नागर खण्ड · अध्याय 185
षड्गुरूपाख्यान एवं यज्ञपुरुषवरप्रदान वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.185.1)
अतिथिरुवाच । एतद्वः सर्वमाख्यातं यथा मे पिंगला गुरुः। संजाता कुररो जातो यथा तत्प्रवदान्यहम्
atithiruvāca etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yathā me piṁgalā guruḥ saṁjātā kuraro jāto yathā tatpravadānyaham
अतिथि ने कहा — "यह सब मैंने तुम्हें बताया कि पिंगला किस प्रकार मेरी गुरु बनी; अब उसी प्रकार बताता हूँ कि कुरर पक्षी किस प्रकार मेरा गुरु बना।"
श्लोक 2 (skanda.6.185.2)
ममासीद्द्रविणं भूरि पितृपैतामहं महत्
mamāsīddraviṇaṁ bhūri pitṛpaitāmahaṁ mahat
"मेरे पास पिता और पितामह का दिया हुआ प्रचुर, महान धन था।"
श्लोक 3 (skanda.6.185.3)
येऽथ पुत्राश्च दायादा बांधवा अपि। ते मां सर्वे प्रबाधन्ते द्रव्यसस्यकृते सदा
ye'tha putrāśca dāyādā bāṁdhavā api te māṁ sarve prabādhante dravyasasyakṛte sadā
"मेरे पुत्र, वारिस और बांधव — ये सभी सदा मुझे धन-धान्य के लिए तंग करते थे।"
श्लोक 4 (skanda.6.185.4)
यस्याहं न प्रयच्छामि स मां चैव प्रबाधते। सीदमानस्तु सुभृशं दर्शयन्प्राणसंक्षयम्
yasyāhaṁ na prayacchāmi sa māṁ caiva prabādhate sīdamānastu subhṛśaṁ darśayanprāṇasaṁkṣayam
"जिसे मैं नहीं देता था, वह मुझे और भी सताता, अत्यंत दुःखी होकर अपने प्राणनाश की धमकी दिखाता।"
श्लोक 5 (skanda.6.185.5)
एक साम्ना प्रयाचंते वित्तं भेदेन चापरे । भयदानेन चान्येऽपि केचिद्दंडेन च द्विजाः
eka sāmnā prayācaṁte vittaṁ bhedena cāpare bhayadānena cānye'pi keciddaṁḍena ca dvijāḥ
"कोई मीठी बातों से धन माँगते, कोई फूट डालकर, कुछ, हे ब्राह्मणो, भय दिखाकर, तथा कुछ बलपूर्वक भी।"
श्लोक 6 (skanda.6.185.6)
एवं नाहं क्वचित्सौख्यं तेषां पार्श्वाल्लभामि भोः । चिन्तयानो दिवानक्तं क्लेशस्य परि संक्षयम् । उपायं न च पश्यामि येन शांतिः प्रजायते
evaṁ nāhaṁ kvacitsaukhyaṁ teṣāṁ pārśvāllabhāmi bhoḥ cintayāno divānaktaṁ kleśasya pari saṁkṣayam upāyaṁ na ca paśyāmi yena śāṁtiḥ prajāyate
"इस प्रकार मुझे उनके साथ कहीं भी सुख नहीं मिलता था; दिन-रात इस क्लेश के अंत का उपाय सोचते हुए भी मुझे शांति का कोई मार्ग नहीं दिखता था।"
श्लोक 7 (skanda.6.185.7)
अन्यस्मिन्दिवसे दृष्टः कृतमांसपरिग्रहः । कुररश्चंचुना व्योम्नि गच्छमानस्त्वरान्वितः
anyasmindivase dṛṣṭaḥ kṛtamāṁsaparigrahaḥ kuraraścaṁcunā vyomni gacchamānastvarānvitaḥ
"एक दिन मैंने एक कुरर पक्षी को देखा, जिसने चोंच में मांस का एक टुकड़ा पकड़ रखा था और वह तीव्रता से आकाश में उड़ रहा था,"
श्लोक 8 (skanda.6.185.8)
हन्यमानः समंताच्च मांसार्थे विविधैः खगैः । अथ तेन परिक्षिप्तं तन्मांसं पक्षिजाद्भयात्
hanyamānaḥ samaṁtācca māṁsārthe vividhaiḥ khagaiḥ atha tena parikṣiptaṁ tanmāṁsaṁ pakṣijādbhayāt
"नाना प्रकार के पक्षी उस मांस के लोभ में चारों ओर से उस पर आक्रमण कर रहे थे; तब उसने पक्षियों के भय से वह मांस त्याग दिया —"
श्लोक 9 (skanda.6.185.9)
यावत्तावत्सुखी जातस्तेऽपिसर्वे समुज्झिताः । मयापि क्लिश्यमानेन तद्वच्च निजबांधवैः
yāvattāvatsukhī jātaste'pisarve samujjhitāḥ mayāpi kliśyamānena tadvacca nijabāṁdhavaiḥ
"त्यागते ही वह सुखी हो गया, और वे सब उसे छोड़कर चले गए; जबकि मैं भी उसी प्रकार अपने बांधवों से पीड़ित था —"
श्लोक 10 (skanda.6.185.10)
सामिषं कुररं दृष्ट्वा वध्यमानं निरामिषैः । आमिषस्य परित्यागात्कुररः सुखमेधते
sāmiṣaṁ kuraraṁ dṛṣṭvā vadhyamānaṁ nirāmiṣaiḥ āmiṣasya parityāgātkuraraḥ sukhamedhate
"उस मांसयुक्त कुरर को निर्मांस पक्षियों द्वारा सताया जाता देखकर मैंने समझा — मांस त्यागने से ही कुरर को सुख मिलता है।"
श्लोक 11 (skanda.6.185.11)
एवं निश्चित्य मनसा सर्वानानीय बांधवान् । पुत्रान्पौत्रांस्ततः सर्वान्पुरस्तेषां निवेदितम्
evaṁ niścitya manasā sarvānānīya bāṁdhavān putrānpautrāṁstataḥ sarvānpurasteṣāṁ niveditam
"मन में ऐसा निश्चय करके मैंने अपने समस्त बांधवों, पुत्रों और पौत्रों को बुलाकर उन सबके सामने घोषणा की —"
श्लोक 12 (skanda.6.185.12)
त्रिःसत्यं शपथं कृत्वा नान्यदस्तीति मे गृहे । विभज्यार्थं यथान्यायं यूयं गृह्णीत बान्धवाः
triḥsatyaṁ śapathaṁ kṛtvā nānyadastīti me gṛhe vibhajyārthaṁ yathānyāyaṁ yūyaṁ gṛhṇīta bāndhavāḥ
"त्रिबार सत्य की शपथ लेकर कि 'मेरे घर में और कुछ शेष नहीं है' — यथान्याय धन को बाँटकर, हे बांधवो, ग्रहण करो।"
श्लोक 13 (skanda.6.185.13)
ततःप्रभृति तैर्मुक्तः सुखं तिष्ठाम्यहं द्विजाः । एतस्मात्कारणाज्जातो ममासौ कुररो गुरुः
tataḥprabhṛti tairmuktaḥ sukhaṁ tiṣṭhāmyahaṁ dvijāḥ etasmātkāraṇājjāto mamāsau kuraro guruḥ
"तब से, उनसे मुक्त होकर, हे ब्राह्मणो, मैं सुखपूर्वक रहता हूँ; इसी कारण वह कुरर मेरा गुरु बना।"
श्लोक 14 (skanda.6.185.14)
अर्थसंपद्विमोहाय विमोहो नरकाय च । तस्मादर्थमनर्थं तं मोक्षार्थी दूरतस्त्यजेत्
arthasaṁpadvimohāya vimoho narakāya ca tasmādarthamanarthaṁ taṁ mokṣārthī dūratastyajet
"धन की समृद्धि मोह के लिए होती है, और मोह नरक के लिए; इसलिए मोक्षार्थी को धन को, जो अनर्थ है, दूर से ही त्याग देना चाहिए।"
श्लोक 15 (skanda.6.185.15)
यथामिषं जले मत्स्यैर्भक्ष्यते श्वापदैर्भुवि। आकाशे पक्षिभिश्चैव तथा सर्वत्र वित्तवान्
yathāmiṣaṁ jale matsyairbhakṣyate śvāpadairbhuvi ākāśe pakṣibhiścaiva tathā sarvatra vittavān
"जैसे जल में मांस मछलियों द्वारा, भूमि पर हिंसक पशुओं द्वारा, आकाश में पक्षियों द्वारा खाया जाता है, वैसे ही सर्वत्र धनवान का भक्षण होता है।"
श्लोक 16 (skanda.6.185.16)
दोषहीनोऽपि धनवान्भूपाद्यैः परिताप्यते। दरिद्रः कृतदोषोऽपि सर्वत्र निरुपद्रवः
doṣahīno'pi dhanavānbhūpādyaiḥ paritāpyate daridraḥ kṛtadoṣo'pi sarvatra nirupadravaḥ
"दोषरहित होते हुए भी धनवान राजा आदि से संतप्त होता है; निर्धन, दोष करने पर भी, सर्वत्र निरुपद्रव रहता है।"
श्लोक 17 (skanda.6.185.17)
आलंबिताः परैर्यांति प्रस्खलंति पदेपदे । गद्गदानि च जल्पंते धनिनो मद्यपा इव
ālaṁbitāḥ parairyāṁti praskhalaṁti padepade gadgadāni ca jalpaṁte dhanino madyapā iva
"दूसरों के सहारे चलने वाले, हर कदम पर लड़खड़ाते, अस्पष्ट बोलते हैं — धनवान, मानो मद्यपायी हों।"
श्लोक 18 (skanda.6.185.18)
भक्ते द्वेषो बहिः प्रीती रुचितं गुरुलघ्वपि । मुखे च कटुता नित्यं धनिनां ज्वरिणामिव
bhakte dveṣo bahiḥ prītī rucitaṁ gurulaghvapi mukhe ca kaṭutā nityaṁ dhanināṁ jvariṇāmiva
"आश्रित के प्रति द्वेष, बाहर से प्रेम, चाहे छोटी हो या बड़ी बात, रुचिकर मानते हैं, किन्तु मुख पर सदा कटुता — ज्वरग्रस्त के समान होते हैं धनवान।"
श्लोक 19 (skanda.6.185.19)
अर्थानामर्जने दुःखमर्जितानां च रक्षणे । नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थो दुःखभाजनम्
arthānāmarjane duḥkhamarjitānāṁ ca rakṣaṇe nāśe duḥkhaṁ vyaye duḥkhaṁ dhigartho duḥkhabhājanam
"धन कमाने में दुःख है, कमाए हुए की रक्षा में दुःख है; उसके नाश में दुःख है, व्यय में दुःख है — धिक्कार है इस दुःख के भाजन धन को!"
