नागर खण्ड · अध्याय 187
राक्षसप्राप्यश्राद्ध वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.187.1)
सूत उवाच । चतुर्थे दिवसे प्राप्ते ततो यज्ञसमुद्भवे । ऋत्विग्भिर्याज्ञिकं कर्म प्रारब्धं तदनंतरम्
sūta uvāca caturthe divase prāpte tato yajñasamudbhave ṛtvigbhiryājñikaṁ karma prārabdhaṁ tadanaṁtaram
सूत जी ने कहा — यज्ञ का चौथा दिन आने पर, ऋत्विजों ने तत्पश्चात याज्ञिक कर्म आरम्भ किया।
श्लोक 2 (skanda.6.187.2)
सोमपानादिकं सर्वं पशोर्हिंसादिकं तथा । पशोर्गुदं समादाय प्रस्थाता च व्यधारयत्
somapānādikaṁ sarvaṁ paśorhiṁsādikaṁ tathā paśorgudaṁ samādāya prasthātā ca vyadhārayat
सोमपान आदि सब कार्य, तथा पशु-हिंसा आदि भी सम्पन्न हुए; प्रस्तोता ने पशु का गुदा ग्रहण करके उसे थाम रखा।
श्लोक 3 (skanda.6.187.3)
एकांते सदसो मध्ये होमार्थं द्विजसत्तमाः । तस्मिन्व्याकुलतां याते ब्राह्मणः कश्चिदागतः
ekāṁte sadaso madhye homārthaṁ dvijasattamāḥ tasminvyākulatāṁ yāte brāhmaṇaḥ kaścidāgataḥ
सभा के मध्य एक कोने में, होम हेतु, हे द्विजसत्तमो — जब वहाँ व्याकुलता फैली हुई थी, तभी कोई ब्राह्मण वहाँ आया,
श्लोक 4 (skanda.6.187.4)
युवा तत्र प्रविष्टस्तु मांस भक्षणलालसः । ततो गुदं पशोर्दृष्ट्वा भक्षयामास चोत्सुकं
yuvā tatra praviṣṭastu māṁsa bhakṣaṇalālasaḥ tato gudaṁ paśordṛṣṭvā bhakṣayāmāsa cotsukaṁ
मांस खाने का इच्छुक एक युवक; उसने पशु का गुदा देखकर उत्सुकतापूर्वक उसे खा लिया।
श्लोक 5 (skanda.6.187.5)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तः प्रस्थाता तस्य संनिधौ । भक्षमाणं समालोक्य तं शशाप ततः परम्
etasminnaṁtare prāptaḥ prasthātā tasya saṁnidhau bhakṣamāṇaṁ samālokya taṁ śaśāpa tataḥ param
इसी बीच प्रस्तोता उसके समीप आ पहुँचे, और उसे खाते देखकर उसे शाप दे दिया —
श्लोक 6 (skanda.6.187.6)
धिग्धिक्पापसमाचार होमार्थं यद्गुदं धृतम् । तत्त्वया दूषितं लौल्याद्यज्ञविघ्नकरं कृतम्
dhigdhikpāpasamācāra homārthaṁ yadgudaṁ dhṛtam tattvayā dūṣitaṁ laulyādyajñavighnakaraṁ kṛtam
"धिक्कार है, धिक्कार है, हे पापाचारी! होम हेतु रखे गए इस गुदे को तूने लोभवश दूषित करके यज्ञ में विघ्न डाला है।"
श्लोक 7 (skanda.6.187.7)
उच्छिष्टेन मया होमः कर्तव्यो नैव सांप्रतम् । राक्षसानामिदं कर्म यत्त्वया समनुष्ठितम्
ucchiṣṭena mayā homaḥ kartavyo naiva sāṁpratam rākṣasānāmidaṁ karma yattvayā samanuṣṭhitam
