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नागर खण्ड · अध्याय 184

पिंगलोपाख्यान वर्णन

अध्याय 183अध्याय-सूचीअध्याय 185

श्लोक 1 (skanda.6.184.1)

सूत उवाच । तृतीये च दिने प्राप्ते त्रयोदश्यां द्विजोत्तमाः । प्रातःसवनमादाय ऋत्विजः सर्व एव ते । स्वेस्वे कर्मणि संलग्ना यज्ञकृत्यसमुद्भवे

sūta uvāca tṛtīye ca dine prāpte trayodaśyāṁ dvijottamāḥ prātaḥsavanamādāya ṛtvijaḥ sarva eva te svesve karmaṇi saṁlagnā yajñakṛtyasamudbhave

सूत जी ने कहा — तीसरा दिन आने पर, त्रयोदशी तिथि को, हे द्विजोत्तमो, समस्त ऋत्विज प्रातःसवन ग्रहण करके अपने-अपने यज्ञकर्म में संलग्न हो गए।

श्लोक 2 (skanda.6.184.2)

ततः प्रवर्तते यज्ञस्तदा पैतामहो महान् । सर्वकामसमृद्धस्तु सर्वैः समुदितो गुणैः

tataḥ pravartate yajñastadā paitāmaho mahān sarvakāmasamṛddhastu sarvaiḥ samudito guṇaiḥ

तब पितामह का वह महान यज्ञ, समस्त कामनाओं से समृद्ध और सभी गुणों से युक्त, आगे बढ़ने लगा।

श्लोक 3 (skanda.6.184.3)

दीयतां दीयतां तत्र भुज्यतां भुज्यतामिति । एकः संश्रूयते शब्दो द्वितीयो द्विजसंभवः

dīyatāṁ dīyatāṁ tatra bhujyatāṁ bhujyatāmiti ekaḥ saṁśrūyate śabdo dvitīyo dvijasaṁbhavaḥ

"दो! दो!" और "खाओ! खाओ!" — वहाँ केवल यही दो ध्वनियाँ सुनाई देती थीं, दूसरी ध्वनि ब्राह्मणों से उत्पन्न होती थी।

श्लोक 4 (skanda.6.184.4)

नान्यस्तत्र तृतीयस्तु यज्ञे पैतामहे शुभे । यो यं कामयते कामं हेमरत्नसमुद्भवम्

nānyastatra tṛtīyastu yajñe paitāmahe śubhe yo yaṁ kāmayate kāmaṁ hemaratnasamudbhavam

उस पितामह के शुभ यज्ञ में कोई तीसरी ध्वनि नहीं थी; जो जिस स्वर्ण या रत्ननिर्मित वस्तु की कामना करता,

श्लोक 5 (skanda.6.184.5)

स तत्प्राप्नोत्यसंदिग्धं वांछिताच्च चतुर्गुणम् । पक्वान्नस्य कृतास्तत्र दृश्यंते पर्वताः शुभाः

sa tatprāpnotyasaṁdigdhaṁ vāṁchitācca caturguṇam pakvānnasya kṛtāstatra dṛśyaṁte parvatāḥ śubhāḥ

वह उसे निःसंदेह, इच्छित से भी चौगुना, प्राप्त कर लेता। वहाँ पके हुए अन्न के शुभ पर्वत दिखाई देते थे,

श्लोक 6 (skanda.6.184.6)

घृतक्षीर महानद्यो दानार्थं वित्तराशयः । एतस्मिन्नंतरे प्राप्तः कश्चिज्ज्ञानी द्विजोत्तमाः

ghṛtakṣīra mahānadyo dānārthaṁ vittarāśayaḥ etasminnaṁtare prāptaḥ kaścijjñānī dvijottamāḥ

घी और दूध की महानदियाँ, दान हेतु धनराशियाँ। इसी बीच वहाँ एक ज्ञानी पुरुष आ पहुँचा, हे द्विजोत्तमो,

श्लोक 7 (skanda.6.184.7)

