचमी तिथि आने पर स्नान करेंगे,

श्लोक 29 (skanda.6.183.29)

न तेषां वत्सरंयावद्भविष्यत्यहिजं भयम् । विषार्द्दितस्तु यो मर्त्यस्तत्र स्नानं करिष्यति

na teṣāṁ vatsaraṁyāvadbhaviṣyatyahijaṁ bhayam viṣārdditastu yo martyastatra snānaṁ kariṣyati

उनके लिए एक वर्ष तक सर्प से उत्पन्न भय नहीं होगा; और जो विषपीड़ित मनुष्य वहाँ स्नान करेगा,

श्लोक 30 (skanda.6.183.30)

तत्क्षणान्निर्विषो भूत्वा संप्राप्स्यति परं सुखम् । पुत्रकामा तु या नारी पंचम्यां भास्करोदये । करिष्यति तथा स्नानं फलहस्ता प्रभक्तितः । भविष्यति च सा शीघ्रं वंध्याऽपि च सुपुत्रिणी

tatkṣaṇānnirviṣo bhūtvā saṁprāpsyati paraṁ sukham putrakāmā tu yā nārī paṁcamyāṁ bhāskarodaye kariṣyati tathā snānaṁ phalahastā prabhaktitaḥ bhaviṣyati ca sā śīghraṁ vaṁdhyā'pi ca suputriṇī

वह उसी क्षण निर्विष होकर परम सुख को प्राप्त करेगा। और जो पुत्रकामिनी नारी पंचमी को सूर्योदय के समय फल हाथ में लेकर भक्तिपूर्वक वहाँ स्नान करेगी, वह बंध्या होते हुए भी शीघ्र सुपुत्रवती हो जाएगी।"

श्लोक 31 (skanda.6.183.31)

सूत उवाच । एवं प्रवदतस्तस्य ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। अन्ये नागाः समायातास्तत्र यज्ञे निमंत्रिताः

sūta uvāca evaṁ pravadatastasya brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ anye nāgāḥ samāyātāstatra yajñe nimaṁtritāḥ

सूत जी ने कहा — अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर, वहाँ यज्ञ में आमन्त्रित अन्य नाग भी आ पहुँचे —

श्लोक 32 (skanda.6.183.32)

वासुकिस्तक्षकश्चैव पुण्डरीकः कृशोदरः । कम्बलाश्वतरौ नागौ शेषः कालिय एव च

vāsukistakṣakaścaiva puṇḍarīkaḥ kṛśodaraḥ kambalāśvatarau nāgau śeṣaḥ kāliya eva ca

वासुकि, तक्षक, पुण्डरीक, कृशोदर, कम्बल और अश्वतर नामक दोनों नाग, शेष और कालिय।

श्लोक 33 (skanda.6.183.33)

ते प्रणम्य वचः प्रोचुः प्रोच्चैर्देवं पितामहम् । तवादेशाद्वयं प्राप्ता यज्ञेऽत्र प्रपितामह

te praṇamya vacaḥ procuḥ proccairdevaṁ pitāmaham tavādeśādvayaṁ prāptā yajñe'tra prapitāmaha

उन्होंने प्रणाम करके देव पितामह से ऊँचे स्वर में कहा — "हे प्रपितामह, आपके आदेश से हम इस यज्ञ में आ पहुँचे हैं।"

श्लोक 34 (skanda.6.183.34)

साहाय्यार्थं तदादेशो दीयतां प्रपितामह। येन कुर्मो वयं शीघ्रं नागराज्ये ह्यधिष्ठिताः

sāhāyyārthaṁ tadādeśo dīyatāṁ prapitāmaha yena kurmo vayaṁ śīghraṁ nāgarājye hyadhiṣṭhitāḥ

"हे प्रपितामह, सहायता हेतु वह आदेश दीजिए, जिससे हम नागराज्य में स्थित होकर शीघ्र कार्य कर सकें।"

श्लोक 35 (skanda.6.183.35)

ब्रह्मोवाच । साहाय्यमेतदस्माकं भवदीयं महोरगाः । गत्वानेन समं शीघ्रं नागराजेन तिष्ठत

brahmovāca sāhāyyametadasmākaṁ bhavadīyaṁ mahoragāḥ gatvānena samaṁ śīghraṁ nāgarājena tiṣṭhata

ब्रह्मा ने कहा — "हे महोरगो, यह सहायता हमारे लिए आवश्यक है ही। तुम शीघ्र इस नागराज के साथ जाकर वहाँ स्थित रहो।"

श्लोक 36 (skanda.6.183.36)

नागतीर्थे ततः स्थेयं सर्वैस्तत्र समास्थितैः

nāgatīrthe tataḥ stheyaṁ sarvaistatra samāsthitaiḥ

"तत्पश्चात् तुम सब वहाँ नागतीर्थ में स्थापित होकर निवास करना।"

श्लोक 37 (skanda.6.183.37)

यः कश्चिन्मम यज्ञेऽत्र दुष्टभावं समाश्रितः । समागच्छति विघ्नाय रक्षणीयः स सत्वरम्

yaḥ kaścinmama yajñe'tra duṣṭabhāvaṁ samāśritaḥ samāgacchati vighnāya rakṣaṇīyaḥ sa satvaram

"मेरे इस यज्ञ में जो कोई दुष्टभाव लेकर विघ्न डालने आए,

श्लोक 38 (skanda.6.183.38)

राक्षसो वा पिशाचो वा भूतो वा मानुषोऽपि वा । एतत्कृत्यतमं नागा मम यज्ञस्य रक्षणम्

rākṣaso vā piśāco vā bhūto vā mānuṣo'pi vā etatkṛtyatamaṁ nāgā mama yajñasya rakṣaṇam