"अब मैं तेरे द्वारा उच्छिष्ट किए गए इससे होम नहीं करूँगा — तूने जो यह कर्म किया है, यह राक्षसों का कर्म है।"
श्लोक 8 (skanda.6.187.8)
तस्मात्त्वं मम वाक्येन राक्षसो भव मा चिरम्
tasmāttvaṁ mama vākyena rākṣaso bhava mā ciram
"इसलिए, मेरे वचन से, तू शीघ्र ही राक्षस बन जा।"
श्लोक 9 (skanda.6.187.9)
एतस्मिन्नेव काले तु ह्यूर्ध्वकेशोऽभवद्धि सः । रक्ताक्षः शंकुकर्णश्च कृष्णदन्तोऽतिभैरवः
etasminneva kāle tu hyūrdhvakeśo'bhavaddhi saḥ raktākṣaḥ śaṁkukarṇaśca kṛṣṇadanto'tibhairavaḥ
उसी क्षण वह वैसा ही हो गया — उसके केश खड़े हो गए, नेत्र लाल हो गए, कान शंकु के समान, दाँत काले, अत्यंत भयंकर,
श्लोक 10 (skanda.6.187.10)
लम्बोष्ठो विकरालास्यो मांसमेदोविवर्जितः । त्वगस्थिस्नायुशेषश्च। चामुण्डाकृतिरेव च
lamboṣṭho vikarālāsyo māṁsamedovivarjitaḥ tvagasthisnāyuśeṣaśca cāmuṇḍākṛtireva ca
होंठ लटके हुए, मुख विकृत, मांस-मेद से रहित, केवल त्वचा, अस्थि और स्नायु शेष, चामुण्डा के समान आकृति वाला।
श्लोक 11 (skanda.6.187.11)
स च विश्वावसुर्नाम पुलस्त्यस्य सुतो मुनिः । मंत्रपूतस्य मांसस्य भक्षणार्थं समागतः
sa ca viśvāvasurnāma pulastyasya suto muniḥ maṁtrapūtasya māṁsasya bhakṣaṇārthaṁ samāgataḥ
उसका नाम विश्वावसु था, एक मुनि, पुलस्त्य का पुत्र, जो मन्त्रपूत मांस खाने के लिए वहाँ आया था,
श्लोक 12 (skanda.6.187.12)
वेदवेदांगतत्त्वजः पौत्रस्तु परमेष्ठिनः । तं दृष्ट्वा राक्षसाकारं वित्रेसुः सर्वतो द्विजाः
vedavedāṁgatattvajaḥ pautrastu parameṣṭhinaḥ taṁ dṛṣṭvā rākṣasākāraṁ vitresuḥ sarvato dvijāḥ
वेद-वेदांग के तत्त्व का ज्ञाता, परमेष्ठी (ब्रह्मा) का पौत्र। उसे राक्षस के रूप में देखकर ब्राह्मण चारों ओर काँप उठे।
श्लोक 13 (skanda.6.187.13)
राक्षोघ्नानि च सूक्तानि जजपुश्चापरे तथा । केचिच्छरणमापन्ना विष्णो रुद्रस्य चापरे
rākṣoghnāni ca sūktāni jajapuścāpare tathā keciccharaṇamāpannā viṣṇo rudrasya cāpare
कुछ ने राक्षस-नाशक सूक्तों का जप किया; कुछ विष्णु की शरण में गए, कुछ रुद्र की,
श्लोक 14 (skanda.6.187.14)
पितामहस्य चान्ये तु गायत्र्याः शरणं गताः । रक्षरक्षेति जल्पन्तो भयसंत्रस्तमानसाः
pitāmahasya cānye tu gāyatryāḥ śaraṇaṁ gatāḥ rakṣarakṣeti jalpanto bhayasaṁtrastamānasāḥ
और कुछ पितामह की तथा गायत्री की शरण में गए, "रक्षा करो, रक्षा करो" कहते हुए, भय से त्रस्त मन वाले।
श्लोक 15 (skanda.6.187.15)