अतीतानागतान्वेत्ति वर्तमानं च यः सदा । स ब्रह्माणं नमस्कृत्य निविष्टश्च तदग्रतः

atītānāgatānvetti vartamānaṁ ca yaḥ sadā sa brahmāṇaṁ namaskṛtya niviṣṭaśca tadagrataḥ

जो सदा भूत, भविष्य और वर्तमान को जानता था; उसने ब्रह्मा को नमस्कार करके उनके सामने आसन ग्रहण किया।

श्लोक 8 (skanda.6.184.8)

कर्मांतरेषु विप्राणां स सर्वेषां द्विजोत्तमाः । कथयामास यद्वृत्तं बाल्यात्प्रभृति कृत्स्नशः

karmāṁtareṣu viprāṇāṁ sa sarveṣāṁ dvijottamāḥ kathayāmāsa yadvṛttaṁ bālyātprabhṛti kṛtsnaśaḥ

ब्राह्मणों के विभिन्न कर्मों के बीच, हे द्विजोत्तमो, उसने बाल्यकाल से लेकर अपना समस्त वृत्तान्त पूर्णरूप से सुनाया।

श्लोक 9 (skanda.6.184.9)

ततस्त ऋत्विजः सर्वे कौतुकाविष्टचेतसः । पप्रच्छुर्ज्ञानिनं तं च विस्मयोत्फुल्ललोचनाः

tatasta ṛtvijaḥ sarve kautukāviṣṭacetasaḥ papracchurjñāninaṁ taṁ ca vismayotphullalocanāḥ

तब समस्त ऋत्विज कौतूहल से भरकर, आश्चर्यचकित नेत्रों से, उस ज्ञानी से प्रश्न करने लगे।

श्लोक 10 (skanda.6.184.10)

विस्मृतानि स्मरंतस्ते निजकृत्यानि वै ततः । प्रोक्तानि गर्हणीयानि ह्यसंख्यातानि सर्वशः

vismṛtāni smaraṁtaste nijakṛtyāni vai tataḥ proktāni garhaṇīyāni hyasaṁkhyātāni sarvaśaḥ

तब वे अपने भूले हुए कृत्यों को स्मरण करते हुए बोले — असंख्य, सर्वथा निन्दनीय कृत्य।

श्लोक 11 (skanda.6.184.11)

ततस्ते पुनरेवाथ पप्रच्छुर्ज्ञानिनं च तम् । लोकोत्तरमिदं ज्ञानं कथं ते संस्थितं द्विज

tataste punarevātha papracchurjñāninaṁ ca tam lokottaramidaṁ jñānaṁ kathaṁ te saṁsthitaṁ dvija

फिर उन्होंने पुनः उस ज्ञानी से पूछा — "हे द्विज, यह लोकोत्तर ज्ञान तुझमें कैसे स्थित हुआ?"

श्लोक 12 (skanda.6.184.12)

को गुरुस्ते समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः । अहोज्ञानमहो ज्ञानं नैतद्दृष्टं श्रुतं च न

ko guruste samācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ ahojñānamaho jñānaṁ naitaddṛṣṭaṁ śrutaṁ ca na

"तेरा गुरु कौन है, हमें बताओ — हमें अत्यंत कौतूहल है। अहो ज्ञान! अहो ज्ञान! ऐसा न पहले देखा गया, न सुना गया,"

श्लोक 13 (skanda.6.184.13)

यादृशं ते द्विजश्रेष्ठ दृश्यते पार्थसंस्थितम् । किं ब्रह्मणा स्वयं विप्र त्वमेवं प्रतिबोधितः

yādṛśaṁ te dvijaśreṣṭha dṛśyate pārthasaṁsthitam kiṁ brahmaṇā svayaṁ vipra tvamevaṁ pratibodhitaḥ

"हे द्विजश्रेष्ठ, जैसा तुझमें स्थित दिखाई देता है। क्या तुझे स्वयं ब्रह्मा ने, हे विप्र, इस प्रकार प्रबोधित किया है,"

श्लोक 14 (skanda.6.184.14)

किं वा हरेण तुष्टेन किं वा देवेन चक्रिणा । नान्यप्रबोधितस्यैवं ज्ञानं संजायते स्फुटम्

kiṁ vā hareṇa tuṣṭena kiṁ vā devena cakriṇā nānyaprabodhitasyaivaṁ jñānaṁ saṁjāyate sphuṭam