श्लोक 20 (skanda.6.185.20)
अर्थार्थी जीव लोकोऽयं स्मशानमपि सेवते । जनितारमपि त्यक्त्वा निःस्वं यांति सुता अपि
arthārthī jīva loko'yaṁ smaśānamapi sevate janitāramapi tyaktvā niḥsvaṁ yāṁti sutā api
"धन के इच्छुक ये प्राणी श्मशान तक का भी सहारा लेते हैं; निर्धन हो जाने पर स्वयं जन्मदाता पिता को भी पुत्र त्याग देते हैं।"
श्लोक 21 (skanda.6.185.21)
सुतस्य वल्लभस्तावत्पिता पुत्रोऽपि वै पितुः । यावन्नार्थस्य संबन्धस्ताभ्यां भावी परस्परम् । संबन्धे वित्तजे जाते वैरं संजायते मिथः
sutasya vallabhastāvatpitā putro'pi vai pituḥ yāvannārthasya saṁbandhastābhyāṁ bhāvī parasparam saṁbandhe vittaje jāte vairaṁ saṁjāyate mithaḥ
"पुत्र पिता को तभी तक प्रिय है, और पिता पुत्र को, जब तक उनके बीच धन का सम्बन्ध नहीं होता; धन से उत्पन्न सम्बन्ध होते ही दोनों में परस्पर वैर उत्पन्न हो जाता है।"
श्लोक 22 (skanda.6.185.22)
एतस्मात्कारणाद्वित्तं मया त्यक्तं तपोधनाः । तेन सौख्येन तिष्ठामि कुररस्योपदेशतः
etasmātkāraṇādvittaṁ mayā tyaktaṁ tapodhanāḥ tena saukhyena tiṣṭhāmi kurarasyopadeśataḥ
"इसी कारण, हे तपोधनो, मैंने धन का त्याग किया; उस त्याग से, कुरर के उपदेश से, मैं सुखपूर्वक रहता हूँ।"
श्लोक 23 (skanda.6.185.23)
शृणुध्वं च महाभागा यथा मेऽहिर्गुरुः स्थितः
śṛṇudhvaṁ ca mahābhāgā yathā me'hirguruḥ sthitaḥ
"अब सुनो, हे महाभाग्यशालियो, कैसे सर्प मेरा गुरु बना।"
श्लोक 24 (skanda.6.185.24)
यथा मया गृहं त्यक्तं दृष्ट्वा सर्पविचेष्टितम् । गृहारंभः सुदुःखाय सुखाय न कदाचन
yathā mayā gṛhaṁ tyaktaṁ dṛṣṭvā sarpaviceṣṭitam gṛhāraṁbhaḥ suduḥkhāya sukhāya na kadācana
"सर्प का आचरण देखकर मैंने अपना घर त्याग दिया — घर बनाना सदैव दुःख के लिए ही होता है, कभी सुख के लिए नहीं।"
श्लोक 25 (skanda.6.185.25)
सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते । उषित्वा तत्र सौख्येन भूयोऽन्यत्तादृशं व्रजेत्
sarpaḥ parakṛtaṁ veśma praviśya sukhamedhate uṣitvā tatra saukhyena bhūyo'nyattādṛśaṁ vrajet
"सर्प दूसरे के बनाए घर में प्रवेश करके सुखपूर्वक रहता है; वहाँ सुखपूर्वक रहकर फिर किसी अन्य वैसे ही स्थान को चला जाता है।"
श्लोक 26 (skanda.6.185.26)
मम त्वं कुरुते नैव ममेदं गृहमित्यसौ । न गृहं जायते तस्य न स्वयं हि कृतं यतः
mama tvaṁ kurute naiva mamedaṁ gṛhamityasau na gṛhaṁ jāyate tasya na svayaṁ hi kṛtaṁ yataḥ
"वह कभी नहीं सोचता 'तुम मेरे हो' या 'यह घर मेरा है'; उसका घर सचमुच उसका नहीं होता, क्योंकि उसने स्वयं उसे नहीं बनाया।"
श्लोक 27 (skanda.6.185.27)
यः पुनः कुरुते हर्म्यं स्वयं क्लेशैः पृथग्विधैः । न तस्य याति तत्पश्चान्मृत्युकालेऽपि संस्थिते
yaḥ punaḥ kurute harmyaṁ svayaṁ kleśaiḥ pṛthagvidhaiḥ na tasya yāti tatpaścānmṛtyukāle'pi saṁsthite
"किन्तु जो स्वयं नाना क्लेशों से भवन बनाता है, वह मृत्यु के समय भी उसके साथ नहीं जाता।"
श्लोक 28 (skanda.6.185.28)
गृहात्संजायते भार्या ततः पुत्रश्च कन्यका । तेषामर्थे करोति स्म कृत्याकृत्यं ततः परम्
gṛhātsaṁjāyate bhāryā tataḥ putraśca kanyakā teṣāmarthe karoti sma kṛtyākṛtyaṁ tataḥ param
"घर से पत्नी उत्पन्न होती है, फिर पुत्र और कन्या; उनके लिए ही मनुष्य आगे कर्तव्य-अकर्तव्य करता है।"
श्लोक 29 (skanda.6.185.29)
कोशकारमिवात्मानं वेष्टयन्नावबुध्यते
kośakāramivātmānaṁ veṣṭayannāvabudhyate
"कोशकार कीट के समान स्वयं को लपेटता हुआ वह इसे जानता तक नहीं।"
श्लोक 30 (skanda.6.185.30)
पुत्रदारगृहक्षेत्रसक्ताः सीदंति जंतवः । लोभपंकार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव
putradāragṛhakṣetrasaktāḥ sīdaṁti jaṁtavaḥ lobhapaṁkārṇave magnā jīrṇā vanagajā iva
"पुत्र, पत्नी, घर और खेत में आसक्त प्राणी लोभ के दलदल-सागर में डूब जाते हैं, जैसे जीर्ण वनगज।"
श्लोक 31 (skanda.6.185.31)
एकः पापानि कुरुते फलं भुंक्ते महाजनः । भोक्तारो विप्रमुच्यंते कर्ता दोषेण लिप्यते एतस्मात्कारणाद्धर्म्यं मया त्यक्तं द्विजोत्तमाः। मोक्षमार्गार्गला भूतं दृष्ट्वा सर्पविचेष्टितम्
ekaḥ pāpāni kurute phalaṁ bhuṁkte mahājanaḥ bhoktāro vipramucyaṁte kartā doṣeṇa lipyate etasmātkāraṇāddharmyaṁ mayā tyaktaṁ dvijottamāḥ mokṣamārgārgalā bhūtaṁ dṛṣṭvā sarpaviceṣṭitam
"पाप एक करता है, फल समूचा परिवार भोगता है; भोगने वाले मुक्त हो जाते हैं, कर्ता ही दोष से लिप्त होता है। इसी कारण, हे द्विजोत्तमो, मैंने गृहस्थधर्म को त्याग दिया, इसे मोक्षमार्ग की अर्गला (रुकावट) मानकर, सर्प का आचरण देखकर।"
श्लोक 32 (skanda.6.185.32)
एकरात्रं वसेद्ग्रामे त्रिरात्रं पत्तने वसेत् । यो याति स यतिः प्रोक्तो योऽन्यो योगविडंबकः
ekarātraṁ vasedgrāme trirātraṁ pattane vaset yo yāti sa yatiḥ prokto yo'nyo yogaviḍaṁbakaḥ
"एक रात्रि गाँव में, तीन रात्रि नगर में निवास करे; जो इस प्रकार आगे बढ़ता जाता है, वही यति कहलाता है — अन्य तो योग का उपहास मात्र है।"
श्लोक 33 (skanda.6.185.33)
विधूमे च प्रशांताग्नौ यस्तु माधुकरीं चरेत् । गृहे च विप्रमुख्यानां यतिः स नेतरः स्मृतः
vidhūme ca praśāṁtāgnau yastu mādhukarīṁ caret gṛhe ca vipramukhyānāṁ yatiḥ sa netaraḥ smṛtaḥ
"जो धुआँ शांत होने और घर की अग्नि बुझ जाने पर, भ्रमर के समान भिक्षा-वृत्ति करता हुआ श्रेष्ठ ब्राह्मणों के घर जाता है, वही सच्चा यति है, अन्य नहीं।"
श्लोक 34 (skanda.6.185.34)