सोऽपि दृष्ट्वा तदात्मानं गतं राक्षसतां द्विजाः । बाष्पपूर्णेक्षणो दीनः पितामहमुपाद्रवत्
so'pi dṛṣṭvā tadātmānaṁ gataṁ rākṣasatāṁ dvijāḥ bāṣpapūrṇekṣaṇo dīnaḥ pitāmahamupādravat
वह भी स्वयं को राक्षस बना हुआ देखकर, आँसुओं से भरे नेत्रों वाला, दीन होकर पितामह के पास दौड़ा गया।
श्लोक 16 (skanda.6.187.16)
स प्रणम्य ततो वाक्यं कृतांजलिरुवाच तम् । पौत्रोऽहं तव देवेश पुलस्त्यस्य सुतो द्विजः । नीतो राक्षसतामद्य प्रस्थात्रा कोपतो विभो
sa praṇamya tato vākyaṁ kṛtāṁjaliruvāca tam pautro'haṁ tava deveśa pulastyasya suto dvijaḥ nīto rākṣasatāmadya prasthātrā kopato vibho
उन्हें प्रणाम करके, हाथ जोड़कर उसने यह वचन कहा — "हे देवेश, मैं आपका पौत्र हूँ, पुलस्त्य का पुत्र, एक ब्राह्मण — प्रस्तोता ने आज क्रोधवश मुझे राक्षस बना दिया है, हे विभो।"
श्लोक 17 (skanda.6.187.17)
जिह्वालौल्येन देवेश पशोर्गुदमजानता । भक्षितं तन्मया देव होमार्थं यत्प्रकल्पितम्
jihvālaulyena deveśa paśorgudamajānatā bhakṣitaṁ tanmayā deva homārthaṁ yatprakalpitam
"जिह्वा के लोभ से, हे देवेश, बिना जाने, मैंने होम हेतु तैयार किया गया पशु का गुदा खा लिया, हे देव।"
श्लोक 18 (skanda.6.187.18)
तस्मान्मानुषताप्राप्त्यै मम देहे दयां कुरु । राक्षसत्वं यथा याति तथा नीतिर्विधीयताम् ' तच्छ्रुत्वा जल्पितं तस्य दयां कृत्वा पितामहः । प्रतिप्रस्थातरं सामवाक्यमेतदुवाच ह
tasmānmānuṣatāprāptyai mama dehe dayāṁ kuru rākṣasatvaṁ yathā yāti tathā nītirvidhīyatām ' tacchrutvā jalpitaṁ tasya dayāṁ kṛtvā pitāmahaḥ pratiprasthātaraṁ sāmavākyametaduvāca ha
"इसलिए, मानवता पुनः प्राप्त करने के लिए, मेरे शरीर पर दया कीजिए; ऐसी व्यवस्था कीजिए जिससे यह राक्षसत्व दूर हो जाए।" उसकी यह विनती सुनकर, दयायुक्त होकर पितामह ने प्रतिप्रस्ताता से यह सान्त्वनापूर्ण वचन कहा —
श्लोक 19 (skanda.6.187.19)
बालोऽयं मम पौत्रस्तु कृत्याकृत्यं न वेत्ति च । तस्मात्त्वं राक्षसं भावं हरस्वास्य द्विजोत्तम
bālo'yaṁ mama pautrastu kṛtyākṛtyaṁ na vetti ca tasmāttvaṁ rākṣasaṁ bhāvaṁ harasvāsya dvijottama
"यह मेरा पौत्र है, अभी बालक है, कृत्य-अकृत्य को नहीं जानता। इसलिए, हे द्विजोत्तम, इसका राक्षसभाव दूर करो।"
श्लोक 20 (skanda.6.187.20)
तच्छ्रुत्वा स मुनिः प्राह प्रायश्चित्तं मखे तव । अनेन जनितं देव गुदं दूषयता विभो