"या प्रसन्न हर ने, या चक्रधारी देव ने? क्योंकि किसी अन्य के द्वारा प्रबोधित हुए बिना ऐसा ज्ञान इस प्रकार स्पष्ट रूप से उत्पन्न नहीं होता।"

श्लोक 15 (skanda.6.184.15)

अतिथिरुवाच । पिंगला कुररः सर्पः सारंगश्चैव यो वने । इषुकारः कुमारी च षडेते गुरवो मम

atithiruvāca piṁgalā kuraraḥ sarpaḥ sāraṁgaścaiva yo vane iṣukāraḥ kumārī ca ṣaḍete guravo mama

अतिथि ने कहा — "पिंगला, कुरर पक्षी, सर्प, वन में रहने वाला सारंग मृग, इषुकार (बाणकार), और एक कुमारी — ये छह मेरे गुरु हैं।"

श्लोक 16 (skanda.6.184.16)

एतेषां चेष्टितं दृष्ट्वा ज्ञानं मे समुपस्थितम्

eteṣāṁ ceṣṭitaṁ dṛṣṭvā jñānaṁ me samupasthitam

"इनके आचरण को देखकर मुझमें ज्ञान स्थित हुआ।"

श्लोक 17 (skanda.6.184.17)

ब्राह्मणा ऊचुः । कथयस्व महाभाग कथं ते गुरवः स्थिताः । कीदृशं च त्वया दृष्टं तेषां चैव विचेष्टितम्

brāhmaṇā ūcuḥ kathayasva mahābhāga kathaṁ te guravaḥ sthitāḥ kīdṛśaṁ ca tvayā dṛṣṭaṁ teṣāṁ caiva viceṣṭitam

ब्राह्मणों ने कहा — "हे महाभाग, बताओ ये तुम्हारे गुरु कैसे बने, और तुमने उनका कैसा आचरण देखा।"

श्लोक 18 (skanda.6.184.18)

कस्मिन्देशे त्वमुत्पन्नः कस्मिन्स्थाने वदस्व नः । किंनामा किं नु गोत्रश्च सर्वं विस्तरतो वद

kasmindeśe tvamutpannaḥ kasminsthāne vadasva naḥ kiṁnāmā kiṁ nu gotraśca sarvaṁ vistarato vada

"तुम किस देश में उत्पन्न हुए, किस स्थान में — हमें बताओ; तुम्हारा नाम क्या है, गोत्र क्या है — सब कुछ विस्तार से बताओ।"

श्लोक 19 (skanda.6.184.19)

अतिथिरुवाच । आसन्नव पुरे विप्राश्चत्वारो ये विवासिताः । शुनःशेपोऽथ शाक्रेयो बौद्धो दांतश्चतुर्थकः

atithiruvāca āsannava pure viprāścatvāro ye vivāsitāḥ śunaḥśepo'tha śākreyo bauddho dāṁtaścaturthakaḥ

अतिथि ने कहा — "एक नगर में चार निर्वासित ब्राह्मण थे — शुनःशेप, फिर शाक्रेय, एक बौद्ध, और चौथा दान्त।"

श्लोक 20 (skanda.6.184.20)

तेषां मध्ये तु यो बौद्धः शांतो दांत इति स्मृतः । छन्दोगगोत्रविख्यातो वेदवेदांगपारगः

teṣāṁ madhye tu yo bauddhaḥ śāṁto dāṁta iti smṛtaḥ chandogagotravikhyāto vedavedāṁgapāragaḥ

"उनमें से जो बौद्ध थे, वे शान्त-दान्त नाम से प्रसिद्ध थे; छन्दोगगोत्र में विख्यात, वेद-वेदांगपारंगत।"

श्लोक 21 (skanda.6.184.21)

नागरेषु समुत्पन्नः पश्चिमेवयसि स्थितः । तस्याहं प्रथमः पुत्रः प्राणेभ्योऽपि सुहृत्प्रियः

nāgareṣu samutpannaḥ paścimevayasi sthitaḥ tasyāhaṁ prathamaḥ putraḥ prāṇebhyo'pi suhṛtpriyaḥ

