नागर खण्ड · अध्याय 186
अतिथिमाहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.186.1)
ऋषय ऊचुः । भूय एव महाभाग वद माहात्म्यमुत्तमम् । अतिथेः कृत्यमस्माकं विस्तरेण च सूतज
ṛṣaya ūcuḥ bhūya eva mahābhāga vada māhātmyamuttamam atitheḥ kṛtyamasmākaṁ vistareṇa ca sūtaja
ऋषियों ने कहा — "हे महाभाग, हमें पुनः यह उत्तम माहात्म्य बताइए — अतिथि के प्रति हमारा कर्तव्य, हे सूतपुत्र, विस्तार से।"
श्लोक 2 (skanda.6.186.2)
सूत उवाच । शृण्वन्तु मुनयः सर्वे माहात्म्यमिदमुत्तमम् । येन संश्रुतमात्रेण नश्येत्पापं दिनोद्भवम्
sūta uvāca śṛṇvantu munayaḥ sarve māhātmyamidamuttamam yena saṁśrutamātreṇa naśyetpāpaṁ dinodbhavam
सूत जी ने कहा — "समस्त मुनि इस उत्तम माहात्म्य को सुनें, जिसे केवल सुन लेने मात्र से दिनभर में उत्पन्न पाप नष्ट हो जाता है —"
श्लोक 3 (skanda.6.186.3)
यन्मया च श्रुतं पूर्वं सकाशात्स्वपितुः शुभम्
yanmayā ca śrutaṁ pūrvaṁ sakāśātsvapituḥ śubham
"जो मैंने पहले अपने पिता से सुना था, अत्यंत शुभ।"
श्लोक 4 (skanda.6.186.4)
गृहस्थानां परो धर्मो नान्योऽस्त्यतिथिपूजनात् । अतिथेर्न च दोषोस्ति तस्यातिक्रमणेन च
gṛhasthānāṁ paro dharmo nānyo'styatithipūjanāt atitherna ca doṣosti tasyātikramaṇena ca
"गृहस्थों के लिए अतिथि-पूजन से बढ़कर कोई धर्म नहीं है; और अतिथि को, भले ही वह स्वयं मर्यादा का अतिक्रमण करे, कोई दोष नहीं लगता।"
श्लोक 5 (skanda.6.186.5)
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति
atithiryasya bhagnāśo gṛhātpratinivartate sa dattvā duṣkṛtaṁ tasmai puṇyamādāya gacchati
"जिस अतिथि की आशा टूट जाती है, जो बिना स्वागत पाए घर से लौट जाता है, वह अपना दुष्कृत्य वहीं छोड़कर उस घर का पुण्य लेकर चला जाता है।"
श्लोक 6 (skanda.6.186.6)
सत्यं शौचं तपोऽधीतं दत्तमिष्टं शतं समाः । तस्य सर्वमिदं नष्टमतिथिं यो न पूजयेत्
satyaṁ śaucaṁ tapo'dhītaṁ dattamiṣṭaṁ śataṁ samāḥ tasya sarvamidaṁ naṣṭamatithiṁ yo na pūjayet
"सत्य, शौच, तप, अध्ययन, दान, सौ वर्षों तक किया गया इष्ट — यह सब उसका नष्ट हो जाता है जो अतिथि की पूजा नहीं करता।"
श्लोक 7 (skanda.6.186.7)
दूरादतिथयो यस्य गृहमायांति निर्वृताः । स गृहस्थ इति प्रोक्तः शेषाश्च गृहरक्षिणः
dūrādatithayo yasya gṛhamāyāṁti nirvṛtāḥ sa gṛhastha iti proktaḥ śeṣāśca gṛharakṣiṇaḥ
"जिसके घर दूर से अतिथि प्रसन्नतापूर्वक आते हैं, वही सच्चा गृहस्थ कहलाता है; शेष सब केवल घर की रखवाली करने वाले हैं।"
श्लोक 8 (skanda.6.186.8)
न पुराकृतपुण्यानां नराणामिह भूतले । त्रीनेतान्प्रतिहन्यंते श्राद्धं दानं शुभा गिरः
na purākṛtapuṇyānāṁ narāṇāmiha bhūtale trīnetānpratihanyaṁte śrāddhaṁ dānaṁ śubhā giraḥ
"इस पृथ्वी पर जिन मनुष्यों ने पूर्वजन्म में पुण्य नहीं किया होता, उन्हीं के लिए ये तीन वस्तुएँ रुक जाती हैं — श्राद्ध, दान, और शुभ वाणी।"
श्लोक 9 (skanda.6.186.9)
तुष्टेऽतिथौ गृहस्थस्य तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः । विमुखे विमुखाः सर्वा भवंति च न संशयः तस्मात्तोषयितव्यश्च गृहस्थेन सदाऽतिथिः । अप्यात्मनः प्रदानेन यदीच्छेत्पुण्यमात्मनः