दण्डी भिक्षां च वा कुर्यात्तदेव व्यसनं विना । यस्तिष्ठति न वैराग्यं याति नैव यतिर्हि सः
daṇḍī bhikṣāṁ ca vā kuryāttadeva vyasanaṁ vinā yastiṣṭhati na vairāgyaṁ yāti naiva yatirhi saḥ
"दण्डधारी भिक्षा माँग सकता है, पर केवल वही, बिना किसी अन्य आसक्ति के; परन्तु जो ऐसा रहते हुए भी वैराग्य को प्राप्त नहीं होता, वह यति ही नहीं है।"
श्लोक 35 (skanda.6.185.35)
दिवा स्वप्नं वृथान्नं च स्त्रीकथाऽऽलोक्यमेव च । श्वेतवस्त्रं हिरण्यं च यतीनां पतनानि षट्
divā svapnaṁ vṛthānnaṁ ca strīkathā''lokyameva ca śvetavastraṁ hiraṇyaṁ ca yatīnāṁ patanāni ṣaṭ
"दिन में सोना, अनुचित रूप से प्राप्त अन्न, स्त्रियों की चर्चा देखना-सुनना, श्वेत वस्त्र और सुवर्ण — ये यतियों के छह पतन हैं।"
श्लोक 36 (skanda.6.185.36)
समः शत्रौ च मित्रे च समलोष्टाश्मकांचनः । सुहृत्पुत्र उदासीनः स यतिर्नेतरः स्मृतः
samaḥ śatrau ca mitre ca samaloṣṭāśmakāṁcanaḥ suhṛtputra udāsīnaḥ sa yatirnetaraḥ smṛtaḥ
"शत्रु और मित्र में समान, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को समान मानने वाला, मित्र के पुत्र के प्रति भी उदासीन — वही सच्चा यति है, अन्य नहीं।"
श्लोक 37 (skanda.6.185.37)
समौ मानापमानौ च स्वदेशे परिकेपि वा । यो न हृष्यति न द्वेष्टि स यतिर्नेतरः स्मृतः
samau mānāpamānau ca svadeśe parikepi vā yo na hṛṣyati na dveṣṭi sa yatirnetaraḥ smṛtaḥ
"मान और अपमान में समान, अपने देश में हो या पराए में, जो न हर्षित होता है न द्वेष करता है — वही सच्चा यति है, अन्य नहीं।"
श्लोक 38 (skanda.6.185.38)
यस्मिन्गृहे विशेषेण लभेद्भिक्षा च वाशनम् । तत्र नो याति यो भूयः स यतिर्नेतरः स्मृतः
yasmingṛhe viśeṣeṇa labhedbhikṣā ca vāśanam tatra no yāti yo bhūyaḥ sa yatirnetaraḥ smṛtaḥ
"जिस घर में विशेष रूप से भिक्षा या भोजन मिल जाए, उस घर में वह पुनः नहीं जाता — वही सच्चा यति है, अन्य नहीं।"
श्लोक 39 (skanda.6.185.39)
एवं ज्ञात्वा मया विप्र दृष्ट्वा सर्पविचेष्टितम् । सर्वसंगपरित्यागो मोक्षार्थं परिकल्पितः
evaṁ jñātvā mayā vipra dṛṣṭvā sarpaviceṣṭitam sarvasaṁgaparityāgo mokṣārthaṁ parikalpitaḥ
"ऐसा जानकर, हे विप्र, सर्प का आचरण देखकर, मैंने मोक्ष हेतु समस्त आसक्ति के त्याग का संकल्प किया।"
श्लोक 40 (skanda.6.185.40)
एवं ममाहिः संजातो गुरुर्ब्राह्मणसत्तमाः। तत्प्रभावान्महत्तेजः संजातं विग्रहे मम
evaṁ mamāhiḥ saṁjāto gururbrāhmaṇasattamāḥ tatprabhāvānmahattejaḥ saṁjātaṁ vigrahe mama
"इस प्रकार सर्प मेरा गुरु बना, हे द्विजश्रेष्ठो; उसके प्रभाव से मेरे शरीर में महान तेज उत्पन्न हुआ।"
श्लोक 41 (skanda.6.185.41)
यथा मे भ्रमरो जातो गुरुस्तद्वद्वदामि च । कस्मिन्वृक्षे मया दृष्टो भ्रमरः कोऽपि संगतः
yathā me bhramaro jāto gurustadvadvadāmi ca kasminvṛkṣe mayā dṛṣṭo bhramaraḥ ko'pi saṁgataḥ
"अब उसी प्रकार बताता हूँ कि भ्रमर मेरा गुरु कैसे बना — किस वृक्ष पर मैंने एक भ्रमर को इस प्रकार लगा हुआ देखा था?"
श्लोक 42 (skanda.6.185.42)
शाखाय तु समाश्रित्य कृतपूर्वनिबंधनम् । वसंतसमये प्राप्ते पुष्पवंतश्च ये द्रुमाः
śākhāya tu samāśritya kṛtapūrvanibaṁdhanam vasaṁtasamaye prāpte puṣpavaṁtaśca ye drumāḥ
"वह एक शाखा से पूर्वबद्ध होकर चिपका हुआ था; वसंतकाल आने पर जब वृक्ष पुष्पों से लद गए,"
श्लोक 43 (skanda.6.185.43)
सुगन्धफलपुष्पाश्च सुगन्धदलसंयुताः । तेषामणुं समादाय श्रेष्ठश्रेष्ठतमं रसम् नियोजयति शाखाग्रे तरोरस्य सदैव हि । अनिर्विण्णतया हृष्टस्तदा सम्यङ्निरीक्षितः
sugandhaphalapuṣpāśca sugandhadalasaṁyutāḥ teṣāmaṇuṁ samādāya śreṣṭhaśreṣṭhatamaṁ rasam niyojayati śākhāgre tarorasya sadaiva hi anirviṇṇatayā hṛṣṭastadā samyaṅnirīkṣitaḥ
"सुगन्धित फल-फूलों से युक्त, सुगन्धित पंखुड़ियों से सम्पन्न — उनसे थोड़ा-थोड़ा, केवल श्रेष्ठतम रस लेकर,"
श्लोक 44 (skanda.6.185.44)
मधुजालं ततो जातं कालेन महता महत् । येनान्ये मधुना तृप्तिं प्राप्ताः शतसहस्रशः
madhujālaṁ tato jātaṁ kālena mahatā mahat yenānye madhunā tṛptiṁ prāptāḥ śatasahasraśaḥ
"वह उसे सदा उसी वृक्ष की शाखा के अग्रभाग पर संचित करता जाता; बिना थके, प्रसन्नचित्त — इस प्रकार मैंने उसे भलीभाँति देखा।"
श्लोक 45 (skanda.6.185.45)
तच्चेष्टितं मया वीक्ष्य शास्त्राण्यन्यानि भूरिशः । ततस्तेषां समादाय सारभूतं पृथक्पृथक् । कृतानि भूरिशास्त्राणि वेदांतानि च कृत्स्नशः
tacceṣṭitaṁ mayā vīkṣya śāstrāṇyanyāni bhūriśaḥ tatasteṣāṁ samādāya sārabhūtaṁ pṛthakpṛthak kṛtāni bhūriśāstrāṇi vedāṁtāni ca kṛtsnaśaḥ
"इससे दीर्घकाल में एक विशाल मधुजाल उत्पन्न हो गया, जिससे लाखों अन्य प्राणी मधु से तृप्त हुए।"
श्लोक 46 (skanda.6.185.46)
उपजीवंति यान्यन्ये यथा भृङ्गास्तथा द्विजाः
upajīvaṁti yānyanye yathā bhṛṅgāstathā dvijāḥ
"उसका यह आचरण देखकर मैंने अन्य अनेक शास्त्रों को भी देखा; फिर उनसे एक-एक करके सारभूत तत्त्व लेकर,"
श्लोक 47 (skanda.6.185.47)
एवं मे मधुपो जातो गुरुत्वे च द्विजोत्तमाः । तेनाहं तेजसा युक्तो नान्यदस्तीह कारणम्
evaṁ me madhupo jāto gurutve ca dvijottamāḥ tenāhaṁ tejasā yukto nānyadastīha kāraṇam
"मैंने अनेक शास्त्र और समस्त वेदान्त-ग्रन्थ रचे — जिन पर अन्य लोग जीविका चलाते हैं, जैसे भ्रमर पर ब्राह्मण जीते हैं।"
श्लोक 48 (skanda.6.185.48)
वेदांतवादिनो येऽत्र प्रभवंति व्रतान्विताः । निर्लोभा गततृष्णाश्च ते भवंति सुतेजसः
vedāṁtavādino ye'tra prabhavaṁti vratānvitāḥ nirlobhā gatatṛṣṇāśca te bhavaṁti sutejasaḥ