"नागरों में उत्पन्न, वे जीवन की अंतिम अवस्था में थे; मैं उनका प्रथम पुत्र था, प्राणों से भी अधिक प्रिय।"

श्लोक 22 (skanda.6.184.22)

ततोऽहं यौवनं प्राप्तो यदा द्विजवरोत्तम। तदा मे दयितस्तातः पंचत्वं समुपागतः

tato'haṁ yauvanaṁ prāpto yadā dvijavarottama tadā me dayitastātaḥ paṁcatvaṁ samupāgataḥ

"फिर, हे द्विजवरोत्तम, जब मैं यौवन को प्राप्त हुआ, तब मेरे प्रिय पिता का देहान्त हो गया।"

श्लोक 23 (skanda.6.184.23)

एतस्मिन्नंतरे राजा ह्यानर्ताधिपतिर्द्विजाः । सुतपास्तेन निर्दिष्टोऽहं तु कंचुकिकर्मणि

etasminnaṁtare rājā hyānartādhipatirdvijāḥ sutapāstena nirdiṣṭo'haṁ tu kaṁcukikarmaṇi

"इसी बीच, हे द्विजो, आनर्त देश के राजा ने मुझे, सुतपा को, कंचुकी (अंतःपुर-रक्षक) के पद पर नियुक्त किया,"

श्लोक 24 (skanda.6.184.24)

शांतं दांतं समालोक्य विश्वस्तेन महात्मना । तस्य चांतःपुरे ह्यासीत्पिंगलानाम नायिका

śāṁtaṁ dāṁtaṁ samālokya viśvastena mahātmanā tasya cāṁtaḥpure hyāsītpiṁgalānāma nāyikā

"उस महात्मा ने मेरे शान्त-दान्त स्वभाव को देखकर विश्वास किया। उनके अंतःपुर में पिंगला नामक एक नायिका थी,"

श्लोक 25 (skanda.6.184.25)

दौर्भाग्येण समोपेता रूपेणापि समन्विता । अथान्याः शतशस्तस्य भार्याश्चांतःपुरे स्थिताः

daurbhāgyeṇa samopetā rūpeṇāpi samanvitā athānyāḥ śataśastasya bhāryāścāṁtaḥpure sthitāḥ

"जो दुर्भाग्य से युक्त होते हुए भी रूप से सम्पन्न थी। उसके अतिरिक्त उनकी सैकड़ों अन्य पत्नियाँ भी अंतःपुर में रहती थीं।"

श्लोक 26 (skanda.6.184.26)

ताः सर्वा रजनीवक्त्रे व्याकुलत्वं प्रयांति च । आहरंति परान्गन्धान्धूपांश्च कुसुमानि च

tāḥ sarvā rajanīvaktre vyākulatvaṁ prayāṁti ca āharaṁti parāngandhāndhūpāṁśca kusumāni ca

"रात्रि का समय निकट आने पर वे सभी व्याकुल हो उठतीं और सुगन्धित द्रव्य, धूप और पुष्प मँगाती थीं,"

श्लोक 27 (skanda.6.184.27)

विलेपनानि मुख्यानि सुरभीणि तथा पुरः । पुष्पाणि च विचित्राणि ह्यन्याः सूक्ष्मांबराणि च

vilepanāni mukhyāni surabhīṇi tathā puraḥ puṣpāṇi ca vicitrāṇi hyanyāḥ sūkṣmāṁbarāṇi ca

"उत्तम सुगन्धित उबटन, तथा उनसे पहले विचित्र पुष्प और अन्य सूक्ष्म वस्त्र मँगातीं,"

श्लोक 28 (skanda.6.184.28)

तावद्यावत्स्थितः कालः शयनीयसमुद्भवः । मन्मथोत्साहसं युक्ताः पुलकेन समन्विताः

tāvadyāvatsthitaḥ kālaḥ śayanīyasamudbhavaḥ manmathotsāhasaṁ yuktāḥ pulakena samanvitāḥ