tacchrutvā sa muniḥ prāha prāyaścittaṁ makhe tava anena janitaṁ deva gudaṁ dūṣayatā vibho
यह सुनकर उस मुनि ने कहा — "हे देव, यह आपके यज्ञ का ही प्रायश्चित्त है, क्योंकि इसी ने गुदे को दूषित करके यह घटना उत्पन्न की है।"
श्लोक 21 (skanda.6.187.21)
तस्मादेष मया शप्तो यज्ञविघ्नकरो मम । नाहमस्य हरिष्यामि राक्षसत्वं कथंचन
tasmādeṣa mayā śapto yajñavighnakaro mama nāhamasya hariṣyāmi rākṣasatvaṁ kathaṁcana
"इसलिए मेरे यज्ञ में विघ्न डालने वाले इसे मैंने शाप दिया है; मैं इसका राक्षसत्व किसी भी प्रकार दूर नहीं करूँगा।"
श्लोक 22 (skanda.6.187.22)
नर्मणापि मया प्रोक्तं कदाचिन्नानृतं वचः । ब्रह्मोवाच । प्रायश्चित्तं करिष्येऽहं यज्ञस्यास्य प्रसिद्धये । दक्षिणा गौर्यथोक्ता च कृत्वा होमं विधानतः । त्वमस्य राक्षसं भावं 'हरस्व मम वाक्यतः
narmaṇāpi mayā proktaṁ kadācinnānṛtaṁ vacaḥ brahmovāca prāyaścittaṁ kariṣye'haṁ yajñasyāsya prasiddhaye dakṣiṇā gauryathoktā ca kṛtvā homaṁ vidhānataḥ tvamasya rākṣasaṁ bhāvaṁ 'harasva mama vākyataḥ
"हास्य में भी मैंने कभी असत्य वचन नहीं कहा।" ब्रह्मा ने कहा — "मैं स्वयं इस यज्ञ की सिद्धि हेतु प्रायश्चित्त करूँगा — विधिपूर्वक होम करके तथा उक्त गौ दक्षिणा देकर, तुम मेरे वचन से इसका राक्षसभाव दूर करो।"
श्लोक 23 (skanda.6.187.23)
सोऽब्रवीच्छीतलो वह्निर्यदि स्यादुष्णगुः शशी । तन्मे स्यादन्यथा वाक्यं व्याहृतं प्रपितामह
so'bravīcchītalo vahniryadi syāduṣṇaguḥ śaśī tanme syādanyathā vākyaṁ vyāhṛtaṁ prapitāmaha
उसने कहा — "यदि अग्नि शीतल हो जाए, यदि चन्द्रमा उष्णकिरण हो जाए — तभी, हे प्रपितामह, आपके सामने कहा गया मेरा यह वचन अन्यथा हो सकता है।"
श्लोक 24 (skanda.6.187.24)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा चैव तु निश्चितम्। विश्वावसुं विधिः प्राह ततो राक्षसरूपिणम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā jñātvā caiva tu niścitam viśvāvasuṁ vidhiḥ prāha tato rākṣasarūpiṇam
उसका यह दृढ़ निश्चित वचन सुनकर, विधाता ने तब राक्षस-रूपधारी विश्वावसु से कहा —
श्लोक 25 (skanda.6.187.25)
त्वं वत्सानेन रूपेण तिष्ठ तावद्वचो मम । कुरुष्व ते प्रयच्छामि येन स्थानमनुत्तमम्
tvaṁ vatsānena rūpeṇa tiṣṭha tāvadvaco mama kuruṣva te prayacchāmi yena sthānamanuttamam
"हे वत्स, अभी तुम इसी रूप में मेरे वचन के अनुसार रहो; मैं तुम्हें एक सर्वोत्तम स्थान प्रदान करता हूँ।"