"इस प्रकार भ्रमर मेरा गुरु बना, हे द्विजोत्तमो; उसी से मैं तेज से युक्त हुआ — इसका कोई अन्य कारण नहीं है।"
श्लोक 49 (skanda.6.185.49)
एकेनापि विहीना ये प्रभवंति कुबुद्धयः । लोभमोहान्विताः पापा जायंते ते विचेतसः
ekenāpi vihīnā ye prabhavaṁti kubuddhayaḥ lobhamohānvitāḥ pāpā jāyaṁte te vicetasaḥ
"जो वेदान्तवादी व्रतयुक्त, निर्लोभ और तृष्णारहित होकर उन्नति करते हैं, वे परम तेजस्वी होते हैं।"
श्लोक 50 (skanda.6.185.50)
वेदांतानि सुभूरीणि मया दृष्ट्वा विचार्य च । समरूपाः कृता ग्रन्था मर्त्यलोकहितार्थिना
vedāṁtāni subhūrīṇi mayā dṛṣṭvā vicārya ca samarūpāḥ kṛtā granthā martyalokahitārthinā
"किन्तु जो इनमें से एक भी गुण से रहित, कुबुद्धि, लोभ-मोह से युक्त, पापी होते हैं, वे बुद्धिहीन हो जाते हैं।"
श्लोक 51 (skanda.6.185.51)
एवं मे गुरुतां प्राप्तो मधुपो द्विजसत्तमाः । इषुकारो यथा जातस्तथा चैव ब्रवीमि वः
evaṁ me gurutāṁ prāpto madhupo dvijasattamāḥ iṣukāro yathā jātastathā caiva bravīmi vaḥ
"अनेक वेदान्त-ग्रन्थों को देखकर और विचार करके, मैंने मर्त्यलोक के हित हेतु समरूप ग्रन्थ रचे।"
श्लोक 52 (skanda.6.185.52)
आत्मावलोकनार्थाय मया दृष्टाः सहस्रशः। योगिनो ज्ञानसंपन्नास्तैः प्रोक्तं च स्वशक्तितः
ātmāvalokanārthāya mayā dṛṣṭāḥ sahasraśaḥ yogino jñānasaṁpannāstaiḥ proktaṁ ca svaśaktitaḥ
"इस प्रकार भ्रमर मुझे गुरुत्व को प्राप्त हुआ, हे द्विजसत्तमो; अब उसी प्रकार बताता हूँ कि इषुकार (बाणकार) मेरा गुरु कैसे बना।"
श्लोक 53 (skanda.6.185.53)
आत्मावलोकनं भावि सुशिष्याय यथा तथा। स समाधिजद्वारेण चतुराशीतिकेन च
ātmāvalokanaṁ bhāvi suśiṣyāya yathā tathā sa samādhijadvāreṇa caturāśītikena ca
"आत्मदर्शन की इच्छा से मैंने सहस्रों ज्ञानसम्पन्न योगियों को देखा, और उन्होंने अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार बताया,"
श्लोक 54 (skanda.6.185.54)
आसनैस्तत्प्रमाणैश्च पद्मासनप्रपूर्वकैः। असंख्यैः कारणैश्चैव ह्यध्यात्मपठनैस्तथा। ततोपि लक्षितो नैव मयाऽत्मा च कथंचन
āsanaistatpramāṇaiśca padmāsanaprapūrvakaiḥ asaṁkhyaiḥ kāraṇaiścaiva hyadhyātmapaṭhanaistathā tatopi lakṣito naiva mayā'tmā ca kathaṁcana
"कि सुशिष्य को आत्मदर्शन विभिन्न प्रकार से होता है — समाधि के द्वार से, तथा चौरासी आसनों से,"
श्लोक 55 (skanda.6.185.55)
ततो वैराग्यमापन्नः प्रभ्रमामि धरातले। गुर्वर्थे न च लेभेऽहं गुरुमात्मावलोकने
tato vairāgyamāpannaḥ prabhramāmi dharātale gurvarthe na ca lebhe'haṁ gurumātmāvalokane
"उतने ही प्रमाण के आसनों से, पद्मासन आदि से, तथा अगणित अन्य कारणों और अध्यात्म-अध्ययनों से भी — फिर भी मुझे आत्मा किसी प्रकार दिखाई नहीं दिया।"
श्लोक 56 (skanda.6.185.56)
अन्यस्मिन्नहनि प्राप्ते राजमार्गेण गच्छता । मया दृष्टो महीपालः सैन्येन महता वृतः
anyasminnahani prāpte rājamārgeṇa gacchatā mayā dṛṣṭo mahīpālaḥ sainyena mahatā vṛtaḥ
"तब वैराग्य को प्राप्त होकर मैं पृथ्वी पर घूमने लगा; आत्मदर्शन के लिए गुरु ढूँढते हुए भी मुझे कोई गुरु नहीं मिला।"
श्लोक 57 (skanda.6.185.57)
ततोऽहं मार्गमुत्सृज्य संमुखस्य महीपतेः । उटजद्वारमाश्रित्य किंचिदूर्ध्वोपि संस्थितः
tato'haṁ mārgamutsṛjya saṁmukhasya mahīpateḥ uṭajadvāramāśritya kiṁcidūrdhvopi saṁsthitaḥ
"एक दिन राजमार्ग से जाते हुए मैंने एक राजा को देखा, जो विशाल सेना से घिरा हुआ था;"
श्लोक 58 (skanda.6.185.58)
तत्रापि च स्थितः कश्चित्पुरुषः कांडकारकः । ऋजुकर्मणि संयुक्तः शराणां नतपर्वणाम्
tatrāpi ca sthitaḥ kaścitpuruṣaḥ kāṁḍakārakaḥ ṛjukarmaṇi saṁyuktaḥ śarāṇāṁ nataparvaṇām
"तब मार्ग छोड़कर, राजा के सम्मुख, एक कुटिया के द्वार का सहारा लेकर, कुछ ऊँचे स्थान पर खड़ा हो गया।"
श्लोक 59 (skanda.6.185.59)
तस्मिन्दूरगते भूपे तथान्यः सेवकोऽभ्यगात्
tasmindūragate bhūpe tathānyaḥ sevako'bhyagāt
"वहाँ भी एक इषुकार (बाणकार) बैठा था, जो टेढ़े जोड़ों वाले बाणों को सीधा करने के कार्य में लगा हुआ था।"
श्लोक 60 (skanda.6.185.60)
तं पप्रच्छ त्वरायुक्तः शृण्वतोऽपि मम द्विजाः । कांडकर्मणि संसक्तमृजुत्वेन स्थितं तदा
taṁ papraccha tvarāyuktaḥ śṛṇvato'pi mama dvijāḥ kāṁḍakarmaṇi saṁsaktamṛjutvena sthitaṁ tadā
"जब राजा दूर चला गया, तब एक अन्य सेवक वहाँ आ पहुँचा।"
श्लोक 61 (skanda.6.185.61)
कियती वर्तते वेला गतस्य पृथिवीपतेः । मार्गेणानेन मे ब्रूहि येन गच्छामि पृष्ठतः
kiyatī vartate velā gatasya pṛthivīpateḥ mārgeṇānena me brūhi yena gacchāmi pṛṣṭhataḥ
"उसने शीघ्रतापूर्वक, मेरे सुनते हुए भी, हे ब्राह्मणो, उस बाणकार्य में तन्मय, एकाग्रचित्त व्यक्ति से पूछा —"
श्लोक 62 (skanda.6.185.62)
सोऽब्रवीत्तं तदा विप्रा अधोवक्त्रः स्थितो नरः । अनेन राजमार्गेण गच्छमानो महीपतिः
so'bravīttaṁ tadā viprā adhovaktraḥ sthito naraḥ anena rājamārgeṇa gacchamāno mahīpatiḥ
"'राजा को गए कितना समय हो गया? मुझे बताओ किस मार्ग से जाऊँ, जिससे मैं उनके पीछे-पीछे जा सकूँ।'"
श्लोक 63 (skanda.6.185.63)
न मया वीक्षितः कश्चिदिदानीं राजसेवक । तदन्यं पृच्छ चेत्कार्यं तवानेन ब्रवीतु सः
na mayā vīkṣitaḥ kaścididānīṁ rājasevaka tadanyaṁ pṛccha cetkāryaṁ tavānena bravītu saḥ
"बाणकार्य में तन्मय, नीचे मुख किए हुए उस व्यक्ति ने तब उससे कहा, हे ब्राह्मणो — 'इस राजमार्ग से राजा जा रहे थे —"
श्लोक 64 (skanda.6.185.64)