tuṣṭe'tithau gṛhasthasya tuṣṭāḥ syuḥ sarvadevatāḥ vimukhe vimukhāḥ sarvā bhavaṁti ca na saṁśayaḥ tasmāttoṣayitavyaśca gṛhasthena sadā'tithiḥ apyātmanaḥ pradānena yadīcchetpuṇyamātmanaḥ
"अतिथि के संतुष्ट होने पर गृहस्थ से समस्त देवता संतुष्ट होते हैं; अतिथि के विमुख होने पर वे सब भी विमुख हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। इसलिए गृहस्थ को सदा अतिथि को संतुष्ट करना चाहिए, अपने आप को देकर भी, यदि वह अपने लिए पुण्य चाहता है।"
श्लोक 10 (skanda.6.186.10)
त्रिविधस्त्वतिथिः प्रोक्तो गृहस्थानां द्विजोत्तमाः । तस्याहं वच्मि वः कालं शृणुध्वं सुसमाहिताः
trividhastvatithiḥ prokto gṛhasthānāṁ dvijottamāḥ tasyāhaṁ vacmi vaḥ kālaṁ śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ
"हे द्विजोत्तमो, गृहस्थों के लिए अतिथि तीन प्रकार का कहा गया है; मैं उसका समय बताता हूँ, सावधान होकर सुनो।"
श्लोक 11 (skanda.6.186.11)
श्राद्धीयो वैश्वदेवीयः सूर्योढश्च तृतीयकः । ये चान्ये भोजनार्थीयास्ते सामान्याः प्रकीर्तिता
śrāddhīyo vaiśvadevīyaḥ sūryoḍhaśca tṛtīyakaḥ ye cānye bhojanārthīyāste sāmānyāḥ prakīrtitā
"श्राद्धीय, वैश्वदेवीय, और तीसरा सूर्योढ; जो अन्य केवल भोजन के अभिलाषी होकर आते हैं, वे सामान्य कहलाते हैं।"
श्लोक 12 (skanda.6.186.12)
सांकल्पे विहिते श्राद्धे पितॄणां भोजनोद्भवे । समागच्छति यः काले तस्मिञ्छ्राद्धीय एव सः
sāṁkalpe vihite śrāddhe pitṝṇāṁ bhojanodbhave samāgacchati yaḥ kāle tasmiñchrāddhīya eva saḥ
"पितरों के भोजन हेतु संकल्पपूर्वक विहित श्राद्ध के समय जो आ पहुँचे, वही श्राद्धीय अतिथि है।"
श्लोक 13 (skanda.6.186.13)
दूराध्वानं पथि श्रांतं वैश्वदेवांत आगतम् । अतिथिं तं विजानीयान्नातिथिः पूर्वमागतः
dūrādhvānaṁ pathi śrāṁtaṁ vaiśvadevāṁta āgatam atithiṁ taṁ vijānīyānnātithiḥ pūrvamāgataḥ
"दूर मार्ग से थका हुआ, वैश्वदेव के अंत में आने वाले को ही अतिथि जानना चाहिए; पहले आया हुआ व्यक्ति इस अर्थ में अतिथि नहीं है।"
श्लोक 14 (skanda.6.186.14)
प्रियो वा यदि वा द्वेष्यो मूर्खः पंडित एव वा । वैश्वदेवे तु संप्राप्तः सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः
priyo vā yadi vā dveṣyo mūrkhaḥ paṁḍita eva vā vaiśvadeve tu saṁprāptaḥ so'tithiḥ svargasaṁkramaḥ
"चाहे प्रिय हो या द्वेष्य, मूर्ख हो या पंडित, जो वैश्वदेव के समय ही आ पहुँचे, वही अतिथि स्वर्ग का साधन है।"
श्लोक 15 (skanda.6.186.15)
न पृच्छेद्गोत्रचरणं न स्थानं वेदमेव च । दृष्ट्वा यज्ञोपवीतं च भोजयेत्तं प्रभक्तितः
na pṛcchedgotracaraṇaṁ na sthānaṁ vedameva ca dṛṣṭvā yajñopavītaṁ ca bhojayettaṁ prabhaktitaḥ
"उससे गोत्र, आचरण, स्थान अथवा वेद के विषय में न पूछे; उसका यज्ञोपवीत देखकर ही उसे भक्तिपूर्वक भोजन कराए।"
श्लोक 16 (skanda.6.186.16)
श्राद्धे वा वैश्वदेवे वा यद्यागच्छति नातिथिः । घृताहुतिं ततो दद्यात्तन्नाम्ना च हविर्भुजि