श्लोक 26 (skanda.6.187.26)
चमत्कारपुरस्यास्य पश्चिमस्थानमाश्रिताः । सन्त्यन्ये राक्षसास्तत्र मर्यादायां व्यवस्थिताः
camatkārapurasyāsya paścimasthānamāśritāḥ santyanye rākṣasāstatra maryādāyāṁ vyavasthitāḥ
"इस चमत्कारपुर के पश्चिम भाग में अन्य राक्षस रहते हैं, वहाँ अपनी मर्यादा में स्थित।"
श्लोक 27 (skanda.6.187.27)
लंकायां राक्षसाश्चैव प्रार्थयन्तोऽत्र सद्गतिम् । ते चागत्य तमुद्देशं तपः कुर्वंति सुव्रताः । तत्र प्रभुत्वमातिष्ठ नागराणां हिते स्थितः । राक्षसा बहवः संति कूष्मांडाश्च पिशाचकाः
laṁkāyāṁ rākṣasāścaiva prārthayanto'tra sadgatim te cāgatya tamuddeśaṁ tapaḥ kurvaṁti suvratāḥ tatra prabhutvamātiṣṭha nāgarāṇāṁ hite sthitaḥ rākṣasā bahavaḥ saṁti kūṣmāṁḍāśca piśācakāḥ
"तथा लंका के राक्षस भी यहाँ सद्गति की कामना से उस स्थान पर आकर सुव्रत होकर तपस्या करते हैं। वहाँ तुम, नागरों के हित में स्थित होकर, प्रभुत्व प्राप्त करो। वहाँ अनेक राक्षस हैं, तथा कूष्माण्ड और पिशाच भी।"
श्लोक 28 (skanda.6.187.28)
ये चान्ये राक्षसाः केचिद्दुष्टभावसमाश्रिताः । तत्र गच्छंति ये सर्वे निगृह्णंति च तत्क्षणात्
ye cānye rākṣasāḥ kecidduṣṭabhāvasamāśritāḥ tatra gacchaṁti ye sarve nigṛhṇaṁti ca tatkṣaṇāt
"जो अन्य राक्षस भी दुष्टभाव से युक्त होकर वहाँ आएँ — उन सबको तुम तत्क्षण पकड़ लेना।"
श्लोक 29 (skanda.6.187.29)
भूताः प्रेताः पिशाचाश्च कूष्मांडाश्च विशेषतः। नागरं तु पुरो दृष्ट्वा तद्भयाद्यांति दूरतः
bhūtāḥ pretāḥ piśācāśca kūṣmāṁḍāśca viśeṣataḥ nāgaraṁ tu puro dṛṣṭvā tadbhayādyāṁti dūrataḥ
"भूत, प्रेत, पिशाच, और विशेषतः कूष्माण्ड, नागर नगर को सामने देखकर उसके भय से दूर भाग जाते हैं।"
श्लोक 30 (skanda.6.187.30)
तद्गच्छ पुत्र तत्र त्वं सर्वेषामधिपो भव । राक्षसानां मया दत्तं तव राज्यं च सांप्रतम्
tadgaccha putra tatra tvaṁ sarveṣāmadhipo bhava rākṣasānāṁ mayā dattaṁ tava rājyaṁ ca sāṁpratam
"इसलिए, हे पुत्र, वहाँ जाओ और उन सबके स्वामी बनो; राक्षसों का यह राज्य अब मैंने तुम्हें दे दिया है।"
श्लोक 31 (skanda.6.187.31)
राक्षस उवाच । आधिपत्ये स्थितस्यैवं राक्षसानां पितामह । किं मया तत्र भोक्तव्यं तेभ्यो देयं च किं वद
rākṣasa uvāca ādhipatye sthitasyaivaṁ rākṣasānāṁ pitāmaha kiṁ mayā tatra bhoktavyaṁ tebhyo deyaṁ ca kiṁ vada
राक्षस ने कहा — "हे पितामह, राक्षसों के आधिपत्य में इस प्रकार स्थित होकर, मुझे वहाँ क्या भोगना चाहिए, और उन्हें क्या देना चाहिए? मुझे बताइए।"