शरकर्मणि संसक्तस्त्वहमत्र व्यवस्थितः । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य स्वचित्ते चिन्तितं मया
śarakarmaṇi saṁsaktastvahamatra vyavasthitaḥ tacchrutvā vacanaṁ tasya svacitte cintitaṁ mayā
"मैंने अभी किसी को नहीं देखा, हे राजसेवक; यदि तुम्हें आवश्यकता हो तो किसी अन्य से पूछो, वह तुम्हें बताएगा।"
श्लोक 65 (skanda.6.185.65)
एकचित्ततया योगो ब्रह्मज्ञानसमुद्भवः । नान्यथा भविता मे स ततश्चित्तनिरोधनम् । करोमि ब्रह्मसंसिद्ध्यै ततो मेऽसौ भविष्यति
ekacittatayā yogo brahmajñānasamudbhavaḥ nānyathā bhavitā me sa tataścittanirodhanam karomi brahmasaṁsiddhyai tato me'sau bhaviṣyati
"मैं तो यहाँ बाण के काम में लगा हूँ।' उसका यह वचन सुनकर मैंने अपने मन में विचार किया —"
श्लोक 66 (skanda.6.185.66)
ततःप्रभृति चित्ते स्वे धारयामि सदैव तु । विश्वरूपं तथा सूर्यं हृत्पंकजनिवासिनम्
tataḥprabhṛti citte sve dhārayāmi sadaiva tu viśvarūpaṁ tathā sūryaṁ hṛtpaṁkajanivāsinam
"'चित्त की एकाग्रता ही योग है, ब्रह्मज्ञान का स्रोत; इसके बिना यह अन्यथा नहीं हो सकता। इसलिए मैं ब्रह्म-सिद्धि के लिए चित्त-निरोध करूँगा — इससे वह मुझे प्राप्त होगा।'"
श्लोक 67 (skanda.6.185.67)
ततो दिक्षु दिगन्तेषु गगने धरणीतले । तमेकं चैव पश्यामि नान्यत्किंचिद्द्विजोत्तमाः
tato dikṣu diganteṣu gagane dharaṇītale tamekaṁ caiva paśyāmi nānyatkiṁciddvijottamāḥ
"तब से मैं सदा अपने चित्त में विश्वरूप को, तथा हृदय-कमल में निवास करने वाले सूर्य को धारण करता हूँ।"
श्लोक 68 (skanda.6.185.68)
अहं च तेजसा युक्तस्तत्प्रभावेण संस्थितः
ahaṁ ca tejasā yuktastatprabhāveṇa saṁsthitaḥ
"फिर दिशाओं में, दिगन्तों में, आकाश में, धरातल पर, मुझे केवल वही एक दिखाई देता है, अन्य कुछ भी नहीं, हे द्विजोत्तमो।"
श्लोक 69 (skanda.6.185.69)
एवं मे स गुरुर्जातः शरकारो द्विजोत्तमाः । शृणुध्वं कन्यका जाता गुरुत्वे मे यथा पुरा
evaṁ me sa gururjātaḥ śarakāro dvijottamāḥ śṛṇudhvaṁ kanyakā jātā gurutve me yathā purā
"मैं भी उसके प्रभाव से स्थित होकर तेज से युक्त हो गया।"
श्लोक 70 (skanda.6.185.70)
सर्वसंगपरित्यागी यदाहं निर्गतो गृहात् । ममानुपृष्ठतश्चैव ततो भार्या विनिर्गता
sarvasaṁgaparityāgī yadāhaṁ nirgato gṛhāt mamānupṛṣṭhataścaiva tato bhāryā vinirgatā
"इस प्रकार बाणकार मेरा गुरु बना, हे द्विजोत्तमो; अब सुनो, पूर्वकाल में एक कुमारी मेरी गुरु कैसे बनी।"
श्लोक 71 (skanda.6.185.71)
शिशुं पुत्रं समादाय कन्यामेकां च शोभनाम्। ततोऽहं भार्यया प्रोक्तो वानप्रस्थाश्रमे स्थितः
śiśuṁ putraṁ samādāya kanyāmekāṁ ca śobhanām tato'haṁ bhāryayā prokto vānaprasthāśrame sthitaḥ
"जब मैं समस्त आसक्ति त्यागकर घर से निकला, तब मेरी पत्नी भी मेरे पीछे-पीछे निकल आई,"
श्लोक 72 (skanda.6.185.72)
कुरु मे वचनं मुक्तिरत्रैव हि भविष्यति। ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथवा यतिः। यदि स्यात्संयतात्मा स नूनं मुक्तिमवाप्नुयात्
kuru me vacanaṁ muktiratraiva hi bhaviṣyati brahmacārī gṛhastho vā vānaprastho'thavā yatiḥ yadi syātsaṁyatātmā sa nūnaṁ muktimavāpnuyāt
"शिशु पुत्र और एक सुन्दर कन्या को साथ लेकर; तब वानप्रस्थ आश्रम में स्थित मुझसे मेरी पत्नी बोली —"
श्लोक 73 (skanda.6.185.73)
अथवा मां परित्यज्य यदि यास्यसि चान्यतः। तदहं च मरिष्यामि सत्यमेतदसंशयम्
athavā māṁ parityajya yadi yāsyasi cānyataḥ tadahaṁ ca mariṣyāmi satyametadasaṁśayam
"'मेरा वचन मानो, यहीं मुक्ति प्राप्त होगी। ब्रह्मचारी हो, गृहस्थ हो, वानप्रस्थ हो अथवा यति — यदि संयतात्मा हो, तो निश्चय ही मुक्ति पाएगा।'"
श्लोक 74 (skanda.6.185.74)
मृतायां मयि ते बालावेतावनुमरिष्यतः। कुमारी च कुमारश्च तस्मान्नाथ दयां कुरु
mṛtāyāṁ mayi te bālāvetāvanumariṣyataḥ kumārī ca kumāraśca tasmānnātha dayāṁ kuru
"'अथवा यदि मुझे त्यागकर तुम कहीं और चले जाओगे, तो मैं निश्चय ही मर जाऊँगी — यह सत्य है, निःसंदेह।'"
श्लोक 75 (skanda.6.185.75)
मा व्रजस्व परं तीर्थं परिजानन्नपि स्वयम्। हाटकेश्वरजं क्षेत्रमेतत्पुण्यतरं स्मृतम्
mā vrajasva paraṁ tīrthaṁ parijānannapi svayam hāṭakeśvarajaṁ kṣetrametatpuṇyataraṁ smṛtam
"'मेरे मरने पर ये दोनों बालक, यह कुमारी और यह कुमार, मेरे पीछे मर जाएँगे; इसलिए, हे नाथ, दया करो।'"
श्लोक 76 (skanda.6.185.76)
सर्वेषामेव तीर्थानां श्रुतमेतन्मया विभो। वदतां ब्राह्मणेन्द्राणां तथान्येषां तपस्विनाम्
sarveṣāmeva tīrthānāṁ śrutametanmayā vibho vadatāṁ brāhmaṇendrāṇāṁ tathānyeṣāṁ tapasvinām
"'स्वयं जानते हुए भी किसी अन्य तीर्थ को मत जाओ — यह हाटकेश्वर क्षेत्र सबसे अधिक पुण्यकारी माना गया है।'"
श्लोक 77 (skanda.6.185.77)
श्लोकोऽयं बहुधा नाथ कीर्त्यमानो मया विभो। विश्वामित्रस्य वक्त्रेण सन्मुनेः सत्यवादिनः
śloko'yaṁ bahudhā nātha kīrtyamāno mayā vibho viśvāmitrasya vaktreṇa sanmuneḥ satyavādinaḥ
"'मैंने यह बात, हे विभो, समस्त तीर्थों के विषय में, श्रेष्ठ ब्राह्मणों और अन्य तपस्वियों के मुख से सुनी है।'"
श्लोक 78 (skanda.6.185.78)
पुनंति सर्वतीर्थानि स्नानदानादसंशयम्। हाटकेश्वरजं क्षेत्रं स्मरणादपि पावयेत्। ततः कृच्छ्रात्प्रतिज्ञातं मयाश्रमनिषेवणम्। वानप्रस्थोद्भवं वा स्यात्ततोऽहं तत्र संस्थितः
punaṁti sarvatīrthāni snānadānādasaṁśayam hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ smaraṇādapi pāvayet tataḥ kṛcchrātpratijñātaṁ mayāśramaniṣevaṇam vānaprasthodbhavaṁ vā syāttato'haṁ tatra saṁsthitaḥ