śrāddhe vā vaiśvadeve vā yadyāgacchati nātithiḥ ghṛtāhutiṁ tato dadyāttannāmnā ca havirbhuji
"यदि श्राद्ध या वैश्वदेव के समय कोई अतिथि न आए, तो उसके नाम से हविष्यभोजी अग्नि में घृत की आहुति देनी चाहिए।"
श्लोक 17 (skanda.6.186.17)
अशक्त्या भोज्यदानस्य देयं भक्त्या ततः परम् । तस्यान्नमपि तु स्तोकं येन तुष्टिं प्रगच्छति
aśaktyā bhojyadānasya deyaṁ bhaktyā tataḥ param tasyānnamapi tu stokaṁ yena tuṣṭiṁ pragacchati
"भोजन देने में असमर्थ होने पर भी भक्तिपूर्वक देना चाहिए — उसके लिए थोड़ा-सा भी अन्न, जिससे उसे तृप्ति प्राप्त हो।"
श्लोक 18 (skanda.6.186.18)
तथान्यश्च तृतीयस्तु सूर्योढोऽतिथिरुच्यते । कृते तु भोजने यस्तु रात्रौ वा चाधिगच्छति। तस्य शक्त्या प्रदातव्यं सस्यं च गृहमेधिना
tathānyaśca tṛtīyastu sūryoḍho'tithirucyate kṛte tu bhojane yastu rātrau vā cādhigacchati tasya śaktyā pradātavyaṁ sasyaṁ ca gṛhamedhinā
"तथा एक तीसरा भी है, जिसे सूर्योढ अतिथि कहते हैं — जो भोजन समाप्त हो जाने पर रात्रि में आ पहुँचे, उसे गृहस्थ को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न देना चाहिए।"
श्लोक 19 (skanda.6.186.19)
सूर्योढो यस्य संप्राप्तो गृहात्पूजां विना व्रजेत्। निराशः पातकं तस्य निजं दत्त्वा प्रयाति सः। तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता। एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यंते कदाचन
sūryoḍho yasya saṁprāpto gṛhātpūjāṁ vinā vrajet nirāśaḥ pātakaṁ tasya nijaṁ dattvā prayāti saḥ tṛṇāni bhūmirudakaṁ vākcaturthī ca sūnṛtā etānyapi satāṁ gehe nocchidyaṁte kadācana
"जिस घर से आया हुआ सूर्योढ अतिथि पूजा पाए बिना निराश होकर चला जाता है, वह अपना पाप वहीं देकर चला जाता है। तृण (आसन हेतु), भूमि, जल, और चौथी मधुर वाणी — ये सज्जनों के घर में कभी समाप्त नहीं होतीं।"
श्लोक 20 (skanda.6.186.20)
स्वागतेनाग्नयस्तृप्तिं गृहस्थस्य प्रयांति च । आसनेन व्रजेत्तुष्टिं स्वयंभूः प्रपितामहः
svāgatenāgnayastṛptiṁ gṛhasthasya prayāṁti ca āsanena vrajettuṣṭiṁ svayaṁbhūḥ prapitāmahaḥ
"सुस्वागत से अग्निदेव गृहस्थ के लिए तृप्ति को प्राप्त होते हैं; आसन देने से स्वयंभू प्रपितामह (ब्रह्मा) तृप्त होते हैं।"
श्लोक 21 (skanda.6.186.21)
अर्घेण शंभुः पाद्येन सर्वे देवाः सवासवाः । भोज्यदानेन विष्णुः स्यात्सर्वदेवमयोऽतिथिः
argheṇa śaṁbhuḥ pādyena sarve devāḥ savāsavāḥ bhojyadānena viṣṇuḥ syātsarvadevamayo'tithiḥ
"अर्घ्य देने से शम्भु, पाद्य (चरण-जल) देने से वासव सहित समस्त देवगण; भोजनदान से विष्णु तृप्त होते हैं — अतिथि सभी देवताओं का स्वरूप है।"
श्लोक 22 (skanda.6.186.22)
तस्मात्पूज्यः सदा विप्रा भोजनीयो विशेषतः । नामाप्युच्चार्य भोज्योऽन्यो ब्राह्मणो गृहमेधिना
tasmātpūjyaḥ sadā viprā bhojanīyo viśeṣataḥ nāmāpyuccārya bhojyo'nyo brāhmaṇo gṛhamedhinā
"इसलिए, हे विप्रो, अतिथि सदा पूज्य है, विशेषरूप से भोजनीय है; अन्य ब्राह्मण को तो गृहस्थ नाम लेकर ही भोजन कराए।"