"जब तक शयन का समय रहता, वे कामोत्साह से युक्त, रोमांचित हो उठतीं।"

श्लोक 29 (skanda.6.184.29)

एका जानाति मां सुप्तां नूनमाकारयिष्यति । अन्या जानाति मां चैव परस्परममर्षतः

ekā jānāti māṁ suptāṁ nūnamākārayiṣyati anyā jānāti māṁ caiva parasparamamarṣataḥ

"एक सोचती — 'वे जानते हैं कि मैं सोई हूँ, अवश्य मुझे बुलाएँगे' — दूसरी भी यही सोचती अपने विषय में — इस प्रकार वे परस्पर असहिष्णु होकर,"

श्लोक 30 (skanda.6.184.30)

स्पर्धयन्ति प्रयुध्यन्ति विरूपाणि वदन्ति च । तासां मध्यात्ततश्चैका प्रयाति नृपसंनिधौ

spardhayanti prayudhyanti virūpāṇi vadanti ca tāsāṁ madhyāttataścaikā prayāti nṛpasaṁnidhau

"होड़ करतीं, झगड़तीं, कटु वचन बोलतीं। फिर उनमें से एक राजा के समीप चली जाती,"

श्लोक 31 (skanda.6.184.31)

शेषा वै लक्ष्यमासाद्य निःश्वस्य प्रस्वपन्ति च । दुःखार्ता न लभन्ति स्म ताश्च निद्रां पराभवात्

śeṣā vai lakṣyamāsādya niḥśvasya prasvapanti ca duḥkhārtā na labhanti sma tāśca nidrāṁ parābhavāt

"शेष अपने लक्ष्य को केवल दूर से पाकर, निःश्वास लेकर सो जातीं; दुःख से पीड़ित, तिरस्कार के कारण उन्हें निद्रा नहीं मिलती,"

श्लोक 32 (skanda.6.184.32)

कामेन पीडितांगाश्च बाष्पपूर्णेक्षणाः स्थिताः

kāmena pīḍitāṁgāśca bāṣpapūrṇekṣaṇāḥ sthitāḥ

"काम से पीड़ित अंगों वाली, आँसुओं से भरे नेत्रों वाली वे वहीं पड़ी रहतीं।"

श्लोक 33 (skanda.6.184.33)

आशा हि परमं दुःखं निराशा परमं सुखम् । आशानिराशां कृत्वा च सुखं स्वपिति पिंगला । न करोति च शृंगारं न स्पर्धां च कदाचन। न व्याकुलत्वमापेदे सुखं स्वपिति पिंगला

āśā hi paramaṁ duḥkhaṁ nirāśā paramaṁ sukham āśānirāśāṁ kṛtvā ca sukhaṁ svapiti piṁgalā na karoti ca śṛṁgāraṁ na spardhāṁ ca kadācana na vyākulatvamāpede sukhaṁ svapiti piṁgalā

"आशा ही परम दुःख है, निराशा ही परम सुख है। आशा को निराशा में परिणत करके पिंगला सुखपूर्वक सोती थी। वह न कभी श्रृंगार करती, न कभी होड़ करती; व्याकुलता को प्राप्त नहीं होती — पिंगला सुखपूर्वक सोती थी।"

श्लोक 34 (skanda.6.184.34)

ततो मयापि तद्दृष्ट्वा तस्याश्चेष्टितमुत्तमम्। आशाः सर्वाः परित्यक्ताः स्वपिमीह ततः सुखी

tato mayāpi taddṛṣṭvā tasyāśceṣṭitamuttamam āśāḥ sarvāḥ parityaktāḥ svapimīha tataḥ sukhī

"फिर मैंने भी उसका यह उत्तम आचरण देखकर समस्त आशाओं का त्याग कर दिया, और तब से यहाँ सुखपूर्वक सोता हूँ।"

श्लोक 35 (skanda.6.184.35)

ये स्वपंति सुखं रात्रौ तेषां कायाग्निरिध्यते। आहारं प्रतिगृह्णाति ततः पुष्टिकरं परम्

ye svapaṁti sukhaṁ rātrau teṣāṁ kāyāgniridhyate āhāraṁ pratigṛhṇāti tataḥ puṣṭikaraṁ param