"'यह श्लोक, हे नाथ, मैंने बारंबार सुनाया है, सत्यवादी सन्मुनि विश्वामित्र के मुख से — "स्नान और दान से सभी तीर्थ निःसंदेह पवित्र करते हैं; हाटकेश्वर से उत्पन्न क्षेत्र तो स्मरणमात्र से पवित्र कर देता है।"' तब कठिनाई से मैंने उस आश्रम में रहने की प्रतिज्ञा की; वानप्रस्थोचित हो अथवा न हो, मैं वहीं स्थित हो गया।"
श्लोक 79 (skanda.6.185.79)
तत्रस्थस्य हि मे कन्या क्रीडते परतः स्थिता। वलयापूरिताभ्यां च प्रकोष्ठाभ्यां ततस्ततः
tatrasthasya hi me kanyā krīḍate parataḥ sthitā valayāpūritābhyāṁ ca prakoṣṭhābhyāṁ tatastataḥ
"वहाँ रहते हुए मेरी कन्या दूर खेलती थी, कंकणों से भरी कलाइयों को इधर-उधर टकराती हुई।"
श्लोक 80 (skanda.6.185.80)
यथायथा सा कुरुते कन्दमूलफलाशनम् । तनुत्वं याति कायेन तथा चैव दिनेदिने
yathāyathā sā kurute kandamūlaphalāśanam tanutvaṁ yāti kāyena tathā caiva dinedine
"जैसे-जैसे वह कन्द-मूल-फल खाकर रहने लगी, वैसे-वैसे उसका शरीर दिन-प्रतिदिन कृश होता गया।"
श्लोक 81 (skanda.6.185.81)
ततो मे जायते दुःखं तेषां पतन संभवम् । कस्यचित्त्वथ कालस्य संजातं वलयत्रयम् । तस्या हस्ते ततस्ताभ्यां शब्दः संजायते मिथः
tato me jāyate duḥkhaṁ teṣāṁ patana saṁbhavam kasyacittvatha kālasya saṁjātaṁ valayatrayam tasyā haste tatastābhyāṁ śabdaḥ saṁjāyate mithaḥ
"तब मुझे उन कंकणों के टूटने की आशंका से दुःख होने लगा। कालांतर में जब उसकी कलाई पर केवल तीन कंकण शेष रह गए, तो उनसे परस्पर टकराने की ध्वनि उत्पन्न होती थी।"
श्लोक 82 (skanda.6.185.82)
ततः कालेन महता ताभ्यामेकं व्यवस्थितम् । न संघर्षो न शब्दश्च तत्रस्थस्य च जायते
tataḥ kālena mahatā tābhyāmekaṁ vyavasthitam na saṁgharṣo na śabdaśca tatrasthasya ca jāyate
"फिर दीर्घकाल बाद जब उस कलाई पर केवल एक ही कंकण शेष रहा, तो न कोई टकराव रहा, न कोई ध्वनि उत्पन्न हुई।"
श्लोक 83 (skanda.6.185.83)
तद्विचिन्त्य मया सोऽपि ह्याश्रमः परिवर्जितः । चिन्तितं च मया चित्ते कृत्वा चैवं सुनिश्चयम्
tadvicintya mayā so'pi hyāśramaḥ parivarjitaḥ cintitaṁ ca mayā citte kṛtvā caivaṁ suniścayam
"इस पर विचार करके मैंने भी वह आश्रम त्याग दिया; मैंने अपने मन में भलीभाँति विचार करके यह दृढ़ निश्चय किया —"
श्लोक 84 (skanda.6.185.84)
बहुभिः कलहो नित्यं द्वाभ्यां संघर्षणं तथा । एकाकी विचरिष्यामि कुमारीवलयं यथा
bahubhiḥ kalaho nityaṁ dvābhyāṁ saṁgharṣaṇaṁ tathā ekākī vicariṣyāmi kumārīvalayaṁ yathā
"'बहुतों के साथ सदा कलह होता है, दो के साथ भी टकराव होता है। मैं उस कुमारी के अकेले कंकण के समान अकेला विचरण करूँगा।'"
श्लोक 85 (skanda.6.185.85)
ततः सुप्तां परित्यज्य तां भार्यां शिशुसंयुताम् । गतोऽहं दूरमध्वानं यत्र नो वेत्ति सा च माम्
tataḥ suptāṁ parityajya tāṁ bhāryāṁ śiśusaṁyutām gato'haṁ dūramadhvānaṁ yatra no vetti sā ca mām
"फिर सोई हुई पत्नी को शिशु सहित छोड़कर मैं दूर मार्ग पर चला गया, जहाँ न वह मुझे जानती थी, न मैं उसे।"
श्लोक 86 (skanda.6.185.86)
यत्राऽस्तमितशायी च यलब्धकृतभोजनः । भ्रमामि मेदिनीपृष्ठे त्यक्त्वा संसारबन्धनम्
yatrā'stamitaśāyī ca yalabdhakṛtabhojanaḥ bhramāmi medinīpṛṣṭhe tyaktvā saṁsārabandhanam
"जहाँ भी सूर्य अस्त होता, वहीं मैं सो जाता; जो भी भोजन मिल जाता वह खाकर, संसार-बंधन को त्यागकर, मैं पृथ्वी पर विचरण करता हूँ।"
श्लोक 87 (skanda.6.185.87)
ततो मे ज्ञानमापन्नमेवं विप्राः शनैःशनैः । अतीतानागतं चैव वर्तमानं विशेषतः
tato me jñānamāpannamevaṁ viprāḥ śanaiḥśanaiḥ atītānāgataṁ caiva vartamānaṁ viśeṣataḥ
"इससे, हे ब्राह्मणो, मुझे धीरे-धीरे भूत, भविष्य और विशेषतः वर्तमान का ज्ञान प्राप्त हुआ।"
श्लोक 88 (skanda.6.185.88)
एवं मे कन्यका जाता गुरुत्वे द्विजसत्तमाः
evaṁ me kanyakā jātā gurutve dvijasattamāḥ
"इस प्रकार एक कुमारी मेरी गुरु बनी, हे द्विजसत्तमो।"
श्लोक 89 (skanda.6.185.89)
एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि गुरोः कृते । न युष्माकं पुरो मिथ्या कीर्तयामि कथंचन
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi guroḥ kṛte na yuṣmākaṁ puro mithyā kīrtayāmi kathaṁcana
"यह सब मैंने तुम्हें बताया, जैसा मुझसे अपने गुरुओं के विषय में पूछा गया था; मैं तुम्हारे सामने किसी भी प्रकार असत्य नहीं कहता।"
श्लोक 90 (skanda.6.185.90)
एवं मे ज्ञानमुत्पन्नं प्रकारैः षड्भिरेव च । एभिर्लोकोत्तरं ज्ञानं युष्मत्प्रत्ययकारकम्
evaṁ me jñānamutpannaṁ prakāraiḥ ṣaḍbhireva ca ebhirlokottaraṁ jñānaṁ yuṣmatpratyayakārakam
"इस प्रकार मुझे इन छह प्रकारों से ज्ञान उत्पन्न हुआ; इनसे यह लोकोत्तर ज्ञान तुम्हें विश्वास दिलाने के लिए है।"
श्लोक 91 (skanda.6.185.91)
सूत उवाच । ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे पप्रच्छुस्तं द्विजोत्तमाः । वानप्रस्थाश्रमं त्यक्त्वा भार्यां शिशुसमन्विताम् । क्व गतस्त्वं तदाचक्ष्व कियत्कालं च संस्थितः
sūta uvāca tataste brāhmaṇāḥ sarve papracchustaṁ dvijottamāḥ vānaprasthāśramaṁ tyaktvā bhāryāṁ śiśusamanvitām kva gatastvaṁ tadācakṣva kiyatkālaṁ ca saṁsthitaḥ
सूत जी ने कहा — तब उन सभी ब्राह्मणों ने, हे द्विजोत्तमो, उससे पुनः पूछा — "वानप्रस्थाश्रम को पत्नी और शिशु सहित त्यागकर तुम कहाँ गए? हमें बताओ, और कितने समय तक तुम भ्रमण करते रहे?"