श्लोक 32 (skanda.6.187.32)
राज्ञा चैव यतो देयं भृत्यानां भोजनं विभो । तन्ममाचक्ष्व देवेश दयां कृत्वा ममोपरि
rājñā caiva yato deyaṁ bhṛtyānāṁ bhojanaṁ vibho tanmamācakṣva deveśa dayāṁ kṛtvā mamopari
"चूँकि राजा को अपने भृत्यों को भोजन देना ही चाहिए, हे देवेश, मुझ पर दया करके यह भी बताइए।"
श्लोक 33 (skanda.6.187.33)
न करोति च यो राजा। भृत्यवर्गस्य पोषणम्। रौरवं नरकं याति स एवं हि श्रुतं मया
na karoti ca yo rājā bhṛtyavargasya poṣaṇam rauravaṁ narakaṁ yāti sa evaṁ hi śrutaṁ mayā
"जो राजा अपने भृत्यवर्ग का पोषण नहीं करता, वह रौरव नरक को प्राप्त होता है — ऐसा मैंने सुना है।"
श्लोक 34 (skanda.6.187.34)
ब्रह्मोवाच । यच्छ्राद्धं दक्षिणाहीनं तिलैर्दर्भैर्विवर्जितम् । तत्सर्वं ते मया दत्तं यद्यपि स्यात्सुतीर्थगम्
brahmovāca yacchrāddhaṁ dakṣiṇāhīnaṁ tilairdarbhairvivarjitam tatsarvaṁ te mayā dattaṁ yadyapi syātsutīrthagam
ब्रह्मा ने कहा — "दक्षिणा से रहित, तिल और दर्भ से रहित जो श्राद्ध होगा — वह सब मैंने तुम्हें दे दिया, चाहे वह उत्तम तीर्थ में ही क्यों न हुआ हो।"
श्लोक 35 (skanda.6.187.35)
यच्छ्राद्धं सूकरः पश्येन्नारी वाथ रजस्वला । कौलेयकोऽथ वालेयस्तत्सर्वं ते भविष्यति
yacchrāddhaṁ sūkaraḥ paśyennārī vātha rajasvalā kauleyako'tha vāleyastatsarvaṁ te bhaviṣyati
"जिस श्राद्ध को सूअर देख ले, अथवा रजस्वला नारी, अथवा कुत्ता, या जंगली गधा — वह सब तुम्हारा होगा।"
श्लोक 36 (skanda.6.187.36)
विधिहीनं तु यच्छ्राद्धं दर्भेर्वा मूलवर्जितैः । वितस्तेरधिकैर्वापि तत्सर्वं ते भविष्यति
vidhihīnaṁ tu yacchrāddhaṁ darbhervā mūlavarjitaiḥ vitasteradhikairvāpi tatsarvaṁ te bhaviṣyati
"जो श्राद्ध विधिहीन हो, जिसके दर्भ मूल-रहित हों अथवा एक वितस्ति (बित्ता) से अधिक लंबे हों — वह सब तुम्हारा होगा।"
श्लोक 37 (skanda.6.187.37)
तिलं वा तैलपक्वं वा शूकधान्यमथापि वा । न यत्र दीयते श्राद्धे तत्ते श्राद्धं भविष्यति
tilaṁ vā tailapakvaṁ vā śūkadhānyamathāpi vā na yatra dīyate śrāddhe tatte śrāddhaṁ bhaviṣyati
"जिस श्राद्ध में तिल, तेल में पका अन्न, अथवा शूकधान्य (आवन वाला अन्न) नहीं दिया जाता — वह श्राद्ध तुम्हारा होगा।"
श्लोक 38 (skanda.6.187.38)
अस्नातैर्यत्कृतं श्राद्धं यच्चाधौतांबरैः कृतम् । तैलाभ्यंगयुतैश्चैव तत्ते सर्वं भविष्यति