"जो रात्रि में सुखपूर्वक सोते हैं, उनकी देहाग्नि प्रज्वलित रहती है; वे जो आहार ग्रहण करते हैं, वह अत्यंत पुष्टिकारक होता है।"

श्लोक 36 (skanda.6.184.36)

तदेत्कारणं जातं मम तेजो भिवृद्धये। गुरुत्वे पिंगला जाता तेन सा मे द्विजोत्तमाः

tadetkāraṇaṁ jātaṁ mama tejo bhivṛddhaye gurutve piṁgalā jātā tena sā me dvijottamāḥ

"यही मेरे तेज की वृद्धि का कारण बना; इसी से पिंगला मेरी गुरु हुई, हे द्विजोत्तमो, इसीलिए वह मेरी मानी जाती है।"

श्लोक 37 (skanda.6.184.37)

आशापाशैः परीतांगा ये भवन्ति नरो र्दिताः। ते रात्रौ शेरते नैव तदप्राप्तिविचिन्तया

āśāpāśaiḥ parītāṁgā ye bhavanti naro rditāḥ te rātrau śerate naiva tadaprāptivicintayā

"जो मनुष्य आशा के पाशों से घिरे, पीड़ित रहते हैं, वे उसकी अप्राप्ति की चिन्ता से रात्रि में कभी नहीं सोते।"

श्लोक 38 (skanda.6.184.38)

नैवाग्निर्दीप्यते तेषां जाठरश्च ततः परम्। आहारं वांछते नैव तन्न तेजोभिवर्धनम्

naivāgnirdīpyate teṣāṁ jāṭharaśca tataḥ param āhāraṁ vāṁchate naiva tanna tejobhivardhanam

"उनकी अग्नि प्रज्वलित नहीं होती, न ही उनकी जठराग्नि; वे आहार की इच्छा भी नहीं करते, और इसलिए उनके तेज की वृद्धि नहीं होती।"

श्लोक 39 (skanda.6.184.39)

सर्वस्य विद्यते प्रांतो न वांछायाः कथंचन

sarvasya vidyate prāṁto na vāṁchāyāḥ kathaṁcana

"सबकी कोई सीमा होती है, किन्तु इच्छा की कोई सीमा नहीं होती।"

श्लोक 40 (skanda.6.184.40)

यथायथा भवेल्लाभो वांचितस्य नृणामिह। हविषा कृष्णवर्त्मेव वृद्धिं याति तथातथा

yathāyathā bhavellābho vāṁcitasya nṛṇāmiha haviṣā kṛṣṇavartmeva vṛddhiṁ yāti tathātathā

"इस संसार में मनुष्य को जैसे-जैसे अभीष्ट लाभ होता जाता है, वैसे-वैसे, हविष्य से पोषित अग्नि के समान, उसकी इच्छा बढ़ती जाती है।"

श्लोक 41 (skanda.6.184.41)

यथा शृंगं रुरोः काये वर्धमानस्य वर्धते। एवं तृष्णापि यत्नेन वर्धमानेन वर्धते

yathā śṛṁgaṁ ruroḥ kāye vardhamānasya vardhate evaṁ tṛṣṇāpi yatnena vardhamānena vardhate

"जैसे बढ़ते हुए मृग के शरीर पर सींग बढ़ता जाता है, वैसे ही प्रयत्नपूर्वक बढ़ाई गई तृष्णा भी बढ़ती जाती है।"

श्लोक 42 (skanda.6.184.42)

एवं ज्ञात्वा महाभागः पुरुषेण विजानता। दिवा तत्कर्म कर्तव्यं येन रात्रौ सुखं स्वपेत्

evaṁ jñātvā mahābhāgaḥ puruṣeṇa vijānatā divā tatkarma kartavyaṁ yena rātrau sukhaṁ svapet

"हे महाभाग्यशाली, यह जानकर बुद्धिमान पुरुष को दिन में वही कर्म करना चाहिए, जिससे वह रात्रि में सुखपूर्वक सो सके।"

अध्याय 183अध्याय-सूचीअध्याय 185