श्लोक 92 (skanda.6.185.92)
अतिथिरुवाच । अहं भीतः सहस्राणि ग्रामाणां च शतानि च । यत्रास्तमितशायी सन्ननेकानि द्विजोत्तमाः । संख्यया रहितान्येव वर्षाणां च शतानि च
atithiruvāca ahaṁ bhītaḥ sahasrāṇi grāmāṇāṁ ca śatāni ca yatrāstamitaśāyī sannanekāni dvijottamāḥ saṁkhyayā rahitānyeva varṣāṇāṁ ca śatāni ca
अतिथि ने कहा — "भयभीत होकर मैं सहस्रों गाँवों और सैकड़ों नगरों में घूमा, जहाँ भी सूर्य अस्त होता वहीं सो जाता, हे द्विजोत्तमो, अगणित स्थानों में, सैकड़ों वर्षों तक, जिनकी कोई गिनती नहीं।"
श्लोक 93 (skanda.6.185.93)
दृष्टानि मुख्यतीर्थानि तथैवायतनानि च । दृष्टाश्च पर्वताः श्रेष्ठा नद्यश्च विमलोदकाः
dṛṣṭāni mukhyatīrthāni tathaivāyatanāni ca dṛṣṭāśca parvatāḥ śreṣṭhā nadyaśca vimalodakāḥ
"मैंने प्रमुख तीर्थों को देखा, तथा उसी प्रकार आयतनों (मन्दिरों) को भी; मैंने श्रेष्ठ पर्वत और निर्मल जल वाली नदियाँ भी देखीं।"
श्लोक 94 (skanda.6.185.94)
स्वयमेव मया ज्ञातो वाराणस्यां स्थितेन च । यज्ञः पैतामहो भावी स्थानेऽस्मिन्मामके यतः
svayameva mayā jñāto vārāṇasyāṁ sthitena ca yajñaḥ paitāmaho bhāvī sthāne'sminmāmake yataḥ
"वाराणसी में रहते हुए मुझे स्वयं ही यह ज्ञात हुआ कि पितामह का यज्ञ इसी मेरे स्थान पर होने वाला है।"
श्लोक 95 (skanda.6.185.95)
ततोऽहं सत्वरं प्राप्तः कौतुकेन द्विजोत्तमाः । कीदृशः स मखो भावी यत्र यज्वा पितामहः
tato'haṁ satvaraṁ prāptaḥ kautukena dvijottamāḥ kīdṛśaḥ sa makho bhāvī yatra yajvā pitāmahaḥ
"तब मैं कौतूहलवश शीघ्र यहाँ आ पहुँचा, हे द्विजोत्तमो — यह जानने कि वह यज्ञ कैसा होगा, जिसमें स्वयं पितामह ही यजमान हैं।"
श्लोक 96 (skanda.6.185.96)
सूत उवाच । एतस्मिन्नंतरे प्राप्ताः सर्वे देवाः सवासवाः । वासुदेवं पुरस्कृत्य तथा चैव महेश्वरम्
sūta uvāca etasminnaṁtare prāptāḥ sarve devāḥ savāsavāḥ vāsudevaṁ puraskṛtya tathā caiva maheśvaram
सूत जी ने कहा — इसी बीच वासव सहित समस्त देवगण, वासुदेव को आगे करके, तथा महेश्वर भी वहाँ आ पहुँचे,
श्लोक 97 (skanda.6.185.97)
कमान्तरं समासाद्य पुलस्त्याद्यास्तथर्त्विजः । ब्रह्मापि स्वयमायातो मृगचर्मधरस्तथा
kamāntaraṁ samāsādya pulastyādyāstathartvijaḥ brahmāpi svayamāyāto mṛgacarmadharastathā
पुलस्त्य आदि ऋत्विजों सहित क्षणभर में अंतरिक्ष पार करके; ब्रह्मा भी स्वयं मृगचर्म धारण किए हुए आए।
श्लोक 98 (skanda.6.185.98)
ततस्ते तुष्टिमापन्नास्तस्य ज्ञानेन तेन च । प्रोचुश्च वरदास्तुभ्यं सर्व एव दिवौकसः
tataste tuṣṭimāpannāstasya jñānena tena ca procuśca varadāstubhyaṁ sarva eva divaukasaḥ
तब उसके ज्ञान से प्रसन्न होकर उन्होंने कहा — "हम सब देवता तुम्हें वर देते हैं।"
श्लोक 99 (skanda.6.185.99)
तस्माद्वरय भद्रं ते प्रार्थयस्व यथेप्सितम् । अवश्यं तव दास्यामो यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम् । अतिथिरुवाच । यदि तुष्टाः सुरा मह्यं प्रयच्छंति वरं मम । अनेनैव शरीरेण देवत्वं प्रार्थयाम्यहम्
tasmādvaraya bhadraṁ te prārthayasva yathepsitam avaśyaṁ tava dāsyāmo yadyapi syātsudurlabham atithiruvāca yadi tuṣṭāḥ surā mahyaṁ prayacchaṁti varaṁ mama anenaiva śarīreṇa devatvaṁ prārthayāmyaham
"इसलिए, हे भद्र, अपने मन का वर माँगो; हम अवश्य ही तुम्हें वह देंगे, चाहे वह कितना भी दुर्लभ क्यों न हो।" अतिथि ने कहा — "यदि देवगण प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं, तो मैं इसी शरीर से देवत्व की प्रार्थना करता हूँ —"
श्लोक 100 (skanda.6.185.100)
यज्ञभागसमोपेतं तथान्येषां दिवौकसाम्। विशेषेण सुरश्रेष्ठाः स्थानं चोपरि संस्थितम्
yajñabhāgasamopetaṁ tathānyeṣāṁ divaukasām viśeṣeṇa suraśreṣṭhāḥ sthānaṁ copari saṁsthitam
"अन्य देवताओं के समान यज्ञभाग से युक्त, और, हे सुरश्रेष्ठो, विशेष रूप से ऊपर स्थापित स्थान भी।"
श्लोक 101 (skanda.6.185.101)
देवा ऊचुः । नूनं त्वं विबुधो भूत्वा देवलोके निवत्स्यसि । अनेनेव शरीरेण यज्ञभागविवर्जितः
devā ūcuḥ nūnaṁ tvaṁ vibudho bhūtvā devaloke nivatsyasi aneneva śarīreṇa yajñabhāgavivarjitaḥ
देवताओं ने कहा — "निश्चय ही तुम इसी शरीर से देवता बनकर देवलोक में निवास करोगे — किन्तु यज्ञभाग से रहित।"
श्लोक 102 (skanda.6.185.102)
यच्छामो यदि ते विप्र यज्ञांशं मानुषस्य भोः । अप्रामाण्यं श्रुतेर्भावि तव दत्तेन तेन च
yacchāmo yadi te vipra yajñāṁśaṁ mānuṣasya bhoḥ aprāmāṇyaṁ śruterbhāvi tava dattena tena ca
"हे विप्र, यदि हम तुम्हें मनुष्य के हिस्से का यज्ञांश देंगे, तो उस दान से श्रुति का अप्रामाण्य (अमान्यता) उत्पन्न होगा।"
श्लोक 103 (skanda.6.185.103)
अतिथिरुवाच । देवत्वेन न मे कार्यं यज्ञांशरहितेन च । तदहं साधयिष्यामि यथा मुक्तिर्भविष्यति
atithiruvāca devatvena na me kāryaṁ yajñāṁśarahitena ca tadahaṁ sādhayiṣyāmi yathā muktirbhaviṣyati
अतिथि ने कहा — "यज्ञांश से रहित देवत्व से मुझे कोई प्रयोजन नहीं है; मैं तो वही साधन करूँगा जिससे मुक्ति प्राप्त हो।"
श्लोक 104 (skanda.6.185.104)
तच्छ्रुत्वा पद्मजः प्राह सर्वान्देवान्कृतांजलिः । शृण्वंतु देवताः सर्वा यद्ब्रवीमि हितं वचः
tacchrutvā padmajaḥ prāha sarvāndevānkṛtāṁjaliḥ śṛṇvaṁtu devatāḥ sarvā yadbravīmi hitaṁ vacaḥ
यह सुनकर पद्मज (ब्रह्मा) ने हाथ जोड़कर समस्त देवताओं से कहा — "समस्त देवगण सुनें, मैं जो हितकर वचन कहता हूँ।"
श्लोक 105 (skanda.6.185.105)
ममायं ब्राह्मणो यज्ञे दूरादेव समागतः । नागरस्तु विशेषेण पात्रं ज्ञानसमुद्भवम्
mamāyaṁ brāhmaṇo yajñe dūrādeva samāgataḥ nāgarastu viśeṣeṇa pātraṁ jñānasamudbhavam
"यह मेरा ब्राह्मण दूर से इस यज्ञ में आया है; विशेष रूप से नागर होने के कारण यह ज्ञान का पात्र है।"
श्लोक 106 (skanda.6.185.106)
प्रतिज्ञातस्तथा सर्वैर्वरोऽस्य विबुधैर्यतः । तस्मात्प्रदीयतामस्मै यदभीष्टं सुरोत्तमाः । महेश्वर उवाच । यथाऽस्य जायते तृप्तिर्यज्ञभागाधिका सदा । तथाहं कथयिष्यामि शृण्वंतु विबुधोत्तमाः
pratijñātastathā sarvairvaro'sya vibudhairyataḥ tasmātpradīyatāmasmai yadabhīṣṭaṁ surottamāḥ maheśvara uvāca yathā'sya jāyate tṛptiryajñabhāgādhikā sadā tathāhaṁ kathayiṣyāmi śṛṇvaṁtu vibudhottamāḥ
"चूँकि तुम सभी देवताओं ने पहले ही इसे वर देने की प्रतिज्ञा की है, इसलिए, हे सुरोत्तमो, इसे जो अभीष्ट हो वही दिया जाए।" महेश्वर ने कहा — "जिस प्रकार इसे यज्ञभाग से भी अधिक तृप्ति सदा प्राप्त हो, वह उपाय मैं बताता हूँ; हे विबुधोत्तमो, सुनें।"