चाहे वह राक्षस हो, पिशाच हो, भूत हो, अथवा मनुष्य ही क्यों न हो — उसे शीघ्र रोकना है; हे नागो, मेरे यज्ञ की यही रक्षा तुम्हारा प्रमुख कार्य है।"

श्लोक 39 (skanda.6.183.39)

तथा यूयमपि प्राप्ते मासि भाद्रपदे तथा । पंचम्यां कृष्णपक्षस्य तत्र पूजामवाप्स्यथ

tathā yūyamapi prāpte māsi bhādrapade tathā paṁcamyāṁ kṛṣṇapakṣasya tatra pūjāmavāpsyatha

"तथा तुम भी भाद्रपद मास आने पर, उसकी कृष्णपक्ष पंचमी को, वहाँ पूजा प्राप्त करोगे।"

श्लोक 40 (skanda.6.183.40)

सूत उवाच । बाढमित्येव ते प्रोच्य प्रणिपत्य पितामहम् । सनातनसुतोपेता नागतीर्थं समाश्रिताः ततःप्रभृति तत्तीर्थं नागतीर्थ मिति स्मृतम् । कामप्रदं च भक्तानां नराणां स्नानकारिणाम्

sūta uvāca bāḍhamityeva te procya praṇipatya pitāmaham sanātanasutopetā nāgatīrthaṁ samāśritāḥ tataḥprabhṛti tattīrthaṁ nāgatīrtha miti smṛtam kāmapradaṁ ca bhaktānāṁ narāṇāṁ snānakāriṇām

सूत जी ने कहा — "ऐसा ही हो" कहकर पितामह को प्रणाम करके, वे सनातन-पुत्र सहित नागतीर्थ में जा बसे। तभी से वह तीर्थ नागतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो स्नान करने वाले भक्त मनुष्यों की समस्त कामनाएँ पूर्ण करता है।

श्लोक 41 (skanda.6.183.41)

यस्तत्र कुरुते स्नानं सकृद्भक्त्या समन्वितः । नान्वयेऽपि भयं तस्य जाय ते सर्पसंभवम्

yastatra kurute snānaṁ sakṛdbhaktyā samanvitaḥ nānvaye'pi bhayaṁ tasya jāya te sarpasaṁbhavam

जो वहाँ एक बार भी भक्तिपूर्वक स्नान करता है, उसके वंश में सर्प से उत्पन्न भय कभी नहीं होता।

श्लोक 42 (skanda.6.183.42)

तत्र यच्छति मिष्टान्नं द्विजानां सज्जनैः सह । पूजयित्वा तु नागेंद्रान्सनातनपुरःसरान्

tatra yacchati miṣṭānnaṁ dvijānāṁ sajjanaiḥ saha pūjayitvā tu nāgeṁdrānsanātanapuraḥsarān

जो वहाँ सज्जनों सहित ब्राह्मणों को मिष्टान्न देता है, सनातनपुत्र आदि नागेन्द्रों की पूजा करके —

श्लोक 43 (skanda.6.183.43)

सप्तजन्मांतरं यावन्न स दौःस्थ्यमवाप्नुयात् । भूतप्रेतपिशाचानां शाकिनीनां विशेषतः । न च्छिद्रं न च रोगाश्च नाधयो न रिपोर्भयम्

saptajanmāṁtaraṁ yāvanna sa dauḥsthyamavāpnuyāt bhūtapretapiśācānāṁ śākinīnāṁ viśeṣataḥ na cchidraṁ na ca rogāśca nādhayo na riporbhayam

वह सात जन्मों तक कभी दुःस्थिति को प्राप्त नहीं होता, विशेषकर भूत, प्रेत, पिशाच और शाकिनियों से; न कोई छिद्र (हानि), न रोग, न मानसिक पीड़ा, न शत्रु का भय होता है।

श्लोक 44 (skanda.6.183.44)

यश्चैतच्छृणुयाद्भक्त्या वाच्यमानं द्विजोत्तमाः । सोऽपि संवत्सरं यावत्पन्नगैर्न च पीड्यते

yaścaitacchṛṇuyādbhaktyā vācyamānaṁ dvijottamāḥ so'pi saṁvatsaraṁ yāvatpannagairna ca pīḍyate

और जो कोई इस वृत्तान्त को भक्तिपूर्वक कहे जाते हुए सुनता है, हे द्विजोत्तमो, वह भी एक वर्ष तक सर्पों से पीड़ित नहीं होता।

श्लोक 45 (skanda.6.183.45)

सर्पदष्टस्य यस्यैतत्पुरतः पठ्यते भृशम् । नागतीर्थस्य माहात्म्यं काल दष्टोऽपि जीवति

sarpadaṣṭasya yasyaitatpurataḥ paṭhyate bhṛśam nāgatīrthasya māhātmyaṁ kāla daṣṭo'pi jīvati

सर्पदंश से पीड़ित जिस व्यक्ति के सामने इस नागतीर्थ की महिमा बारंबार पढ़ी जाती है, वह काल के डसे जाने पर भी जीवित रहता है।

श्लोक 46 (skanda.6.183.46)

पुस्तके लिखितं चैतन्नागतीर्थसमुद्भवम् । माहात्म्यं तिष्ठते यत्र न सर्पस्तत्र तिष्ठति

pustake likhitaṁ caitannāgatīrthasamudbhavam māhātmyaṁ tiṣṭhate yatra na sarpastatra tiṣṭhati

और जिस स्थान पर नागतीर्थ की उत्पत्ति बताने वाली यह महिमा पुस्तक में लिखी रहती है, वहाँ सर्प कभी नहीं रहता।

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