asnātairyatkṛtaṁ śrāddhaṁ yaccādhautāṁbaraiḥ kṛtam tailābhyaṁgayutaiścaiva tatte sarvaṁ bhaviṣyati
"जो श्राद्ध बिना स्नान किए, अथवा अधोत वस्त्र पहने हुए, अथवा तैलाभ्यंग किए हुए लोगों द्वारा किया जाए — वह सब तुम्हारा होगा।"
श्लोक 39 (skanda.6.187.39)
यद्वा माहिषिको भुंक्ते श्वित्री वा कुनखोऽपि वा । कुष्ठी वाथ द्विजो भुंक्ते तत्ते श्राद्धं भविष्यति
yadvā māhiṣiko bhuṁkte śvitrī vā kunakho'pi vā kuṣṭhī vātha dvijo bhuṁkte tatte śrāddhaṁ bhaviṣyati
"अथवा जहाँ भैंस चराने वाला खाए, या श्वेतकुष्ठी, या विकृत नखों वाला, या कुष्ठरोगी ब्राह्मण खाए — वह श्राद्ध तुम्हारा होगा।"
श्लोक 40 (skanda.6.187.40)
हीनांगो वाऽथ यद्भुंक्तेऽधिकांगो वाथ निंदितः । महाव्याधिगृहीतो वा चौरो वार्द्धुषिकोऽपि वा । यत्र भुंक्तेऽथवा श्राद्धे तत्ते श्राद्धं भविष्यति
hīnāṁgo vā'tha yadbhuṁkte'dhikāṁgo vātha niṁditaḥ mahāvyādhigṛhīto vā cauro vārddhuṣiko'pi vā yatra bhuṁkte'thavā śrāddhe tatte śrāddhaṁ bhaviṣyati
"जहाँ अंगहीन, या अधिकांग, या निन्दित व्यक्ति खाए, अथवा महारोगग्रस्त, चोर, या सूदखोर श्राद्ध में खाए — वह तुम्हारा होगा।"
श्लोक 41 (skanda.6.187.41)
श्यावदन्तस्तु यद्भुंक्ते यद्भुंक्ते वृषलीपतिः । विनग्नो वाथ यद्भुंक्ते तत्ते श्राद्धं भविष्यति
śyāvadantastu yadbhuṁkte yadbhuṁkte vṛṣalīpatiḥ vinagno vātha yadbhuṁkte tatte śrāddhaṁ bhaviṣyati
"जहाँ काले दाँतों वाला खाए, या शूद्रा-पति खाए, अथवा नग्न व्यक्ति खाए — वह श्राद्ध तुम्हारा होगा।"
श्लोक 42 (skanda.6.187.42)
यो यज्ञो दक्षिणाहीनो यश्चाशौचयुतैः कृतः । ब्रह्मचर्यविहीनस्तु तत्फलं ते भविष्यति
yo yajño dakṣiṇāhīno yaścāśaucayutaiḥ kṛtaḥ brahmacaryavihīnastu tatphalaṁ te bhaviṣyati
"जो यज्ञ दक्षिणाहीन हो, अशौचयुक्तों द्वारा किया गया हो, ब्रह्मचर्यहीन हो — उसका फल तुम्हारा होगा।"
श्लोक 43 (skanda.6.187.43)
यस्मिन्नैवातिथिः पूज्यः श्राद्धे वा यज्ञकर्मणि । संप्राप्ते वैश्वदेवांते तत्ते सर्वं भविष्यति आवाहनात्परं यत्र मौनं न श्राद्धदश्चरेत्। ब्राह्मणो वाऽथ भोक्ता च तत्ते श्राद्धं भविष्यति
yasminnaivātithiḥ pūjyaḥ śrāddhe vā yajñakarmaṇi saṁprāpte vaiśvadevāṁte tatte sarvaṁ bhaviṣyati āvāhanātparaṁ yatra maunaṁ na śrāddhadaścaret brāhmaṇo vā'tha bhoktā ca tatte śrāddhaṁ bhaviṣyati