श्लोक 107 (skanda.6.185.107)
य एष क्रियते यज्ञस्तस्य नाथो हरिः स्मृतः। एतस्मात्कारणात्प्रोक्तः स देवो यज्ञपूरुषः
ya eṣa kriyate yajñastasya nātho hariḥ smṛtaḥ etasmātkāraṇātproktaḥ sa devo yajñapūruṣaḥ
"जो भी यज्ञ किया जाता है, उसका स्वामी हरि माना जाता है; इसी कारण वे यज्ञपुरुष देव कहे गए हैं।"
श्लोक 108 (skanda.6.185.108)
अद्यप्रभृति यत्किंचिच्छ्राद्धं मर्त्ये भविष्यति । दैवं वा पैतृकं वाऽपि तस्य चांते व्यवस्थितः
adyaprabhṛti yatkiṁcicchrāddhaṁ martye bhaviṣyati daivaṁ vā paitṛkaṁ vā'pi tasya cāṁte vyavasthitaḥ
"आज से मर्त्यलोक में जो भी श्राद्ध होगा, चाहे देवसम्बन्धी हो या पितृसम्बन्धी, वह इस (यज्ञपुरुष) के अंत में स्थापित रहेगा —"
श्लोक 109 (skanda.6.185.109)
एतस्य नाम संकीर्त्य पश्चाच्च यज्ञपूरुषम् । संकीर्त्य भोजनं देयं ब्राह्मणस्य द्विजोत्तमाः
etasya nāma saṁkīrtya paścācca yajñapūruṣam saṁkīrtya bhojanaṁ deyaṁ brāhmaṇasya dvijottamāḥ
"इसका नाम कीर्तन करके, फिर यज्ञपुरुष का नाम कीर्तन करके ही, हे द्विजोत्तमो, ब्राह्मण को भोजन देना चाहिए।"
श्लोक 110 (skanda.6.185.110)
तेनास्य भविता तृप्तिर्यज्ञांताऽभ्यधिका सदा । अदत्त्वास्य कृतं श्राद्धं यत्किंचित्प्रभविष्यति
tenāsya bhavitā tṛptiryajñāṁtā'bhyadhikā sadā adattvāsya kṛtaṁ śrāddhaṁ yatkiṁcitprabhaviṣyati
"इससे इसकी तृप्ति यज्ञ के अंत की तृप्ति से भी सदा अधिक होगी; इसे दिए बिना किया गया जो भी श्राद्ध होगा —"
श्लोक 111 (skanda.6.185.111)
तद्यास्यत्यखिलं व्यर्थं तथा भस्महुतं यथा । वैश्वदेवांतमासाद्य यश्चैनं पूजयिष्यति
tadyāsyatyakhilaṁ vyarthaṁ tathā bhasmahutaṁ yathā vaiśvadevāṁtamāsādya yaścainaṁ pūjayiṣyati
"वह भस्म में डाले हुए हवन के समान पूर्णतः व्यर्थ हो जाएगा। किन्तु जो वैश्वदेव के अंत में पहुँचकर इसकी पूजा करेगा —"
श्लोक 112 (skanda.6.185.112)
विष्णुनामसमोपेतं भविष्यति तदक्षयम् । दत्तं स्वल्पमपि प्रायः श्रद्धापूतेन चेतसा
viṣṇunāmasamopetaṁ bhaviṣyati tadakṣayam dattaṁ svalpamapi prāyaḥ śraddhāpūtena cetasā
"वह विष्णु के नाम से युक्त होकर अक्षय हो जाएगा; श्रद्धापूत चित्त से दिया गया अल्प दान भी प्रायः इसी प्रकार अक्षय होगा।"
श्लोक 113 (skanda.6.185.113)
श्राद्धे वा वैश्वदेवे वा यश्चैनं नार्चयिष्यति । संप्राप्तं व्यर्थतां तस्य तच्च सर्वं भविष्यति
śrāddhe vā vaiśvadeve vā yaścainaṁ nārcayiṣyati saṁprāptaṁ vyarthatāṁ tasya tacca sarvaṁ bhaviṣyati
"श्राद्ध में अथवा वैश्वदेव में जो इसकी पूजा नहीं करेगा, उसका वह सम्पूर्ण कर्म व्यर्थ हो जाएगा।"
श्लोक 114 (skanda.6.185.114)
अस्मिंस्तुष्टिं गते सर्वे सुरा यास्यंति संमुदम् । पितरश्च तमायांति विमुखे संमुखे तथा
asmiṁstuṣṭiṁ gate sarve surā yāsyaṁti saṁmudam pitaraśca tamāyāṁti vimukhe saṁmukhe tathā
"इसे तृप्ति मिलने पर समस्त देवता प्रसन्नतापूर्वक चले जाते हैं, और पितर भी इसके समीप आते हैं, चाहे यह विमुख हो या सम्मुख।"
श्लोक 115 (skanda.6.185.115)
तच्छ्रुत्वा विबुधाः सर्वे महेश्वरवचस्तदा । तथेति मुदिताः प्रोचुर्ब्रह्मविष्णुपुरस्सराः
tacchrutvā vibudhāḥ sarve maheśvaravacastadā tatheti muditāḥ procurbrahmaviṣṇupurassarāḥ
यह महेश्वर का वचन सुनकर समस्त देवगण, ब्रह्मा और विष्णु को आगे करके, प्रसन्नतापूर्वक "ऐसा ही हो" कहने लगे।
श्लोक 116 (skanda.6.185.116)
ततःप्रभृति संजाता पूजा चातिथिसंभवा । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूजा कार्याऽतिथेः सदा । यज्ञे पूरुषयज्ञस्य न चैकस्य कथंचन । अतिथिरुवाच । अत्रास्ति मामकं तीर्थं मया यत्र तपः कृतम् । हाटकेश्वरजे क्षेत्रे पुरुकाले द्विजोत्तमाः
tataḥprabhṛti saṁjātā pūjā cātithisaṁbhavā tasmātsarvaprayatnena pūjā kāryā'titheḥ sadā yajñe pūruṣayajñasya na caikasya kathaṁcana atithiruvāca atrāsti māmakaṁ tīrthaṁ mayā yatra tapaḥ kṛtam hāṭakeśvaraje kṣetre purukāle dvijottamāḥ
तभी से अतिथि से उत्पन्न यह पूजा प्रचलित हुई; इसलिए यज्ञ में अतिथि की पूजा सदा पूर्ण प्रयत्न से करनी चाहिए — यह यज्ञपुरुष की ही है, किसी अकेले की नहीं। अतिथि ने कहा — "यहाँ मेरा एक तीर्थ है, जहाँ मैंने पूर्वकाल में तपस्या की थी, इसी हाटकेश्वर क्षेत्र में, हे द्विजोत्तमो।"
श्लोक 117 (skanda.6.185.117)
अंगारकेण संयुक्ता चतुर्थी स्याद्यदा तिथिः । सांनिध्यं तत्र कार्यं च सर्वैर्देवैश्च तद्दिने
aṁgārakeṇa saṁyuktā caturthī syādyadā tithiḥ sāṁnidhyaṁ tatra kāryaṁ ca sarvairdevaiśca taddine
"जब मंगलवार से युक्त चतुर्थी तिथि हो, उस दिन वहाँ समस्त देवताओं को उपस्थित रहना चाहिए।"
श्लोक 118 (skanda.6.185.118)
कुर्यात्तत्रैव यः स्नानं तस्मिन्नहनि संस्थिते । सर्वतीर्थफलं तस्य जायतां वः प्रसादतः
kuryāttatraiva yaḥ snānaṁ tasminnahani saṁsthite sarvatīrthaphalaṁ tasya jāyatāṁ vaḥ prasādataḥ
"जो कोई उस दिन वहाँ स्नान करेगा, उसे तुम्हारी कृपा से समस्त तीर्थों का फल प्राप्त होगा।"
श्लोक 119 (skanda.6.185.119)
तथास्त्विति ततः सर्वेऽतिथिं प्रोचुः सुरोत्तमाः । एतस्मिन्नंतरे प्राह पुलस्त्यर्षिः पितामहम् । पुलस्त्य उवाच । ऋत्विजः सकला देवाः संस्थिताः कौतुकान्विताः । उत्तिष्ठंतु च ते शीघ्रं यज्ञकर्मप्रसिद्धये
tathāstviti tataḥ sarve'tithiṁ procuḥ surottamāḥ etasminnaṁtare prāha pulastyarṣiḥ pitāmaham pulastya uvāca ṛtvijaḥ sakalā devāḥ saṁsthitāḥ kautukānvitāḥ uttiṣṭhaṁtu ca te śīghraṁ yajñakarmaprasiddhaye
"ऐसा ही हो" — यह कहकर समस्त श्रेष्ठ देवताओं ने अतिथि से कहा। इसी बीच पुलस्त्य ऋषि ने पितामह से कहा। पुलस्त्य ने कहा — "समस्त ऋत्विज देवगण कौतूहलपूर्वक बैठे हैं; यज्ञकर्म की सिद्धि हेतु वे शीघ्र उठें।"
श्लोक 120 (skanda.6.185.120)
एतस्मिन्नंतरे सर्वे तस्य वाक्यप्रणोदिताः । उत्थिता ऋत्विजो ये च स्वानि स्थानानि भेजिरे । ततः प्रववृते यज्ञः सपुनर्द्विजसत्तमाः । कुर्वता यज्ञकर्माणि होमपूर्वाणि यानि च
etasminnaṁtare sarve tasya vākyapraṇoditāḥ utthitā ṛtvijo ye ca svāni sthānāni bhejire tataḥ pravavṛte yajñaḥ sapunardvijasattamāḥ kurvatā yajñakarmāṇi homapūrvāṇi yāni ca
इसी बीच उनके वचन से प्रेरित होकर सभी ऋत्विज उठकर अपने-अपने स्थान पर चले गए; फिर, हे द्विजसत्तमो, होम आदि यज्ञकर्मों को करते हुए यज्ञ पुनः आगे बढ़ने लगा।