"जहाँ श्राद्ध या यज्ञकर्म में, वैश्वदेव के अंत में पहुँचकर भी अतिथि का पूजन न हो — वह सब तुम्हारा होगा। जहाँ आवाहन के पश्चात मौन का पालन न करते हुए ब्राह्मण या भोक्ता आचरण करे — वह श्राद्ध तुम्हारा होगा।"
श्लोक 44 (skanda.6.187.44)
मृन्मयेषु च पात्रेषु यः श्राद्धं कुरुते नरः । भिन्नपात्रेषु वा यच्च तत्ते सर्वं भविष्यति
mṛnmayeṣu ca pātreṣu yaḥ śrāddhaṁ kurute naraḥ bhinnapātreṣu vā yacca tatte sarvaṁ bhaviṣyati
"जो मनुष्य मिट्टी के पात्रों में, अथवा टूटे-फूटे पात्रों में श्राद्ध करता है — वह सब तुम्हारा होगा।"
श्लोक 45 (skanda.6.187.45)
प्रत्यक्षलवणं यत्र तक्रं वा विकृतं भवेत् । जातीपुष्पप्रदानं च तत्ते सर्वं भविष्यति
pratyakṣalavaṇaṁ yatra takraṁ vā vikṛtaṁ bhavet jātīpuṣpapradānaṁ ca tatte sarvaṁ bhaviṣyati
"जहाँ नमक खुले रूप में रखा जाए, या छाछ विकृत हो, तथा जहाँ जाति (चमेली) के पुष्पों का अनुचित दान हो — वह सब तुम्हारा होगा।"
श्लोक 46 (skanda.6.187.46)
यजमानो द्विजो वाथ ब्रह्मचर्यविवर्जितः । तच्छ्राद्धं ते मया दत्तं त्रिपात्रेण विवर्जितम्
yajamāno dvijo vātha brahmacaryavivarjitaḥ tacchrāddhaṁ te mayā dattaṁ tripātreṇa vivarjitam
"यदि यजमान अथवा उपस्थित ब्राह्मण ब्रह्मचर्यहीन हो — वह श्राद्ध, तीन पात्रों से रहित, मैं तुम्हें दे देता हूँ।"
श्लोक 47 (skanda.6.187.47)
आयसेन तु पात्रेण यत्रान्नं च प्रदीयते । तच्छ्राद्धं ते मया दत्तं तथान्यदपि हीयते
āyasena tu pātreṇa yatrānnaṁ ca pradīyate tacchrāddhaṁ te mayā dattaṁ tathānyadapi hīyate
"जहाँ लोहे के पात्र में अन्न दिया जाता है — वह श्राद्ध मैं तुम्हें दे देता हूँ, और उसमें अन्य भी हीन रहता है।"
श्लोक 48 (skanda.6.187.48)
मंत्रक्रियाभ्यां यत्किचिद्रात्रौ दत्तं हुतं तथा । सक्रांतिसोमपर्वभ्यां व्यति रिक्तं तु कुत्सितम्
maṁtrakriyābhyāṁ yatkicidrātrau dattaṁ hutaṁ tathā sakrāṁtisomaparvabhyāṁ vyati riktaṁ tu kutsitam
"संक्रान्ति और सोमपर्व के अवसरों के अतिरिक्त जो कुछ भी मन्त्र-क्रिया से रात्रि में दिया या हुत किया जाता है — वह निन्दित है।"
श्लोक 49 (skanda.6.187.49)
इत्युक्त्वा विररामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः । राक्षसः सोऽपि तत्रापि लेभे स्थानं तु राक्षसम्
ityuktvā virarāmāśu brahmā lokapitāmahaḥ rākṣasaḥ so'pi tatrāpi lebhe sthānaṁ tu rākṣasam
ऐसा कहकर लोक-पितामह ब्रह्मा शीघ्र मौन हो गए; और वह राक्षस भी वहीं राक्षसों के आधिपत्य का पद प्राप्त कर गया।